Sonam Wangchuk Story: बॉलीवुड फिल्म 3 Idiots में आमिर खान द्वारा निभाया गया 'रैंचो' का किरदार आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस किरदार की प्रेरणा लद्दाख के प्रसिद्ध इंजीनियर, इनोवेटर और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक से जुड़ी मानी जाती है। शिक्षा व्यवस्था में बदलाव और बच्चों को बेहतर सीखने का अवसर देने के लिए वर्षों से काम कर रहे सोनम वांगचुक इन दिनों एक बार फिर चर्चा में हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रही उनकी भूख हड़ताल ने देशभर का ध्यान शिक्षा प्रणाली, परीक्षा व्यवस्था और जवाबदेही जैसे मुद्दों की ओर आकर्षित किया है। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल परीक्षा पास कराना नहीं, बल्कि बच्चों की प्रतिभा और सोचने की क्षमता को विकसित करना होना चाहिए। 'रैंचो' की प्रेरणा बने सोनम वांगचुक साल 2009 में रिलीज हुई फिल्म 3 Idiots में 'रैंचो' का किरदार पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था को चुनौती देता है और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देता है। माना जाता है कि इस किरदार की प्रेरणा सोनम वांगचुक के जीवन और उनके शिक्षा सुधार के कार्यों से ली गई थी। बताया जाता है कि फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले 2008 में आमिर खान की मुलाकात सोनम वांगचुक से एक सम्मान समारोह में हुई थी, जहां उनके जीवन और शिक्षा सुधार के प्रयासों पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री भी दिखाई गई थी। शिक्षा के लिए समर्पित पूरा जीवन लद्दाख के रहने वाले सोनम वांगचुक ने अपना जीवन ऐसे बच्चों के लिए समर्पित किया है जिन्हें पारंपरिक शिक्षा प्रणाली अक्सर पीछे छोड़ देती है। साल 1988 में उन्होंने अपने साथियों के साथ Students' Educational and Cultural Movement of Ladakh (SECMOL) की स्थापना की। इस पहल का उद्देश्य उन छात्रों को नई दिशा देना था जिन्हें पारंपरिक परीक्षा प्रणाली 'असफल' मानती थी। SECMOL ने हजारों छात्रों को आत्मविश्वास, व्यावहारिक शिक्षा और कौशल आधारित सीखने का अवसर दिया। यहां से पढ़े कई छात्र आगे चलकर वैज्ञानिक, इंजीनियर और विभिन्न क्षेत्रों में सफल पेशेवर बने। इंजीनियरिंग से शिक्षा सुधार तक का सफर सोनम वांगचुक ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। छात्र जीवन में उन्होंने लेह का पहला कोचिंग सेंटर शुरू किया, जहां पढ़ाते समय उन्हें महसूस हुआ कि कई प्रतिभाशाली छात्र केवल शिक्षा प्रणाली की कमियों के कारण पीछे रह जाते हैं। यही अनुभव उनके शिक्षा सुधार मिशन की नींव बना। उन्होंने ऐसी शिक्षा प्रणाली की वकालत की जिसमें रटने के बजाय समझ, नवाचार और वास्तविक जीवन से जुड़ी सीख को प्राथमिकता मिले। पर्यावरण संरक्षण में भी निभाई अहम भूमिका शिक्षा के अलावा सोनम वांगचुक पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी अपने नवाचारों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने 'आइस स्तूप' (Ice Stupa) तकनीक विकसित की, जिसके जरिए सर्दियों के पानी को कृत्रिम ग्लेशियर के रूप में संरक्षित कर गर्मियों में सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है। इस मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली है। शिक्षा सुधार की मांग को लेकर भूख हड़ताल इन दिनों सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने कथित परीक्षा गड़बड़ियों और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग करते हुए शिक्षा मंत्रालय से ठोस कार्रवाई की अपील की है। उनका कहना है कि देश के छात्रों का भविष्य किसी भी व्यवस्था से बड़ा है और शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। क्यों चर्चा में हैं सोनम वांगचुक? सोनम वांगचुक केवल एक इंजीनियर या इनोवेटर नहीं, बल्कि ऐसे शिक्षा सुधारक हैं जिन्होंने वर्षों से बच्चों की रचनात्मकता, कौशल और व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ावा देने का काम किया है। उनकी पहल ने यह संदेश दिया कि सफलता केवल परीक्षा के अंकों से नहीं, बल्कि सीखने की क्षमता और नवाचार से तय होती है। आज उनका आंदोलन एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, व्यावहारिक और छात्र-केंद्रित बनाने की आवश्यकता है।
रांची। झारखंड सरकार राज्य के सभी विश्वविद्यालयों की वित्तीय व्यवस्था में व्यापक सुधार करने जा रही है। इसके तहत वर्षों से अलग-अलग विभागों, अंगीभूत कॉलेजों, परीक्षा शाखाओं और विभिन्न योजनाओं के नाम पर संचालित बैंक खातों की व्यवस्था समाप्त कर दी जाएगी। अब प्रत्येक विश्वविद्यालय का केवल एक सिंगल नोडल अकाउंट (एसएनए) होगा, जिसके माध्यम से सभी वित्तीय लेनदेन किए जाएंगे। इस नई व्यवस्था के लिए "स्टैच्यूट्स फॉर फाइनेंस एंड अकाउंट मैनेजमेंट (Statutes for Finance and Account Management) इन स्टेट यूनिवर्सिटीज ऑफ झारखंड" का मसौदा (Draft ) तैयार कर लिया गया है। ई-समर्थ पोर्टल से होगा पूरा वित्तीय प्रबंधन नई व्यवस्था लागू होने के बाद बजट तैयार करने, भुगतान, लेखांकन, बैंक मिलान, ऑडिट और वित्तीय रिपोर्टिंग तक की पूरी प्रक्रिया ई-समर्थ पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन संचालित होगी। नकद भुगतान और मैनुअल वाउचर की व्यवस्था पूरी तरह समाप्त कर दी जाएगी। प्रत्येक भुगतान का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रहेगा, जिससे किसी भी समय उसकी जांच और ऑडिट करना आसान होगा। सरकार का उद्देश्य वित्तीय पारदर्शिता बढ़ाना और अनियमितताओं पर पूरी तरह रोक लगाना है। तीन स्तर की मंजूरी के बाद होगा भुगतान वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए मेकर, चेकर और अप्रूविंग अथॉरिटी की तीन-स्तरीय प्रणाली लागू की जाएगी। किसी भी भुगतान को जारी करने से पहले इन तीनों स्तरों से स्वीकृति आवश्यक होगी। यदि स्वीकृत बजट से अधिक राशि खर्च करनी होगी तो उसके लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति लेना अनिवार्य होगा। साथ ही आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए कंटिंजेंसी फंड बनाने का भी प्रावधान किया गया है। 90 से 365 दिनों में लागू होगी नई व्यवस्था अध्यादेश लागू होने के बाद सभी विश्वविद्यालयों को 90 से 365 दिनों के भीतर अपने पुराने बैंक खातों और उनमें उपलब्ध राशि को सिंगल नोडल अकाउंट में स्थानांतरित करना होगा। इसके बाद सभी अनुदान, योजनागत राशि और विशेष उद्देश्य के लिए मिलने वाले फंड का उपयोग केवल निर्धारित कार्यों के लिए ही किया जा सकेगा। किसी अन्य मद में राशि खर्च करने की अनुमति नहीं होगी। समय पर वेतन और वित्तीय पारदर्शिता पर जोर नई व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ शिक्षकों और कर्मचारियों को मिलेगा। सरकार का लक्ष्य है कि सभी विश्वविद्यालयों में प्रत्येक माह की तीन तारीख तक वेतन का भुगतान सुनिश्चित किया जाए। इसके अलावा वर्षों से लंबित वित्तीय गड़बड़ियों और ऑडिट आपत्तियों को भी दूर किया जा सकेगा। वर्तमान में कई विश्वविद्यालयों में दर्जनों बैंक खाते संचालित हैं, जिनमें से कई वर्षों से निष्क्रिय पड़े हैं। कुछ मामलों में बड़ी राशि का समायोजन भी लंबित है, जिससे नियमित रूप से ऑडिट में आपत्तियां उठती रही हैं। सरकार का मानना है कि सिंगल नोडल अकाउंट और डिजिटल वित्तीय प्रणाली लागू होने से राज्य के विश्वविद्यालयों में पारदर्शिता, जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन मजबूत होगा। साथ ही सरकारी अनुदानों के उपयोग की निगरानी भी पहले से अधिक प्रभावी और आसान हो जाएगी।
रांची। झारखंड में 30 जून से शुरू होने जा रहे विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) अभियान को लेकर शिक्षक संगठनों और सरकार के बीच विवाद गहरा गया है। अभियान के तहत बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करेंगे। इस कार्य में बड़ी संख्या में शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति किए जाने पर झारखंड माध्यमिक शिक्षक संघ ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। संघ का कहना है कि पहले से ही शिक्षकों की कमी से जूझ रहे सरकारी विद्यालयों में इस फैसले से छात्रों की पढ़ाई पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। शिक्षक संघ ने सरकार से की पुनर्विचार की मांग संघ के प्रदेश महासचिव गंगा प्रसाद यादव ने कहा कि शिक्षकों का मूल दायित्व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है, लेकिन उन्हें लगातार चुनाव, जनगणना और मतदाता पुनरीक्षण जैसे गैर शैक्षणिक कार्यों में लगाया जा रहा है। इससे विशेष रूप से 10वीं और 12वीं के विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि SIR अभियान में शिक्षकों की ड्यूटी लगाने के निर्णय पर पुनर्विचार किया जाए। जिला सचिव संजय यादव ने भी कहा कि जनगणना के बाद अब मतदाता पुनरीक्षण की जिम्मेदारी मिलने से विद्यालयों में नियमित कक्षाएं प्रभावित होंगी और इसका सीधा नुकसान विद्यार्थियों को उठाना पड़ेगा। अधिकारियों ने बताया जरूरी अभियान चुनाव से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। राज्य के करीब 24,520 मतदान केंद्रों पर अभियान सफल बनाने के लिए पर्याप्त मानव संसाधन की आवश्यकता है। जानकारी के अनुसार, लगभग 50 हजार बीएलओ में 7,500 शिक्षक पहले से कार्यरत हैं और आवश्यकता पड़ने पर 25 हजार से अधिक शिक्षकों की सेवाएं ली जा सकती हैं। अधिकारियों का दावा है कि जिन स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, वहां पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए आवश्यक व्यवस्था की जाएगी। 7 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने तक चलने वाले इस अभियान के बीच शिक्षा और चुनावी जिम्मेदारियों के संतुलन को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि सरकार शिक्षक संगठनों की मांगों पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था करती है या अपने मौजूदा फैसले पर कायम रहती है।
एडमिशन-रजिस्टर से लेकर साफ-सफाई तक प्रभावित, करीब एक लाख बच्चों की पढ़ाई पर पड़ेगा असर हजारीबाग: झारखंड के हजारीबाग जिले में सरकारी स्कूलों की हालत नए शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही चिंताजनक हो गई है। जिले के 1457 प्रारंभिक विद्यालयों को अब तक विद्यालय विकास कोष की राशि नहीं मिल पाई है, जिससे स्कूलों की बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो पा रही हैं। नए सत्र से पहले बढ़ी परेशानी राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में 1 अप्रैल 2026 से नया सत्र शुरू होना है, लेकिन मार्च खत्म होने को है और अब तक फंड जारी नहीं किया गया है। आमतौर पर हर साल झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद द्वारा मार्च की शुरुआत में ही यह राशि उपलब्ध करा दी जाती है, ताकि स्कूल समय रहते तैयारी पूरी कर सकें। इस बार देरी से स्कूल प्रबंधन और शिक्षक दोनों चिंतित हैं। एडमिशन और अटेंडेंस रजिस्टर की कमी फंड नहीं मिलने का सबसे बड़ा असर एडमिशन प्रक्रिया पर पड़ रहा है। स्कूलों में नामांकन और छात्रों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए जरूरी रजिस्टर तक उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा चॉक, डस्टर जैसी सामान्य शैक्षणिक सामग्री भी स्कूलों में नहीं पहुंच पाई है। कई शिक्षक अपने स्तर पर व्यवस्था कर किसी तरह पढ़ाई जारी रखने की कोशिश कर रहे हैं। एक लाख छात्रों की पढ़ाई पर असर इस वित्तीय संकट का सीधा प्रभाव जिले के करीब एक लाख छात्रों पर पड़ रहा है। बुनियादी संसाधनों की कमी के कारण पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। शिक्षकों का कहना है कि यदि जल्द फंड नहीं मिला तो सत्र की शुरुआत अव्यवस्थित तरीके से होगी। स्वच्छता और पेयजल व्यवस्था भी प्रभावित विद्यालय विकास कोष का एक हिस्सा साफ-सफाई और स्वच्छता पर खर्च किया जाता है, लेकिन फंड के अभाव में स्कूलों में सफाई व्यवस्था चरमरा गई है। शौचालयों की नियमित सफाई नहीं हो पा रही है और पेयजल की देखरेख भी प्रभावित हो रही है, जिससे बच्चों के स्वास्थ्य पर खतरा बढ़ गया है। छात्रों की संख्या के आधार पर मिलती है राशि सरकारी प्रावधान के अनुसार, स्कूलों को छात्रों की संख्या के आधार पर फंड दिया जाता है- 100 तक छात्र: 25 हजार रुपये 101 से 200 छात्र: 50 हजार रुपये 201 से 300 छात्र: 75 हजार रुपये यह राशि विद्यालय प्रबंधन समिति (एसएमसी) के खाते में भेजी जाती है, जहां से स्कूल के विकास कार्यों में इसका उपयोग किया जाता है। विभाग की चुप्पी से बढ़े सवाल फंड जारी करने में हो रही देरी को लेकर शिक्षा विभाग की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। जमीनी स्तर पर समस्याएं बढ़ती जा रही हैं, लेकिन समाधान की दिशा में कोई ठोस पहल नजर नहीं आ रही है। क्या बोले अधिकारी जिला शिक्षा पदाधिकारी प्रवीण रंजन ने बताया कि माध्यमिक स्कूलों को फंड मिल चुका है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि प्रारंभिक विद्यालयों के लिए भी जल्द ही राशि जारी कर दी जाएगी, जिससे स्कूलों में जरूरी व्यवस्थाएं बहाल हो सकें।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।