नई दिल्ली: सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि 30 जून 2026 से भारत में कागज के नोटों की जगह प्लास्टिक करेंसी शुरू कर दी जाएगी। वीडियो में यह भी कहा गया है कि 10, 20, 50 और 100 रुपये के मौजूदा नोट धीरे-धीरे बंद कर दिए जाएंगे। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) ने इन दावों को पूरी तरह फर्जी बताया है। सोशल मीडिया पर क्या किया जा रहा है दावा? वायरल वीडियो में कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार और RBI जल्द ही पॉलीमर यानी प्लास्टिक के नोट जारी करने वाले हैं और 30 जून 2026 तक पुराने कागजी नोटों को बदल दिया जाएगा। वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कथित आवाज का भी इस्तेमाल किया गया है। क्या है वायरल दावे की सच्चाई? इन दावों के सामने आने के बाद प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) ने फैक्ट चेक जारी कर स्थिति स्पष्ट की। RBI के हवाले से बताया गया कि फिलहाल कागज के नोटों को वापस लेने या उनकी जगह प्लास्टिक करेंसी लाने की कोई योजना नहीं है। PIB ने यह भी कहा कि वायरल वीडियो डिजिटल रूप से एडिट किया गया है और उसमें किए गए दावे भ्रामक हैं। लोगों से क्या अपील की गई? सरकार ने लोगों से अपील की है कि नोटों और बैंकिंग से जुड़ी किसी भी जानकारी के लिए केवल भारतीय रिजर्व बैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर ही भरोसा करें। सोशल मीडिया पर वायरल किसी भी संदेश या वीडियो को बिना जांचे-परखे साझा न करें। अगर किसी को सरकार से जुड़ा कोई संदिग्ध या फर्जी कंटेंट दिखाई देता है, तो उसकी शिकायत @PIBFactCheck के माध्यम से की जा सकती है। किन देशों में चलते हैं प्लास्टिक के नोट? दुनिया के कई देशों में पॉलीमर आधारित नोट पहले से इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया, न्यूजीलैंड और वियतनाम जैसे देश शामिल हैं। प्लास्टिक के नोट कैसे बनते हैं? विशेषज्ञों के अनुसार, ये नोट सामान्य प्लास्टिक से नहीं बल्कि पॉलीमर सामग्री, विशेष रूप से पॉलीप्रोपलीन से बनाए जाते हैं। ये पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक मजबूत और टिकाऊ होते हैं तथा जल्दी खराब नहीं होते।
रांची। झारखंड में चिकित्सा शिक्षा को नई दिशा देने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य के प्रमुख चिकित्सा संस्थान रिम्स रांची में स्नातक (UG), स्नातकोत्तर (PG) और सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों की सीटों में उल्लेखनीय वृद्धि की जाएगी। स्वास्थ्य विभाग ने इस संबंध में रिम्स प्रशासन को विस्तृत प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश दिया है। इस पहल का उद्देश्य राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाना और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना है। केंद्र और राज्य मिलकर उठाएंगे खर्च केंद्र प्रायोजित योजना के तहत मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने के लिए प्रति सीट लगभग 1.5 करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता दी जाएगी। इसमें 60 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करेगी। योजना के तहत रिम्स में UG सीटों को 180 से बढ़ाकर 250, PG सीटों को 176 से बढ़ाकर 275 और सुपर स्पेशियलिटी सीटों को 11 से बढ़ाकर 100 करने का लक्ष्य रखा गया है। MGM और धनबाद मेडिकल कॉलेज को मिल चुकी मंजूरी स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, एमजीएम मेडिकल कॉलेज, जमशेदपुर में UG सीटें 150 से बढ़ाकर 250 और PG सीटें 49 से बढ़ाकर 200 करने के प्रस्ताव को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है। वहीं, धनबाद मेडिकल कॉलेज में UG सीटें 100 से बढ़ाकर 250 और PG सीटें 19 से बढ़ाकर 200 करने के प्रस्ताव को भी भारत सरकार की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। PPP मॉडल पर बनेंगे नए छात्रावास रिम्स-टू परियोजना के तहत छात्रावास निर्माण के लिए नई रणनीति अपनाई जाएगी। राज्य सरकार ने निर्णय लिया है कि हॉस्टल निर्माण पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर किया जाएगा। इसके लिए केंद्र सरकार के वायबिलिटी गैप फंड (VGF) से सहायता लेने की योजना है। इससे सरकारी खर्च कम होगा और छात्रों को आधुनिक सुविधाओं से युक्त बेहतर आवास उपलब्ध कराया जा सकेगा। चिकित्सा शिक्षा को मिलेगा नया आयाम सीटों में बढ़ोतरी और आधुनिक बुनियादी ढांचे के विकास से झारखंड में मेडिकल शिक्षा को बड़ा लाभ मिलेगा। इससे राज्य के छात्रों को अधिक अवसर मिलेंगे और भविष्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी को दूर करने में मदद मिलेगी।
रांची। झारखंड के छात्रों के लिए प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान बीआईटी मेसरा में प्रवेश अब पहले से ज्यादा कठिन होने वाला है। संस्थान ने सत्र 2026-27 से राज्य के विद्यार्थियों को मिलने वाला 50 प्रतिशत होम स्टेट कोटा समाप्त करने का निर्णय लिया है। अब सभी सीटों पर दाखिला केवल ऑल इंडिया मेरिट के आधार पर होगा। एमओयू खत्म होने के बाद बदली व्यवस्था यह फैसला झारखंड सरकार और बीआईटी मेसरा के बीच हुए समझौते (एमओयू) की अवधि समाप्त होने के बाद लिया गया है। अब तक राज्य के छात्रों को संस्थान में विशेष अवसर मिलता था और कुल सीटों का आधा हिस्सा झारखंड के अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित रहता था। इन सीटों पर प्रवेश जोसा, सीसैब और संस्थान स्तरीय काउंसलिंग के माध्यम से होता था। नई व्यवस्था लागू होने के बाद झारखंड के छात्रों को भी देशभर के उम्मीदवारों के साथ सीधे मुकाबले में उतरना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्रवेश प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और कटऑफ भी पहले से अधिक ऊंचा जा सकता है। 650 बीटेक सीटों पर मिलता था लाभ बीआईटी मेसरा में बीटेक, बीआर्क और इंटीग्रेटेड एमएससी समेत विभिन्न पाठ्यक्रमों में कुल 1342 सीटें हैं। इनमें से करीब 650 बीटेक सीटों पर झारखंड के विद्यार्थियों को होम स्टेट कोटा का लाभ मिलता था। अब ये सभी सीटें ऑल इंडिया कोटा में शामिल कर दी जाएंगी। बीसी-1 और बीसी-2 वर्ग पर भी असर इस फैसले का असर बीसी-1 और बीसी-2 वर्ग के छात्रों पर भी पड़ेगा। पहले इन वर्गों के लिए लगभग 80 सीटों पर विशेष आरक्षण का लाभ मिलता था, लेकिन अब इन सीटों पर भी राष्ट्रीय स्तर की मेरिट के आधार पर ही नामांकन होगा। छात्रों और अभिभावकों में बढ़ी चिंता बीआईटी मेसरा लंबे समय से झारखंड के मेधावी छात्रों की पहली पसंद माना जाता रहा है। ऐसे में कोटा समाप्त होने की खबर से छात्रों और अभिभावकों के बीच चिंता बढ़ गई है। कई लोगों का मानना है कि इससे राज्य के विद्यार्थियों के लिए अवसर सीमित हो सकते हैं, जबकि कुछ विशेषज्ञ इसे संस्थान में गुणवत्ता और राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की दिशा में उठाया गया कदम मान रहे हैं। संस्थान ने स्पष्ट किया है कि नई प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होगी और सभी अभ्यर्थियों को समान अवसर प्रदान किए जाएंगे। सरकार का क्या है कहना? इधर इस पूरे मामले पर झारखंड सरकार ने भी स्थिति स्पष्ट की है। सरकार का कहना है कि मामले में कानूनी राय ली जाएगी और सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद छात्रों के हित में फैसला लिया जाएगा। हालांकि जब तक अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक यह मुद्दा छात्रों और अभिभावकों के लिए चिंता और असमंजस का कारण बना हुआ है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।