नई दिल्ली: युवाओं में तेजी से बढ़ते ई-सिगरेट (E-Cigarette) के इस्तेमाल को लेकर एक नया शोध सामने आया है, जिसने गंभीर चिंता बढ़ा दी है। अध्ययन के मुताबिक, 18 से 25 वर्ष के युवाओं में ई-सिगरेट का उपयोग शुरुआती संज्ञानात्मक गिरावट (Cognitive Decline) और डिमेंशिया के बढ़ते जोखिम से जुड़ा पाया गया है। यह शोध ऐसे समय में आया है जब दुनियाभर में किशोरों और युवाओं के बीच ई-सिगरेट का चलन तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि मस्तिष्क के विकास के महत्वपूर्ण चरणों में निकोटिन का प्रभाव सोचने-समझने की क्षमता पर नकारात्मक असर डाल सकता है। कैसे किया गया अध्ययन? इस क्रॉस-सेक्शनल स्टडी में थाईलैंड के 232 युवाओं को शामिल किया गया, जिन्हें दो समूहों में बांटा गया–ई-सिगरेट उपयोग करने वाले और नॉन-स्मोकर्स। शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क की कार्यक्षमता को मापने के लिए Montreal Cognitive Assessment जैसे टूल्स का इस्तेमाल किया, साथ ही ADHD (Attention-Deficit/Hyperactivity Disorder) और इमोशनल इंटेलिजेंस से जुड़े पहलुओं का भी आकलन किया गया। क्या निकला निष्कर्ष? अध्ययन में पाया गया कि: ई-सिगरेट उपयोग करने वालों में डिमेंशिया के जोखिम वाले व्यक्तियों की संख्या काफी अधिक थी। जो युवा एक महीने के भीतर ई-सिगरेट छोड़ने की योजना नहीं बना रहे थे, उनमें जोखिम 6 गुना तक बढ़ा पाया गया। वहीं, छह महीने तक छोड़ने की कोई योजना न रखने वालों में यह जोखिम 4 गुना अधिक था। हालांकि, ADHD के लक्षण और इमोशनल इंटेलिजेंस के स्तर में दोनों समूहों के बीच कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया। शुरुआती संकेत, लेकिन खतरे की घंटी विशेषज्ञों का कहना है कि यह अध्ययन डिमेंशिया की पुष्टि नहीं करता, बल्कि इसके शुरुआती संकेतों की ओर इशारा करता है। यानी यह जोखिम भविष्य में गंभीर बीमारी का रूप ले सकता है। कारण और सीमाएं शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह एक क्रॉस-सेक्शनल स्टडी है, इसलिए यह तय नहीं किया जा सकता कि ई-सिगरेट सीधे तौर पर डिमेंशिया का कारण बनती है। इसके पीछे अन्य सामाजिक या व्यवहारिक कारण भी हो सकते हैं। क्यों जरूरी है सतर्कता? स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अगर युवाओं में इस तरह के शुरुआती संज्ञानात्मक बदलाव बढ़ते हैं, तो भविष्य में यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि: युवाओं में ई-सिगरेट के नुकसान को लेकर जागरूकता बढ़ाई जाए निकोटिन की लत से बचने के लिए काउंसलिंग और रोकथाम कार्यक्रम चलाए जाएं आगे और लंबे समय तक चलने वाले शोध किए जाएं
नई दिल्ली: डिजिटल युग में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसका अत्यधिक इस्तेमाल अब मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बनता जा रहा है। हाल ही में सामने आए एक अध्ययन में पाया गया है कि स्मार्टफोन की लत युवा छात्रों में चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) के बढ़ते स्तर से जुड़ी हुई है। करीब 2,000 युवाओं पर किए गए इस शोध में 1,846 विश्वविद्यालय के छात्रों को शामिल किया गया, जिनकी औसत उम्र 19.6 वर्ष थी। अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि जिन छात्रों में स्मार्टफोन उपयोग की लत अधिक थी, उनमें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी ज्यादा देखने को मिलीं। कैसे मापी गई स्मार्टफोन की लत? शोधकर्ताओं ने स्मार्टफोन एडिक्शन को मापने के लिए “Smartphone Addiction Scale” का इस्तेमाल किया, साथ ही चिंता और अवसाद के स्तर को आंकने के लिए मान्यता प्राप्त टूल्स का उपयोग किया गया। परिणामों में पाया गया कि जो छात्र बार-बार फोन चेक करते हैं, फोन से अलग नहीं रह पाते हैं और जिनकी दिनचर्या इससे प्रभावित होती है, उनमें चिंता और डिप्रेशन के लक्षण काफी अधिक थे। पढ़ाई पर नहीं पड़ा सीधा असर दिलचस्प बात यह रही कि इस अध्ययन में स्मार्टफोन की लत और शैक्षणिक प्रदर्शन (Academic Performance) के बीच कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया। यानी छात्रों के नंबर भले प्रभावित न हों, लेकिन उनकी मानसिक और भावनात्मक स्थिति पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। पब्लिक हेल्थ के लिए बढ़ती चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्टफोन की लत अब एक उभरती हुई सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health) समस्या बनती जा रही है। युवा वर्ग, जो सबसे ज्यादा डिजिटल रूप से सक्रिय है, इस जोखिम के दायरे में सबसे आगे है। आज के समय में लगभग हर युवा के पास स्मार्टफोन है, ऐसे में यदि इसका मानसिक स्वास्थ्य पर थोड़ा भी नकारात्मक असर पड़ता है, तो यह बड़े स्तर पर गंभीर समस्या बन सकता है। शोध की सीमाएं भी समझना जरूरी हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि यह एक “क्रॉस-सेक्शनल स्टडी” है, इसलिए यह साबित नहीं किया जा सकता कि स्मार्टफोन की लत सीधे तौर पर चिंता और डिप्रेशन का कारण है। इसके पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। इसी साल मार्च के महीने में बोस्टन में अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन (AHA) की एक कॉन्फ्रेंस हुई। इसमें ताइवान की ‘नेशनल यांग मिंग चियाओ तुंग यूनिवर्सिटी’ ने रिसर्च पेश की। इसके मुताबिक, बेली फैट (तोंद) के कारण हार्ट डिजीज, खासकर हार्ट फेल्योर का रिस्क बढ़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, मोटापा एपिडेमिक बन गया है। एपिडेमिक यानी ऐसी बीमारी, जो दुनिया में बहुत तेजी से फैल रही है। मोटापे के कारण जानलेवा बीमारियों से पूरी दुनिया में हर साल 28 लाख एडल्ट्स की मौत होती है। इस वजह से हार्ट फेल्योर का खतरा नई रिसर्च के मुताबिक, बेली फैट से हार्ट फेल्योर का खतरा बढ़ सकता है। बेली फैट के कारण हार्ट फेल्योर की सबसे बड़ी वजह इंफ्लेमेशन है- बेली फैट से शरीर में इंफ्लेमेशन बढ़ता है। इससे ब्लड वेसल्स डैमेज होती हैं। इससे हार्ट टिशू प्रभावित होते हैं। इसलिए हार्ट फेल्योर का खतरा बढ़ता है। कैसे पता चलता है बैली फैट का BMI (बॉडी मास इंडेक्स) और बेली फैट दोनों सेहत के लिए जरूरी पैरामीटर्स हैं, लेकिन इन दोनों से अलग-अलग चीजें पता चलती हैं। BMI-यह मोटापे का पता लगाने के लिए जरूरी पैरामीटर है। इसमें लंबाई और वजन का रेशियो निकालकर तय किया जाता है कि व्यक्ति मोटा है या नहीं। हालांकि, BMI से यह नहीं पता चलता है कि शरीर में फैट कहां जमा है। इससे यह भी पता कर सकते हैं कि- कोई अंडरवेट है। नॉर्मल है। ओवरवेट है। या ओबीज कैटेगरी में है। बेली फैट- बेली फैट का मतलब पेट के आसपास जमा चर्बी है। इसे वेस्ट साइज मापकर पता किया जा सकता है। कमर का साइज स्वस्थ व्यक्ति की लंबाई के आधे से कम होना चाहिए। उदाहरण के लिए अगर किसी की लंबाई 170 सेंटीमीटर है तो फिट व्यक्ति की कमर का साइज 85 सेंटीमीटर से कम होना चाहिए। BMI आसान और सस्ता तरीका BMI को लंबे समय से मोटापे का पता लगाने के लिए जरूरी टूल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। यह इसलिए पॉपुलर हो गया क्योंकि आसान और सस्ता है। इससे रिस्क ट्रेंड समझने में मदद मिलती है, लेकिन यह उतना साइंटिफिक नहीं है। इसलिए इसकी लिमिट्स हैं- फैट और मसल का फर्क नहीं कर पाता कोई व्यक्ति (जैसे एथलीट) बहुत मस्कुलर हो सकता है। BMI उसे ओवरवेट दिखा सकता है, जबकि वह फिट हो सकता है। फैट कहां जमा है, पता नहीं चलता BMI नहीं बता सकता कि फैट पूरे शरीर में है या पेट में ज्यादा है। जबकि बेली फैट ज्यादा खतरनाक होता है। बैली फैट ज्यादा खतरनाक विशेषज्ञों के मुताबिक, BMI से सिर्फ लंबाई के रेशियो में वजन का पता चलता है। इससे यह नहीं पता चलता है कि शरीर में फैट कहां जमा है। नई रिसर्च, स्टडीज में बेली फैट को ज्यादा खतरनाक माना गया है। बेली फैट और विसरल फैट एक ही बैली फैट और विसरल फैट अलग नहीं होते, बल्कि आपस में जुड़े हुए हैं, समझिए कैसे- बेली फैट क्या होता है? पेट के आसपास की चर्बी को बेली फैट कहते हैं। यह दो तरह का होता है- स्किन के नीचे जमा फैट (सबक्यूटेनियस फैट) इंटरनल ऑर्गन्स के आसपास जमा फैट (विसरल फैट) विसरल फैट क्या है? यह बेली फैट का ही एक प्रकार है। यह इंटरनल ऑर्गन्स में जमा होता है। लिवर, आंत और अन्य अंगों के आसपास होता है। यह जरूरी नहीं है कि विसरल फैट हमेशा बाहर से दिखाई देगा। पेट पर जमा चर्बी हार्ट को कैसे नुकसान पहुंचाती है? बेली फैट अंदर-ही-अंदर हार्ट को कई तरह से नुकसान पहुंचाता है। विसरल फैट का रिस्क हर किसी को होता है, लेकिन कुछ लोगों में इसका रिस्क ज्यादा होता है। बेली फैट कम कैसे करे बेली फैट कम करने की कोई एक ट्रिक नहीं है। यह पूरी लाइफस्टाइल पर डिपेंड करता है। कुछ अच्छी आदतें अपनाकर इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसमें हेल्दी और लो डाइट, नियमित व्यायाम और योग शामिल हैं। बेली फैट कम करने के लिए क्या खाएं और क्या न खाएं? बेली फैट कम करने में डाइट का रोल सबसे अहम है। कोई क्या खाता-पीता है, इससे तय होता है कि शरीर में मसल्स बढ़ेगा या फैट। इसलिए समझिए क्या खाना चाहिए और क्या नहीं- क्या खाएं? 1. प्रोटीन वेज- दाल, राजमा, छोले, पनीर और दही। नॉन वेज- अंडे, चिकन और फिश। 2. फाइबर फल/सब्जियां- पालक, लौकी, सेब और अमरूद। मोटे अनाज- ओट्स और ब्राउन राइस। 3. हेल्दी फैट ड्राई फ्रूट्स- बादाम और अखरोट। सीड्स- अलसी और चिया सीड्स। 4. प्रोबायोटिक फूड डेयरी प्रोडक्ट- दही और छाछ। 5. पानी दिन में 2.5-3 लीटर। नारियल पानी। क्या न खाएं? 1.मीठा मिठाई, केक और चीनी। कोल्ड ड्रिंक और पैकेज्ड जूस। 2. रिफाइंड कार्ब मैदा-नान, पिज्जा और ब्रेड। पैकेज्ड बिस्किट और नमकीन। 3. प्रोसेस्ड और जंक फूड चिप्स और फ्राइड फूड। पैकेज्ड स्नैक्स।
एक बड़े फेज-3 ट्रायल में Tuberculosis (टीबी) वैक्सीन रणनीति के नतीजों से मिला-जुला संकेत मिला है। जहां कुल मिलाकर टीबी से बचाव सीमित रहा, वहीं कुछ खास मरीज समूहों में गंभीर (एक्स्ट्रापल्मोनरी) टीबी के खिलाफ बेहतर सुरक्षा देखी गई। क्या था ट्रायल? PreVenTB नाम का यह ट्रायल भारत के 18 केंद्रों पर किया गया, जिसमें 12,717 लोगों को शामिल किया गया। ये सभी ऐसे लोग थे जो टीबी मरीजों के संपर्क में थे। प्रतिभागियों को तीन समूहों में बांटा गया: VPM1002 Immuvac प्लेसीबो (डमी) करीब 38 महीनों तक यह देखा गया कि वैक्सीन टीबी को रोकने में कितनी प्रभावी है। कुल सुरक्षा क्यों रही सीमित? ट्रायल में पाया गया: VPM1002 लेने वालों में 1.68% को टीबी हुआ प्लेसीबो समूह में 2.13% Immuvac समूह में 2.09% यानी वैक्सीन का असर बहुत ज्यादा मजबूत नहीं था और आंकड़ों में अनिश्चितता (confidence interval) भी दिखी। सबसे अहम बात यह रही कि फेफड़ों की टीबी (Pulmonary TB) के खिलाफ कोई खास सुरक्षा नहीं दिखी, जबकि यही सबसे आम और फैलने वाला रूप है। कहां दिखा बेहतर असर? एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी (जो फेफड़ों के बाहर होती है) में बेहतर नतीजे सामने आए: VPM1002 ने लगभग 50% तक सुरक्षा दिखाई कुछ मरीजों में यह प्रभाव 60% से ज्यादा भी रहा खासतौर पर जिन लोगों का ट्यूबरक्युलिन स्किन टेस्ट पॉजिटिव था (यानी पहले से इम्यून प्रतिक्रिया मौजूद थी), उनमें वैक्सीन ज्यादा असरदार रही। बच्चों (6–14 साल) में भी बेहतर सुरक्षा के संकेत मिले, हालांकि इस पर और रिसर्च की जरूरत है। क्या सुरक्षित है वैक्सीन? दोनों वैक्सीन को सुरक्षित पाया गया। लगभग एक-तिहाई लोगों में हल्की स्थानीय प्रतिक्रिया (जैसे इंजेक्शन साइट पर दर्द/सूजन) देखी गई कोई गंभीर साइड इफेक्ट सामने नहीं आया इसका क्या मतलब है? यह स्टडी बताती है कि: अभी तक कोई भी टीबी वैक्सीन सभी प्रकार की टीबी से पूरी सुरक्षा नहीं दे पा रही लेकिन कुछ खास मरीज समूहों में गंभीर टीबी को रोकने में मदद मिल सकती है भविष्य में “टारगेटेड वैक्सीनेशन” (विशेष समूहों पर केंद्रित रणनीति) ज्यादा प्रभावी हो सकती है
ब्रेन कैंसर के सबसे खतरनाक प्रकार Glioblastoma (GBM) के इलाज को लेकर वैज्ञानिकों ने एक बड़ी सफलता हासिल की है। एक नई रिसर्च में ऐसी थेरेपी विकसित की गई है, जिसने प्रीक्लिनिकल मॉडल में अधिकांश मामलों में ट्यूमर को पूरी तरह खत्म कर दिया—वह भी बिना किसी विषाक्त प्रभाव (toxicity) या दोबारा लौटने (recurrence) के। कैसे काम करती है नई थेरेपी? इस अभिनव उपचार में Synthetic Super-Enhancers (SSEs) नामक तकनीक का उपयोग किया गया। यह तकनीक कैंसर स्टेम सेल्स के अपने जीन कंट्रोल सिस्टम को टारगेट करती है, जिससे केवल ट्यूमर कोशिकाओं पर असर होता है और स्वस्थ कोशिकाएं सुरक्षित रहती हैं। शोध के दौरान: सिर्फ एक बार थेरेपी देने पर 83% मामलों में ट्यूमर पूरी तरह खत्म हो गया 11 महीनों तक कोई साइड इफेक्ट या ट्यूमर की वापसी नहीं देखी गई दोबारा कैंसर सेल डालने पर भी नया ट्यूमर नहीं बना, जो लंबे समय तक सुरक्षा का संकेत देता है डबल एक्शन: ट्यूमर खत्म और इम्यून सिस्टम एक्टिव इस उपचार की खासियत इसका ड्यूल मैकेनिज्म है। इसमें: एक हिस्सा सीधे कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करता है दूसरा हिस्सा शरीर के इम्यून सिस्टम को सक्रिय करता है यह प्रक्रिया एक तरह के इन-सिटू वैक्सीन की तरह काम कर सकती है, जो शरीर को कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और भविष्य में उनसे लड़ने के लिए तैयार करती है। मरीजों के टिश्यू पर भी सफल परीक्षण शोधकर्ताओं ने इस तकनीक को GBM मरीजों के असली टिश्यू सैंपल्स पर भी परखा। नतीजों में पाया गया कि: थेरेपी ने केवल ट्यूमर कोशिकाओं को निशाना बनाया स्वस्थ ब्रेन सेल्स को कोई नुकसान नहीं पहुंचा यह पहलू बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि ब्रेन कैंसर के इलाज में आसपास के स्वस्थ टिश्यू को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होती है। आगे क्या? वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज ब्रेन कैंसर के इलाज में गेम-चेंजर साबित हो सकती है। अब टीम जल्द ही मानव परीक्षण (clinical trials) शुरू करने की योजना बना रही है, जिससे इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता को और बेहतर तरीके से समझा जा सके।
नई दिल्ली: वैश्विक स्तर पर दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है, और इसके पीछे सबसे बड़ा कारण खराब खानपान सामने आया है। Global Burden of Disease Study 2023 के ताजा विश्लेषण के मुताबिक, असंतुलित डाइट के कारण साल 2023 में इस्केमिक हार्ट डिजीज (IHD) से करीब 40.6 लाख मौतें हुईं, जबकि 9.68 करोड़ DALYs (डिसेबिलिटी-एडजस्टेड लाइफ ईयर्स) दर्ज किए गए। क्या है IHD और क्यों है खतरनाक? इस्केमिक हार्ट डिजीज एक ऐसी स्थिति है, जिसमें दिल तक खून का प्रवाह कम हो जाता है। यह आज भी दुनिया में मौत का प्रमुख कारण बनी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार, डाइट इसका सबसे बड़ा बदला जा सकने वाला (modifiable) जोखिम कारक है। किन खानपान की गलतियों से बढ़ रहा खतरा? रिपोर्ट में बताया गया कि कुछ प्रमुख डाइटरी फैक्टर्स इस बीमारी के जोखिम को बढ़ा रहे हैं: नट्स और सीड्स (मेवे और बीज) का कम सेवन – सबसे बड़ा कारण साबुत अनाज (Whole Grains) की कमी फलों का कम सेवन नमक (सोडियम) का अधिक सेवन आंकड़ों के अनुसार, नट्स और सीड्स की कमी से प्रति 1 लाख आबादी पर 9.87 मौतें जुड़ी हैं, जबकि साबुत अनाज और फलों की कमी से क्रमशः 9.22 और 7.25 मौतें दर्ज की गईं। गरीब देशों पर ज्यादा असर रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि लो और मिडिल इनकम देशों में इस बीमारी का बोझ ज्यादा है। इसका कारण पोषक तत्वों से भरपूर भोजन की कमी और प्रोसेस्ड फूड पर बढ़ती निर्भरता है। सुधार के बावजूद खतरा बरकरार हालांकि 1990 से 2023 के बीच खराब डाइट से जुड़ी मौतों की दर में करीब 43.92% की कमी आई है, लेकिन बढ़ती आबादी और उम्रदराज़ लोगों की संख्या के कारण कुल मामलों में कमी नहीं आ पाई है।
बीजिंग: चीन में हुई एक बड़ी स्टडी ने मेटाबॉलिक बीमारियों को लेकर एक दिलचस्प और चौंकाने वाला ट्रेंड सामने रखा है। 2026 की इस राष्ट्रीय स्तर की रिसर्च के अनुसार, कम सामाजिक-आर्थिक स्थिति (Low Socioeconomic Status) वाले लोगों में जहां हाई ब्लड प्रेशर और मोटापे का खतरा ज्यादा है, वहीं डायबिटीज और डिस्लिपिडेमिया (खून में फैट का असंतुलन) के मामले अपेक्षाकृत कम पाए गए। क्या कहती है स्टडी? यह शोध 2 लाख से ज्यादा लोगों पर आधारित था, जिसमें सामाजिक-आर्थिक स्थिति को शिक्षा, रहने की स्थिति और वैवाहिक स्थिति के आधार पर मापा गया। विश्लेषण में पाया गया कि सबसे निचले सामाजिक-आर्थिक वर्ग में मेटाबॉलिक बीमारियों का कुल प्रचलन सबसे ऊंचे वर्ग की तुलना में 87.1% अधिक था। किन बीमारियों का खतरा ज्यादा? सामाजिक-आर्थिक स्तर में हर एक अंक की गिरावट पर हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension) का खतरा लगभग 10% बढ़ा मोटापे (Obesity) का जोखिम भी करीब 10% बढ़ा लेकिन डायबिटीज में उल्टा ट्रेंड कम सामाजिक-आर्थिक वर्ग में डायबिटीज (Diabetes) का जोखिम लगभग 3% कम डिस्लिपिडेमिया का खतरा करीब 7% कम पाया गया यह ट्रेंड पारंपरिक सोच से अलग है, जहां आमतौर पर कम आय वर्ग में सभी बीमारियों का खतरा ज्यादा माना जाता है। पुरुष और महिलाओं में अलग असर स्टडी में जेंडर के आधार पर भी बड़ा अंतर सामने आया: महिलाओं में कम सामाजिक-आर्थिक स्थिति से मोटापा और हाई BP का खतरा ज्यादा जुड़ा पुरुषों में यह स्थिति डायबिटीज, मोटापा और डिस्लिपिडेमिया के कम जोखिम से जुड़ी पाई गई
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के ताउंसा शहर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच 331 बच्चे HIV पॉजिटिव पाए गए हैं। इस घटना ने पूरे देश के स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल में लापरवाही बनी संक्रमण की वजह? बीबीसी की जांच में सामने आया कि THQ ताउंसा अस्पताल में गंभीर लापरवाही बरती जा रही थी। मरीजों को लगाने वाली सिरिंज दोबारा इस्तेमाल की जा रही थीं एक ही दवा की शीशी (मल्टी-डोज वायल) से कई बच्चों को इंजेक्शन दिए गए 32 घंटे की अंडरकवर रिकॉर्डिंग में: 10 बार सिरिंज का दोबारा इस्तेमाल देखा गया 4 मामलों में वही दवा दूसरे बच्चों को दी गई विशेषज्ञों ने बताया बेहद खतरनाक संक्रामक रोग विशेषज्ञ Dr Altaf Ahmed के मुताबिक: सिरिंज का पिछला हिस्सा भी वायरस फैला सकता है सिर्फ नई सुई लगाने से खतरा खत्म नहीं होता यह तरीका HIV संक्रमण फैलाने के लिए बेहद खतरनाक है अन्य गंभीर खामियां भी उजागर जांच में अस्पताल की कार्यप्रणाली पर और भी सवाल उठे: 66 बार बिना स्टरलाइज्ड ग्लव्स के इंजेक्शन लगाए गए मेडिकल वेस्ट को बिना सुरक्षा के संभाला गया इस्तेमाल की गई सुइयां और दवाइयां खुले में पाई गईं कैसे सामने आया मामला? इस पूरे मामले का खुलासा 8 साल के बच्चे मोहम्मद अमीन की मौत के बाद हुआ। उसकी बहन असमा भी HIV पॉजिटिव पाई गई परिवार का आरोप है कि अस्पताल में संक्रमित सुई के कारण बच्चों को यह संक्रमण हुआ सबसे पहले निजी डॉक्टर Gul Qaiserani ने इस पैटर्न को पहचाना। उन्होंने बताया कि संक्रमित बच्चों में से अधिकांश का इलाज उसी अस्पताल में हुआ था। आंकड़े क्या बताते हैं? 97 संक्रमित बच्चों में से सिर्फ 4 की माताएं HIV पॉजिटिव थीं इससे संकेत मिलता है कि संक्रमण मां से नहीं, बल्कि अन्य कारणों से फैला आधे से ज्यादा मामलों में कारण: दूषित सुई (Contaminated Needle) प्रशासन ने आरोपों से किया इनकार अस्पताल प्रशासन ने इन आरोपों को खारिज किया है। नए सुपरिटेंडेंट Dr Qasim Buzdar ने कहा कि: वीडियो पुराना या स्टेज्ड हो सकता है वहीं, स्थानीय सरकार का कहना है कि अभी तक यह साबित नहीं हुआ कि संक्रमण का स्रोत वही अस्पताल है। हालांकि, एक लीक रिपोर्ट में अस्पताल में: दवाओं की कमी IV फ्लूइड का दोबारा इस्तेमाल खराब साफ-सफाई जैसी गंभीर कमियां सामने आईं। पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले Pakistan में इस तरह की घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं: 2019: सिंध के रतोदेरो में सैकड़ों बच्चे HIV पॉजिटिव 2021 तक संख्या 1500 पहुंची कराची में भी 84 बच्चों के संक्रमित होने का मामला विशेषज्ञ Dr Fatima Mir के अनुसार: यह पूरे सिस्टम में संक्रमण नियंत्रण की कमजोरी को दिखाता है जरूरत से ज्यादा इंजेक्शन देने की प्रवृत्ति भी एक बड़ा कारण है कितना खतरनाक है सिरिंज का दोबारा इस्तेमाल? संक्रमित खून सीधे दूसरे मरीज में पहुंच सकता है HIV जैसे वायरस तेजी से फैल सकते हैं नई सुई लगाने के बावजूद जोखिम बना रहता है ताउंसा का यह मामला केवल एक अस्पताल की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य सिस्टम की खामियों को उजागर करता है। सैकड़ों बच्चों का संक्रमित होना एक गंभीर चेतावनी है कि इन्फेक्शन कंट्रोल, मेडिकल सुरक्षा और निगरानी प्रणाली को तुरंत मजबूत करना बेहद जरूरी है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। बादाम को सुपरफूड माना जाता है और यह सेहत के लिए बेहद लाभकारी होता है। लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि बादाम को छीलकर खाना चाहिए या बिना छीले। न्यूट्रिशन एक्सपर्ट्स के अनुसार, दोनों तरीकों के अपने-अपने फायदे हैं, लेकिन सही तरीका जानना जरूरी है ताकि शरीर को अधिकतम पोषण मिल सके। छिलके में छिपे हैं जरूरी पोषक तत्व विशेषज्ञों के मुताबिक बादाम के छिलके में पॉलीफेनॉल्स, विटामिन E और डाइटरी फाइबर जैसे अहम पोषक तत्व मौजूद होते हैं। ये तत्व शरीर को एंटीऑक्सीडेंट सुरक्षा देते हैं और त्वचा व दिमाग के लिए फायदेमंद होते हैं। बताया जाता है कि छिलका हटाने से करीब 70 प्रतिशत पॉलीफेनॉल्स कम हो जाते हैं, जिससे इसके कुछ महत्वपूर्ण फायदे घट सकते हैं। भिगोकर छीलकर खाने के फायदे वहीं, बादाम को भिगोकर छीलकर खाने से पाचन आसान हो जाता है। छिलके में मौजूद टैनिन एंजाइम की क्रिया को बाधित करता है, जिससे पाचन धीमा हो सकता है। भिगोने से बादाम नरम हो जाता है और शरीर पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से अवशोषित कर पाता है। इसके अलावा, फाइटिक एसिड की मात्रा भी कम हो जाती है, जिससे कैल्शियम, आयरन और जिंक जैसे मिनरल्स का अवशोषण बेहतर होता है। क्या है सही तरीका? स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आपका पाचन मजबूत है तो आप बादाम छिलके सहित खा सकते हैं। वहीं, जिन लोगों को पाचन संबंधी दिक्कत होती है, उनके लिए भिगोकर छीलकर खाना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है। कुल मिलाकर, दोनों तरीकों से बादाम खाने के फायदे मिलते हैं, लेकिन जरूरत और शरीर के अनुसार तरीका चुनना बेहतर होता है। डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य ज्ञान पर आधारित है। किसी भी तरह का डाइट बदलाव करने से पहले डॉक्टर या विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
नई दिल्ली, एजेंसियां। आज के समय में आयरन की कमी एक आम समस्या बनती जा रही है, खासकर महिलाओं में। शरीर में आयरन की कमी होने पर हीमोग्लोबिन का स्तर घटने लगता है, जिससे थकान, कमजोरी, चक्कर आना और सांस फूलने जैसी दिक्कतें होने लगती हैं। ऐसे में समय रहते सही खानपान अपनाना बेहद जरूरी है। आयरन बढ़ाने के लिए क्या खाएं? विशेषज्ञों के अनुसार, डाइट में आयरन से भरपूर खाद्य पदार्थ शामिल करना सबसे जरूरी है। हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, मेथी और सरसों का साग आयरन के अच्छे स्रोत माने जाते हैं। इसके अलावा चुकंदर, अनार, खजूर और किशमिश जैसे फल भी शरीर में खून की कमी को दूर करने में मदद करते हैं। दालें, चना, राजमा और सोयाबीन भी आयरन से भरपूर होते हैं। वहीं, नॉन-वेज खाने वाले लोग अंडा, मछली और चिकन का सेवन कर सकते हैं, जो शरीर में आयरन की कमी को तेजी से पूरा करने में सहायक होते हैं। आयरन का अवशोषण कैसे बढ़ाएं? सिर्फ आयरन युक्त चीजें खाना ही काफी नहीं होता, बल्कि उसका सही अवशोषण भी जरूरी है। इसके लिए विटामिन C से भरपूर चीजें जैसे नींबू, संतरा और आंवला का सेवन करना फायदेमंद होता है। ये शरीर में आयरन को बेहतर तरीके से अवशोषित करने में मदद करते हैं। साथ ही, आयरन युक्त भोजन के साथ चाय या कॉफी पीने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे आयरन का अवशोषण कम हो सकता है। लाइफस्टाइल भी है अहम आयरन की कमी को दूर करने के लिए संतुलित आहार के साथ सही लाइफस्टाइल भी जरूरी है। समय पर भोजन करना, पर्याप्त नींद लेना और शरीर को सक्रिय रखना बेहद महत्वपूर्ण है। अगर समस्या ज्यादा हो तो डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लेना और नियमित जांच कराना भी जरूरी है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। गर्मियों का मौसम आते ही आम की डिमांड बढ़ जाती है। फलों का राजा कहलाने वाला आम न सिर्फ स्वाद में लाजवाब होता है, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है। इसमें विटामिन A, C और फाइबर भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर को पोषण देने के साथ-साथ गर्मी से राहत भी देते हैं। ऐसे में आम से बनी कुछ खास रेसिपी इस मौसम को और भी मजेदार बना सकती हैं घर पर बनाएं ये 5 टेस्टी रेसिपी गर्मियों में आम से कई तरह के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किए जा सकते हैं। आम की लस्सी सबसे लोकप्रिय रेसिपी में से एक है, जिसे दही और आम के गूदे से तैयार किया जाता है। यह ठंडक देने के साथ-साथ पाचन के लिए भी फायदेमंद होती है। वहीं, आम पन्ना एक पारंपरिक पेय है, जो लू से बचाने में मदद करता है और शरीर को हाइड्रेट रखता है। इसके अलावा आम का शेक भी बच्चों और बड़ों दोनों का पसंदीदा ड्रिंक है, जो एनर्जी से भरपूर होता है। खाने के साथ भी बढ़ाएं स्वाद अगर आप खाने के साथ कुछ अलग ट्राई करना चाहते हैं, तो आम का अचार एक बेहतरीन विकल्प है। यह लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है और खाने का स्वाद कई गुना बढ़ा देता है। वहीं, मीठे के शौकीनों के लिए मैंगो कुल्फी एक परफेक्ट डेजर्ट है। इसे घर पर आसानी से तैयार किया जा सकता है और यह गर्मी में ठंडक का बेहतरीन एहसास देती है। स्वाद के साथ सेहत का भी ख्याल इन सभी रेसिपीज में स्वाद के साथ सेहत का भी ध्यान रखा गया है। आम से बनी ये डिशेज शरीर को तरोताजा रखती हैं और गर्मी के असर को कम करने में मदद करती हैं। ऐसे में इस सीजन में आम को अपनी डाइट में शामिल करना एक स्मार्ट और टेस्टी विकल्प साबित हो सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। गर्मियों के मौसम में लौकी का सेवन सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है। पानी से भरपूर होने के कारण यह शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ-साथ पाचन को भी बेहतर बनाती है। हालांकि, बाजार से लौकी खरीदते समय सावधानी बरतना जरूरी है, क्योंकि कई बार दुकानदार पुरानी या बासी लौकी दे देते हैं, जो स्वाद और पोषण दोनों के लिहाज से नुकसानदायक हो सकती है। ताजी लौकी का रंग हल्का हरा और छिलका चिकना होता है। अगर लौकी पर काले धब्बे हों या छिलका सिकुड़ा हुआ लगे, तो समझ लें कि वह पुरानी है। ऐसी लौकी खरीदने से बचना चाहिए क्योंकि इसमें पोषक तत्व कम हो सकते हैं। दबाकर जांचना भी जरूरी लौकी खरीदते समय उसे हल्का दबाकर जरूर देखें। अगर यह ज्यादा मुलायम या बहुत सख्त लगे, तो यह बासी या ज्यादा पकी हो सकती है। ताजी लौकी हल्की नरम और ताजी महसूस होती है, जिसमें बीज कम होते हैं। नाखून से करें टेस्ट एक आसान तरीका यह भी है कि लौकी के छिलके पर हल्का नाखून लगाकर देखें। अगर छिलका आसानी से दब जाए और उसमें से हल्की नमी महसूस हो, तो लौकी ताजी है। वहीं, अगर छिलका बहुत सख्त हो तो यह पुरानी हो सकती है। आकार और बनावट पर दें ध्यान बहुत बड़ी या मोटी लौकी अक्सर ज्यादा पकी होती है, जिसमें बीज अधिक होते हैं और स्वाद भी अच्छा नहीं रहता। इसलिए मध्यम आकार की लौकी ही खरीदना बेहतर होता है। केमिकल वाली लौकी से बचें आजकल बाजार में केमिकल से उगाई गई सब्जियां भी मिलती हैं। अगर लौकी असामान्य रूप से बड़ी या ज्यादा चमकदार दिखे, तो उसे खरीदने से बचें।
यूरोप में किए गए एक बड़े अध्ययन ने Severe Asthma के मरीजों में मौजूद अन्य बीमारियों (comorbidities) के खास पैटर्न की पहचान की है। इस रिसर्च से पता चलता है कि गंभीर अस्थमा केवल एक फेफड़ों की बीमारी नहीं, बल्कि कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के साथ जुड़ी एक जटिल स्थिति है। क्या है Severe Asthma और Multimorbidity? Severe asthma ऐसे मरीजों में देखा जाता है, जहां: लक्षण लगातार बने रहते हैं बार-बार अटैक (exacerbations) आते हैं हाई-डोज दवाओं के बावजूद फेफड़ों की क्षमता कम रहती है अक्सर इन मरीजों में कई दूसरी बीमारियां भी साथ होती हैं, जिसे “multimorbidity” कहा जाता है। क्या कहता है यूरोप का बड़ा अध्ययन? 11 यूरोपीय देशों के 2,690 मरीजों पर किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि: अलग-अलग बीमारियां रैंडम तरीके से नहीं जुड़तीं बल्कि कुछ तय पैटर्न (clusters) में एक साथ दिखाई देती हैं ये पैटर्न अलग-अलग क्षेत्रों में भी समान पाए गए तीन प्रमुख ‘क्लस्टर’ सामने आए रिसर्च में तीन स्थिर पैटर्न (clusters) की पहचान हुई: 1. स्टेरॉयड से जुड़ा क्लस्टर Osteoporosis (हड्डियों की कमजोरी) वजन बढ़ना (steroid-induced weight gain) यह लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं के असर को दर्शाता है 2. एलर्जिक क्लस्टर Eczema Allergic Rhinitis यह एलर्जी से जुड़ी प्रोफाइल को दर्शाता है 3. अपर एयरवे क्लस्टर Chronic Sinusitis Nasal Polyps यह नाक और साइनस से जुड़ी समस्याओं को दिखाता है अन्य बीमारियों में दिखी विविधता कुछ अन्य स्थितियां जैसे: मोटापा (Obesity) Bronchiectasis Acid Reflux (GERD) मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं इनका पैटर्न स्थिर नहीं रहा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि severe asthma हर मरीज में अलग तरह से प्रकट हो सकता है। इलाज और परिणामों पर असर अध्ययन में पाया गया कि: स्टेरॉयड से जुड़ा पैटर्न सबसे खराब परिणामों से जुड़ा था ज्यादा दवाओं की जरूरत फेफड़ों की खराब कार्यक्षमता ज्यादा अटैक Maximal multimorbidity ग्रुप में: कई बीमारियां एक साथ Biologic therapies की ज्यादा जरूरत डॉक्टरों के लिए क्या संकेत? यह रिसर्च बताती है कि: मरीजों को सिर्फ अस्थमा के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी पूरी स्वास्थ्य स्थिति को देखकर इलाज करना चाहिए स्टेरॉयड पर निर्भर मरीजों में जल्दी वैकल्पिक इलाज (steroid-sparing therapies) पर विचार करना जरूरी है हर मरीज के लिए पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट जरूरी है
अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारी की शुरुआती पहचान आसान बनाने के लिए वैज्ञानिक लगातार नए तरीके खोज रहे हैं। हाल के वर्षों में लार (Saliva) में मौजूद बायोमार्कर्स को एक आसान और गैर-आक्रामक (non-invasive) टेस्ट के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन नई रिसर्च से पता चलता है कि इनकी सटीकता अभी भरोसेमंद नहीं है। क्या कहती है नई रिसर्च? Alzheimer’s disease की पहचान के लिए किए गए एक बड़े सिस्टमेटिक रिव्यू में 3118 स्टडीज की जांच की गई, जिनमें से केवल 18 स्टडीज ही मानकों पर खरी उतरीं। इन स्टडीज में मुख्य रूप से दो तरह के सैलिवरी मार्कर्स पर ध्यान दिया गया: Amyloid beta (Aβ42) Lactoferrin इनकी जांच sensitivity (संवेदनशीलता), specificity (विशिष्टता) और AUC (accuracy measure) के आधार पर की गई। सबसे बड़ी समस्या: परिणामों में भारी अंतर रिव्यू में पाया गया कि अलग-अलग स्टडीज के नतीजों में काफी अंतर (variability) है, जिससे इन टेस्ट्स की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं। मुख्य कारण: सैंपल लेने के तरीके अलग-अलग कुछ स्टडीज में फास्टिंग (खाली पेट) नहीं थी कहीं stimulated saliva (उत्तेजित लार) इस्तेमाल हुई स्टोरेज और प्रोसेसिंग के तरीके अलग-अलग यही वजह है कि कई स्टडीज में यह टेस्ट अल्जाइमर और स्वस्थ लोगों के बीच फर्क तक नहीं कर पाया। किन चीजों से बेहतर रिजल्ट मिले? रिसर्च में कुछ ऐसे फैक्टर भी सामने आए जिनसे टेस्ट की सटीकता बेहतर हुई: सैंपल से पहले फास्टिंग Unstimulated saliva का उपयोग −80°C पर सैंपल स्टोर करना हालांकि, कलेक्शन का समय, सेंट्रीफ्यूगेशन और अन्य तकनीकी प्रक्रियाओं का असर स्पष्ट नहीं पाया गया। अभी क्यों नहीं है पूरी तरह भरोसेमंद? सबसे बड़ी कमी यह सामने आई कि किसी भी स्टडी ने सैलिवा टेस्टिंग के लिए तय मानकों (standard guidelines) का पूरी तरह पालन नहीं किया। इस वजह से: हर स्टडी का तरीका अलग रहा रिजल्ट्स में एकरूपता नहीं आई क्लिनिकल उपयोग (hospital use) के लिए भरोसा नहीं बन पाया आगे क्या है रास्ता? विशेषज्ञों का मानना है कि: एक समान (standardized) टेस्टिंग प्रक्रिया जरूरी है बड़े स्तर पर नई स्टडीज करनी होंगी तभी यह तय हो पाएगा कि सैलिवरी मार्कर्स भविष्य में अल्जाइमर की शुरुआती पहचान में मददगार होंगे या नहीं
नई दिल्ली, एजेंसियां। आधुनिक जीवनशैली में खुद को फिट रखने के लिए अधिकांश लोग अपने आहार में फलों के रस (फ्रूट जूस) को शामिल करते हैं। विशेषकर सुबह के नाश्ते या दोपहर के समय जूस पीना एक स्वस्थ विकल्प माना जाता है। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर अक्सर चर्चा होती है कि क्या जूस का नियमित सेवन ब्लड प्रेशर (BP) और शुगर लेवल को अनियंत्रित कर सकता है। हालिया शोध और विशेषज्ञों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि फलों का रस पोषक तत्वों से भरपूर होने के बावजूद, इसके सेवन का तरीका और मात्रा सेहत के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। फ्रूट जूस और ब्लड शुगर के बीच गहरा संबंध स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, फलों के रस का ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) मध्यम से थोड़ा अधिक होता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि जूस पीने के बाद यह शरीर में बहुत तेजी से पचता है और रक्त में शुगर की मात्रा को अस्थाई रूप से बढ़ा देता है। शोध बताते हैं कि भले ही जूस प्राकृतिक फलों से तैयार किया गया हो, लेकिन इसमें मौजूद शुगर की सांद्रता शरीर के इंसुलिन रिस्पॉन्स को प्रभावित कर सकती है। यदि कोई व्यक्ति पहले से ही हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज से जूझ रहा है, तो अनियंत्रित मात्रा में जूस का सेवन उसके लिए चिंता का विषय बन सकता है। साबुत फल बनाम जूस: फाइबर की अहम भूमिका अक्सर यह सवाल उठता है कि फल खाना बेहतर है या उनका रस पीना। जानकारों का कहना है कि साबुत फलों में फाइबर की प्रचुर मात्रा होती है, जो जूस निकालने की प्रक्रिया में पूरी तरह नष्ट हो जाती है। फाइबर शरीर में शुगर के अवशोषण (Absorption) की गति को धीमा करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है। जब हम केवल जूस का सेवन करते हैं, तो फाइबर की अनुपस्थिति के कारण शरीर को सीधे 'लिक्विड शुगर' मिलती है, जो तेजी से अवशोषित होकर ब्लड शुगर लेवल को ऊपर ले जाती है। यही कारण है कि पोषण विशेषज्ञ जूस के बजाय सीधे फल खाने की सलाह देते हैं। कब और कैसे करें जूस का सेवन? रिपोर्ट के अनुसार, फ्रूट जूस पूरी तरह हानिकारक नहीं है, बल्कि इसके सेवन का समय और मात्रा सबसे अधिक मायने रखती है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि जूस में विटामिन और मिनरल्स जैसे जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। हालांकि, मधुमेह के रोगियों को जूस पीने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य लेना चाहिए। जूस के बजाय यदि स्मूदी या बिना छाने हुए रस का उपयोग किया जाए, तो कुछ हद तक फाइबर को बरकरार रखा जा सकता है, जो सेहत के लिए तुलनात्मक रूप से बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। निष्कर्ष और विशेषज्ञों की राय कुल मिलाकर, फ्रूट जूस सीधे तौर पर ब्लड प्रेशर बढ़ाता है या नहीं, इस पर शोध के अलग-अलग पहलू हैं, लेकिन यह रक्त शर्करा को प्रभावित कर अप्रत्यक्ष रूप से मेटाबॉलिज्म पर असर डालता है। हृदय रोगों और हाइपरटेंशन से बचाव के लिए एक संतुलित दिनचर्या का होना आवश्यक है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि प्राकृतिक रूप से मीठे फलों का सीमित मात्रा में सेवन करना ही स्वास्थ्य के लिए सबसे सुरक्षित मार्ग है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या के होने पर आहार में बदलाव करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना अनिवार्य है।
अस्पतालों में एंटीबायोटिक के सही इस्तेमाल को लेकर एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय स्टडी सामने आई है, जिसमें पाया गया कि Penicillin Allergy Testing के जरिए गलत एलर्जी लेबल हटाने से इलाज की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। इस प्रक्रिया ने World Health Organization द्वारा सीमित (restricted) एंटीबायोटिक्स के उपयोग को भी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेषज्ञों के अनुसार, अस्पताल में भर्ती लगभग 10 में से 1 मरीज खुद को पेनिसिलिन एलर्जी वाला बताता है, जबकि इनमें से अधिकांश मामलों में यह दावा गलत होता है। इसके चलते डॉक्टर अक्सर व्यापक (broad-spectrum) या कम प्रभावी एंटीबायोटिक्स का उपयोग करते हैं, जिससे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस बढ़ता है और मरीजों के परिणाम भी प्रभावित होते हैं। कैसे किया गया अध्ययन? यह अध्ययन 8 देशों के 40 अस्पतालों में किया गया, जिसमें 5,000 से अधिक मरीज शामिल थे। जिन मरीजों ने पेनिसिलिन एलर्जी की जानकारी दी थी, उनका डिजिटल टूलकिट के जरिए मूल्यांकन किया गया। कुछ मरीजों पर Direct Oral Challenge (DOC) टेस्ट किया गया–यह एक निगरानी में किया जाने वाला परीक्षण है, जिससे यह पता लगाया जाता है कि वास्तव में एलर्जी है या नहीं। चौंकाने वाले नतीजे 1,573 मरीजों में DOC टेस्ट किया गया इनमें से 95.5% मरीजों को “डीलैबल” कर दिया गया, यानी वे वास्तव में एलर्जिक नहीं थे केवल 4.5% मरीजों में एलर्जी की पुष्टि हुई गंभीर साइड इफेक्ट बेहद कम (सिर्फ 0.4%) पाए गए एंटीबायोटिक इस्तेमाल पर असर इस टेस्टिंग का सीधा असर दवाइयों के चयन पर पड़ा: जिन मरीजों का DOC हुआ, उन्हें 90 दिनों के भीतर पेनिसिलिन मिलने की संभावना 13 गुना ज्यादा रही WHO के “Watch” और “Reserve” कैटेगरी के एंटीबायोटिक्स का उपयोग 27% तक कम हुआ यह परिणाम बताते हैं कि सही एलर्जी जांच एंटीबायोटिक के बेहतर और जिम्मेदार उपयोग (antibiotic stewardship) में अहम भूमिका निभा सकती है। चुनौतियां और आगे की राह हालांकि इस तकनीक के उपयोग में कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी सामने आईं, जैसे स्टाफ की कमी, प्रशिक्षण और जोखिम को लेकर धारणा। बावजूद इसके, 6 महीनों में 77 डॉक्टरों ने इस डिजिटल टूल को अपनाया, जो एक सकारात्मक संकेत है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर Penicillin Allergy Testing और DOC को नियमित चिकित्सा प्रक्रिया में शामिल किया जाता है, तो यह न केवल मरीजों के बेहतर इलाज में मदद करेगा, बल्कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जैसी वैश्विक समस्या से निपटने में भी अहम भूमिका निभाएगा।
बाल चिकित्सा के क्षेत्र में Paediatric Leukaemia की पहचान और इलाज को लेकर एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रगति सामने आई है। हाल ही में हुए एक अध्ययन में Long Read Sequencing तकनीक ने पारंपरिक जांच तरीकों की तुलना में अधिक सटीक और व्यापक परिणाम दिए हैं, जिससे बीमारी की पहचान और वर्गीकरण में बड़ा सुधार संभव हुआ है। क्या है Long Read Sequencing और क्यों है खास? ल्यूकेमिया में जीन फ्यूजन (Gene Fusion) बीमारी के मुख्य कारणों में से एक होते हैं, जो संरचनात्मक बदलावों (Structural Variants) से उत्पन्न होते हैं। वर्तमान क्लीनिकल प्रक्रियाओं में इन बदलावों को पहचानने के लिए कई अलग-अलग परीक्षणों की जरूरत पड़ती है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं। लेकिन Long Read Sequencing एक ही टेस्ट में इन जटिल जीन बदलावों को पहचानने में सक्षम है, जिससे पूरी प्रक्रिया सरल और तेज हो सकती है। अध्ययन में क्या सामने आया? इस प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट स्टडी में 17 बच्चों पर इस तकनीक का परीक्षण किया गया। परिणाम बेहद सकारात्मक रहे: सभी पहले से ज्ञात महत्वपूर्ण जीन बदलाव (5/5) को इस तकनीक ने सही तरीके से पहचाना पारंपरिक जांच के साथ 100% समानता (Concordance) देखी गई कई नए और पहले छूटे हुए जीन बदलाव भी सामने आए नई खोज: छूटे हुए मामलों की पहचान सबसे अहम बात यह रही कि इस तकनीक ने ऐसे जीन बदलाव भी पकड़े, जो पहले की जांच में सामने नहीं आए थे। इन नई खोजों की मदद से 12 में से 4 मरीजों में ल्यूकेमिया के एक विशेष जीन सबटाइप की पहचान संभव हो सकी, जो पहले तय नहीं हो पाई थी। इन्हीं में एक जटिल बदलाव ins(11;10)(q23.3;p12p12) भी शामिल था, जिससे KMT2A::MLLT10 जीन फ्यूजन बना–जो क्लीनिकली बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इलाज और भविष्य पर असर इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि Long Read Sequencing भविष्य में Paediatric Leukaemia के निदान के लिए एक प्रभावी “वन-स्टॉप सॉल्यूशन” बन सकता है। इसके संभावित फायदे: तेज और सटीक निदान कम लागत और समय बेहतर जीन आधारित वर्गीकरण मरीज के लिए अधिक सटीक इलाज की योजना विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक को नियमित क्लीनिकल प्रैक्टिस में शामिल किया जाता है, तो यह बच्चों में ल्यूकेमिया के इलाज के तरीके को पूरी तरह बदल सकती है।
एक नई रिसर्च में सामने आया है कि Pulmonary Arterial Hypertension (PAH) सिर्फ दिल और फेफड़ों तक सीमित बीमारी नहीं है, बल्कि यह दिमाग पर भी गंभीर असर डाल सकती है। अध्ययन के मुताबिक, यह बीमारी ब्रेन इंफ्लेमेशन, ब्लड-ब्रेन बैरियर (BBB) में गड़बड़ी और धीरे-धीरे कॉग्निटिव डिक्लाइन (याददाश्त व सोचने की क्षमता में कमी) का कारण बन सकती है। क्या है PAH और क्यों है खतरनाक? PAH एक प्रोग्रेसिव बीमारी है, जिसमें फेफड़ों की धमनियों में दबाव बढ़ जाता है, जिससे दिल के दाहिने हिस्से पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। अब तक इसे मुख्य रूप से कार्डियोपल्मोनरी डिजीज माना जाता था, लेकिन मरीजों में लगातार मेमोरी प्रॉब्लम और सोचने की क्षमता में गिरावट देखी जा रही थी। रिसर्च में क्या सामने आया? वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन में चूहों (rats) में PAH की स्थिति उत्पन्न कर 14 दिनों तक उनके व्यवहार और शारीरिक बदलावों का विश्लेषण किया। PAH से ग्रस्त चूहों में फेफड़ों की धमनियों का दबाव बढ़ा और दिल के दाहिने हिस्से में सूजन देखी गई साथ ही उनकी याददाश्त और नई चीजों को पहचानने की क्षमता कमजोर पाई गई खास बात यह रही कि उनमें एंग्जायटी जैसे लक्षण नहीं दिखे, जिससे स्पष्ट हुआ कि असर सीधे कॉग्निशन पर पड़ रहा है दिमाग में सूजन और BBB डैमेज रिसर्च में पाया गया कि PAH के कारण दिमाग के महत्वपूर्ण हिस्सों - कॉर्टेक्स और हिप्पोकैम्पस - में सूजन बढ़ गई। माइक्रोग्लिया और एस्ट्रोसाइट्स (ब्रेन सेल्स) सक्रिय हो गए इंफ्लेमेटरी मार्कर्स जैसे TNF-α और IL-1β का स्तर बढ़ा ब्लड-ब्रेन बैरियर (BBB) कमजोर हुआ, जिससे दिमाग में बाहरी तत्वों का प्रवेश बढ़ा यह संकेत देते हैं कि PAH सीधे ब्रेन फंक्शन को प्रभावित कर सकता है। क्या हैं इसके मायने? यह स्टडी बताती है कि PAH को अब सिर्फ दिल और फेफड़ों की बीमारी मानना गलत होगा। यह एक मल्टीसिस्टम डिजीज है, जो दिमाग को भी नुकसान पहुंचा सकती है। हालांकि, यह रिसर्च जानवरों पर आधारित है और इसका समयकाल भी सीमित (14 दिन) था, इसलिए इसे सीधे इंसानों पर लागू करने से पहले और अध्ययन की जरूरत है। आगे क्या? विशेषज्ञों का मानना है कि: PAH मरीजों में कॉग्निटिव लक्षणों पर ज्यादा ध्यान देना होगा इंफ्लेमेशन को कम करने और BBB को सुरक्षित रखने वाली थेरेपी पर रिसर्च जरूरी है
स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़ी प्रगति सामने आई है, जहां वैज्ञानिकों ने एक ऐसा लो-कॉस्ट ब्लड टेस्ट विकसित किया है, जो एक साथ कई प्रकार के कैंसर का पता लगाने में सक्षम हो सकता है। यह नई तकनीक cell-free DNA (cfDNA) पर आधारित है, जिसे भविष्य में कैंसर स्क्रीनिंग के तरीके को पूरी तरह बदलने वाला माना जा रहा है। क्या है यह नई तकनीक? मल्टीकैंसर डिटेक्शन के लिए विकसित इस नई टेस्ट तकनीक का नाम MethylScan है। यह खून में मौजूद cfDNA के मिथाइलेशन पैटर्न का विश्लेषण करके शरीर के अलग-अलग अंगों से जुड़े कैंसर के संकेतों को पहचानता है। यह टेस्ट न केवल कम खर्चीला है, बल्कि एक ही सैंपल से कई बीमारियों की पहचान करने की क्षमता रखता है, जो इसे मौजूदा टेस्ट्स से अलग बनाता है। स्टडी में क्या पाया गया? इस रिसर्च में 1061 लोगों पर परीक्षण किया गया और इसके नतीजे बेहद प्रभावशाली रहे: लिवर, लंग, ओवेरियन और स्टमक कैंसर की पहचान में AUROC स्कोर 0.938 रहा सेंसिटिविटी 63.3% और स्पेसिफिसिटी 98% दर्ज की गई शुरुआती स्टेज के कैंसर में भी टेस्ट ने 0.916 का AUROC हासिल किया लिवर कैंसर मॉनिटरिंग में सेंसिटिविटी 79.6% तक पहुंची ये आंकड़े बताते हैं कि यह तकनीक शुरुआती चरण में भी कैंसर पहचानने की दिशा में कारगर हो सकती है। क्यों है यह खोज अहम? अब तक ज्यादातर कैंसर टेस्ट महंगे होते हैं और एक समय में एक ही बीमारी का पता लगा पाते हैं। लेकिन यह नया ब्लड टेस्ट: एक साथ कई कैंसर की पहचान कर सकता है शुरुआती स्टेज में बीमारी पकड़ने में मददगार हो सकता है कम लागत के कारण ज्यादा लोगों तक पहुंच सकता है क्या हैं सीमाएं? हालांकि यह शोध काफी उम्मीद जगाता है, लेकिन अभी इसे बड़े स्तर पर और अलग-अलग आबादी पर जांचने की जरूरत है। साथ ही शुरुआती स्टेज के कैंसर में सेंसिटिविटी को और बेहतर करने की आवश्यकता है। भविष्य की दिशा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ऐसे ब्लड टेस्ट: कैंसर स्क्रीनिंग को आसान और सुलभ बना सकते हैं समय रहते इलाज शुरू करने में मदद करेंगे हेल्थकेयर सिस्टम पर बोझ कम कर सकते हैं
प्रोस्टेट कैंसर के इलाज में एक महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है। नई रिसर्च के अनुसार, सर्जरी से पहले किया गया MRI (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग) अब केवल बीमारी की पहचान और स्टेजिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मरीज के दीर्घकालिक परिणामों का भी सटीक अनुमान लगाने में मदद कर सकता है। करीब 40 स्टडीज और 24,941 मरीजों के डेटा पर आधारित इस व्यापक मेटा-एनालिसिस ने यह साबित किया है कि प्री-ट्रीटमेंट MRI से डॉक्टरों को कैंसर के जोखिम और उसके फैलाव के बारे में अहम जानकारी मिल सकती है। MRI में दिखने वाले संकेत जो बढ़ाते हैं खतरा रिसर्च में पाया गया कि MRI में दिखने वाला Extraprostatic Extension (mrT3a) यानी कैंसर का प्रोस्टेट के बाहर फैलना, खराब परिणामों से जुड़ा है। ऐसे मरीजों में: बायोकेमिकल रिकरेंस (कैंसर का दोबारा उभरना) का खतरा 2 गुना से ज्यादा मेटास्टेसिस (कैंसर का फैलना) का जोखिम 3 गुना से अधिक प्रोस्टेट कैंसर से मृत्यु का खतरा लगभग 11 गुना ज्यादा पाया गया इसी तरह, Seminal Vesicle Invasion (mrT3b) भी एक हाई-रिस्क संकेत माना गया, जो कैंसर के तेजी से बढ़ने और फैलने की संभावना को बढ़ाता है। MRI के अन्य अहम पैरामीटर्स स्टडी में कुछ अन्य MRI आधारित संकेत भी सामने आए, जो कैंसर के दोबारा लौटने की संभावना को बढ़ाते हैं: उच्च PI-RADS स्कोर (4–5) ट्यूमर का आकार 20 mm या उससे अधिक कम ADC (Apparent Diffusion Coefficient) वैल्यू इन सभी फैक्टर्स से कैंसर के दोबारा होने का खतरा लगभग दोगुना हो जाता है, भले ही अन्य क्लिनिकल रिपोर्ट सामान्य क्यों न हों। इलाज की योजना बनाने में कैसे मददगार? विशेषज्ञों का मानना है कि सर्जरी से पहले सही रिस्क का आकलन बेहद जरूरी होता है। MRI से मिली जानकारी: मरीज को सही काउंसलिंग देने में मदद करती है सर्जरी की रणनीति तय करने में सहायक होती है एडजुवेंट थेरेपी (अतिरिक्त इलाज) की जरूरत का संकेत देती है क्यों है यह रिसर्च अहम? इस स्टडी में न तो कोई बड़ा पब्लिकेशन बायस पाया गया और न ही डेटा में असामान्य भिन्नता, जिससे इसके निष्कर्ष मजबूत माने जा रहे हैं। अब यह साफ होता जा रहा है कि MRI सिर्फ एक डायग्नोस्टिक टूल नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली प्रोग्नोस्टिक टूल भी है, जो मरीज के भविष्य के जोखिम को समझने में डॉक्टरों की मदद कर सकता है।
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों पर की गई एक नई रिसर्च ने यह संकेत दिया है कि नाइट शिफ्ट में काम करना टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकता है। 10 दिनों तक चले इस ऑब्जर्वेशनल अध्ययन में पाया गया कि रात में काम करने से खानपान की आदतें, जागने का समय और ब्लड शुगर का उतार-चढ़ाव काफी प्रभावित होता है। स्टडी में क्या पाया गया? इस अध्ययन में टाइप 2 डायबिटीज से पीड़ित 37 हेल्थकेयर वर्कर्स को शामिल किया गया, जिनमें से अधिकतर महिलाएं थीं और नर्स या मिडवाइफ के रूप में कार्यरत थीं। रिसर्च के दौरान प्रतिभागियों की ब्लड शुगर, फिजिकल एक्टिविटी, डाइट और नींद के पैटर्न को बारीकी से मॉनिटर किया गया। हालांकि औसत ब्लड शुगर लेवल में खास अंतर नहीं पाया गया, लेकिन ग्लूकोज में उतार-चढ़ाव (ग्लाइसेमिक वेरिएबिलिटी) नाइट शिफ्ट के दौरान ज्यादा देखा गया। खासतौर पर ‘मीन एब्सोल्यूट ग्लूकोज चेंज’ और ‘कंटीन्यूस ओवरलैपिंग नेट ग्लाइसेमिक एक्शन’ जैसे संकेतकों में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो यह दिखाता है कि रात में काम करने से ब्लड शुगर ज्यादा अस्थिर हो सकता है। खानपान पर असर नाइट शिफ्ट के दौरान लोगों की खाने की आदतों में भी बड़ा बदलाव देखा गया। इन दिनों में कैलोरी इनटेक सबसे ज्यादा (लगभग 2199 kcal) रहा। साथ ही मीठे स्नैक्स का सेवन भी बढ़ गया - जो कुल ऊर्जा का करीब 13.4% था, जबकि आराम के दिनों में यह घटकर 7.8% रह गया। खाने की संख्या भी नाइट शिफ्ट में सबसे ज्यादा रही (औसतन 7 बार), जबकि आराम के दिनों में यह घटकर लगभग 3.4 बार रह गई। एक्टिविटी और जागने का समय रात में काम करने वाले लोग ज्यादा समय तक जागते रहे - औसतन 22 घंटे से अधिक। इसके साथ ही उनकी फिजिकल एक्टिविटी भी बढ़ी, जहां स्टेप काउंट 13,775 तक पहुंच गया। यह बदलाव शरीर के मेटाबॉलिज्म और शुगर कंट्रोल को प्रभावित कर सकते हैं। क्यों है यह चिंता का विषय? विशेषज्ञों के अनुसार, नाइट शिफ्ट में काम करने से शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक प्रभावित होती है, जिससे हार्मोनल बैलेंस बिगड़ सकता है। यह डायबिटीज के मरीजों में ब्लड शुगर कंट्रोल को और कठिन बना देता है। क्या है समाधान? इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि नाइट शिफ्ट करने वाले डायबिटीज मरीजों के लिए अलग तरह की डाइट, नींद और लाइफस्टाइल प्लानिंग जरूरी है। हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसे लोगों के लिए विशेष गाइडलाइन और सपोर्ट सिस्टम विकसित किए जाने चाहिए, ताकि वे अपनी बीमारी को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सकें।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।