वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान ने दोबारा बातचीत की इच्छा जताई है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका भी वार्ता के लिए तैयार है, लेकिन साथ ही स्पष्ट कर दिया कि दोनों देशों के बीच लागू युद्धविराम अब समाप्त हो चुका है। उनके इस बयान से पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ट्रंप बोले- ईरान बातचीत चाहता है डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर लिखा कि ईरान ने अमेरिका से बातचीत जारी रखने का अनुरोध किया है और वॉशिंगटन इसके लिए तैयार है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि युद्धविराम अब खत्म हो चुका है और यदि ईरान की ओर से हमले जारी रहे तो अमेरिका पहले से अधिक कड़ी सैन्य कार्रवाई करेगा। हालिया हमलों के बाद बढ़ा तनाव ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब पिछले दो दिनों में अमेरिका ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं। इसके जवाब में ईरान ने कतर, बहरीन और कुवैत की दिशा में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए मिसाइलें दागीं। अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, कार्रवाई के दौरान ईरान में लगभग 90 सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। इनमें मिसाइल लॉन्चर, हवाई अड्डों के रनवे और अन्य सैन्य प्रतिष्ठान शामिल थे। वहीं, ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार इन हमलों में कम से कम 14 लोगों की मौत हुई और 78 अन्य घायल हुए हैं। ट्रंप की नई चेतावनी नाटो शिखर सम्मेलन से लौटने के बाद ट्रंप ने कहा था कि होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में अमेरिकी कार्रवाई की गई। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान ने फिर हमला किया तो अमेरिका दस गुना अधिक ताकत से जवाब देगा। ट्रंप ने ईरान के बिजली संयंत्रों, समुद्री जल शोधन संयंत्रों और खर्ग द्वीप जैसे रणनीतिक ठिकानों को भी संभावित लक्ष्य बताया। तनाव कम कराने की कोशिशें तेज सैन्य टकराव के बीच कूटनीतिक प्रयास भी तेज हो गए हैं। इसी सिलसिले में कतर के मध्यस्थ तेहरान पहुंचे हैं। उनका उद्देश्य अमेरिका और ईरान के बीच रुकी हुई वार्ता को दोबारा शुरू कराने और क्षेत्रीय तनाव कम करने का रास्ता तैयार करना है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार फिलहाल वॉशिंगटन सीमित सैन्य कार्रवाई के साथ कूटनीतिक समाधान की रणनीति पर भी काम कर रहा है ताकि व्यापक युद्ध की स्थिति से बचा जा सके। बातचीत और सैन्य तैयारी साथ-साथ अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि जरूरत पड़ने पर सभी सैन्य विकल्प खुले हैं, लेकिन प्राथमिकता अब भी राजनयिक समाधान तलाशने की है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में कतर और अन्य क्षेत्रीय मध्यस्थों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि दोनों पक्ष बातचीत की मेज पर लौटते हैं तो पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को कम करने की संभावना बन सकती है, हालांकि मौजूदा हालात अभी भी बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।
अगर परिवार में किसी को डायबिटीज है, तो अक्सर माता-पिता को यह चिंता रहती है कि कहीं उनके बच्चों को भी भविष्य में यह बीमारी न हो जाए। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि पारिवारिक इतिहास जोखिम जरूर बढ़ाता है, लेकिन यह तय नहीं करता कि बच्चे को डायबिटीज होगी ही। सही खानपान, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। एंडोक्राइनोलॉजिस्ट्स के अनुसार, बचपन में अपनाई गई अच्छी आदतें लंबे समय तक मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। क्या केवल जेनेटिक्स ही जिम्मेदार हैं? विशेषज्ञों के मुताबिक, टाइप-2 डायबिटीज केवल आनुवंशिक कारणों से नहीं होती। यह जेनेटिक प्रवृत्ति और जीवनशैली दोनों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है। यदि माता-पिता या भाई-बहन को डायबिटीज है, तो बच्चे में इंसुलिन रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ सकता है। लेकिन यह जोखिम बीमारी में बदलेगा या नहीं, यह काफी हद तक उसकी रोजमर्रा की आदतों पर निर्भर करता है। बचपन से डालें स्वस्थ खानपान की आदत डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों को सख्त डाइट पर रखने की बजाय पूरे परिवार में हेल्दी खाने की आदत विकसित करनी चाहिए। दैनिक भोजन में शामिल करें: ताजे फल हरी सब्जियां साबुत अनाज दालें और फलियां कम वसा वाले प्रोटीन हेल्दी फैट्स वहीं, इन चीजों का सेवन सीमित रखें: मीठे पेय पदार्थ पैकेज्ड स्नैक्स प्रोसेस्ड फूड फास्ट फूड विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे वही आदतें सीखते हैं जो वे घर में रोज देखते हैं। रोजाना शारीरिक गतिविधि है जरूरी बच्चों को जिम भेजने की जरूरत नहीं है। उन्हें ऐसी गतिविधियों के लिए प्रेरित करें जिनमें उन्हें आनंद आता हो। बेहतर विकल्प हो सकते हैं: साइकिल चलाना तैराकी क्रिकेट या फुटबॉल खेलना दौड़ना डांस करना स्केटिंग आउटडोर गेम्स डॉक्टरों की सलाह है कि बच्चों को हर दिन कम से कम 60 मिनट मध्यम से तेज शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए। पर्याप्त नींद भी उतनी ही महत्वपूर्ण अक्सर लोग खानपान और एक्सरसाइज पर ध्यान देते हैं, लेकिन अच्छी नींद को नजरअंदाज कर देते हैं। कम नींद लेने से शरीर के उन हार्मोन्स पर असर पड़ता है जो नियंत्रित करते हैं: भूख भूख बढ़ाने वाले हार्मोन ब्लड शुगर वजन इसलिए बच्चों के लिए नियमित सोने और जागने का समय तय करना जरूरी है। साथ ही रात में मोबाइल और अन्य स्क्रीन का उपयोग कम करना चाहिए। स्क्रीन टाइम रखें सीमित लंबे समय तक मोबाइल, टीवी या टैबलेट का इस्तेमाल बच्चों की शारीरिक गतिविधि कम कर देता है, जिससे: वजन बढ़ सकता है मोटापे का खतरा बढ़ता है नींद प्रभावित होती है टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है इसलिए स्क्रीन टाइम और एक्टिव प्ले के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। इन शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें यदि परिवार में डायबिटीज का इतिहास है और बच्चे में नीचे दिए गए लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें। बार-बार प्यास लगना बार-बार पेशाब आना बिना कारण वजन घटना लगातार थकान महसूस होना गर्दन या बगल में काले, मखमली धब्बे (Acanthosis Nigricans) तेजी से वजन बढ़ना या मोटापा जरूरत पड़ने पर डॉक्टर ब्लड शुगर टेस्ट, बीएमआई और कमर की माप जैसी जांच की सलाह भी दे सकते हैं। बच्चे वही सीखते हैं जो माता-पिता करते हैं विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चे केवल सलाह नहीं, बल्कि अपने माता-पिता की आदतों की नकल करते हैं। यदि माता-पिता: संतुलित भोजन खाते हैं नियमित व्यायाम करते हैं समय-समय पर हेल्थ चेकअप करवाते हैं मीठे पेय पदार्थों से बचते हैं पर्याप्त नींद लेते हैं तो बच्चों में भी स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की संभावना अधिक रहती है। परिवार में डायबिटीज है तो घबराएं नहीं, सतर्क रहें डॉक्टरों का मानना है कि पारिवारिक इतिहास को डर की तरह नहीं, बल्कि समय रहते बचाव करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए। जेनेटिक्स बदले नहीं जा सकते, लेकिन सही जीवनशैली अपनाकर भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यदि बच्चे में डायबिटीज से जुड़े लक्षण दिखाई दें या परिवार में बीमारी का मजबूत इतिहास हो, तो चिकित्सक से व्यक्तिगत सलाह अवश्य लें।
US-Iran Conflict: अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम टूटने के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव एक बार फिर तेज हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कहा है कि अंतरिम युद्धविराम (सीजफायर) अब समाप्त हो चुका है। लगातार दो दिनों से दोनों देशों के बीच हमले जारी हैं। इस बीच, पहले मध्यस्थता की भूमिका निभाने की कोशिश कर चुका पाकिस्तान अब दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील कर रहा है। पाकिस्तान ने जताई चिंता पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा शुरू हुआ सैन्य संघर्ष किसी के हित में नहीं है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में सभी पक्षों से संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की, जिनसे क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को नुकसान पहुंचे। पाकिस्तान ने कहा कि स्थायी समाधान केवल संवाद, कूटनीति और बातचीत से ही संभव है। मध्यस्थता की पेशकश पाकिस्तान ने यह भी कहा कि यदि दोनों पक्ष सहमत हों तो इस्लामाबाद अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि पहले हुए समझौतों और प्रतिबद्धताओं का सम्मान किया जाना चाहिए ताकि क्षेत्र में शांति बनी रहे। ट्रंप ने कहा- सीजफायर खत्म अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि दोनों देशों के बीच हुआ अंतरिम समझौता अब समाप्त हो चुका है। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कूटनीतिक बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। ट्रंप के बयान के बाद वैश्विक बाजारों में भी असर देखने को मिला और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेजी दर्ज की गई। दोनों ओर से जारी हैं हमले अमेरिका ने लगातार दूसरे दिन ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए। इसके जवाब में ईरान ने बहरीन, कुवैत और कतर में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इन घटनाओं के बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है तथा व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष की आशंका जताई जा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य बना तनाव का केंद्र विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा तनाव का सबसे बड़ा केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल निर्यात होता है। यदि संघर्ष और बढ़ता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति तथा समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकता है। ईरान का सख्त रुख ईरान के वरिष्ठ नेताओं ने भी अमेरिका को चेतावनी दी है कि यदि सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो उसका जवाब और कड़े तरीके से दिया जाएगा। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय अधिकारों की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगा। बढ़ी वैश्विक चिंता अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा शुरू हुए सैन्य टकराव ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की अपील की है, ताकि पश्चिम एशिया में व्यापक युद्ध की स्थिति से बचा जा सके।
तेहरान/वॉशिंगटन: इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच एक अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट में बड़ा दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच अंतरिम शांति समझौते पर बातचीत के दौरान इजरायल कथित तौर पर ईरान के शीर्ष वार्ताकारों को निशाना बनाने की योजना पर काम कर रहा था। हालांकि, इन दावों की किसी भी पक्ष ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में बड़ा दावा अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने वर्तमान और पूर्व अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दावा किया है कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघचीऔर संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर गालिबाफ कथित तौर पर इजरायल की टारगेट लिस्ट में शामिल थे। दोनों नेता युद्धविराम और शांति वार्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका को आशंका थी कि यदि इन नेताओं पर हमला होता है तो शांति वार्ता पूरी तरह विफल हो सकती है। अमेरिका ने जताई थी चिंता रिपोर्ट में कहा गया है कि अप्रैल में शुरू हुई वार्ताओं के दौरान वॉशिंगटन ने क्षेत्र के कुछ मित्र देशों के जरिए ईरान को संभावित सुरक्षा खतरे की जानकारी भी पहुंचाई थी। अमेरिकी अधिकारियों को डर था कि वार्ता में शामिल नेताओं पर किसी भी तरह का हमला पूरे कूटनीतिक प्रयास को पटरी से उतार सकता है। ईरानी नेतृत्व को निशाना बनाने की रणनीति का दावा रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान के शीर्ष नेताओं को निशाना बनाना युद्ध की शुरुआत से ही इजरायल की कथित रणनीति का हिस्सा रहा है। दावे के मुताबिक, इजरायल की सूची में वरिष्ठ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी और पूर्व विदेश मंत्री कमाल खराजी जैसे अन्य प्रमुख नेताओं के नाम भी शामिल थे। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। पाकिस्तान यात्रा के दौरान भी सुरक्षा का खतरा रिपोर्ट के अनुसार, इसी वर्ष अप्रैल में जब अब्बास अराघची और मोहम्मद बाकर गालिबाफ वार्ता के सिलसिले में इस्लामाबाद पहुंचे थे, तब भी उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता बनी हुई थी। बताया गया है कि पाकिस्तान ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल के विमान को अपने लड़ाकू विमानों की सुरक्षा उपलब्ध कराई थी। वापसी के दौरान ईरानी सुरक्षा एजेंसियों ने कथित खुफिया सूचना के आधार पर विमान को संभावित खतरे की चेतावनी दी। तेहरान की जगह मशहद में उतारा गया विमान रिपोर्ट में दावा किया गया है कि संभावित सुरक्षा खतरे को देखते हुए ईरानी विमान को तेहरान के बजाय मशहद हवाई अड्डे पर उतारा गया। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल ने सड़क मार्ग से करीब आठ घंटे की यात्रा कर तेहरान पहुंचकर अपना सफर पूरा किया। आधिकारिक पुष्टि नहीं रिपोर्ट में किए गए सभी दावों की अब तक स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। न तो इजरायल, न अमेरिका और न ही ईरान की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी की गई है। ऐसे में इन दावों को फिलहाल मीडिया रिपोर्ट के तौर पर ही देखा जा रहा है।
यरुशलम/बेरूत: मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी संघर्ष को खत्म करने की दिशा में अमेरिका की मध्यस्थता से इजरायल और लेबनान के बीच एक महत्वपूर्ण फ्रेमवर्क समझौता तैयार किया गया है। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच स्थायी शांति और सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था बहाल करना है। समझौते की घोषणा के तुरंत बाद हिज्बुल्लाह ने इसका कड़ा विरोध करते हुए चेतावनी दी है कि यदि इसे लागू करने की कोशिश की गई तो लेबनान गृहयुद्ध जैसी स्थिति की ओर बढ़ सकता है। अमेरिका ने किया समझौते का ऐलान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शुक्रवार को इस फ्रेमवर्क समझौते की घोषणा करते हुए कहा कि यह इजरायल और लेबनान के बीच स्थायी शांति की दिशा में पहला बड़ा कदम है। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने पूरे समझौते में मध्यस्थ और सहयोगी की भूमिका निभाई है। इस समझौते पर लेबनान की राजदूत नादा हमादेह, इजरायल के राजदूत येचिएल लेइटर और अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए। क्या हैं समझौते की प्रमुख शर्तें? समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में तत्काल युद्धविराम लागू करने और हिज्बुल्लाह द्वारा सभी तरह की सैन्य गतिविधियां एवं रॉकेट हमले रोकने की शर्त रखी गई है। इसके साथ ही संगठन को दक्षिणी लेबनान से पीछे हटना होगा। जिन इलाकों से इजरायली सेना और हिज्बुल्लाह पीछे हटेंगे, वहां लेबनानी सेना की तैनाती की जाएगी ताकि सीमा क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा व्यवस्था स्थापित की जा सके। अमेरिका करेगा निगरानी, लेबनान को मिलेगी आर्थिक सहायता मार्को रुबियो ने बताया कि समझौते के क्रियान्वयन की निगरानी अमेरिका की अगुवाई में बनाए गए त्रिपक्षीय सैन्य समन्वय समूह द्वारा की जाएगी। इसके अलावा अमेरिका ने लेबनान के लिए तत्काल 10 करोड़ डॉलर की मानवीय सहायता देने की घोषणा की है। साथ ही लेबनानी सशस्त्र बलों को मजबूत करने और सरकारी नियंत्रण बढ़ाने के लिए 3 करोड़ डॉलर से अधिक की अतिरिक्त सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। दक्षिणी लेबनान में बनाए जाएंगे दो पायलट जोन समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में दो पायलट सुरक्षा क्षेत्र विकसित किए जाएंगे। इन क्षेत्रों से इजरायली सेना चरणबद्ध तरीके से पीछे हटेगी और उनकी जगह लेबनानी सेना तैनात होगी। इजरायल ने स्पष्ट किया है कि सेना की पूरी वापसी तभी होगी जब हिज्बुल्लाह अपने हथियार छोड़ेगा और उसका सैन्य ढांचा पूरी तरह समाप्त होगा। लेबनान ने बताया संप्रभुता बहाल करने की दिशा में बड़ा कदम अमेरिका में लेबनान की राजदूत नादा हमादेह ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि इससे लेबनान की संप्रभुता मजबूत होगी, सीमा पर संघर्ष समाप्त होगा और विस्थापित नागरिक अपने घर लौट सकेंगे। उन्होंने इस पहल का श्रेय लेबनान के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सशस्त्र बलों के सहयोग को दिया। नेतन्याहू बोले- हिज्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण पर निर्भर करेगी आगे की कार्रवाई इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि लेबनानी सेना जल्द ही सीमावर्ती इलाकों का नियंत्रण संभालेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इजरायली सेना की आगे की वापसी पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि लेबनानी सेना हिज्बुल्लाह को हथियार छोड़ने और उसके सैन्य ढांचे को खत्म करने में कितनी सफल रहती है। इजरायल के राजदूत येचिएल लेइटर ने भी इस समझौते को "परफॉर्मेंस आधारित" बताते हुए कहा कि इसकी सफलता पूरी तरह जमीनी स्तर पर लागू होने वाले कदमों पर निर्भर करेगी। हिज्बुल्लाह ने किया समझौते का विरोध समझौते की घोषणा के तुरंत बाद हिज्बुल्लाह ने इसका कड़ा विरोध किया। संगठन के वरिष्ठ सांसद हसन फदलल्लाह ने कहा कि यदि लेबनानी सरकार अमेरिकी समर्थन के साथ इस समझौते को लागू करने की कोशिश करती है तो देश गृहयुद्ध जैसी स्थिति में पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि हिज्बुल्लाह किसी भी कीमत पर अपने हथियार नहीं छोड़ेगा और इस दिशा में किए जाने वाले हर प्रयास का विरोध करेगा। हजारों लोगों की जान ले चुका है संघर्ष इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच मौजूदा संघर्ष में अब तक भारी जनहानि हो चुकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजरायली सैन्य कार्रवाई में 4,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 10 लाख से ज्यादा लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। वहीं संघर्ष के दौरान 37 इजरायली सैनिकों के भी मारे जाने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है, हालांकि हिज्बुल्लाह के विरोध के चलते इसके सफल क्रियान्वयन को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।
Israel-Lebanon Conflict: दक्षिणी लेबनान में इज़राइल की सैन्य मौजूदगी को लेकर एक नया दावा सामने आने के बाद क्षेत्र में हलचल तेज हो गई है। एक अमेरिकी अधिकारी ने दावा किया है कि इज़राइल ने दक्षिणी लेबनान के कुछ कब्जे वाले इलाकों से अपनी सेना हटा ली है। लेबनान के अधिकारियों ने इस दावे की पुष्टि करने से इनकार किया है। ऐसे में सीमा पर हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं और विस्थापित नागरिक अपने घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। अमेरिकी अधिकारी का दावा, लेबनान ने नहीं की पुष्टि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि इज़राइली सेना दक्षिणी लेबनान के कुछ इलाकों से पीछे हट चुकी है और अब वहां सुरक्षा की जिम्मेदारी लेबनानी सेना को संभालनी चाहिए। यह दावा ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका क्षेत्रीय तनाव कम करने के लिए लगातार कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। लेबनान के एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि दक्षिणी लेबनान में इज़राइल द्वारा बनाए गए तथाकथित "बफर जोन" से सेना हटने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। युद्धविराम के बावजूद सीमा पर तनाव कायम इज़राइल और हिज्बुल्लाह के बीच लंबे समय से जारी संघर्ष के बीच कई बार युद्धविराम की घोषणा की गई, लेकिन सीमा पर तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। हाल के महीनों में छिटपुट घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। फिलहाल अमेरिका की मध्यस्थता से क्षेत्र में तनाव कम करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात अब भी सामान्य नहीं हो पाए हैं। ईरान और हिज्बुल्लाह की स्पष्ट शर्त ईरान ने कहा है कि किसी भी व्यापक शांति समझौते में लेबनान की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और इज़राइल को दक्षिणी लेबनान से पूरी तरह सेना हटानी होगी। वहीं, हिज्बुल्लाह ने भी स्पष्ट किया है कि वह अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में किसी भी तरह की इज़राइली सैन्य मौजूदगी स्वीकार नहीं करेगा और कब्जे का विरोध जारी रखेगा। घर लौटने का इंतजार कर रहे हजारों विस्थापित दक्षिणी लेबनान के कई गांव युद्ध के दौरान भारी तबाही का शिकार हुए हैं। बड़ी संख्या में लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए थे और अब भी सुरक्षित वापसी का इंतजार कर रहे हैं। दिब्बीन गांव की निवासी मिलिया अल-शेख ने बताया कि उनका घर अब भी बंद सैन्य क्षेत्र में है। गांव तक जाने वाले रास्तों पर कंटीले तार लगे हैं और आम नागरिकों की आवाजाही प्रतिबंधित है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि उन्हें अपने घर की मौजूदा स्थिति तक की जानकारी नहीं है। स्थायी शांति पर टिकी दुनिया की नजर दक्षिणी लेबनान में हालात को लेकर अब भी असमंजस बना हुआ है। एक ओर सेना हटने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन इसकी पुष्टि नहीं कर रहा। ऐसे में क्षेत्र के हजारों विस्थापित लोगों की सुरक्षित वापसी और स्थायी शांति को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर आने वाले घटनाक्रम पर टिकी हुई है।
न्यूयॉर्क, एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच एक मजबूत और प्रभावशाली समझौता होने की संभावना काफी बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच जारी बातचीत निर्णायक चरण में पहुंच चुकी है और जल्द ही ऐसा समझौता हो सकता है जो सैन्य कार्रवाई से भी अधिक प्रभावी साबित होगा। न्यूयॉर्क में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के पास सैन्य विकल्प मौजूद हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकता कूटनीतिक समाधान है। उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका चाहे तो ईरान के खिलाफ व्यापक बमबारी अभियान चला सकता है, लेकिन इससे क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री व्यापार मार्गों पर गंभीर असर पड़ेगा। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि युद्ध की तुलना में हस्ताक्षरित समझौता अधिक स्थायी और मजबूत परिणाम देगा। ‘बमबारी नहीं, समझौता बेहतर विकल्प’ ट्रंप ने कहा कि किसी भी सैन्य अभियान में बड़ी संख्या में लोगों की जान जा सकती है, जिसे वे टालना चाहते हैं। उनका मानना है कि एक औपचारिक समझौता ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों पर अधिक प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर सकता है। नाकेबंदी को बताया सबसे प्रभावी हथियार अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि आर्थिक प्रतिबंधों और समुद्री नाकेबंदी ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला है। उनके अनुसार, यही दबाव तेहरान को बातचीत की मेज पर लाने में सफल रहा है। ट्रंप ने कहा कि नाकेबंदी कई मामलों में बमबारी से भी अधिक प्रभावशाली साबित हुई है और ईरान अब समझौते के लिए मजबूर होता दिख रहा है। मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव हाल के दिनों में ईरान और इजराइल के बीच मिसाइल हमलों और जवाबी सैन्य कार्रवाइयों से क्षेत्र में तनाव बढ़ा है। ट्रंप ने बताया कि उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री से भी बातचीत कर संयम बरतने की सलाह दी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि संघर्ष बढ़ता है तो क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर व्यापक असर पड़ सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच राष्ट्रपति Donald Trump ने संघर्षविराम की नई व्याख्या पेश की है। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व में सीजफायर का मतलब हमेशा पूरी तरह युद्धविराम नहीं होता, बल्कि कई बार इसका अर्थ केवल कम तीव्रता वाली सैन्य कार्रवाई भी हो सकता है। व्हाइट हाउस में ट्रंप का संकेत- अमेरिकी सैनिक मरे तो खत्म हो सकता है संघर्षविराम ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि यदि किसी हमले में अमेरिकी सैनिकों की मौत होती है और उसके पीछे ईरान की भूमिका साबित होती है, तो मौजूदा संघर्षविराम जारी रखना मुश्किल होगा। वॉशिंगटन पोस्ट रिपोर्ट: सहयोगियों को ट्रंप ने दिया सख्त संदेश रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रंप ने अपने करीबी अधिकारियों से कहा है कि छोटे स्तर की झड़पों को कुछ समय तक सहन किया जा सकता है, लेकिन अमेरिकी सैनिकों पर घातक हमले की स्थिति में अमेरिका की रणनीति बदल सकती है। होर्मुज के पास अमेरिकी कार्रवाई के बाद बढ़ा नया तनाव ताजा तनाव तब बढ़ा जब अमेरिका ने ईरान के केश्म द्वीप के निकट एक सैन्य नियंत्रण केंद्र और होर्मुज जलडमरूमध्य क्षेत्र में एक लक्ष्य पर कार्रवाई की। इसके बाद क्षेत्र में हालात और संवेदनशील हो गए। कुवैत और बहरीन में ईरानी हमले, भारतीय नागरिक की मौत ईरान की जवाबी कार्रवाई में कुवैत और बहरीन के कई ठिकानों को निशाना बनाया गया। कुवैत अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुए हमले में एक भारतीय नागरिक की मौत हो गई, जबकि दर्जनों लोग घायल हुए। ट्रंप का दावा- ईरानी हमले हालिया अमेरिकी कार्रवाई का जवाब राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि हर सैन्य कार्रवाई के पीछे कोई न कोई कारण होता है। उनके अनुसार, हाल के अमेरिकी हमलों के बाद ईरान की प्रतिक्रिया अपेक्षित थी और स्थिति को नियंत्रण में लाया जा रहा है। वॉशिंगटन-तेहरान संपर्क अब भी जारी, ट्रंप ने खारिज की बातचीत रुकने की खबरें ईरानी मीडिया में वार्ता रुकने की खबरों के बावजूद ट्रंप ने दावा किया कि दोनों देशों के बीच संपर्क बना हुआ है और बातचीत की प्रक्रिया जारी है। तीन महीने से खाड़ी क्षेत्र में जारी है टकराव 28 फरवरी से शुरू हुए इस संकट के दौरान मिसाइल और ड्रोन हमलों की कई घटनाएं सामने आई हैं। 8 अप्रैल को संघर्षविराम लागू हुआ था, लेकिन इसके बाद भी छिटपुट सैन्य कार्रवाइयां जारी रहीं। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अटका विवाद, वैश्विक ऊर्जा बाजार की बढ़ी चिंता Strait of Hormuz इस पूरे विवाद का केंद्र बना हुआ है। दुनिया के तेल और एलएनजी व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है, इसलिए क्षेत्र में अस्थिरता का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ रहा है। परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों पर अब भी आमने-सामने हैं अमेरिका-ईरान वॉशिंगटन चाहता है कि ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम भंडार पर नियंत्रण स्वीकार करे, जबकि तेहरान प्रतिबंधों में राहत और विदेशों में जमा अपनी संपत्तियों तक पहुंच की मांग कर रहा है। इसी मुद्दे पर दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा गतिरोध बना हुआ है। युद्ध और कूटनीति साथ-साथ, पश्चिम एशिया में अनिश्चितता बरकरार ट्रंप के ताजा बयान ने संकेत दिया है कि संघर्षविराम लागू होने के बावजूद क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। बातचीत जारी है, लेकिन किसी भी बड़े हमले से हालात फिर तेजी से बदल सकते हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्षविराम (सीजफायर) की घोषणा के बाद भी पश्चिम एशिया में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। एक अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने सीजफायर के बाद ईरान के अंदर कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाते हुए हवाई हमले किए। हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट ने क्षेत्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट में क्या किया गया दावा? अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल में अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर की घोषणा के कुछ दिनों बाद UAE ने ईरान के भीतर कई महत्वपूर्ण ठिकानों पर जवाबी हवाई कार्रवाई की। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन स्थानों को निशाना बनाया गया उनमें फारस की खाड़ी स्थित लावन द्वीप की रिफाइनरी, होर्मुज स्ट्रेट के पास केशम और अबू मूसा द्वीप, बंदर अब्बास बंदरगाह शहर और असलुयेह पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स शामिल थे। ऊर्जा केंद्रों पर हमलों से बढ़ी चिंता रिपोर्ट के मुताबिक, असलुयेह ऊर्जा केंद्र पर हुए कथित हमले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी। यह क्षेत्र ईरान के ऊर्जा उत्पादन और निर्यात के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। बताया गया है कि इन घटनाओं के बाद अमेरिका ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ने से रोकने के लिए अपने सहयोगियों पर दबाव डाला, ताकि ऊर्जा अवसंरचना पर हमलों को सीमित किया जा सके। अमेरिका और इजरायल के साथ समन्वय का दावा रिपोर्ट में मामले से जुड़े सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि UAE ने ईरान के खिलाफ चलाए गए व्यापक सैन्य अभियान के दौरान अमेरिका और इजरायल के साथ समन्वय में काम किया। दावे के अनुसार, सीजफायर लागू होने के बाद भी कुछ हफ्तों तक यह अभियान जारी रहा। हालांकि इन आरोपों पर UAE, अमेरिका या इजरायल की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। खाड़ी देशों में बदली रणनीतिक स्थिति विश्लेषकों का मानना है कि यदि रिपोर्ट में किए गए दावे सही साबित होते हैं, तो यह संकेत होगा कि UAE ने ईरान के खिलाफ पहले की तुलना में अधिक आक्रामक रणनीति अपनाई है। जहां अधिकांश खाड़ी देश संघर्ष के दौरान अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने और तनाव से बचने की कोशिश करते रहे, वहीं UAE कथित तौर पर ईरान को सीधे जवाब देने वाले देशों में शामिल होता दिखाई देता है। आधिकारिक पुष्टि का इंतजार फिलहाल इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। न तो UAE और न ही ईरान ने रिपोर्ट में बताए गए हमलों को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी किया है। ऐसे में क्षेत्रीय घटनाक्रम पर दुनिया की नजर बनी हुई है, क्योंकि किसी भी नए सैन्य टकराव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है।
युद्धविराम के बावजूद ईरान में खतरे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। उत्तर-पश्चिमी जंजान में शुक्रवार को हुए एक भीषण विस्फोट ने यह साफ कर दिया कि युद्ध के अवशेष कितने घातक हो सकते हैं। इस हादसे में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के 14 जवानों की मौत हो गई, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। बम निष्क्रिय करने के दौरान हुआ हादसा ईरान की सरकारी एजेंसी IRNA के मुताबिक, यह विस्फोट उस समय हुआ जब IRGC की एक विशेष बम निरोधक टीम इलाके में सफाई अभियान चला रही थी। यह टीम हालिया हवाई हमलों के बाद बचे हुए गोला-बारूद को खोजकर निष्क्रिय कर रही थी अचानक एक अज्ञात विस्फोटक सक्रिय हो गया धमाका इतना शक्तिशाली था कि कई जवान मौके पर ही मारे गए मारे गए जवान “अंसार अल-महदी” यूनिट के अनुभवी सदस्य थे, जिन्हें ऐसे जोखिम भरे अभियानों के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। बिना फटे बम बने सबसे बड़ा खतरा प्रारंभिक जांच में यह आशंका जताई गई है कि विस्फोट का कारण क्लस्टर बम या बारूदी सुरंग हो सकता है, जो हवाई हमलों के दौरान गिराए गए थे लेकिन फटे नहीं थे। ऐसे बम जमीन में छिपे रहते हैं और लंबे समय तक सक्रिय रहते हैं इन्हें निष्क्रिय करना बेहद कठिन और खतरनाक होता है जरा सी चूक जानलेवा साबित हो सकती है युद्ध खत्म होने के बाद भी ये ‘अनएक्सप्लोडेड ऑर्डनेंस’ (UXO) वर्षों तक खतरा बने रहते हैं। सीजफायर के बाद सबसे बड़ी सैन्य क्षति 8 अप्रैल को लागू हुए युद्धविराम के बाद यह IRGC के लिए अब तक की सबसे बड़ी जनहानि बताई जा रही है। यह घटना इस बात की गंभीर याद दिलाती है कि युद्ध के प्रभाव सिर्फ लड़ाई तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उसके बाद भी जानलेवा खतरे बने रहते हैं। IRGC के मुताबिक: अब तक 15,000 से ज्यादा बिना फटे गोला-बारूद की पहचान की जा चुकी है इनको निष्क्रिय करने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जा रहा है कई इलाके अभी भी ‘हाई रिस्क जोन’ बने हुए हैं आम नागरिक और खेती भी खतरे में अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यह खतरा सिर्फ सैन्य बलों तक सीमित नहीं है। कई बम रिहायशी इलाकों और गांवों के पास पड़े हैं कृषि भूमि में भी भारी मात्रा में विस्फोटक मौजूद हैं फार्स न्यूज एजेंसी के अनुसार, लगभग 1,200 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र अभी भी जोखिम में है, जिससे किसानों की आजीविका प्रभावित हो रही है और खाद्य उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। युद्ध की पृष्ठभूमि और बढ़ता वैश्विक तनाव इस हादसे की पृष्ठभूमि हालिया संघर्ष से जुड़ी है, जिसमें अमेरिका और इजरायल ने फरवरी में ईरान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर संयुक्त हमले किए थे। जवाब में ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमले किए इस संघर्ष में 4000 से अधिक लोगों की जान गई वैश्विक दबाव और बढ़ते नुकसान के बाद 8 अप्रैल को सीजफायर लागू हुआ होर्मुज जलडमरूमध्य और ऊर्जा संकट होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट गहरा गया है। यह दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से तेल और गैस की सप्लाई पर असर पड़ा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला सीजफायर के बाद भी इस क्षेत्र में स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है। अमेरिका-ईरान वार्ता में जारी गतिरोध इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के नए प्रस्ताव पर असंतोष जताया है। उन्होंने कहा कि प्रस्ताव “पर्याप्त नहीं” है परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों में मतभेद बरकरार हैं बातचीत जारी है, लेकिन ठोस समाधान अभी दूर नजर आ रहा है ईरान ने युद्ध समाप्त करने और आर्थिक प्रतिबंधों में राहत के लिए बातचीत की इच्छा जताई है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच भरोसे की कमी साफ दिखती है।
व्हाइट हाउस में बातचीत के बाद सीजफायर बढ़ाने की घोषणा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि इजरायल और लेबनान के बीच चल रहे संघर्ष में लागू सीजफायर को तीन सप्ताह के लिए बढ़ा दिया गया है। यह फैसला व्हाइट हाउस में हुई उच्चस्तरीय वार्ता के बाद लिया गया बताया जा रहा है, जिसमें दोनों देशों के राजदूतों की मुलाकात भी शामिल थी। ट्रंप ने कहा कि बातचीत “सकारात्मक और सफल” रही, हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस प्रक्रिया में हिज़्बुल्लाह की भूमिका एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। दशकों बाद सीधी बातचीत, लेकिन तनाव अभी भी कायम रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह पहली बार है जब इजरायल और लेबनान के बीच दशकों बाद सीधे कूटनीतिक बातचीत हुई है। दोनों देश औपचारिक रूप से लंबे समय से युद्ध की स्थिति में माने जाते रहे हैं। पहले लागू 10 दिनों के अस्थायी सीजफायर की समय सीमा सोमवार को खत्म होनी थी, लेकिन अब इसे तीन हफ्ते और बढ़ा दिया गया है। ट्रंप का बयान: “इजरायल को आत्मरक्षा का अधिकार है” व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि इजरायल को आत्मरक्षा का पूरा अधिकार है, खासकर तब जब उस पर हमला हो। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए आगे भी बातचीत जारी रहेगी और अमेरिका इस प्रक्रिया में सहयोग करेगा। लेबनान और इजरायल के बीच शांति की उम्मीद लेबनान और इजरायल के राजनयिकों ने इस बातचीत को सकारात्मक बताया है। लेबनान के प्रतिनिधियों ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच स्थायी शांति की दिशा में प्रगति हो सकती है। लेबनान के नेतृत्व ने संकेत दिया है कि भविष्य की बातचीत में सीमा विवाद, सैनिकों की वापसी और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण जैसे मुद्दे शामिल होंगे। हिज़्बुल्लाह बना सबसे बड़ी चुनौती हालांकि, इस कूटनीतिक पहल के बीच हिज़्बुल्लाह एक प्रमुख बाधा के रूप में सामने है। संगठन ने अब तक इस बातचीत का हिस्सा बनने से इनकार किया है और किसी भी समझौते को मानने से भी इंकार किया है। इजरायल का कहना है कि जब तक हिज़्बुल्लाह का प्रभाव कम नहीं होता, तब तक क्षेत्र में स्थायी शांति मुश्किल है। युद्ध और मानवीय संकट का गंभीर असर इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर लेबनान की जनता पर पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले युद्ध में हजारों लोगों की मौत हुई है, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। इसके अलावा, लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं, जिससे मानवीय संकट और गहरा गया है। शांति की दिशा में कदम, लेकिन चुनौतियां बरकरार इजरायल और लेबनान के बीच सीधी बातचीत और सीजफायर विस्तार को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम माना जा रहा है। हालांकि, हिज़्बुल्लाह की भूमिका, क्षेत्रीय तनाव और पुराना युद्ध इतिहास इस प्रक्रिया को अभी भी जटिल बनाए हुए हैं।
नाज़ुक युद्धविराम के बीच ईरान में आम लोगों की ज़िंदगी धीरे-धीरे पटरी पर लौटती दिख रही है, लेकिन दिलों में डर और अनिश्चितता अब भी कायम है। उत्तर-पश्चिमी इलाकों में जहां बादाम के पेड़ फूलों से लद गए हैं, वहीं सड़कों पर बढ़ती आवाजाही इस बात का संकेत दे रही है कि लोग अपने घरों की ओर लौट रहे हैं। तुर्की सीमा के पास एक अस्थायी वेटिंग रूम में मिले एक बुज़ुर्ग बैंकर ने बताया कि वे अपने बेटे के साथ एक महीने तक तुर्की में शरण लिए हुए थे। उन्होंने कहा कि उनके शहर में हुए हवाई हमले मुख्य रूप से सैन्य ठिकानों तक सीमित थे और आम नागरिक ढांचे को कम नुकसान पहुंचा। हालांकि, हर कोई इतना आश्वस्त नहीं है। हिजाब पहने एक बुज़ुर्ग महिला ने डर जाहिर करते हुए कहा कि हालात अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। उन्होंने उन लोगों की पीड़ा का जिक्र किया जो घनी आबादी वाले इलाकों में बमबारी और अर्धसैनिक बलों के दबाव के बीच जी रहे हैं। एक युवा महिला ने युद्धविराम को लेकर संदेह जताते हुए कहा कि यह शांति ज्यादा समय तक टिकने वाली नहीं है। उनका मानना है कि ईरान रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण कभी नहीं छोड़ेगा। सीमा पार कर ईरान में दाखिल होने के बाद एक स्थानीय व्यक्ति ने अमेरिका को लेकर गहरा अविश्वास व्यक्त किया। उनका कहना था कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump कभी भी ईरान को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने नहीं देंगे और उनका उद्देश्य देश पर दबाव बनाए रखना है। इन तमाम प्रतिक्रियाओं से साफ है कि भले ही ज़मीन पर युद्धविराम लागू हो गया हो, लेकिन आम ईरानी नागरिकों के मन में शांति को लेकर भरोसा अभी भी बहुत कमजोर है। अमेरिका के साथ संभावित समझौते को लेकर भी लोगों में उम्मीद से ज्यादा शंका और डर देखने को मिल रहा है।
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता के विफल होने के बाद हालात और संवेदनशील हो गए हैं। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई बातचीत बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई, जिससे दोनों देशों के बीच जारी युद्धविराम पर भी खतरा मंडराने लगा है। युद्धविराम पर संकट, सैन्य गतिविधियां तेज अमेरिकी सेना ने ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों की निगरानी और संभावित नाकेबंदी के संकेत दिए हैं। इसके जवाब में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में कड़ी प्रतिक्रिया की चेतावनी दी है। बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच किसी भी समय हालात बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है। आम लोगों में डर और अनिश्चितता ईरान के शहर करज और राजधानी तेहरान में रहने वाले लोगों के बीच गहरी चिंता देखी जा रही है। एक स्थानीय युवक ने कहा कि उसे उम्मीद थी कि बातचीत से हल निकलेगा, लेकिन अब उसे लगता है कि युद्ध कभी भी दोबारा शुरू हो सकता है। वहीं, एक युवती ने उम्मीद जताई कि हालात जल्द सामान्य होंगे और बातचीत के जरिए समाधान निकलेगा। इंटरनेट बंदी से बढ़ी मुश्किलें ईरान में पिछले कई हफ्तों से इंटरनेट सेवाएं बाधित हैं, जिससे लोग बाहरी दुनिया से कट गए हैं। सरकार का कहना है कि यह कदम साइबर हमलों से बचाव के लिए उठाया गया है, लेकिन आम नागरिकों और व्यवसायों को इससे भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। कंटेंट क्रिएटर और छोटे कारोबारी खासतौर पर प्रभावित हुए हैं। एक स्थानीय नागरिक ने कहा, “कोई भी इस संघर्ष में नहीं जीत रहा है, लेकिन आम लोगों की जिंदगी जरूर मुश्किल हो गई है।” आर्थिक संकट और भविष्य की चिंता युद्ध और प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही दबाव में है। लोगों का कहना है कि भले ही युद्ध खत्म हो जाए, लेकिन कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते जीवन आसान नहीं होगा। कुछ नागरिकों का मानना है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप घरेलू राजनीतिक कारणों से सख्त रुख अपनाए हुए हैं, जिससे समझौते की संभावना और कम हो गई है। शांति वार्ता के अगले दौर की कोई तारीख तय नहीं हुई है। ऐसे में ईरान के लोग अनिश्चितता, डर और उम्मीद के बीच जी रहे हैं। अगर जल्द कोई समाधान नहीं निकला, तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बेहद संवेदनशील मोड़ पर पश्चिम एशिया में हालात फिर तनावपूर्ण हो गए हैं। एक ओर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की तैयारी चल रही है, वहीं दूसरी ओर इजरायल ने लेबनान में ताजा हमला कर दिया है। इस हमले में कम से कम तीन लोगों की मौत हो गई है, जिससे क्षेत्र में शांति प्रयासों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इजरायली सेना ने दक्षिण लेबनान के नबातीह क्षेत्र के मेफादौन कस्बे में एक रिहायशी इमारत को निशाना बनाया। यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब क्षेत्र में दो सप्ताह के संघर्षविराम (सीजफायर) को स्थायी रूप देने के लिए बातचीत की उम्मीदें जताई जा रही थीं। वार्ता पर मंडराया संकट इस पूरे घटनाक्रम ने इस्लामाबाद में होने वाली अमेरिका-ईरान वार्ता पर असर डाल दिया है। ईरान का दावा है कि हालिया सीजफायर में लेबनान भी शामिल था, जबकि इजरायल और अमेरिका इस दावे को खारिज करते रहे हैं। यही मतभेद अब शांति वार्ता के एजेंडे का सबसे बड़ा विवाद बनता दिख रहा है। सूत्रों के मुताबिक, लेबनान को लेकर बढ़ते तनाव के कारण ईरान ने पहले वार्ता में शामिल होने से हिचक दिखाई थी। हालांकि, इजरायल द्वारा बातचीत के संकेत देने के बाद ईरान वार्ता के लिए तैयार हुआ। 14 अप्रैल को नई उम्मीद इस बीच, लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन ने घोषणा की है कि 14 अप्रैल से इजरायल और लेबनान के बीच सीधी बातचीत शुरू हो सकती है। यह बातचीत अमेरिका की मध्यस्थता में होने की संभावना है। जंग का बड़ा असर 28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद से लेबनान में हालात बेहद खराब हो चुके हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक करीब 1,900 लोगों की मौत हो चुकी है। लगातार हमलों और जवाबी कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है और वैश्विक स्तर पर भी चिंता बढ़ा दी है। क्या आगे बढ़ेगी शांति प्रक्रिया? विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लेबनान में हिंसा नहीं रुकती, तो अमेरिका-ईरान वार्ता का सकारात्मक परिणाम निकलना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि क्षेत्र स्थिरता की ओर बढ़ेगा या फिर एक बार फिर बड़े संघर्ष की ओर लौटेगा।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच Donald Trump ने ईरान को कड़ा संदेश देते हुए साफ कहा है कि दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग Strait of Hormuz को हर हाल में खोला जाएगा - चाहे इसके लिए किसी समझौते का इंतजार करना पड़े या नहीं। “डील हो या न हो, रास्ता खुलेगा” अमेरिका के जॉइंट बेस एंड्रयूज में मीडिया से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान अब सैन्य रूप से कमजोर हो चुका है और अमेरिका इस रणनीतिक जलडमरूमध्य को खोलने के लिए तैयार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर बातचीत में देरी होती है, तो अमेरिका “दूसरे विकल्प” अपनाने से भी पीछे नहीं हटेगा। पाकिस्तान में शांति वार्ता की पहल इस बीच, अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय टीम Islamabad पहुंच चुकी है। इस टीम में Steve Witkoff Jared Kushner जैसे वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। यह प्रतिनिधिमंडल ईरान के साथ शांति वार्ता को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ईरान की दो सख्त शर्तें दूसरी ओर, ईरानी संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf के नेतृत्व में ईरानी प्रतिनिधिमंडल भी पाकिस्तान पहुंच चुका है। ईरान ने बातचीत से पहले दो बड़ी शर्तें रखी हैं: लेबनान में तत्काल सीजफायर ईरान के रोके गए फंड की रिहाई ईरानी टीम में विदेश मंत्री Seyed Abbas Araghchi और अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। सीजफायर पर उलझन बरकरार अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर को लेकर अब भी मतभेद बने हुए हैं। Islamic Republic of Iran Broadcasting के अनुसार, ईरान चाहता है कि लेबनान में इजरायली हमले भी इस समझौते में शामिल हों। हालांकि, अमेरिका और इजरायल ने साफ किया है कि Hezbollah के खिलाफ ऑपरेशन इस सीजफायर का हिस्सा नहीं होगा। दुनिया की नजर इस्लामाबाद बैठक पर व्हाइट हाउस के मुताबिक, 11 अप्रैल को Islamabad में पहली औपचारिक बैठक है। इस बातचीत को पश्चिम एशिया में जारी तनाव को खत्म करने की दिशा में अहम माना जा रहा है। अब सवाल यही है - क्या ईरान अपनी शर्तों पर अड़ा रहेगा या बातचीत के जरिए कोई बीच का रास्ता निकलेगा? पूरी दुनिया की नजरें इस हाई-प्रोफाइल मीटिंग पर टिकी हैं।
Israel-Lebanon Conflict: इजराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने साफ कर दिया है कि लेबनान के साथ किसी भी तरह का संघर्षविराम (सीजफायर) लागू नहीं है। उन्होंने कहा कि इजरायली सेना हिज़्बुल्लाह के खिलाफ अपनी कार्रवाई जारी रखेगी। “हम तब तक नहीं रुकेंगे…” नेतन्याहू ने उत्तरी इजराइल के नागरिकों को संबोधित करते हुए कहा: “लेबनान में कोई संघर्षविराम लागू नहीं है। हम पूरी ताकत से हिज़्बुल्लाह पर हमले कर रहे हैं और तब तक नहीं रुकेंगे, जब तक अपनी सुरक्षा बहाल नहीं हो जाती।” बातचीत के लिए भी दिए निर्देश हालांकि, इससे पहले नेतन्याहू ने एक अलग बयान में संकेत दिया था कि: उन्होंने कैबिनेट को लेबनान के साथ बातचीत शुरू करने के निर्देश दिए हैं यह बातचीत जल्द शुरू हो सकती है बातचीत का फोकस क्या होगा? नेतन्याहू के मुताबिक संभावित बातचीत इन मुद्दों पर केंद्रित होगी: हिज़्बुल्लाह का निरस्त्रीकरण (हथियार छोड़ना) इजराइल और लेबनान के बीच शांतिपूर्ण संबंध स्थापित करना लेबनान के PM के बयान का जिक्र इजरायली प्रधानमंत्री ने लेबनान के प्रधानमंत्री द्वारा बेरूत के निरस्त्रीकरण की अपील की सराहना भी की और इसे बातचीत के लिए सकारात्मक संकेत बताया।
US-Iran Tension: अमेरिका-ईरान सीजफायर के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की “चालों” में नहीं फंसना चाहिए और कूटनीतिक प्रक्रिया को कमजोर नहीं होने देना चाहिए। “अमेरिका को तय करना होगा रास्ता” अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा: “40 दिनों की लड़ाई के बाद अहम सीजफायर हुआ है, ऐसे में अमेरिका को इसे खत्म नहीं होने देना चाहिए।” उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अमेरिका ने इजरायल को कूटनीति बिगाड़ने की छूट दी, तो यह “बेवकूफी” होगी हालांकि ईरान हर स्थिति के लिए तैयार है। नेतन्याहू पर सीधा हमला ईरानी विदेश मंत्री ने नेतन्याहू के क्रिमिनल ट्रायल का जिक्र करते हुए कहा: “अगर क्षेत्र में अशांति होती है, तो उन्हें जवाबदेही का सामना करना पड़ेगा।” यह बयान इजरायल पर सीधा राजनीतिक हमला माना जा रहा है। लेबनान में जारी हमलों से बढ़ा तनाव सीजफायर के बावजूद: इजरायल ने साफ किया है कि लेबनान में सीजफायर लागू नहीं होता हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रहेगी रिपोर्ट्स के मुताबिक: हालिया हमलों में 300+ लोगों की मौत 1,100 से ज्यादा घायल इजरायल ने यह भी दावा किया है कि हमले में हिजबुल्लाह प्रमुख के करीबी अली यूसुफ हर्षी मारे गए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी हलचल अराघची ने रूस, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी के विदेश मंत्रियों से बातचीत कर: सीजफायर बनाए रखने पर जोर दिया इजरायल के हमलों पर चिंता जताई फ्रांस और स्पेन ने भी इजरायल के हमले रोकने और कूटनीति जारी रखने की बात कही होर्मुज स्ट्रेट पर शर्त ईरान ने संकेत दिया है कि: अगर अमेरिका अपने वादे निभाता है तो दो हफ्ते तक होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित आवाजाही जारी रहेगी
मिडिल ईस्ट अपडेट: ईरान और अमेरिका के बीच दो हफ्तों के सीजफायर के बावजूद होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव बना हुआ है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने इस अहम समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या सीमित कर दी है। हर दिन सिर्फ 15 जहाजों को अनुमति हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान अब रोजाना केवल 15 जहाजों को ही होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की इजाजत देगा। ईरान के उप विदेश मंत्री सईद खतीबजादा ने साफ किया है कि: हर जहाज को ईरानी अथॉरिटी से मंजूरी लेनी होगी सुरक्षित मार्ग के लिए सेना के साथ तालमेल जरूरी होगा जमीनी हकीकत: लगभग ठप पड़ा ट्रैफिक रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 24 घंटों में: सिर्फ 1 ऑयल टैंकर 5 ड्राई बल्क कैरियर और 2 ईरानी टैंकर ही इस रास्ते से गुजर पाए हैं। अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के प्रमुख सुल्तान अल जाबेर ने कहा कि इस तरह की शर्तों के साथ दी गई अनुमति को “फ्री पैसेज” नहीं कहा जा सकता, यानी रास्ता लगभग बंद जैसा ही है। इस्लामाबाद में होगी अहम वार्ता सीजफायर के बाद अब ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में शांति वार्ता होने जा रही है। ईरान ने 10 शर्तें रखी हैं (जैसे प्रतिबंधों में ढील, होर्मुज पर नियंत्रण) अमेरिका ने 15 पॉइंट प्लान पेश किया है दोनों के बीच मतभेद अभी भी बने हुए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान भविष्य में जहाजों से उनके प्रकार और कार्गो के आधार पर फीस वसूलने की योजना बना रहा है। ट्रंप की चेतावनी, सेना तैनात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान होर्मुज को खोलने पर सहमत हो गया है। हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि: जब तक ठोस समझौता नहीं होता, अमेरिकी सेना क्षेत्र में तैनात रहेगी वहीं ईरान की सुप्रीम काउंसिल ने इस दावे को गलत बताते हुए कहा कि अमेरिका ने होर्मुज पर ईरान के नियंत्रण को स्वीकार किया है। तेल बाजार पर असर इस पूरे तनाव का असर ग्लोबल मार्केट पर भी दिख रहा है। कच्चे तेल की कीमतें 3.6% बढ़कर 98.16 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई हैं सीजफायर पर खतरा ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर सीजफायर का उल्लंघन हुआ तो कड़ा जवाब दिया जाएगा। विवाद की एक बड़ी वजह यह है कि: ईरान चाहता है कि लेबनान में इजरायल के हमले भी रोके जाएं लेकिन इजरायल ने साफ कर दिया है कि वह हिजबुल्लाह पर कार्रवाई जारी रखेगा अमेरिका भी इजरायल के इस रुख का समर्थन कर रहा है, जिससे शांति समझौता कमजोर पड़ता दिख रहा है।
मध्य पूर्व तनाव: अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्तों के सीजफायर पर सहमति बनने के बावजूद क्षेत्र में तनाव कम नहीं हुआ है। इजराइल ने लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर बड़े पैमाने पर एयरस्ट्राइक कर दी है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, इजराइल का दावा है कि इन हमलों में हिजबुल्लाह प्रमुख नईम कासिम के भतीजे अली यूसुफ हरशी की मौत हो गई है। हालांकि, इस दावे पर अभी तक हिजबुल्लाह की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। एक दिन में सबसे ज्यादा मौतें इजराइल ने बुधवार को लेबनान की राजधानी बेरूत के घनी आबादी वाले इलाकों को निशाना बनाया। इन हमलों में कम से कम 182 लोगों की मौत और 890 लोग घायल बताए जा रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह इजराइल-हिजबुल्लाह संघर्ष के दौरान एक दिन में हुई सबसे बड़ी जनहानि है। ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक लेबनान में इजराइली हमलों में 1,739 लोगों की मौत और 5,873 लोग घायल हो चुके हैं। ईरान का कड़ा विरोध लेबनान पर इजराइली हमलों को लेकर ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि युद्धविराम समझौते की शर्तें स्पष्ट थीं और इसमें लेबनान को भी शामिल किया जाना चाहिए था। उन्होंने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा कि उसे तय करना होगा-वह युद्धविराम चाहता है या इजराइल के जरिए युद्ध जारी रखना। दोनों एक साथ नहीं चल सकते। होर्मुज स्ट्रेट फिर बंद इजराइली हमलों के बाद ईरान ने एक बार फिर होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया है, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। इजराइल और अमेरिका का अलग रुख इजराइल ने साफ कर दिया है कि यह सीजफायर लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ उसकी कार्रवाई पर लागू नहीं होता। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी एक न्यूज चैनल से बातचीत में कहा कि यह युद्धविराम केवल अमेरिका और ईरान के बीच है, लेबनान इसमें शामिल नहीं है। उन्होंने इजराइल-हिजबुल्लाह संघर्ष को “अलग लड़ाई” बताया।
तेहरान/वॉशिंगटन: ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने अमेरिकी नागरिकों को संबोधित करते हुए एक खुला पत्र लिखा है, जिसे उन्होंने बुधवार को सोशल मीडिया पर साझा किया। इस पत्र में उन्होंने युद्धविराम का कोई उल्लेख नहीं किया, जबकि इससे कुछ ही घंटे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान की ओर से सीजफायर की मांग की गई है। “ईरान ने कभी युद्ध शुरू नहीं किया” अपने पत्र में पेज़ेश्कियान ने कहा कि ईरान ने “कभी कोई युद्ध शुरू नहीं किया” और देश लंबे समय से “हमलों और कब्ज़े” का सामना करता रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरानी जनता का अमेरिका, यूरोप या पड़ोसी देशों के लोगों के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है। ट्रंप के दावे से अलग संदेश ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि ईरान के “नए शासन” ने युद्धविराम की अपील की है। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि यह अपील किसने की। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका युद्धविराम पर तभी विचार करेगा जब होर्मुज़ जलडमरूमध्य पूरी तरह सुरक्षित और खुला होगा। उन्होंने ईरान के खिलाफ कड़ी चेतावनी देते हुए सख्त कार्रवाई की बात भी कही। संवाद बनाम टकराव की अपील पेज़ेश्कियान ने अपने पत्र के अंत में कहा कि दुनिया के सामने आज सबसे बड़ा विकल्प “टकराव और संवाद” के बीच है। उन्होंने चेतावनी दी कि आज लिया गया फैसला आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को तय करेगा। बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक संदेश विशेषज्ञों के मुताबिक, यह पत्र सीधे अमेरिकी सरकार की बजाय वहां के नागरिकों को संबोधित कर एक कूटनीतिक संदेश देने की कोशिश है। इसमें शांति और संवाद की बात तो की गई है, लेकिन औपचारिक रूप से युद्धविराम का प्रस्ताव नहीं रखा गया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।