Sawan Somwar Bel Patra Ke Upay: सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित माना जाता है और इस दौरान पड़ने वाले सोमवार का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। शिवभक्त इस दिन व्रत रखते हैं, शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं और भगवान भोलेनाथ को बेलपत्र अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यताओं में बेलपत्र को भगवान शिव का प्रिय माना गया है। इस बार सावन में चार सोमवार पड़ रहे हैं, जिनमें पहला सोमवार 3 अगस्त 2026 को है। मान्यता है कि सावन सोमवार के दिन शिव पूजा के साथ बेलपत्र से जुड़े कुछ पारंपरिक उपाय करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सकारात्मकता, सुख-शांति एवं समृद्धि के संयोग बन सकते हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, बेलपत्र से जुड़े कुछ उपाय अलग-अलग मनोकामनाओं के लिए किए जाते हैं। आइए जानते हैं सावन सोमवार पर बेलपत्र के कौन-कौन से उपाय किए जा सकते हैं। सुख-शांति और कालसर्प दोष के लिए बेलपत्र का उपाय सावन सोमवार के दिन स्नान आदि से निवृत्त होकर 108 बेलपत्र लें। इन पर सफेद चंदन से ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘श्रीराम’ लिखकर भगवान शिव को अर्पित करने की परंपरा बताई गई है। मान्यता के अनुसार, इस उपाय को सांसारिक सुख, मानसिक शांति और भगवान शिव की कृपा से जोड़कर देखा जाता है। कुंडली में कालसर्प दोष की स्थिति में भी इस उपाय को शुभ माना जाता है। हालांकि, कालसर्प दोष और उसके प्रभाव से जुड़ी मान्यताएं ज्योतिष पर आधारित हैं और इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उपचार नहीं माना जाता। परिवार के आरोग्य के लिए करें यह उपाय यदि परिवार में कोई व्यक्ति लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी परेशानी से जूझ रहा है, तो सावन सोमवार पर बेलपत्र से जुड़ी यह पारंपरिक पूजा की जा सकती है। इसके लिए तांबे के पात्र में पीला चंदन मिला हुआ जल लें और उसमें 108 बेलपत्र डालें। इसके बाद शिवलिंग पर श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करते हुए भगवान शिव का ध्यान करें और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस पूजा के माध्यम से भगवान शिव से परिवार के सदस्य के अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना की जाती है। ध्यान रखें: बीमारी की स्थिति में यह धार्मिक उपाय चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर योग्य डॉक्टर की सलाह और उपचार जरूरी है। मंदिर न जा पाएं तो बेलपत्र के पेड़ के पास करें पूजा किसी कारण से यदि आप मंदिर नहीं जा सकते या आसपास शिवलिंग उपलब्ध नहीं है, तो बेलपत्र के पौधे या वृक्ष के पास भी पूजा करने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यता है कि बेलपत्र के मूल स्थान में भगवान शिव का वास माना जाता है। ऐसे में बेलपत्र के वृक्ष के मूल में जल अर्पित करें। इसके बाद धूप, पुष्प आदि चढ़ाएं और दीपक जलाकर भगवान शिव का स्मरण करें। मान्यता के अनुसार, श्रद्धापूर्वक की गई इस पूजा से मन में सकारात्मकता और आध्यात्मिक शांति का भाव बढ़ सकता है। आर्थिक तंगी के लिए करें दान सावन में बेलपत्र को भगवान शिव से जुड़ा महत्वपूर्ण पूजन सामग्री माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहा है तो सावन सोमवार के दिन बेलपत्र के मूल स्थान के पास किसी जरूरतमंद या शिवभक्त को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूध, घी और अन्न का दान किया जा सकता है। मान्यता है कि जरूरतमंद की सहायता और दान-पुण्य से घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मकता का वातावरण बनता है। सावन सोमवार पर बेलपत्र चढ़ाते समय रखें इन बातों का ध्यान भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा प्राचीन धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। पूजा करते समय श्रद्धा और स्वच्छता का ध्यान रखना महत्वपूर्ण माना जाता है। बेलपत्र अर्पित करते समय भगवान शिव का ध्यान करें और अपनी मनोकामना के साथ-साथ परिवार के सुख, शांति और कल्याण की प्रार्थना करें। धार्मिक अनुष्ठानों में स्थानीय परंपरा और अपने परिवार की पूजा-पद्धति का भी सम्मान करें। सावन सोमवार 2026: आस्था के साथ सेवा का भी संदेश सावन सोमवार केवल पूजा और व्रत तक सीमित नहीं है। इस अवसर पर जरूरतमंदों की सहायता, अन्नदान और सेवा को भी धार्मिक परंपराओं में विशेष महत्व दिया गया है। इसलिए यदि आप बेलपत्र से जुड़े उपाय कर रहे हैं, तो अपनी क्षमता के अनुसार किसी जरूरतमंद की मदद करना भी इस दिन को सार्थक बना सकता है।
हिंदू धर्म में पूजा के दौरान दीपक जलाना शुभ और मंगलकारी माना जाता है। मान्यता है कि दीपक की लौ केवल प्रकाश ही नहीं देती, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक होती है। कई धार्मिक मान्यताओं और लोकविश्वासों के अनुसार, पूजा के समय दीपक की लौ में बनने वाली कुछ आकृतियां जीवन से जुड़े शुभ-अशुभ संकेत भी दे सकती हैं। ज्योतिष एवं वास्तु से जुड़े पारंपरिक मतों के अनुसार, दीपक की लौ में बनने वाली आकृतियों को दैवीय संकेत माना जाता है। हालांकि, इन मान्यताओं का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है और इन्हें धार्मिक आस्था एवं परंपरागत विश्वास के रूप में ही देखा जाना चाहिए। आइए जानते हैं कि दीपक की लौ में दिखाई देने वाली अलग-अलग आकृतियों का पारंपरिक अर्थ क्या माना जाता है। दीपक की लौ में दिखने वाले शुभ संकेत त्रिशूल, ॐ या स्वास्तिक जैसी आकृति धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि दीपक की लौ में त्रिशूल, ॐ या स्वास्तिक जैसी आकृति दिखाई दे, तो इसे अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह ईश्वर की विशेष कृपा और सकारात्मक ऊर्जा का संकेत हो सकता है। साथ ही जीवन में चल रही बाधाएं धीरे-धीरे दूर होने की संभावना मानी जाती है। फूल जैसी आकृति यदि लौ में कमल या गुलाब जैसे फूल की आकृति प्रतीत हो, तो पारंपरिक मान्यता के अनुसार यह इस बात का संकेत माना जाता है कि आपकी पूजा-आराधना स्वीकार हो रही है। इसे आने वाले शुभ समाचार और मनोकामनाओं की पूर्ति से भी जोड़ा जाता है। हंस या मोर की आकृति हंस और मोर दोनों को भारतीय संस्कृति में शुभता, ज्ञान और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। यदि दीपक की लौ में ऐसी आकृति दिखाई दे, तो इसे परिवार में सुख-शांति, प्रेम और मानसिक संतुलन का संकेत माना जाता है। भगवान गणेश जैसी आकृति यदि लौ में भगवान गणेश का स्वरूप प्रतीत हो, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह कार्यों में आ रही बाधाओं के दूर होने और नए शुभ कार्यों के सफल होने का संकेत माना जाता है। दीपक की लौ में दिखाई देने वाले सतर्क करने वाले संकेत दो भागों में बंटी हुई लौ यदि दीपक की लौ बीच से दो हिस्सों में विभाजित दिखाई दे, तो पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इसे शुभ नहीं माना जाता। इसे परिवार में मतभेद, आर्थिक चुनौतियों या किसी प्रकार की अस्थिरता का संकेत माना जाता है। बिना हवा के काला धुआं निकलना यदि वातावरण शांत होने के बावजूद दीपक से लगातार काला धुआं निकल रहा हो, तो लोकमान्यताओं के अनुसार इसे नकारात्मक ऊर्जा का संकेत माना जाता है। ऐसी स्थिति में घर की साफ-सफाई, सकारात्मक वातावरण और पूजा-पाठ पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी जाती है। लगातार फड़फड़ाती हुई लौ यदि दीपक की लौ बिना स्पष्ट कारण के लगातार तेज़ी से कांपती या फड़फड़ाती रहे, तो इसे आने वाली चुनौतियों, अनावश्यक खर्चों या स्वास्थ्य संबंधी सावधानी बरतने का संकेत माना जाता है। ध्यान रखने योग्य बात धार्मिक मान्यताएं व्यक्ति की आस्था और परंपराओं पर आधारित होती हैं। दीपक की लौ में दिखाई देने वाली आकृतियों को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। इन्हें भविष्य की निश्चित भविष्यवाणी या वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। सकारात्मक सोच, सत्कर्म और नियमित पूजा ही जीवन में मानसिक शांति और आत्मविश्वास का आधार बनते हैं।
दुबई, एजेंसियां। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) ने 2028 पुरुष T20 वर्ल्ड कप के फॉर्मेट में बड़े बदलावों को मंजूरी दे दी है। नए प्रारूप के तहत टूर्नामेंट में 20 टीमें हिस्सा लेंगी, लेकिन अब प्रतियोगिता ग्रुप स्टेज, एलिमिनेटर, सुपर 10 और नॉकआउट चरणों में खेली जाएगी। ICC का कहना है कि नए फॉर्मेट का उद्देश्य अधिक प्रतिस्पर्धी मुकाबले और उभरती टीमों को बेहतर अवसर देना है। एलिमिनेटर राउंड से बढ़ेगा रोमांच नए फॉर्मेट में ग्रुप चरण के बाद कुछ टीमें सीधे अगले दौर में पहुंचेंगी, जबकि अन्य क्वालीफाई करने वाली टीमें एलिमिनेटर मुकाबले खेलेंगी। इन मुकाबलों के विजेता आगे बढ़ेंगे, जबकि हारने वाली टीमों का सफर यहीं समाप्त हो जाएगा। 'सुपर 10' में होगा खिताब का असली मुकाबला एलिमिनेटर के बाद 10 टीमें 'सुपर 10' चरण में पहुंचेंगी। यहां सभी टीमों को दो समूहों में बांटा जाएगा और प्रत्येक टीम अपने समूह की अन्य टीमों से मुकाबला करेगी। इसके बाद शीर्ष टीमें सेमीफाइनल में जगह बनाएंगी। उभरती टीमों को मिलेगा बड़ा मौका ICC के अनुसार, नए फॉर्मेट से एसोसिएट और उभरती क्रिकेट टीमों को अधिक प्रतिस्पर्धी मैच खेलने का अवसर मिलेगा। साथ ही बड़े देशों के बीच अधिक हाई-वोल्टेज मुकाबले देखने को मिल सकते हैं। 2028 से लागू होगा नया प्रारूप ICC ने स्पष्ट किया है कि नया फॉर्मेट 2028 पुरुष T20 वर्ल्ड कप से लागू होगा। इस टूर्नामेंट की मेजबानी ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड संयुक्त रूप से करेंगे। नए प्रारूप को लेकर क्रिकेट जगत में उत्सुकता बढ़ गई है।
आषाढ़ अमावस्या को सनातन धर्म में पितरों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से किए गए कर्म पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति में सहायक होते हैं। वहीं, स्वप्न शास्त्र में भी अमावस्या के दिन सपने में पितरों के दर्शन को विशेष संकेत माना गया है। यदि इस दिन आपको सपने में अपने पूर्वज दिखाई दें, तो कुछ धार्मिक उपाय करने की परंपरा बताई गई है। आइए जानते हैं इन मान्यताओं के बारे में। आषाढ़ अमावस्या पर सपने में पितर दिखने का क्या माना जाता है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या के दिन सपने में पूर्वजों का दिखाई देना उनके आशीर्वाद, स्मरण या किसी संदेश का संकेत माना जाता है। स्वप्न शास्त्र में कहा गया है कि ऐसे सपनों के बाद श्रद्धापूर्वक पितरों का तर्पण और दान-पुण्य करना शुभ माना जाता है। सपने में पितरों के दर्शन हों तो करें ये उपाय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि अमावस्या के दिन सपने में पूर्वज दिखाई दें तो ये कार्य किए जा सकते हैं- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान सूर्य को जल अर्पित करें। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल में काले तिल और कुश मिलाकर पितरों का तर्पण करें। जरूरतमंदों या ब्राह्मण को भोजन कराएं। अपनी श्रद्धा अनुसार अन्न, वस्त्र या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करें। शाम के समय दक्षिण दिशा में या पीपल के वृक्ष के समीप सरसों के तेल का दीपक जलाएं और श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें। सपने में मुस्कुराते हुए पितर दिखें तो क्या संकेत मिलता है? स्वप्न शास्त्र में माना गया है कि यदि सपने में पूर्वज प्रसन्न या मुस्कुराते हुए दिखाई दें, तो इसे शुभ संकेत माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यह उनके संतोष और आशीर्वाद का प्रतीक हो सकता है तथा परिवार में सुख-समृद्धि का संकेत देता है। अगर सपने में पितर भोजन मांगें तो क्या करें? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि सपने में पूर्वज भोजन मांगते हुए दिखाई दें, तो तर्पण, पिंडदान या ब्राह्मण भोजन कराने जैसी धार्मिक परंपराओं का पालन करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। आषाढ़ अमावस्या का धार्मिक महत्व आषाढ़ अमावस्या को पितरों के निमित्त किए जाने वाले तर्पण, दान और पूजा-पाठ का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए धार्मिक कार्यों को पुण्यदायी माना जाता है। साथ ही, जरूरतमंदों की सहायता और दान-पुण्य को भी इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है। अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक मान्यताओं, स्वप्न शास्त्र और पारंपरिक विश्वासों पर आधारित है। IDTV Indradhanush इन मान्यताओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं करता। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या उपाय को अपनाने से पहले अपने विवेक का उपयोग करें।
रांची। रांची के सदर अस्पताल में बनने वाली झारखंड की पहली सरकारी बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) यूनिट का निर्माण फिलहाल अंतिम प्रशासनिक मंजूरी का इंतजार कर रहा है। परियोजना की लागत 6.45 करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 10 करोड़ रुपये हो गई है। एल-1 कंपनी ने संशोधित डिजाइन और नई लागत के आधार पर सबसे कम बोली लगाई है। लागत बढ़ने के साथ यूनिट के प्लान और डिजाइन में भी कई तकनीकी बदलाव किए गए हैं, जिसके कारण निर्माण कार्य अब तक शुरू नहीं हो सका है। स्वास्थ्य विभाग की मंजूरी के बाद तीन माह में होगा निर्माण सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार ने बताया कि यूनिट का संशोधित डिजाइन पूरी तरह तैयार कर लिया गया है और इसे स्वास्थ्य विभाग को भेजा जा रहा है। विभाग से संशोधित डीपीआर और बढ़ी हुई लागत को मंजूरी मिलते ही चयनित एजेंसी को कार्यादेश जारी कर दिया जाएगा। निर्माण शुरू होने के बाद एजेंसी को तीन महीने के भीतर यूनिट तैयार कर पूरी तरह संचालन योग्य बनाना होगा। सातवीं मंजिल पर बनेगी अत्याधुनिक यूनिट संक्रमण के खतरे को देखते हुए बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट सदर अस्पताल की सातवीं मंजिल पर विकसित की जाएगी। यहां नियंत्रित वातावरण, क्लीन रूम, आइसोलेशन जोन, सीमित प्रवेश व्यवस्था, आईसीयू स्तर की सुविधाएं और हाई-एफिशिएंसी एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम स्थापित किए जाएंगे। साथ ही सेंसर आधारित हैंड-फ्री स्टेशन जैसी आधुनिक संक्रमण नियंत्रण व्यवस्थाएं भी उपलब्ध होंगी। झारखंड के मरीजों को मिलेगा बड़ा लाभ यूनिट शुरू होने के बाद राज्य के हजारों मरीजों को बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगरों का रुख नहीं करना पड़ेगा। सदर अस्पताल के हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. अभिषेक रंजन और विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम रांची में ही यह जटिल उपचार उपलब्ध कराएगी। वर्तमान में निजी अस्पतालों में इस उपचार पर 15 से 30 लाख रुपये या उससे अधिक खर्च आता है। सरकारी अस्पताल में यह सुविधा शुरू होने से मरीजों को कम लागत में इलाज मिलेगा और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी।
पूजा-पाठ में भगवान को फल अर्पित करना सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। हालांकि, कई श्रद्धालुओं के मन में यह सवाल रहता है कि क्या बीज वाले फल भगवान को चढ़ाए जा सकते हैं या नहीं। खासकर आम, तरबूज, लीची या अन्य बड़े बीज वाले फलों को लेकर लोगों में अलग-अलग धारणाएं देखने को मिलती हैं। आइए जानते हैं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस विषय में क्या माना जाता है और भोग लगाते समय किन नियमों का पालन करना चाहिए। क्या भगवान को बीज वाले फल चढ़ा सकते हैं? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान को बीज वाले फल अर्पित करना पूरी तरह स्वीकार्य माना जाता है। फल को सात्विक और पवित्र भोग माना गया है तथा मौसमी फलों का भोग विशेष शुभ माना जाता है। हालांकि, यदि फल में बड़ा बीज हो, जैसे आम, तरबूज या अन्य ऐसे फल, तो भोग लगाने से पहले उसका बीज निकाल देना उचित माना जाता है। मान्यता है कि भगवान को वही स्वरूप में भोग अर्पित करना चाहिए, जैसा भोजन सामान्य रूप से ग्रहण किया जाता है। भोग लगाने से पहले इन नियमों का रखें ध्यान भगवान को फल अर्पित करते समय केवल फल का चयन ही नहीं, बल्कि उसकी शुद्धता और प्रस्तुत करने का तरीका भी महत्वपूर्ण माना गया है। भोग में शामिल किए जाने वाले फलों को पहले साफ पानी से अच्छी तरह धो लें। पूजा से काफी पहले फल काटकर न रखें। भोग से ठीक पहले ही फल धोकर या काटकर अर्पित करें। यदि फल बड़ा है तो उसे स्वच्छ चाकू से काटकर भगवान के सामने रखें। भोग में संभव हो तो तुलसी दल भी शामिल करें, जिसे विशेष रूप से शुभ माना जाता है। भोग लगाते समय मन शांत रखें और पूरी श्रद्धा एवं भक्ति के साथ भगवान का स्मरण करें। श्रद्धा को सबसे अधिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान के लिए सबसे महत्वपूर्ण भक्त की सच्ची भावना और श्रद्धा होती है। भोग कितना बड़ा या महंगा है, इससे अधिक महत्व उसे अर्पित करने के भाव का माना गया है। इसलिए पूजा के दौरान अहंकार छोड़कर पूर्ण विश्वास और भक्ति के साथ भगवान को भोग अर्पित करना चाहिए। बड़े बीज वाले फलों के लिए क्या करें? यदि किसी फल में बड़ा और कठोर बीज हो, तो उसे निकालकर फल भगवान को अर्पित करना बेहतर माना जाता है। वहीं छोटे बीज वाले फलों को सामान्य रूप से भी चढ़ाया जा सकता है। उद्देश्य यह माना जाता है कि भगवान को वही भोजन प्रेमपूर्वक अर्पित किया जाए, जिसे आसानी से ग्रहण किया जा सके। ध्यान रखें धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं में विभिन्न क्षेत्रों और संप्रदायों के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। ऐसे में यदि आपके परिवार या गुरु द्वारा बताए गए विशेष पूजा-विधान हैं, तो उनका पालन करना अधिक उचित माना जाता है। पूजा में सबसे महत्वपूर्ण तत्व श्रद्धा, पवित्रता और सच्ची आस्था ही मानी जाती है।
नई दिल्ली: भारत और पोलैंड के रिश्ते नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहे हैं। भारत दौरे पर आए पोलैंड के विदेश मंत्रालय के सचिव व्लादिस्लाव तेओफिल बार्तोशेव्स्की ने कहा कि दोनों देशों के बीच रक्षा, व्यापार, तकनीक और ऊर्जा समेत कई क्षेत्रों में सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की आर्थिक प्रगति की भी सराहना की और कहा कि भारत वैश्विक स्तर पर लगातार मजबूत भूमिका निभा रहा है। अक्टूबर में भारत आएंगे पोलैंड के प्रधानमंत्री पोलैंड के विदेश मंत्रालय के सचिव ने बताया कि पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क अक्टूबर में भारत की यात्रा करेंगे। इस दौरे की तैयारियों को लेकर दोनों देशों के अधिकारियों के बीच लगातार बातचीत चल रही है। उन्होंने कहा कि यह यात्रा भारत-पोलैंड रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करेगी। रक्षा क्षेत्र में बढ़ेगा सहयोग बार्तोशेव्स्की ने कहा कि भारत और पोलैंड रक्षा क्षेत्र में संयुक्त उत्पादन और तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पोलैंड पहले ही भारत में ड्रोन निर्माण शुरू कर चुका है। अब दोनों देश संयुक्त रक्षा उत्पादन, तकनीक हस्तांतरण और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पोलैंड भारत की 'मेक इन इंडिया' पहल का समर्थन करता है और भारतीय कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करने के लिए तैयार है। भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते से बढ़ेगा कारोबार पोलैंड के अधिकारी ने भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का स्वागत करते हुए कहा कि इससे दोनों देशों के बीच व्यापार को नई गति मिलेगी। उन्होंने बताया कि वर्तमान में भारत और पोलैंड के बीच करीब 6 अरब यूरो का द्विपक्षीय व्यापार होता है, जिसे आने वाले वर्षों में और बढ़ाने की बड़ी संभावना है। भारत की आर्थिक प्रगति की सराहना बार्तोशेव्स्की ने कहा कि पिछले 11 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक और तकनीकी प्रगति की है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का भारत का लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन देश उस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने भारत की खाद्यान्न उत्पादन क्षमता, तकनीकी विकास और आर्थिक सुधारों की भी प्रशंसा की। वैश्विक मुद्दों पर भारत के रुख का समर्थन पोलैंड के अधिकारी ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खुला रहना चाहिए और किसी भी प्रकार की बाधा स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम का विरोध किया और पश्चिम एशिया के मुद्दों पर भारत के संतुलित कूटनीतिक दृष्टिकोण की सराहना की। रूस-यूक्रेन युद्ध का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से सुना जाता है। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति का समर्थन करते हुए कहा कि पोलैंड की भी आतंकवाद के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति है। इन क्षेत्रों में भी बढ़ेगा सहयोग पोलैंड ने भारत के साथ निम्न क्षेत्रों में दीर्घकालिक सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई है- रक्षा और संयुक्त सैन्य उत्पादन ऊर्जा और हरित ऊर्जा स्वच्छ जल प्रबंधन अंतरिक्ष और सैटेलाइट तकनीक ड्रोन निर्माण तकनीकी नवाचार व्यापार और निवेश दोनों देशों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह साझेदारी आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी क्षेत्रों में और अधिक मजबूत होगी।
हिंदू धर्म में भड़ली नवमी को वर्ष की सबसे शुभ तिथियों में से एक माना जाता है। इस दिन को 'अबूझ मुहूर्त' की श्रेणी में रखा जाता है, यानी ऐसा शुभ दिन जब कई मांगलिक कार्यों के लिए अलग से पंचांग या शुभ मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। वर्ष 2026 में भड़ली नवमी 22 जुलाई को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किए गए शुभ कार्यों से सुख, समृद्धि और सफलता की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यवसाय की शुरुआत और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए यह तिथि विशेष मानी जाती है। क्या होता है 'अबूझ मुहूर्त'? 'अबूझ मुहूर्त' का अर्थ है ऐसा शुभ समय जिसमें पूरे दिन किसी भी समय मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं। मान्यता है कि भड़ली नवमी पर ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति शुभ कार्यों के लिए अनुकूल रहती है, इसलिए अलग से मुहूर्त निकालने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसी वजह से देश के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग इस दिन अपने महत्वपूर्ण कार्यों की शुरुआत करना शुभ मानते हैं। भड़ली नवमी पर कौन-कौन से कार्य किए जाते हैं? धार्मिक परंपराओं के अनुसार भड़ली नवमी पर कई शुभ कार्य किए जा सकते हैं, जैसे— विवाह गृह प्रवेश नए व्यापार की शुरुआत भूमि पूजन संपत्ति खरीदना वाहन खरीदना आभूषण खरीदना नामकरण संस्कार यज्ञ एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान मान्यता है कि इस दिन शुरू किए गए कार्यों में बाधाएं कम आती हैं और सफलता की संभावना बढ़ जाती है। क्यों मानी जाती है इतनी शुभ? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भड़ली नवमी सकारात्मक ऊर्जा, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक है। इसलिए इस दिन किए गए मांगलिक कार्य विशेष फलदायी माने जाते हैं। इसी कारण इसे हिंदू पंचांग की सबसे शुभ तिथियों में शामिल किया जाता है और कई परिवार वर्षों से इस दिन महत्वपूर्ण धार्मिक एवं पारिवारिक आयोजन करते आ रहे हैं। इस दिन किन बातों का रखें ध्यान? भड़ली नवमी के दिन कुछ धार्मिक परंपराओं का पालन करने की भी सलाह दी जाती है। भगवान विष्णु और मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा करें। यदि परिवार या निकट संबंधियों में शोक की स्थिति हो, तो मांगलिक कार्य टालने की परंपरा कई स्थानों पर प्रचलित है। किसी बड़े धार्मिक या पारिवारिक आयोजन से पहले अपने परिवार की परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं का भी ध्यान रखें। धार्मिक महत्व भड़ली नवमी केवल एक शुभ तिथि ही नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का भी महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है। इस दिन शुभ कार्य करने से जीवन में सुख, समृद्धि और शुभ फल की प्राप्ति होने का विश्वास है। यही वजह है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग इस तिथि का इंतजार करते हैं और अपने महत्वपूर्ण कार्य इसी दिन संपन्न करते हैं। नोट: भड़ली नवमी को 'अबूझ मुहूर्त' मानने की परंपरा विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग हो सकती है। किसी भी बड़े धार्मिक या पारिवारिक निर्णय से पहले स्थानीय परंपराओं या योग्य पुरोहित की सलाह लेना उचित माना जाता है।
मुंबई, एजेंसियां। अजय देवगन, रितेश देशमुख, अरशद वारसी और जावेद जाफरी स्टारर कॉमेडी फिल्म 'धमाल 4' ने रिलीज के पहले ही दिन बॉक्स ऑफिस पर शानदार शुरुआत की है। निर्देशक इंद्र कुमार की इस मल्टीस्टारर फिल्म ने पहले दिन भारत में करीब ₹13.5–13.75 करोड़ का नेट कलेक्शन किया, जबकि दुनियाभर में इसकी कमाई ₹20 करोड़ का आंकड़ा पार कर लगभग ₹21 करोड़ से अधिक पहुंच गई। कॉमेडी का जादू दर्शकों को आया पसंद लंबे समय बाद बड़े पर्दे पर लौटी 'धमाल' फ्रेंचाइजी को दर्शकों से अच्छा रिस्पॉन्स मिला है। फिल्म के हल्के-फुल्के हास्य, पुराने किरदारों की वापसी और दमदार स्टारकास्ट ने फैमिली ऑडियंस को सिनेमाघरों तक खींचने में अहम भूमिका निभाई। पहले दिन कई शहरों में शो के दौरान अच्छी ऑक्यूपेंसी दर्ज की गई, जिससे वीकेंड पर कमाई में और तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है। वीकेंड से बढ़ी उम्मीदें हालांकि फिल्म अपनी पिछली किस्त 'टोटल धमाल' की ओपनिंग को पीछे नहीं छोड़ सकी, लेकिन ट्रेड एक्सपर्ट्स का मानना है कि सकारात्मक वर्ड ऑफ माउथ और छुट्टियों का फायदा मिलने पर फिल्म शुरुआती वीकेंड में मजबूत कारोबार कर सकती है। मेकर्स को उम्मीद है कि 'धमाल 4' आने वाले दिनों में घरेलू और विदेशी बाजारों में अपनी कमाई का ग्राफ और ऊपर ले जाएगी।
हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के दौरान चरणामृत और पंचामृत का विशेष महत्व माना जाता है। हालांकि कई लोग इन्हें एक ही समझ लेते हैं, जबकि सनातन परंपरा में दोनों का अर्थ, बनाने की विधि और धार्मिक उपयोग अलग-अलग है। आइए जानते हैं कि चरणामृत और पंचामृत में क्या अंतर है और पूजा के बाद इनके बचे हुए भाग का क्या करना चाहिए। चरणामृत क्या होता है? चरणामृत का अर्थ है भगवान के चरणों का अमृत। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान के चरणों का स्पर्श प्राप्त जल अत्यंत पवित्र माना जाता है। चरणामृत तैयार करने के लिए आमतौर पर इन चीजों का उपयोग किया जाता है— स्वच्छ जल गंगाजल तुलसी के पत्ते चंदन मान्यता है कि चरणामृत का सेवन करने से मन को शांति मिलती है, सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भगवान की कृपा प्राप्त होती है। इसे तांबे के पात्र में रखना शुभ माना जाता है। पंचामृत क्या होता है? पंचामृत का अर्थ है पांच अमृत तत्वों का मिश्रण। इसका उपयोग मुख्य रूप से देवी-देवताओं के अभिषेक (स्नान) में किया जाता है। पंचामृत बनाने में सामान्यतः इन सामग्रियों का प्रयोग होता है— गाय का दूध दही घी शहद शक्कर (या मिश्री) कई परंपराओं में इसमें थोड़ी मात्रा में जल भी मिलाया जाता है। अभिषेक के बाद यही पंचामृत भक्तों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। चरणामृत और पंचामृत में मुख्य अंतर चरणामृत पंचामृत भगवान के चरणों का पवित्र जल माना जाता है पांच पवित्र पदार्थों से तैयार किया जाता है जल, गंगाजल, तुलसी और चंदन का उपयोग दूध, दही, घी, शहद और शक्कर का उपयोग पूजा के बाद प्रसाद स्वरूप दिया जाता है अभिषेक के लिए उपयोग होता है, फिर प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है तांबे के पात्र में रखना शुभ माना जाता है चांदी, कांसे या मिट्टी के पात्र में रखना शुभ माना जाता है बचा हुआ चरणामृत या पंचामृत क्या करें? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बचा हुआ चरणामृत या पंचामृत सिंक, नाली या किसी अपवित्र स्थान पर नहीं बहाना चाहिए। यदि पूजा के बाद यह बच जाए, तो इसे— तुलसी के पौधे में अर्पित करें। किसी पवित्र पौधे या स्वच्छ स्थान पर श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। ऐसा करना धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है। धार्मिक महत्व चरणामृत और पंचामृत दोनों ही हिंदू पूजा-पद्धति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चरणामृत जहां भगवान के चरणों की कृपा और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है, वहीं पंचामृत शुद्धता, समृद्धि और देवपूजन में श्रद्धा का प्रतीक है। दोनों का उपयोग अलग-अलग उद्देश्यों के लिए किया जाता है और इन्हें श्रद्धा एवं सम्मान के साथ ग्रहण करने की परंपरा है.
12 जुलाई को रखा जाएगा रवि प्रदोष व्रत, प्रदोष काल में करें भगवान शिव की पूजा Pradosh Vrat 2026: हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। जुलाई 2026 का पहला प्रदोष व्रत 12 जुलाई, रविवार को पड़ रहा है। रविवार के दिन होने के कारण इसे रवि प्रदोष व्रत या भानु प्रदोष व्रत कहा जाएगा। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने और व्रत रखने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं तथा सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। प्रदोष व्रत 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रदोष व्रत की पूजा सूर्यास्त के समय यानी प्रदोष काल में करना सबसे शुभ माना जाता है। त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 12 जुलाई 2026, सुबह 02:04 बजे त्रयोदशी तिथि समाप्त: 12 जुलाई 2026, रात 10:29 बजे प्रदोष काल पूजा मुहूर्त: शाम 07:22 बजे से रात 09:24 बजे तक प्रदोष व्रत की पूजा विधि प्रदोष व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें तथा भगवान शिव के समक्ष दीपक प्रज्वलित करें। दिनभर श्रद्धा के साथ व्रत रखें। अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार निराहार या फलाहार रह सकते हैं। इस दौरान "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करना शुभ माना जाता है। शाम को प्रदोष काल से पहले स्नान कर पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। इसके बाद उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवान शिव की पूजा आरंभ करें। शिवलिंग का पंचामृत से अभिषेक करें और फिर चंदन, बेलपत्र, धतूरा, भांग, सफेद पुष्प तथा अक्षत अर्पित करें। इसके बाद भगवान शिव को फल और मिठाई का भोग लगाएं। अंत में शिव चालीसा और प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें तथा कपूर या दीपक से भगवान शिव की आरती करें। पूजा पूर्ण होने के बाद प्रसाद वितरित करें और विधि अनुसार व्रत का पारण करें। रवि प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रवि प्रदोष व्रत रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से कुंडली में सूर्य ग्रह की स्थिति मजबूत होती है और व्यक्ति के जीवन से अनेक बाधाएं दूर होती हैं। मान्यता यह भी है कि इस व्रत के पुण्य प्रभाव से पितृ दोष का प्रभाव कम होता है तथा यश, सम्मान, सुख-समृद्धि और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। नोट: व्रत, पूजा और शुभ मुहूर्त से जुड़ी मान्यताएं धार्मिक विश्वासों और पंचांग पर आधारित हैं। श्रद्धालु स्थानीय परंपरा या अपने पुरोहित की सलाह के अनुसार भी पूजा कर सकते हैं।
नई दिल्ली: आज, 29 जून 2026 (सोमवार) को वट पूर्णिमा व्रत रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना के साथ यह व्रत करती हैं। इस दिन वट (बरगद) वृक्ष, माता सावित्री और सत्यवान की विधि-विधान से पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा और नियमपूर्वक वट पूर्णिमा व्रत करने से वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वट पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि वट पूर्णिमा के दिन महिलाओं को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ या लाल एवं पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा के दौरान इन बातों का विशेष ध्यान रखें— सोलह श्रृंगार करके व्रत और पूजा का संकल्प लें। एक बांस की टोकरी में सात प्रकार के अनाज रखें और उसे स्वच्छ कपड़े से ढक दें। पूजा की सामग्री लेकर वट (बरगद) वृक्ष के पास जाएं। वट वृक्ष, माता सावित्री और सत्यवान की विधिवत पूजा करें। वट वृक्ष पर जल अर्पित करें तथा कुमकुम, अक्षत, फूल, फल, रोली और दीप अर्पित करें। कच्चा सूत लपेटते हुए वट वृक्ष की परिक्रमा करें। वट सावित्री व्रत कथा श्रद्धापूर्वक सुनें। पूजा के बाद दान-दक्षिणा करें। चना और गुड़ का प्रसाद अर्पित करें। सुहाग की सामग्री वट वृक्ष पर चढ़ाएं। घर लौटकर पति का आशीर्वाद लें और उन्हें प्रसाद अर्पित करें। वट पूर्णिमा व्रत में क्या करें? सोलह श्रृंगार अवश्य करें। पूजा में सुहाग की सामग्री अर्पित करें। व्रत का पारण परंपरा के अनुसार भीगे हुए चने खाकर करें। पूजा में चढ़ाई गई सुहाग सामग्री किसी सुहागिन महिला, सास या ननद को भेंट करें। वट वृक्ष की 5, 7, 11, 21 या 51 परिक्रमा करें। यदि संभव हो तो 108 परिक्रमा भी की जा सकती है। वट पूर्णिमा व्रत में क्या नहीं करना चाहिए? मन में नकारात्मक विचार न रखें। किसी से विवाद या बहस करने से बचें। जीवनसाथी से क्रोध या कटु व्यवहार न करें। काले, नीले और सफेद रंग के वस्त्र पहनने से बचें। व्रत कथा के दौरान बीच में उठकर न जाएं। पूरी कथा समाप्त होने के बाद ही अपने स्थान से उठें। धार्मिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प, तप और पतिव्रत धर्म के बल पर अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए थे। तभी से वट पूर्णिमा और वट सावित्री व्रत को अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन का प्रतीक माना जाता है।
Nirjala Ekadashi 2026 Date: हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे पूरे वर्ष की 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है और व्रती पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर उपवास रखते हैं। इसलिए इसे सबसे कठिन और सबसे फलदायी एकादशी भी कहा जाता है। कब है निर्जला एकादशी 2026? पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 24 जून 2026, बुधवार को शाम 6:13 बजे से होगा और इसका समापन 25 जून 2026, गुरुवार को शाम 8:10 बजे पर होगा। उदया तिथि के आधार पर निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। तिथि समय एकादशी तिथि प्रारंभ 24 जून 2026, शाम 6:13 बजे एकादशी तिथि समाप्त 25 जून 2026, शाम 8:10 बजे निर्जला एकादशी व्रत 25 जून 2026, गुरुवार क्यों माना जाता है निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ? शास्त्रों के अनुसार, निर्जला एकादशी का महत्व अत्यंत विशेष है। पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है कि इस दिन बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु का स्मरण और उपवास करने से मनुष्य को बड़े से बड़े पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। इस दिन किए गए स्नान, दान, जप और पूजा का फल अक्षय माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत से मेरु पर्वत के समान बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। भीमसेनी एकादशी क्यों कहलाती है? निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों में से भीमसेन अपनी प्रबल भूख के कारण नियमित व्रत नहीं रख पाते थे। तब उन्होंने महर्षि वेदव्यास से ऐसा उपाय पूछा, जिससे उन्हें सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो सके। महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी पर निर्जल रहकर व्रत करने का उपदेश दिया। भीमसेन ने इस कठिन व्रत का पालन किया और उन्हें वर्षभर की सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त हुआ। तभी से इसे भीमसेनी एकादशी कहा जाने लगा। क्यों मिलता है 24 एकादशियों के बराबर फल? धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो लोग पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का व्रत करने में सक्षम नहीं होते, उनके लिए निर्जला एकादशी विशेष महत्व रखती है। कहा जाता है कि केवल इस एक व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से वर्षभर में आने वाली सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है। निर्जला एकादशी व्रत की विधि प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन करें। पीले वस्त्र, तुलसी दल, फल और पंचामृत अर्पित करें। दिनभर अन्न और जल का त्याग कर उपवास रखें। विष्णु मंत्र और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। जरूरतमंदों को दान करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक व्रत का पारण करें।
हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 संस्कारों का वर्णन मिलता है। इनमें अंतिम संस्कार को अंत्येष्टि संस्कार कहा जाता है। मृत्यु के समय व्यक्ति के मुख में तुलसी का पत्ता और गंगाजल डालने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। गरुड़ पुराण में इस परंपरा के पीछे गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक कारण बताए गए हैं। मृत्यु के समय तुलसी का पत्ता रखने का महत्व गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु निकट होती है तो उसकी आत्मा शरीर छोड़ने की तैयारी करती है। मान्यता है कि उस समय यमदूत जीवात्मा को लेने आते हैं, जिससे आत्मा भयभीत हो सकती है। शास्त्रों में तुलसी को भगवान विष्णु की अत्यंत प्रिय माना गया है और इसे ‘हरिप्रिया’ कहा जाता है। माना जाता है कि मृत्यु के समय यदि व्यक्ति के मुख, सिर या छाती पर तुलसी का पत्ता रखा जाए तो यमदूत उसके पास नहीं आते। इसके बजाय भगवान विष्णु के दूत उसकी आत्मा का मार्गदर्शन करते हैं और उसे शुभ लोकों की ओर ले जाते हैं। गंगाजल को क्यों माना गया है मोक्षदायी? सनातन परंपरा में गंगा नदी को केवल जलधारा नहीं, बल्कि मां गंगा का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गंगाजल अत्यंत पवित्र होता है और यह व्यक्ति के पापों का नाश करने वाला माना गया है। गरुड़ पुराण में वर्णन मिलता है कि यदि मृत्यु के समय गंगाजल की कुछ बूंदें व्यक्ति के कंठ से नीचे उतर जाएं तो उसके जीवनभर के अनेक पापों का क्षय होता है। ऐसा माना जाता है कि इससे आत्मा को सांसारिक बंधनों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। यमलोक की यातनाओं से मुक्ति की मान्यता धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी और गंगाजल का स्पर्श आत्मा को शांति प्रदान करता है। यह माना जाता है कि इनके प्रभाव से आत्मा को यमलोक की कठोर यातनाओं का सामना नहीं करना पड़ता और उसे शुभ गति प्राप्त होती है। शास्त्रों में वर्णित श्लोक गरुड़ पुराण में इस परंपरा के महत्व को दर्शाते हुए एक प्रसिद्ध श्लोक का उल्लेख मिलता है— तुलसीदलयुक्तं जलं यो पिबेत् मरणे काले। स गच्छति परं धाम यत्र न म्रियते पुनः।। अर्थ: जो व्यक्ति मृत्यु के समय तुलसी युक्त जल का सेवन करता है, वह परम धाम को प्राप्त करता है, जहां पहुंचने के बाद उसे पुनः जन्म और मृत्यु के चक्र में नहीं आना पड़ता। धार्मिक आस्था और परंपरा का संगम तुलसी और गंगाजल से जुड़ी यह परंपरा हिंदू धर्म में आस्था, श्रद्धा और मोक्ष की अवधारणा से गहराई से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि आज भी अधिकांश हिंदू परिवार मृत्यु के अंतिम क्षणों में अपने प्रियजनों को तुलसी और गंगाजल अर्पित करते हैं, ताकि उनकी आत्मा को शांति और शुभ गति प्राप्त हो सके।
सनातन धर्म में गायत्री मंत्र को अत्यंत पवित्र, शक्तिशाली और कल्याणकारी मंत्रों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप करने से मन को शांति मिलती है, बुद्धि का विकास होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, इस मंत्र के जप के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना भी आवश्यक माना गया है। गायत्री मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।। गायत्री मंत्र का अर्थ गायत्री मंत्र का अर्थ है— "हम उस परम प्रकाशमान, सर्वशक्तिमान और दिव्य परमात्मा के तेज का ध्यान करते हैं। वह परम तेज हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे और हमें सत्य तथा सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करे।" यह मंत्र ज्ञान, विवेक और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक माना जाता है। गायत्री मंत्र जप का सही समय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गायत्री मंत्र का जप विशेष रूप से इन समयों में शुभ माना जाता है— सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय के समय सूर्यास्त के बाद संध्या काल में मान्यता है कि इन समयों में वातावरण अपेक्षाकृत शांत और सात्विक होता है, जिससे ध्यान और मंत्र जप में एकाग्रता बढ़ती है। गायत्री मंत्र जप के प्रमुख नियम 1. स्वच्छता का रखें विशेष ध्यान मंत्र जप से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। शारीरिक और मानसिक पवित्रता पर विशेष बल दिया जाता है। 2. शांत स्थान का चयन करें जप के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करें जहां शांति हो और ध्यान भंग न हो। मंत्र जप शुरू करने से पहले माता गायत्री का स्मरण और ध्यान करें। 3. रुद्राक्ष की माला का प्रयोग परंपरागत मान्यताओं के अनुसार गायत्री मंत्र के जप के लिए रुद्राक्ष की माला का उपयोग शुभ माना जाता है। 4. 108 बार जप का महत्व एक माला में 108 मनके होते हैं। इसलिए कम से कम 108 बार मंत्र जप करना शुभ माना जाता है। 5. सकारात्मक भाव रखें मंत्र जप करते समय मन में सकारात्मक विचार और शुभ संकल्प रखना चाहिए। मान्यता है कि श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किया गया जप अधिक फलदायी माना जाता है। 6. संध्या से पहले जप करते समय मौन रहें कुछ धार्मिक परंपराओं में माना जाता है कि यदि सूर्यास्त से पहले जप किया जाए तो यथासंभव मौन रहकर जप करना चाहिए। क्या कोई भी कर सकता है गायत्री मंत्र का जप? इस विषय में विभिन्न धार्मिक परंपराओं और मतों में अलग-अलग विचार मिलते हैं। कई परंपराएं मानती हैं कि गायत्री मंत्र का जप गुरु से दीक्षा लेकर करना चाहिए और गुरु द्वारा बताए गए नियमों का पालन करना चाहिए। वहीं कई आधुनिक आध्यात्मिक संस्थाएं श्रद्धा और उचित उच्चारण के साथ सभी लोगों को गायत्री मंत्र जप की अनुमति देती हैं। यदि आप किसी विशेष धार्मिक परंपरा का पालन करते हैं, तो अपने गुरु या आध्यात्मिक मार्गदर्शक से परामर्श लेना उचित रहेगा। गायत्री मंत्र जप के बताए गए लाभ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नियमित गायत्री मंत्र जप से— मानसिक शांति प्राप्त होती है। एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है। सकारात्मक सोच विकसित होती है। आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। निर्णय लेने की क्षमता बेहतर हो सकती है। विद्यार्थियों को अध्ययन में लाभ मिलने की मान्यता है। हालांकि इन लाभों को धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
भगवान गणेश को समर्पित विभुवन संकष्टी चतुर्थी इस वर्ष 3 जून 2026, बुधवार को मनाई जाएगी। हिंदू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा और व्रत करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं तथा सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। विभुवन संकष्टी चतुर्थी को वर्ष भर में आने वाली संकष्टी चतुर्थियों में सबसे दुर्लभ और विशेष माना जाता है, क्योंकि यह केवल तीन वर्ष में एक बार आती है। यह ज्येष्ठ अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। विभुवन संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व हिंदू मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य देव हैं। विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने और गणपति बप्पा की पूजा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, कार्यों में सफलता मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। विशेष रूप से संतान सुख, आर्थिक उन्नति और मानसिक शांति की कामना करने वाले भक्त इस व्रत को बड़ी श्रद्धा के साथ करते हैं। पूजा के लिए आवश्यक सामग्री विभुवन संकष्टी चतुर्थी की पूजा शुरू करने से पहले सभी सामग्री एकत्र कर लेना शुभ माना जाता है। आवश्यक पूजा सामग्री भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र लाल या पीला वस्त्र दूर्वा घास लाल पुष्प अक्षत (चावल) रोली कुमकुम पीला चंदन धूप अगरबत्ती दीपक कपूर घी कलश गंगाजल पान के पत्ते सुपारी लौंग इलायची कलावा मौसमी फल मिठाई या मोदक तांबे, पीतल या चांदी का लोटा पूजा विधि व्रत के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान गणेश का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। एक साफ चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान गणेश को रोली, चंदन का तिलक लगाएं और 21 दूर्वा तथा लाल पुष्प अर्पित करें। इसके बाद धूप, दीप और अगरबत्ती जलाकर पूजा प्रारंभ करें। गणेश जी को फल, मिठाई, अक्षत, लौंग, इलायची तथा अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। पूजा के दौरान गणेश मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप करें और विभुवन संकष्टी व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करें। अंत में कपूर या दीपक से भगवान गणेश की आरती करें। चंद्रमा को अर्घ्य देने का विशेष महत्व संकष्टी चतुर्थी व्रत में चंद्र दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। रात्रि में चंद्रमा के दर्शन होने पर लोटे में जल, दूध और चंदन मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित करें। इसके बाद भगवान गणेश का प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण करें। मान्यता है कि इस विधि से पूजा करने पर भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं।
सनातन धर्म में तिलक केवल एक धार्मिक चिन्ह नहीं, बल्कि आस्था, ऊर्जा और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। पूजा-पाठ, यज्ञ, दान और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में तिलक का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार तिलक धारण करने से व्यक्ति को शुभ फल प्राप्त होते हैं और उसकी आध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि होती है। शास्त्रों में तिलक का महत्व धार्मिक ग्रंथों में तिलक को अत्यंत पवित्र माना गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मपर्व में उल्लेख मिलता है कि स्नान, दान, तप, हवन, देवपूजन और पितरों से जुड़े कर्म यदि तिलक लगाए बिना किए जाएं तो उनका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। यही कारण है कि वैदिक परंपरा में पूजा और धार्मिक अनुष्ठान से पहले तिलक धारण करने की परंपरा रही है। किस अंगुली से तिलक लगाने का क्या फल मिलता है? स्कंदपुराण में तिलक लगाने की विधि और उसके प्रभाव का विस्तार से वर्णन किया गया है। अनामिका (रिंग फिंगर) से तिलक लगाने पर शांति और मानसिक संतुलन की प्राप्ति होती है। मध्यमा अंगुली से तिलक करने पर आयु वृद्धि का फल बताया गया है। अंगूठे से लगाया गया तिलक स्वास्थ्य और बल प्रदान करने वाला माना जाता है। तर्जनी अंगुली से तिलक लगाने को मोक्ष प्राप्ति से जोड़ा गया है। देवी-देवताओं के अनुसार अलग-अलग तिलक हिंदू धर्म में विभिन्न संप्रदायों और उपासना पद्धतियों के अनुसार तिलक के स्वरूप भी अलग-अलग होते हैं। विष्णु भक्तों का ऊर्ध्व तिलक भगवान विष्णु के उपासक माथे पर दो सीधी रेखाओं वाला ऊर्ध्व तिलक धारण करते हैं, जो भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। शक्ति उपासकों का तिलक मां शक्ति की आराधना करने वाले साधक प्रायः दो बिंदुओं या विशेष स्वरूप का तिलक लगाते हैं, जो शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक होता है। शिव भक्तों का त्रिपुंड भगवान शिव के भक्त भस्म से तीन आड़ी रेखाओं वाला त्रिपुंड धारण करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि त्रिपुंड धारण कर जप, तप और पूजा करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है। तिलक का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व माथे के बीच का भाग, जहां तिलक लगाया जाता है, शरीर का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा केंद्र माना जाता है। योग और ध्यान परंपरा में इसे आज्ञा चक्र कहा जाता है। यह स्थान दोनों भौंहों के बीच स्थित होता है और मानसिक एकाग्रता तथा चेतना से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि इस स्थान पर चंदन, कुमकुम या भस्म का तिलक लगाने से मन को शांति मिलती है, एकाग्रता बढ़ती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि माथे के इस हिस्से पर हल्का दबाव मानसिक तनाव को कम करने और ध्यान केंद्रित करने में सहायक हो सकता है। केवल परंपरा नहीं, आस्था और ऊर्जा का प्रतीक तिलक सनातन संस्कृति की एक महत्वपूर्ण पहचान है। यह व्यक्ति की धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। पूजा, व्रत और शुभ कार्यों में तिलक लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी श्रद्धालु इसे शुभता, सकारात्मकता और ईश्वरीय कृपा का प्रतीक मानते हैं।
हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर संस्कार का विशेष महत्व माना गया है। सनातन परंपरा के अनुसार प्रत्येक धार्मिक कार्य को विधि-विधान और निर्धारित नियमों के साथ करना जरूरी माना जाता है। यही वजह है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार भी पूरी श्रद्धा और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाता है। Garuda Purana में मृत्यु, आत्मा और मोक्ष से जुड़े कई नियमों और मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। इन्हीं मान्यताओं के अनुसार सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार करना अशुभ माना गया है। अंतिम संस्कार का क्या है धार्मिक महत्व? हिंदू मान्यता के अनुसार मृत्यु केवल शरीर का अंत है, जबकि आत्मा अमर मानी जाती है। अंतिम संस्कार को आत्मा की मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है। धार्मिक विश्वास है कि यदि दाह संस्कार सही विधि-विधान, मंत्रों और परंपराओं के अनुसार न किया जाए, तो आत्मा को शांति नहीं मिलती और उसे मोक्ष प्राप्त करने में बाधा आ सकती है। सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार क्यों नहीं किया जाता? Garuda Purana और अन्य धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार: सूर्य देव प्रकाश, ऊर्जा और सकारात्मकता के प्रतीक माने जाते हैं। दिन के समय किए गए संस्कारों को शुभ और देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त माना जाता है। रात का समय नकारात्मक शक्तियों और अशुभ प्रभावों से जुड़ा माना गया है। इसी वजह से माना जाता है कि सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार करने से आत्मा को मोक्ष प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है। यही कारण है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु रात में हो जाए, तो शव को अगले दिन सूर्योदय तक सुरक्षित रखा जाता है। इसके पीछे वैज्ञानिक और व्यावहारिक कारण भी हैं धार्मिक मान्यताओं के अलावा इसके पीछे कुछ व्यावहारिक वजहें भी बताई जाती हैं। प्राचीन समय में: रात में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था नहीं होती थी जंगलों और श्मशान घाटों में सुरक्षा का खतरा रहता था अंतिम संस्कार की प्रक्रिया सही ढंग से पूरी करना कठिन होता था इन्हीं कारणों से दिन के समय अंतिम संस्कार करने की परंपरा विकसित हुई, जो आज भी कई परिवारों में निभाई जाती है। परंपरा और आस्था का प्रतीक सनातन धर्म में अंतिम संस्कार केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और मोक्ष से जुड़ा पवित्र संस्कार माना जाता है। इसलिए आज भी अधिकांश लोग सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से बचते हैं और पारंपरिक मान्यताओं का पालन करते हैं।
Vat Savitri Vrat हिंदू धर्म का एक बेहद महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखती हैं। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। इस व्रत से जुड़ी कई परंपराएं हैं, लेकिन इनमें सबसे खास मानी जाती है बहू द्वारा अपनी सास को “बायना” देने की रस्म। पूजा के बाद बहुएं अपनी सास को श्रृंगार सामग्री, मिठाई, फल और वस्त्र भेंट कर उनका आशीर्वाद लेती हैं। क्यों दिया जाता है बायना? Savitri और Satyavan की कथा के अनुसार, माता सावित्री ने अपने पतिव्रता धर्म, बुद्धिमानी और समर्पण से यमराज को प्रसन्न किया था। उन्होंने अपने पति सत्यवान के प्राण मांगने से पहले अपने अंधे सास-ससुर की आंखों की रोशनी और उनका खोया हुआ राजपाट वापस मांगा था। इसी प्रसंग को आदर्श बहू के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। माना जाता है कि सास-ससुर का सम्मान और सेवा परिवार में सुख-शांति और समृद्धि लाती है। यही कारण है कि वट सावित्री के दिन बहुएं अपनी सास को बायना देकर सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करती हैं। यह परंपरा सास-बहू के रिश्ते में प्रेम, सम्मान और अपनापन बढ़ाने का प्रतीक भी मानी जाती है। बायने की थाली में क्या-क्या रखें? वट सावित्री के बायने की थाली में शुभ और पारंपरिक वस्तुएं रखने का विशेष महत्व माना जाता है। मुख्य प्रसाद भीगे हुए काले चने पूड़ी हलवा गुलगुले सुहाग सामग्री सिंदूर बिंदी लाल चूड़ियां मेहंदी काजल आलता शीशा और कंघी वस्त्र और फल सास के लिए नई साड़ी लाल, पीला या गुलाबी रंग शुभ माना जाता है आम, केला, तरबूज, खरबूजा पानी वाला नारियल दक्षिणा श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार नकद राशि बायना देते समय किन बातों का रखें ध्यान? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बायना देते समय कुछ सावधानियां रखना बेहद जरूरी माना जाता है। इस्तेमाल किया हुआ सुहाग सामान न दें काले, सफेद और गहरे नीले रंग के कपड़े न दें थाली में कैंची, सुई या सेफ्टी पिन जैसी धारदार चीजें न रखें कैसे दी जाती है बायने की थाली? वट वृक्ष की 7 या 108 परिक्रमा और कथा सुनने के बाद महिलाएं घर लौटती हैं। इसके बाद वे बांस के पंखे से अपने पति को हवा करती हैं और उनका आशीर्वाद लेती हैं। फिर बायने की थाली को पल्लू से ढककर सास को सम्मानपूर्वक भेंट किया जाता है। यदि सास मौजूद न हों, तो यह बायना घर की किसी बड़ी महिला, जेठानी या मंदिर के पुजारी की पत्नी को भी दिया जा सकता है।
Vat Savitri Vrat हिंदू धर्म का बेहद महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन माता सावित्री ने अपने तप, प्रेम और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत वैवाहिक सुख और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। वट सावित्री व्रत 2026 कब है? पंचांग के अनुसार Vat Savitri Vrat ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। इस वर्ष व्रत की तिथि: व्रत: 16 मई 2026, शनिवार अमावस्या तिथि प्रारंभ: सुबह 05:12 बजे अमावस्या तिथि समाप्त: देर रात 01:31 बजे पूजा का शुभ मुहूर्त ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश झा के अनुसार, वट वृक्ष की पूजा सुबह के समय करना विशेष फलदायी माना गया है। शुभ योग: सुबह 10:26 बजे तक सौभाग्य योग रहेगा इस दौरान पूजा और व्रत संबंधी धार्मिक कार्य करना अत्यंत शुभ माना जा रहा है। वट सावित्री व्रत का धार्मिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार: वट वृक्ष में Brahma, Vishnu और Shiva का वास माना जाता है। इसे “अक्षय वट” भी कहा जाता है। वट वृक्ष की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। इस दिन महिलाएं: व्रत रखती हैं वट वृक्ष की पूजा करती हैं सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं पति की लंबी आयु की कामना करती हैं वट सावित्री व्रत पूजा विधि Vat Savitri Vrat के दिन: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें स्वच्छ वस्त्र धारण करें वट वृक्ष के पास जाकर जल अर्पित करें रोली, अक्षत, फूल और मिठाई चढ़ाएं पेड़ के चारों ओर कच्चा सूत लपेटें सावित्री-सत्यवान कथा का पाठ करें पति की लंबी आयु की प्रार्थना करें दान का भी है विशेष महत्व धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन: भोजन वस्त्र फल जरूरत की वस्तुएं दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 की पहली शनिश्चरी अमावस्या 16 मई, शनिवार को पड़ रही है। जब अमावस्या तिथि शनिवार के दिन आती है, तो उसे शनिश्चरी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन को धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से बेहद शुभ और फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए शनि देव की पूजा, तर्पण और दान-पुण्य से न केवल पितृ दोष शांत होता है, बल्कि जीवन की बाधाएं भी कम होती हैं। शुभ योगों का विशेष संयोग ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 16 मई 2026 को कई शुभ योग बन रहे हैं: सुबह से 10:26 बजे तक सौभाग्य योग इसके बाद शोभन योग का प्रारंभ इन योगों को सुख, समृद्धि और सफलता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन समयों में किए गए कार्य कई गुना अधिक फल देते हैं। पूजा और स्नान के शुभ मुहूर्त इस दिन कई महत्वपूर्ण मुहूर्त बताए गए हैं: ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:07 से 4:48 बजे तक शनि पूजा का शुभ समय: सुबह 7:19 से 8:59 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:50 से 12:45 बजे तक इस दौरान स्नान, ध्यान और मंत्र जाप को अत्यंत शुभ माना गया है। शनि देव को प्रसन्न करने के उपाय ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शनिश्चरी अमावस्या पर किए गए उपाय विशेष फलदायी माने जाते हैं: पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना काले तिल और नीले फूल अर्पित करना जरूरतमंदों को काले वस्त्र, उड़द दाल और लोहे की वस्तुएं दान करना इन उपायों से शनि दोष में कमी आती है और आर्थिक बाधाएं दूर होने की मान्यता है। पितृ दोष निवारण के लिए तर्पण का महत्व इस दिन पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण करना अत्यंत शुभ माना गया है। माना जाता है कि इससे पितृ दोष शांत होता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस दिन: चावल की खीर बनाकर पितरों के नाम से अग्नि में अर्पित करना तर्पण और श्राद्ध करना इन उपायों से पितरों की कृपा प्राप्त होती है और वंश वृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। धार्मिक महत्व और मान्यता शनिश्चरी अमावस्या को शनि देव की कृपा प्राप्त करने का विशेष दिन माना जाता है। इस दिन किए गए धार्मिक कार्य व्यक्ति के जीवन में चल रही परेशानियों को कम करने और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने में सहायक माने जाते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।