पुणे: महाराष्ट्र के पुणे जिले के मोशी इलाके में तीन मंजिला इमारत गिरने के बाद राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है। हादसे के करीब 30 घंटे बाद भी एनडीआरएफ, दमकल विभाग और स्थानीय प्रशासन की टीमें मलबे में फंसे लोगों को निकालने में जुटी हैं। अब तक नौ लोगों को सुरक्षित बचाया गया है, जबकि एक व्यक्ति की मौत की पुष्टि हुई है। अब भी कई लोगों के फंसे होने की आशंका एनडीआरएफ अधिकारियों के अनुसार, मलबे में अभी भी तीन से चार लोगों के दबे होने की आशंका है। बचाव दल हर संभावित स्थान पर सावधानीपूर्वक तलाशी अभियान चला रहा है। अस्थिर इमारत बनी सबसे बड़ी चुनौती एनडीआरएफ के सेकंड-इन-कमांड (ऑपरेशन्स) दीपक तिवारी ने बताया कि इमारत का ढांचा आगे की ओर झुक गया है और कैंटिलीवर जैसी स्थिति में है। इससे पूरी संरचना बेहद अस्थिर हो गई है, जिसके कारण राहत कार्य जोखिम भरा हो गया है। उन्होंने बताया कि मलबे के बीच जमा भारी मलबा और कचरा भी बचाव अभियान को मुश्किल बना रहा है। फिलहाल भारी मशीनों और मैन्युअल तरीके से मलबा हटाया जा रहा है। डॉग स्क्वॉड और तकनीक की मदद से चल रहा सर्च ऑपरेशन बचाव अभियान में आधुनिक तकनीकी उपकरणों के साथ डॉग स्क्वॉड की भी मदद ली जा रही है। एनडीआरएफ ने पूरी इमारत का तकनीकी सर्वे किया है और अब मलबा हटाकर अंदर तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि अभियान पूरी सावधानी के साथ चलाया जा रहा है ताकि मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सके। भवन सुरक्षा पर फिर उठे सवाल मोशी की यह घटना महाराष्ट्र में पहले हो चुके घाटकोपर, ठाणे, भिवंडी और पुणे के अन्य इमारत हादसों की याद दिलाती है। इन मामलों में भी कमजोर निर्माण, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और लापरवाही को प्रमुख कारण माना गया था। हर बड़े हादसे के बाद जांच और कार्रवाई के दावे किए जाते हैं, लेकिन बार-बार सामने आ रही ऐसी घटनाएं भवन निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। जांच के साथ जारी है राहत कार्य फिलहाल घटनास्थल पर राहत एवं बचाव अभियान जारी है। प्रशासन ने पूरे इलाके को सुरक्षा घेरे में ले लिया है और इमारत गिरने के कारणों की जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि प्राथमिकता मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने की है, जबकि हादसे के कारणों की विस्तृत जांच बाद में की जाएगी।
Pimpri Chinchwad Building Collapse: महाराष्ट्र के पुणे जिले में लगातार हो रही भारी बारिश के बीच बड़ा हादसा हो गया। पिंपरी-चिंचवाड़ नगर निगम (PCMC) के वेस्ट-टू-एनर्जी (WTE) प्लांट की तीन मंजिला प्रशासनिक इमारत ढह गई। हादसे के बाद मलबे में करीब 16 लोगों के फंसे होने की आशंका जताई जा रही है। पुलिस, दमकल विभाग और बचाव दल मौके पर पहुंचकर राहत एवं बचाव कार्य में जुटे हैं। दोपहर में हुआ हादसा जानकारी के अनुसार, यह हादसा बुधवार दोपहर करीब 1:45 बजे मोशी इलाके में हुआ। इमारत अचानक भरभराकर गिर गई, जिससे वहां मौजूद लोगों में अफरा-तफरी मच गई। स्थानीय लोगों ने तुरंत प्रशासन को सूचना दी, जिसके बाद राहत दल घटनास्थल पर पहुंचा। मलबा हटाने का काम जारी हादसे के बाद पुलिस, फायर ब्रिगेड, आपदा प्रबंधन टीम और अन्य बचाव एजेंसियों ने मौके पर पहुंचकर मलबा हटाने का अभियान शुरू कर दिया। अधिकारियों के मुताबिक, मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए युद्धस्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। लगातार बारिश के बीच बढ़ी मुश्किलें पुणे समेत महाराष्ट्र के कई हिस्सों में 4 जुलाई से लगातार भारी बारिश हो रही है। खराब मौसम और जलभराव के कारण राहत एवं बचाव कार्य प्रभावित हो रहा है। प्रशासन अतिरिक्त मशीनों और बचाव कर्मियों की मदद से अभियान को तेज करने की कोशिश कर रहा है। इमारत गिरने की वजह स्पष्ट नहीं फिलहाल यह साफ नहीं हो पाया है कि इमारत किस कारण ढही। शुरुआती तौर पर लगातार हो रही बारिश को संभावित वजह माना जा रहा है, लेकिन प्रशासन ने कहा है कि तकनीकी जांच के बाद ही वास्तविक कारणों का पता चल सकेगा। प्रशासन ने शुरू की जांच स्थानीय प्रशासन ने घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं। अधिकारियों का कहना है कि पहले सभी फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना प्राथमिकता है। इसके बाद इमारत गिरने के कारणों की विस्तृत जांच कर जिम्मेदारी तय की जाएगी।
रांची। झारखंड के रांची जिले के तमाड़ क्षेत्र में हुए सनसनीखेज हत्याकांड का पुलिस ने 17 दिनों बाद खुलासा करने का दावा किया है। 19 जून को बुंडू थाना क्षेत्र के तेतरटांड़ जंगल से मिली सिरकटी और आंशिक रूप से जली लाश की गुत्थी सुलझाते हुए पुलिस ने मृतक की पत्नी और उसके कथित प्रेमी को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया कि प्रेमी से शादी करने की चाह में पत्नी ने अपने पति की हत्या की साजिश रची थी। पहचान मिटाने के लिए सिर काटकर जलाया शव पुलिस के अनुसार मृतक की पहचान तमाड़ थाना क्षेत्र के मांझीडीह निवासी संजय लोहरा के रूप में हुई। हत्या के बाद आरोपियों ने शव की पहचान छिपाने के लिए पहले सिर धड़ से अलग किया, फिर धड़ को जलाकर जंगल में फेंक दिया। सिर को अलग स्थान पर जमीन में दफना दिया गया, जिससे पुलिस को कोई सुराग न मिल सके। बिना सिर के शव मिलने के कारण यह मामला पुलिस के लिए ब्लाइंड मर्डर बन गया था। आरोपियों की निशानदेही पर मिला कटा हुआ सिर गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में आरोपियों ने अपराध स्वीकार किया। उनकी निशानदेही पर तमाड़ थाना क्षेत्र के सुंदरडीह स्थित रानी वन में जमीन के भीतर दबाकर रखा गया मृतक का सिर बरामद किया गया। बरामदगी के दौरान एफएसएल टीम ने मौके से वैज्ञानिक साक्ष्य भी जुटाए। चार आरोपी शामिल, दो अब भी फरार डीएसपी ओमप्रकाश ने बताया कि तकनीकी विश्लेषण, फॉरेंसिक जांच और लगातार छानबीन के आधार पर पुलिस आरोपियों तक पहुंची। जांच में चार लोगों की संलिप्तता सामने आई है। पत्नी और उसके कथित प्रेमी को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि दो अन्य आरोपी अभी फरार हैं। उनकी गिरफ्तारी के लिए छापेमारी जारी है। पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल कार भी जब्त कर ली है। अधिकारियों का कहना है कि सभी साक्ष्य जुटाने के बाद न्यायालय में मजबूत आरोपपत्र दाखिल किया जाएगा। इस ब्लाइंड मर्डर केस के खुलासे में अनुसंधान टीम, तकनीकी सेल और एफएसएल की संयुक्त भूमिका रही।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे के शोधकर्ताओं ने एक अत्याधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम विकसित किया है, जो बाढ़ संभावित क्षेत्रों की पहचान करने के साथ-साथ 30 मीटर रिजॉल्यूशन पर बाढ़ के पानी की गहराई का भी अनुमान लगा सकता है। यह तकनीक दक्षिण भारत के पश्चिमी घाट क्षेत्र में विकसित की गई है और भविष्य में देश के अन्य बाढ़ प्रभावित इलाकों में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। 93% से ज्यादा सटीकता के साथ करता है बाढ़ का अनुमान शोधकर्ताओं के अनुसार, यह AI सिस्टम 93 प्रतिशत से अधिक सटीकता के साथ बाढ़ संभावित क्षेत्रों की पहचान करने में सक्षम है। यह मॉडल लगभग 55,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करता है, जो कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के तदरी से लेकर तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक फैला हुआ है। इस तकनीक का उद्देश्य भारी बारिश के कारण आने वाली अचानक बाढ़ (Flash Flood) से होने वाले जान-माल के नुकसान को कम करना और समय रहते प्रशासन को सतर्क करना है। सिर्फ बारिश नहीं, कई कारकों का करता है विश्लेषण IIT बॉम्बे की रिसर्च टीम ने इस मॉडल में केवल वर्षा के आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय कई अन्य कारकों को भी शामिल किया है। इनमें शामिल हैं: सतही जल प्रवाह (Surface Runoff) मिट्टी की नमी भूमि उपयोग (Land Use) जल अवशोषण क्षमता ड्रेनेज सिस्टम शोधकर्ताओं का कहना है कि सतही जल प्रवाह, केवल बारिश की मात्रा की तुलना में बाढ़ का अधिक विश्वसनीय संकेतक साबित हुआ। सैटेलाइट और AI का अनोखा संयोजन इस सिस्टम को तैयार करने के लिए यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के Sentinel-1 Synthetic Aperture Radar (SAR) सैटेलाइट डेटा का उपयोग किया गया। यह रडार तकनीक घने मानसूनी बादलों के बीच भी पृथ्वी की स्पष्ट तस्वीरें लेने में सक्षम है। AI मॉडल ने बाढ़ से पहले और बाद की सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण कर पानी से भरे क्षेत्रों की पहचान करना सीखा और उसी आधार पर संभावित बाढ़ की गहराई का अनुमान लगाया। दो चरणों में करता है काम यह AI सिस्टम दो स्तरों पर कार्य करता है: पहले चरण में यह पहचानता है कि कौन-सा क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आने की आशंका रखता है। दूसरे चरण में यह अनुमान लगाता है कि उस स्थान पर पानी कितनी गहराई तक भर सकता है। इससे प्रशासन को राहत एवं बचाव कार्यों की बेहतर योजना बनाने में मदद मिल सकती है। अस्पताल, सड़क और स्कूलों की सुरक्षा में होगी मदद 30 मीटर रिजॉल्यूशन वाले हाई-प्रिसिजन मैप्स की मदद से यह पता लगाया जा सकेगा कि बाढ़ के दौरान कौन-कौन से अस्पताल, स्कूल, सड़कें और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे प्रभावित हो सकते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक विशेष रूप से केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में आपदा प्रबंधन और शहरी नियोजन के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। भविष्य में मुंबई और पूर्वी तट तक होगा विस्तार फिलहाल यह मॉडल पश्चिमी घाट के कम ढलान (7% से कम) वाले क्षेत्रों के लिए विकसित किया गया है। हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि आवश्यक बदलाव और अतिरिक्त डेटा जोड़कर इसे मुंबई और भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्रों जैसे जटिल इलाकों में भी लागू किया जा सकता है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के हिंगलगंज क्षेत्र में कालिंदी नदी के तटबंध (बांध) का करीब 300 फुट हिस्सा धंस जाने से आसपास के गांवों में बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है। घटना के बाद साहेबखाली और आसपास के इलाकों में दहशत का माहौल है। ग्रामीणों को आशंका है कि यदि बांध और कमजोर हुआ तो नदी का पानी गांवों, कृषि भूमि और मछली पालन के तालाबों में घुस सकता है। साहेबखाली इलाके में बढ़ी लोगों की चिंता स्थानीय लोगों के मुताबिक, कालिंदी नदी का यह तटबंध पहले से ही कमजोर स्थिति में था। लगातार कटाव और बारिश के बीच अचानक करीब 300 फुट हिस्से में धंसाव होने से हालात गंभीर हो गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते मरम्मत नहीं की गई तो बड़े पैमाने पर नुकसान हो सकता है। लोगों ने प्रशासन से तत्काल सुरक्षा उपाय करने की मांग की है ताकि संभावित बाढ़ से जान-माल की रक्षा की जा सके। आयला और अम्फान जैसी तबाही का डर ग्रामीणों ने वर्ष 2009 के चक्रवात आयला और 2020 के चक्रवात अम्फान को याद करते हुए कहा कि उन आपदाओं के दौरान भी तटबंध टूटने से भारी नुकसान हुआ था। उनका कहना है कि अस्थायी मरम्मत की बजाय कालिंदी नदी के किनारे स्थायी कंक्रीट तटबंध बनाया जाए, जिससे भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके। प्रशासन ने सिंचाई विभाग को किया अलर्ट हिंगलगंज के बीडीओ देवदास गंगोपाध्याय ने बताया कि तटबंध धंसने की सूचना मिलते ही सिंचाई विभाग को अवगत करा दिया गया है। विभाग की टीम आवश्यक कदम उठाने की तैयारी में जुटी है और प्रशासन पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। उन्होंने कहा कि फिलहाल उन्हें मौके से प्रारंभिक रिपोर्ट मिली है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आवश्यकता पड़ने पर आपदा प्रबंधन टीम भी भेजी जाएगी। मरम्मत कार्य जल्द शुरू होने की उम्मीद प्रशासन का कहना है कि प्रभावित हिस्से की तकनीकी जांच के बाद मरम्मत कार्य शुरू किया जाएगा। साथ ही नदी के जलस्तर और तटबंध की स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है ताकि किसी भी आपात स्थिति से समय रहते निपटा जा सके। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से त्वरित कार्रवाई की मांग करते हुए कहा है कि मानसून के दौरान तटबंध की सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है, क्योंकि थोड़ी भी लापरवाही आसपास के गांवों के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है।
Donald Trump ने एक बार फिर Cameron Hamilton पर भरोसा जताते हुए उन्हें Federal Emergency Management Agency (FEMA) का नेतृत्व करने के लिए नामित किया है। यह फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पिछले साल ट्रंप प्रशासन ने ही हैमिल्टन को FEMA के अस्थायी प्रमुख पद से हटा दिया था। क्यों हटाए गए थे हैमिल्टन? रिपोर्ट्स के मुताबिक, हैमिल्टन को उस समय हटाया गया था जब उन्होंने FEMA के अस्तित्व और उसकी जरूरत का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था। उस दौरान ट्रंप प्रशासन लगातार संकेत दे रहा था कि FEMA को खत्म या कमजोर किया जा सकता है। ट्रंप पहले भी एजेंसी की कार्यप्रणाली की आलोचना करते रहे हैं और कई बार इसे “अप्रभावी” बता चुके हैं। अब क्यों हुई वापसी? अगर सीनेट उनके नामांकन को मंजूरी देती है, तो हैमिल्टन: आपदा प्रबंधन मामलों में ट्रंप के मुख्य सलाहकार होंगे Markwayne Mullin के साथ मिलकर काम करेंगे प्राकृतिक आपदाओं और आपात स्थितियों के लिए FEMA की तैयारी संभालेंगे विशेषज्ञों का मानना है कि यह नियुक्ति ट्रंप प्रशासन की रणनीति में बदलाव का संकेत हो सकती है, क्योंकि अमेरिका में गर्मियों के दौरान तूफान, बाढ़ और जंगल की आग जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ जाता है। चुनौतीपूर्ण होगी जिम्मेदारी हैमिल्टन ऐसे समय FEMA की कमान संभालने जा रहे हैं जब एजेंसी के भीतर लगातार अस्थिरता बनी हुई है। जनवरी 2025 से अब तक एजेंसी तीन अस्थायी प्रमुख देख चुकी है। इसके चलते: प्रशासनिक असमंजस नीतिगत बदलाव आपदा तैयारी को लेकर चिंता जैसे मुद्दे सामने आए हैं। FEMA क्यों अहम है? Federal Emergency Management Agency अमेरिका में: तूफान बाढ़ भूकंप जंगल की आग अन्य प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए सबसे अहम संघीय एजेंसी मानी जाती है। यह एजेंसी राज्यों को राहत, बचाव और पुनर्वास में मदद करती है। क्या है ट्रंप प्रशासन की रणनीति? ट्रंप प्रशासन के भीतर लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि: FEMA की भूमिका सीमित की जाए राज्यों को ज्यादा जिम्मेदारी दी जाए संघीय खर्च कम किया जाए हालांकि लगातार बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के खतरे के बीच FEMA को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं माना जा रहा। अब कैमरन हैमिल्टन की वापसी को इस रूप में देखा जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन फिलहाल एजेंसी को खत्म करने के बजाय उसे अपने तरीके से पुनर्गठित करना चाहता है।
अगर आप पढ़ाई के साथ-साथ सरकारी संस्थान में काम करने का अनुभव लेना चाहते हैं, तो National Institute of Disaster Management (NIDM) आपके लिए शानदार अवसर लेकर आया है। वर्ष 2026 के लिए NIDM ने अपना इंटर्नशिप प्रोग्राम शुरू किया है, जिसमें स्टूडेंट्स को हर महीने ₹15,000 तक का स्टाइपेंड दिया जाएगा। यह संस्थान Ministry of Home Affairs के अंतर्गत काम करता है और देश में आपदा प्रबंधन (Disaster Management) के क्षेत्र में रिसर्च और ट्रेनिंग का प्रमुख केंद्र है। क्या है NIDM इंटर्नशिप प्रोग्राम? NIDM इंटर्नशिप एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां छात्रों को: आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में काम करने का अनुभव मिलता है देश के विशेषज्ञों के साथ काम करने का मौका मिलता है सरकारी सिस्टम और रिसर्च कार्यों को करीब से समझने का अवसर मिलता है कौन कर सकता है आवेदन? (Eligibility Criteria) इस इंटर्नशिप के लिए सीमित पात्रता तय की गई है: पोस्ट-ग्रेजुएशन (Master’s) या PhD कर रहे छात्र इन विषयों के स्टूडेंट्स आवेदन कर सकते हैं: Disaster Management Social Work Environmental Science Engineering Town Planning Geography Social Sciences न्यूनतम 60% अंक आवश्यक स्टाइपेंड और अवधि NIDM इंटर्नशिप की अवधि और लाभ इस प्रकार हैं: अवधि: 1 से 3 महीने UG छात्रों के लिए: ₹12,000 प्रति माह PG छात्रों के लिए: ₹15,000 प्रति माह इंटर्नशिप पूरी करने पर सर्टिफिकेट भी दिया जाएगा इसके अलावा, एक नॉन-स्टाइपेंड इंटर्नशिप ऑप्शन भी उपलब्ध है, जो पूरे साल खुला रहता है। आवेदन कैसे करें? इंटर्नशिप के लिए आवेदन की प्रक्रिया आसान है: NIDM की आधिकारिक वेबसाइट nidm.gov.in पर जाएं ‘Announcements’ या ‘Vacancies’ सेक्शन में इंटर्नशिप लिंक खोलें आवेदन फॉर्म भरें जरूरी डॉक्यूमेंट अपलोड करें (मार्कशीट, ID प्रूफ, NOC) फॉर्म सबमिट करें आवेदन की अंतिम तिथि: 15 अप्रैल 2026 क्यों खास है यह इंटर्नशिप? सरकारी संस्थान में काम करने का अनुभव करियर में वैल्यू एडिशन सामाजिक क्षेत्र में योगदान का अवसर प्रोफेशनल नेटवर्किंग और स्किल डेवलपमेंट
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।