Congress

Meenakshi Natarajan
मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द, कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का खटखटाया दरवाजा

भोपाल, एजेंसियां। मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की एकमात्र उम्मीदवार मिनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा नामांकन खारिज किए जाने के बाद कांग्रेस ने आधी रात को कानूनी रणनीति तैयार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। मामले पर अवकाशकालीन पीठ के समक्ष जल्द सुनवाई की उम्मीद जताई जा रही है।   भाजपा की आपत्ति के बाद हुआ फैसला विवाद की शुरुआत भाजपा द्वारा उठाई गई आपत्ति से हुई। भाजपा का आरोप है कि मीनाक्षी नटराजन ने अपने नामांकन पत्र के साथ दाखिल हलफनामे में तेलंगाना से जुड़े एक कानूनी मामले की जानकारी नहीं दी। इसी आधार पर रिटर्निंग ऑफिसर ने उनका नामांकन रद्द कर दिया। हालांकि कांग्रेस ने इस फैसले को पूरी तरह गैरकानूनी और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है।   कांग्रेस ने फैसले को बताया साजिश मीनाक्षी नटराजन और कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है, जिसे चुनावी नियमों के तहत घोषित करना आवश्यक हो। उनका दावा है कि संबंधित मामला केवल एक निजी शिकायत तक सीमित था और अदालत ने उस पर अभी तक संज्ञान भी नहीं लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने सरकार के दबाव में आकर निर्णय लिया।   चुनाव आयोग से भी की गई शिकायत वरिष्ठ कांग्रेस नेता Abhishek Manu Singhvi और K. C. Venugopal के नेतृत्व में पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर विस्तृत ज्ञापन सौंपा। कांग्रेस ने आयोग से हस्तक्षेप कर नामांकन रद्द करने के फैसले की समीक्षा करने की मांग की है।   कांग्रेस के सामने बढ़ी चुनौती मीनाक्षी नटराजन राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की एकमात्र उम्मीदवार थीं। नामांकन की अंतिम तिथि समाप्त होने के बाद उनका पर्चा खारिज होने से पार्टी किसी अन्य उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतार सकती। ऐसे में कांग्रेस की उम्मीदें अब सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के फैसले पर टिकी हुई हैं।   अब सबकी नजर अदालत पर राजनीतिक और कानूनी रूप से महत्वपूर्ण बन चुके इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला कांग्रेस की आगे की रणनीति तय करेगा। साथ ही चुनाव आयोग भी कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेकर अपना रुख स्पष्ट कर सकता है।

anjali kumari जून 11, 2026 0
TMC rebel leader Rietbrat Banerjee addresses media amid claims of growing support from MLAs in West Bengal.
बागी टीएमसी गुट का दावा: 64 विधायक हमारे साथ, कांग्रेस में विलय की चर्चाओं को रीतब्रत ने किया खारिज

  कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी उथल-पुथल के बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी गुट ने अपनी ताकत बढ़ने का दावा किया है। बागी गुट के नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनके समर्थन वाले विधायकों की संख्या बढ़कर 64 हो गई है। साथ ही उन्होंने टीएमसी के कांग्रेस में विलय से जुड़े सभी कयासों को सिरे से खारिज कर दिया। बागी खेमे ने बढ़ते समर्थन का किया दावा रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि कुछ समय पहले तक उनके साथ 58 विधायक थे, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 64 हो चुकी है। उन्होंने दावा किया कि जल्द ही एक और विधायक उनके गुट में शामिल हो सकता है। उनके मुताबिक, बागी गुट को केवल विधायकों का ही नहीं बल्कि कई सांसदों, जिला स्तर के नेताओं और स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों का भी समर्थन प्राप्त है। "असली तृणमूल कांग्रेस हमारे साथ" विधानसभा परिसर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनका गुट ही तृणमूल कांग्रेस की वास्तविक राजनीतिक विरासत और संगठनात्मक ताकत का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने कहा, "हम कांग्रेस में शामिल नहीं हो रहे हैं। हम ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं और पार्टी के झंडे तथा विचारधारा के साथ आगे बढ़ते रहेंगे।" ममता-सोनिया मुलाकात के बाद तेज हुईं राजनीतिक चर्चाएं हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष Sonia Gandhi के बीच दिल्ली में हुई मुलाकात के बाद टीएमसी और कांग्रेस के रिश्तों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई थीं। इसके अलावा टीएमसी नेता Abhishek Banerjee और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच हुई बैठकों ने भी दोनों दलों के संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर कयासों को हवा दी थी। रीतब्रत बनर्जी ने स्पष्ट किया कि इन बैठकों का उनके गुट की राजनीतिक दिशा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा जाएगा नया समर्थन पत्र बागी गुट अब अपनी संख्या बल को आधिकारिक रूप से दर्ज कराने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार, गुट जल्द ही विधानसभा अध्यक्ष को नया समर्थन पत्र सौंप सकता है, जिसमें उनके साथ खड़े विधायकों की अद्यतन संख्या दर्ज होगी। लोकसभा में NDA को समर्थन जारी रहेगा रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनके समर्थक सांसद लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का समर्थन जारी रखेंगे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय राजनीति में उनका रुख पहले की तरह कायम रहेगा और वर्तमान परिस्थितियों में किसी बदलाव की संभावना नहीं है। टीएमसी के सामने गहराता संगठनात्मक संकट राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस अपने 28 वर्षों के इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है। पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस बीच, टीएमसी और कांग्रेस के बीच संभावित राजनीतिक नजदीकियों को लेकर चर्चाएं जारी हैं, लेकिन बागी गुट ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी प्रकार के विलय या राजनीतिक समझौते का हिस्सा नहीं बनने जा रहा और खुद को ही पार्टी का वास्तविक प्रतिनिधि मानता है।  

Deepshikha जून 11, 2026 0
Mamata BanerjeeMamata Banerjee
राजनीतिक चक्रव्यूह में ममता बनर्जीः कांग्रेस के साथ जाने से कितना नफा, कितना नुकसान?

कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद तृणमूल कांग्रेस यानी TMC में मचे अभूतपूर्व आंतरिक घमासान के बीच देश के सियासी गलियारों में एक नई सुगबुगाहट तेज हो गई है। हाल ही में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी की कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी से दिल्ली में हुई मुलाकात और उसके बाद अभिषेक बनर्जी व राहुल गांधी की बैठक ने इन चर्चाओं को हवा दे दी है कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर सकती हैं? हालांकि टीएमसी और कांग्रेस दोनों ही अधिकारिक तौर पर इसे 'अफवाह' और 'निराधार' बता रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे संकट में घिरी ममता बनर्जी के लिए एक रणनीतिक कदम के रूप में देख रहे हैं। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी बनाने वाली ममता बनर्जी अगर आज दोबारा कांग्रेस का दामन थामती हैं, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। आइए विश्लेषण करते हैं कि इस संभावित कदम से ममता बनर्जी को कितना फायदा और कितना नुकसान हो सकता है: यदि फायदों की बात करें, तो ममता बनर्जी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा कवच और राजनीतिक वजूद की रक्षा को ध्यान में रखते हुए ये फैसला ले सकती हैं। इससे उन्हें बगावत और बिखराव से बचने का 'सेफ पैसेज' मिल सकता है।  दरअसल, हालिया चुनावों में मिली करारी शिकस्त के बाद ममता बनर्जी की पार्टी गहरे संकट में है। टीएमसी के विधायकों और सांसदों में भारी असंतोष है। खबर है कि 20 के करीब लोकसभा सांसद और 60 से अधिक विधायक बागी रुख अपनाए हुए हैं। ऐसी स्थिति में यदि टीएमसी का कांग्रेस में विलय होता है, तो दल-बदल विरोधी कानून मतलब Anti-Defection Law के तहत बागियों के मंसूबों पर पानी फिर सकता है और ममता को अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय 'मदरशिप' मिल जाएगी। राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका टीएमसी एक क्षेत्रीय दल है, जिसकी ताकत मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल तक ही सीमित रही है। कांग्रेस के साथ आने से ममता बनर्जी और उनके उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी को सीधे राष्ट्रीय राजनीति के मुख्य मंच पर एंट्री मिल जाएगी। वह विपक्षी गठबंधन (INDIA Bloc) और संसद में कांग्रेस के बड़े चेहरे के रूप में उभर सकती हैं, जिससे उनका कद एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होगा। केंद्रीय एजेंसियों और राजनीतिक दबाव से राहत बीजेपी और एनडीए के आक्रामक रुख के सामने फिलहाल ममता बनर्जी राज्य में अकेली पड़ती दिख रही हैं। कांग्रेस जैसी पुरानी और राष्ट्रीय पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और कानूनी सेल का साथ मिलने से वह केंद्रीय जांच एजेंसियों मसलन CBI, ED और अन्य राजनीतिक हमलों का मुकाबला अधिक संस्थागत तरीके से कर पाएंगी। अब यदि इस विलय से होनेवाले नुकसान की बात करें, तो इससे बंगाल में 'दीदी' के ब्रांड और वर्चस्व का अंत होना सुनिश्चित है। इसे 'बंगाल की बेटी' की अपनी पहचान और संप्रभुता का समर्पण ही समझा जायेगा। ममता बनर्जी की पूरी राजनीति 'अस्मिता' और स्वायत्तता पर टिकी है। उन्होंने हमेशा दिल्ली के नियंत्रण के खिलाफ लड़कर अपनी छवि बनाई है। कांग्रेस में विलय का सीधा मतलब होगा कि अब बंगाल टीएमसी के फैसले कोलकाता के हरीश चटर्जी स्ट्रीट से नहीं, बल्कि दिल्ली के 24 अकबर रोड यानी कांग्रेस मुख्यालय से तय होंगे। इससे 'दीदी' का वह कड़क और स्वतंत्र नेतृत्व वाला ब्रांड कमजोर हो जाएगा, जिसने उन्हें तीन दशक तक पहचान दी। जमीनी कार्यकर्ताओं और कैडर में निराशा बंगाल में टीएमसी का काडर सालों तक कांग्रेस और वामपंथियों यानी Left दोनों के खिलाफ संघर्ष करके बड़ा हुआ है। स्थानीय स्तर पर आज भी कई जगह कांग्रेस और टीएमसी के कार्यकर्ता आमने-सामने हैं। अचानक हुए इस बदलाव से जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी भ्रम और निराशा फैल सकती है, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को जमीन मजबूत करने में मिलेगा। कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व का आंतरिक विरोध भले ही दिल्ली में सोनिया-ममता के बीच गर्मजोशी दिख रही हो, लेकिन बंगाल कांग्रेस के नेता (जैसे अधीर रंजन चौधरी और अन्य गुट) सालों तक ममता की राजनीति के पीड़ित रहे हैं। बंगाल कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा इस विलय के खिलाफ है। उनका मानना है कि टीएमसी के खिलाफ जनता के गुस्से (Anti-incumbency) का खामियाजा कांग्रेस को भी भुगतना पड़ सकता है, जिससे पार्टी को आंतरिक कलह का सामना करना पड़ेगा। क्या मजबूरी बन गई है 'घर वापसी'? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी एक 'शतरंज की माहिर खिलाड़ी' हैं और वह कभी भी आसानी से घुटने नहीं टेकतीं। लेकिन, मौजूदा वक्त में जब उनकी अपनी ही पार्टी के कई सांसद और विधायक पाला बदलने को तैयार बैठे हैं, तो कांग्रेस के साथ गठबंधन को मजबूत करना या विलय की दिशा में सोचना उनकी रणनीतिक मजबूरी हो सकता है। राजनीतिक विशेषज्ञ संजय सिंह के अनुसार:  "यह कदम ममता बनर्जी के लिए अपनी राजनीतिक विरासत को पूरी तरह खत्म होने से बचाने और अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने का आखिरी दांव साबित हो सकता है।" क्या ममता बनर्जी अपनी शर्तों पर कांग्रेस के साथ आगे बढ़ेंगी या फिर यह केवल विपक्षी एकजुटता को और धार देने की एक कोशिश है? इसका फैसला आने वाले कुछ दिनों में पूरी तरह साफ हो जाएगा, लेकिन इतना तय है कि बंगाल की राजनीति अब एक नए मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है।

anjali kumari जून 11, 2026 0
Sonia Gandhi and Mamata Banerjee share a warm interaction during INDIA alliance coordination meeting in Delhi.
सोनिया गांधी से गले मिलते ही भावुक हुईं ममता बनर्जी, INDIA बैठक की तस्वीरों ने खींचा ध्यान

  नई दिल्ली: INDIA गठबंधन की समन्वय समिति की बैठक के दौरान सोमवार को एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी देखने को मिली। इस दौरान ममता बनर्जी भावुक भी नजर आईं। दिल्ली में विपक्षी नेताओं की मुलाकात बनी चर्चा का विषय INDIA गठबंधन की बैठक में शामिल होने पहुंचीं ममता बनर्जी का सोनिया गांधी ने स्वागत किया। दोनों नेताओं के बीच कुछ समय तक बातचीत हुई और मुलाकात की तस्वीरें तेजी से चर्चा में आ गईं। राजनीतिक जानकार इसे विपक्षी दलों के बीच बढ़ते संवाद का संकेत मान रहे हैं। तीन दशक पुराने रिश्तों की फिर हुई चर्चा कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के रिश्ते भारतीय राजनीति के सबसे दिलचस्प अध्यायों में से एक रहे हैं। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। इसके बाद दोनों दलों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा का दौर लगातार चलता रहा। बंगाल की राजनीति में कई बार आमने-सामने आए दोनों दल पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी कई चुनावों में प्रतिद्वंद्वी रही हैं। राज्य की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के उभार के साथ कांग्रेस का प्रभाव सीमित होता गया। इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर दोनों दल कई मौकों पर एक साथ भी नजर आए हैं। 2024 के चुनाव के बाद बढ़ी थी राजनीतिक दूरी लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच मतभेद खुलकर सामने आए थे। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था, जिसके बाद कांग्रेस और टीएमसी के रिश्तों में तनाव की चर्चा तेज हो गई थी। INDIA गठबंधन को मजबूत करने पर हुई बातचीत सूत्रों के अनुसार बैठक के दौरान विपक्षी एकजुटता और भविष्य की राजनीतिक रणनीति पर भी चर्चा हुई। विपक्षी दल आगामी चुनावों को देखते हुए साझा मुद्दों पर साथ आने की कोशिश कर रहे हैं। 10 जनपथ पर फिर हुई अहम मुलाकात बैठक के अगले दिन ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से उनके आवास 10 जनपथ पर भी मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच हुई इस बातचीत को विपक्षी राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। टीएमसी की चुनौतियों के बीच बढ़ी राजनीतिक सक्रियता हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस को संगठनात्मक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में ममता बनर्जी की विपक्षी नेताओं के साथ लगातार बैठकें राजनीतिक रूप से अहम मानी जा रही हैं। विपक्षी राजनीति में नए संकेत दे रही है यह मुलाकात विश्लेषकों का मानना है कि सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की यह मुलाकात केवल शिष्टाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि विपक्षी दलों के बीच बेहतर समन्वय और संवाद की संभावनाओं को भी दर्शाती है। आने वाले समय में इसका असर राष्ट्रीय राजनीति में देखने को मिल सकता है।  

Deepshikha जून 10, 2026 0
Congress leader Meenakshi Natarajan reacts after Rajya Sabha nomination rejection amid political controversy.
मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द, कांग्रेस का आरोप—‘सीट चोरी’; चुनाव आयोग दफ्तर के बाहर हंगामा, सियासत गरमाई

  भोपाल/नई दिल्ली: मध्य प्रदेश में होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किए जाने के बाद राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस ने इस फैसले को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए “सीट चोरी” का गंभीर आरोप लगाया है। कांग्रेस ने फैसले को बताया लोकतंत्र पर हमला कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग के निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी को अपनी बात रखने का पूरा अवसर नहीं दिया गया। मंगलवार को कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली स्थित चुनाव आयोग कार्यालय पहुंचा और औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। पार्टी ने चेतावनी दी है कि वह इस मामले को अदालत में भी चुनौती देगी। सचिन पायलट ने उठाए गंभीर सवाल कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा कि यह बेहद दुर्लभ मामला है कि बिना स्पष्ट और ठोस आधार के किसी उम्मीदवार का नामांकन रद्द किया गया हो। उन्होंने दावा किया कि नटराजन के खिलाफ न कोई FIR है और न ही कोई आपराधिक चार्जशीट दाखिल है। पायलट ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल बताया और निष्पक्ष जांच की मांग की। मीनाक्षी नटराजन का आरोप—‘वोट से आगे अब सीट की चोरी’ नामांकन रद्द होने के बाद मीनाक्षी नटराजन ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक दबाव में उनका नामांकन खारिज किया गया है। उन्होंने कहा कि पहले “वोट चोरी” की बात होती थी, लेकिन अब मामला “सीट चोरी” तक पहुंच गया है। नटराजन ने दावा किया कि उन्हें पर्याप्त सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। नामांकन रद्द करने का क्या है आधार? सूत्रों के अनुसार, भाजपा प्रत्याशी पक्ष की ओर से आपत्ति दर्ज कराई गई थी कि नटराजन ने अपने शपथपत्र में एक लंबित आपराधिक मामले की जानकारी नहीं दी थी। बताया गया कि तेलंगाना की एक अदालत में CrPC की धारा 223 के तहत एक मामला दर्ज है, जिसका उल्लेख नामांकन पत्र में नहीं किया गया। इसी आधार पर निर्वाचन अधिकारी ने नामांकन रद्द करने का निर्णय लिया। भाजपा ने फैसले को बताया सही मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे “न्याय की जीत” बताया। उन्होंने कहा कि पूरी प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार हुई है और नियमों के तहत ही आपत्ति दर्ज की गई थी। कांग्रेस का पलटवार कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने नामांकन रद्द किए जाने के फैसले को गलत बताया। उन्होंने दावा किया कि नटराजन के खिलाफ न कोई एफआईआर है और न ही कोई आपराधिक मुकदमा लंबित है। तन्खा के अनुसार केवल CrPC की धारा 223 के तहत एक नोटिस जारी हुआ था, जिसे गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। चुनाव आयोग में शिकायत, अदालत जाने की तैयारी कांग्रेस ने इस पूरे मामले को लेकर चुनाव आयोग के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। पार्टी ने संकेत दिया है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो वह अदालत का दरवाजा खटखटाएगी। राज्यसभा चुनाव से पहले बढ़ा सियासी तनाव मध्य प्रदेश में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले इस घटनाक्रम ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल इस मामले को लोकतांत्रिक प्रक्रिया और पारदर्शिता से जोड़कर देख रहे हैं।  

Deepshikha जून 10, 2026 0
PM Modi
मोदी ने नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ा

नई दिल्ली, एजेंसियां। नरेंद्र मोदी बतौर इलेक्टेड प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को पार कर चुके हैं। नेहरू चुनाव जीतकर 4398 दिन प्रधानमंत्री रहे थे। मोदी बतौर पीएम सबसे ज्यादा यानी 4399 पार कर चुके हैं।    हालांकि नेहरू 1947 से 1952 तक भी प्रधानमंत्री थे, लेकिन तब चुनाव नहीं हुआ था, यानी इलेक्टेड पीएम नहीं थे। उसे भी जोड़ दें तो नेहरू का कुल कार्यकाल 6131 दिन का हो जाएगा। देश में सबसे ज्यादा लगातार 9000 से ज्यादा दिनों तक सत्ता  प्रमुख रहने का रिकॉर्ड भी नरेंद्र मोदी के नाम है। पहले गुजरात के सीएम और फिर देश के पीएम के तौर पर।

Unknown जून 10, 2026 0
Parimal Nathwani
नाथवानी के नामांकन में पेंच, JMM व कांग्रेस खुश

रांची। झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। इस बीच नामांकन पत्रों की स्क्रूटनी के दौरान एक दिलचस्प मोड़ आ गया है। एक ओर सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के प्रत्याशियों ने तकनीकी परीक्षा आसानी से पास कर ली है, वहीं निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी का नामांकन नाम-विवाद के कारण अधर में लटक गया है। नाथवानी के दस्तावेजों में नाम के हेर-फेर को लेकर दर्ज कराई गई आपत्ति के बाद चुनाव अधिकारी ने उनके नामांकन को होल्ड पर रख दिया है, जिस पर अब बुधवार सुबह फैसला होना है। नाम के आगे-पीछे का फेर, थम गई नाथवानी की रेस दस्तावेजों की जांच के दौरान निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी के कागजातों में एक तकनीकी त्रुटि सामने आई। शिकायत के मुताबिक, कुछ दस्तावेजों में उनका नाम परिमल नाथवानी दर्ज है, तो कुछ जगहों पर इसे नाथवानी परिमल लिखा गया है। इस तकनीकी उलटफेर को आधार बनाकर उनके नामांकन पर आपत्ति दर्ज कराई गई। मामला गरमाते ही रिटर्निंग ऑफिसर ने फिलहाल नामांकन को होल्ड पर डाल दिया है। पहुंचे नाथवानी, भाजपा नेता जुटे रास्ता निकालने मे विवाद की भनक लगते ही परिमल नाथवानी तुरंत विधानसभा सचिवालय पहुंचे। उन्होंने विधानसभा के प्रभारी सचिव सह रिटर्निंग ऑफिसर रंजीत कुमार के समक्ष उपस्थित होकर अपनी स्थिति स्पष्ट की। इस दौरान रिटर्निंग ऑफिसर के कक्ष में कानूनी पहलुओं को लेकर लंबी मैराथन बैठक और विचार-विमर्श का दौर चला। दिलचस्प बात यह रही कि निर्दलीय उम्मीदवार होने के बावजूद भाजपा के कई वरिष्ठ नेता भी इस दौरान सचिवालय पहुंचे और पूरी प्रक्रिया पर पैनी नजर बनाए रखी, जिससे इस चुनाव के सियासी समीकरणों को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। बैजनाथ राम और प्रणव झा की राह आसान उधर, जेएमएम उम्मीदवार बैजनाथ राम के नामांकन पत्रों की जांच पूरी हो चुकी है और उसे वैध पाया गया है। इसके साथ ही, कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा का पर्चा भी पूरी तरह सही मिला, जिससे उनकी उम्मीदवारी को हरी झंडी मिल गई है। अब बुधवार सुबह 11 बजे होगी सुनवाई रिटर्निंग ऑफिसर ने निर्देश दिया है कि दर्ज आपत्ति पर अंतिम सुनवाई बुधवार सुबह 11 बजे होगी। इस दौरान परिमल नाथवानी या उनके अधिकृत एजेंट को खुद उपस्थित रहना होगा। अब सबकी नजरें कल की सुनवाई पर टिकी हैं कि क्या चुनाव आयोग इस नाम-विवाद को महज एक लिपिकीय (तार्किक) भूल मानकर नाथवानी का नामांकन वैध करता है, या फिर यह तकनीकी पेंच उनकी उम्मीदवारी के लिए कोई बड़ा रोड़ा बनेगा।

Unknown जून 9, 2026 0
Congress and BJP leaders amid intense political contest before Madhya Pradesh Rajya Sabha elections.
राज्यसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश में सियासी हलचल तेज, डिनर पॉलिटिक्स से बढ़ी कांग्रेस की चिंता

  मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए होने वाले चुनाव से पहले सियासी माहौल पूरी तरह गरमा गया है। Bharatiya Janata Party (बीजेपी) द्वारा तीसरे उम्मीदवार की घोषणा के बाद मुकाबला और दिलचस्प हो गया है, वहीं Indian National Congress (कांग्रेस) में क्रॉस वोटिंग और टूट के डर को लेकर हलचल तेज हो गई है। डिनर मीटिंग से कांग्रेस ने साधे विधायकों के सुर भोपाल में कांग्रेस विधायक दल की अहम बैठक के साथ डिनर का आयोजन किया गया, जिसकी अगुवाई नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने की। इस बैठक में आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर रणनीति पर चर्चा हुई और विधायकों की एकजुटता बनाए रखने पर जोर दिया गया। उमंग सिंघार ने कहा कि पार्टी को अपने विधायकों पर पूरा भरोसा है और सभी मिलकर चुनावी रणनीति के तहत काम करेंगे। उन्होंने यह भी संकेत दिए कि कांग्रेस अपने विधायकों को किसी सुरक्षित स्थान पर ले जा सकती है ताकि क्रॉस वोटिंग की संभावना को रोका जा सके। बीजेपी ने उतारा तीसरा उम्मीदवार, मुकाबला हुआ और दिलचस्प बीजेपी की केंद्रीय चुनाव समिति ने राज्यसभा चुनाव के लिए तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट के नाम की घोषणा की है। इससे पहले पार्टी दो उम्मीदवारों के नाम पहले ही घोषित कर चुकी थी। कांग्रेस की ओर से मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया गया है, जिन्होंने अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया है। पार्टी ने दावा किया है कि उनके पास जीत के लिए पर्याप्त संख्या बल मौजूद है। मध्य प्रदेश का सियासी गणित बना चर्चा का विषय मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल 230 सीटें हैं, जिनमें से वर्तमान में 228 विधायकों का प्रभावी वोट माना जा रहा है। बीजेपी के पास 164 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास प्रभावी रूप से 62 विधायक बचे हैं। राज्यसभा सीट जीतने के लिए लगभग 58 वोटों की आवश्यकता होती है। ऐसे में बीजेपी के पास दो सीटों पर आसान जीत का रास्ता दिख रहा है, लेकिन तीसरी सीट के लिए उसे अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा। कांग्रेस के लिए चुनौती बढ़ी बीजेपी द्वारा तीसरा उम्मीदवार उतारे जाने के बाद कांग्रेस की रणनीति पर दबाव बढ़ गया है। पार्टी को अपने सभी विधायकों को एकजुट रखना और क्रॉस वोटिंग से बचाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। बीना विधायक निर्मला सप्रे के रुख को लेकर भी अटकलें हैं कि वे बीजेपी के पक्ष में जा सकती हैं, जबकि विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा के मतदान पर रोक लगी हुई है। इससे कांग्रेस का गणित और कमजोर हुआ है। सियासी डिनर के बाद बढ़ी रणनीतिक गतिविधियां कांग्रेस ने अपने विधायकों के साथ डिनर और बैठक के जरिए एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की है, जबकि बीजेपी अपने संख्याबल के आधार पर तीसरी सीट पर भी रणनीति बना रही है। राज्यसभा चुनाव को लेकर दोनों दल अब अपने-अपने विधायकों को साधने में जुट गए हैं और आने वाले दिनों में राजनीतिक हलचल और तेज होने की संभावना है।  

Deepshikha जून 9, 2026 0
Rajya Sabha Elections 2026
राज्यसभा चुनाव 2026: जेएमएम-कांग्रेस उम्मीदवारों ने भरा नामांकन

रांची। झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां सोमवार को चरम पर रहीं। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि पर सत्तारूढ़ गठबंधन के उम्मीदवारों ने अपना नामांकन पत्र जमा कर दिया। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की ओर से बैद्यनाथ राम और कांग्रेस की ओर से प्रणव झा ने राज्यसभा चुनाव के लिए अपनी दावेदारी पेश की। दोनों उम्मीदवारों के नामांकन के साथ ही राज्य की राजनीति में चुनावी माहौल और गर्म हो गया है।   मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मौजूदगी रही खास नामांकन प्रक्रिया के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी मौजूद रहे। उन्होंने दोनों प्रत्याशियों का स्वागत करते हुए गठबंधन की मजबूती और एकजुटता का संदेश दिया। उनके साथ गठबंधन के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री की मौजूदगी राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन की एकजुटता का स्पष्ट संकेत है।   जीत को लेकर उम्मीदवारों ने जताया भरोसा नामांकन दाखिल करने के बाद बैद्यनाथ राम और प्रणव झा ने अपनी जीत को लेकर विश्वास जताया। दोनों नेताओं ने कहा कि उन्हें गठबंधन के सभी विधायकों का समर्थन प्राप्त है और वे राज्य के हितों को राज्यसभा में मजबूती से उठाने का प्रयास करेंगे। उन्होंने महागठबंधन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का भरोसा भी दिया।   समर्थकों की रही भारी मौजूदगी नामांकन केंद्र के बाहर सुबह से ही समर्थकों और कार्यकर्ताओं की भीड़ देखने को मिली। चुनावी नारों और उत्साह के बीच दोनों उम्मीदवारों ने अपना नामांकन दाखिल किया। इस दौरान गठबंधन के नेताओं ने विपक्ष को भी एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की।   अब चुनावी समीकरणों पर टिकी निगाहें नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब राजनीतिक दलों और पर्यवेक्षकों की नजर आगामी चुनावी प्रक्रिया पर टिकी है। राज्यसभा सीटों के लिए संख्या बल और समर्थन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर गतिविधियां और तेज होने की संभावना है। गठबंधन को उम्मीद है कि उसके उम्मीदवार आसानी से जीत दर्ज करेंगे, जबकि विपक्ष भी अपनी रणनीति पर नजर बनाए हुए है।

Unknown जून 8, 2026 0
Congress president Mallikarjun Kharge criticizes LPG price hike, questioning government over rising household expenses.
एलपीजी कीमतों में बढ़ोतरी पर खरगे का केंद्र पर हमला, बीजेपी नेताओं से पूछा- अब सिलेंडर लेकर सड़क पर क्यों नहीं बैठते?

  नई दिल्ली: घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को महंगाई के मुद्दे पर घेरा और कई सवाल उठाए। रविवार को घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 29 रुपये की बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाले सिलेंडर की कीमत 913 रुपये से बढ़कर 942 रुपये हो गई है। इसी बढ़ोतरी को लेकर विपक्ष लगातार सरकार पर निशाना साध रहा है। महंगाई पर बीजेपी की चुप्पी पर उठाए सवाल मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि यूपीए सरकार के दौरान महंगाई के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन करने वाले भाजपा नेता अब चुप क्यों हैं। उन्होंने पूछा कि जो नेता पहले गैस सिलेंडर लेकर सड़कों पर बैठते थे, वे आज बढ़ती कीमतों के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठा रहे हैं। खरगे ने कहा कि घरेलू एलपीजी की बढ़ती कीमतों का सीधा असर आम लोगों की रसोई पर पड़ रहा है और इससे मध्यम वर्ग तथा गरीब परिवारों का बजट प्रभावित हो रहा है। प्रधानमंत्री के दावों पर उठाया सवाल कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन बयानों का भी उल्लेख किया, जिनमें पश्चिम एशिया संकट के दौरान कई देशों से ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित करने की बात कही गई थी। उन्होंने सवाल किया कि यदि ईंधन आपूर्ति के पर्याप्त विकल्प मौजूद हैं, तो फिर घरेलू गैस की कीमतों में लगातार वृद्धि क्यों हो रही है। साथ ही उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी की उपलब्धता को लेकर भी सरकार से जवाब मांगा। उज्ज्वला योजना को लेकर भी घेरा खरगे ने दावा किया कि बड़ी संख्या में लाभार्थी परिवार उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन मिलने के बावजूद नियमित रूप से सिलेंडर रिफिल नहीं करवा पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि करोड़ों परिवार गैस सिलेंडर दोबारा भरवाने में सक्षम नहीं हैं, तो यह बढ़ती कीमतों और आम लोगों पर बढ़ते आर्थिक बोझ का संकेत है। कांग्रेस ने उठाए तीन प्रमुख सवाल अपने बयान में कांग्रेस अध्यक्ष ने सरकार से तीन प्रमुख सवाल पूछे— पश्चिम एशिया संकट के बावजूद ईंधन आपूर्ति के दावों के बाद भी गैस की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं? बड़ी संख्या में उज्ज्वला लाभार्थी सिलेंडर रिफिल क्यों नहीं करा पा रहे हैं? महंगाई के मुद्दे पर पहले विरोध करने वाले भाजपा नेता अब चुप क्यों हैं? चार महीनों में 89 रुपये महंगा हुआ सिलेंडर एलपीजी कीमतों में यह वृद्धि पिछले चार महीनों में दूसरी बड़ी बढ़ोतरी है। मार्च 2026 में भी घरेलू गैस सिलेंडर के दाम 60 रुपये बढ़ाए गए थे। ताजा बढ़ोतरी के बाद चार महीनों के भीतर घरेलू सिलेंडर की कीमत कुल 89 रुपये बढ़ चुकी है। विपक्षी दलों का आरोप है कि बढ़ती गैस कीमतें आम लोगों की आर्थिक मुश्किलें बढ़ा रही हैं, जबकि सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार की परिस्थितियों का असर घरेलू कीमतों पर पड़ता है।  

Deepshikha जून 8, 2026 0
Domestic LPG cylinders stacked at a distribution center after latest cooking gas price hike in India.
घरेलू गैस सिलेंडर फिर महंगा, विपक्ष का केंद्र सरकार पर हमला; महंगाई को लेकर बढ़ी सियासी गर्मी

  नई दिल्ली: घरेलू रसोई गैस उपभोक्ताओं को एक बार फिर महंगाई का झटका लगा है। केंद्र सरकार ने 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 29 रुपये की बढ़ोतरी कर दी है। नई दरें 7 जून से लागू हो गई हैं। इसके बाद राजधानी दिल्ली में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत 913 रुपये से बढ़कर 942 रुपये हो गई है। यह पिछले तीन महीनों में दूसरी बार है जब घरेलू एलपीजी की कीमतों में वृद्धि की गई है। इससे पहले मार्च 2026 में प्रति सिलेंडर 60 रुपये का इजाफा किया गया था। इस तरह चार महीनों के भीतर घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत कुल 89 रुपये बढ़ चुकी है, जिससे आम परिवारों के मासिक बजट पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है। कांग्रेस ने साधा निशाना कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि लगातार बढ़ रही गैस की कीमतों ने आम जनता की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार महंगाई को नियंत्रित करने में विफल रही है और इसका सीधा असर मध्यम वर्ग तथा गरीब परिवारों पर पड़ रहा है। खरगे ने यह भी सवाल उठाया कि यदि सरकार ने वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान वैकल्पिक ईंधन आपूर्ति के पर्याप्त इंतजाम किए थे, तो घरेलू उपभोक्ताओं को बार-बार मूल्य वृद्धि का सामना क्यों करना पड़ रहा है। आम लोगों पर बढ़ेगा आर्थिक दबाव कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर भारत पर पड़ रहा है, लेकिन सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि आम लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े। उनका कहना है कि पहले से बढ़ती महंगाई और स्थिर आय के बीच घरेलू गैस की कीमतों में लगातार वृद्धि परिवारों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। शरद पवार ने भी जताई नाराजगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) के प्रमुख शरद पवार ने भी बढ़ती महंगाई को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी का असर सीधे आम नागरिकों की जेब पर पड़ रहा है। पवार ने दावा किया कि यदि महंगाई इसी तरह बढ़ती रही, तो इसका राजनीतिक असर भी देखने को मिल सकता है और जनता चुनावों में अपनी प्रतिक्रिया दे सकती है। भाजपा पर विपक्ष का दोहरा रवैया अपनाने का आरोप महाराष्ट्र विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता विजय वडेट्टीवार ने कहा कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा महंगाई के मुद्दे पर सरकारों को घेरती थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद उसकी प्राथमिकताएं बदल गई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों में पेट्रोल, डीजल, सीएनजी और एलपीजी की कीमतों में कई बार बढ़ोतरी हुई है, जिससे आम उपभोक्ताओं की मुश्किलें बढ़ी हैं। रसोई बजट पर असर की आशंका विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू गैस की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर सीधे परिवारों के मासिक खर्च पर पड़ता है। खासकर निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए रसोई गैस की बढ़ती कीमतें चिंता का विषय बन सकती हैं। सरकार की ओर से अभी तक इस बढ़ोतरी को लेकर कोई विस्तृत स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और आयात लागत में बदलाव को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है।  

Deepshikha जून 8, 2026 0
Rahul Gandhi Hemant Soren
झारखंड में राज्यसभा सीटों को लेकर इंडिया ब्लॉक में बढ़ा विवाद

रांची। झारखंड में आगामी राज्यसभा चुनाव से पहले इंडिया ब्लॉक के भीतर शामिल झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे और उम्मीदवार चयन को लेकर सहमति नहीं बन पाई है, जिससे गठबंधन में खींचतान तेज हो गई है। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस ने जहां अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी है, वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा का कहना है कि यह फैसला बिना आपसी सहमति के लिया गया है, जिससे पार्टी के भीतर नाराजगी बढ़ी है।  JMM दोनों राज्यसभा सीटों पर उतार सकती है प्रत्याशी वहीं JMM ने स्पष्ट कर दिया है कि वह दोनों राज्यसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार सकती है, जिससे आने वाले दिनों में राजनीतिक समीकरण और अधिक जटिल हो सकते  हैं।  राजनीतिक समीकरणों के अनुसार, विधानसभा में झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास मजबूत बल संख्या है, जिससे एक सीट पर उसकी जीत लगभग पक्की मानी जा रही है। लेकिन दूसरी सीट को लेकर कांग्रेस और JMM के बीच सीधा टकराव देखा जा रहा है। इस पूरे विवाद के बीच सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर बातचीत और समाधान की कोशिशें जारी हैं, लेकिन फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं है और टकराव के संकेत बने हुए हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि जल्द सहमति नहीं बनी तो इसका असर राज्यसभा चुनाव परिणाम और गठबंधन की एकजुटता पर भी पड़ सकता है। इस विवाद ने झारखंड की सियासत में नए राजनीतिक समीकरणों की अटकलों को भी जन्म दे दिया है।

Unknown जून 7, 2026 0
Jharkhand Rajyasabha Election
राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार ऐलान से नाराज झामुमो, दोनों सीटों पर ठोका दावा

रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाले चुनाव से पहले महागठबंधन में मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। कांग्रेस द्वारा बोकारो निवासी प्रणव झा को राज्यसभा उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने दोनों सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की मंशा जाहिर की है। इससे गठबंधन के भीतर राजनीतिक तनाव बढ़ गया है और आने वाले दिनों में सियासी समीकरण बदलने की संभावना जताई जा रही है। कांग्रेस के फैसले पर उठे सवाल कांग्रेस ने गुरुवार देर रात प्रणव झा को उम्मीदवार घोषित किया। इसके बाद पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह सवाल उठने लगे। राजनीतिक हलकों में प्रणव झा को "पैराशूट उम्मीदवार" बताया जा रहा है। उनका जन्म भले ही झारखंड में हुआ हो, लेकिन राज्य की सक्रिय राजनीति में उनकी भूमिका सीमित रही है। बताया जा रहा है कि उनके नाम पर अंतिम फैसला कांग्रेस आलाकमान ने लिया, जिससे प्रदेश कांग्रेस के कुछ नेताओं में नाराजगी है। फुरकान अंसारी ने जताई नाराजगी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और गोड्डा के पूर्व सांसद फुरकान अंसारी ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने संकेत दिया कि वर्षों तक पार्टी के लिए काम करने के बावजूद उनके नाम पर विचार नहीं किया गया। उनकी प्रतिक्रिया ने यह साफ कर दिया कि उम्मीदवार चयन को लेकर कांग्रेस के भीतर भी असंतोष मौजूद है। झामुमो की बैठक में दोनों सीटों पर दावा शुक्रवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास पर झामुमो की अहम बैठक हुई, जिसमें पार्टी के सांसद, विधायक, मंत्री और वरिष्ठ नेता शामिल हुए। बैठक के बाद नेताओं ने स्पष्ट किया कि झामुमो राज्यसभा की दोनों सीटों पर अपना दावा पेश करेगा। नेताओं का कहना है कि राज्य में झामुमो सबसे बड़ा दल है, इसलिए दोनों सीटों पर उसका स्वाभाविक अधिकार बनता है। हफीजुल हसन और बैद्यनाथ राम के बयान मंत्री हफीजुल हसन ने कहा कि पार्टी का रुख पहले से स्पष्ट है और दोनों सीटों पर झामुमो उम्मीदवार उतारना चाहता है। वहीं विधायक बैद्यनाथ राम ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सहमति के बिना उम्मीदवार घोषित कर दिया। उन्होंने कहा कि पार्टी के सभी सांसदों और विधायकों ने दोनों सीटों पर झामुमो उम्मीदवार उतारने की इच्छा जताई है। हेमंत सोरेन के फैसले पर टिकी निगाहें राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस और झामुमो अपने-अपने उम्मीदवार मैदान में उतारते हैं तो महागठबंधन की एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। फिलहाल अंतिम निर्णय के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को अधिकृत किया गया है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि गठबंधन आपसी सहमति से समाधान निकालता है या राज्यसभा चुनाव में टकराव की स्थिति बनती है।

Unknown जून 6, 2026 0
Congress leaders announce seven Rajya Sabha candidates for elections across five Indian states.
राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने 7 उम्मीदवारों का किया ऐलान, खरगे और पवन खेड़ा को टिकट

  राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने गुरुवार (4 जून) को अपने सात उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। पार्टी ने कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और झारखंड से अपने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की है। कर्नाटक से खरगे, पवन खेड़ा और मंसूर अली खान मैदान में कांग्रेस ने कर्नाटक से पार्टी अध्यक्ष Mallikarjun Kharge को एक बार फिर राज्यसभा उम्मीदवार बनाया है। वे वर्तमान में भी कर्नाटक से राज्यसभा सदस्य हैं और उच्च सदन में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं। इसके अलावा पार्टी के मीडिया विभाग प्रमुख Pawan Khera को भी कर्नाटक से पहली बार राज्यसभा उम्मीदवार बनाया गया है। तीसरे उम्मीदवार के रूप में मंसूर अली खान को टिकट दिया गया है। मध्य प्रदेश से मीनाक्षी नटराजन उम्मीदवार मध्य प्रदेश से कांग्रेस ने पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन को मैदान में उतारा है। वह वर्तमान में पार्टी की तेलंगाना प्रभारी हैं। इस सीट पर दिग्विजय सिंह का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, उन्होंने पहले ही राज्यसभा न जाने की इच्छा जताई थी। राजस्थान, तमिलनाडु और झारखंड से भी नाम घोषित राजस्थान से मौजूदा राज्यसभा सदस्य नीरज डांगी को दोबारा उम्मीदवार बनाया गया है। तमिलनाडु से प्रवीण चक्रवर्ती को टिकट मिला है, जो AICC के प्रोफेशनल कांग्रेस और डेटा विभाग के प्रमुख हैं। झारखंड से राष्ट्रीय सचिव प्रणव झा को उम्मीदवार घोषित किया गया है। 18 जून को होगा राज्यसभा चुनाव राज्यसभा की 24 सीटों के लिए चुनाव 18 जून को होंगे। इन सीटों पर चुनाव 10 राज्यों में कराया जाएगा, जहां सदस्यों का कार्यकाल 21 जून से 19 जुलाई के बीच समाप्त हो रहा है। नामांकन की अंतिम तिथि 8 जून निर्धारित की गई है।  

Deepshikha जून 5, 2026 0
Rahul Gandhi criticizes CBSE re-evaluation fees, raising concerns over student expenses after exam results
'गलती CBSE की, सजा छात्रों को': री-इवैल्यूएशन फीस को लेकर राहुल गांधी का केंद्र पर निशाना

लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की पोस्ट-रिजल्ट फीस व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि मूल्यांकन प्रक्रिया में होने वाली संभावित त्रुटियों को सुधारने के लिए भी छात्रों से शुल्क वसूला जा रहा है, जिससे विद्यार्थियों और उनके परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि यदि सीबीएसई की ओर से मूल्यांकन में गलती होती है तो उसका खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ता है। उन्होंने लिखा कि स्कैन कॉपी, री-टोटलिंग और री-इवैल्यूएशन जैसी प्रक्रियाओं के लिए छात्रों से अलग-अलग शुल्क लिया जा रहा है। फीस व्यवस्था पर उठाए सवाल राहुल गांधी के अनुसार, डिजिटल स्कैन कॉपी प्राप्त करने के लिए प्रति विषय 100 रुपये, री-टोटलिंग के लिए प्रति पेपर 100 रुपये और री-इवैल्यूएशन के लिए प्रति प्रश्न 25 रुपये शुल्क निर्धारित है। उन्होंने दावा किया कि कई मामलों में छात्रों को अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की दोबारा जांच कराने के लिए करीब 2,000 रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं। कांग्रेस नेता ने यह भी सवाल उठाया कि यदि लाखों छात्र पुनर्मूल्यांकन और संबंधित प्रक्रियाओं के लिए आवेदन कर रहे हैं तो इससे बोर्ड को कितनी आय प्राप्त हो रही है। 'शिक्षा को व्यवसाय बनाया जा रहा' राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि जब शिक्षा को सेवा के बजाय व्यवसाय के रूप में संचालित किया जाता है तो व्यवस्थागत त्रुटियों का बोझ छात्रों पर डाल दिया जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में विद्यार्थियों को न केवल आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है, बल्कि उनके समय, आत्मविश्वास और भविष्य पर भी असर पड़ता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन प्रणाली में होने वाली संभावित त्रुटियों के कारण बड़ी संख्या में छात्रों को अपने अंकों की दोबारा जांच कराने की आवश्यकता पड़ती है। CBSE ने दिया स्पष्टीकरण इस बीच ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली को लेकर उठे सवालों के बीच सीबीएसई ने कहा है कि मूल्यांकन प्रक्रिया से जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म की सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए विशेष कदम उठाए गए हैं। बोर्ड ने एक बयान जारी कर कहा कि उसके सेवा प्रदाता के ऑनमार्क पोर्टल में चिन्हित तकनीकी कमजोरियों की निगरानी की जा रही है और विभिन्न सरकारी एजेंसियों तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) के साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की टीम सिस्टम को और मजबूत बनाने में जुटी है। सीबीएसई के अनुसार, पहचानी गई कमजोरियों को नियंत्रित कर लिया गया है और पोर्टल की सुरक्षा को और बेहतर बनाने की प्रक्रिया जारी है। बोर्ड ने संभावित खामियों की जानकारी देने वाले जागरूक नागरिकों और एथिकल हैकर्स का भी आभार व्यक्त किया है। शिक्षा व्यवस्था पर फिर छिड़ी बहस राहुल गांधी की टिप्पणी के बाद परीक्षा मूल्यांकन, पुनर्मूल्यांकन शुल्क और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। विपक्ष जहां छात्रों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का मुद्दा उठा रहा है, वहीं सीबीएसई का कहना है कि वह मूल्यांकन प्रक्रिया की गुणवत्ता और तकनीकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लगातार सुधारात्मक कदम उठा रहा है।  

surbhi जून 1, 2026 0
Congress leader Jairam Ramesh criticizes Modi government over India’s stance on Israel and West Asia conflict
इज़राइल मुद्दे पर कांग्रेस  महासचिव जयराम रमेश  का केंद्र सरकार पर बड़ा हमला

कांग्रेस ने इज़राइल और पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी का इज़राइल के प्रति कथित रूप से एकतरफा समर्थन भारत की पारंपरिक विदेश नीति, मानवीय मूल्यों और ऐतिहासिक रुख के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा शांति, संवाद और फिलिस्तीनी अधिकारों के समर्थन की नीति पर चलता रहा है, लेकिन मौजूदा सरकार इस परंपरा से दूर जाती दिखाई दे रही है। नेतन्याहू के कथित बयान का हवाला देकर कांग्रेस ने उठाए सवाल यह राजनीतिक विवाद उस समय और बढ़ गया जब जयराम रमेश ने इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के एक कथित बयान का हवाला दिया। कांग्रेस नेता के अनुसार, नेतन्याहू ने एक सम्मेलन में कहा था कि दुनिया के कई देशों में इज़राइल की वैधता पर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन भारत अब भी उसके समर्थन में खड़ा है। जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इज़राइल के सबसे मजबूत वैश्विक समर्थकों में शामिल नजर आते हैं। कांग्रेस ने लगाया गाजा और ईरान मुद्दे पर चुप्पी साधने का आरोप कांग्रेस महासचिव ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व की लक्षित हत्या की कभी सार्वजनिक निंदा नहीं की। उन्होंने यह भी कहा कि गाजा में जारी इज़राइली सैन्य अभियान, लेबनान पर हमलों और वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनियों के कथित विस्थापन जैसे मुद्दों पर भी केंद्र सरकार ने खुलकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जयराम रमेश ने कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संतुलित और मानवीय दृष्टिकोण की अपेक्षा की जाती है। फरवरी 2026 की मुलाकात का भी किया जिक्र कांग्रेस नेता ने अपने बयान में प्रधानमंत्री मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू की फरवरी 2026 में हुई मुलाकात का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि इस मुलाकात के कुछ समय बाद इज़राइल और अमेरिका ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले शुरू किए। कांग्रेस ने सीधे तौर पर इन घटनाओं के बीच किसी संबंध का दावा नहीं किया, लेकिन सरकार की विदेश नीति को लेकर सवाल जरूर उठाए। ‘यह पूरे भारत की राय नहीं’, कांग्रेस ने कहा जयराम रमेश ने कहा कि नेतन्याहू का यह कहना कि भारत इज़राइल के समर्थन में खड़ा है, पूरी तरह सही नहीं है। उनके मुताबिक, यह प्रधानमंत्री मोदी और उनके राजनीतिक तंत्र का नजरिया हो सकता है, लेकिन देश के करोड़ों लोग फिलिस्तीनी जनता के प्रति सहानुभूति रखते हैं और पश्चिम एशिया में शांति तथा न्यायपूर्ण समाधान के पक्षधर हैं। उन्होंने कहा कि भारत की जनता हमेशा मानवाधिकार, शांति और संतुलित कूटनीति के साथ खड़ी रही है। केंद्र सरकार से स्पष्ट रुख बताने की मांग कांग्रेस ने केंद्र सरकार से पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, गाजा की स्थिति, ईरान-इज़राइल तनाव और फिलिस्तीनी मुद्दे पर अपना स्पष्ट रुख सामने रखने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि भारत को अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखना चाहिए और किसी भी अंतरराष्ट्रीय संघर्ष में मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता देनी चाहिए। सरकार की ओर से अभी नहीं आया जवाब कांग्रेस के आरोपों पर केंद्र सरकार की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, पश्चिम एशिया की स्थिति और भारत की विदेश नीति को लेकर देश की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।  

surbhi मई 29, 2026 0
Siddaramaiah meets Karnataka Governor after submitting resignation amid Congress leadership change
कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन की शुरुआत, राज्यपाल ने स्वीकार किया सिद्धारमैया का इस्तीफा

कर्नाटक की राजनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है। राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही उनके नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया गया है। अब राज्य में नए मुख्यमंत्री के चयन और नई सरकार के गठन को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। नए मुख्यमंत्री के शपथ लेने तक सिद्धारमैया कार्यवाहक मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी जिम्मेदारी निभाते रहेंगे। कांग्रेस में पिछले कई महीनों से नेतृत्व परिवर्तन को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच यह फैसला काफी अहम माना जा रहा है। कांग्रेस आलाकमान के निर्देश का पालन करते हुए छोड़ा मुख्यमंत्री पद सिद्धारमैया ने 28 मई को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था। उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व के निर्देशों का पालन किया है और पार्टी के फैसले का सम्मान किया है। इस्तीफे के बाद मीडिया से बातचीत में सिद्धारमैया ने कहा कि पार्टी की ओर से उन्हें राज्यसभा भेजने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उनकी रुचि राष्ट्रीय राजनीति में नहीं है और वह कर्नाटक की राजनीति में ही सक्रिय बने रहना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विधायक के रूप में उनका कार्यकाल अभी दो वर्ष बाकी है और वह जनता के बीच रहकर अपनी राजनीतिक भूमिका जारी रखेंगे। 2023 में सत्ता में वापसी के बाद शुरू हुआ था दूसरा कार्यकाल सिद्धारमैया ने 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद दूसरी बार मुख्यमंत्री पद संभाला था। कांग्रेस ने बीजेपी को हराकर राज्य में सत्ता वापसी की थी और सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बनाया गया था, जबकि डीके शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अब उनके इस्तीफे के साथ ही राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू हो चुकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस नेतृत्व राज्य में संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। इस्तीफे के बाद समर्थकों में भावुकता, कई जगह हुए विरोध प्रदर्शन मुख्यमंत्री पद छोड़ने के फैसले के बाद सिद्धारमैया समर्थकों में नाराजगी और भावुकता देखने को मिली। 28 मई को राज्य के कई हिस्सों में समर्थकों ने प्रदर्शन किया और नेतृत्व परिवर्तन के फैसले पर सवाल उठाये। बेंगलुरु स्थित सिद्धारमैया के सरकारी आवास पर बड़ी संख्या में समर्थक जमा हुए। कई समर्थकों ने उनसे इस्तीफा वापस लेने की अपील की। इस दौरान माहौल काफी भावुक नजर आया। सिद्धारमैया बाहर आये और समर्थकों को समझाने की कोशिश की। उन्होंने लोगों से शांत रहने और पार्टी के फैसले का सम्मान करने की अपील की। डीके शिवकुमार के आवास के बाहर जश्न, समर्थकों ने मनायी खुशी जहां एक तरफ सिद्धारमैया समर्थकों में निराशा थी, वहीं दूसरी ओर उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के आवास के बाहर जश्न का माहौल देखने को मिला। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि डीके शिवकुमार कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री बन सकते हैं। इसी संभावना को देखते हुए उनके समर्थकों ने मिठाइयां बांटीं और जश्न मनाया। कई कांग्रेस नेता और विधायक भी शिवकुमार को बधाई देने उनके आवास पहुंचे। पार्टी कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी कर समर्थन जताया और नेतृत्व परिवर्तन को कांग्रेस के लिए नया अध्याय बताया। दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व के साथ अहम बैठकों की संभावना इस्तीफे के तुरंत बाद सिद्धारमैया दिल्ली के लिए रवाना हो गए। माना जा रहा है कि वह कांग्रेस आलाकमान के साथ नए मुख्यमंत्री के चयन और मंत्रिमंडल गठन को लेकर चर्चा करेंगे। उधर, डीके शिवकुमार भी बाद में दिल्ली पहुंचे। वर्तमान में वह उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, दिल्ली में होने वाली बैठकों में विधायक दल के नए नेता के चयन, मंत्रिमंडल के स्वरूप और प्रदेश संगठन में संभावित बदलाव जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। नए मुख्यमंत्री के नाम पर कांग्रेस के अंतिम फैसले का इंतजार कर्नाटक में अब सबसे बड़ी नजर कांग्रेस आलाकमान के फैसले पर टिकी हुई है। हालांकि डीके शिवकुमार का नाम सबसे आगे माना जा रहा है, लेकिन पार्टी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस नेतृत्व राज्य में सत्ता और संगठन दोनों को संतुलित रखने की रणनीति के तहत फैसला ले सकता है। आने वाले दिनों में कर्नाटक की राजनीति में और बड़े घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं।  

surbhi मई 29, 2026 0
Mamata Banerjee addressing supporters amid renewed efforts to revive the INDIA opposition alliance
बंगाल में हार के बाद ममता को याद आया INDIA गठबंधन! दिल्ली में बड़ी बैठक की तैयारी, क्या कांग्रेस देगी साथ?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। 2026 विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद Mamata Banerjee अब विपक्षी INDIA गठबंधन को फिर से सक्रिय करने की कोशिश में जुट गई हैं। खबर है कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने विपक्षी दलों की एक अहम बैठक बुलाने की पहल की है, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। भवानीपुर में हार ने बढ़ाई मुश्किल करीब 15 साल तक West Bengal की सत्ता पर काबिज रहीं ममता बनर्जी इस बार न सिर्फ सरकार गंवा बैठीं, बल्कि अपने पारंपरिक गढ़ भवानीपुर सीट से भी चुनाव हार गईं। उन्हें बीजेपी नेता Suvendu Adhikari ने मात दी। 2021 में 215 सीटें जीतने वाली टीएमसी 2026 में महज 80 सीटों तक सिमट गई। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस हार के बाद ममता अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए विपक्षी दलों से रिश्ते सुधारना चाहती हैं। कांग्रेस ने क्या कहा? पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस के महासचिव Ashutosh Chatterjee ने कहा कि INDIA गठबंधन को लेकर कोई भी अंतिम फैसला All India Congress Committee यानी AICC लेगी। उन्होंने साफ कहा कि प्रदेश स्तर पर निर्णय कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष शुभंकर सरकार की राय से होगा। हालांकि उन्होंने ममता बनर्जी पर तीखा हमला भी बोला। चटर्जी ने आरोप लगाया कि टीएमसी शासन के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं की हत्या हुई, उन्हें झूठे मामलों में फंसाया गया और पंचायत चुनावों में हिंसा हुई। उन्होंने कहा कि विपक्षी एकता की बात करने से पहले ममता बनर्जी को इन सवालों का जवाब देना होगा। INDIA गठबंधन में बढ़ी उलझन ममता बनर्जी की बैठक की अपील के बावजूद गठबंधन के भीतर तालमेल की कमी साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस और Samajwadi Party दोनों ने फिलहाल इस बैठक की जानकारी से इनकार किया है। सूत्रों के मुताबिक, अगर ममता सीधे Akhilesh Yadav से बात करती हैं, तभी जून में बैठक संभव हो सकती है। उधर, चुनाव के दौरान Rahul Gandhi ने ममता पर तीखे हमले किए थे, लेकिन हार के बाद उन्होंने चुनाव नतीजों को बीजेपी और चुनाव आयोग की “वोट चोरी” से जोड़ते हुए ममता के प्रति नरम रुख दिखाया। DMK की नाराजगी ने बढ़ाई टेंशन INDIA गठबंधन के सामने सिर्फ बंगाल की चुनौती नहीं है। दक्षिण भारत से भी गठबंधन के लिए परेशान करने वाली खबर आई है। तमिलनाडु में Dravida Munnetra Kazhagam यानी DMK कांग्रेस से नाराज बताई जा रही है। वजह यह है कि कांग्रेस ने अभिनेता विजय की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam को समर्थन दिया है। इसके बाद DMK ने संसद में कांग्रेस से अलग बैठने की मांग तक कर दी है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या DMK आगे भी INDIA गठबंधन का हिस्सा बनी रहेगी? बीजेपी का डर या विपक्षी मजबूरी? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्षी दलों के बीच भले ही मतभेद बढ़ रहे हों, लेकिन बीजेपी के खिलाफ एकजुट रहने की मजबूरी उन्हें साथ बनाए हुए है। ममता बनर्जी भी इसी रणनीति पर आगे बढ़ती दिख रही हैं। बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद अब उनके लिए संसद और राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत उपस्थिति बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का समर्थन उनके लिए बेहद अहम माना जा रहा है।  

surbhi मई 26, 2026 0
Election Commission announces Rajya Sabha Election 2026 schedule for 24 seats across 10 states
Rajya Sabha Election 2026: 10 राज्यों की 24 सीटों पर चुनाव का ऐलान, 18 जून को होगी वोटिंग

Election Commission of India ने जून और जुलाई 2026 में खाली होने वाली राज्यसभा की 24 सीटों के लिए चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही महाराष्ट्र और तमिलनाडु की दो राज्यसभा सीटों पर उपचुनाव कराने का भी ऐलान किया गया है। आयोग की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार, 10 राज्यों में राज्यसभा के जिन सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, उनकी सीटों पर 18 जून 2026 को मतदान कराया जाएगा। वोटों की गिनती भी उसी दिन होगी और परिणाम घोषित कर दिए जाएंगे। 1 जून को जारी होगा नोटिफिकेशन चुनाव आयोग के अनुसार, राज्यसभा चुनाव के लिए 1 जून 2026 को आधिकारिक अधिसूचना जारी की जाएगी। उम्मीदवारों के लिए नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 8 जून तय की गई है। इन सीटों पर चुनाव इसलिए हो रहे हैं क्योंकि मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 21 जून से 19 जुलाई 2026 के बीच अलग-अलग तारीखों पर समाप्त हो रहा है। किन राज्यों में कितनी सीटों पर चुनाव? राज्यसभा की 24 सीटों के लिए जिन राज्यों में चुनाव होंगे, उनमें कई बड़े राज्य शामिल हैं। सीटों का विवरण इस प्रकार है: Andhra Pradesh – 4 सीट Gujarat – 4 सीट Karnataka – 4 सीट Madhya Pradesh – 3 सीट Rajasthan – 3 सीट Jharkhand – 2 सीट Manipur – 1 सीट Meghalaya – 1 सीट Arunachal Pradesh – 1 सीट Mizoram – 1 सीट इन सभी सीटों के लिए संबंधित राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य मतदान करेंगे। महाराष्ट्र और तमिलनाडु में उपचुनाव चुनाव आयोग ने राज्यसभा की दो सीटों पर उपचुनाव की भी घोषणा की है। ये सीटें सदस्यों के इस्तीफे के बाद खाली हुई हैं। महाराष्ट्र सीट Sunetra Pawar के इस्तीफे के बाद महाराष्ट्र की एक राज्यसभा सीट खाली हुई है। विधायक बनने के बाद उन्होंने 6 मई को राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। उनका कार्यकाल 4 जुलाई 2028 तक था। तमिलनाडु सीट वहीं, C. V. Shanmugam ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मैलाम सीट से विधायक चुने जाने के बाद 7 मई को राज्यसभा सदस्यता छोड़ दी थी। उनका कार्यकाल 29 जून 2028 तक था। इन दोनों सीटों के लिए भी 18 जून को मतदान होगा और उसी दिन परिणाम घोषित किए जाएंगे। निष्पक्ष चुनाव के लिए आयोग की तैयारी चुनाव आयोग ने कहा है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी व्यवस्थाएं की जाएंगी। आयोग की ओर से पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की जाएगी और पूरी चुनाव प्रक्रिया की करीबी निगरानी की जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इन राज्यसभा चुनावों का असर संसद के ऊपरी सदन में विभिन्न दलों की ताकत पर पड़ सकता है। खासतौर पर गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में मुकाबला दिलचस्प रहने की संभावना है।  

surbhi मई 22, 2026 0
Rahul Gandhi and BJP leaders clash over NEET-UG paper leak controversy and student future concerns.
NEET-UG पेपर लीक पर सियासी घमासान तेज, बीजेपी का राहुल गांधी पर पलटवार

Bharatiya Janata Party और Indian National Congress के बीच NEET-UG पेपर लीक मामले को लेकर राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। भाजपा ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर आरोप लगाया है कि उन्होंने लाखों छात्रों के भविष्य से ऊपर “तुच्छ राजनीति” को तरजीह दी है। दरअसल, राहुल गांधी ने NEET-UG पेपर लीक विवाद, CBSE मूल्यांकन प्रक्रिया और तीन-भाषा नीति को लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोला था। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan पर छात्रों को “विफल” करने का आरोप लगाया और प्रधानमंत्री Narendra Modi से लाखों छात्रों का भविष्य “बर्बाद” करने के लिए माफी मांगने की मांग की थी। बीजेपी का जवाब- “छात्रों के भविष्य पर राजनीति” भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता Gaurav Bhatia ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा कि विपक्ष छात्रों की चिंता करने के बजाय राजनीतिक अवसरवाद में लगा हुआ है। उन्होंने कहा, “राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर छात्रों के भविष्य के बजाय तुच्छ राजनीति को चुना है।” भाटिया ने आरोप लगाया कि कांग्रेस रचनात्मक सुझाव देने की बजाय केवल राजनीतिक नैरेटिव मजबूत करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि दूसरों को जवाबदेही का पाठ पढ़ाने से पहले कांग्रेस को अपने शासनकाल में हुए पेपर लीक, परीक्षा घोटालों और संस्थागत विफलताओं का जवाब देना चाहिए। “मोदी सरकार ने की त्वरित कार्रवाई” भाजपा प्रवक्ता ने दावा किया कि मोदी सरकार ने NEET पेपर लीक मामले में तेजी से कार्रवाई की है और जांच एजेंसियों ने कथित मुख्य साजिशकर्ताओं को गिरफ्तार किया है। उन्होंने कहा कि कई राज्यों में चल रही कार्रवाई यह साबित करती है कि सरकार अपराधियों को संरक्षण नहीं देती। गौरव भाटिया ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “कांग्रेस की रणनीति छात्रों का राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना है।” उन्होंने आगे कहा, “यह कोई लीपापोती नहीं है, न ही चुप्पी। यह निर्णायक और संस्थागत कार्रवाई है।” शिक्षा व्यवस्था पर बढ़ा राजनीतिक दबाव NEET-UG पेपर लीक विवाद को लेकर देशभर में छात्रों और अभिभावकों के बीच चिंता बनी हुई है। विपक्ष लगातार परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहा है, जबकि केंद्र सरकार और भाजपा दावा कर रही है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति और शिक्षा व्यवस्था दोनों में बड़ा बहस का विषय बना रह सकता है।  

surbhi मई 18, 2026 0
Akhilesh Yadav with MK Stalin and Mamata Banerjee amid opposition alliance political tensions
स्टालिन और ममता के साथ तस्वीर शेयर कर अखिलेश यादव ने कांग्रेस पर कसा तंज

समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav ने एक बार फिर राजनीतिक संकेतों से भरी पोस्ट कर सियासी हलचल तेज कर दी है. अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर M. K. Stalin और Mamata Banerjee के साथ अपनी तस्वीरें साझा करते हुए कांग्रेस पर इशारों में निशाना साधा. उन्होंने पोस्ट में लिखा, “हम वो नहीं जो मुश्किलों में साथ छोड़ दें.” इस एक लाइन को विपक्षी राजनीति और हाल के चुनावी घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है. कांग्रेस के फैसले के बाद बढ़ी सियासी चर्चा अखिलेश यादव की यह पोस्ट ऐसे समय आई है जब तमिलनाडु में कांग्रेस ने चुनाव बाद डीएमके से दूरी बनाते हुए टीवीके (TVK) को समर्थन देने का फैसला किया है. कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव डीएमके के साथ मिलकर लड़ा था, लेकिन नतीजों के बाद पार्टी ने अपना रुख बदल लिया. तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, हालांकि उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. इसके बाद सरकार गठन को लेकर लगातार राजनीतिक जोड़तोड़ जारी है. बंगाल के संदर्भ में भी बड़ा संदेश अखिलेश यादव की पोस्ट को पश्चिम बंगाल की राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है. हाल ही में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद कांग्रेस नेताओं के कुछ बयानों पर विपक्षी दलों के बीच असहजता देखी गई थी. इसी बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi ने भी कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को नसीहत दी थी कि वे तृणमूल कांग्रेस की हार का मजाक न उड़ाएं. विपक्षी एकता पर नया संदेश? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव की यह पोस्ट विपक्षी दलों के बीच भरोसे और साथ निभाने का संदेश देने की कोशिश है. ममता बनर्जी और स्टालिन दोनों ही INDIA गठबंधन के प्रमुख चेहरे माने जाते हैं, ऐसे में अखिलेश का यह बयान कांग्रेस की रणनीति पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच यह पोस्ट विपक्षी राजनीति में नए समीकरणों की ओर भी इशारा कर रही है.  

surbhi मई 8, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Deepshikha जून 5, 2026 0