पश्चिम एशिया में जारी तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधित सप्लाई के बीच भारत के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर की रूस के शीर्ष नेतृत्व के साथ अहम बैठक के बाद रूस ने भारत को तेल और गैस आपूर्ति बढ़ाने का भरोसा दिया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा है और भारत जैसे बड़े आयातक देशों की चिंता बढ़ गई थी। रूस का भरोसा: ऊर्जा संकट में बड़ी राहत रूस के उप-प्रधानमंत्री Denis Manturov ने प्रधानमंत्री Narendra Modi और विदेश मंत्री जयशंकर के साथ बैठक में स्पष्ट किया कि रूसी कंपनियां भारत को कच्चा तेल और एलएनजी (LNG) की सप्लाई बढ़ाने में सक्षम हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, मार्च 2026 में रूस से भारत को तेल सप्लाई में करीब 90 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो इस संकट के समय भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उर्वरक आपूर्ति में भी बढ़ोतरी ऊर्जा के साथ-साथ रूस ने उर्वरकों की सप्लाई बढ़ाने का भी भरोसा दिया है। 2025 के अंत तक भारत को खनिज उर्वरकों की आपूर्ति में 40 प्रतिशत की वृद्धि की गई है। दोनों देशों के बीच यूरिया उत्पादन को लेकर संयुक्त परियोजनाएं भी प्रगति पर हैं, जो भारत के कृषि क्षेत्र को मजबूती देंगी। कूटनीतिक स्तर पर बढ़ा सहयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बैठक को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार, कनेक्टिविटी और रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर सहमति बनी है। वहीं विदेश मंत्री जयशंकर ने ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, उद्योग और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की बात कही। इसके अलावा, पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति और वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य पर भी विस्तृत चर्चा हुई। भारत-रूस संबंधों को नई मजबूती हाल के समय में भारत और रूस के बीच ऊर्जा सहयोग तेजी से मजबूत हुआ है। प्रतिबंधों में आंशिक ढील के बाद रूस एक बार फिर भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। इसके साथ ही परमाणु ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग जारी है, जो रणनीतिक साझेदारी को और गहरा बना रहा है।
अमेरिकी सेना में उस समय बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जब ईरान के साथ जारी तनाव और युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। इसी बीच अमेरिका के आर्मी चीफ रैंडी ए. जॉर्ज को अचानक पद से हटाकर तत्काल रिटायर होने के लिए कहा गया है। यह फैसला अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने लिया, जिससे कई सवाल खड़े हो गए हैं। अचानक क्यों लिया गया यह फैसला? पेंटागन की ओर से इस फैसले की पुष्टि तो कर दी गई, लेकिन इसके पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। जानकारों का मानना है कि यह कदम अमेरिकी प्रशासन के भीतर चल रहे बड़े सैन्य पुनर्गठन का हिस्सा हो सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन लगातार सेना के शीर्ष नेतृत्व में बदलाव कर रहा है, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंडे के अनुरूप नई रणनीति लागू की जा सके। नए आर्मी चीफ की नियुक्ति रैंडी ए. जॉर्ज के हटने के बाद, वाइस चीफ ऑफ स्टाफ क्रिस्टोफर ला-नेव को कार्यवाहक आर्मी चीफ बनाया गया है। ला-नेव इससे पहले कई महत्वपूर्ण सैन्य पदों पर रह चुके हैं और उन्हें रक्षा मंत्री के करीबी अधिकारियों में भी गिना जाता है। ट्रंप प्रशासन क्यों कर रहा लगातार बदलाव? विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। कई वरिष्ठ अधिकारियों को पहले ही हटाया जा चुका है कुछ को समय से पहले रिटायर किया गया ‘डाइवर्सिटी, इक्विटी और इंक्लूजन’ (DEI) नीतियों को खत्म करने की कोशिश जारी है सूत्रों के मुताबिक, प्रशासन उन अधिकारियों को हटाने की कोशिश कर रहा है, जिन्हें पिछली सरकार की नीतियों से जुड़ा माना जाता है। क्या युद्ध के बीच यह फैसला सही? ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच इस तरह का नेतृत्व परिवर्तन कई विशेषज्ञों को चौंका रहा है। उनका मानना है कि: इससे सैनिकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है रणनीतिक फैसलों में अस्थिरता आ सकती है युद्ध के दौरान नेतृत्व में बदलाव जोखिम भरा हो सकता है हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि अमेरिका अपने सैन्य लक्ष्यों को तेजी से पूरा करना चाहता है और इसी दिशा में यह बदलाव किया जा रहा है। रैंडी जॉर्ज का सैन्य करियर रैंडी ए. जॉर्ज एक अनुभवी इन्फैंट्री अधिकारी रहे हैं। वेस्ट प्वाइंट मिलिट्री अकादमी के स्नातक गल्फ वॉर, इराक और अफगानिस्तान में सेवा 2023 में आर्मी चीफ नियुक्त सामान्य कार्यकाल 2027 तक था यानी उनका कार्यकाल अभी पूरा नहीं हुआ था, लेकिन उन्हें समय से पहले ही हटाया गया। आगे क्या हो सकता है? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आने वाले समय में अमेरिकी सेना और प्रशासन में और बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। यह भी संभावना जताई जा रही है कि कुछ और वरिष्ठ अधिकारियों को हटाया या रिटायर किया जा सकता है।
बीजिंग/मिडिल ईस्ट: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच जहां दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं, वहीं चीन ने युद्ध खत्म कराने के लिए कूटनीतिक पहल तेज कर दी है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने बहरीन के साथ मिलकर क्षेत्र में शांति बहाल करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। बहरीन के साथ मिलकर शांति पहल चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने बहरीन के विदेश मंत्री अब्दुल्लातिफ बिन राशिद अल ज़यानी से फोन पर बातचीत की। इस दौरान उन्होंने कहा कि: चीन युद्ध खत्म कराने और स्थिरता लाने के लिए तैयार है बहरीन के साथ मिलकर शांति बहाली के प्रयास किए जाएंगे चीन का साफ संदेश: ‘आक्रामकता का विरोध’ वांग यी ने स्पष्ट किया कि: चीन किसी भी तरह की आक्रामकता के खिलाफ है क्षेत्र में संवाद और कूटनीति के जरिए समाधान चाहता है चीन-पाकिस्तान की 5 सूत्रीय योजना चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर एक पांच सूत्रीय पहल भी पेश की है, जिसमें शामिल हैं: नागरिकों और गैर-सैन्य ठिकानों पर हमले रोकना युद्धविराम लागू करना होर्मुज़ जलडमरूमध्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना समुद्री व्यापार और आवाजाही को सामान्य करना क्षेत्र में दीर्घकालिक शांति स्थापित करना संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर जोर चीन ने कहा कि: युद्धविराम अंतरराष्ट्रीय समुदाय की साझा जरूरत है UN सिक्योरिटी काउंसिल को तनाव कम करने और बातचीत बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए बहरीन की चिंता बहरीन ने भी माना कि: खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा गंभीर खतरे में है हॉर्मुज़ स्ट्रेट में समुद्री आवाजाही प्रभावित हो रही है बहरीन ने इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र के जरिए समाधान और चीन के साथ सहयोग बढ़ाने की बात कही। ‘ग्लोबल साउथ’ पर फोकस चीन ने खुद को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति बताते हुए कहा कि वह: पाकिस्तान के साथ मिलकर शांति बहाल करने में योगदान देगा खासकर छोटे और विकासशील देशों (Global South) के हितों की रक्षा करेगा
अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि अमेरिका अपने सैन्य लक्ष्यों को तय समय से पहले हासिल कर रहा है और अब ऑपरेशन अपने अंतिम पड़ाव में है। रुबियो ने कहा, “हम अपने हर लक्ष्य पर तय समय से आगे चल रहे हैं। अब हमें फिनिश लाइन साफ दिखाई दे रही है।” उन्होंने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ को आधुनिक दौर का बेहद कुशल सैन्य अभियान बताते हुए कहा कि इसे इतिहास में इसकी टैक्टिकल क्षमता के लिए याद किया जाएगा। सैन्य लक्ष्यों को किया स्पष्ट रुबियो ने उन अटकलों को खारिज किया जिनमें कहा जा रहा था कि अमेरिका के लक्ष्य स्पष्ट नहीं हैं। उन्होंने बताया कि इस अभियान का उद्देश्य ईरान की वायुसेना, नौसेना, मिसाइल फैक्ट्रियों और लॉन्च सिस्टम को निष्क्रिय करना था, जिसमें अमेरिका को बड़ी सफलता मिली है। ईरान पर सख्त टिप्पणी विदेश मंत्री ने ईरान की तुलना उत्तर कोरिया से करते हुए कहा कि वह ऐसे रास्ते पर था, जहां उसकी मिसाइलें सीधे अमेरिका तक पहुंच सकती थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान ने अपनी जनता के संसाधनों का इस्तेमाल विकास के बजाय हथियारों और आतंकवाद पर किया, जिससे देश की हालत खराब हो गई है। कूटनीति पर भी दिया जवाब युद्ध को लेकर उठ रही आलोचनाओं पर रुबियो ने कहा कि अमेरिका ने कूटनीतिक रास्तों को पूरी तरह अपनाया था। “राष्ट्रपति ट्रंप हमेशा बातचीत को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन ईरान को बातचीत के नाम पर समय बर्बाद करने की अनुमति नहीं दी जा सकती,” उन्होंने कहा। रुबियो ने यह भी कहा कि ईरान के पास 60% संवर्धित यूरेनियम रखने का कोई उचित कारण नहीं है और यह सीधे तौर पर परमाणु हथियार कार्यक्रम की ओर इशारा करता है। होर्मुज और NATO पर सख्त रुख रुबियो ने होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र बताते हुए कहा कि वहां वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही रोकना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। साथ ही NATO पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका अपने हितों की रक्षा के लिए गठबंधन के तहत अपने यूरोपीय ठिकानों का इस्तेमाल नहीं कर सकता, तो यह व्यवस्था एकतरफा बनकर रह जाएगी।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच ईरान और अमेरिका के बीच टकराव और बढ़ता नजर आ रहा है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) ने अमेरिका की 18 बड़ी कंपनियों को निशाना बनाने की चेतावनी दी है, जिसके बाद व्हाइट हाउस ने कड़ा रुख अपनाते हुए जवाब दिया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने कहा कि अमेरिकी सेना पहले भी ईरान के हमलों को रोकने में सक्षम रही है और आगे भी पूरी तरह तैयार है। उन्होंने दावा किया कि ईरान के बैलेस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों में करीब 90 प्रतिशत की कमी आई है, जो अमेरिकी रक्षा क्षमता को दर्शाता है। टेक कंपनियां निशाने पर IRGC ने मंगलवार (31 मार्च 2026) को जारी बयान में कहा कि अगर ईरानी नेताओं की हत्या जारी रहती है तो अमेरिका की प्रमुख टेक और कॉर्पोरेट कंपनियों को निशाना बनाया जाएगा। ईरान ने यह भी आरोप लगाया कि ये कंपनियां अमेरिका और इजरायल की सैन्य व खुफिया गतिविधियों में सहयोग कर रही हैं। ईरान ने जिन कंपनियों को निशाने पर बताया है, उनमें गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, एपल, मेटा, इंटेल, आईबीएम, सिस्को, ओरेकल, डेल, एनवीडिया, टेस्ला, जेपी मॉर्गन, जनरल इलेक्ट्रिक, बोइंग सहित कुल 18 कंपनियां शामिल हैं। कर्मचारियों को चेतावनी IRGC ने इन कंपनियों में काम कर रहे कर्मचारियों को भी चेतावनी दी है। बयान में कहा गया है कि यदि वे अपनी सुरक्षा चाहते हैं तो तुरंत अपने कार्यस्थल छोड़ दें। ईरान ने यह भी कहा कि वह अपने अधिकारियों की हत्या का बदला इन कंपनियों से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाकर लेगा। खाड़ी देशों में बढ़ा खतरा ईरान पहले ही खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले कर चुका है। अब कॉर्पोरेट ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी ने क्षेत्र में सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे साइबर हमलों और आर्थिक मोर्चे पर टकराव तेज हो सकता है। अमेरिका का सख्त रुख अमेरिका ने साफ किया है कि वह अपने नागरिकों और कंपनियों की सुरक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा। व्हाइट हाउस ने संकेत दिया है कि किसी भी हमले का जवाब कड़े तरीके से दिया जाएगा। मिडिल ईस्ट में बढ़ते इस तनाव का असर वैश्विक बाजारों और टेक सेक्टर पर भी पड़ सकता है, जिससे आने वाले दिनों में हालात और गंभीर होने की आशंका जताई जा रही है।
वैश्विक राजनीति में एक दिलचस्प मोड़ तब देखने को मिला जब Vladimir Putin द्वारा भेजा गया तेल टैंकर Cuba पहुंच गया-और हैरानी की बात यह रही कि United States ने इसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका और रूस के बीच संबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है-क्या अमेरिका अपनी नीति बदल रहा है या इसके पीछे कोई बड़ी रणनीति है? क्यूबा क्यों झेल रहा है संकट? क्यूबा इस समय गंभीर ऊर्जा संकट से गुजर रहा है। लगातार बिजली कटौती, ईंधन की कमी और ट्रांसपोर्ट व्यवस्था पर असर ने हालात को बदतर बना दिया है। इस संकट की बड़ी वजह Nicolás Maduro से जुड़े घटनाक्रम और तेल आपूर्ति में आई बाधा मानी जा रही है, जिससे क्यूबा की निर्भरता और बढ़ गई। रूस ने क्यों भेजा तेल? रूस ने क्यूबा को तेल भेजकर साफ संदेश दिया है कि वह अपने सहयोगियों के साथ खड़ा है। क्रेमलिन के प्रवक्ता Dmitry Peskov ने कहा कि क्यूबा की मुश्किल परिस्थितियों को देखते हुए यह मदद “जिम्मेदारी” के तहत की गई है। इस कदम के जरिए रूस ने न केवल मानवीय सहायता दी, बल्कि वैश्विक मंच पर अपनी रणनीतिक मौजूदगी भी दिखाई। ट्रंप ने टैंकर क्यों नहीं रोका? सबसे बड़ा सवाल यही है कि Donald Trump ने इस टैंकर को रोकने का आदेश क्यों नहीं दिया। इसके पीछे कई अहम वजहें मानी जा रही हैं: 1. मानवीय संकट क्यूबा में हालात बेहद खराब हैं-अस्पतालों तक में ईंधन की कमी है। ऐसे में टैंकर रोकना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का कारण बन सकता था। 2. टकराव से बचने की रणनीति अगर अमेरिका टैंकर को रोकता, तो यह सीधे रूस से टकराव का कारण बन सकता था-यहां तक कि नौसैनिक संघर्ष भी हो सकता था। 3. सीमित प्रभाव का आकलन ट्रंप ने खुद कहा कि इससे रूस को कोई बड़ा फायदा नहीं होगा। यानी अमेरिका इसे “लो-इम्पैक्ट” घटना मान रहा है। 4. वैश्विक तनाव पहले ही चरम पर ईरान, मध्य-पूर्व और अन्य क्षेत्रों में तनाव पहले से बढ़ा हुआ है। ऐसे में अमेरिका कोई नया मोर्चा खोलने से बचना चाहता है। क्या बदल रही है अमेरिका की नीति? विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिका की नीति में स्थायी बदलाव नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार लिया गया एक व्यावहारिक फैसला है। यह कदम दिखाता है कि जहां एक तरफ अमेरिका अपनी सख्त विदेश नीति जारी रखता है, वहीं दूसरी ओर मानवीय संकट और रणनीतिक संतुलन को भी ध्यान में रखता है। रूस को क्या मिला फायदा? क्यूबा में प्रभाव मजबूत हुआ वैश्विक स्तर पर “सहयोगी देश” की छवि बनी अमेरिका को बिना टकराव संदेश दिया
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उस समय हलचल मच गई जब Mohammad Safa नाम के एक पूर्व राजनयिक ने संयुक्त राष्ट्र से इस्तीफा देते हुए ईरान पर संभावित परमाणु हमले का दावा कर दिया। उनके इस सनसनीखेज बयान ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है, हालांकि अभी तक इन दावों की कोई स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। कौन हैं मोहम्मद साफा? मोहम्मद साफा United Nations से जुड़े रहे एक वरिष्ठ राजनयिक हैं। वह Patriotic Vision Organization (PVA) के मुख्य प्रतिनिधि के रूप में कार्यरत थे, जिसे संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) में विशेष सलाहकार का दर्जा प्राप्त है। साफा पिछले एक दशक से अधिक समय से इस संगठन से जुड़े थे और 2013 से इसके एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर के रूप में काम कर रहे थे। इस्तीफा और गंभीर आरोप साफा ने अपने इस्तीफे के साथ एक खुला पत्र जारी करते हुए आरोप लगाया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ “पावरफुल लॉबी” ऐसे फैसलों को प्रभावित कर रही हैं, जिनके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि Iran में संभावित परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की एक “गुप्त तैयारी” चल रही है। उनका कहना है कि उन्होंने यह जानकारी दुनिया को आगाह करने के लिए सार्वजनिक की और इसी वजह से अपना पद छोड़ दिया। ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ से दूरी का दावा अपने बयान में साफा ने कहा कि वह किसी भी ऐसी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे, जो मानवता के खिलाफ अपराध की ओर ले जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर समय रहते इस स्थिति को नहीं रोका गया, तो इसके गंभीर और वैश्विक परिणाम हो सकते हैं। धमकियों और दबाव का आरोप साफा ने यह भी दावा किया कि अलग विचार रखने के कारण उन्हें आलोचना, सेंसरशिप और यहां तक कि धमकियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि यह निर्णय उन्होंने काफी सोच-विचार के बाद लिया है। अभी तक नहीं हुई पुष्टि गौरतलब है कि साफा के इन दावों की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही United Nations की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर बिना पुष्टि के दावों को सावधानी से देखने की जरूरत है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच युद्धविराम की कोशिशें अब तेज होती नजर आ रही हैं। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, JD Vance (अमेरिका के उपराष्ट्रपति) अगले तीन दिनों के भीतर Pakistan का दौरा कर सकते हैं। इस संभावित यात्रा का उद्देश्य Iran और United States के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए बातचीत को आगे बढ़ाना बताया जा रहा है। क्या कहती हैं रिपोर्ट्स? अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान में उच्चस्तरीय बैठक आयोजित करने की कोशिश कर रहा है, जिसमें जेडी वेंस की भागीदारी संभव है। हालांकि, अभी तक इस यात्रा की तारीख, स्थान और भागीदारी को लेकर अंतिम पुष्टि नहीं हुई है। ईरान ने किनसे बातचीत से किया इनकार? सूत्रों के मुताबिक, ईरान ने Steve Witkoff और Jared Kushner जैसे अमेरिकी दूतों के साथ दोबारा बातचीत करने से साफ इनकार कर दिया है। इसके बाद पाकिस्तान ने नए चेहरे के तौर पर जेडी वेंस का नाम आगे बढ़ाया है, जिससे वार्ता को नई दिशा मिल सके। पाकिस्तान क्यों बना रहा है खुद को मध्यस्थ? Shehbaz Sharif ने हाल ही में कहा था कि उनका देश “सार्थक और निर्णायक बातचीत” को संभव बनाने के लिए तैयार है। पाकिस्तान लगातार यह कोशिश कर रहा है कि वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाए और इस्लामाबाद को बातचीत का केंद्र बनाया जाए। व्हाइट हाउस का क्या रुख? व्हाइट हाउस ने फिलहाल इस यात्रा को लेकर कोई स्पष्ट पुष्टि नहीं की है। प्रेस सचिव ने कहा कि जेडी वेंस पहले से ही राष्ट्रीय सुरक्षा टीम का अहम हिस्सा हैं, लेकिन उनकी भूमिका में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। साथ ही, अमेरिका ने यह भी साफ नहीं किया कि वह ईरान से किस स्तर पर बातचीत कर रहा है। क्या जल्द खत्म होगा युद्ध? विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पाकिस्तान में यह वार्ता होती है, तो यह युद्धविराम की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। हालांकि, दोनों देशों के बीच अविश्वास और सख्त रुख को देखते हुए बातचीत आसान नहीं मानी जा रही।
नई दिल्ली में पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच हुई अहम सर्वदलीय बैठक में भारत ने अपनी कूटनीतिक स्थिति साफ कर दी है। विदेश मंत्री S. Jaishankar ने स्पष्ट कहा कि भारत वैश्विक राजनीति में “दलाल देश” की भूमिका नहीं निभा सकता। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब Shehbaz Sharif ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश करते हुए बातचीत की मेजबानी की इच्छा जताई है। बैठक में क्या हुआ? यह उच्चस्तरीय बैठक रक्षा मंत्री Rajnath Singh की अध्यक्षता में आयोजित की गई, जिसमें गृह मंत्री Amit Shah, वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman और पेट्रोलियम मंत्री Hardeep Singh Puri सहित कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। सरकार ने विपक्ष को जानकारी दी कि भारत की प्राथमिकता इस समय दो अहम मुद्दे हैं: खाड़ी देशों में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर बनाए रखना पाकिस्तान की भूमिका पर सरकार का जवाब बैठक में विपक्ष ने पाकिस्तान की मध्यस्थता भूमिका पर सवाल उठाए। इस पर S. Jaishankar ने कहा कि पाकिस्तान का यह रोल नया नहीं है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, 1980 के दशक से ही अमेरिका-ईरान संवाद में पाकिस्तान एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। इसलिए मौजूदा घटनाक्रम को “नई रणनीति” के रूप में देखना सही नहीं होगा। कूटनीतिक स्तर पर भारत की पहल सरकार ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री Narendra Modi ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump से बातचीत में स्पष्ट किया है कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को जल्द समाप्त किया जाना चाहिए, क्योंकि इसका असर सभी देशों पर पड़ रहा है। भारत ने हालात पर लगातार नजर बनाए रखी है और आवश्यक कूटनीतिक कदम उठाए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्थिति और बढ़ती जटिलता पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक राजनीति को और जटिल बना दिया है। पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये बैकचैनल कूटनीति में सक्रिय बताए जा रहे हैं ईरान ने सार्वजनिक रूप से बातचीत से इनकार किया है अमेरिका ने सीमित समय के लिए हमलों पर रोक के संकेत दिए हैं इस बीच, क्षेत्र में तनाव लगातार बना हुआ है और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी इसका असर पड़ रहा है। सरकार बनाम विपक्ष: आरोप-प्रत्यारोप जहां सरकार ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता का बचाव किया, वहीं विपक्ष ने इसे “अपर्याप्त प्रतिक्रिया” बताया और संसद में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की मांग की।
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका के साथ युद्धविराम (ceasefire) बातचीत के लिए कड़ी शर्तें रख दी हैं। तेहरान ने साफ कहा है कि जब तक खाड़ी क्षेत्र (Gulf) में मौजूद सभी अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद नहीं किया जाता और उस पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध (sanctions) पूरी तरह नहीं हटाए जाते, तब तक वह किसी समझौते के लिए तैयार नहीं होगा। ईरान की मुख्य मांगें ईरान ने बातचीत से पहले कई अहम शर्तें सामने रखी हैं: खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य बेस पूरी तरह बंद किए जाएं ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं युद्ध के दौरान हुए नुकसान के लिए वित्तीय मुआवजा दिया जाए हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर ईरान का अधिक नियंत्रण हो इस जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों से फीस वसूली का अधिकार भविष्य में किसी भी हमले को रोकने के लिए ठोस सुरक्षा गारंटी सख्ती के बीच नरमी के संकेत हालांकि सार्वजनिक तौर पर ईरान कड़ा रुख दिखा रहा है, लेकिन अंदरखाने कुछ लचीलापन भी दिख रहा है: 5 साल के लिए बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम रोकने पर विचार यूरेनियम संवर्धन (enrichment) कम करने की संभावना IAEA को सेंट्रीफ्यूज निरीक्षण की अनुमति 60% समृद्ध यूरेनियम के स्टॉक पर बातचीत की तैयारी हिज़्बुल्लाह, हमास जैसे प्रॉक्सी समूहों से समर्थन खत्म करने पर चर्चा ट्रंप के शांति प्रस्ताव पर शक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पेश किए गए 15-सूत्रीय शांति प्रस्ताव पर भी ईरान ने अविश्वास जताया है। ईरान का कहना है कि पहले भी कई बार बातचीत के बीच हमले हुए हैं, इसलिए वह “फिर से धोखा” नहीं खाना चाहता। क्यों है अविश्वास? पिछले साल जून में, परमाणु वार्ता से ठीक पहले इजरायल ने US समर्थन से हमला किया हाल ही में जेनेवा में बातचीत के बाद भी सैन्य कार्रवाई जारी रही कैसे शुरू हुआ युद्ध? ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ, जब एक संयुक्त US-इजरायल हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई बड़े अधिकारी मारे गए। इसके जवाब में ईरान ने: इराक, कतर, UAE, बहरीन, कुवैत और सऊदी अरब में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए भारी नुकसान ईरान में अब तक 2300 से ज्यादा लोगों की मौत इनमें 1300 से अधिक नागरिक करीब 200 बच्चे (12 साल से कम उम्र) भी शामिल
मध्य-पूर्व में जारी अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष के बीच इजरायल ने लेबनान को लेकर बड़ा दावा किया है। इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने कहा है कि उनकी सेना दक्षिणी लेबनान के करीब 10% हिस्से पर नियंत्रण स्थापित करेगी। लिटानी नदी तक बनेगा ‘बफर ज़ोन’ काट्ज के मुताबिक, इजरायली सेना लिटानी नदी तक इलाके को नियंत्रित करेगी और वहां एक मजबूत रक्षात्मक बफर ज़ोन तैयार किया जाएगा। यह नदी इजरायल की सीमा से लगभग 30 किलोमीटर अंदर है और यह क्षेत्र लेबनान के कुल भूभाग का करीब एक-दसवां हिस्सा माना जाता है। उन्होंने कहा, “सेना लिटानी नदी तक बचे हुए पुलों और सुरक्षा क्षेत्र को अपने नियंत्रण में लेगी।” काट्ज ने यह भी दावा किया कि जिन इलाकों में “आतंकवाद” मौजूद है, वहां नागरिकों को रहने की अनुमति नहीं होगी। ‘सुरक्षा सुनिश्चित होने तक वापसी नहीं’ इजरायल ने साफ किया है कि जब तक उसकी उत्तरी सीमा पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो जाती, तब तक सेना पीछे नहीं हटेगी। रक्षा मंत्री के अनुसार, दक्षिणी लेबनान से लाखों लोग पहले ही उत्तर की ओर पलायन कर चुके हैं और उनकी वापसी सुरक्षा हालात सुधरने पर ही संभव होगी। क्यों लिया गया फैसला? इजरायल का कहना है कि यह कदम हिजबुल्लाह के खतरे को खत्म करने और अपनी सीमा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है। इजरायली सेना पहले ही लिटानी नदी के आसपास कई पुलों को निशाना बना चुकी है, ताकि हिजबुल्लाह के लड़ाके और हथियार दक्षिणी इलाकों में न पहुंच सकें। काट्ज ने इसे “फॉरवर्ड डिफेंस लाइन” बताया। हिजबुल्लाह की चेतावनी हिजबुल्लाह ने इजरायल के इस प्लान को लेबनान के लिए “अस्तित्व का खतरा” बताया है और कहा है कि किसी भी कब्जे की कोशिश का जोरदार विरोध किया जाएगा। जंग में नया मोड़ यह बयान ऐसे समय में आया है जब हिजबुल्लाह लगातार इजरायल के शहरों-हाइफा और नाहारिया-पर रॉकेट हमले कर रहा है। वहीं ईरान की ओर से भी ड्रोन हमले जारी हैं। इसके अलावा, बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर धमाकों की खबरें भी सामने आई हैं। कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं फिलहाल कमजोर दिख रही हैं। इजरायल का यह बयान मिडिल ईस्ट संघर्ष को और गंभीर मोड़ दे सकता है। अगर दक्षिणी लेबनान में बफर ज़ोन बनाने की योजना आगे बढ़ती है, तो इससे क्षेत्र में जंग और लंबी तथा व्यापक हो सकती है।
मध्य-पूर्व में जारी तनाव और अमेरिका-इसराइल के साथ टकराव के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने वैश्विक प्रतिक्रिया को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने पाकिस्तान, तुर्की, इराक़, लेबनान, मिस्र और अन्य अरब देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन देशों के लोग अमेरिका और इसराइल की नीतियों के खिलाफ खुलकर अपनी नाराज़गी जता रहे हैं। राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान ने कहा, “आज हम दुनिया के कई देशों के लोगों को जागते हुए देख रहे हैं। पाकिस्तान, तुर्की, इराक़, लेबनान, मिस्र और अरब देशों के लोग अमेरिका, इसराइल और उनके अपराधों के प्रति अपनी नाराज़गी को मुखरता से व्यक्त कर रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा कि दुनिया के स्वतंत्र लोग “ज़ायनिस्टों” के साथ नहीं हैं और क्षेत्र में स्थिरता केवल आपसी सहयोग और देशों की संप्रभुता के सम्मान से ही संभव है। पाकिस्तान की मध्यस्थता की पेशकश ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान ने इस तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थता की पेशकश की है। पाकिस्तान ने दोनों पक्षों से बातचीत के ज़रिए समाधान निकालने की अपील की है। 15 सूत्रीय योजना की चर्चा इस बीच अमेरिकी और इसराइली मीडिया की कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका ने समझौते के लिए पाकिस्तान के माध्यम से ईरान को 15 सूत्रीय प्रस्ताव सौंपा है। हालांकि, इस प्रस्ताव की आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हुई है। बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक नजर मध्य-पूर्व की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। लगातार हो रहे हमलों और बयानों के बीच कूटनीतिक कोशिशें भी तेज़ हो गई हैं, लेकिन हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध को लेकर बड़ा दावा किया है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका इस जंग को “जीत चुका है” और ईरान अब कभी परमाणु हथियार न रखने पर सहमत हो गया है। “ईरान की परमाणु क्षमता पूरी तरह खत्म” ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी हमलों में ईरान की न्यूक्लियर क्षमता पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। उन्होंने कहा: अगर हमला नहीं किया जाता, तो ईरान दो हफ्ते में परमाणु हथियार बना लेता ईरान इसका इस्तेमाल इजरायल और पूरे पश्चिम एशिया में कर सकता था अमेरिकी कार्रवाई ने इस खतरे को पूरी तरह खत्म कर दिया “तेहरान के ऊपर उड़ रहे हैं हमारे विमान” ट्रंप ने यह भी कहा कि जंग में ईरान की नौसेना और वायुसेना खत्म हो चुकी है। उनके मुताबिक, अमेरिकी लड़ाकू विमान तेहरान और अन्य इलाकों के ऊपर उड़ान भर रहे हैं, जो उनकी सैन्य बढ़त को दिखाता है। “समझौते के लिए तैयार है ईरान” ट्रंप ने कहा कि ईरान अब समझौता करना चाहता है। बातचीत में शामिल प्रमुख नाम: उपराष्ट्रपति जेडी वेंस विदेश मंत्री मार्को रूबियो विशेष दूत स्टीव विटकॉफ जेरेड कुशनर हालांकि, ट्रंप ने यह भी कहा कि वह पहले से सब कुछ सार्वजनिक नहीं करना चाहते, लेकिन ईरान परमाणु हथियार न रखने पर सहमत हो चुका है। ईरान में “सत्ता परिवर्तन” का दावा ट्रंप ने एक और बड़ा दावा करते हुए कहा कि ईरान में सत्ता परिवर्तन हो चुका है। उनके मुताबिक: मौजूदा नेतृत्व पहले से अलग है नए लोग सत्ता में आए हैं यह बदलाव “रिजीम चेंज” जैसा है पाकिस्तान की एंट्री: मध्यस्थता की पेशकश इस बीच पाकिस्तान ने भी इस मुद्दे पर पहल दिखाई है। ट्रंप ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का पोस्ट शेयर करते हुए बताया कि: पाकिस्तान, अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करना चाहता है शांति वार्ता के लिए “सार्थक और निर्णायक भूमिका” निभाने को तैयार है
अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर तीखी बयानबाज़ी देखने को मिली। संयुक्त राष्ट्र में आयोजित विश्व जल दिवस से जुड़े एक कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि को बहाल करने की मांग उठाई, लेकिन भारत ने स्पष्ट शब्दों में इसे खारिज करते हुए कड़ा रुख अपनाया। भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने पाकिस्तान को दो टूक जवाब देते हुए कहा कि जब तक वह आतंकवाद को पूरी तरह समाप्त नहीं करता, तब तक सिंधु जल संधि बहाल नहीं की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी संधि की पवित्रता की बात करने से पहले मानव जीवन की पवित्रता का सम्मान करना जरूरी है। पाकिस्तान की अपील, भारत का जवाब पाकिस्तान ने इस मुद्दे को उस कार्यक्रम में उठाया, जिसका मुख्य उद्देश्य सभी के लिए सुरक्षित जल और स्वच्छता सुनिश्चित करना था। पाकिस्तान ने खुद को पीड़ित पक्ष के रूप में पेश करते हुए संधि बहाल करने की मांग की। हालांकि, भारत ने इसे भटकाने वाली रणनीति बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई। भारत ने कहा कि उसने हमेशा एक जिम्मेदार ऊपरी-तटीय देश की भूमिका निभाई है, लेकिन जिम्मेदारी दोनों पक्षों की होती है। भारत ने क्यों निलंबित की संधि गौरतलब है कि 1960 में हुई सिंधु जल संधि को भारत ने पिछले वर्ष पहलगाम आतंकी हमले के बाद निलंबित कर दिया था। इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान से जुड़े आतंकी संगठन ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ ने ली थी, जिसका संबंध लश्कर-ए-तैयबा से बताया गया। इसके जवाब में भारत ने कड़ा रुख अपनाते हुए न केवल कूटनीतिक स्तर पर दबाव बनाया, बल्कि जल समझौते को भी निलंबित कर दिया। ‘आतंकवाद के साथ नहीं चल सकती संधि’ हरीश ने अपने बयान में स्पष्ट कहा कि पाकिस्तान ने वर्षों से आतंकवाद को एक सरकारी नीति के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है, जिससे हजारों निर्दोष भारतीयों की जान गई। उन्होंने कहा, “हमारे धैर्य और सद्भावना का पाकिस्तान पर कोई असर नहीं पड़ा। इसलिए भारत को मजबूर होकर यह कदम उठाना पड़ा।” संधि में बदलाव की जरूरत पर भी उठे सवाल भारत ने यह भी कहा कि पिछले 65 वर्षों में तकनीक, जनसंख्या और पर्यावरण में बड़े बदलाव हुए हैं, जिससे संधि में संशोधन की आवश्यकता थी। लेकिन पाकिस्तान ने इस पर चर्चा से इनकार कर दिया। भारत का जल प्रबंधन पर जोर भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह भी दोहराया कि वह जल प्रबंधन और स्वच्छता को लेकर गंभीर है। सरकार की ‘जल जीवन मिशन’ योजना के तहत देश के करोड़ों ग्रामीण परिवारों तक पाइप से पीने का पानी पहुंचाया जा चुका है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा है कि Iran अमेरिका के साथ समझौता करना चाहता है, लेकिन फिलहाल वह ऐसे किसी समझौते को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि मौजूदा हालात में ईरान पूरी तरह कमजोर पड़ चुका है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर एक पोस्ट में मीडिया पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि “फेक न्यूज मीडिया” अमेरिकी सेना की कार्रवाई को सही तरीके से नहीं दिखा रहा है। ट्रंप ने लिखा, “फेक न्यूज मीडिया यह बताने से कतराता है कि अमेरिकी सेना ने ईरान के खिलाफ कितना शानदार प्रदर्शन किया है।” उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान “पूरी तरह हार चुका है” और अब समझौता करना चाहता है। संघर्ष के बीच बयान यह बयान ऐसे समय आया है जब United States और Iran के बीच चल रहे तनाव और सैन्य टकराव को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। ट्रंप पहले भी कह चुके हैं कि हालिया अमेरिकी हमलों में ईरान के कई सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचा है। हालांकि ईरान की ओर से इन दावों को लेकर आधिकारिक प्रतिक्रिया सीमित रही है। मध्य पूर्व में बढ़ते इस तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी चिंता जता रहा है और कई देश दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील कर चुके हैं।
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने 2500 मरीन सैनिकों को तैनात करने का आदेश दिया है। इस फैसले के बाद रणनीतिक रूप से बेहद अहम जलमार्ग Strait of Hormuz को लेकर अमेरिका की संभावित सैन्य योजना पर चर्चा तेज हो गई है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना बेहद जोखिम भरी हो सकती है। ट्रंप ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिकी सेना ने ईरान के तेल निर्यात के प्रमुख केंद्र Kharg Island पर हमला किया है। इसके बाद यह अटकलें तेज हो गई हैं कि अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट के आसपास स्थित द्वीपों पर कब्जा करने की रणनीति पर काम कर रहा है। अमेरिकी नौसेना के पूर्व अधिकारी और रक्षा विशेषज्ञ Malcolm Nance ने इस संभावित योजना को “खतरनाक” बताते हुए कहा कि इसका विश्लेषण अमेरिकी सैन्य कमांडरों ने करीब 40 साल पहले ही किया था। उनके मुताबिक, उस समय अनुमान लगाया गया था कि इस तरह के ऑपरेशन के लिए कम से कम 6000 मरीन सैनिकों और भारी सैन्य उपकरणों की जरूरत होगी। पहले द्वीपों पर कब्जे की रणनीति नैंस के अनुसार, उस योजना के तहत सबसे पहले Larak Island, Hormuz Island और Qeshm Island पर कब्जा कर Bandar Abbas को चारों तरफ से घेरने की रणनीति थी। इसके बाद प्रतिबंधित समुद्री क्षेत्र को पार कर आगे बढ़ने की योजना बनाई गई थी। हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि 1988 में जब ईरानी बारूदी सुरंगों से अमेरिकी जहाजों को खतरा हुआ था, तब भी अमेरिका ने इस तरह की कार्रवाई नहीं की थी। ईरान की जवाबी कार्रवाई का खतरा नैंस के मुताबिक अगर अमेरिका ऐसा कदम उठाता है तो Islamic Revolutionary Guard Corps और बासिज बल पहाड़ी इलाकों से द्वीपों पर मिसाइल और आत्मघाती हमले कर सकते हैं। इसके अलावा ईरान पनडुब्बी ड्रोन, सुसाइड बोट और समुद्री बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल भी कर सकता है। रसद सप्लाई भी बड़ी चुनौती विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस अभियान की सप्लाई लाइन भी बड़ी समस्या बन सकती है। अमेरिकी सेना को अपने ठिकानों United Arab Emirates और Qatar से रसद सप्लाई करनी होगी, जो संभावित हमलों के निशाने पर आ सकते हैं। नैंस ने कहा कि इस तरह के विवादित और खतरनाक जलमार्ग से सप्लाई भेजना “पागलपन” जैसा कदम होगा। होर्मुज स्ट्रेट में बारूदी सुरंगों की आशंका हालिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ईरान Strait of Hormuz में बारूदी सुरंगें बिछा रहा है। हालांकि अगर पेंटागन इटली से एक्सपेडिशनरी सी बेस जहाज हिंद महासागर में तैनात करता है तो अमेरिका को कुछ रणनीतिक बढ़त मिल सकती है। फिलहाल इस दिशा में कोई ठोस प्रगति सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना जल्दबाजी में बनाई गई प्रतीत होती है और इससे पूरे क्षेत्र में बड़ा सैन्य टकराव हो सकता है।
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है। तीखी बयानबाज़ी और सैन्य कार्रवाई के बीच दोनों देशों के नेताओं के बीच शब्दों की जंग भी तेज हो गई है। ईरान के वरिष्ठ नेता और सुरक्षा मामलों के प्रभावशाली चेहरों में शामिल अली लारिजानी ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कड़ी चेतावनी दी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर जारी एक संदेश में लारिजानी ने ट्रंप के हालिया बयान का जवाब देते हुए लिखा, “आपसे भी अधिक शक्तिशाली लोग ईरान को खत्म नहीं कर पाए। अपने लिए सावधान रहें, कहीं ऐसा न हो कि आप ही समाप्त कर दिए जाएं।” यह बयान उस समय आया है जब ट्रंप ने ईरान के खिलाफ बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए सैन्य कार्रवाई की धमकी दी थी। ट्रंप की सख्त चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा था कि यदि ईरान ने दुनिया की तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बाधित करने की कोशिश की, तो अमेरिका पहले की तुलना में “20 गुना अधिक ताकत” से हमला करेगा। ट्रंप ने अपने संदेश में कहा कि ऐसा हमला ईरान को इस स्थिति में पहुंचा सकता है कि वह दोबारा खड़ा भी न हो पाए। उन्होंने लिखा, “मौत, आग और तबाही उन पर बरसेगी-लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि स्थिति वहां तक न पहुंचे।” इसके साथ ही ट्रंप ने ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई को लेकर भी तीखी टिप्पणी की। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि उन्हें ईरान के नए नेतृत्व से संतोष नहीं है और उनका मानना है कि मोजतबा खामेनेई “शांति से नहीं रह पाएंगे।” नए नेतृत्व पर भी जताई नाराज़गी दरअसल, ईरान में हाल ही में हुए बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के पश्चात उनके दूसरे बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता चुना गया है। इस फैसले को लेकर अमेरिका की ओर से पहले ही असंतोष जताया जा चुका है। ट्रंप ने इससे पहले यह भी कहा था कि ईरान के नए नेता के चयन में अमेरिका की भी भूमिका होनी चाहिए, जैसा कि अतीत में कुछ देशों के राजनीतिक मामलों में अमेरिका का प्रभाव देखा गया है। हमलों के बाद भड़का युद्ध मध्य पूर्व में मौजूदा तनाव की शुरुआत उस समय हुई जब 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान पर बड़े सैन्य हमले किए। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत हो गई, जिसके बाद क्षेत्र में व्यापक संघर्ष शुरू हो गया। ईरान ने इस हमले के जवाब में इज़राइल और उसके सहयोगी देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमले तेज कर दिए हैं। इस संघर्ष का असर अब कई खाड़ी देशों तक पहुंच चुका है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर संकट ईरान ने चेतावनी दी है कि जब तक युद्ध जारी रहेगा, वह क्षेत्र से तेल की आपूर्ति रोक सकता है। ईरानी अधिकारियों ने यहां तक कहा है कि वे “एक भी लीटर तेल के निर्यात” को रोक सकते हैं, खासकर उन देशों के लिए जो अमेरिका और इज़राइल का समर्थन कर रहे हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। वैश्विक स्तर पर करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में इस मार्ग पर किसी भी प्रकार का व्यवधान अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। खाड़ी देशों में भी बढ़े हमले मंगलवार को ईरान ने इज़राइल और कई खाड़ी देशों को निशाना बनाते हुए नए हमले किए। बहरीन की राजधानी मनामा में एक रिहायशी इमारत पर हुए हमले में 29 वर्षीय महिला की मौत हो गई और आठ लोग घायल हो गए। सऊदी अरब ने अपने पूर्वी तेल समृद्ध क्षेत्र में दो ड्रोन मार गिराने का दावा किया। कुवैत की नेशनल गार्ड ने छह ड्रोन को नष्ट करने की जानकारी दी। वहीं संयुक्त अरब अमीरात के औद्योगिक शहर रुवैस में एक ड्रोन हमले के बाद पेट्रोकेमिकल संयंत्रों के पास आग लग गई, हालांकि इस घटना में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है। इज़राइल में भी अलर्ट इज़राइल में भी हमलों की आशंका के बीच अलर्ट जारी है। यरुशलम में सायरन बजने लगे और तेल अवीव के ऊपर कई धमाकों की आवाजें सुनी गईं। इज़राइली रक्षा प्रणाली ने ईरान की ओर से दागे गए कई मिसाइलों और ड्रोन को हवा में ही रोकने की कोशिश की। वैश्विक बाजारों पर असर मध्य पूर्व में बढ़ते इस संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी चिंता बढ़ा दी है। तेल आपूर्ति में संभावित बाधा और युद्ध के फैलने की आशंका के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार और शेयर बाजारों में अस्थिरता देखी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह टकराव और बढ़ता है या होर्मुज़ जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। कुल मिलाकर, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती सैन्य कार्रवाई और तीखी बयानबाज़ी ने मध्य पूर्व को एक बार फिर गंभीर संकट की स्थिति में ला खड़ा किया है। आने वाले दिनों में यह टकराव किस दिशा में जाता है, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव-जहां Iran, Israel और United States आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं-ने दुनिया भर में एक अहम बहस को जन्म दे दिया है। लगातार हो रहे मिसाइल हमलों और नागरिकों की मौतों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या युद्ध में भी कुछ नियम होते हैं और अगर इन नियमों का उल्लंघन होता है तो उसे अंतरराष्ट्रीय कानून कैसे देखता है। इसी संदर्भ में ‘वॉर क्राइम’ यानी युद्ध अपराध की चर्चा तेज हो गई है। क्या होता है वॉर क्राइम? सरल शब्दों में समझें तो युद्ध के दौरान किए गए ऐसे गंभीर अपराध, जो अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के नियमों का उल्लंघन करते हैं, उन्हें वॉर क्राइम कहा जाता है। युद्ध में सैनिक एक-दूसरे के खिलाफ लड़ सकते हैं, लेकिन जानबूझकर आम नागरिकों, अस्पतालों, स्कूलों, धार्मिक स्थलों या राहत शिविरों को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपराध माना जाता है। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि युद्ध की स्थिति में भी मानवता और बुनियादी अधिकारों की रक्षा की जाए। युद्ध के नियम कहां से आए दुनिया ने दो विनाशकारी विश्व युद्धों के बाद यह महसूस किया कि युद्ध के दौरान भी कुछ मानवीय सीमाएं तय होना जरूरी हैं। इसी सोच के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर Geneva Conventions बनाए गए। इन समझौतों में स्पष्ट रूप से तय किया गया कि: नागरिकों को निशाना नहीं बनाया जाएगा। अस्पतालों और राहत केंद्रों पर हमला प्रतिबंधित होगा। युद्धबंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार नहीं किया जाएगा। अगर कोई देश या उसकी सेना इन नियमों का उल्लंघन करती है, तो उसे वॉर क्राइम की श्रेणी में रखा जा सकता है। मिडिल ईस्ट के संघर्ष में क्यों उठ रहा यह सवाल मौजूदा समय में Iran और Israel के बीच लगातार सैन्य हमले हो रहे हैं, जबकि United States भी इस टकराव में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार कई सैन्य ठिकानों के साथ-साथ शहरों के आसपास भी हमले हुए हैं, जिनका असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहस तेज हो गई है कि क्या इन हमलों के दौरान नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन किया जा रहा है या नहीं। वॉर क्राइम की जांच और सजा कौन देता है ऐसे मामलों की जांच और सुनवाई के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष अदालतें बनाई गई हैं। इनमें सबसे प्रमुख है International Criminal Court (ICC)। यह अदालत उन मामलों की जांच कर सकती है जिनमें नरसंहार, मानवता के खिलाफ अपराध और वॉर क्राइम जैसे गंभीर आरोप शामिल हों। हालांकि व्यवहार में यह प्रक्रिया अक्सर जटिल होती है, क्योंकि कई बार बड़े देशों की राजनीतिक शक्ति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है। क्या किसी राष्ट्राध्यक्ष को कभी सजा मिली है इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जब राष्ट्राध्यक्षों या शीर्ष नेताओं को युद्ध अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया। लाइबेरिया के पूर्व राष्ट्रपति Charles Taylor को सिएरा लियोन के गृहयुद्ध में युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए 50 साल की सजा सुनाई गई। इराक के पूर्व राष्ट्रपति Saddam Hussein को मानवाधिकार उल्लंघनों और युद्ध अपराधों के आरोपों में दोषी पाए जाने के बाद फांसी दी गई। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुए Nuremberg Trials में नाजी शासन के कई शीर्ष नेताओं को युद्ध अपराधों के लिए सजा दी गई, जिनमें कई को मृत्युदंड भी मिला। कुछ मामलों में नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुए, लेकिन उन्हें सजा नहीं मिल सकी। उदाहरण के तौर पर सूडान के पूर्व राष्ट्रपति Omar al-Bashir के खिलाफ ICC ने वारंट जारी किया था, लेकिन अब तक मुकदमा पूरा नहीं हो सका। क्या मौजूदा युद्ध में किसी नेता को सजा मिल सकती है सैद्धांतिक रूप से अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी भी देश के नेता पर वॉर क्राइम का मुकदमा चलाया जा सकता है। लेकिन व्यवहारिक रूप से यह बेहद कठिन होता है। कारण यह है कि कई शक्तिशाली देश ICC के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं करते या अंतरराष्ट्रीय जांच में सीमित सहयोग देते हैं। इसके अलावा किसी नेता के खिलाफ कार्रवाई तभी संभव होती है, जब वह सत्ता से बाहर हो या उसके खिलाफ वैश्विक राजनीतिक सहमति बन जाए। वास्तविकता क्या कहती है विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े और शक्तिशाली देशों के नेताओं पर अंतरराष्ट्रीय अदालत में मुकदमा चलाना बहुत मुश्किल होता है। अक्सर ऐसे मामलों में कार्रवाई कमजोर या पराजित पक्ष के नेताओं पर ही होती है। यही वजह है कि मौजूदा मिडिल ईस्ट संघर्ष में भले ही युद्ध अपराधों को लेकर गंभीर आरोप और बहस हो रही हो, लेकिन निकट भविष्य में किसी बड़े नेता को अंतरराष्ट्रीय अदालत से सजा मिलने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। सरल शब्दों में कहा जाए तो युद्ध में भी नियम मौजूद हैं, लेकिन वैश्विक राजनीति और शक्ति संतुलन के कारण इन नियमों को लागू करना हमेशा आसान नहीं होता।
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और Israel, Iran तथा United States के बीच जारी संघर्ष को लेकर भारत सरकार ने स्थिति पर कड़ी नजर बनाए रखी है। विदेश मंत्री S. Jaishankar ने सोमवार को Rajya Sabha में बयान देते हुए कहा कि भारत इस संकट का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए चाहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत कभी भी युद्ध का समर्थन नहीं करता और सभी पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील करता है। जयशंकर ने कहा कि खाड़ी क्षेत्र में हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं और सरकार वहां रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। उन्होंने बताया कि Narendra Modi स्वयं स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए हैं और सरकार की विभिन्न एजेंसियां हालात पर निगरानी कर रही हैं। उन्होंने कहा कि संघर्ष के कारण आम जनजीवन और कारोबार दोनों प्रभावित हो रहे हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर भी चिंताएं बढ़ी हैं। विदेश मंत्री ने यह भी बताया कि ईरान में फंसे भारतीयों की मदद के लिए Embassy of India, Tehran लगातार काम कर रहा है और जरूरत पड़ने पर भारतीयों को सुरक्षित बाहर निकालने की तैयारी भी की जा रही है। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में फंसे भारतीयों को वापस लाने के लिए सरकार हर संभव कदम उठा रही है। ऊर्जा आपूर्ति के मुद्दे पर बोलते हुए जयशंकर ने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को लेकर पूरी तरह सतर्क है और इस विषय पर सभी संबंधित विभागों को अलर्ट पर रखा गया है। उन्होंने बताया कि खाड़ी क्षेत्र के देश भारत के महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार हैं, लेकिन मौजूदा संघर्ष की वजह से व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका है। जयशंकर ने यह भी कहा कि भारत लगातार खाड़ी देशों के संपर्क में है और क्षेत्र में शांति बहाल करने की अपील कर रहा है। उन्होंने बताया कि मौजूदा परिस्थितियों में ईरान के नेतृत्व से संपर्क करना आसान नहीं है, फिर भी उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री से बातचीत कर स्थिति पर चर्चा की है। विदेश मंत्री के अनुसार भारत की नीति हमेशा स्पष्ट रही है कि अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान युद्ध से नहीं बल्कि संवाद, संयम और कूटनीति के जरिए होना चाहिए। भारत का मानना है कि तनाव कम करना और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना इस समय सबसे जरूरी है।
वैश्विक राजनीति में अमेरिका की भूमिका को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हाल ही में ईरान पर हमलों के बाद यह सवाल उठने लगा है कि दुनिया में बढ़ते संघर्षों में अमेरिका की भूमिका क्या है और उसके फैसलों का असर कितना व्यापक हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump अक्सर यह दावा करते रहे हैं कि उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को रोकने में भूमिका निभाई है। उन्होंने पहले भारत और पाकिस्तान के बीच हुए तनाव का जिक्र करते हुए कहा था कि उनकी मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच स्थिति नियंत्रण में आई। लेकिन आलोचकों का कहना है कि हाल के समय में अमेरिका की विदेश नीति कई नए विवादों और सैन्य टकरावों से जुड़ी रही है। खासकर मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को और जटिल बना दिया है। हालिया घटनाओं में अमेरिका और Israel द्वारा Iran पर किए गए हमलों को लेकर दुनिया भर में चर्चा हो रही है। इस घटनाक्रम के बाद कई विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर छोटे-छोटे संघर्ष तेजी से बड़े टकराव में बदल सकते हैं। ब्लॉग में यह भी कहा गया है कि आम अमेरिकी नागरिकों को भी अक्सर यह समझ नहीं आता कि उनके देश की विदेश नीति किस दिशा में जा रही है और किस कारण से किसी नए संघर्ष की शुरुआत हो जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक असर वाला मुद्दा है, क्योंकि इसका प्रभाव ऊर्जा बाजार, वैश्विक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी पड़ता है।
न्यूयॉर्क कोर्ट में गवाही, कहा– ‘परिवार को धमकी मिली, मजबूरी में माना काम’ अमेरिका की एक संघीय अदालत में चल रहे आतंकी साजिश के मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। पाकिस्तान के एक कारोबारी ने दावा किया है कि उसे ईरान की अर्धसैनिक संस्था Islamic Revolutionary Guard Corps (आईआरजीसी) के एक हैंडलर ने वर्ष 2024 में अमेरिका के शीर्ष नेताओं की हत्या की साजिश के लिए भर्ती किया था। आरोपी आसिफ मर्चेंट ने अदालत में कहा कि उसका परिवार खतरे में था और उसके पास इस काम को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। किन नेताओं को बनाया गया निशाना? अदालत में दी गई गवाही के अनुसार, साजिश के निशाने पर अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति Donald Trump, तत्कालीन राष्ट्रपति Joe Biden और पूर्व संयुक्त राष्ट्र राजदूत Nikki Haley थे। गौरतलब है कि आईआरजीसी को अमेरिका पहले ही “विदेशी आतंकी संगठन” घोषित कर चुका है। यह संगठन ईरान के सर्वोच्च नेता रहे Ayatollah Ali Khamenei के कार्यकाल में काफी प्रभावशाली बना। हाल ही में अमेरिका-इजराइल हमलों में खामेनेई की मौत की खबरों के बीच यह मामला और संवेदनशील हो गया है। अदालत में क्या बोला आरोपी? 47 वर्षीय आसिफ मर्चेंट ने न्यूयॉर्क की अदालत में उर्दू दुभाषिए के माध्यम से जूरी के सामने बयान दिया। उसने कहा, “मेरे परिवार को धमकी दी गई थी, इसलिए मुझे यह करना पड़ा।” मर्चेंट को 12 जुलाई 2024 को गिरफ्तार किया गया था। उसने अदालत में यह भी दावा किया कि उसे पहले से अंदेशा था कि वह पकड़ा जाएगा और वह बाद में अमेरिकी एजेंसियों के साथ सहयोग करने की योजना बना चुका था। एफबीआई के अंडरकवर एजेंट बने ‘सुपारी किलर’ मर्चेंट ने खुद किसी नेता की हत्या करने की योजना नहीं बनाई थी, बल्कि वह कथित रूप से योजना तैयार करने और गतिविधियों की जानकारी जुटाने का काम कर रहा था। उसने ट्रंप की रैलियों और उनकी आवाजाही की जानकारी जुटाई थी। रिपोर्ट के अनुसार, उसने दो ‘सुपारी किलर’ तय किए थे और उन्हें 5,000 डॉलर देने की व्यवस्था भी की थी। लेकिन जिन लोगों को वह हत्यारा समझ रहा था, वे वास्तव में Federal Bureau of Investigation (एफबीआई) के अंडरकवर एजेंट निकले। इसी वजह से पूरी साजिश नाकाम हो गई। अभियोजन पक्ष का तर्क सरकारी वकील नीना गुप्ता ने जिरह के दौरान मर्चेंट से सीधे सवाल किया कि क्या वह अमेरिका किसी राजनेता की हत्या के लिए माफिया से संपर्क करने आया था। इस पर मर्चेंट ने “हां” में जवाब दिया। हालांकि अभियोजन पक्ष का कहना है कि अगर मर्चेंट सचमुच मजबूर था, तो उसने गिरफ्तारी से पहले कानून प्रवर्तन एजेंसियों से संपर्क क्यों नहीं किया। इस पर आरोपी ने कहा कि उसे लगा एजेंसियां उसकी बात पर विश्वास नहीं करेंगी, क्योंकि उन्हें शक था कि वह “कोई सुपर जासूस” है। दो देशों में परिवार, लंबा कारोबारी करियर अदालत में बताया गया कि मर्चेंट का पाकिस्तान में 20 साल का बैंकिंग करियर रहा है। वह कपड़ा कारोबार, कार बिक्री, केला निर्यात और इंसुलेशन आयात जैसे कई व्यवसायों से जुड़ा रहा है। उसके दो परिवार हैं-एक पाकिस्तान में और दूसरा ईरान में। मर्चेंट का दावा है कि ईरान में उसके परिवार को खतरे में डालकर उस पर दबाव बनाया गया। अमेरिका-ईरान तनाव के बीच बढ़ी गंभीरता यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। मध्य पूर्व के कई देशों में हमलों और जवाबी कार्रवाई की खबरें आ रही हैं। ऐसे में यह साजिश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा सकती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
UPSC CSE Result 2025: देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक Civil Services Examination का अंतिम परिणाम जारी कर दिया गया है। Union Public Service Commission ने शुक्रवार 6 मार्च 2026 को UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 का फाइनल रिजल्ट घोषित किया। इस परीक्षा में अनुज अग्निहोत्री ने पहला स्थान हासिल किया है। परीक्षा में शामिल हुए उम्मीदवार अब आयोग की आधिकारिक वेबसाइट UPSC Official Website पर जाकर फाइनल मेरिट लिस्ट देख सकते हैं। 958 उम्मीदवारों का हुआ चयन यूपीएससी द्वारा जारी फाइनल रिजल्ट के अनुसार इस वर्ष कुल 958 उम्मीदवारों ने सफलता हासिल की है। चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति विभिन्न केंद्रीय सेवाओं में उनकी रैंक और पसंद के आधार पर की जाएगी। फाइनल रिजल्ट उम्मीदवारों के लिखित परीक्षा (Main Exam) और पर्सनैलिटी टेस्ट (Interview) में प्रदर्शन के आधार पर तैयार किया गया है। इन प्रतिष्ठित सेवाओं के लिए होता है चयन यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से देश की कई प्रतिष्ठित सेवाओं के लिए अधिकारियों का चयन किया जाता है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं— भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) भारतीय पुलिस सेवा (IPS) भारतीय विदेश सेवा (IFS) भारतीय राजस्व सेवा (IRS) भारतीय व्यापार सेवा सहित अन्य ग्रुप A और ग्रुप B सेवाएं 979 पदों को भरने का लक्ष्य सिविल सेवा परीक्षा 2025 के माध्यम से केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में कुल 979 रिक्त पदों को भरा जाना है। ऐसे चेक करें UPSC CSE 2025 का रिजल्ट उम्मीदवार नीचे दिए गए स्टेप्स के माध्यम से अपना रिजल्ट देख सकते हैं— आधिकारिक वेबसाइट upsc.gov.in पर जाएं होमपेज पर “Examination” टैब पर क्लिक करें “Active Examinations” या “What’s New” सेक्शन में जाएं Civil Services Examination Final Result 2025 लिंक पर क्लिक करें मेरिट लिस्ट की PDF खुल जाएगी Ctrl + F दबाकर अपना नाम या रोल नंबर सर्च करें 15 दिन में जारी होगी मार्कशीट यूपीएससी के अनुसार सभी उम्मीदवारों की मार्कशीट रिजल्ट जारी होने के 15 दिनों के भीतर आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कर दी जाएगी। उम्मीदवार इसे 30 दिनों तक ऑनलाइन डाउनलोड कर सकेंगे। पिछले साल का कट-ऑफ पिछले वर्ष का अंतिम कट-ऑफ इस प्रकार था— जनरल: 87.98 EWS: 85.92 OBC: 87.28 SC: 79.03 ST: 74.23 आयु सीमा क्या है यूपीएससी की अधिसूचना के अनुसार उम्मीदवार की आयु 1 अगस्त 2024 तक कम से कम 21 वर्ष और अधिकतम 32 वर्ष होनी चाहिए। यानी उम्मीदवार का जन्म 2 अगस्त 1992 से 1 अगस्त 2003 के बीच होना चाहिए। यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा भारत की सबसे कठिन और प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक मानी जाती है। हर साल लाखों उम्मीदवार इस परीक्षा में शामिल होते हैं, लेकिन तीन चरणों—प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू—को पार कर बहुत कम उम्मीदवार ही अंतिम सूची में जगह बना पाते हैं। UPSC CSE 2025 टॉप-20 उम्मीदवारों की सूची रैंक रोल नंबर नाम 1 1131589 अनुज अग्निहोत्री 2 4000040 राजेश्वरी सुवे एम 3 3512521 अकांश ढुल 4 0834732 राघव झुनझुनवाला 5 0409847 ईशान भटनागर 6 6410067 जिनिया अरोड़ा 7 0818306 ए आर राजा मोहिद्दीन 8 0843487 पक्षल सेक्रेटरी 9 0831647 आस्था जैन 10 1523945 उज्ज्वल प्रियांक 11 1512091 यशस्वी राज वर्धन 12 0840280 अक्षित भारद्वाज 13 7813999 अनन्या शर्मा 14 5402316 सुरभि यादव 15 3507500 सिमरनदीप कौर 16 0867445 मोनिका श्रीवास्तव 17 0829589 चितवन जैन 18 5604518 श्रुति आर 19 0105602 निसार दिशांत अमृतलाल 20 6630448 रवि राज