Homemade Potato Chips Recipe: अगर आपके बच्चे बार-बार बाजार के पैकेट वाले चिप्स खाने की जिद करते हैं, तो इस बार उन्हें घर पर बने कुरकुरे Potato Chips से सरप्राइज दें। सही तकनीक अपनाकर आप बिना प्रिजर्वेटिव और अपनी पसंद के मसालों के साथ बिल्कुल Crispy Chips तैयार कर सकते हैं। आवश्यक सामग्री 2 बड़े आलू 2 चम्मच नमक 2 बड़े चम्मच सफेद सिरका तलने के लिए तेल स्वादानुसार नमक काली मिर्च पाउडर चाट मसाला पुदीना पाउडर पेरी-पेरी मसाला (वैकल्पिक) ऐसे बनाएं Crispy Potato Chips सबसे पहले आलू धोकर छील लें और स्लाइसर की मदद से बेहद पतले स्लाइस काटें। एक बाउल में ठंडा पानी और नमक मिलाकर स्लाइस को 15–20 मिनट तक भिगो दें ताकि अतिरिक्त स्टार्च निकल जाए। अब एक बर्तन में पानी उबालें और उसमें सफेद सिरका डालें। आलू के स्लाइस को 3–4 मिनट तक हल्का उबालें। इसके बाद स्लाइस को किचन टॉवल पर अच्छी तरह सुखा लें। कढ़ाही में तेल गर्म करें और आलू के स्लाइस को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में मध्यम आंच पर सुनहरा और कुरकुरा होने तक तलें। अतिरिक्त तेल निकालने के बाद गर्म चिप्स पर नमक, काली मिर्च, चाट मसाला, पुदीना पाउडर या पेरी-पेरी मसाला छिड़ककर अच्छी तरह मिलाएं। स्टोर करने का सही तरीका चिप्स पूरी तरह ठंडे होने के बाद उन्हें एयरटाइट कंटेनर में रखें। इससे वे कई दिनों तक कुरकुरे बने रहते हैं। प्रति सर्विंग अनुमानित पोषण कैलोरी: 180–220 kcal कार्बोहाइड्रेट: 24–28 ग्राम प्रोटीन: 2–3 ग्राम फैट: 9–12 ग्राम फाइबर: 2–3 ग्राम ध्यान दें: डीप फ्राइड चिप्स का सेवन सीमित मात्रा में करें। अधिक हेल्दी विकल्प के लिए इन्हें एयर फ्रायर या बेक करके भी तैयार किया जा सकता है।
कोलकाता: कोलकाता नगर निगम (KMC) ने वार्डों के परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू कर दी है। नगर निगम का लक्ष्य मौजूदा 144 वार्डों की संख्या बढ़ाकर 200 करना है, ताकि प्रत्येक वार्ड में मतदाताओं और मतदान केंद्रों का संतुलित वितरण सुनिश्चित किया जा सके। इस संबंध में राज्य सरकार ने अधिसूचना जारी कर दी है और परिसीमन के लिए केंद्रीय एवं बोरो स्तर पर समितियों का गठन किया गया है। दो स्तरों पर गठित की गईं परिसीमन समितियां परिसीमन प्रक्रिया को सुचारू रूप से पूरा करने के लिए नगर निगम ने दो स्तरों पर समितियां बनाई हैं। इनमें एक केंद्रीय परिसीमन समिति (Central Delimitation Committee) और दूसरी प्रत्येक बोरो के लिए अलग-अलग समितियां शामिल हैं। सरकारी अधिसूचना के अनुसार, 10 सदस्यीय केंद्रीय परिसीमन समिति के अध्यक्ष विशेष आयुक्त सौम्य भट्टाचार्य होंगे। वहीं, प्रत्येक बोरो समिति का नेतृत्व संबंधित कार्यपालक अभियंता (Executive Engineer) करेंगे, जिनके साथ राजस्व अधिकारी भी सदस्य के रूप में शामिल रहेंगे। 200 वार्ड बनाने की तैयारी नगर निगम की योजना के अनुसार परिसीमन के बाद वार्डों की संख्या 144 से बढ़ाकर 200 कर दी जाएगी। नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक वार्ड में औसतन— 20,000 से 25,000 मतदाता 25 से 30 मतदान केंद्र (बूथ) रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इससे सभी वार्डों में समान प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक संतुलन स्थापित करने में मदद मिलेगी। क्यों जरूरी हुआ परिसीमन? वर्तमान में कोलकाता नगर निगम के कई वार्डों में मतदाताओं की संख्या में काफी असमानता है। कुछ वार्डों में एक पार्षद को 60 हजार से अधिक मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करना पड़ता है, जबकि कुछ वार्ड ऐसे हैं, जहां 10 हजार से भी कम मतदाता हैं। इसी तरह मतदान केंद्रों की संख्या में भी बड़ा अंतर देखने को मिलता है। नगर निगम का मानना है कि इस असंतुलन को दूर करने के लिए वार्डों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण आवश्यक है, जिससे प्रशासनिक कार्य अधिक प्रभावी और जनप्रतिनिधित्व अधिक संतुलित हो सके। आंकड़ों के आधार पर होगा वार्डों का पुनर्गठन बोरो स्तर की समितियां संबंधित क्षेत्रों की— जनसंख्या, मतदाताओं की संख्या, मतदान केंद्रों की उपलब्धता, राजस्व संग्रह, और स्थानीय प्रशासनिक जरूरतों का विस्तृत अध्ययन करेंगी। इसके आधार पर वार्डों की नई सीमाओं और पुनर्गठन को लेकर अपनी सिफारिश केंद्रीय परिसीमन समिति को भेजेंगी। प्रशासनिक व्यवस्था होगी मजबूत नगर निगम का कहना है कि परिसीमन का उद्देश्य केवल वार्डों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि प्रत्येक पार्षद पर समान जिम्मेदारी सुनिश्चित करना और नागरिक सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार करना भी है। परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने के बाद नगर निगम की प्रशासनिक व्यवस्था अधिक संतुलित होगी और सभी क्षेत्रों को समान प्रतिनिधित्व मिलने की उम्मीद है।
रांची। झारखंड में मानसून के आगमन से पहले रांची नगर निगम पूरी तरह सतर्क हो गया है। हर वर्ष बारिश के दौरान शहर के कई हिस्सों में जलजमाव, नालों के उफान और घरों में पानी घुसने जैसी समस्याओं को देखते हुए इस बार निगम ने पहले से ही व्यापक तैयारी शुरू कर दी है। नगर निगम का लक्ष्य शहर को जलजमाव की समस्या से राहत दिलाना और मानसून के दौरान बेहतर जल निकासी व्यवस्था सुनिश्चित करना है। नगर निगम के अनुसार शहर के बड़े और छोटे नालों की सफाई युद्धस्तर पर की जा रही है। नालों से गाद निकालकर उनकी जल वहन क्षमता बढ़ाई जा रही है ताकि भारी बारिश के दौरान पानी का प्रवाह बाधित न हो। साथ ही नालों के किनारों पर उगी झाड़ियों और घास की भी नियमित सफाई कराई जा रही है। संवेदनशील इलाकों पर विशेष निगरानी कोकर चौक, सफायर अस्पताल क्षेत्र, महावीर नगर, खोरहाटोली और बांधगाड़ी जैसे जलजमाव प्रभावित इलाकों को विशेष फोकस में रखा गया है। इन क्षेत्रों में नालियों के चौड़ीकरण, अवरोध हटाने और अतिरिक्त जल निकासी व्यवस्था विकसित करने का काम तेजी से चल रहा है। निगम का मानना है कि समय रहते इन स्थानों पर सुधार कार्य पूरा होने से बारिश के दौरान परेशानी काफी हद तक कम हो सकती है। अतिक्रमण पर होगी सख्त कार्रवाई नालों पर बढ़ते अतिक्रमण को भी निगम ने जलजमाव की बड़ी वजह माना है। इसके लिए ड्रोन मैपिंग और जमीनी सर्वे के माध्यम से अवैध निर्माणों की पहचान की जा रही है। चिन्हित अतिक्रमणों को हटाने की प्रक्रिया जल्द शुरू होगी। इसके अलावा नालियों को जाम करने, निर्माण सामग्री फेंकने या सड़क पर पानी बहाने वालों के खिलाफ जुर्माना और कानूनी कार्रवाई की भी तैयारी की गई है। नगर आयुक्त सुशांत गौरव ने बताया कि पिछले वर्षों में जलजमाव वाले सभी स्थानों की समीक्षा कर विशेष रणनीति बनाई गई है। निगम का उद्देश्य केवल राहत कार्य करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करना है जिससे समस्या उत्पन्न ही न हो। अब मानसून की पहली तेज बारिश के साथ इन तैयारियों की असली परीक्षा होगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।