पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री और भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने छात्र आंदोलन को लेकर विपक्ष और प्रदर्शनकारियों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत को बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसी स्थिति में धकेलने की कोशिश की जा रही है। साथ ही दावा किया कि प्रदर्शनकारियों के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है। हालांकि, उन्होंने कहा कि ऐसी कोशिशें पहले भी नाकाम रही हैं और इस बार भी सफल नहीं होंगी। 'भारत को बांग्लादेश बनाने की कोशिश हो रही है' कोलकाता में मीडिया से बातचीत के दौरान दिलीप घोष ने कहा कि कुछ लोग भारत में वैसा ही माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जैसा पहले बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका में जन आंदोलनों के दौरान देखने को मिला था। उन्होंने दावा किया कि इन प्रयासों का उद्देश्य देश में अस्थिरता पैदा करना है, लेकिन ऐसी कोशिशें सफल नहीं होंगी। 'प्रदर्शनकारी विदेशी ताकतों की कठपुतली' दिलीप घोष ने आरोप लगाया कि आंदोलन में शामिल कुछ लोग विदेशी ताकतों के इशारे पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शुरुआत में आंदोलन से जुड़े कई लोगों को भी अब एहसास हो गया है कि उन्हें केवल मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। उनके अनुसार, कुछ पेशेवर समूह माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। संसद सत्र को बताया आसान निशाना उन्होंने कहा कि संसद सत्र के दौरान विरोध प्रदर्शन करना इसलिए आसान होता है, क्योंकि उस समय बड़ी संख्या में मीडिया मौजूद रहती है। घोष के मुताबिक, प्रदर्शनकारी इसी का फायदा उठाकर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। 'मोदी सरकार सही समय पर फैसला लेगी' दिलीप घोष ने कहा कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और गृह मंत्री अमित शाह हालात पर नजर रखे हुए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार उचित समय पर उचित निर्णय लेगी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार कोई कड़ा कदम उठाती है, तो विपक्ष उसे राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश करेगा। किसान आंदोलन का दिया उदाहरण दिलीप घोष ने अपने बयान में किसान आंदोलन का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जिस तरह पहले हुए आंदोलनों से विपक्ष को अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, उसी तरह वर्तमान छात्र आंदोलन भी सफल नहीं होगा। उनके अनुसार, जनता का व्यापक समर्थन आंदोलन के साथ नहीं है और विपक्ष चुनाव में हारने के बाद ऐसे आंदोलनों के जरिए राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने CJP के 'चलो संसद' मार्च के दौरान कथित विदेशी फंडिंग और हिंसा के आरोपों से जुड़ी जनहित याचिका (PIL) पर तत्काल सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदर्शन में विदेशी फंडिंग पाने वाले संगठनों और राजनीतिक तत्वों की घुसपैठ हुई, जिससे आंदोलन हिंसक हो गया। अदालत इस मामले पर 24 जुलाई (शुक्रवार) को सुनवाई करेगी। याचिका में क्या-क्या आरोप लगाए गए? याचिका में कहा गया है कि CJP के 'चलो संसद' मार्च के दौरान कुछ ऐसे संगठन सक्रिय थे, जिन्हें कथित तौर पर विदेशी फंडिंग मिलती है। आरोप है कि इन तत्वों ने शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन को हिंसक रूप देने की कोशिश की। याचिकाकर्ता ने पूरे मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) से कराने की मांग की है। याचिका में यह भी दावा किया गया है कि प्रदर्शन के दौरान सरकारी और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया, पत्रकारों के साथ मारपीट हुई, आम लोगों की आवाजाही प्रभावित हुई और संसद की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश की गई। इसमें कई पुलिसकर्मियों के घायल होने का भी उल्लेख किया गया है। पहले लाठीचार्ज वाली याचिका पर क्या हुआ था? इससे पहले छात्रों पर कथित लाठीचार्ज के खिलाफ दायर याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया था। अदालत ने कहा था कि हर मामले में कोर्ट को बीच में नहीं लाया जाना चाहिए, हालांकि याचिका को अगले दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया गया था। 22 जुलाई की सुनवाई में कोर्ट के निर्देश 22 जुलाई को सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। अदालत ने यह भी कहा था कि प्रदर्शन से जुड़े CCTV फुटेज और पुलिस बॉडी कैमरा रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखी जाए, ताकि जांच के दौरान उनका इस्तेमाल किया जा सके। इस मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को निर्धारित की गई है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act - FCRA) के तहत नए संशोधित नियम 2026 जारी किए हैं। इन नियमों का उद्देश्य विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले संगठनों के कामकाज में पारदर्शिता, जवाबदेही और निगरानी को मजबूत करना बताया गया है। सरकार ने पहली बार धार्मिक गतिविधियों की स्पष्ट परिभाषा तय करते हुए उनके दायरे को भी विस्तृत रूप से निर्धारित किया है। धार्मिक गतिविधियों की स्पष्ट परिभाषा तय नए नियमों के अनुसार मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, मठ, सिनेगॉग और अन्य धार्मिक स्थलों के निर्माण, मरम्मत, नवीनीकरण और रखरखाव को धार्मिक उद्देश्य के तहत मान्यता दी गई है। इसके साथ ही धार्मिक ग्रंथों का संरक्षण, अनुवाद, प्रकाशन और डिजिटलीकरण, धार्मिक दर्शन और संस्कृति से जुड़े अध्ययन संस्थान, धर्मशालाओं, लंगरों, अन्नदान और सामुदायिक रसोई का संचालन तथा तीर्थयात्रियों के लिए पेयजल, शौचालय और आश्रय जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने को भी वैध धार्मिक गतिविधियों में शामिल किया गया है। धर्मांतरण गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी प्रकार की धर्मांतरण (प्रोसिलिटाइजेशन) गतिविधि को धार्मिक उद्देश्य नहीं माना जाएगा। इसके तहत धर्मांतरण से जुड़े कार्यक्रम या किसी भी प्रकार का ऐसा प्रचार-प्रसार जो धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देता है, उसे अनुमति नहीं दी जाएगी। धार्मिक शिक्षा, प्रवचन, सत्संग, ध्यान शिविर, भजन-कीर्तन और पारंपरिक आस्था प्रणालियों के संरक्षण को अनुमति दी गई है। विदेशी फंडिंग उपयोग पर सख्त शर्तें नए नियमों के तहत किसी भी संस्था को अगली किस्त तभी मिलेगी जब वह पहले प्राप्त विदेशी फंड का कम से कम 75 प्रतिशत उपयोग कर चुकी हो। इसके साथ ही सभी संस्थाओं को अपने सोशल मीडिया अकाउंट, वेबसाइट और प्रकाशनों की जानकारी देना अनिवार्य किया गया है। सभी FCRA पंजीकृत संगठनों को अपनी गतिविधियों और कार्यों का वार्षिक अपडेट भी केंद्र सरकार को देना होगा। “की फंक्शनरी” की नई परिभाषा लागू संशोधित नियमों में “की फंक्शनरी” की नई परिभाषा जोड़ी गई है, जिसके तहत ट्रस्टी, निदेशक, साझेदार, पदाधिकारी, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के प्रतिनिधि और संस्था के संचालन से जुड़े अन्य जिम्मेदार व्यक्ति शामिल होंगे। इससे संस्थाओं की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किया जाएगा। विदेशी नागरिकों से जुड़े संगठनों पर कड़ी शर्त सरकार के अनुसार यदि किसी धार्मिक संस्था में विदेशी नागरिक प्रमुख पद पर है, तो उसे सामान्य परिस्थितियों में FCRA पंजीकरण नहीं मिलेगा, जब तक कि सरकार से विशेष अनुमति प्राप्त न हो। सरकार का उद्देश्य गृह मंत्रालय ने कहा है कि इन संशोधनों का उद्देश्य विदेशी फंडिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और सुव्यवस्थित बनाना है, ताकि इसका उपयोग केवल निर्धारित धार्मिक और सामाजिक उद्देश्यों के लिए ही हो सके।
नागपुर स्थित Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) मुख्यालय और हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर की कथित रेकी मामले में सुनवाई के दौरान कई अहम खुलासे हुए हैं। विशेष सत्र न्यायालय में पेश गवाही के अनुसार आरोपी रईस अहमद शेख को इस कथित साजिश के लिए विदेशी फंडिंग मिली थी और उसकी फ्लाइट टिकट अमेरिकी डॉलर में बुक कराई गई थी। मामले में यह जानकारी IndiGo एयरलाइंस की तत्कालीन एयरपोर्ट मैनेजर चारू वर्मा की गवाही के दौरान सामने आई। डॉलर में बुक हुआ था फ्लाइट टिकट अदालत में दी गई गवाही के मुताबिक, आरोपी रईस शेख की यात्रा के लिए इंडिगो फ्लाइट का भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया गया था। इसके लिए “वर्डपे कार्ड” का इस्तेमाल हुआ था। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह विदेशी फंडिंग से जुड़े संभावित नेटवर्क की ओर इशारा करता है। सरकारी पक्ष का दावा है कि रईस शेख एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन का सक्रिय सदस्य है और संगठन के निर्देश पर ही नागपुर पहुंचा था। श्रीनगर से मुंबई होते हुए पहुंचा नागपुर जांच के अनुसार, रईस शेख 13 जुलाई 2021 को श्रीनगर से मुंबई होते हुए नागपुर पहुंचा था। वहां उसने RSS मुख्यालय और हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर की कथित रेकी की। इसके बाद वह 15 जुलाई 2021 को नागपुर से दिल्ली होते हुए वापस श्रीनगर लौट गया था। कश्मीर पुलिस की पूछताछ में हुआ खुलासा सितंबर 2021 में कश्मीर पुलिस ने संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर रईस शेख को हिरासत में लेकर पूछताछ की थी। अधिकारियों के मुताबिक, पूछताछ के दौरान उसने नागपुर में रेकी करने की बात कबूल की, जिसके बाद पूरी साजिश का खुलासा हुआ। मामले की जानकारी सामने आने के बाद Maharashtra Anti Terrorism Squad (ATS) ने उसे कश्मीर से गिरफ्तार कर ट्रांजिट रिमांड पर नागपुर लाया था। जमानत याचिकाएं बार-बार खारिज फिलहाल आरोपी नागपुर सेंट्रल जेल में बंद है। सुनवाई के दौरान उसकी पेशी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कराई गई। रईस शेख ने कई बार जमानत की मांग की, लेकिन अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए उसकी सभी जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। जांच एजेंसियों के पास ‘पुख्ता सबूत’ सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि जांच एजेंसियों के पास आरोपी के आतंकवादी संगठन से संबंधों और कथित गतिविधियों से जुड़े ठोस सबूत मौजूद हैं। मामले की जांच अभी भी जारी है और सुरक्षा एजेंसियां विदेशी फंडिंग नेटवर्क समेत कई पहलुओं की जांच कर रही हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।