Governance

Punjab politics
क्या पंजाब बनेगा अगला बंगाल?

रांची। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अब पंजाब में संगठन विस्तार और चुनावी जमीन तैयार करने में जुटी है। 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी राज्य में अपनी रणनीति को धार देने में लगी है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि क्या पंजाब भी आने वाले समय में बंगाल की तरह भाजपा और विपक्ष के बीच सीधी राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बनेगा। बीजेपी पंजाब में कानून-व्यवस्था, नशे की समस्या, किसानों से जुड़े मुद्दों और विकास के एजेंडे को प्रमुखता से उठा रही है। पार्टी का प्रयास शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी अपने संगठन को मजबूत करना है। इसके लिए बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और नए चेहरों को जोड़ने की रणनीति पर काम किया जा रहा है।   राघव चड्ढा फैक्टर पर नजर पंजाब की राजनीति में राघव चड्ढा का नाम लगातार चर्चा में बना हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आम आदमी पार्टी के प्रमुख चेहरों में रहे राघव चड्ढा को लेकर चल रही अटकलों ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दी है। हालांकि, उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक किसी बड़े बदलाव की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद उनका नाम पंजाब की बदलती सियासी तस्वीर में अहम माना जा रहा है।   क्या पंजाब में दोहराएगा बंगाल वाला समीकरण? विशेषज्ञों का कहना है कि पंजाब की राजनीतिक परिस्थितियां पश्चिम बंगाल से काफी अलग हैं। यहां आम आदमी पार्टी सत्ता में है, जबकि शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और बीजेपी चार प्रमुख ताकतों के रूप में मैदान में हैं। ऐसे में बीजेपी के लिए चुनौती आसान नहीं होगी। फिर भी पार्टी संगठन का विस्तार, नए सामाजिक समीकरण और आक्रामक चुनावी रणनीति के जरिए खुद को मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है।आप के दो पूर्व नेता रेस में हैं।     पंजाब की सियासी ताकत की बात करे तो पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं। विधानसभा में बीजेपी के दो MLA हैं।पंजाब में लोकसभा की कुल सीटें 13 हैं। बीजेपी के पास कोई सीट नहीं है।पंजाब में राज्यसभा की कुल सीटें सात हैं। इनमें छह बीजेपी के पास हैं।   आप के दो पूर्व नेता हैं रेस में इधर पश्चिम बंगाल की जीत के बाद पंजाब को गंभीरता से ले रही बीजेपी राज्य को केंद्रीय मंत्रिमंडल फेरबदल में अधिक तवज्जो दे सकती है। चर्चा है कि पंजाब में AAP छोड़कर आए नेताओं को इनाम मिल सकता है। इनमें सेलिब्रेटी फेस राघव चड्ढा का नाम सबसे आगे है। उनके साथ अशोक मित्तल (लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी) का भी नाम चल रहा है। चर्चा है कि दोनों में किसी एक को मंत्री बनाया जा सकता है, लेकिन अभी फैसला नहीं हुआ है। रवनीत बिट्टू को बीजेपी चुनावों में झोंकना चाहती है। उनकी जगह पर हाल ही में मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद बने तरुण चुघ को लाया जा सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कद्दावर नेता चुघ पंजाब चुनाव में पार्टी को मजबूती देंगे। वह पंजाब से ही आते हैं।   अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि 2027 के विधानसभा चुनाव तक पंजाब की सियासत किस ओर करवट बैठती है ये तो आने वाला  वक्त  ही बताएगा। और क्या बीजेपी राज्य में वैसी ही राजनीतिक बढ़त हासिल कर पाएगी जैसी उसने बंगाल या अन्य राज्यों में दर्ज की है?

anjali kumari जून 30, 2026 0
Ketan Agarwal Murder Case
केतन मर्डर केस: चेतन चौधरी का होगा गेट एनालिसिस, जांच में खुल सकते हैं कई बड़े राज

पुणे, एजेंसियां। चर्चित केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। पुलिस ने मामले के मुख्य आरोपी चेतन चौधरी का गेट (Gait) एनालिसिस कराने का फैसला लिया है। जांच एजेंसियों का मानना है कि इस वैज्ञानिक परीक्षण से हत्या वाले दिन चेतन की गतिविधियों और घटनास्थल पर उसकी मौजूदगी से जुड़े महत्वपूर्ण सुराग मिल सकते हैं। इसी कड़ी में पुलिस मंगलवार को चेतन को लेकर एक बार फिर लोहागढ़ किला पहुंची, जहां पूरे घटनाक्रम का पुनर्निर्माण (क्राइम सीन रीक्रिएशन) किया जाएगा।   पुलिस हिरासत पांच दिन और बढ़ी सोमवार को महाराष्ट्र की एक अदालत ने मुख्य आरोपी सिया गोयल और चेतन चौधरी की पुलिस हिरासत पांच दिन के लिए बढ़ा दी। पुलिस ने अदालत को बताया कि मामले की जांच अभी जारी है और आरोपियों से पूछताछ के साथ-साथ घटनास्थल पर साक्ष्यों की पुष्टि के लिए उनका पुलिस हिरासत में रहना जरूरी है।   पासपोर्ट जलाने का भी आरोप पुलिस जांच के अनुसार, सिया गोयल ने कथित तौर पर केतन का पासपोर्ट चोरी कर उसे फाड़कर जला दिया था। दावा है कि परिवार की प्रस्तावित बाली यात्रा को रोकने और केतन के साथ विदेश जाने से बचने के लिए उसने ऐसा किया। जांच में कार चालक के बयान को भी अहम माना जा रहा है, जिसने बताया कि यात्रा के दौरान सिया कुछ देर के लिए अकेले कार तक गई थी।   हत्या की साजिश के मिले संकेत पुलिस का आरोप है कि 18 जून को लोहागढ़ किले पर केतन अग्रवाल को खाई में धक्का देकर हत्या की गई। शुरुआत में इसे हादसा माना गया था, लेकिन बाद की जांच में हत्या की आशंका सामने आई। पुलिस के मुताबिक, सिया और चेतन के बीच पिछले छह महीनों में 2,000 से अधिक फोन कॉल और लगभग 238 घंटे की बातचीत हुई थी। जांच एजेंसियों को शक है कि इन्हीं बातचीत के दौरान कथित साजिश रची गई।   पुलिस यह भी दावा कर रही है कि घटना से पहले भी केतन को खाई में धक्का देने की एक असफल कोशिश की गई थी। अब गेट एनालिसिस, क्राइम सीन रीक्रिएशन और अन्य फॉरेंसिक जांच के आधार पर पुलिस इस हाई-प्रोफाइल मामले की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है।

abhishek singh जून 30, 2026 0
Babulal Marandi
रांची में बीजेपी ने गिनाई पीएम मोदी के कार्यकाल की उपलब्धियां, कहा-25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आये

रांची। झारखंड प्रदेश बीजेपी ने गुरुवार को  PM मोदी के 12 साल के कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाईं। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मीडिया से कहा कि PM मोदी ने 12 साल का कार्यकाल पूरा किया। यह देश के लिये काफी गौरवपूर्ण बात है। उन्होंने देश के विकास, सुशासन और गरीब कल्याण के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल की। इस दौरान 25 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला गया।  उन्होंने कहा कि मोदी सरकार की नीतियों के कारण इतनी बड़ी संख्या में लोगों का गरीबी रेखा से बाहर निकलना, किसी भी सरकार के लिए बड़ी उपलब्धि है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रधानमंत्री का लक्ष्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि देश के गरीबों का उत्थान करना रहा है। 22 राज्यों में एनडीए की सरकार उन्होंने कहा कि आज देश के 22 राज्यों में एनडीए की सरकार है। विभिन्न राज्यों में भाजपा को जनता का लगातार समर्थन मिल रहा है। पीएम मोदी का कार्यकाल सत्ता नहीं साधना और तपस्या का कालखंड है।   जम्मू-कश्मीर से लेकर नॉर्थ ईस्ट तक विकास मरांडी ने कहा कि एक समय जम्मू-कश्मीर में रेल संपर्क की कल्पना भी नहीं की जाती थी। लेकिन, आज श्रीनगर तक ट्रेन पहुंच चुकी है। वहीं नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में भी अभूतपूर्व विकास कार्य हुए हैं। जिन क्षेत्रों को कभी विकास से वंचित रखा गया था। वहां आज सड़क, रेल और अन्य आधारभूत संरचनाओं का तेजी से विस्तार हुआ है। आर्टिकल 370 और 3 तलाक जैसे ऐतिहासिक फैसले उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का साहसिक निर्णय लिया। साथ ही तीन तलाक जैसी कुप्रथा को समाप्त कर महिलाओं को न्याय दिलाने का काम किया। ये ऐसे फैसले थे, जिनकी पहले कोई कल्पना भी नहीं करता था। ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाई भारत की ताकत उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि भारत आतंकवाद के खिलाफ कठोर कार्रवाई करेगा। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पूरी दुनिया ने भारत की सैन्य शक्ति और क्षमता को देखा। पहले रक्षा क्षेत्र की अधिकांश जरूरतें विदेशों से पूरी होती थीं। लेकिन, अब भारत आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। लड़ाकू विमानों सहित कई रक्षा उपकरणों का निर्माण देश में ही किया जा रहा है। कोरोना काल में दिखी मजबूत नेतृत्व क्षमता मरांडी ने कहा कि कोरोना महामारी के दौरान देशवासियों को एकजुट रखने और संकट से बाहर निकालने का सफल प्रयास किया। लगभग 50 करोड़ से अधिक लोगों को आयुष्मान भारत योजना से जोड़ा गया है।   करोड़ों गरीबों को मिली छत मरांडी ने कहा कि करोड़ों गरीब परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के मकान मिले हैं। अब तक लगभग 4 करोड़ मकानों का निर्माण कराया गया है।   दुनिया की अर्थव्यवस्था में पीछे था देश बाबूलाल मरांडी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस ने कई दशकों तक देश में शासन किया, लेकिन गांव और शहरों के विकास के लिए कोई ठोस काम नहीं किया। उन्होंने दावा किया कि 2014 से पहले भारत दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं में काफी पीछे था, जबकि आज देश चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है।

anjali kumari जून 11, 2026 0
Indian voters standing in queue at polling booth highlighting unequal voter distribution across constituencies
‘एक व्यक्ति, एक वोट’ पर बढ़ता सवाल: असमान मतदाता संख्या के बीच परिसीमन की मांग तेज

भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद समान प्रतिनिधित्व पर टिकी है, जहां हर नागरिक का वोट बराबर महत्व रखता है। इसी सिद्धांत को “एक व्यक्ति, एक वोट” कहा जाता है। लेकिन मौजूदा हालात में निर्वाचन क्षेत्रों के बीच मतदाताओं की संख्या में भारी असमानता इस सिद्धांत को कमजोर करती नजर आ रही है। ऐसे में अब परिसीमन (Delimitation) की जरूरत को लेकर बहस तेज हो गई है। क्या है समस्या? देश के अलग-अलग संसदीय क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में बहुत बड़ा अंतर है। उदाहरण के तौर पर: Malkajgiri में करीब 37.80 लाख मतदाता हैं जबकि Lakshadweep में केवल 58 हजार मतदाता इसी तरह: Ghaziabad में करीब 30 लाख वोटर हैं वहीं छोटे क्षेत्रों में यह संख्या कुछ लाख से भी कम है ऐसी स्थिति में कम आबादी वाले क्षेत्र के मतदाता का प्रभाव अधिक हो जाता है, जो लोकतांत्रिक समानता के सिद्धांत के विपरीत है। ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ क्यों हो रहा कमजोर? जब किसी क्षेत्र में बहुत अधिक मतदाता होते हैं: वहां का सांसद हर व्यक्ति तक पहुंच नहीं बना पाता लोगों की समस्याएं और अपेक्षाएं पूरी तरह सामने नहीं आ पातीं दूसरी ओर, कम मतदाताओं वाले क्षेत्रों में: प्रतिनिधि अपेक्षाकृत कम लोगों का प्रतिनिधित्व करता है वहां मतदाताओं की आवाज ज्यादा प्रभावी हो जाती है यही असंतुलन “एक व्यक्ति, एक वोट” के मूल सिद्धांत को कमजोर करता है। क्या है परिसीमन? परिसीमन का मतलब है: लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण हर सीट पर मतदाताओं की संख्या को संतुलित करना जब लोकसभा सीटों का परिसीमन होता है, तो उसके अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीटों की संरचना भी बदल जाती है। सरकार का क्या कहना है? केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने संसद में कहा कि: अधिक मतदाताओं वाले क्षेत्रों के सांसद सभी की अपेक्षाएं पूरी नहीं कर पाते इसलिए परिसीमन जरूरी है ताकि हर सीट पर मतदाताओं की संख्या संतुलित हो सके उन्होंने यह भी कहा कि “एक व्यक्ति, एक वोट” का सिद्धांत तभी सही मायनों में लागू होगा, जब यह असमानता दूर की जाए। महिला आरक्षण से भी जुड़ा है मामला सरकार के अनुसार: महिला आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए भी परिसीमन जरूरी है सीटों का सही बंटवारा और संख्या तय होने के बाद ही आरक्षण का लाभ सही तरीके से मिल सकेगा जनसंख्या बढ़ी, लेकिन सीटें नहीं 1971 में भारत की जनसंख्या करीब 54 करोड़ थी आज यह बढ़कर 140 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है लेकिन लोकसभा सीटों की संख्या लंबे समय से लगभग स्थिर है। विशेषज्ञों का मानना है कि: सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 तक करने पर विचार होना चाहिए इससे बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होगा बड़े और छोटे संसदीय क्षेत्र (उदाहरण) सबसे बड़े क्षेत्र: मलकाजगिरि – 37.80 लाख बेंगलुरु उत्तर – 32.15 लाख गाजियाबाद – 29.48 लाख गौतम बुद्ध नगर – 26.81 लाख पश्चिमी दिल्ली – 25.92 लाख सबसे छोटे क्षेत्र: लक्षद्वीप – 58 हजार दमन और दीव – 1.34 लाख लद्दाख – 1.90 लाख दादरा और नगर हवेली – 2.83 लाख अंडमान और निकोबार – 3.15 लाख

surbhi अप्रैल 20, 2026 0
Uttar Pradesh assembly building with discussion on increasing seats from 403 to 605 amid delimitation talks
UP में बढ़ सकती है विधानसभा सीटें! 403 से बढ़कर 605 होने की चर्चा, जानिए पूरा मामला

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ने को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। मौजूदा 403 सीटों के मुकाबले भविष्य में यह संख्या बढ़कर 605 तक पहुंच सकती है। हालांकि, यह बदलाव 2027 के विधानसभा चुनाव में लागू नहीं होगा। क्यों बढ़ सकती हैं सीटें? यह चर्चा संभावित परिसीमन (Delimitation) और नारी वंदन अधिनियम के तहत प्रस्तावित बदलावों के कारण शुरू हुई है। सूत्रों के मुताबिक: लोकसभा और विधानसभा सीटों में करीब 50% तक बढ़ोतरी हो सकती है यूपी में लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर 120 हो सकती हैं विधानसभा सीटें 403 से बढ़कर 605 होने का अनुमान 2027 चुनाव पर क्या असर? 2027 के विधानसभा चुनाव पुरानी 403 सीटों पर ही होंगे सीटों में बढ़ोतरी परिसीमन के बाद लागू होगी संभावना है कि 2032 के बाद नए ढांचे पर चुनाव हो आबादी के हिसाब से क्यों जरूरी? यूपी में तेजी से बढ़ती आबादी के कारण: एक विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या काफी बढ़ गई है आंकड़ों पर नजर: 1952: 347 सीटें, प्रति सीट ~1.82 लाख आबादी 1973: 425 सीटें, प्रति सीट ~2.8 लाख वर्तमान (403 सीट): प्रति सीट ~4.95 लाख आबादी अगर 605 सीटें होती हैं तो: प्रति सीट आबादी घटकर करीब 3.30 लाख रह जाएगी जिलों में क्या होगा बदलाव? अभी 75 जिलों में औसतन 3-5 विधानसभा सीटें हैं बढ़ोतरी के बाद यह संख्या 6-8 सीट प्रति जिला हो सकती है बड़े और छोटे विधानसभा क्षेत्र सबसे बड़े क्षेत्र: साहिबाबाद, लोनी, मुरादनगर (7-12 लाख मतदाता) छोटे क्षेत्र: महोबा, सीसामऊ

surbhi मार्च 25, 2026 0
WWII bomb found India
सुवर्णरेखा नदी किनारे मिला द्वितीय विश्व युद्ध काल का बम, आज सेना का हाई-रिस्क डिफ्यूज ऑपरेशन

पूर्वी सिहंभूम। झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के बहरागोड़ा प्रखंड में सुवर्णरेखा नदी किनारे द्वितीय विश्व युद्ध काल का 227 किलोग्राम वजनी बम मिलने से हड़कंप मच गया है। दशकों पुराना यह अनएक्सप्लोडेड ऑर्डिनेंस (UXO) आज भी बेहद खतरनाक बताया जा रहा है।   सेना ने संभाली कमान मामले की गंभीरता को देखते हुए भारतीय सेना की स्पेशल बम निरोधक टीम मौके पर पहुंच चुकी है। लेफ्टिनेंट कर्नल धर्मेंद्र सिंह के नेतृत्व में टीम ने ऑपरेशन की पूरी रणनीति तैयार कर ली है। बुधवार को इस बम को निष्क्रिय करने के लिए हाई-रिस्क डिफ्यूज ऑपरेशन चलाया जाएगा।   कड़ी सुरक्षा व्यवस्था सुरक्षा के मद्देनजर बम स्थल के एक किलोमीटर दायरे को पूरी तरह खाली करा लिया गया है। इलाके में नो-एंट्री लागू कर दी गई है और बैरिकेडिंग की गई है। साथ ही पश्चिम बंगाल सीमा से सटे गांवों को भी अलर्ट पर रखा गया है। ऑपरेशन के दौरान हवाई गतिविधियों पर भी रोक रहेगी।   ऐसे किया जा रहा है सुरक्षित बम को निष्क्रिय करने के लिए उसके चारों ओर बालू भरी बोरियों का घेरा बनाया गया है और करीब 10 फीट गहरे गड्ढे में सुरक्षित रखा गया है, ताकि संभावित विस्फोट की ऊर्जा जमीन के भीतर ही सीमित रहे।   रिमोट से होगा ऑपरेशन जानकारी के मुताबिक, यह डिफ्यूज ऑपरेशन करीब एक किलोमीटर दूर से रिमोट सिस्टम के जरिए किया जाएगा, जिससे किसी भी खतरे की स्थिति में जोखिम कम किया जा सके।   आठ दिन पहले चला था पता करीब आठ दिन पहले स्थानीय लोगों ने इस बम को देखा था, जिसके बाद पुलिस और प्रशासन ने तुरंत सेना को सूचना दी। बम पर “AN-M64 500-LB American Made” अंकित है, जिससे इसकी पहचान द्वितीय विश्व युद्ध के बम के रूप में हुई है।

Unknown मार्च 25, 2026 0
West Bengal government enforces new medical rules for ministers requiring CM approval for out-of-state treatment
बंगाल में मंत्रियों पर सख्ती: राज्य के बाहर इलाज के लिए CM की अनुमति अनिवार्य

पश्चिम बंगाल सरकार ने मंत्रियों और उनके परिवार के चिकित्सा खर्च को लेकर सख्त कदम उठाया है। अब राज्य के बाहर किसी भी अस्पताल में इलाज कराने से पहले मुख्यमंत्री से पूर्व अनुमति लेना जरूरी होगा। इस संबंध में गृह विभाग की ओर से अधिसूचना जारी कर दी गई है, जिसे कोलकाता गजट में प्रकाशित किया गया है। नए नियम के तहत मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और उपमंत्री इसके दायरे में आएंगे। साथ ही उनके कुछ परिजनों को भी इस सुविधा में शामिल किया गया है। क्यों लिया गया फैसला? सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य चिकित्सा खर्चों पर नियंत्रण रखना और प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना है। अधिकारियों के मुताबिक, हाल के वर्षों में कुछ मामलों में बिना गंभीर बीमारी के भी अन्य राज्यों में इलाज कराकर भारी-भरकम बिल जमा किए गए थे, जिसके बाद यह फैसला लिया गया। पहले क्या थी व्यवस्था? पहले मंत्रियों को राज्य के बाहर इलाज कराने के लिए किसी तरह की पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं थी। इसी कारण कई बार मेडिकल खर्च को लेकर विवाद भी सामने आए थे। किन पर लागू होगा नियम? इस नई व्यवस्था में मंत्रियों के परिवार के कुछ सदस्य भी शामिल होंगे, जैसे: अविवाहित बेटियां आश्रित माता-पिता 18 वर्ष तक के आश्रित भाई-बहन किन अस्पतालों में मिलेगा लाभ? अब चिकित्सा सुविधाओं का दायरा बढ़ा दिया गया है। इसमें शामिल हैं: सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त अस्पताल पश्चिम बंगाल क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट, 2017 के तहत पंजीकृत निजी अस्पताल और नर्सिंग होम कौन-कौन सी सुविधाएं होंगी शामिल? नई व्यवस्था के तहत निम्न सेवाएं कवर होंगी: डॉक्टर से परामर्श पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी जांच दवाएं और टीकाकरण सर्जरी और दंत चिकित्सा खर्च कैसे होगा कवर? सरकारी अस्पतालों में इलाज पूरी तरह मुफ्त रहेगा निजी या पंजीकृत अस्पतालों में इलाज पर सरकार खर्च वहन करेगी या प्रतिपूर्ति देगी इसके अलावा डॉक्टर के निजी चैंबर, मंत्री आवास पर इलाज, अस्पताल के उच्च श्रेणी के वार्ड और विशेष नर्सिंग सेवाओं का खर्च भी योजना के तहत कवर किया जाएगा।  

surbhi मार्च 25, 2026 0
Government office in Dhanbad with officials amid land dispute case, highlighting administrative action and accountability
धनबाद में प्रशासन पर कड़ा एक्शन: जमीन विवाद में रिपोर्ट न देने पर सीओ की सैलरी रोकी

धनबाद: झारखंड के धनबाद जिले से प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर एक बड़ा मामला सामने आया है। लंबे समय तक जमीन विवाद में रिपोर्ट नहीं देने पर उपभोक्ता फोरम ने अंचल अधिकारी (सीओ) की सैलरी पर रोक लगाने का आदेश जारी किया है। इस फैसले के बाद जिला प्रशासन में हलचल तेज हो गई है और अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। बार-बार निर्देश के बावजूद नहीं दी गई रिपोर्ट उपभोक्ता फोरम की सुनवाई के दौरान यह पाया गया कि संबंधित अंचल अधिकारी को कई बार जमीन की स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए गए थे। फोरम यह जानना चाहता था कि संबंधित जमीन रैयती है या गैर आबाद श्रेणी में आती है। इसके बावजूद तय समयसीमा में रिपोर्ट नहीं सौंपी गई। इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए फोरम ने सख्त रुख अपनाया और सीओ के वेतन पर रोक लगाने का आदेश दे दिया। जिला प्रशासन को भी दिए गए निर्देश फोरम ने अपने आदेश में जिला प्रशासन को भी स्पष्ट रूप से निर्देशित किया है कि इस आदेश का सख्ती से पालन कराया जाए। आदेश की प्रति उपायुक्त और संबंधित अधिकारी को भेज दी गई है। यह कदम साफ संकेत देता है कि अब प्रशासनिक लापरवाही को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। क्या है पूरा मामला यह विवाद धनबाद के भूली क्षेत्र की रहने वाली इंदिरा कुमारी की शिकायत से जुड़ा है। उन्होंने वर्ष 2018 में लुबी सर्कुलर रोड स्थित SSLNT कॉलेज के पीछे एक बिल्डर से करीब 1400 वर्ग फीट का फ्लैट बुक कराया था। आरोप है कि पैसे लेने के बावजूद बिल्डर ने समय पर फ्लैट की रजिस्ट्री नहीं कराई। लगातार देरी के कारण शिकायतकर्ता को जमीन की वैधता पर संदेह होने लगा। जमीन की वैधता पर उठे गंभीर सवाल शिकायतकर्ता ने आशंका जताई कि संबंधित जमीन कहीं छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) के दायरे में तो नहीं आती, या फिर यह गैर आबाद जमीन तो नहीं है। इसी संदेह को दूर करने के लिए उन्होंने उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया। इस मामले में बिल्डर कंपनी और अन्य संबंधित पक्षों को भी शामिल किया गया है। फोरम ने मांगी थी स्पष्ट स्थिति सुनवाई के दौरान फोरम ने अंचल कार्यालय से जमीन की वास्तविक स्थिति पर स्पष्ट रिपोर्ट मांगी थी, जो इस मामले के समाधान के लिए बेहद जरूरी थी। लेकिन समय पर जानकारी नहीं मिलने से न सिर्फ शिकायतकर्ता को परेशानी हुई, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया भी प्रभावित हुई। लापरवाही पर सख्त संदेश उपभोक्ता फोरम का यह फैसला प्रशासन के लिए एक कड़ा संदेश माना जा रहा है। यह साफ कर दिया गया है कि आम लोगों से जुड़े मामलों में लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। खासकर जमीन और संपत्ति जैसे संवेदनशील मामलों में अधिकारियों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। पीड़ित को जल्द न्याय की उम्मीद इस सख्त कार्रवाई के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि मामले की सुनवाई अब तेज होगी और शिकायतकर्ता को जल्द न्याय मिल सकेगा। कुल मिलाकर यह मामला सिर्फ जमीन विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की एक बड़ी परीक्षा बन चुका है, जिसमें उपभोक्ता फोरम ने सख्त रुख अपनाकर एक मिसाल पेश की है।  

surbhi मार्च 20, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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kalpana जुलाई 21, 2026 0