पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले सियासी माहौल गरमा गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के एक प्रतिनिधिमंडल ने Election Commission of India से मुलाकात कर राज्य में चुनावी माहौल को लेकर गंभीर शिकायत दर्ज कराई है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि मतदाताओं को डराकर चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। क्या है पूरा मामला? बीजेपी प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग को सौंपी याचिका में दावा किया कि राज्य के कई इलाकों में मतदाताओं को घर-घर जाकर धमकाया जा रहा है। इस मुलाकात के बाद केंद्रीय मंत्री Kiren Rijiju ने कहा कि: लोगों को बीजेपी को वोट न देने के लिए दबाव डाला जा रहा है चुनाव प्रक्रिया को “हाईजैक” करने की कोशिश हो रही है मतदाताओं को डराकर और दबाकर प्रभावित किया जा रहा है ममता सरकार पर सीधे आरोप रिजिजू ने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और उनकी पार्टी All India Trinamool Congress (TMC) पर निशाना साधते हुए कहा कि: पार्टी कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को धमका रहे हैं पिछले चुनावों में भी इसी तरह के तरीके अपनाए गए राज्य का पुलिस और प्रशासन TMC के प्रभाव में काम कर रहा है चुनाव आयोग का जवाब चुनाव आयोग ने बीजेपी प्रतिनिधिमंडल की शिकायतों को गंभीरता से सुनने के बाद आश्वासन दिया कि: राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित किए जाएंगे सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे कब होंगे चुनाव? पश्चिम बंगाल की 294 सीटों पर: मतदान: 23 अप्रैल और 29 अप्रैल मतगणना: 4 मई इस बीच, राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज होते जा रहे हैं, जिससे चुनावी माहौल और अधिक संवेदनशील बनता दिख रहा है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में आई तकनीकी गड़बड़ी को लेकर चुनाव आयोग (EC) ने सफाई दी है। आयोग ने बुधवार को स्वीकार किया कि डिस्प्ले एरर के कारण कई मतदाताओं का नाम “जांच के दायरे में” दिख रहा था, जबकि वे पहले से ही फाइनल वोटर लिस्ट में शामिल थे। क्या थी गड़बड़ी? मंगलवार शाम को जब लोगों ने EPIC नंबर के जरिए अपना वोटर स्टेटस चेक किया, तो: उनके नाम के आगे “जांच के दायरे में” दिख रहा था यह समस्या उन वोटरों के साथ भी हुई, जिनका नाम पहले से फाइनल लिस्ट में था 2 घंटे में ठीक हुई समस्या चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक: यह पूरी तरह तकनीकी (टेक्निकल) गड़बड़ी थी टेक्निकल टीम ने करीब 2 घंटे में इसे ठीक कर दिया फिलहाल आयोग इस मामले की जांच कर रहा है TMC ने उठाए सवाल इस गड़बड़ी पर सत्ताधारी पार्टी TMC (तृणमूल कांग्रेस) ने सवाल उठाए: पार्टी ने कहा कि इससे ऐसा लग रहा था जैसे सभी वोटरों पर शक किया जा रहा है हालांकि, चुनाव आयोग ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह सिर्फ एक डिस्प्ले एरर था, किसी भी तरह की जांच या कार्रवाई से इसका कोई संबंध नहीं है। क्या है स्थिति अब? तकनीकी समस्या को ठीक कर दिया गया है वोटर स्टेटस अब सामान्य रूप से दिख रहा है आयोग मामले की विस्तृत जांच कर रहा है
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर चुनाव आयोग (ECI) पूरी तरह एक्शन मोड में आ गया है। आयोग ने साफ कर दिया है कि इस बार चुनाव “हिंसा-मुक्त” और “भय-मुक्त” माहौल में कराए जाएंगे। सोमवार को निर्वाचन आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों ने राज्य के सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों (DM/DEO), पुलिस अधीक्षकों (SP) और पुलिस आयुक्तों (CP) के साथ हाई-लेवल ऑनलाइन समीक्षा बैठक की। CEC का साफ संदेश: डर और प्रलोभन की कोई जगह नहीं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दोहराया कि आयोग का लक्ष्य है कि हर मतदाता बिना किसी डर के मतदान कर सके। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि संवेदनशील इलाकों में विशेष सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। बैठक में दिए गए अहम निर्देश चुनाव आयोग ने अधिकारियों को कई सख्त निर्देश दिए- संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान: जहां मतदाताओं को डराया-धमकाया जा सकता है खर्च पर नजर: काले धन और अवैध शराब के इस्तेमाल पर रोक आचार संहिता (MCC): सख्ती से पालन सुनिश्चित करना EVM सुरक्षा: मशीनों के सुरक्षित संचालन और रखरखाव पर फोकस ट्रेनिंग: राष्ट्रीय मास्टर ट्रेनर्स द्वारा अधिकारियों को विशेष प्रशिक्षण 25 मार्च को होगी ROs की विशेष ट्रेनिंग चुनाव तैयारियों के अगले चरण में 25 मार्च 2026 को सभी रिटर्निंग ऑफिसर्स (ROs) के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसका उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया और कानूनी पहलुओं को और मजबूत बनाना है। मतदान केंद्रों पर सुविधाओं का ध्यान चुनाव आयोग ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि सभी बूथों पर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों- पेयजल बिजली रैंप (दिव्यांग और बुजुर्गों के लिए)
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले आज का दिन राज्य के करीब 27.2 लाख मतदाताओं के लिए बेहद अहम है। ये वे लोग हैं, जिनका नाम ‘अंडर एडजुडिकेशन’ श्रेणी में रखा गया था और जिनका मतदान अधिकार अब चुनाव आयोग की पहली सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट के जरिए तय होगा। दरअसल, ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न’ (SIR) के दौरान राज्य के लगभग 60 लाख मतदाताओं को इस श्रेणी में रखा गया था। यानी इन मतदाताओं के दस्तावेज़ों और पात्रता पर अंतिम निर्णय अभी लंबित था। अब जारी होने वाली पहली सप्लीमेंट्री लिस्ट से इनमें से करीब आधे लोगों की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कि वे आगामी चुनाव में वोट डाल सकेंगे या नहीं। 8.6% वोटरों का भविष्य अधर में 28 फरवरी को जारी अंतिम मतदाता सूची में राज्य के करीब 7 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 8.6% यानी 60 लाख लोगों की स्थिति स्पष्ट नहीं थी। यही वजह है कि लाखों परिवारों में असमंजस और चिंता का माहौल है। चुनाव आयोग के अधिकारियों के अनुसार, जिन मतदाताओं के दस्तावेज़ों में विसंगतियां पाई गईं या सुनवाई के दौरान संतोषजनक प्रमाण नहीं दिए गए, उन्हें ‘अंडर एडजुडिकेशन’ में रखा गया। तीन चरणों में आएगी सप्लीमेंट्री लिस्ट पहली सूची: 23 मार्च दूसरी सूची: अगले शुक्रवार तीसरी सूची: 3 अप्रैल पहली सूची जारी होने के बाद 27.2 लाख लोगों को अपने मतदान अधिकार की स्थिति का पता चल जाएगा, जबकि बाकी लोगों को अभी और इंतजार करना होगा। नाम नहीं आया तो क्या विकल्प? यदि किसी मतदाता का नाम सप्लीमेंट्री सूची में शामिल नहीं होता है, तो उसके पास अपील का विकल्प मौजूद रहेगा। वे: ECINET ऐप के माध्यम से ऑनलाइन अपील कर सकते हैं जिला मजिस्ट्रेट या उप-विभागीय अधिकारी के समक्ष आवेदन दे सकते हैं इसके लिए चुनाव आयोग ने 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल का गठन किया है। जमीनी स्तर पर बेचैनी और उम्मीद भवानीपुर की शिखा दास, जो पिछले चार दशकों से मतदान करती आ रही हैं, इस बार अपने नाम को लेकर अनिश्चितता में हैं। उनके परिवार के अन्य सदस्यों के नाम सूची में हैं, लेकिन उनका नाम रोका गया है। वहीं अलीपुर के सौरव चक्रवर्ती और कैनिंग के अकरमुल हक सरदार जैसे कई मतदाता अपने दस्तावेजों के आधार पर आश्वस्त हैं, लेकिन अंतिम सूची का इंतजार उन्हें बेचैन कर रहा है। प्रशासन अलर्ट मोड में राज्य सरकार ने सभी जिला मजिस्ट्रेटों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए हैं, ताकि सूची जारी होने के बाद किसी भी तरह की अव्यवस्था न हो।
कोलकाता: Election Commission of India ने पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। चुनाव की तारीखों के ऐलान के कुछ ही घंटों बाद आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती और गृह विभाग के शीर्ष अधिकारी को उनके पद से हटा दिया। आयोग ने नंदिनी चक्रवर्ती की जगह दुष्यंत नरियाला को राज्य का नया मुख्य सचिव नियुक्त किया है। वहीं संघमित्रा घोष को गृह एवं पर्वतीय मामलों के विभाग का नया प्रधान सचिव बनाया गया है। चुनाव आयोग के आदेश के मुताबिक ये नियुक्तियां तत्काल प्रभाव से लागू होंगी। निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की कोशिश चुनाव आयोग का कहना है कि यह फैसला निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है। चुनावी माहौल के बीच प्रशासनिक स्तर पर इस तरह का फेरबदल राज्य की राजनीतिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकता है। चुनावी प्रचार में प्रमुख मुद्दे बंगाल में इस बार चुनाव प्रचार कई बड़े मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है। इनमें सबसे प्रमुख है ‘बंगाली अस्मिता’ का सवाल। सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा पर लगातार बंगाली पहचान पर हमले का आरोप लगाती रही हैं। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के नेता अवैध घुसपैठ और कानून-व्यवस्था के मुद्दों को चुनावी एजेंडे में प्रमुखता से उठा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल की रैलियों में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है। मतुआ समुदाय और वोट बैंक की राजनीति राज्य की लगभग 50 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखने वाला मतुआ समुदाय भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में इस समुदाय के समर्थन से भाजपा को कई सीटों पर फायदा मिला था, जबकि तृणमूल कांग्रेस भी इस वोट बैंक को साधने की कोशिश में जुटी है। मतदाता सूची में बड़े बदलाव चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद लगभग 63.66 लाख नाम हटाए जाने की खबर ने भी राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है। इससे राज्य के कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 7.66 करोड़ से घटकर करीब 7.04 करोड़ रह गई है। विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता सूची में हुए इन बदलावों से कई क्षेत्रों में चुनावी समीकरण बदल सकते हैं, जिससे राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति नए सिरे से बनानी पड़ रही है।
पश्चिम बंगाल में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से जुड़े मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सख्त रुख देखने को मिला। सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant याचिकाकर्ताओं पर काफी नाराज़ दिखाई दिए और न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाने को लेकर कड़ी चेतावनी दी। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है, जिनमें पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए हैं। ‘न्यायिक अधिकारियों पर सवाल बर्दाश्त नहीं’ सुनवाई के दौरान Justice Surya Kant ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाकर “हद पार कर दी है”। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि इस तरह की याचिकाएं न्यायिक व्यवस्था पर अविश्वास का संदेश देती हैं और अदालत इसे किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं करेगी। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा, “याचिकाकर्ता ऐसी अर्जी दाखिल करने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं? न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” उन्होंने यह भी कहा कि अदालत इस तरह की टिप्पणियों को गंभीरता से लेती है और इस संबंध में कड़ी चेतावनी जारी की जा रही है। ‘सिस्टम पर भरोसे की कमी का गलत संदेश’ सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत लगभग 52 लाख लोगों के मामलों की जांच की जा रही है, जिनमें से करीब 10 लाख मामलों का काम पूरा हो चुका है। इस पर Justice Surya Kant ने कहा कि समय से पहले याचिका दायर करना यह संकेत देता है कि याचिकाकर्ताओं को व्यवस्था पर भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रक्रिया को पूरा होने का समय दिया जाना चाहिए। वैध मतदाता शामिल होंगे, अवैध नाम हटेंगे अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन लोगों का मतदान का अधिकार वैध है, उन्हें मतदाता सूची में शामिल किया जाएगा, जबकि अवैध रूप से जोड़े गए नामों को हटाया जाएगा। सीजेआई ने कहा, “जो लोग वास्तविक और वैध मतदाता हैं, उन्हें शामिल किया जाएगा और जो घुसपैठिए हैं, उन्हें बाहर किया जाएगा।” सुप्रीम कोर्ट के निर्देश सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने Election Commission of India और राज्य सरकार को प्रक्रिया सुचारू रूप से चलाने के लिए कई निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि: पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और व्यवस्थित तरीके से पूरा किया जाए। पोर्टल से जुड़ी तकनीकी दिक्कतों को तुरंत दूर किया जाए। अधिकारियों के लिए आवश्यक लॉग-इन आईडी और तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। न्यायिक अधिकारियों को काम करने के लिए सभी जरूरी संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। अपील की सुनवाई कौन करेगा अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल करने का दावा खारिज हो जाता है, तो उसके खिलाफ किसी प्रशासनिक निकाय के पास अपील नहीं होगी। ऐसे मामलों में संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दो पूर्व या वर्तमान हाईकोर्ट जजों की एक विशेष पीठ गठित कर सकते हैं, जो इन अपीलों की सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि इस अपीलीय व्यवस्था से जुड़ी जानकारी आधिकारिक अधिसूचना जारी कर सार्वजनिक की जाए। इस पूरे घटनाक्रम के बाद बंगाल की SIR प्रक्रिया से जुड़ा मामला एक बार फिर न्यायिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।
नई दिल्ली: देश में 2026 Rajya Sabha Elections को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। चुनाव आयोग ने 10 राज्यों की 37 सीटों पर चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया है। इन सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त हो रहा है। इन राज्यों में Maharashtra, Tamil Nadu, West Bengal, Bihar, Assam, Odisha, Telangana, Chhattisgarh, Haryana और Himachal Pradesh शामिल हैं। चुनाव आयोग के अनुसार नामांकन की अंतिम तारीख 5 मार्च और नाम वापसी की अंतिम तिथि 9 मार्च थी। मतदान 16 मार्च को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक होगा और उसी दिन शाम 5 बजे मतगणना की जाएगी। कई राज्यों में दिग्गजों का निर्विरोध चुना जाना तय कई राज्यों में राजनीतिक समीकरण पहले से तय होने के कारण कई बड़े नेताओं के निर्विरोध राज्यसभा पहुंचने की संभावना है। बिहार: बिहार की पांच सीटों में से चार पर NDA की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। मुख्यमंत्री Nitish Kumar और भाजपा नेता Nitin Naveen का राज्यसभा जाना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि पांचवीं सीट पर Rashtriya Janata Dal ने A. D. Singh को मैदान में उतारकर मुकाबला दिलचस्प बना दिया है। महाराष्ट्र: महाराष्ट्र की 7 सीटों में से कई सीटों पर बड़े नेताओं का निर्विरोध चुना जाना तय माना जा रहा है। इनमें Sharad Pawar, Ramdas Athawale और भाजपा के Vinod Tawde के नाम प्रमुख हैं। असम: असम की तीन सीटों पर NDA की स्थिति मजबूत बताई जा रही है। यहां Jogen Mohan, Terash Gowalla और Pramod Boro के निर्विरोध चुने जाने की संभावना जताई जा रही है। तमिलनाडु: तमिलनाडु में छह उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने की संभावना है। इनमें Tiruchi Siva (DMK) और M. Thambidurai (AIADMK) शामिल हैं। छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा को एक-एक सीट मिलने की संभावना है। कांग्रेस ने Phulo Devi Netam को उम्मीदवार बनाया है, जबकि भाजपा ने Laxmi Verma को मैदान में उतारा है। जहां मुकाबला दिलचस्प कुछ राज्यों में मुकाबला काफी रोचक बना हुआ है। बिहार: बिहार में पांचवीं सीट पर मुकाबला कड़ा माना जा रहा है। आरजेडी के उम्मीदवार ए.डी. सिंह के मैदान में उतरने से NDA को अतिरिक्त समर्थन जुटाने की जरूरत पड़ सकती है। ओडिशा: ओडिशा में चार सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बन गई है। कांग्रेस ने Biju Janata Dal का समर्थन किया है, जबकि भाजपा ने निर्दलीय नेता Dilip Ray को समर्थन दिया है। हरियाणा: हरियाणा की दो सीटों पर चुनाव होना है। भाजपा ने एक उम्मीदवार उतारा है, जबकि दूसरी सीट पर कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के बीच मुकाबला होने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के राज्यसभा चुनाव केंद्र और राज्यों के राजनीतिक समीकरणों पर असर डाल सकते हैं। कई जगह NDA की स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है, जबकि विपक्ष भी जहां मौका मिल रहा है, वहां कड़ी टक्कर देने की तैयारी में है। बिहार, ओडिशा और हरियाणा जैसे राज्यों में चुनावी रोमांच सबसे ज्यादा देखने को मिल सकता है।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर चल रहे विवाद के बीच Supreme Court of India ने एक नई याचिका पर सुनवाई करने की सहमति दे दी है। यह मामला स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान कुछ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने से जुड़ा है। याचिका में दावा किया गया है कि कई ऐसे लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए हैं जो पहले चुनावों में वोट डाल चुके हैं, लेकिन अब उनके दस्तावेजों को स्वीकार नहीं किया जा रहा है। मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील Menaka Guruswamy ने अदालत से कहा कि कई मतदाताओं के पास वैध दस्तावेज मौजूद हैं, इसके बावजूद Election Commission of India ने उन्हें स्वीकार नहीं किया और उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। उन्होंने अदालत से इस मामले की जल्द सुनवाई की मांग की। इस पर सुनवाई कर रहे मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की पीठ ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट सीधे तौर पर न्यायिक अधिकारियों के फैसलों पर अपील की तरह नहीं बैठ सकता। हालांकि वकील ने दलील दी कि कानून की धारा 23 और 24 के तहत अपील का प्रावधान मौजूद है और इस मामले को मुख्य याचिका के साथ जोड़ा जा सकता है। अदालत ने इस दलील पर विचार करते हुए कहा कि इस याचिका पर मंगलवार को मुख्य मामले के साथ सुनवाई की जाएगी। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।