आज के दौर में स्मार्टफोन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। कामकाज, पढ़ाई, बैंकिंग, मनोरंजन और लोगों से जुड़े रहने तक लगभग हर काम मोबाइल के जरिए होने लगा है। हालांकि, जब इसका इस्तेमाल जरूरत से बढ़कर आदत और फिर लत में बदल जाता है, तो इसका असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ने लगता है। विशेषज्ञों के अनुसार, कई लोग बिना समझे ही मोबाइल एडिक्शन का शिकार हो जाते हैं। यदि आपके व्यवहार में भी कुछ खास बदलाव दिखाई दे रहे हैं, तो समय रहते सावधान होना जरूरी है। बार-बार मोबाइल देखने की आदत अगर बिना किसी जरूरी कॉल, मैसेज या नोटिफिकेशन के भी आप हर थोड़ी देर में फोन अनलॉक करके देखते रहते हैं, तो यह मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता का संकेत हो सकता है। धीरे-धीरे यह आदत आपकी एकाग्रता और उत्पादकता को भी प्रभावित कर सकती है। फोन दूर होने पर बेचैनी महसूस होना कुछ लोगों को मोबाइल कुछ समय के लिए भी अपने पास न होने पर घबराहट, चिड़चिड़ापन या बेचैनी होने लगती है। यदि आपके साथ भी ऐसा होता है, तो यह मोबाइल की लत का स्पष्ट संकेत माना जा सकता है। सुबह उठते ही और रात को सोने से पहले फोन इस्तेमाल करना यदि आपकी सुबह की शुरुआत मोबाइल देखने से होती है और रात को सोने से पहले भी लंबे समय तक स्क्रीन पर नजरें टिकी रहती हैं, तो यह आदत धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकती है। देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है और शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता। काम, पढ़ाई और परिवार से ज्यादा मोबाइल को प्राथमिकता देना जब सोशल मीडिया, वीडियो देखने या मोबाइल गेम्स की वजह से पढ़ाई, नौकरी या परिवार के साथ बिताने वाला समय कम होने लगे, तो यह गंभीर चेतावनी हो सकती है। ऐसी स्थिति में व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन दोनों प्रभावित हो सकते हैं। स्क्रीन टाइम कम करने में बार-बार असफल होना अगर आपने कई बार मोबाइल का इस्तेमाल कम करने का फैसला किया, लेकिन हर बार कुछ समय बाद फिर पहले जैसी आदत लौट आई, तो यह भी मोबाइल एडिक्शन का प्रमुख संकेत माना जाता है। मोबाइल की लत से हो सकते हैं ये नुकसान मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल लंबे समय में कई स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है। इनमें शामिल हैं: आंखों में जलन, दर्द और सिरदर्द की समस्या। नींद की गुणवत्ता खराब होना और लगातार थकान महसूस होना। तनाव और मानसिक दबाव बढ़ना। ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी आना। पढ़ाई और कामकाज की कार्यक्षमता प्रभावित होना। परिवार और दोस्तों के साथ संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ना। मोबाइल इस्तेमाल कैसे करें संतुलित? मोबाइल का उपयोग पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है, लेकिन इसकी आदत को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए स्क्रीन टाइम की सीमा तय करें, सोने से कम से कम एक घंटा पहले फोन का इस्तेमाल बंद करें, अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद रखें और खाली समय में किताब पढ़ने, व्यायाम करने या परिवार के साथ समय बिताने जैसी गतिविधियों को प्राथमिकता दें। अगर मोबाइल का अत्यधिक उपयोग आपकी दिनचर्या, मानसिक स्थिति या सामाजिक जीवन को लगातार प्रभावित कर रहा है, तो किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या काउंसलर से सलाह लेना भी लाभदायक हो सकता है।
आज के समय में मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। काम, पढ़ाई और मनोरंजन के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल करना आम बात है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल स्क्रीन के सामने बिताया गया समय ही नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है, यह भी मानसिक स्वास्थ्य और याददाश्त पर बड़ा असर डालता है। क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के अनुसार, स्क्रीन टाइम को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है—Passive Screen Time और Active Screen Time। इनमें से पैसिव स्क्रीन टाइम दिमाग के लिए अधिक नुकसानदायक माना जाता है। क्या होता है Passive Screen Time? Passive Screen Time वह होता है, जिसमें व्यक्ति बिना किसी उद्देश्य के लगातार स्क्रीन पर समय बिताता रहता है। इसमें सोशल मीडिया पर लगातार स्क्रॉल करना, ऑटो-प्ले वीडियो देखते रहना या बैकग्राउंड में वीडियो चलाकर अन्य काम करना शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का स्क्रीन इस्तेमाल दिमाग पर बहुत कम मानसिक दबाव डालता है, लेकिन धीरे-धीरे यह याददाश्त, एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। कैसे प्रभावित होती है याददाश्त और फोकस? विशेषज्ञों का कहना है कि एक वयस्क व्यक्ति औसतन रोजाना 6 से 7 घंटे स्क्रीन पर बिताता है, जिसमें बड़ा हिस्सा पैसिव स्क्रीन टाइम का होता है। लगातार बिना सोचे-समझे कंटेंट देखने की आदत से कई समस्याएं हो सकती हैं, जैसे— ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई वर्किंग मेमोरी कमजोर होना मानसिक थकान बढ़ना किसी काम पर लंबे समय तक टिके रहने में परेशानी छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन विशेषज्ञ बताते हैं कि छोटे-छोटे वीडियो और लगातार मिलने वाली तुरंत संतुष्टि (Instant Gratification) दिमाग को इसी तरह के कंटेंट का आदी बना सकती है, जिससे ध्यान अवधि (Attention Span) धीरे-धीरे कम होने लगती है। Active Screen Time क्यों है बेहतर? Active Screen Time में व्यक्ति स्क्रीन का इस्तेमाल किसी उद्देश्य के साथ करता है। जैसे— नई स्किल सीखना ऑनलाइन कोर्स करना किताब पढ़ना नई भाषा सीखना पजल या ब्रेन गेम खेलना डिजिटल जर्नलिंग ऑनलाइन फिटनेस क्लास लेना क्रिएटिव कंटेंट बनाना ऐसी गतिविधियां दिमाग को सक्रिय रखती हैं और सोचने, समझने तथा समस्या सुलझाने की क्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं। क्या स्क्रीन टाइम से बढ़ सकता है डिमेंशिया का खतरा? विशेषज्ञों के अनुसार, केवल स्क्रीन टाइम को डिमेंशिया का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। हालांकि लंबे समय तक दिमाग को पर्याप्त मानसिक चुनौती न मिलने पर याददाश्त, ध्यान और सोचने की क्षमता कमजोर हो सकती है। दूसरी ओर, सीखने और दिमाग को सक्रिय रखने वाली गतिविधियां "कॉग्निटिव रिजर्व" को मजबूत बनाने में मदद करती हैं, जिससे उम्र बढ़ने के साथ मानसिक कार्यक्षमता को बनाए रखने में सहायता मिल सकती है। कैसे करें स्क्रीन का सही इस्तेमाल? अगर आप स्क्रीन का उपयोग करते हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें— बिना उद्देश्य के लगातार स्क्रॉल करने से बचें। सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए समय सीमा तय करें। हर 30–45 मिनट बाद स्क्रीन से ब्रेक लें। स्क्रीन का उपयोग सीखने और नई स्किल विकसित करने के लिए करें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें। निष्कर्ष स्क्रीन अपने आप में नुकसानदायक नहीं है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि आप उसका इस्तेमाल किस तरह करते हैं। यदि स्क्रीन का उपयोग केवल मनोरंजन और लगातार स्क्रॉलिंग तक सीमित है, तो यह आपकी याददाश्त, ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है। वहीं, सीखने और रचनात्मक कार्यों के लिए किया गया स्क्रीन इस्तेमाल दिमाग को सक्रिय और स्वस्थ बनाए रखने में मदद कर सकता है। नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। यदि आपको याददाश्त, ध्यान या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी लगातार समस्या हो रही है, तो किसी योग्य डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।