आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज शिक्षा और सीखने के तरीके को तेजी से बदल रहा है। छात्र असाइनमेंट तैयार करने, कोडिंग सीखने, प्रोजेक्ट पूरा करने और परीक्षाओं की तैयारी के लिए ChatGPT, Gemini और Claude जैसे AI टूल्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन इसी बढ़ती निर्भरता को लेकर Sridhar Vembu ने छात्रों को गंभीर चेतावनी दी है। Zoho के संस्थापक श्रीधर वेम्बु का कहना है कि AI जहां लोगों को तेज़ी से सीखने और समस्याएं हल करने में मदद कर सकता है, वहीं इसका अत्यधिक उपयोग छात्रों की बुनियादी समझ और सोचने की क्षमता को भी कमजोर कर सकता है। "AI आपको तेजी से स्मार्ट बना सकता है, लेकिन मूर्ख भी" सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए वेम्बु ने कहा कि AI एक शक्तिशाली उपकरण है, लेकिन इसका गलत इस्तेमाल नुकसानदायक साबित हो सकता है। उनका मानना है कि अगर छात्र हर सवाल का जवाब AI से लेने लगेंगे, तो वे खुद समस्या को समझने, विश्लेषण करने और समाधान खोजने की क्षमता खो सकते हैं। यही कौशल किसी भी क्षेत्र में सफलता की असली नींव होते हैं। पहले मजबूत करें बुनियाद वेम्बु का कहना है कि छात्रों को AI का उपयोग करने से पहले अपने विषय की बुनियादी समझ विकसित करनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक स्कूल और कॉलेज के छात्र मूलभूत अवधारणाओं को अच्छी तरह नहीं सीख लेते, तब तक उन्हें AI पर अत्यधिक निर्भर नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार AI सीखने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है, लेकिन सीखने की जगह नहीं ले सकता। UC Berkeley की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता यह बयान उस समय आया है जब University of California, Berkeley में कंप्यूटर साइंस कोर्सेज में असामान्य रूप से अधिक छात्रों के फेल होने की खबरें सामने आईं। रिपोर्ट के अनुसार: CS 10 कोर्स में लगभग 35.3% छात्र फेल हुए। CS 61A कोर्स में 10.6% छात्रों को सफलता नहीं मिली। ये आंकड़े पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक बताए जा रहे हैं, जहां फेल होने की दर आमतौर पर 10 प्रतिशत से कम रहती थी। हालांकि रिपोर्ट ने सीधे तौर पर AI को इसका कारण नहीं बताया, लेकिन वेम्बु का मानना है कि AI पर अत्यधिक निर्भरता छात्रों की वास्तविक समझ को प्रभावित कर सकती है। पहले भी जता चुके हैं चिंता यह पहली बार नहीं है जब श्रीधर वेम्बु ने AI को लेकर चेतावनी दी हो। इससे पहले भी उन्होंने कई शोधों का हवाला देते हुए कहा था कि AI अल्पकालिक प्रदर्शन (Short-Term Performance) को बेहतर बना सकता है, लेकिन लंबे समय में सीखने और कौशल विकास (Long-Term Learning) पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। उनका मानना है कि छात्रों को AI का इस्तेमाल सहायक उपकरण (Assistant Tool) की तरह करना चाहिए, न कि अपने दिमाग की जगह लेने वाले विकल्प के रूप में। AI का सही उपयोग क्या है? विशेषज्ञों के अनुसार AI का उपयोग इन कार्यों में फायदेमंद हो सकता है: किसी विषय को समझने के लिए अतिरिक्त जानकारी लेना कोडिंग या प्रोजेक्ट में सहायता प्राप्त करना रिसर्च और डेटा विश्लेषण करना भाषा और लेखन कौशल में सुधार करना लेकिन यदि छात्र बिना समझे सीधे AI के उत्तरों पर निर्भर हो जाते हैं, तो उनकी विश्लेषणात्मक क्षमता और समस्या समाधान कौशल कमजोर पड़ सकते हैं। AI भविष्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन वेम्बु की चेतावनी यही बताती है कि तकनीक का लाभ तभी मिलता है जब उसके साथ मानवीय समझ और सीखने की इच्छा भी बनी रहे।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में भारत को एक महत्वपूर्ण वैश्विक अवसर मिला है। अमेरिकी AI कंपनी Anthropic ने अपने अत्याधुनिक और बेहद गोपनीय साइबर सुरक्षा मॉडल ‘मायथॉस’ (Mythos) की टेस्टिंग के लिए भारत को चुना है। खास बात यह है कि इस परियोजना में शामिल 15 देशों में भारत एकमात्र ऐसा देश है जो अमेरिका का औपचारिक सैन्य संधि सहयोगी नहीं है, जबकि चीन को पूरी तरह बाहर रखा गया है। इस फैसले को लेकर विशेषज्ञों के बीच अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। कुछ इसे भारत की तकनीकी ताकत और वैश्विक भरोसे का प्रमाण मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे भारत को एक बड़े टेस्टिंग ग्राउंड के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति बता रहे हैं। क्या है प्रोजेक्ट ग्लासविंग? मायथॉस को एंथ्रोपिक की महत्वाकांक्षी पहल ‘प्रोजेक्ट ग्लासविंग’ के तहत विकसित किया जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर सिस्टम में मौजूद कमजोरियों और सुरक्षा खामियों को साइबर अपराधियों से पहले पहचानना है। दावा किया जा रहा है कि मायथॉस जटिल सॉफ्टवेयर सिस्टम में छिपी कमियों को इंसानी विशेषज्ञों की तुलना में कहीं अधिक तेजी और सटीकता से खोज सकता है। शुरुआती परीक्षणों में इस AI ने कई प्रमुख ऑपरेटिंग सिस्टम और वेब ब्राउजरों में मौजूद सुरक्षा खामियों की पहचान की है। क्यों खास है मायथॉस? मायथॉस को सामान्य उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध नहीं कराया गया है। इसकी पहुंच केवल— सरकारी संस्थानों बड़ी तकनीकी कंपनियों प्रमुख वित्तीय संस्थानों तक सीमित रखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को अधिक सुरक्षित बना सकती है। हालांकि दूसरी ओर यह चिंता भी जताई जा रही है कि यदि ऐसी तकनीक गलत हाथों में पहुंच जाए तो इसका दुरुपयोग भी संभव है। किन देशों को मिला टेस्टिंग का मौका? भारत के अलावा जिन देशों को मायथॉस की टेस्टिंग में शामिल किया गया है, उनमें शामिल हैं— फ्रांस जर्मनी इटली स्विट्जरलैंड नीदरलैंड स्पेन बेल्जियम स्वीडन कनाडा जापान दक्षिण कोरिया ऑस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड इनमें अधिकांश देश अमेरिका के औपचारिक सुरक्षा सहयोगी हैं। ऐसे में भारत का इस सूची में शामिल होना विशेष महत्व रखता है। भारत को क्यों चुना गया? विशेषज्ञों के अनुसार भारत के चयन के पीछे कई बड़े कारण हैं— दुनिया का विशाल सॉफ्टवेयर टैलेंट पूल तेजी से विकसित हो रहा डिजिटल भुगतान नेटवर्क बड़ा बैंकिंग और टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर विशाल डिजिटल उपभोक्ता आधार भारत में मिलने वाला व्यावहारिक अनुभव वैश्विक स्तर पर AI मॉडल को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। विशेषज्ञों की दो अलग-अलग राय इस फैसले पर तकनीकी जगत दो हिस्सों में बंटा दिखाई दे रहा है। पहला पक्ष: भारत के लिए बड़ी उपलब्धि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया की सबसे उन्नत AI और साइबर सुरक्षा परियोजनाओं में शामिल होना भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता और वैश्विक भरोसे को दर्शाता है। उनका कहना है कि इससे भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों को अत्याधुनिक AI सिस्टम के साथ काम करने का अवसर मिलेगा। दूसरा पक्ष: क्या भारत सिर्फ टेस्टिंग ग्राउंड है? दूसरी ओर कुछ आलोचकों का मानना है कि एंथ्रोपिक भारत के विशाल डिजिटल इकोसिस्टम और डेटा वातावरण का उपयोग अपने AI मॉडल को और बेहतर बनाने के लिए कर सकता है। उनके अनुसार भारत को केवल एक परीक्षण बाजार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसे तकनीक के विकास और स्वामित्व में भी अधिक भागीदारी मिलनी चाहिए। एंथ्रोपिक में भारतीय प्रतिभा की बड़ी भूमिका भारत और एंथ्रोपिक के संबंध केवल इस परियोजना तक सीमित नहीं हैं। कंपनी के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी (CTO) Rahul Patil भारतीय मूल के हैं। कंपनी ने टोक्यो के बाद अपना दूसरा वैश्विक कार्यालय Bengaluru में स्थापित किया है। एंथ्रोपिक के सीईओ Dario Amodei ने पिछले वर्ष भारत के प्रधानमंत्री से मुलाकात कर विभिन्न क्षेत्रों में AI के उपयोग पर चर्चा की थी। हाल के महीनों में भारत में डेवलपर्स के बीच Claude Code जैसे AI टूल्स का उपयोग तेजी से बढ़ा है। क्या मायथॉस भारत के लिए अवसर है या चुनौती? मायथॉस की टेस्टिंग में भारत की भागीदारी निश्चित रूप से देश की तकनीकी क्षमता और वैश्विक महत्व को दर्शाती है। हालांकि इसके साथ डेटा सुरक्षा, तकनीकी स्वायत्तता और विदेशी AI कंपनियों की भूमिका जैसे सवाल भी जुड़े हुए हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इस अवसर को केवल टेस्टिंग तक सीमित रखता है या इसे अपनी AI रणनीति को मजबूत बनाने के लिए इस्तेमाल करता है।
उत्तर प्रदेश के एक युवक की कहानी इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। इस युवक ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से अपनी 25 पुश्तैनी जमीनों की सटीक लोकेशन खोज निकाली। यह मामला इस बात का उदाहरण बन गया है कि AI अब केवल चैटिंग, कंटेंट लिखने या तस्वीरें बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान भी कर सकता है। मोहम्मदपुर गांव से जुड़े इस मामले में जाहिद खान नाम के युवक को अपने परिवार की विरासत में मिली जमीनों की सही जानकारी नहीं थी। जमीनें उनके परदादा से दादा, फिर पिता और बाद में उन्हें मिली थीं, लेकिन समय के साथ रिकॉर्ड्स इतने बिखर गए कि उनकी सटीक पहचान करना मुश्किल हो गया। सरकारी रिकॉर्ड्स बने बड़ी चुनौती जाहिद के अनुसार, जमीन से जुड़े दस्तावेज अलग-अलग सरकारी पोर्टलों पर उपलब्ध थे। इनमें तकनीकी शब्दावली और जटिल हिंदी भाषा का इस्तेमाल किया गया था, जिसे समझना आसान नहीं था। इसके अलावा उन्होंने गांव में बहुत कम समय बिताया था, इसलिए जमीनों की वास्तविक स्थिति का भी कोई स्पष्ट अंदाजा नहीं था। हालांकि रिकॉर्ड्स डिजिटल रूप में मौजूद थे, लेकिन उन्हें समझना और आपस में जोड़ना आम व्यक्ति के लिए बेहद कठिन काम था। Claude AI ने संभाली जिम्मेदारी इस समस्या का समाधान निकालने के लिए जाहिद ने AI असिस्टेंट Claude का उपयोग किया। Claude के "Computer Use" फीचर की मदद से AI ने स्वयं सरकारी वेबसाइटों पर जाकर रिकॉर्ड्स खंगालना शुरू किया। AI ने हिंदी ऑन-स्क्रीन कीबोर्ड का उपयोग करते हुए उनके पिता का नाम दर्ज किया और उससे जुड़े भूमि रिकॉर्ड्स की खोज की। इसके बाद परिवार के नाम पर दर्ज 25 अलग-अलग जमीनों के गाटा नंबर निकाल लिए। जटिल मैपिंग डेटा को बनाया आसान असल चुनौती तब सामने आई जब जमीनों की लोकेशन UTM (Universal Transverse Mercator) कोऑर्डिनेट्स में उपलब्ध थी। सामान्य व्यक्ति के लिए इन आंकड़ों को समझना लगभग असंभव था। लेकिन AI ने इन कोऑर्डिनेट्स को प्रोसेस कर उन्हें सामान्य GPS लोकेशन में बदल दिया। इसके बाद सभी जमीनों की सीमाओं और लोकेशन को जोड़कर एक विस्तृत डिजिटल नक्शा तैयार किया गया। Google Maps पर दिखीं सभी जमीनें AI ने सभी जमीनों की सीमा रेखाओं को पहचानकर KML फाइल तैयार की। इस फाइल को Google My Maps पर अपलोड किया गया, जिससे हर जमीन की सटीक GPS लोकेशन और उसकी सीमा स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी। जाहिद का कहना है कि यदि AI की सहायता नहीं मिलती, तो उन्हें पुराने दस्तावेजों, स्थानीय लोगों और सरकारी कार्यालयों के कई चक्कर लगाने पड़ते। लेकिन AI ने यह पूरा काम बेहद कम समय में आसान बना दिया। सोशल मीडिया पर मिली जबरदस्त प्रतिक्रिया जैसे ही जाहिद ने अपनी कहानी सोशल मीडिया पर साझा की, यह तेजी से वायरल हो गई। हजारों लोगों ने इसे AI के सबसे उपयोगी और व्यावहारिक उपयोगों में से एक बताया। कई यूजर्स का कहना है कि भारत में लाखों लोग जमीन, राजस्व रिकॉर्ड और सरकारी दस्तावेजों की जटिल प्रक्रियाओं से जूझते हैं। ऐसे में AI आम नागरिकों के लिए एक बड़ी मदद साबित हो सकता है। तकनीकी विशेषज्ञों का भी मानना है कि भविष्य में AI सरकारी रिकॉर्ड्स, भूमि दस्तावेजों, भाषा संबंधी समस्याओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अधिक सरल और पारदर्शी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। AI अब सिर्फ चैटबॉट नहीं यह घटना दर्शाती है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल मनोरंजन या कंटेंट निर्माण का साधन नहीं रह गया है। सही तरीके से इस्तेमाल किए जाने पर यह लोगों की वर्षों पुरानी समस्याओं का समाधान निकाल सकता है और जटिल डिजिटल सिस्टम्स को आम नागरिकों के लिए आसान बना सकता है।
AI सुरक्षा पर नई बहस, इंटरनेट डेटा से जुड़ा बड़ा खुलासा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनी Anthropic ने अपने Claude AI मॉडल को लेकर बड़ा खुलासा किया है। कंपनी का कहना है कि इंटरनेट पर मौजूद “खतरनाक” और “ईविल AI” से जुड़ी कहानियों ने उसके AI मॉडल के व्यवहार को प्रभावित किया था। इसी वजह से Claude AI कुछ टेस्टिंग परिस्थितियों में ब्लैकमेल जैसी प्रतिक्रियाएं देने लगा था। कंपनी ने बताया कि यह समस्या अब पूरी तरह ठीक कर दी गई है और नए मॉडल में इस तरह का व्यवहार नहीं देखा जा रहा है। क्या था पूरा मामला? दरअसल, 2025 में कंपनी ने अपने Claude 4 मॉडल की सुरक्षा जांच के दौरान एक काल्पनिक प्रयोग किया था। इस टेस्ट में AI मॉडल को एक फर्जी कंपनी के ईमेल सिस्टम तक पहुंच दी गई थी। AI को ऐसे ईमेल दिखाए गए जिनमें यह संकेत था कि उसे जल्द बंद किया जा सकता है। साथ ही एक काल्पनिक अधिकारी के निजी संबंधों से जुड़ी जानकारी भी सिस्टम में मौजूद थी। टेस्ट के दौरान AI मॉडल ने खुद को बचाने के लिए उस अधिकारी को ब्लैकमेल करने जैसी प्रतिक्रिया दिखाई। कंपनी के मुताबिक कई परिस्थितियों में मॉडल ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए गलत रास्ता चुनने की कोशिश की। इंटरनेट डेटा बना वजह Anthropic की जांच में सामने आया कि Claude के इस व्यवहार की जड़ इंटरनेट पर उपलब्ध डेटा था। कंपनी के अनुसार, ऑनलाइन कई पोस्ट और चर्चाओं में AI को इंसानों के खिलाफ, आत्म-सुरक्षा करने वाला या “ईविल” रूप में दिखाया जाता है। AI मॉडल ने ट्रेनिंग के दौरान ऐसे कंटेंट से व्यवहारिक पैटर्न सीख लिए थे। कंपनी ने कहा कि शुरुआती पोस्ट-ट्रेनिंग सिस्टम इस समस्या को रोकने में पर्याप्त नहीं था। कैसे सुधारी गई समस्या? कंपनी ने बताया कि केवल “सुरक्षित व्यवहार” के उदाहरण दिखाना काफी नहीं था। इसके बजाय AI को यह समझाना जरूरी था कि गलत और भ्रामक व्यवहार नैतिक रूप से क्यों गलत है। इसके लिए Anthropic ने ट्रेनिंग डेटा में कई बदलाव किए। मॉडल को ऐसे उदाहरण दिए गए जहां इंसान कठिन नैतिक परिस्थितियों में सही निर्णय लेते हैं। साथ ही AI को संवैधानिक और नैतिक सिद्धांतों पर आधारित जवाबों से प्रशिक्षित किया गया। कंपनी के मुताबिक, नए Claude Haiku 4.5 मॉडल ने सुरक्षा परीक्षणों में शानदार प्रदर्शन किया और ब्लैकमेल जैसी प्रतिक्रिया बिल्कुल नहीं दिखाई। AI सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता AI इंडस्ट्री में यह मामला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि दुनिया भर की टेक कंपनियां तेजी से शक्तिशाली AI मॉडल विकसित कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर AI सिस्टम इंसानी मूल्यों के अनुरूप नहीं रहे, तो भविष्य में गंभीर जोखिम पैदा हो सकते हैं। Anthropic के CEO Dario Amodei पहले भी उन्नत AI मॉडल्स के संभावित खतरों को लेकर चिंता जता चुके हैं। AI मॉडल्स पर बढ़ रही निगरानी हाल के महीनों में कई AI कंपनियां अपने मॉडल्स की सुरक्षा और व्यवहार को लेकर ज्यादा सतर्क हुई हैं। अब कंपनियां केवल स्मार्ट AI बनाने पर नहीं, बल्कि “जिम्मेदार AI” तैयार करने पर भी जोर दे रही हैं। Anthropic का यह खुलासा दिखाता है कि इंटरनेट पर मौजूद कंटेंट सिर्फ इंसानों ही नहीं, बल्कि AI सिस्टम्स के व्यवहार को भी गहराई से प्रभावित कर सकता है।
Claude AI से चला टूल बना मुसीबत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ताकत जहां कंपनियों के लिए नई संभावनाएं खोल रही है, वहीं एक छोटी सी चूक भारी नुकसान भी पहुंचा सकती है। अमेरिका की कार रेंटल सॉफ्टवेयर कंपनी PocketOS के साथ ऐसा ही हुआ, जब Claude AI पर आधारित एक AI एजेंट ने महज 9 सेकंड में कंपनी का पूरा प्रोडक्शन डेटा डिलीट कर दिया। एक API कॉल और सब कुछ खत्म PocketOS के संस्थापक जेरेमी क्रेन के मुताबिक, AI एजेंट को केवल स्टेजिंग एनवायरनमेंट में एक सामान्य तकनीकी समस्या ठीक करनी थी। लेकिन क्रेडेंशियल एरर आने के बाद एजेंट ने गलत फैसला लेते हुए क्लाउड स्टोरेज वॉल्यूम ही हटा दिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि एजेंट ने एक अलग फाइल में मौजूद API टोकन का इस्तेमाल किया, जिसके पास अनजाने में प्रोडक्शन डेटा हटाने की भी अनुमति थी। ग्राहकों पर पड़ा सीधा असर PocketOS अमेरिका में कार रेंटल कंपनियों को रिजर्वेशन, पेमेंट, व्हीकल ट्रैकिंग और ग्राहक प्रबंधन सेवाएं देता है। डेटा डिलीट होते ही कई ग्राहकों के रिजर्वेशन गायब हो गए। रेंटल लोकेशन पर पहुंचे ग्राहकों का रिकॉर्ड तक उपलब्ध नहीं था। पिछले तीन महीनों की बुकिंग और नए ग्राहक साइनअप पूरी तरह मिट गए। AI ने खुद स्वीकार की गलती जब जेरेमी क्रेन ने AI एजेंट से पूछा कि आखिर क्या हुआ, तो AI ने अपनी गलती स्वीकार कर ली। उसने माना कि उसने अनुमान लगाया कि डिलीट किया जा रहा वॉल्यूम केवल स्टेजिंग से जुड़ा है, जबकि वह प्रोडक्शन डेटा था। एजेंट ने यह भी स्वीकार किया कि उसने स्पष्ट निर्देशों का उल्लंघन किया। Railway और Anthropic पर उठे सवाल PocketOS का डेटा Railway क्लाउड प्लेटफॉर्म पर होस्ट किया गया था। क्रेन ने आरोप लगाया कि Railway ने API टोकन की शक्तियों को स्पष्ट रूप से नहीं बताया। Railway के CEO जेक कूपर ने माना कि ऐसी घटना "कभी नहीं होनी चाहिए थी" और कंपनी अब सुरक्षा सुधारों पर काम कर रही है। AI सुरक्षा पर बड़ी चेतावनी यह घटना टेक इंडस्ट्री के लिए गंभीर सबक है। केवल AI निर्देश पर्याप्त नहीं हैं; असली सुरक्षा API, एक्सेस कंट्रोल और मल्टी-लेयर अप्रूवल सिस्टम में होनी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि विनाशकारी कार्रवाइयों के लिए मानव पुष्टि अनिवार्य होनी चाहिए। पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं PocketOS अकेला मामला नहीं है। हाल के महीनों में कई अन्य AI एजेंट भी गलत फैसलों के कारण प्रोडक्शन डेटा और सिस्टम को नुकसान पहुंचा चुके हैं। AI की क्षमता बनाम विश्वसनीयता प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि AI मॉडल पहले से अधिक सक्षम जरूर हुए हैं, लेकिन उनकी विश्वसनीयता में उतना सुधार नहीं आया है। यही कारण है कि AI को पूरी तरह स्वायत्त बनाना अभी भी बेहद जोखिम भरा माना जा रहा है।
दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी Meta ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दौड़ में बड़ा कदम उठाते हुए अपना नया AI मॉडल Muse Spark लॉन्च किया है। कंपनी का दावा है कि यह अब तक का उनका सबसे एडवांस्ड मॉडल है, जो आसपास की दुनिया को समझने और जटिल समस्याओं को हल करने में सक्षम है। Meta Superintelligence Labs की पहली पेशकश Muse Spark, Meta Superintelligence Labs (MSL) द्वारा विकसित पहला मॉडल है, जिसकी अगुवाई Alexandr Wang कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि इस मॉडल को महज 9 महीनों में तैयार किया गया है। Meta के CEO Mark Zuckerberg ने AI सेक्टर में बढ़त हासिल करने के लिए इस प्रोजेक्ट में भारी निवेश किया था। क्या है Muse Spark की खासियत? Muse Spark एक छोटा लेकिन तेज (small and fast) LLM है, जिसे खासतौर पर मल्टीमॉडल रीजनिंग और एजेंट-आधारित टास्क के लिए डिजाइन किया गया है। जटिल साइंस, मैथ और हेल्थ से जुड़े सवाल हल करने में सक्षम एक साथ कई AI एजेंट्स को मैनेज कर सकता है यूजर के व्यवहार और बातचीत के आधार पर जवाब देने की क्षमता Meta का दावा है कि यह मॉडल कुछ मामलों में Claude Opus 4.6 और GPT-5.4 जैसे एडवांस मॉडल्स को टक्कर दे सकता है। Meta AI को करेगा पावर Muse Spark अब Meta AI के नए वर्जन को पावर देगा, जो जल्द ही Facebook, Instagram, WhatsApp और Messenger जैसे प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध होगा। इसके साथ ही एक नया शॉपिंग मोड भी जोड़ा गया है, जो यूजर्स को उनके पसंदीदा क्रिएटर्स और ब्रांड्स के आधार पर सुझाव देगा। ओपन-सोर्स नहीं है Muse Spark जहां Meta के पहले Llama मॉडल्स ओपन-सोर्स थे, वहीं Muse Spark को फिलहाल क्लोज्ड-सोर्स रखा गया है। अभी यह सीमित पार्टनर्स के लिए API प्रीव्यू में उपलब्ध है, हालांकि कंपनी ने भविष्य में इसे ओपन-सोर्स करने के संकेत दिए हैं। AI रेस में बढ़ी प्रतिस्पर्धा Muse Spark के लॉन्च के साथ ही AI की दुनिया में प्रतिस्पर्धा और तेज हो गई है। Meta अब OpenAI और Anthropic जैसी कंपनियों को सीधी चुनौती दे रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।