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Shatrughan Sinha
शत्रुघ्न सिन्हा ने TMC को लेकर दूर किया सस्पेंस, बोले- ‘ममता दीदी के साथ था, हूं और रहूंगा’

नई दिल्ली, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने पार्टी छोड़ने की अटकलों पर विराम लगाते हुए स्पष्ट किया है कि वह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के साथ पूरी मजबूती से खड़े हैं। पिछले कुछ दिनों से ऐसी खबरें सामने आ रही थीं कि टीएमसी के कुछ सांसद पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं और अलग रुख अपना सकते हैं। इन चर्चाओं के बीच शत्रुघ्न सिन्हा का बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।   सिन्हा ने कहा कि ममता बनर्जी ने उनके राजनीतिक जीवन के कठिन दौर में उनका साथ दिया था, इसलिए वह आज उनके साथ खड़े रहना अपना कर्तव्य मानते हैं। उन्होंने कहा कि जब 2019 में चुनावी हार के बाद वह मुश्किल दौर से गुजर रहे थे, तब ममता बनर्जी ने उन पर भरोसा जताया और आसनसोल से चुनाव लड़ने का अवसर दिया। इसके बाद वह लगातार दो बार लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे।   ‘बागी नहीं, स्पष्टवादी हूं’ अपने बारे में फैल रही अफवाहों पर प्रतिक्रिया देते हुए शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि कुछ लोग उन्हें बागी गुट का हिस्सा बता रहे हैं, लेकिन यह सही नहीं है। उन्होंने कहा कि वह हमेशा बेबाक रहे हैं और सच बोलने में विश्वास रखते हैं। उनके अनुसार, यदि सच बोलना बगावत है तो वह खुद को बागी कहने में संकोच नहीं करेंगे, लेकिन इसका मतलब पार्टी छोड़ना नहीं है।   मोदी की तारीफ भी बनी चर्चा का विषय इस बीच शत्रुघ्न सिन्हा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  के कार्यकाल के 12 वर्ष पूरे होने पर उन्हें शुभकामनाएं भी दीं। उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना की। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद उनके इस संदेश को कई लोगों ने सकारात्मक राजनीति का उदाहरण बताया।   हालांकि मोदी की तारीफ और टीएमसी के समर्थन को लेकर उठे सवालों के बीच शत्रुघ्न सिन्हा ने साफ कर दिया है कि उनका राजनीतिक भविष्य फिलहाल तृणमूल कांग्रेस के साथ ही जुड़ा हुआ है और पार्टी छोड़ने का उनका कोई इरादा नहीं है।

anjali kumari जून 11, 2026 0
Rajya Sabha Election
Rajya Sabha Election: सेकेंड प्रेफरेंस वोट से बदलेगा समीकरण!  जानें नाथवाणी, JMM-कांग्रेस का दांव

रांची। झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए तीन प्रत्याशी बैजनाथ राम, प्रणव झा और परिमल नाथवाणी मैदान में हैं। चुनाव मैदान में तीन प्रत्याशियों आ जाने के कारण मुकाबला रोचक हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार सेकेंड प्रेफरेंस के वोट से समीकरण बदल सकता है। 56 वोटों का जादुई आंकड़ा इंडिया गठबंधन के पक्ष मे झारखंड की दोनों सीटों पर जीत के लिए आवश्यक 56 वोटों का जादुई आंकड़ा इंडिया गठबंधन के पक्ष में है, लेकिन क्रॉस वोटिंग से तस्वीर बदल सकती है। निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवाणी को भाजपा, जदयू, आजसू पार्टी और लोजपा-आर के 24 विधायकों का समर्थन हासिल है। इसके अलावा तटस्थ माने जाने वाले जेएलकेएम के एक विधायक जयराम महतो का वोट भी निर्णायक हो सकता है। एक वोट से बदल सकता है पूरा समीकरण राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के पास 56 वोट जरूर है। ऐसी स्थिति में जेएमएम प्रत्याशी बैजनाथ राम और कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा को 28-28 वोट मिल जाए, तो दोनों उम्मीदवारों की जीत हो सकती है। लेकिन, सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए 28 मतों का दांव लगाना जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि एक भी वोट रद्द होने से पूरा समीकरण बिगड़ सकता है। दूसरी तरफ सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए रणनीतिक पेच ये भी है कि इंडिया गठबंधन के एक प्रत्याशी के पक्ष में 28 वोट से अधिक मतदान कराया जाए, तो गठबंधन के दूसरे प्रत्याशी का वोट कम जाएगा। इस स्थिति में निर्दलीय प्रत्याशी को फायदा मिल सकता है। प्रथम के साथ द्वितीय वरीयता का वोट भी होगा निर्णायक राज्यसभा चुनाव में मतदाताओं के इस अधिकार से चुनाव परिणाम का पूरा समीकरण बदल सकता है। इंडिया गठबंधन के विधायकों की कोशिश होगी कि 28-28 वोट उन्हें प्रथम वरीयता का मिले और इतना ही वोट उन्हें द्वितीय वरीयता का भी मिल जाए, ऐसी स्थिति में सत्तारूढ़ गठबंधन के दोनों उम्मीदवारों की जीत तय हो जाएगी। लेकिन, कुछ वोट रद्द होने या अनुपस्थित रहने की स्थिति में सत्ता पक्ष के 56 विधायकों में से जितने मतदाताओं का द्वितीय वरीयता का वोट निर्दलीय प्रत्याशी को मिलेगा, उसके अनुसार समीकरण में बदलाव होगा। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए सभी 81 मतदाताओं यानी विधायकों के पास प्रथम के अलावा द्वितीय वरीयता का वोट देने का अधिकार होगा। मतदाता चाहे, तो किसी एक उम्मीदवार को ही वोट कर सकते हैं, लेकिन इच्छा होने पर द्वितीय वरीयता का वोट भी कर सकते हैं। दोनों ही स्थिति में उनका वोट वैध होगा। क्या है वोटों का गणित झारखंड विधानसभा के सदस्यों की संख्या 81 है, यदि सभी सदस्य वोट करते हैं और उनका मत वैध पाया जाता है, तो किसी भी उम्मीदवार को निर्वाचित होने के लिए 2701 अंक का कोटा यानी प्रथम वरीयता का 28 मात प्राप्त करना होगा। सत्तारूढ़ जेएमएम-कांग्रेस- राजद और माले गठबंधन के पास पास दो उम्मीदवारों की जीत के लिए पर्याप्त वोट हैं। एनडीए विधायकों की संख्या 24 है, जबकि जेएलकेएम के जयराम महतो तटस्थ माने जा रहे हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन के विधायकों की संख्या दल    विधायक  जेएमएम    34 कांग्रेस    16 राजद    4 भाकपा-माले    2 कुल वोट    56 एनडीए विधायकों की संख्याः दल    विधायक भाजपा    21 जदयू    1 लोजपा-आर    1 आजसू पार्टी    1 कुल    24   JMM-कांग्रेस का दांव राज्यसभा चुनाव में जेएमएम उम्मीदवार बैजनाथ राम सिर्फ अपनी पार्टी के ही 34 में से 28 विधायकों के प्रथम वरीयता के वोट से आसानी से जीत हासिल कर लेंगे। लेकिन, कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा को अपनी पार्टी के 16 विधायकों के अलावा जेएमएम के बचे 6 वोट के साथ राजद और भाकपा-माले के 2 विधायकों का भी प्रथम वरीयता का वोट प्राप्त करना होगा, तभी उनकी जीत सुनिश्चित होगी। लेकिन, मामला तभी फंसेगा, जब भीतरघात या क्रॉस वोटिंग होगी। कैसे जीतेंगे नाथवाणी? निर्दलीय परिमल नाथवाणी को भाजपा के 21 के साथ जदयू, आजसू पार्टी और लोजपा आर के एक-एक विधायकों का समर्थन मिल सकता है। इसके बाद भी प्रथम वरीयता के चार वोट की जरूरत उन्हें पड़ेगी। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि परिमल नाथवानी के जेएलकेएम के जयराम महतो का समर्थन मिल सकता है। इसके बाद भी उन्हें तीन वोट की जरूरत हो सकती है। ऐसी स्थिति में क्रॉस वोटिंग या सेकेंड प्रेफरेंस का वोट निर्णायक साबित हो सकता है।

anjali kumari जून 11, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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राजनीति

तमिलनाडु बीजेपी में बढ़ी टूट, अन्नामलाई के बाद उपाध्यक्ष और प्रदेश सचिव ने भी छोड़ी पार्टी

Deepshikha जून 6, 2026 0