रियलिटी शो Lock Upp 2: Sach Ya Saza में अभिनेत्री और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर श्रेया कालरा ने अभिनेता कुशल टंडन को लेकर बड़ा दावा किया है। शो के दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि कुशल ने उन्हें सोशल मीडिया पर मैसेज किए थे, जबकि उस समय उनका नाम अभिनेत्री शिवांगी जोशी के साथ जोड़ा जा रहा था। हालांकि, इन आरोपों पर अब तक कुशल टंडन और शिवांगी जोशी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्रमोशनल शूट के बाद आए मैसेज शो में सह-प्रतियोगी शिल्पा शिंदे से बातचीत के दौरान श्रेया कालरा ने बताया कि उन्होंने टीवी शो Barsatein – Mausam Pyaar Ka के प्रमोशनल वीडियो में कुशल टंडन के साथ काम किया था। श्रेया के अनुसार, शूटिंग पूरी होने के बाद कुशल ने उन्हें इंस्टाग्राम पर मैसेज करना शुरू किया। उन्होंने दावा किया कि उस समय वह खुद भी एक रिश्ते में थीं और बाद में उन्हें पता चला कि कुशल और शिवांगी जोशी के बीच भी रिश्ता था। इसके बाद उन्होंने कुशल से बातचीत आगे नहीं बढ़ाई। शिवांगी से मुलाकात के दौरान क्या हुआ? श्रेया ने यह भी दावा किया कि बाद में जब उनकी मुलाकात शिवांगी जोशी से हुई, तब अभिनेत्री ने बताया कि कुशल ने कहा था कि सोशल मीडिया पर सबसे पहले श्रेया ने ही उन्हें मैसेज और फॉलो किया था। श्रेया ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने शिवांगी को अपनी पूरी चैट दिखाई, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि उन्होंने कभी भी फ्लर्ट या बातचीत की शुरुआत नहीं की थी। ब्रेकअप का भी किया जिक्र श्रेया कालरा ने शो में यह भी दावा किया कि कुछ महीनों बाद कुशल टंडन ने इंस्टाग्राम स्टोरी के जरिए शिवांगी जोशी से अपने अलग होने की जानकारी साझा की थी। गौरतलब है कि कुशल ने वर्ष 2025 में सोशल मीडिया पर अपने ब्रेकअप की पुष्टि की थी, हालांकि बाद में वह पोस्ट हटा दी गई थी। क्या बोले कुशल और शिवांगी? फिलहाल श्रेया कालरा के इन आरोपों पर कुशल टंडन या शिवांगी जोशी की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। ऐसे में इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और दोनों पक्षों की प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है। Lock Upp 2 में बढ़ रहा है विवाद Lock Upp 2: Sach Ya Saza इन दिनों अपने विवादित खुलासों और कंटेस्टेंट्स के व्यक्तिगत बयानों को लेकर लगातार चर्चा में है। शो में कई प्रतिभागी अपने निजी जीवन से जुड़े अनुभव साझा कर रहे हैं, जिससे दर्शकों के बीच इसकी चर्चा बनी हुई है।
श्रीनगर, एजेंसियां। इस वर्ष अमरनाथ यात्रा शुरू होने के महज पांच दिन के भीतर पवित्र हिम शिवलिंग (बाबा बर्फानी) के लगभग पूरी तरह पिघल जाने से करोड़ों श्रद्धालुओं में चिंता और जिज्ञासा बढ़ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह किसी एक वजह से नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, कम बर्फबारी और गुफा क्षेत्र में बढ़ी मानवीय गतिविधियों का संयुक्त प्रभाव हो सकता है। प्राकृतिक प्रक्रिया पर पड़ा मौसम का असर वैज्ञानिकों के अनुसार अमरनाथ गुफा में बनने वाला हिम शिवलिंग पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रिया से बनता है। गुफा की छत से टपकने वाली पानी की बूंदें कम तापमान में जमकर बर्फ का स्तंभ बनाती हैं। इस बार सर्दियों में अपेक्षाकृत कम बर्फबारी, अधिक तापमान और मौसम के बदलते पैटर्न के कारण शिवलिंग अपेक्षित आकार नहीं ले सका और जल्दी पिघल गया। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या भी मानी जा रही वजह विशेषज्ञों का मानना है कि यात्रा के शुरुआती दिनों में ही रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालु गुफा तक पहुंचे। बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही, रोशनी, अस्थायी ढांचों और अन्य मानवीय गतिविधियों से गुफा के आसपास का तापमान प्रभावित हो सकता है, जिससे प्राकृतिक हिम शिवलिंग तेजी से पिघलने की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि इस संबंध में कोई अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है। आस्था बरकरार, यात्रा जारी हिम शिवलिंग के अंतर्ध्यान होने के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमी नहीं आई है। बड़ी संख्या में भक्त अब भी अमरनाथ गुफा पहुंचकर दर्शन कर रहे हैं। प्रशासन ने भी स्पष्ट किया है कि यात्रा पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार जारी रहेगी और श्रद्धालुओं की सुरक्षा व सुविधाओं के पूरे इंतजाम किए गए हैं।
श्रीनगर: 3 जुलाई से शुरू होने वाली अमरनाथ यात्रा से पहले जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व स्तर पर कड़ी कर दी गई है। अनंतनाग पुलिस ने पहलगाम और आसपास के इलाकों में घर-घर तलाशी अभियान शुरू कर दिया है, ताकि आतंकी घुसपैठ की किसी भी कोशिश को समय रहते नाकाम किया जा सके। सुरक्षा एजेंसियां यात्रा मार्ग से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की पहचान और पृष्ठभूमि की जांच कर रही हैं। इसके तहत घोड़ा संचालकों, ड्राइवरों, पिट्ठुओं और फोटोग्राफरों को अलग-अलग QR कोड वाले पहचान पत्र जारी किए गए हैं। बिना QR-ID यात्रियों के साथ नहीं जा सकेगा कोई पुलिस ने स्पष्ट किया है कि अब बिना वैध QR कोड और पहचान पत्र के कोई भी व्यक्ति यात्रियों के साथ पहाड़ पर नहीं जा सकेगा। सुरक्षा बल प्रत्येक आईडी कार्ड को स्कैन कर उसका सत्यापन कर रहे हैं, जिससे फर्जी पहचान के जरिए यात्रा मार्ग में प्रवेश की संभावना समाप्त हो सके। 2017 के आतंकी हमले से लिया सबक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के पीछे वर्ष 2017 की वह घटना भी है, जब 10 जुलाई को अनंतनाग में अमरनाथ यात्रियों की बस पर आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग की थी। इस हमले में आठ श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी, जबकि 19 अन्य घायल हुए थे। जांच में सामने आया था कि आतंकियों को स्थानीय स्तर पर मदद मिली थी और कुछ संदिग्ध लोग यात्रियों के बीच घुसपैठ करने में सफल रहे थे। इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए इस बार यात्रा से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति का विस्तृत सत्यापन किया जा रहा है। QR सिस्टम से रहेगा हर गतिविधि का रिकॉर्ड सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, QR कोड आधारित व्यवस्था से प्रत्येक घोड़ा संचालक, पिट्ठू, ड्राइवर और सेवा प्रदाता का पूरा डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा। किसी भी संदिग्ध गतिविधि या गड़बड़ी की स्थिति में संबंधित व्यक्ति की तुरंत पहचान कर कार्रवाई की जा सकेगी। स्थानीय लोगों ने किया स्वागत घोड़ा संचालकों और वाहन चालकों ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि QR कोड प्रणाली से न केवल उनकी पहचान सुनिश्चित हुई है, बल्कि इससे श्रद्धालुओं का भरोसा भी बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि अब फर्जी सेवा प्रदाताओं और ठगी की घटनाओं पर भी अंकुश लगेगा। 3 जुलाई से शुरू होगी 57 दिन की अमरनाथ यात्रा इस वर्ष अमरनाथ यात्रा 3 जुलाई 2026 से शुरू होकर 28 अगस्त 2026 (रक्षाबंधन) तक चलेगी। कुल 57 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा के लिए ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया 15 अप्रैल 2026 से शुरू हो चुकी है। प्रशासन को इस वर्ष भी लाखों श्रद्धालुओं के पवित्र गुफा तक पहुंचने की उम्मीद है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।