Balendra Shah

Nepal Supreme Court controversy grows after junior judge recommended as new Chief Justice by constitutional council
नेपाल में चीफ जस्टिस नियुक्ति पर विवाद, PM बालेन शाह पर मनमानी के आरोप

नेपाल में सुप्रीम कोर्ट के नए चीफ जस्टिस की नियुक्ति को लेकर बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। करीब 70 साल से चली आ रही वरिष्ठता (सीनियरिटी) की परंपरा को तोड़ते हुए प्रधानमंत्री Balendra Shah की अगुवाई वाली संवैधानिक परिषद ने सुप्रीम कोर्ट के चौथे सबसे वरिष्ठ जज Manoj Kumar Sharma को मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश कर दी है। इस फैसले के बाद नेपाल की राजनीति और न्यायपालिका में तीखी बहस शुरू हो गई है। काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार परिषद ने वरिष्ठ जज Sapana Pradhan Malla, Kumar Regmi और Hari Prasad Phuyal को नजरअंदाज करते हुए मनोज कुमार शर्मा के नाम को आगे बढ़ाया। माना जा रहा है कि यह नेपाल के न्यायिक इतिहास में एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि अब तक परंपरा के अनुसार सबसे वरिष्ठ जज को ही चीफ जस्टिस बनाया जाता रहा है। परिषद में हुआ विरोध छह सदस्यीय संवैधानिक परिषद की बैठक में इस फैसले का विरोध भी हुआ। नेशनल असेंबली के अध्यक्ष और विपक्ष के नेता ने वरिष्ठता को दरकिनार करने पर आपत्ति जताई। परिषद के एक सदस्य ने कहा कि स्थापित प्रक्रिया और न्यायिक परंपरा को तोड़ना सही नहीं है, इसलिए विरोध लिखित रूप में दर्ज कराया गया। मार्च में पूर्व चीफ जस्टिस Prakash Man Singh Raut के रिटायर होने के बाद सपना प्रधान मल्ला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी संभाल रही थीं। ऐसे में उन्हें नजरअंदाज किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। PM बालेन शाह ने दिया यह तर्क बैठक में प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि केवल वरिष्ठता के आधार पर नियुक्तियां नहीं होनी चाहिए। उनके मुताबिक चयन प्रक्रिया में योग्यता, विशेषज्ञता और न्याय देने की क्षमता को भी महत्व मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि कार्यक्षमता भी अहम है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञ इस तर्क से पूरी तरह सहमत नजर नहीं आ रहे हैं। Kathmandu University School of Law के प्रोफेसर Bipin Adhikari ने कहा कि संविधान में वरिष्ठता अनिवार्य नहीं है, लेकिन अगर परंपरा तोड़ी जा रही है तो उसके पीछे बेहद मजबूत और पारदर्शी कारण होने चाहिए। उनके मुताबिक बिना ठोस वजह के जूनियर जज को आगे बढ़ाना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर सकता है। न्यायपालिका पर दबाव बढ़ने की आशंका विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से भविष्य में जजों पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। उन्हें डर हो सकता है कि सरकार की नाराजगी उनके प्रमोशन को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि नेपाल में इस नियुक्ति को केवल प्रशासनिक फैसला नहीं बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा माना जा रहा है। नेपाल की राजनीति में पहले ही अस्थिरता और सत्ता संघर्ष के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में चीफ जस्टिस की नियुक्ति को लेकर उठा यह विवाद आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।  

surbhi मई 8, 2026 0
Nepal government decision cancels political appointments causing nationwide administrative and political debate
बालेन सरकार का बड़ा फैसला–1500 से ज्यादा ‘राजनीतिक नियुक्तियां’ रद्द, देशभर में हलचल

Nepal में नई सरकार ने भ्रष्टाचार और कथित राजनीतिक हस्तक्षेप पर बड़ा प्रहार करते हुए 1,500 से अधिक सार्वजनिक नियुक्तियों को एक झटके में रद्द कर दिया है। Balendra Shah के नेतृत्व वाली सरकार के इस फैसले से प्रशासनिक तंत्र में भारी उथल-पुथल मच गई है और देशभर में बहस छिड़ गई है। राष्ट्रपति के अध्यादेश से लागू हुआ फैसला राष्ट्रपति Ram Chandra Poudel ने मंत्रिमंडल की सिफारिश पर ‘सार्वजनिक पद धारकों को हटाने के लिए विशेष प्रावधानों पर अध्यादेश, 2083’ जारी किया। इस अध्यादेश के लागू होते ही 26 मार्च से पहले की गई 1,594 से अधिक नियुक्तियां तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गईं। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ये नियुक्तियां प्रशासन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे अहम क्षेत्रों में की गई थीं, जिससे इन विभागों में अचानक रिक्तियां पैदा हो गई हैं। ‘राजनीतिक नियुक्तियों’ पर सरकार का प्रहार सरकार का दावा है कि पिछली सरकारों ने बड़े पैमाने पर राजनीतिक आधार पर नियुक्तियां की थीं, जिन्हें अब निष्प्रभावी करना जरूरी था। इस कार्रवाई का मकसद प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना बताया जा रहा है। बताया जा रहा है कि ‘जेन-जी’ आंदोलन के बाद बनी अंतरिम व्यवस्था के दौरान भी कई नियुक्तियां की गई थीं, जिन्हें अब रद्द कर दिया गया है। ‘जेन-जी आंदोलन’ से सत्ता तक का सफर नेपाल की राजनीति में यह बड़ा बदलाव तब आया जब पारंपरिक दलों के खिलाफ जनाक्रोश बढ़ा और ‘जेन-जी’ (नई पीढ़ी) आंदोलन ने जोर पकड़ा। इसी लहर पर सवार होकर नई राजनीतिक ताकत उभरी और Balendra Shah के नेतृत्व में सरकार बनी। इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री K. P. Sharma Oli की सरकार का पतन हुआ था, जिसके बाद राजनीतिक अस्थिरता का दौर देखा गया। बड़े फैसलों से चर्चा में बालेन सरकार प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन सरकार लगातार सख्त और विवादास्पद फैसले ले रही है। काठमांडू में नदी किनारे अवैध निर्माणों पर बुलडोजर कार्रवाई शिक्षा सुधार के लिए 100 दिन का एक्शन प्लान निजी स्कूलों के नाम नेपाली भाषा में करने का निर्देश छात्र राजनीति पर रोक और सरकारी स्कूलों को बढ़ावा इसके अलावा, भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री K. P. Sharma Oli की गिरफ्तारी भी चर्चा में रही, हालांकि बाद में अदालत से उन्हें राहत मिल गई। फैसले से खड़ी हुई नई चुनौतियां सरकार के इस फैसले ने जहां एक ओर भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त संदेश दिया है, वहीं दूसरी ओर कई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं। प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होने का खतरा स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों में स्टाफ की कमी बर्खास्त किए गए अधिकारियों की कानूनी चुनौती राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने की आशंका विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर नियुक्तियां रद्द करना एक साहसिक कदम जरूर है, लेकिन इसके प्रभाव को संभालना सरकार के लिए बड़ी परीक्षा होगी।  

surbhi मई 4, 2026 0
Nepal Home Minister Sudhan Gurung resigns amid corruption allegations, political crisis deepens in Kathmandu
नेपाल के गृहमंत्री सुधन गुरुंग का इस्तीफा, वित्तीय लेनदेन विवाद के बाद लिया बड़ा फैसला

  भ्रष्टाचार आरोपों के बीच अचानक इस्तीफा Sudhan Gurung ने गृहमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। उनका नाम कथित तौर पर वित्तीय लेनदेन और मनी लॉन्ड्रिंग जांच से जुड़े मामलों में सामने आने के बाद यह कदम उठाया गया। नेपाल की राजनीति में यह घटनाक्रम बड़ा माना जा रहा है, क्योंकि गुरुंग सरकार के सबसे मुखर चेहरों में गिने जाते थे। पीएम को सौंपा इस्तीफा, खुद संभालेंगे मंत्रालय सूत्रों के मुताबिक, Sudhan Gurung ने अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री Balendra Shah को सौंप दिया है। फिलहाल गृहमंत्रालय की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री खुद संभालेंगे। गुरुंग ने 27 मार्च को ही इस पद की जिम्मेदारी संभाली थी, लेकिन एक महीने के भीतर ही विवादों में घिर गए। पावर ब्रोकर से संबंधों के आरोप मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि गुरुंग का नाम Dipak Bhatta से जुड़ा है, जिन पर सरकारी ठेकों और फैसलों को प्रभावित करने के आरोप हैं। बताया जा रहा है कि यह मामला उस समय का भी है जब K P Sharma Oli देश के प्रधानमंत्री थे। ‘जनता का भरोसा सबसे जरूरी’ – गुरुंग इस्तीफा देते हुए गुरुंग ने कहा कि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने और हितों के टकराव से बचने के लिए उन्होंने यह फैसला लिया है। उन्होंने कहा, “सार्वजनिक जीवन में सबसे बड़ी ताकत नैतिकता और लोगों का भरोसा है, इससे बड़ा कुछ नहीं।” पहले भी विवादों में रहे गुरुंग पूर्व डीजे और सामाजिक कार्यकर्ता रहे गुरुंग अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं। वे 2025 में भ्रष्टाचार विरोधी “Gen Z” आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल थे। हालांकि, उनके काम करने के तरीके और प्रशासन में दखल को लेकर पुलिस नेतृत्व के साथ मतभेद भी सामने आए थे।  

surbhi अप्रैल 23, 2026 0
Nepal government committee reviewing political leaders’ assets under anti-corruption investigation panel
नेपाल में भ्रष्टाचार पर सख्ती: पीएम बालेंद्र शाह ने संपत्ति जांच के लिए पैनल बनाया

नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ नई सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री Balendra Shah ने पूर्व और वर्तमान नेताओं व अधिकारियों की संपत्ति की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय पैनल गठित किया है। रिटायर्ड जज करेंगे पैनल की अगुवाई सरकार द्वारा बनाए गए इस पांच सदस्यीय पैनल की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज Rajendra Kumar Bhandari करेंगे। पैनल का मुख्य काम नेताओं और सरकारी अधिकारियों की संपत्तियों व परिसंपत्तियों की जांच करना होगा। निष्पक्ष जांच का दावा कैबिनेट प्रवक्ता Sasmit Pokharel ने बताया कि जांच प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष होगी और कानूनी मानकों ठोस सबूतों के आधार पर की जाएगी। रिपोर्ट के आधार पर होगी कार्रवाई सरकार ने स्पष्ट किया है कि पैनल अपनी रिपोर्ट और सिफारिशें संबंधित एजेंसियों को सौंपेगा, जिसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।  हालांकि, अभी तक जांच पूरी करने की समयसीमा तय नहीं की गई है। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह का यह कदम नेपाल में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में बड़ा माना जा रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि जांच रिपोर्ट के बाद सरकार किस तरह की ठोस कार्रवाई करती है। 20.नेपाल में ‘सफेदपोश’ भ्रष्टाचार पर बड़ा प्रहार: 2006 से अब तक नेताओं की संपत्ति की होगी न्यायिक जांच नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री Balendra Shah की सरकार ने एक व्यापक न्यायिक आयोग गठित किया है। यह आयोग 2006 में राजतंत्र समाप्त होने के बाद से लेकर वित्तीय वर्ष 2025-26 तक सार्वजनिक पदों पर रहे नेताओं और अधिकारियों की संपत्ति की जांच करेगा। किन-किन पर होगी जांच? इस जांच के दायरे को बेहद व्यापक रखा गया है। इसमें शामिल हैं: पूर्व राजा Gyanendra Shah पूर्व राष्ट्रपति Ram Baran Yadav, Bidya Devi Bhandari वर्तमान राष्ट्रपति Ram Chandra Poudel पूर्व प्रधानमंत्री जैसे Pushpa Kamal Dahal, K. P. Sharma Oli, Sher Bahadur Deuba, Baburam Bhattarai, Madhav Kumar Nepal, Jhala Nath Khanal अंतरिम सरकारों के प्रमुख और वरिष्ठ नौकरशाह यहां तक कि दिवंगत नेताओं–जैसे गिरिजा प्रसाद कोइराला और सुशील कोइराला–की संपत्तियों की भी जांच की जाएगी, जिससे उनके परिवार और राजनीतिक उत्तराधिकारियों पर भी असर पड़ सकता है। अपने ही सहयोगी भी जांच के दायरे में सरकार ने इस आयोग को पूरी तरह स्वतंत्र और व्यापक बनाया है। वर्तमान स्पीकर और कुछ मौजूदा मंत्री यहां तक कि सत्तारूढ़ दल के नेता Rabi Lamichhane भी जांच के दायरे में आ सकते हैं। कौन कर रहा है जांच की अगुवाई? इस पांच सदस्यीय आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज Rajendra Kumar Bhandari कर रहे हैं। कैबिनेट प्रवक्ता Sasmit Pokharel के अनुसार, जांच पूरी तरह निष्पक्ष होगी कानूनी मानकों और सबूतों के आधार पर की जाएगी युवा आंदोलन के बाद बड़ा फैसला यह कदम मार्च 2025 के चुनाव में भारी जीत के बाद उठाया गया है, जो देश में हुए बड़े युवा-नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद संभव हुआ। नेपाल में यह पहली बार है जब इतने बड़े स्तर पर राजनीतिक और प्रशासनिक वर्ग की संपत्ति की जांच हो रही है। यह कदम देश में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में ऐतिहासिक माना जा रहा है–अब नजर इस पर रहेगी कि आयोग की रिपोर्ट के बाद क्या ठोस कार्रवाई होती है।  

surbhi अप्रैल 17, 2026 0
Balendra Shah’s Rastriya Swatantra Party leads Nepal 2026 elections, historic victory in sight
नेपाल चुनाव 2026 में बालेन शाह की बड़ी बढ़त, RSP 90 से ज्यादा सीटों पर आगे; दिग्गज दल पीछे

Nepal General Election 2026 की मतगणना में बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखने को मिल रहा है। रैपर से नेता बने Balendra Shah की पार्टी Rastriya Swatantra Party ने चुनावी मुकाबले में जबरदस्त बढ़त बना ली है। ताजा रुझानों के अनुसार आरएसपी करीब 98 सीटों पर आगे चल रही है, जिससे पार्टी की ऐतिहासिक जीत की संभावना मजबूत हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह बढ़त बरकरार रहती है तो नेपाल की पारंपरिक राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।   झापा-5 सीट पर ओली से काफी आगे बालेन शाह झापा-5 संसदीय क्षेत्र में बालेन शाह ने मजबूत बढ़त बना ली है। उन्हें अब तक लगभग 39,284 वोट मिल चुके हैं। वहीं चार बार प्रधानमंत्री रह चुके K. P. Sharma Oli को करीब 10,293 वोट मिले हैं। इस सीट पर Samir Tamang (श्रम संस्कृति पार्टी) को 6,324 वोट प्राप्त हुए हैं। ओली का यह इलाका उनका मजबूत गढ़ माना जाता रहा है, ऐसे में यहां उनकी बड़ी हार की संभावना को बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।   संसद की 275 सीटों पर चुनाव नेपाल की संसद के निचले सदन में कुल 275 सीटें हैं। इनमें से 165 सीटों पर First-Past-the-Post (FPTP) प्रणाली के तहत सीधे चुनाव होते हैं, जबकि 110 सीटें Proportional Representation (PR) के जरिए तय होती हैं। सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 138 सीटों का आंकड़ा हासिल करना जरूरी होता है। इस चुनाव में देशभर से कुल 68 राजनीतिक दल मैदान में हैं। लगभग 3,406 उम्मीदवार एफपीटीपी प्रणाली के तहत और 1,270 उम्मीदवार आनुपातिक प्रतिनिधित्व श्रेणी में चुनाव लड़ रहे हैं।   पारंपरिक पार्टियां पीछे मतगणना के शुरुआती रुझानों में पारंपरिक राजनीतिक दल काफी पीछे दिखाई दे रहे हैं। Rastriya Swatantra Party – 93 सीटों पर बढ़त Nepal Communist Party – 10 सीटों पर आगे Communist Party of Nepal (Unified Marxist–Leninist) – 10 सीटों पर बढ़त Nepali Congress – 9 सीटों पर आगे अन्य छोटी पार्टियां मिलकर करीब 6 सीटों पर आगे चल रही हैं।   युवाओं का समर्थन बना बड़ा फैक्टर विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं और शहरी मतदाताओं का समर्थन बालेन शाह की पार्टी को बड़ी बढ़त दिला रहा है। पूर्व Kathmandu मेयर रहे शाह ने भ्रष्टाचार और पारंपरिक राजनीति के खिलाफ अभियान चलाया था, जिसे जनता का व्यापक समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है। यदि अंतिम नतीजे भी इसी तरह रहते हैं, तो नेपाल की राजनीति में एक नई ताकत उभर सकती है और देश को लंबे समय बाद स्थिर सरकार मिलने की उम्मीद भी बढ़ सकती है।  

surbhi मार्च 7, 2026 0
Nepal voters casting ballots as protests erupt against KP Sharma Oli amid high-stakes national elections
नेपाल में निर्णायक मतदान: युवा आक्रोश के बाद सियासत का बड़ा इम्तिहान, 1.89 करोड़ मतदाता करेंगे सत्ता का फैसला

महीनों पहले जनआंदोलन से गिरी थी सरकार, अब चुनावी मैदान में आमने-सामने दिग्गज और नई पीढ़ी नेपाल में गुरुवार को ऐतिहासिक आम चुनाव की शुरुआत हो गई। यह चुनाव ऐसे समय में हो रहा है जब कुछ महीने पहले युवाओं के उग्र विरोध प्रदर्शन के बाद पूर्व प्रधानमंत्री KP Sharma Oli की सरकार गिर गई थी। इस बार का मतदान सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि पुरानी राजनीतिक व्यवस्था और नई जनरेशन के बीच सीधा मुकाबला माना जा रहा है। देशभर में 1.89 करोड़ से अधिक मतदाता 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा के लिए अपने मताधिकार का उपयोग कर रहे हैं। चुनाव को लेकर युवाओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है, क्योंकि पिछली बार सड़कों पर उतरी जेनरेशन-ज़ेड की भूमिका ने राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया था। 10,967 बूथों पर मतदान, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम सुबह 7 बजे से मतदान शुरू हुआ, जो शाम 5 बजे तक चलेगा। पूरे देश में 10,967 मतदान बूथ और 23,112 मतदान केंद्र बनाए गए हैं। चुनाव आयोग के अनुसार, मतपेटियों को सुरक्षित रखने के बाद तुरंत मतगणना शुरू कर दी जाएगी। पहले चरण यानी फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली के नतीजे 24 घंटे के भीतर आने की संभावना है। सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार ने व्यापक इंतजाम किए हैं। करीब 3 लाख सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है। दुर्गम इलाकों से मतपेटियों को हेलीकॉप्टर के जरिए लाया जाएगा। गृह मंत्री ओम प्रकाश अर्याल ने मतदाताओं से निर्भीक होकर मतदान करने की अपील की है। मतदान को सुचारू बनाने के लिए सरकार ने तीन दिन का सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। 275 सीटों पर मुकाबला, 65 पार्टियां मैदान में प्रतिनिधि सभा की 275 सीटों में से 165 सीटों पर सीधे चुनाव (फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट) से फैसला होगा, जबकि 110 सीटें आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत भरी जाएंगी। सीधे चुनाव वाली 165 सीटों पर 3,406 उम्मीदवार मैदान में हैं, जबकि 110 आनुपातिक सीटों के लिए 3,135 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। कुल 65 राजनीतिक दल इस चुनाव में हिस्सा ले रहे हैं। सड़कों से संसद तक: कैसे बदला सियासी माहौल राजनीतिक उथल-पुथल की शुरुआत 8 और 9 सितंबर 2025 को हुई थी, जब हजारों युवा काठमांडू समेत कई शहरों में सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी के खिलाफ जोरदार आंदोलन किया। हिंसक झड़पों में 75 से अधिक लोगों की मौत हुई, जिससे देशभर में आक्रोश फैल गया। बढ़ते दबाव के बीच KP Sharma Oli ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद राष्ट्रपति Ramchandra Paudel ने प्रतिनिधि सभा भंग कर दी और पूर्व मुख्य न्यायाधीश Sushila Karki को कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त किया। पुराना अनुभव बनाम नई सोच यह चुनाव अब पारंपरिक दलों और उभरते राजनीतिक विकल्पों के बीच सीधी टक्कर में बदल गया है। 75 वर्षीय ओली एक बार फिर अपनी पार्टी Communist Party of Nepal (Unified Marxist–Leninist) (सीपीएन-यूएमएल) के चेहरे के रूप में स्थिरता का दावा कर रहे हैं। वहीं Nepali Congress ने 49 वर्षीय गगन थापा को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर युवा नेतृत्व की झलक देने की कोशिश की है। दूसरी ओर, Rastriya Swotantra Party (आरएसपी) खुद को जनआंदोलन की असली आवाज बता रही है। पार्टी के नेता Rabi Lamichhane और काठमांडू के मेयर Balendra Shah युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय हैं। 35 वर्षीय बालेन्द्र शाह झापा-5 सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, जहां उनका मुकाबला सीधे ओली से है। यह सीट इस चुनाव की सबसे चर्चित और प्रतिष्ठित सीटों में गिनी जा रही है, क्योंकि ओली यहां से छह बार जीत चुके हैं। क्या बदलेगा नेपाल का राजनीतिक भविष्य? इस चुनाव को नेपाल की राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव की परीक्षा माना जा रहा है। क्या युवा आंदोलन की ऊर्जा सत्ता में तब्दील होगी, या अनुभवी नेतृत्व फिर से भरोसा जीत लेगा-इसका जवाब आने वाले नतीजों में छिपा है। नेपाल की जनता आज सिर्फ सांसद नहीं चुन रही, बल्कि देश की भावी दिशा भी तय कर रही है।  

surbhi मार्च 5, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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surbhi मई 15, 2026 0