नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने स्कूल शिक्षा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और कंप्यूटेशनल थिंकिंग (CT) को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। बोर्ड ने नए शैक्षणिक सत्र के तहत AI आधारित मॉड्यूल और स्किल एजुकेशन के विस्तार पर जोर देते हुए स्कूलों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसका उद्देश्य छात्रों को भविष्य की तकनीकों और डिजिटल कौशल के लिए तैयार करना है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कंप्यूटेशनल थिंकिंग पर विशेष फोकस CBSE ने कक्षा 3 से 8 तक के लिए नया कंप्यूटेशनल थिंकिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पाठ्यक्रम लागू किया है। वहीं माध्यमिक स्तर पर भी AI और कंप्यूटेशनल थिंकिंग को मॉड्यूल के रूप में शामिल किया जा रहा है, ताकि छात्रों में तार्किक सोच, समस्या समाधान और डिजिटल साक्षरता विकसित हो सके। शिक्षकों को भी मिलेगा विशेष प्रशिक्षण बोर्ड ने 2026-27 सत्र के लिए शिक्षकों के प्रशिक्षण का मुख्य विषय "Computational Thinking and Understanding Artificial Intelligence" तय किया है। इसके तहत देशभर में कार्यशालाएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिससे शिक्षक AI आधारित शिक्षण पद्धतियों को कक्षा में प्रभावी ढंग से लागू कर सकें। स्किल एजुकेशन को मिलेगा बढ़ावा CBSE ने स्किल एजुकेशन के तहत कई नए तकनीकी और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को भी बढ़ावा दिया है। इनमें Generative AI, Python, Internet of Things (IoT), 3D Printing, VLSI, DevSecOps जैसे आधुनिक विषय शामिल हैं, ताकि छात्र नई तकनीकों से जुड़ सकें। NEP 2020 के अनुरूप पहल बोर्ड के अनुसार यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और NCFSE 2023 के अनुरूप है। इसका उद्देश्य छात्रों में नवाचार, रचनात्मक सोच, तकनीकी समझ और AI के जिम्मेदार उपयोग की क्षमता विकसित करना है, जिससे वे भविष्य की चुनौतियों के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकें।
मुंबई, एजेंसियां। देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए AI और मशीन लर्निंग (ML) से जुड़े नए ड्राफ्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनका उद्देश्य डिजिटल बैंकिंग को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। AI मॉडल पर होगी सख्त निगरानी प्रस्तावित नियमों के अनुसार, हर बैंक को AI और ML मॉडल के उपयोग के लिए एक मजबूत रिस्क मैनेजमेंट फ्रेमवर्क तैयार करना होगा। इस फ्रेमवर्क को बैंक के बोर्ड से मंजूरी लेनी होगी और समय-समय पर इसकी समीक्षा भी करनी होगी। ग्राहक से जुड़े फैसलों में जरूरी होगी मानवीय निगरानी RBI ने स्पष्ट किया है कि यदि AI किसी ग्राहक से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेता है, जैसे लोन मंजूरी या जोखिम मूल्यांकन, तो उस प्रक्रिया में मानवीय निगरानी भी अनिवार्य होगी। केवल AI के आधार पर अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सकेगा। जनरेटिव AI के लिए अतिरिक्त सुरक्षा ड्राफ्ट में कहा गया है कि ग्राहक से सीधे संवाद करने वाले Generative AI सिस्टम के लिए अतिरिक्त साइबर सुरक्षा उपाय अपनाने होंगे। इससे डेटा लीक, गलत जानकारी और साइबर हमलों के जोखिम को कम किया जा सकेगा। थर्ड-पार्टी AI सिस्टम की भी होगी जांच अगर कोई बैंक किसी बाहरी कंपनी का AI मॉडल इस्तेमाल करता है, तब भी उसकी स्वतंत्र जांच करानी होगी। इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि AI सिस्टम सुरक्षित और विश्वसनीय तरीके से काम कर रहा है। 24 जुलाई तक मांगे गए सुझाव RBI ने इन ड्राफ्ट दिशानिर्देशों पर बैंकों, विशेषज्ञों और आम लोगों से 24 जुलाई 2026 तक सुझाव मांगे हैं। सुझावों पर विचार करने के बाद अंतिम नियम जारी किए जाएंगे।
Infosys Chairman on AI: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव और इसके कारण नौकरियों पर मंडरा रहे खतरे को लेकर दुनिया भर में बहस जारी है। इसी बीच इंफोसिस के चेयरमैन नंदन नीलेकणि ने AI से जुड़ी आशंकाओं पर स्पष्ट और मजबूत राय रखी है। उनका कहना है कि AI पारंपरिक आईटी कंपनियों की जगह नहीं लेगा, बल्कि उनकी क्षमता और उत्पादकता को कई गुना बढ़ाने का काम करेगा। AI से नहीं खत्म होंगी आईटी कंपनियां इंफोसिस की 45वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) में बोलते हुए नंदन नीलेकणि ने कहा कि जेनरेटिव AI के आने से पारंपरिक आईटी सर्विसेज मॉडल खत्म होने की बात सही नहीं है। उन्होंने कहा कि: "AI हमारी जैसी कंपनियों को रिप्लेस नहीं करेगा, बल्कि उन संगठनों की ताकत बढ़ाएगा जो तेजी से बदलाव के साथ खुद को ढालते हैं और स्पष्ट लक्ष्य के साथ आगे बढ़ते हैं।" नीलेकणि के अनुसार, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट केवल कोड लिखने तक सीमित नहीं है। इसमें डोमेन नॉलेज, सुरक्षा, टेस्टिंग, सिस्टम डिजाइन और आर्किटेक्चर जैसी कई महत्वपूर्ण विशेषज्ञताएं शामिल होती हैं, जिन्हें केवल AI के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। ऑटोमेशन के बीच क्यों बढ़ा है डर? दुनियाभर में यह चिंता लगातार बढ़ रही है कि AI और ऑटोमेशन के कारण कोडिंग, आउटसोर्सिंग और पारंपरिक आईटी सेवाओं की मांग घट सकती है। खासकर भारत के 300 अरब डॉलर से अधिक के तकनीकी उद्योग के लिए यह चिंता महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, नंदन नीलेकणि का मानना है कि AI खतरा नहीं बल्कि अवसर है। पुराने सिस्टम को आधुनिक बनाने में मदद कर रहा AI इंफोसिस चेयरमैन ने बताया कि AI की मदद से कंपनियां अपने दशकों पुराने टेक्नोलॉजी सिस्टम को आधुनिक बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रही हैं। उनके मुताबिक, आने वाले समय में सबसे बड़ा अवसर AI मॉडल और एजेंट्स को कंपनियों के महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ने में होगा। रिपोर्ट्स के अनुसार, इंफोसिस अपने शीर्ष 200 ग्राहकों में से लगभग 90 प्रतिशत के साथ AI आधारित प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। 2030 तक 400 बिलियन डॉलर का हो सकता है बाजार इंफोसिस ने हाल ही में अपना AI-First Value Framework लॉन्च किया है। कंपनी का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक AI-फर्स्ट सर्विसेज का वैश्विक बाजार 300 से 400 बिलियन डॉलर के बीच पहुंच सकता है। नंदन नीलेकणि के बयान से यह संकेत मिलता है कि इंफोसिस AI को चुनौती नहीं, बल्कि भविष्य के विकास का सबसे बड़ा अवसर मान रही है।
अमेरिकी टेक कंपनी Meta Platforms में एक बार फिर बड़े पैमाने पर छंटनी की संभावना जताई जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश की योजना के बीच अपने ऑपरेशन्स को अधिक कुशल बनाने के लिए कर्मचारियों की संख्या कम करने पर विचार कर रही है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि वर्कफोर्स में करीब 20% तक कटौती पर चर्चा हुई है। अगर ऐसा होता है तो लगभग 16,000 कर्मचारियों की नौकरी प्रभावित हो सकती है। दिसंबर के अंत तक कंपनी में करीब 79,000 कर्मचारी काम कर रहे थे। हालांकि कंपनी के प्रवक्ता Andy Stone ने इन खबरों को “सैद्धांतिक संभावनाओं पर आधारित अटकलें” बताया है और कहा कि अभी तक छंटनी के पैमाने या समय को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों ने विभिन्न टीमों से यह आकलन करने को कहा है कि ऑपरेशन्स को कैसे और अधिक सुव्यवस्थित किया जा सकता है। दरअसल, कंपनी के सीईओ Mark Zuckerberg चाहते हैं कि Meta जनरेटिव AI क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को और तेज करे। इसी रणनीति के तहत कंपनी AI टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा निवेश कर रही है। यदि यह छंटनी होती है तो यह Meta के इतिहास में सबसे बड़ा पुनर्गठन होगा। इससे पहले कंपनी ने 2022 और 2023 में लागत घटाने के लिए कुल मिलाकर 21,000 से अधिक कर्मचारियों की छंटनी की थी। कंपनी ने आधिकारिक तौर पर किसी बड़े फैसले की पुष्टि नहीं की है, लेकिन रिपोर्ट के बाद टेक सेक्टर में संभावित छंटनी को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।