Jantar Mantar Protest: दिल्ली के जंतर-मंतर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सोमवार (27 जुलाई) को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह मंगलवार (28 जुलाई) को इस मामले से जुड़ी सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करेगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में पूरे देश में विरोध-प्रदर्शनों से निपटने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure-SOP) तैयार करने पर विचार किया जाएगा। दिल्ली से बिहार तक के मामलों पर होगी संयुक्त सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष दिल्ली के जंतर-मंतर छात्र आंदोलन में पुलिस कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं का उल्लेख किया गया। इस दौरान वकीलों ने बताया कि बिहार समेत अन्य राज्यों में प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामले भी अदालत के समक्ष लाए गए हैं। याचिकाओं में दिल्ली के जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान हुए लाठीचार्ज के अलावा बिहार के सिवान में कथित तौर पर AK-47 के इस्तेमाल जैसे मामलों का भी जिक्र किया गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी मामलों को एक साथ सूचीबद्ध कर संयुक्त सुनवाई करने का निर्देश दिया। पूरे देश के लिए SOP बनाने पर सुप्रीम कोर्ट का संकेत सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए पूरे देश में एक समान SOP की आवश्यकता पर विचार किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि सभी राज्यों से जुड़े मामलों पर विचार करने के बाद यह देखा जाएगा कि भविष्य में ऐसे हालात से निपटने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए जा सकते हैं या नहीं। 'शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार' मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र का एक मूल अधिकार है और नागरिकों को इसके लिए उचित स्थान और अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल विरोध प्रदर्शन होने के आधार पर पुलिस की कठोर कार्रवाई या आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग को उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत इस बात की भी जांच करेगी कि पुलिस द्वारा अपनाए गए कदम कानून और संविधान के अनुरूप थे या नहीं। पुलिसकर्मियों की सुरक्षा पर भी होगी सुनवाई सुनवाई के दौरान घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की ओर से भी पक्ष रखा गया। उनके वकील ने अदालत को बताया कि प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने पुलिसकर्मियों पर हमला किया, जिससे कई जवान घायल हुए। उन्होंने मांग की कि अदालत पुलिसकर्मियों की सुरक्षा और उनके अधिकारों पर भी विचार करे। इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि "हर जीवन महत्वपूर्ण है।" उन्होंने कहा कि अदालत प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के साथ-साथ ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों की सुरक्षा व्यवस्था और उनके संरक्षण से जुड़े पहलुओं की भी समीक्षा करेगी। मंगलवार को होगी अहम सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सभी संबंधित याचिकाओं को एक साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। मंगलवार (28 जुलाई) को होने वाली सुनवाई में अदालत प्रदर्शनकारियों के अधिकार, पुलिस की जवाबदेही, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की प्रक्रिया और भविष्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर SOP तैयार करने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार करेगी। यह सुनवाई देशभर में विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई के लिए भविष्य की कानूनी रूपरेखा तय करने की दिशा में अहम मानी जा रही है।
सॉफ्टवेयर कंपनी Zoho के संस्थापक श्रीधर वेम्बु ने दिल्ली में चल रहे प्रदर्शनों को लेकर अपनी स्पष्ट राय व्यक्त की है। आमतौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), टेक्नोलॉजी और भविष्य की तकनीकों पर अपने विचार साझा करने वाले वेम्बु ने इस बार देश के मौजूदा घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कुछ प्रदर्शन भारत की प्रगति को बाधित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका मानना है कि देश को विकास की राह से भटकाने वाले ऐसे प्रयासों को सफल नहीं होने देना चाहिए। सोशल मीडिया पोस्ट में क्या कहा? श्रीधर वेम्बु ने सोशल मीडिया पर लिखे अपने पोस्ट में कहा कि उनके अनुसार दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे लोग भारत को अराजकता की ओर धकेलना चाहते हैं और देश की प्रगति को रोकने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने लिखा कि ऐसे इरादों को विफल करना आवश्यक है और भारत को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने वाली ताकतों को सफल नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है, जहां जनता अपनी सामूहिक राय चुनावों के माध्यम से व्यक्त करती है। उनके अनुसार लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव ही जनमत व्यक्त करने का सबसे उचित माध्यम हैं। किस पोस्ट के जवाब में आई प्रतिक्रिया? श्रीधर वेम्बु की यह टिप्पणी उद्योग जगत से जुड़े विचारक एस. गुरुमूर्ति की एक सोशल मीडिया पोस्ट के जवाब में आई। इसके बाद उनका बयान सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया और लोगों ने इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं। तकनीकी विकास पर जताई चिंता वेम्बु का मानना है कि भारत इस समय टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर निर्माण और एयरोस्पेस जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में लंबे समय तक चलने वाले विवाद और प्रदर्शन देश की विकास गति को प्रभावित कर सकते हैं। उनके अनुसार भारत के सामने आज वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का बड़ा अवसर है और इस दिशा में स्थिर माहौल बेहद जरूरी है। पहले भी प्रगति को लेकर जताई थी उम्मीद हाल ही में किए गए एक अन्य सोशल मीडिया पोस्ट में श्रीधर वेम्बु ने भारत की तकनीकी प्रगति की सराहना की थी। उन्होंने लिखा था कि पिछले एक दशक में भारत ने सेमीकंडक्टर फैब, एयरोस्पेस और उन्नत तकनीकों के क्षेत्र में बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। उन्होंने कहा था कि भारत अभी भी लंबा सफर तय कर रहा है, लेकिन देश सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। उनके अनुसार कुछ ताकतें भारत की प्रगति को रोकना चाहती हैं, फिर भी उन्हें विश्वास है कि अंततः जीत भारत की ही होगी। AI को लेकर क्या सोचते हैं श्रीधर वेम्बु? श्रीधर वेम्बु अक्सर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और भविष्य की तकनीकों पर अपने विचार साझा करते रहते हैं। हाल ही में उन्होंने कहा था कि दुनिया भर में AI में हो रहा भारी निवेश इस सोच पर आधारित है कि आने वाले वर्षों में यही सबसे प्रभावशाली तकनीक बनेगी। उनका मानना है कि AI केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह— कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज खोजने में मदद करेगा। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान विकसित करेगा। शहरों में सस्ते आवास जैसी समस्याओं के समाधान खोजने में योगदान देगा। विभिन्न उद्योगों और तकनीकों को नए सिरे से विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। बयान बना चर्चा का विषय दिल्ली में जारी प्रदर्शनों के बीच श्रीधर वेम्बु का यह बयान सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है। जहां कुछ लोग उनके विचारों का समर्थन कर रहे हैं, वहीं कुछ लोग इससे अलग राय भी व्यक्त कर रहे हैं। फिलहाल यह बयान देश में विकास, लोकतंत्र और विरोध-प्रदर्शन की भूमिका को लेकर नई बहस का हिस्सा बन गया है।
नई दिल्ली: पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से जुड़ा एक भावुक और कम चर्चित प्रसंग पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) एस.वाई. कुरैशी की आगामी पुस्तक India and I: A Hundred Memories, Not a Memoir में सामने आया है। कुरैशी के अनुसार, वर्ष 2012 में निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर कुछ मंत्रियों की टिप्पणी से नाराजगी जताने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनसे मुलाकात में कहा था, "अगर आप ऐसा सोचते हैं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा।" कैसे शुरू हुआ पूरा मामला? एस.वाई. कुरैशी के अनुसार, जनवरी 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने चुनावी सभा में मुसलमानों के लिए आरक्षण बढ़ाने का वादा किया था। भारतीय जनता पार्टी ने इसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन बताते हुए चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई। लगातार चार दिनों तक सुनवाई हुई, जिसमें कांग्रेस की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी और भाजपा की ओर से अरुण जेटली ने पक्ष रखा। सुनवाई के बाद निर्वाचन आयोग ने सलमान खुर्शीद की सार्वजनिक रूप से निंदा की। मंत्रियों के बयानों से आहत थे कुरैशी कुरैशी लिखते हैं कि आयोग के फैसले के बाद कांग्रेस के कुछ नेताओं की ओर से निर्वाचन आयोग पर "अहंकारी" और "मनमाना" होने जैसे आरोप लगाए जाने लगे। उनका कहना है कि आलोचना से उन्हें परेशानी नहीं थी, लेकिन संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाली बयानबाजी उन्हें बेहद आहत कर रही थी। PMO तक पहुंची नाराजगी ईद के अवसर पर आयोजित अपने वार्षिक मिलन समारोह में कुरैशी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री के प्रेस सचिव हरीश खरे से अपनी नाराजगी साझा की। हरीश खरे ने पूछा कि क्या वह यह बात प्रधानमंत्री तक पहुंचा दें। कुरैशी ने सहमति जताई। अगले ही दिन प्रधानमंत्री कार्यालय से उन्हें फोन आया और बताया गया कि प्रधानमंत्री उनसे तत्काल मिलना चाहते हैं। "अगर आप ऐसा सोचते हैं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा" शाम को प्रधानमंत्री आवास पर हुई मुलाकात का जिक्र करते हुए कुरैशी लिखते हैं कि मनमोहन सिंह स्वयं दरवाजे पर उनका इंतजार कर रहे थे। बैठते ही उन्होंने भावुक स्वर में कहा, "हरीश ने मुझे बताया कि आपने क्या कहा। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा।" कुरैशी के मुताबिक, यह सुनकर वह पूरी तरह स्तब्ध रह गए। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी शिकायत प्रधानमंत्री से नहीं, बल्कि कुछ मंत्रियों के व्यवहार को लेकर थी। "निर्वाचन आयोग लोकतंत्र की आत्मा है" कुरैशी के अनुसार, मनमोहन सिंह ने उनसे कहा कि यदि उन्हें इस पूरे मामले की जानकारी होती तो संबंधित मंत्रियों को तुरंत फटकार लगाते। उन्होंने आगे कहा, "निर्वाचन आयोग केवल भारत का गौरव नहीं है, यह हमारे लोकतंत्र की आत्मा है। अगर हमने इसे खो दिया तो हम सब कुछ खो देंगे।" प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भविष्य में यदि ऐसी कोई समस्या हो तो वे सीधे उन्हें फोन करें। किताब में साझा किए कई संस्मरण एस.वाई. कुरैशी की पुस्तक India and I: A Hundred Memories, Not a Memoir में सार्वजनिक जीवन और संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े कई अनुभवों का उल्लेख किया गया है। इस संस्मरण में मनमोहन सिंह को एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता रखते थे।
ढाका/नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने स्पष्ट कहा है कि वह हर हाल में इसी साल अपने देश लौटेंगी, चाहे उन्हें मौत की सजा का सामना ही क्यों न करना पड़े। करीब दो वर्षों से भारत में रह रहीं हसीना ने कहा कि राजनीतिक दबाव और कानूनी कार्रवाई उनके फैसले को नहीं बदल सकती। उन्होंने अपने खिलाफ दिए गए फैसले को राजनीतिक प्रतिशोध करार देते हुए लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष जारी रखने की बात कही। 'मौत की सजा से नहीं डरती' एक इंटरव्यू में शेख हसीना ने कहा कि उन्हें मौत की सजा का कोई भय नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है और इसका उद्देश्य उनकी पार्टी अवामी लीग को कमजोर करना है। उनके अनुसार, पार्टी जनता की ताकत पर खड़ी है और उसे खत्म नहीं किया जा सकता। हसीना ने कहा कि उनका जीवन हमेशा बांग्लादेश की जनता और लोकतंत्र के लिए समर्पित रहा है तथा वह हर परिस्थिति में अपने देश लौटने का प्रयास करेंगी। 'अवामी लीग को खत्म करने की साजिश' पूर्व प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार उनके नेतृत्व और अवामी लीग को राजनीतिक रूप से खत्म करना चाहती है। उन्होंने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब उनकी पार्टी पर दबाव बनाया गया हो, लेकिन हर बार जनता ने उनका साथ दिया है। उनका दावा है कि उनके खिलाफ सुनाया गया फैसला न्यायिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडा का हिस्सा है। परिवार की त्रासदी का किया जिक्र शेख हसीना ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कई कठिन दौर देखे हैं। उन्होंने 1975 में अपने पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की हत्या का जिक्र करते हुए कहा कि उस हमले में उनके परिवार के अधिकांश सदस्य मारे गए थे। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उन पर पहले भी जानलेवा हमले हुए, जिनमें वह बच निकलीं। उनके मुताबिक, इन घटनाओं ने उन्हें और अधिक मजबूत बनाया है। मौजूदा सरकार पर लगाए गंभीर आरोप हसीना ने दावा किया कि बांग्लादेश में लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हुई हैं और कानून का शासन प्रभावित हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेताओं और अवामी लीग के कार्यकर्ताओं को राजनीतिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिति पर नकारात्मक असर पड़ा है तथा अल्पसंख्यक समुदायों पर हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर जताई चिंता पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला पूरे देश की लोकतांत्रिक भावना पर हमला है। उन्होंने कहा कि सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होती है और इस दिशा में गंभीर प्रयास होने चाहिए। 'दिल आज भी बांग्लादेश में ही है' शेख हसीना ने कहा कि निर्वासन में रहने के बावजूद उनका मन हमेशा बांग्लादेश में ही रहता है। उन्होंने कहा कि देश में अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं और आम लोगों की मुश्किलों की खबरें सुनना उनके लिए बेहद पीड़ादायक है। उन्होंने कहा कि वह लगातार अपने सहयोगियों के संपर्क में हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बांग्लादेश में लोकतंत्र एवं मानवाधिकारों के मुद्दे उठाने का प्रयास कर रही हैं। 'जनता के दम पर फिर खड़ी होगी अवामी लीग' अपने संदेश के अंत में हसीना ने भरोसा जताया कि बांग्लादेश की जनता एक बार फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करेगी। उन्होंने कहा कि अवामी लीग जनता के समर्थन से दोबारा मजबूती के साथ उभरेगी और वह अपने अंतिम दिन तक इस संघर्ष का हिस्सा बनी रहेंगी।
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति में एक नया इतिहास रच दिया है। लगातार तीसरी बार देश की सत्ता संभाल रहे मोदी अब भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने वाले नेता बन गए हैं। उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड पीछे छोड़ते हुए 4,399 दिनों का लगातार निर्वाचित कार्यकाल पूरा कर लिया है। लगातार तीसरे कार्यकाल में बना नया इतिहास प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इसके बाद उन्होंने 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी जीत दर्ज कर लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की। इसी के साथ उनका निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल 4,399 दिनों तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे लंबा लगातार निर्वाचित कार्यकाल है। नेहरू का रिकॉर्ड टूटा पंडित Jawaharlal Nehru ने 13 मई 1952 को पहले आम चुनाव के बाद निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था और 27 मई 1964 तक इस पद पर रहे। निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल 4,398 दिनों का था। यदि 15 अगस्त 1947 से उनके पूरे प्रधानमंत्री कार्यकाल को शामिल किया जाए तो वे कुल 6,130 दिनों तक देश के प्रधानमंत्री रहे थे। लेकिन निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में लगातार कार्यकाल के मामले में मोदी अब उनसे आगे निकल गए हैं। गुजरात से दिल्ली तक का लंबा राजनीतिक सफर राष्ट्रीय राजनीति में आने से पहले नरेंद्र मोदी ने 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था। लगभग 13 वर्षों तक राज्य का नेतृत्व करने के बाद वे 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में उनका कुल नेतृत्वकाल अब 8,931 दिनों तक पहुंच चुका है, जो भारत के किसी भी निर्वाचित सरकार प्रमुख के लिए एक नया रिकॉर्ड माना जा रहा है। मोदी के नाम पहले से कई बड़े रिकॉर्ड प्रधानमंत्री मोदी पहले भी कई राजनीतिक उपलब्धियां अपने नाम कर चुके हैं। वे: स्वतंत्र भारत के बाद जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं। पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने लगातार दो पूर्ण कार्यकाल पूरे किए। लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतकर सत्ता में लौटने वाले चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं। सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री दोनों पदों पर रहने वाले निर्वाचित नेताओं में से एक हैं। सोशल मीडिया पर भी मजबूत मौजूदगी राजनीतिक उपलब्धियों के साथ-साथ प्रधानमंत्री मोदी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लगातार नए रिकॉर्ड बना रहे हैं। यूट्यूब पर 3 करोड़ से अधिक सब्सक्राइबर। इंस्टाग्राम पर 10 करोड़ से ज्यादा फॉलोअर्स वाले दुनिया के पहले कार्यरत राष्ट्र प्रमुख। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर 10 करोड़ से अधिक फॉलोअर्स। 12 वर्षों के कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियां आर्थिक क्षेत्र भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना। डिजिटल भुगतान प्रणाली UPI को वैश्विक पहचान मिली। निवेश और कारोबार को बढ़ावा देने के लिए कई सुधार लागू किए गए। जनकल्याण योजनाएं प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत करोड़ों बैंक खाते खुले। उज्ज्वला योजना के माध्यम से करोड़ों परिवारों को गैस कनेक्शन मिला। आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री आवास योजना का विस्तार हुआ। जल जीवन मिशन और स्वच्छ भारत अभियान को व्यापक स्तर पर लागू किया गया। बड़े राजनीतिक फैसले जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया। तीन तलाक कानून लागू किया गया। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पारित हुआ। नए संसद भवन का उद्घाटन किया गया। बुनियादी ढांचा और रक्षा वंदे भारत ट्रेनों की शुरुआत। एक्सप्रेसवे, हाईवे और एयरपोर्ट नेटवर्क का विस्तार। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर। राफेल लड़ाकू विमानों को भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया। वैश्विक मंच पर भारत G20 New Delhi Summit की सफल मेजबानी। International Solar Alliance को वैश्विक पहचान। ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में भारत की भूमिका मजबूत हुई। क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि? प्रधानमंत्री मोदी का 4,399 दिनों का लगातार निर्वाचित कार्यकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। यह उपलब्धि न केवल उनके लंबे राजनीतिक सफर को दर्शाती है, बल्कि लगातार तीन आम चुनावों में मिले जनादेश को भी रेखांकित करती है। भारत के राजनीतिक इतिहास में यह रिकॉर्ड अब एक नए मानक के रूप में दर्ज हो गया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।