Bangladesh News: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने ऐलान किया है कि वह दिसंबर 2026 तक अपने देश लौटेंगी, चाहे उन्हें गिरफ्तारी, जेल या मौत का सामना ही क्यों न करना पड़े। भारत में निर्वासन के दौरान दिए गए बयान में हसीना ने कहा कि उनके लोग उन्हें वापस बुला रहे हैं और वह हर हाल में स्वदेश लौटेंगी। अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन और हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा था। प्रदर्शनकारियों के उनके सरकारी आवास तक पहुंचने के बाद वह हेलीकॉप्टर से भारत आ गई थीं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, उस दौरान हुई हिंसा में करीब 1,400 लोगों की मौत हुई थी। बाद में ढाका की एक अदालत ने उन्हें मानवता के खिलाफ अपराध के मामले में दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई, जिसे हसीना ने राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया। 'मेरे लोग बुला रहे हैं, इसलिए लौटूंगी' हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, शेख हसीना ने कहा कि उन्हें पता है कि बांग्लादेश लौटने पर उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है, जेल भेजा जा सकता है या उनकी हत्या भी हो सकती है। इसके बावजूद उन्होंने कहा कि उनके लोग उन्हें वापस बुला रहे हैं और वह किसी भी परिस्थिति में देश लौटना चाहती हैं। भारत को लेकर क्या कहा? शेख हसीना ने कहा कि भारत में उन्हें सम्मान मिला है और भारतीय अधिकारियों ने कभी उनके प्रत्यर्पण को लेकर उन पर किसी तरह का दबाव नहीं बनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि बांग्लादेश लौटने का फैसला पूरी तरह उनका निजी निर्णय है। हालांकि, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार भारत से उनके प्रत्यर्पण की मांग कर चुकी है, जिस पर भारत ने कहा है कि अनुरोध पर विचार किया जा रहा है। आरोपों को बताया राजनीतिक बदले की कार्रवाई पूर्व प्रधानमंत्री ने अपने शासनकाल में मानवाधिकार उल्लंघन और विपक्ष पर कार्रवाई से जुड़े आरोपों को सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ चलाए जा रहे मामले राजनीतिक साजिश का हिस्सा हैं। हसीना का दावा है कि छात्र आंदोलन धीरे-धीरे एक सुनियोजित हिंसक अभियान में बदल गया था, जिसका उद्देश्य उनकी सरकार को सत्ता से हटाना था। राजनीति में वापसी पर क्या बोलीं? राजनीति में वापसी के सवाल पर शेख हसीना ने कहा कि सत्ता हासिल करना उनका उद्देश्य नहीं है। उन्होंने कहा कि उनका लक्ष्य केवल अपने देश और लोगों की सेवा करना है, और इसी भावना के साथ वह बांग्लादेश लौटने का फैसला कर रही हैं।
ढाका: तीस्ता नदी परियोजना को लेकर भारत की चिंताओं के बीच चीन ने पहली बार अपना आधिकारिक रुख स्पष्ट किया है। बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन ने कहा कि चीन इस परियोजना में केवल बांग्लादेश के अनुरोध पर सहयोग कर रहा है और इसके पीछे उसका कोई अन्य रणनीतिक उद्देश्य नहीं है। ढाका स्थित चीनी दूतावास में आयोजित प्रेस वार्ता में याओ वेन ने कहा कि तीस्ता परियोजना पूरी तरह बांग्लादेश के विकास और वहां के लोगों की जरूरतों से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि चीन इस परियोजना को सफल बनाने के लिए हरसंभव तकनीकी और आर्थिक सहयोग देने को तैयार है। तारिक रहमान की चीन यात्रा में रही तीस्ता परियोजना की चर्चा चीन के राजदूत का यह बयान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की हालिया चीन यात्रा के बाद सामने आया है। इस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच कई अहम परियोजनाओं पर चर्चा हुई, जिनमें तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना प्रमुख रही। याओ वेन ने कहा कि तीस्ता नदी के आसपास रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका इस परियोजना से जुड़ी हुई है। ऐसे में चीन बांग्लादेश की जरूरतों के अनुरूप इस परियोजना में अधिकतम सहयोग देगा। यूनुस सरकार के समय हुए समझौते पर भी दी सफाई प्रेस वार्ता के दौरान जब पिछली अंतरिम सरकार के कार्यकाल में एक चीनी कंपनी और बांग्लादेशी संस्था के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के बारे में सवाल पूछा गया तो याओ वेन ने कहा कि वह समझौता केवल एक कंपनी और सरकारी संस्था के बीच था। उन्होंने बताया कि अब परियोजना सरकार-स्तर पर आगे बढ़ रही है और चीन पहले विस्तृत सर्वेक्षण कराएगा, जिसके बाद आगे की प्रक्रिया तय होगी। भारत की चिंताओं पर क्या कहा? जब पत्रकारों ने पूछा कि भारत इस परियोजना को लेकर चिंता जता रहा है और यदि ऊपरी हिस्से से पर्याप्त पानी नहीं छोड़ा गया तो परियोजना पर क्या असर पड़ेगा, तो याओ वेन ने कहा कि यह चीन का विषय नहीं है। उन्होंने कहा, "चीन केवल बांग्लादेश की अपेक्षाओं के अनुरूप इस परियोजना में सहयोग कर रहा है। इसके अलावा हमारा कोई अन्य उद्देश्य या चिंता नहीं है।" बांग्लादेश-म्यांमार-चीन कॉरिडोर पर भी रखी बात याओ वेन ने बांग्लादेश-म्यांमार-चीन आर्थिक कॉरिडोर (BMCC) का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह कोई नई अवधारणा नहीं है। करीब 15 वर्ष पहले चीन ने बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार (BCIM) आर्थिक कॉरिडोर का प्रस्ताव रखा था, लेकिन यह योजना अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी। भारत के लिए भी खुला रखा प्रस्ताव चीन के राजदूत ने कहा कि यदि भारत भविष्य में इस आर्थिक कॉरिडोर से जुड़ना चाहता है तो चीन उसका स्वागत करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसमें शामिल होना या नहीं होना पूरी तरह भारत का निर्णय होगा। उन्होंने कहा कि फिलहाल चीन बांग्लादेश और म्यांमार के साथ क्षेत्रीय संपर्क और आर्थिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहा है। भारत की क्यों बढ़ी है चिंता? तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। नदी के जल बंटवारे और प्रबंधन का मुद्दा लंबे समय से भारत और बांग्लादेश के बीच चर्चा का विषय रहा है। भारत की चिंता इस बात को लेकर भी है कि प्रस्तावित परियोजना सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के निकट स्थित है, जिसे देश के पूर्वोत्तर राज्यों से संपर्क बनाए रखने के लिहाज से बेहद रणनीतिक क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में इस परियोजना को क्षेत्रीय और सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
Bangladesh ने अपनी विदेश नीति को लेकर बड़ा संकेत देते हुए साफ कहा है कि वह भारत और चीन के बीच किसी एक पक्ष की ओर झुकाव नहीं दिखाएगा। बांग्लादेश सरकार ने कहा है कि उसकी प्राथमिकता “बांग्लादेश फर्स्ट” यानी राष्ट्रीय हित होंगे और वह संतुलित कूटनीति अपनाएगी। हुमायूं कबीर का बड़ा बयान प्रधानमंत्री Tarique Rahman के विदेश मामलों के सलाहकार Humayun Kabir ने ढाका में आयोजित एक गोलमेज सम्मेलन में कहा: “बांग्लादेश भारत और चीन के बीच फुटबॉल नहीं बनेगा।” उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार की विदेश नीति व्यावहारिक सोच, संतुलन और राष्ट्रीय हितों पर आधारित होगी। बांग्लादेश सभी बड़ी वैश्विक शक्तियों के साथ अच्छे और रचनात्मक संबंध बनाए रखना चाहता है। भारत और चीन दोनों से संतुलित रिश्ते Humayun Kabir ने कहा कि सरकार किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय बहुआयामी कूटनीतिक रणनीति अपनाना चाहती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि: India और China दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए जाएंगे हर फैसले में बांग्लादेश के राष्ट्रीय हित सर्वोच्च होंगे ढाका वाशिंगटन, बीजिंग और नई दिल्ली सभी के साथ संतुलित रिश्ते चाहता है चीन को बताया अहम विकास सहयोगी हुमायूं कबीर ने चीन को बांग्लादेश का महत्वपूर्ण विकास साझेदार बताया। उन्होंने कहा कि बीजिंग की उनकी हालिया यात्रा काफी सकारात्मक रही और दोनों देशों के बीच सहयोग के कई नए रास्तों पर चर्चा हुई। “Bangladesh First” नीति क्या है? प्रधानमंत्री Tarique Rahman की “Bangladesh First” नीति पर बोलते हुए कबीर ने कहा कि इसका मतलब अलगाववाद नहीं है। उन्होंने कहा कि इस नीति का उद्देश्य: देश की संप्रभुता की रक्षा आर्थिक विकास को प्राथमिकता विदेश नीति में आत्मनिर्भर और संतुलित दृष्टिकोण को आगे बढ़ाना है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर भी साफ रुख Humayun Kabir ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर कहा कि बांग्लादेश खुले, सहयोगात्मक और समावेशी क्षेत्रीय ढांचे का समर्थन करता है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश किसी वैश्विक शक्ति संघर्ष में किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं करेगा, लेकिन व्यापार, समुद्री सुरक्षा, कनेक्टिविटी और सतत विकास से जुड़े प्रयासों में सक्रिय भागीदारी जारी रखेगा। क्यों अहम है यह बयान? विशेषज्ञों के अनुसार, दक्षिण एशिया में India और China के बढ़ते प्रभाव के बीच बांग्लादेश का यह रुख काफी अहम माना जा रहा है। एक ओर भारत बांग्लादेश का करीबी पड़ोसी और बड़ा व्यापारिक साझेदार है, वहीं चीन बुनियादी ढांचे और निवेश परियोजनाओं में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। ऐसे में ढाका संतुलन बनाकर दोनों देशों से रणनीतिक और आर्थिक लाभ लेना चाहता है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और Strait of Hormuz पर संकट के बीच बांग्लादेश गंभीर ईंधन संकट का सामना कर रहा है। ऐसे मुश्किल समय में भारत ने एक बार फिर पड़ोसी देश का साथ देते हुए डीजल की आपूर्ति कर राहत पहुंचाई है। पाइपलाइन के जरिए डीजल सप्लाई भारत ने Bangladesh को Numaligarh Refinery से पाइपलाइन के माध्यम से लगभग 7,000 टन डीजल की नई खेप भेजी है। इससे पहले भी हाल के दिनों में कई खेप भेजी जा चुकी हैं, जिससे कुल आपूर्ति बढ़कर लगभग 15,000 टन तक पहुंच गई है। यह सप्लाई India-Bangladesh Friendship Pipeline के जरिए की जा रही है, जो दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग का एक अहम उदाहरण है। क्यों बढ़ा संकट? Iran और अमेरिका के बीच तनाव के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य पर असर पड़ा है, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हुई है। बांग्लादेश जैसे देश, जो समुद्री आयात पर निर्भर हैं, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। वहां ईंधन की कमी के साथ-साथ जमाखोरी भी एक बड़ी समस्या बन गई है। आंतरिक संकट ने बढ़ाई परेशानी बांग्लादेश में हालात और बिगड़ गए जब आठ जिलों में टैंकर कर्मचारियों ने हड़ताल शुरू कर दी। इससे दिनाजपुर, रंगपुर, निलफामारी समेत कई इलाकों में ईंधन आपूर्ति पूरी तरह ठप हो गई। इसका सीधा असर परिवहन व्यवस्था पर पड़ा है, जिससे आम लोगों की परेशानी बढ़ गई है। भारत-बांग्लादेश संबंधों की मिसाल भारत का यह कदम दोनों देशों के मजबूत रिश्तों को दर्शाता है। संकट के समय भारत ने त्वरित मदद देकर यह साबित किया है कि वह क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है। ऊर्जा आपूर्ति जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह सहयोग बांग्लादेश के लिए बड़ी राहत लेकर आया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।