बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सैन्य तथा खुफिया सहयोग बढ़ने की खबरों ने भारत की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश की सैन्य खुफिया एजेंसी डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस (DGFI) का छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल 15 अगस्त को पाकिस्तान पहुंचा। इस दौरे को दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों के बीच बढ़ते संपर्क के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इस दौरे के एजेंडे और पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के साथ हुई कथित बातचीत को लेकर सार्वजनिक रूप से विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। इसलिए इसे लेकर किए जा रहे सुरक्षा संबंधी आकलनों को फिलहाल दावों और रिपोर्टों के स्तर पर ही देखा जाना चाहिए। छह सदस्यीय DGFI प्रतिनिधिमंडल ने किया पाकिस्तान का दौरा रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेशी प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई कर्नल मगफूज-उल-बारी ने की। टीम में विंग कमांडर इम्नुल कैस, मोहिउद्दीन मोहम्मद आसिफ, स्क्वाड्रन लीडर रेहान मोहम्मद चौधरी, मुराद हुसैन तुषार और खंडोकर आरिफुल इस्लाम शामिल थे। यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सैन्य एवं रणनीतिक संपर्कों को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। रिपोर्ट में इससे पहले अप्रैल में DGFI के तत्कालीन महानिदेशक मेजर जनरल कैसर राशिद चौधरी की इस्लामाबाद यात्रा का भी उल्लेख किया गया है। शेख हसीना सरकार के बाद बदले क्षेत्रीय समीकरण अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश की विदेश और सुरक्षा नीति में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। इसी अवधि में ढाका और इस्लामाबाद के बीच संपर्क बढ़ने की खबरें सामने आती रही हैं। पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के बढ़ते सैन्य संपर्क को भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दोनों देश भारत के पड़ोसी हैं। यदि सैन्य और खुफिया सहयोग लंबे समय तक मजबूत होता है, तो इसका असर दक्षिण एशिया के रणनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है। हालांकि, किसी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा को सीधे तौर पर किसी खुफिया अभियान या भारत विरोधी गतिविधि का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। इसके लिए ठोस आधिकारिक जानकारी और जांच के निष्कर्ष जरूरी होंगे। तारिक रहमान सरकार की भारत नीति भी चर्चा में रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तारिक रहमान के सत्ता में आने के बाद भी भारत-बांग्लादेश संबंधों में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। भारत और बांग्लादेश के बीच कई मुद्दों पर बातचीत जारी है, जबकि शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा भी दोनों देशों के संबंधों में संवेदनशील विषय बना हुआ है। तारिक रहमान की भारत यात्रा को लेकर भी दोनों देशों के बीच बातचीत की खबरें सामने आई हैं, लेकिन अभी तक यह यात्रा नहीं हो सकी है। दूसरी ओर, बांग्लादेश की पाकिस्तान और चीन के साथ बढ़ती सक्रियता क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है DGFI-Pakistan संपर्क? भारत की चिंता केवल पाकिस्तान-बांग्लादेश संबंधों को लेकर नहीं, बल्कि पूर्वी सीमा की सुरक्षा और क्षेत्रीय खुफिया सहयोग को लेकर भी है। भारत की बांग्लादेश के साथ लंबी सीमा है और दोनों देशों के बीच व्यापार, आवागमन तथा सुरक्षा से जुड़े कई साझा मुद्दे हैं। यदि बांग्लादेश और पाकिस्तान की सैन्य या खुफिया एजेंसियों के बीच सहयोग व्यापक होता है, तो भारत को सीमा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी कार्रवाई और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन के स्तर पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
नई दिल्ली: तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल से जुड़े 2013 के बलात्कार मामले में कानूनी लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच द्वारा तेजपाल को 10 साल की कठोर सजा सुनाए जाने के बाद गोवा सरकार ने सजा बढ़ाने की मांग करते हुए सर्वोच्च अदालत का रुख किया है। सरकार ने अपनी याचिका में मामले की गंभीरता का हवाला देते हुए तेजपाल को उम्रकैद की सजा देने की मांग की है। खास बात यह है कि गोवा सरकार ने हाई कोर्ट के उस निष्कर्ष को चुनौती नहीं दी है, जिसमें तेजपाल को दोषी ठहराया गया था। सरकार की अपील मुख्य रूप से सजा की अवधि से संबंधित है। सरकार ने कहा- समय बीतना सजा कम करने का आधार नहीं गोवा सरकार का तर्क है कि केवल इस वजह से आरोपी को कम सजा का लाभ नहीं दिया जा सकता कि घटना को कई वर्ष बीत चुके हैं। हाई कोर्ट ने 6 अगस्त 2026 को मामले में तेजपाल को दोषी ठहराते हुए 10 साल की कठोर कैद सुनाई थी। कोर्ट ने माना था कि मामले में निर्धारित न्यूनतम सजा लागू होती है। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने अधिकतम सजा के रूप में उम्रकैद की मांग की थी। अब गोवा सरकार का कहना है कि अपराध की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए सजा बढ़ाई जानी चाहिए। हाई कोर्ट ने 2021 के बरी करने के फैसले को पलटा था यह मामला नवंबर 2013 का है। तब तरुण तेजपाल तहलका के संपादक थे। एक जूनियर महिला सहयोगी ने उन पर गोवा के एक होटल की लिफ्ट में यौन उत्पीड़न और बलात्कार का आरोप लगाया था। मामले की सुनवाई के बाद 2021 में गोवा की सेशन कोर्ट ने तेजपाल को बरी कर दिया था। इसके बाद गोवा सरकार ने इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 6 अगस्त 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और तेजपाल को बलात्कार, यौन उत्पीड़न तथा संबंधित अपराधों में दोषी ठहराया। हाई कोर्ट ने 10 साल की सजा सुनाई दोषसिद्धि के बाद हाई कोर्ट ने तेजपाल को 10 साल की कठोर कैद की सजा दी। अदालत ने घटना को पुराना होने और इस अवधि में आरोपी के किसी अन्य आपराधिक कृत्य की जानकारी सामने नहीं आने जैसे पहलुओं पर भी विचार किया। हालांकि, अभियोजन पक्ष का कहना था कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए अधिकतम सजा दी जानी चाहिए। हाई कोर्ट के फैसले के बाद अब यही मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के सामने है। सुप्रीम कोर्ट में क्या चाहती है गोवा सरकार? गोवा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि तेजपाल की सजा को बढ़ाकर उम्रकैद किया जाए। यानी सरकार इस स्तर पर उनकी दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दे रही है, बल्कि यह कह रही है कि हाई कोर्ट द्वारा तय की गई 10 साल की सजा अपराध की गंभीरता के अनुपात में पर्याप्त नहीं है। अब सुप्रीम कोर्ट में यह तय होना है कि क्या मौजूदा सजा में बढ़ोतरी की आवश्यकता है और यदि हां, तो सजा कितनी होनी चाहिए। मामले में आगे क्या होगा? गोवा सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इस मामले की अगली महत्वपूर्ण कानूनी कड़ी होगी। अदालत सरकार की दलीलों, हाई कोर्ट के फैसले और मामले से जुड़े सभी कानूनी पहलुओं पर विचार करेगी।
जमशेदपुर: देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान दिल्ली के लाल किले से जमशेदपुर का नाम भी चर्चा में आया. शहर की पहचान बन चुकी डिमना लेक को देश के प्रमुख और ऐतिहासिक जलाशयों की सूची में शामिल करते हुए विशेष सम्मान दिया गया. इस उपलब्धि के बाद जमशेदपुर समेत पूरे झारखंड में गर्व का माहौल है. केंद्र सरकार की ओर से 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान देश के 25 प्रमुख और ऐतिहासिक जलाशयों के नाम पर लाल किले की दर्शक दीर्घाओं का नामकरण किया गया. इसी सूची में जमशेदपुर की डिमना लेक को भी स्थान मिला. यह सम्मान डिमना लेक के ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ जल संरक्षण और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर की गयी योजना की पहचान के तौर पर देखा जा रहा है. 80 साल पहले रखी गयी थी जल संरक्षण की नींव डिमना लेक का इतिहास टाटा स्टील की दूरदर्शी योजना से जुड़ा हुआ है. शहर की बढ़ती आबादी और भविष्य में पानी की बढ़ती जरूरत को देखते हुए करीब आठ दशक पहले इस जलाशय की योजना तैयार की गयी थी. इस परियोजना की परिकल्पना प्रसिद्ध इंजीनियर डॉ. एम. विश्वेश्वरैया की सोच से जुड़ी रही. फरवरी 1940 में डिमना लेक के निर्माण का काम शुरू हुआ और करीब चार साल बाद 17 अप्रैल 1944 से जमशेदपुर शहर को यहां से पानी की आपूर्ति शुरू कर दी गयी. आज भी जमशेदपुर की जलापूर्ति में अहम भूमिका करीब 7500 मिलियन गैलन जल भंडारण क्षमता वाला डिमना लेक आज भी जमशेदपुर के लिए बेहद महत्वपूर्ण जलस्रोत है. पिछले करीब आठ दशकों से यह शहर की पानी की जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा रहा है. डिमना लेक सिर्फ पेयजल का स्रोत नहीं है, बल्कि यह जमशेदपुर की पर्यावरणीय और प्राकृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. जलाशय की देखरेख और निगरानी के लिए संबंधित संस्थाओं की ओर से लगातार काम किया जाता है. पर्यटकों के लिए भी खास आकर्षण दलमा पहाड़ियों की खूबसूरत वादियों के बीच स्थित डिमना लेक जमशेदपुर के प्रमुख पर्यटन स्थलों में भी शामिल है. शहर और आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में लोग यहां घूमने, पिकनिक मनाने और प्राकृतिक वातावरण का आनंद लेने पहुंचते हैं. डिमना लेक पर नौकायन समेत कई मनोरंजक गतिविधियां भी लोगों को आकर्षित करती हैं. बारिश के मौसम में जलाशय और आसपास का प्राकृतिक नजारा पर्यटकों के लिए और भी खास हो जाता है. लाल किले से सम्मान ने बढ़ाया गौरव डिमना लेक को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से मिली राष्ट्रीय पहचान जमशेदपुर के लिए गौरव की बात है. करीब आठ दशक पहले भविष्य की जल जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की गयी यह परियोजना आज भी शहर के लिए उपयोगी बनी हुई है.
दक्षिण सूडान में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के तहत उत्कृष्ट सेवा के लिए 210 भारतीय शांति सैनिकों को संयुक्त राष्ट्र पदक से सम्मानित किया गया है। इनमें छह महिला शांति सैनिक और सात स्टाफ अधिकारी भी शामिल हैं। यह सम्मान मुश्किल परिस्थितियों में साहस, समर्पण और मानवीय सेवा के लिए दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र मिशन के मुताबिक, जुबा में आयोजित सम्मान समारोह में भारतीय ब्लू हेलमेट्स की सेवाओं को विशेष रूप से सराहा गया। भारतीय सैनिकों ने संकट की परिस्थितियों, मेडिकल इमरजेंसी और लोगों की जान बचाने वाले अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुश्किल हालात में निभाई जिम्मेदारी दक्षिण सूडान लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता और संघर्ष जैसी चुनौतियों से जूझता रहा है। ऐसे माहौल में संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों की जिम्मेदारी केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि स्थानीय नागरिकों की मदद और आपात परिस्थितियों में राहत पहुंचाना भी इसका अहम हिस्सा है। UNMISS ने भारतीय सैनिकों के साहस और करुणा की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से लोगों की जान बचाने और शांति को बढ़ावा देने में मदद मिली है। UN शांति अभियानों में भारत का लंबा रिकॉर्ड भारत का संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में योगदान दशकों पुराना है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 1948 से शुरू हुए 71 संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में 2 लाख से अधिक भारतीयों ने सेवा दी है। इस दौरान 160 भारतीय शांति सैनिकों ने अपनी जान भी गंवाई। भारत वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में करीब 4,200 सैन्य और पुलिसकर्मियों का योगदान देता है, जिनमें लगभग 155 महिलाएं शामिल हैं। योगदान देने वाले देशों में भारत दूसरे स्थान पर है। महिलाओं की भागीदारी भी महत्वपूर्ण संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भारतीय महिलाओं की भूमिका भी उल्लेखनीय रही है। वर्ष 2007 में भारत ने लाइबेरिया में संयुक्त राष्ट्र मिशन के लिए पूरी तरह महिला कर्मियों वाली फॉर्म्ड पुलिस यूनिट तैनात की थी। इस टुकड़ी ने सुरक्षा ड्यूटी, रात्रि गश्त और स्थानीय पुलिस की क्षमता बढ़ाने में योगदान दिया था। दक्षिण सूडान में 210 भारतीय शांति सैनिकों को मिला यह सम्मान भारत की अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों में लंबे समय से जारी भूमिका को रेखांकित करता है।
नई दिल्ली: देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर 1947 के विभाजन की त्रासदी को याद कर रहा है। 14 अगस्त को मनाए जा रहे विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभाजन के दौरान जान गंवाने वाले और विस्थापन का दर्द झेलने वाले लोगों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि विभाजन का दौर बेहद पीड़ादायक था, जिसने न जाने कितने परिवारों को बिखेर दिया और लोगों को अपनी जड़ों से दूर होने के लिए मजबूर कर दिया। पीएम मोदी ने सोशल मीडिया पर साझा किया भावुक संदेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक संदेश के जरिए 1947 के विभाजन के पीड़ितों को याद किया। उन्होंने उस दौर की भयावह परिस्थितियों का जिक्र करते हुए कहा कि बंटवारे ने कई परिवारों की खुशियां छीन लीं। प्रधानमंत्री के मुताबिक, विभाजन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा। कई परिवार अपनों से बिछड़ गए, जबकि अनेक लोगों को जान गंवानी पड़ी। विस्थापन और हिंसा के कारण लोगों को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, जिसकी पीड़ा को शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना मुश्किल है। मुश्किल हालात के बावजूद लोगों ने नहीं हारी हिम्मत पीएम मोदी ने अपने संदेश में विभाजन पीड़ितों के संघर्ष और उनके जज्बे को भी याद किया। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी त्रासदी झेलने के बाद भी लोगों ने हार नहीं मानी। जिन लोगों को अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करनी पड़ी, उन्होंने मेहनत और साहस के साथ अपने जीवन को दोबारा खड़ा किया। उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी लोगों ने अपनी मेहनत को ताकत बनाया और देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विभाजन से प्रभावित लोगों की संघर्ष यात्रा आने वाली पीढ़ियों को साहस और मानवीय दृढ़ता की सीख देती है। भाईचारा और सौहार्द बनाए रखने की अपील प्रधानमंत्री ने विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस को केवल अतीत को याद करने का दिन नहीं, बल्कि भविष्य के लिए संकल्प लेने का अवसर भी बताया। उन्होंने देशवासियों से आपसी भाईचारा, सामाजिक सौहार्द और मेल-मिलाप को मजबूत बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि देश की एकता और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। साथ मिलकर एक मजबूत और विकसित भारत के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान भी किया गया। 14 अगस्त को क्यों मनाया जाता है विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस? भारत सरकार ने 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था। इसका उद्देश्य 1947 के विभाजन के दौरान पीड़ा झेलने वाले लोगों को याद करना और उनके संघर्षों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है। देश के विभाजन के दौरान बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन हुआ। लाखों परिवारों को अपना घर और जमीन छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ा। इस दौरान हिंसा, बिछड़ने और जान-माल के नुकसान ने इतिहास के इस अध्याय को बेहद त्रासद बना दिया। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के जरिए उन लोगों की पीड़ा को याद करने के साथ-साथ देश में एकता, भाईचारे और सामाजिक सौहार्द का संदेश देने पर भी जोर दिया जाता है।
नई दिल्ली: डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ सकती हैं। वर्ष 2002 में सिरसा के पत्रकार राम चंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट द्वारा राम रहीम को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए सहमति जताई है। शीर्ष अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड भी तलब किया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने राम रहीम के वकील की आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा कि मामले पर विचार किए जाने की जरूरत है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल हाई कोर्ट के किसी बरी करने के फैसले की पुष्टि का मामला नहीं है, बल्कि ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि वाले निष्कर्षों के पलटे जाने से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। राम रहीम के वकील ने क्या दलील दी? सुप्रीम कोर्ट में राम रहीम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर. बसंत ने दलील दी कि यह बरी किए जाने से जुड़ा मामला है और राज्य की ओर से हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ कोई अपील दायर नहीं की गई है। इस पर अदालत ने कहा कि वह मामले की परिस्थितियों और रिकॉर्ड का परीक्षण करेगी। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि राज्य की ओर से अपील नहीं किए जाने के बावजूद याचिका पर न्यायिक समीक्षा की आवश्यकता हो सकती है। ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद राम चंद्र छत्रपति हत्याकांड में ट्रायल कोर्ट ने जनवरी 2019 में गुरमीत राम रहीम को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मामले में अन्य आरोपियों को भी सजा दी गई थी। बाद में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने राम रहीम को इस मामले में बरी कर दिया। इसी फैसले को मृत पत्रकार के बेटे और शिकायतकर्ता अरिंदम छत्रपति ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में दावा किया गया है कि ट्रायल कोर्ट ने हत्या की साजिश को लेकर स्पष्ट निष्कर्ष दिए थे और तीन अन्य सह-आरोपियों की सजा भी बरकरार रही। याचिकाकर्ता का आरोप है कि हाई कोर्ट ने राम रहीम की कथित भूमिका को लेकर अलग निष्कर्ष निकाला। सुप्रीम कोर्ट ने मंगाए ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट ने मामले की पड़ताल के लिए ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड तलब किए हैं। इनमें गवाहों के बयान और मामले से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज शामिल हैं। पीठ ने यह भी कहा कि वह मुख्य गवाह से जुड़े परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और उसके बयान के मूल्यांकन की जांच करेगी। राम रहीम के पूर्व ड्राइवर को इस मामले का महत्वपूर्ण गवाह बताया गया है। उसने न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज कराया था। राम रहीम की ओर से अदालत में इस गवाह की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए हैं। वहीं याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया है कि गवाह के बयान और अन्य साक्ष्यों को ट्रायल कोर्ट ने गंभीरता से स्वीकार किया था। CBI जांच तक कैसे पहुंचा मामला? राम चंद्र छत्रपति की हत्या के बाद पुलिस जांच पर सवाल उठे थे। जांच में कथित कमियों के बाद पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने वर्ष 2003 में मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंपने का आदेश दिया था। इसके बाद CBI ने मामले की जांच की और आगे की कानूनी कार्रवाई हुई। इसी जांच के आधार पर बाद में ट्रायल कोर्ट में मुकदमा चला। क्या राम रहीम की मुश्किलें फिर बढ़ सकती हैं? सुप्रीम कोर्ट का याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत होना अपने आप में राम रहीम को दोषी ठहराने का फैसला नहीं है। अदालत फिलहाल यह जांच करेगी कि हाई कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के फैसले में कानूनी या साक्ष्य संबंधी कोई गंभीर त्रुटि हुई थी या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अंतिम सुनवाई नवंबर के अंतिम सप्ताह में निर्धारित की है। अब ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों की समीक्षा के बाद ही आगे की तस्वीर स्पष्ट होगी। गौरतलब है कि गुरमीत राम रहीम पहले से ही दो साध्वियों के यौन शोषण के मामलों में 20 वर्ष की सजा काट रहा है। पत्रकार राम चंद्र छत्रपति हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इसमें हाई कोर्ट के बरी करने के फैसले की न्यायिक समीक्षा होगी।
ढाका: भारत और बांग्लादेश के बीच बढ़ती राजनीतिक और कूटनीतिक हलचल के बीच चार भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल ढाका पहुंचा है। यह दौरा बांग्लादेश की सेना की खुफिया एजेंसी डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फोर्स इंटेलिजेंस (डीजीएफआई) के बुलावे पर हुआ है। रिपोर्टों के मुताबिक, चार सदस्यीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल रविवार दोपहर नई दिल्ली से विमान के जरिए ढाका पहुंचा। दोनों देशों के बीच संबंधों में हाल के दिनों में तनाव और संवेदनशील मुद्दों को देखते हुए इस सुरक्षा प्रतिनिधिमंडल की यात्रा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, प्रतिनिधिमंडल में शामिल अधिकारियों के नाम, पद और दौरे के विस्तृत एजेंडे की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। डीजीएफआई के निमंत्रण पर पहुंचा भारतीय दल उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का चार सदस्यीय दल बांग्लादेश की सैन्य खुफिया एजेंसी डीजीएफआई के निमंत्रण पर ढाका पहुंचा है। सुरक्षा कारणों से अधिकारियों की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है। ढाका पहुंचने के बाद प्रतिनिधिमंडल के ठहरने और अन्य व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी डीजीएफआई की ओर से संभाले जाने की बात कही गई है। रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों के लिए एक प्रमुख होटल में ठहरने की व्यवस्था की गई है। इस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग और आपसी हित से जुड़े मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि बैठक का मुख्य एजेंडा क्या होगा। भारत-बांग्लादेश संबंधों में बढ़ी संवेदनशीलता भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब भारत और बांग्लादेश के संबंध कई संवेदनशील मुद्दों के कारण चर्चा में हैं। दोनों देशों के बीच सीमा सुरक्षा, अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण, क्षेत्रीय सुरक्षा और आपसी सहयोग जैसे मुद्दे लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में सुरक्षा अधिकारियों के बीच संपर्क बनाए रखना दोनों देशों के लिए अहम माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, राजनीतिक स्तर पर मतभेद होने के बावजूद सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के बीच संवाद के चैनल खुले रहना जरूरी होता है। इससे सीमा और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर समय रहते जानकारी साझा करने और संभावित तनाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। भारतीय उच्चायुक्त की भी अहम मुलाकात इस घटनाक्रम के बीच ढाका में भारतीय उच्चायुक्त की बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के साथ प्रस्तावित मुलाकात भी चर्चा में है। इस बैठक की समय-सीमा को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के हालिया सार्वजनिक बयान के कुछ ही समय बाद हो रही है। ऐसे में भारतीय उच्चायुक्त और बांग्लादेशी प्रधानमंत्री के बीच बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों, सुरक्षा सहयोग और दोनों देशों से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की संभावना है। सितंबर में नई दिल्ली आ सकते हैं तारिक रहमान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सितंबर में नई दिल्ली में प्रस्तावित बहुपक्षीय बैठक में शामिल होने की संभावना को लेकर भी चर्चा है। यदि यह दौरा होता है, तो प्रधानमंत्री के रूप में यह उनका पहला भारत दौरा होगा। ऐसे में भारत और बांग्लादेश के बीच उच्चस्तरीय राजनीतिक संपर्क की दिशा में इसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा सकता है। हालांकि, इस संभावित यात्रा और इसके कार्यक्रम को लेकर अंतिम आधिकारिक पुष्टि का इंतजार रहेगा। सुरक्षा सहयोग पर बनी रहेगी नजर भारत और बांग्लादेश के बीच सुरक्षा सहयोग का एक लंबा इतिहास रहा है। दोनों देश सीमा प्रबंधन, आतंकवाद और उग्रवाद से निपटने, संगठित अपराध तथा क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विभिन्न स्तरों पर संपर्क में रहे हैं। मौजूदा परिस्थितियों में भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का ढाका दौरा इस बात का संकेत माना जा सकता है कि दोनों पक्ष संवेदनशील मुद्दों पर संवाद का रास्ता खुला रखना चाहते हैं। हालांकि, प्रतिनिधिमंडल के दौरे के वास्तविक उद्देश्य और बातचीत के परिणाम के बारे में आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी। फिलहाल सभी की नजर भारतीय सुरक्षा अधिकारियों की बैठकों और भारतीय उच्चायुक्त की बांग्लादेशी प्रधानमंत्री के साथ होने वाली बातचीत पर है। आने वाले दिनों में इन संपर्कों से भारत-बांग्लादेश संबंधों की दिशा को लेकर तस्वीर और साफ हो सकती है।
चंबा, हिमाचल प्रदेश: हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में शनिवार सुबह एक भीषण बस हादसे ने पूरे इलाके को झकझोर दिया। तीसा-बैरागढ़ मार्ग पर चालुज मोड़ के पास एक बस अचानक पहाड़ी से नीचे सड़क पर जा गिरी। हादसा इतना गंभीर था कि बस के चालक और परिचालक समेत 7 लोगों की मौत हो गई, जबकि 11 लोग घायल बताए जा रहे हैं। दुर्घटना के बाद मौके पर चीख-पुकार मच गई। स्थानीय लोगों ने तत्काल राहत और बचाव कार्य शुरू किया और पुलिस-प्रशासन को सूचना दी। घायलों को कड़ी मशक्कत के बाद दुर्घटनाग्रस्त बस से बाहर निकाला गया और उपचार के लिए सिविल अस्पताल तीसा भेजा गया। तीसा-बैरागढ़ रोड पर चालुज मोड़ के पास हादसा प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक बस बैरागढ़ से चंबा की ओर जा रही थी। इसी दौरान चालुज मोड़ के पास वह अचानक अनियंत्रित होकर पहाड़ी से नीचे सड़क पर जा गिरी। दुर्घटनाग्रस्त बस शर्मा बस कंपनी की बताई जा रही है। बस का नंबर HP73A-2101 है। हादसे के समय बस में करीब 15 से 20 लोग सवार होने की जानकारी सामने आई है। दुर्घटना के बाद बस की स्थिति देखकर हादसे की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। तस्वीरों में बस के चारों पहिए ऊपर की ओर दिखाई दे रहे हैं, जबकि उसकी छत सड़क से लगी हुई थी। 7 लोगों की मौत, चालक और परिचालक भी शामिल प्रारंभिक जानकारी के अनुसार हादसे में चार पुरुषों और तीन महिलाओं की मौत हुई है। मृतकों में बस चालक रूप सिंह और परिचालक तेज सिंह भी शामिल हैं। मृतकों की पहचान जगदेव शर्मा (50), देस राज (35), तेज सिंह (39), जगदेई (24), हरदेई (43), नीलम (34) और रूप सिंह (35) के रूप में हुई है। 11 लोग घायल हादसे में घायल हुए 11 लोगों को इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया गया है। घायलों में बच्चे भी शामिल हैं। घायलों की पहचान कर्ण सिंह उर्फ साहिल (18), सुष्मिता (32), प्रियंका (5), हर्षु (4), पानो देवी (41), काव्या (11), धन्नी (40), धर्मों देवी (62), अप्रित मंगल (11), नेहा (10) और विजय कुमार (34) के रूप में बताई गई है। घायलों को अस्पताल में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। प्रशासन की ओर से घायलों की स्थिति पर नजर रखी जा रही है। पुलिस ने शुरू की जांच हादसे की सूचना मिलते ही स्थानीय लोग, पुलिस और प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची। राहत और बचाव अभियान चलाकर बस में फंसे लोगों को बाहर निकाला गया। तीसा थाना के एडिशनल एसएचओ अनुभव शर्मा ने हादसे की पुष्टि की है। दुर्घटना आखिर किस वजह से हुई, इसका अभी स्पष्ट पता नहीं चल पाया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है और हादसे के कारणों का पता लगाया जा रहा है। पहाड़ी इलाकों में सड़क सुरक्षा पर फिर उठे सवाल चंबा जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क दुर्घटनाएं अक्सर गंभीर रूप ले लेती हैं। तीखे मोड़, संकरी सड़कें, ढलान और मौसम संबंधी परिस्थितियां वाहन चालकों के लिए चुनौती पैदा करती हैं। ऐसे में इस हादसे के बाद एक बार फिर पहाड़ी मार्गों पर सार्वजनिक परिवहन की सुरक्षा, सड़क की स्थिति और यातायात नियमों के पालन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। फिलहाल प्रशासन का पूरा ध्यान राहत एवं बचाव कार्य और घायलों के इलाज पर है। हादसे के वास्तविक कारणों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
नई दिल्ली: जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र बेहद महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज हैं। स्कूल में दाखिले से लेकर सरकारी योजनाओं, पासपोर्ट, संपत्ति और कई अन्य जरूरी कामों में इनकी आवश्यकता पड़ सकती है। अब जन्म-मृत्यु पंजीकरण से जुड़े नियमों में बदलाव के बाद समय पर रजिस्ट्रेशन कराना और भी जरूरी हो गया है। नए प्रावधानों के तहत अगर जन्म या मृत्यु का पंजीकरण दो साल से अधिक समय तक लंबित रहता है, तो इसे दर्ज कराने के लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की जरूरत होगी। ऐसे में लोगों के लिए बेहतर है कि वे निर्धारित समय के भीतर ही जन्म या मृत्यु का रजिस्ट्रेशन करा लें। खास बात यह है कि इसके लिए हर बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाना जरूरी नहीं है। कई जगहों पर नागरिक ऑनलाइन माध्यम से घर बैठे मोबाइल या कंप्यूटर से आवेदन कर सकते हैं। हालांकि, प्रक्रिया और उपलब्ध सुविधाएं राज्य या स्थानीय निकाय के अनुसार अलग हो सकती हैं। जन्म प्रमाण पत्र के लिए ऑनलाइन कैसे करें आवेदन? जन्म प्रमाण पत्र के लिए नागरिक CRS पोर्टल या अपने क्षेत्र के नगर निगम/स्थानीय निकाय की आधिकारिक वेबसाइट का इस्तेमाल कर सकते हैं। ऑनलाइन आवेदन की सामान्य प्रक्रिया इस प्रकार है: संबंधित CRS पोर्टल या नगर निगम की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं। General Public Signup/Citizen Login के माध्यम से अकाउंट बनाएं या लॉग-इन करें। लॉग-इन करने के बाद Birth Registration/Apply Online जैसे विकल्प पर जाएं। बच्चे का नाम, जन्म तिथि, जन्म स्थान और माता-पिता की जानकारी सावधानी से भरें। जहां मांगी जाए वहां अस्पताल की बर्थ रिपोर्ट/डिस्चार्ज स्लिप और माता-पिता के पहचान दस्तावेज अपलोड करें। आवेदन जमा करने के बाद मिलने वाला Application Reference Number सुरक्षित रखें। कुछ स्थानीय निकायों में आवेदन के बाद दस्तावेजों या रेफरेंस की कॉपी कार्यालय में जमा करनी पड़ सकती है। आवेदन स्वीकृत होने के बाद उपलब्ध होने पर डिजिटल हस्ताक्षर वाला जन्म प्रमाण पत्र ऑनलाइन डाउनलोड किया जा सकता है। डेथ सर्टिफिकेट के लिए कैसे करें ऑनलाइन आवेदन? मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए भी नागरिक संबंधित CRS पोर्टल या नगर निगम की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए सामान्य तौर पर: पोर्टल पर Citizen Login से लॉग-इन करें। Death Registration/Apply for Death Certificate विकल्प चुनें। मृतक की मृत्यु की तारीख, समय, स्थान और अन्य जरूरी जानकारी दर्ज करें। अस्पताल की डेथ समरी/मृत्यु संबंधी चिकित्सा दस्तावेज और जरूरी पहचान पत्र अपलोड करें। आवेदन जमा करने के बाद मिलने वाला Reference Number सुरक्षित रखें। यदि स्थानीय निकाय की ओर से जरूरी हो, तो रेफरेंस की कॉपी और अन्य दस्तावेज कार्यालय में जमा करें। आवेदन स्वीकृत होने के बाद उपलब्ध होने पर डिजिटल हस्ताक्षर वाला मृत्यु प्रमाण पत्र पोर्टल से डाउनलोड किया जा सकता है। 21 दिन के भीतर पंजीकरण कराना बेहतर जन्म या मृत्यु की घटना का पंजीकरण समय पर कराना बेहद जरूरी है। सामान्य तौर पर 21 दिनों के भीतर रजिस्ट्रेशन कराने पर प्रक्रिया आसान रहती है। देरी बढ़ने के साथ अतिरिक्त औपचारिकताएं और दस्तावेजों की जरूरत पड़ सकती है। वहीं, दो साल से अधिक देरी होने पर न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनुमति जैसी अतिरिक्त कानूनी प्रक्रिया लागू हो सकती है। इसलिए परिवारों को सलाह दी जाती है कि बच्चे के जन्म या परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद प्रमाण पत्र बनवाने की प्रक्रिया को टालें नहीं। आवेदन करते समय इन बातों का रखें ध्यान ऑनलाइन आवेदन करते समय नाम, जन्म या मृत्यु की तारीख, स्थान और अन्य व्यक्तिगत जानकारी बिल्कुल सही भरें। जानकारी अस्पताल के रिकॉर्ड और संबंधित सरकारी पहचान दस्तावेजों से मिलती-जुलती होनी चाहिए। यह भी ध्यान रखें कि CRS पोर्टल और स्थानीय निकायों की ऑनलाइन प्रक्रिया हर जगह एक जैसी नहीं हो सकती। इसलिए आवेदन से पहले अपने राज्य, नगर निगम या स्थानीय रजिस्ट्रार की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध मौजूदा निर्देश जरूर जांच लें।
नई दिल्ली: अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना स्पष्ट रुख पेश किया है। सरकार ने अदालत को बताया कि SC-ST आरक्षण में OBC की तरह क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि इन वर्गों को मिलने वाला आरक्षण केवल आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक और संरचनात्मक पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर दिया गया है। दरअसल, करीब दो महीने पहले सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर SC-ST आरक्षण में भी क्रीमी लेयर व्यवस्था लागू करने और आरक्षित वर्गों के भीतर आय आधारित उप-वर्गीकरण की मांग की गई थी। इस याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना जवाब दाखिल किया। OBC तक ही सीमित है क्रीमी लेयर का प्रावधान केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत अब तक केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए लागू होता है। OBC आरक्षण में आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों को आरक्षण का लाभ नहीं देने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी, लेकिन SC और ST के मामले में आरक्षण का आधार अलग है। सरकार ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का उद्देश्य केवल आर्थिक असमानता दूर करना नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव, ऐतिहासिक वंचना और सामाजिक पिछड़ेपन की भरपाई करना है। इसलिए केवल आय के आधार पर इन वर्गों के भीतर क्रीमी लेयर लागू करना उचित नहीं होगा। नीति में बदलाव से पहले जरूरी होगा व्यापक अध्ययन केंद्र ने अदालत को बताया कि यदि आरक्षित वर्गों के भीतर आय आधारित प्राथमिकता या उप-कोटा जैसी कोई व्यवस्था लागू करनी हो, तो इसके लिए व्यापक सामाजिक-आर्थिक अध्ययन, विश्वसनीय आंकड़ों का विश्लेषण और समग्र समीक्षा आवश्यक होगी। सरकार ने यह भी कहा कि इस तरह का कोई भी बड़ा बदलाव न्यायिक आदेश के बजाय नीति निर्माण और विधायी प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए। संसद के अधिकार क्षेत्र का मामला सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 15 जून 2026 को दिए अपने जवाब का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने का फैसला केवल संसद ही ले सकती है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि वह ऐसी याचिकाओं पर न्यायिक निर्देश जारी करने से परहेज करे, जिनका उद्देश्य देश की आरक्षण व्यवस्था में व्यापक नीतिगत बदलाव करना हो। सरकार का कहना है कि आरक्षण नीति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन संवैधानिक, सामाजिक और विधायी पहलुओं को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।
नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र में लगातार जारी गतिरोध के बीच सरकार और विपक्ष के बीच संवाद की नई पहल ने समाधान की उम्मीद जगाई है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात कर संसद की बाधित कार्यवाही को सामान्य करने पर चर्चा की। राजनीतिक मतभेदों के बीच यह पहल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। कई मुद्दों पर टकराव, ठप रही संसद मानसून सत्र की शुरुआत NEET पेपर लीक और छात्र आंदोलन के माहौल में हुई थी। हालांकि आंदोलन समाप्त हो चुका है, लेकिन उससे जुड़े राजनीतिक मुद्दे अब भी संसद में गतिरोध का कारण बने हुए हैं। CJP के 'संसद चलो मार्च' के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई, राम मंदिर चंदा चोरी के आरोप और अन्य विवादों को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है। इसके चलते लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित हो रही है। बिना चर्चा पारित हुए कई विधेयक सत्र के दौरान अब तक लोकसभा में एक भी प्रश्नकाल पूरी तरह संचालित नहीं हो सका है। सरकार ने पांच विधेयक पारित कराए हैं, लेकिन अधिकांश पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी। लोक परीक्षा संशोधन विधेयक जैसे महत्वपूर्ण बिल पर भी पर्याप्त बहस नहीं हुई। संसदीय विशेषज्ञों का मानना है कि कानून बनाने की प्रक्रिया में व्यापक चर्चा लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है। प्रश्नकाल क्यों है लोकतंत्र की ताकत? प्रश्नकाल संसद की जवाबदेही व्यवस्था का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है। इसी दौरान विपक्ष सरकार से सीधे सवाल पूछता है और जनता से जुड़े मुद्दों को सदन में उठाता है। इससे सरकार की नीतियों की समीक्षा होती है और आवश्यक सुधार का अवसर मिलता है। लगातार बाधित हो रहा प्रश्नकाल लोकतांत्रिक जवाबदेही को भी प्रभावित कर रहा है। बजट सत्र जैसा प्रदर्शन दोहराने की चुनौती पिछले बजट सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद होने के बावजूद लोकसभा की उत्पादकता 93 प्रतिशत और राज्यसभा की 110 प्रतिशत रही थी। इस बार भी उम्मीद जताई जा रही है कि संवाद के जरिए गतिरोध खत्म होगा और लंबित महत्वपूर्ण विधेयकों, जिनमें प्रस्तावित FCRA विधेयक और अन्य अहम बिल शामिल हैं, पर सार्थक चर्चा हो सकेगी। संवाद ही लोकतंत्र का सबसे मजबूत रास्ता लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष दोनों की भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण होती है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष से लगातार संवाद बनाए रखे, जबकि विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि विरोध के साथ-साथ बहस और चर्चा में सक्रिय भागीदारी करे। यदि दोनों पक्ष टकराव की बजाय संवाद को प्राथमिकता दें, तो संसद की कार्यवाही अधिक प्रभावी होगी और जनता से जुड़े मुद्दों पर बेहतर फैसले लिए जा सकेंगे।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि 1992 की यह घटना देश के इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। नई दिल्ली में आयोजित एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में उन्होंने बाबरी विध्वंस को देश के शरीर पर एक "दर्दनाक और बदसूरत फोड़े" की संज्ञा दी और कहा कि सरकारें कई बार परिस्थितियों को देखते हुए रणनीतिक संयम का रास्ता अपनाती हैं, लेकिन समय बीतने के बाद वही फैसले गलत भी लग सकते हैं। सलमान खुर्शीद लेखक और वकील जावेद गाया की पुस्तक "हार्टलैंड राइजिंग: द मेकिंग ऑफ मेजॉरिटेरियन इंडिया" के विमोचन कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इस दौरान उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस, 2002 के गुजरात दंगे, देश के विभाजन और उत्तर प्रदेश की राजनीति जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से अपनी बात रखी। बाबरी मस्जिद विध्वंस पर क्या बोले सलमान खुर्शीद? कार्यक्रम की संचालक मालविका राजकोटिया ने सलमान खुर्शीद से पूछा कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने रणनीतिक संयम क्यों अपनाया था। इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि किसी एक घटना को अलग करके देखने पर वह बहुत बड़ी, दर्दनाक और भयावह दिखाई देती है, लेकिन समय के साथ परिस्थितियों को व्यापक संदर्भ में समझना भी जरूरी होता है। उन्होंने कहा कि पीछे मुड़कर देखने पर यह कहना आसान होता है कि कौन-सा फैसला सही था और कौन-सा गलत। लेकिन जब कोई सरकार सत्ता में होती है, तब उसे उसी समय उपलब्ध परिस्थितियों और सीमित विकल्पों के आधार पर निर्णय लेना पड़ता है। 'संयम नहीं रखते तो हालात और ज्यादा बिगड़ सकते थे' सलमान खुर्शीद ने कहा कि उस समय कई लोगों की राय थी कि रणनीतिक संयम ही सबसे बेहतर विकल्प था। उनका मानना था कि अगर सरकार ने तत्काल सख्त कार्रवाई की होती, तो देश में हालात और अधिक बिगड़ सकते थे और बड़े स्तर पर हिंसा फैल सकती थी। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि संभव है, जिस रणनीतिक संयम को उस समय सही समझा गया, वही बाद में हालात को और गंभीर बनाने का कारण भी बना हो। उन्होंने कहा कि इतिहास का मूल्यांकन हमेशा बाद में होता है और समय बीतने के बाद फैसलों पर अलग नजरिया बन सकता है। देश के विभाजन का भी दिया उदाहरण अपने जवाब के दौरान सलमान खुर्शीद ने भारत के विभाजन का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि आज भी कई लोग देश के विभाजन के लिए जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या उस समय यह फैसला लिया जा सकता था कि विभाजन नहीं होगा, भले ही देश गृहयुद्ध की स्थिति में पहुंच जाए। उन्होंने कहा कि सत्ता में बैठी सरकारों के सामने कई कठिन परिस्थितियां होती हैं और उन्हें उपलब्ध विकल्पों में से सबसे उपयुक्त फैसला लेना पड़ता है। बाद में उन फैसलों की आलोचना करना अपेक्षाकृत आसान होता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति को बताया सबसे अहम उत्तर प्रदेश की राजनीति पर बोलते हुए सलमान खुर्शीद ने कहा कि देश के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा काफी हद तक उत्तर प्रदेश तय करेगा। उनके मुताबिक यदि भारत को संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करना है, तो इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश से हो सकती है। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों का मानना है कि देश में राजनीतिक बदलाव संभव नहीं है, जबकि कुछ लोग इसे पूरी तरह संभव मानते हैं। वहीं, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि बदलाव भारतीय जनता पार्टी के भीतर से आएगा, जबकि अन्य का कहना है कि उत्तर प्रदेश में गठबंधन की राजनीति भविष्य की दिशा तय कर सकती है। कई अहम मुद्दों पर रखी राय कार्यक्रम के दौरान सलमान खुर्शीद ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के अलावा 2002 के गुजरात दंगों, भारत के विभाजन और मौजूदा राजनीतिक माहौल पर भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि इतिहास की घटनाओं को केवल एक नजरिए से नहीं देखा जा सकता। किसी भी बड़े फैसले का आकलन उस समय की परिस्थितियों, चुनौतियों और उपलब्ध विकल्पों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में संवाद, संवैधानिक मूल्यों और संस्थाओं की मजबूती सबसे महत्वपूर्ण है। सरकारों के फैसलों का मूल्यांकन समय के साथ बदल सकता है, लेकिन इतिहास से सीख लेकर भविष्य की दिशा तय करना अधिक जरूरी है।
पंजाब के अमृतसर में पुलिस ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से जुड़े दो कथित आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ करने का दावा किया है। इस कार्रवाई में कुल 9 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें 4 नाबालिग और 5 वयस्क शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों में से अधिकांश का संबंध पेट्रोल बम मॉड्यूल से है और इनमें कई नाबालिग भी शामिल हैं। जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शन से जुड़ा कनेक्शन अमृतसर पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार किए गए आठ आरोपी दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित एक विरोध प्रदर्शन में भी शामिल हुए थे। जांच में सामने आया है कि वहां उन्हें कथित तौर पर स्थानीय स्तर पर लॉजिस्टिक सपोर्ट उपलब्ध कराया गया, जिसमें पेट्रोल बम बनाने के लिए जरूरी सामग्री भी शामिल थी। पुलिस इस पूरे नेटवर्क और स्थानीय सहयोगियों की भूमिका की भी जांच कर रही है। रेलवे ट्रैक पर कैमरे लगाने की थी साजिश अमृतसर पुलिस आयुक्त गुरप्रीत सिंह भुल्लर ने बताया कि एक मॉड्यूल का काम रेलवे ट्रैक के ऊपर कैमरे लगाकर उसकी लाइव फीड पाकिस्तान भेजना था। शुरुआती जांच के मुताबिक, इन कैमरों के जरिए संवेदनशील गतिविधियों की निगरानी की जानी थी। पुलिस ने समय रहते कार्रवाई करते हुए कैमरे बरामद कर लिए और आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का कहना है कि कैमरे खरीदने और अन्य खर्चों के लिए हवाला नेटवर्क के जरिए धन उपलब्ध कराया गया था। पेट्रोल बम बनाने और हमला करने की ट्रेनिंग जांच एजेंसियों के अनुसार, दूसरे मॉड्यूल के सदस्यों को ISI हैंडलर्स की ओर से पेट्रोल बम तैयार करने और इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग दी गई थी। उन्हें पुलिस और अन्य सुरक्षा प्रतिष्ठानों की रेकी करने के निर्देश भी दिए गए थे। हालांकि, पुलिस का कहना है कि आरोपी अपने कथित मंसूबों को अंजाम देने से पहले ही पकड़ लिए गए। पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स पर शक पुलिस का मानना है कि दोनों मॉड्यूल को पाकिस्तान में बैठे ISI हैंडलर्स संचालित कर रहे थे। शुरुआती जांच में सीमा पार से निर्देश मिलने और स्थानीय नेटवर्क के जरिए सहायता उपलब्ध कराने के संकेत मिले हैं। सुरक्षा एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क, फंडिंग और संभावित सहयोगियों की विस्तृत जांच कर रही हैं। जांच जारी फिलहाल पुलिस गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच कई पहलुओं पर जारी है, जिसमें जंतर-मंतर कनेक्शन, स्थानीय मदद, हवाला फंडिंग और सीमा पार मौजूद कथित संचालकों की भूमिका शामिल है। पुलिस का दावा है कि समय रहते कार्रवाई कर एक बड़ी साजिश को विफल कर दिया गया।
विदेशों में छिपे आर्थिक अपराधियों और गंभीर मामलों के आरोपियों पर भारत सरकार लगातार शिकंजा कस रही है। आधुनिक तकनीक, जियो-लोकेशन ट्रैकिंग, डिजिटल फुटप्रिंट, रेड कॉर्नर नोटिस और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मदद से पिछले कुछ वर्षों में बड़ी सफलता हासिल हुई है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, साल 2021 से अब तक 36 देशों से 274 भगोड़े अपराधियों को भारत वापस लाया गया है। सरकार का दावा है कि अब फरार अपराधियों की पहचान छिपाना पहले जितना आसान नहीं रह गया है। तकनीक बनी सबसे बड़ा हथियार विदेश भाग चुके आरोपी अक्सर नाम, पहचान और ठिकाना बदलकर कानून से बचने की कोशिश करते हैं। ऐसे मामलों में सरकार अब सैटेलाइट तकनीक, जियो-लोकेशन ट्रैकिंग, डिजिटल फुटप्रिंट और सोशल मीडिया गतिविधियों का विश्लेषण कर उनकी लोकेशन का पता लगा रही है। इसके साथ ही इंटरपोल, विदेशी जांच एजेंसियों और विभिन्न देशों की कानून प्रवर्तन संस्थाओं के साथ समन्वय बढ़ाया गया है। ऑपरेशन त्रिशूल से तेज हुई कार्रवाई भगोड़ों की तलाश और गिरफ्तारी के लिए केंद्र सरकार ने ऑपरेशन त्रिशूल शुरू किया है। इस अभियान के तहत विदेशों में छिपे आरोपियों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती है और उनकी पहचान बदलने की कोशिशों को तकनीक के जरिए ट्रैक किया जाता है। सरकार का कहना है कि इस अभियान ने कई मामलों में महत्वपूर्ण सफलता दिलाई है। पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ी सफलता गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में 401 भगोड़ों के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किए गए हैं। वहीं, 2014 से पहले औसतन हर साल केवल चार भगोड़े ही भारत वापस लाए जा रहे थे। उस समय भारत की केवल 37 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि थी और करीब 110 प्रत्यर्पण आवेदन लंबित थे। अब कई नए देशों के साथ सहयोग बढ़ने और कानूनी प्रक्रियाओं में सुधार के कारण प्रत्यर्पण की रफ्तार तेज हुई है। इन माध्यमों से ढूंढे जा रहे फरार आरोपी सैटेलाइट और जियो-लोकेशन ट्रैकिंग डिजिटल और सोशल मीडिया फुटप्रिंट की निगरानी इंटरपोल और अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियों का सहयोग रेड कॉर्नर नोटिस और प्रत्यर्पण अनुरोध बैंकिंग और वित्तीय लेन-देन की जांच नए कानूनों से मिली कानूनी ताकत सरकार ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम लागू कर आर्थिक अपराधियों की संपत्ति जब्त करने का रास्ता मजबूत किया। इसके अलावा एनआईए संशोधन अधिनियम, यूएपीए संशोधन अधिनियम और 2024 में लागू तीन नए आपराधिक कानूनों ने भी जांच एजेंसियों को अतिरिक्त अधिकार दिए हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 355 और 356 के तहत पहली बार फरार आरोपी की अनुपस्थिति में भी मुकदमा चलाने (Trial in Absentia) का प्रावधान किया गया है। ईडी की जांच और संपत्ति जब्ती राज्यसभा में वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) बैंक धोखाधड़ी से जुड़े 32 मामलों की जांच कर रहा है। इन मामलों में 54 आरोपी देश छोड़कर फरार हो चुके हैं। अब तक 9 आरोपियों को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया जा चुका है और उनकी 840.68 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की गई है। इसके अलावा 18 आरोपियों के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया जारी है तथा उनसे जुड़ी 35,166.28 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति कुर्क की जा चुकी है। सरकार का फोकस सरकार का कहना है कि आधुनिक तकनीक, मजबूत कानूनों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए विदेशों में छिपे आर्थिक अपराधियों, ड्रग तस्करों और संगठित अपराध से जुड़े आरोपियों को कानून के दायरे में लाने की प्रक्रिया आगे भी इसी तरह जारी रहेगी।
Rashtrapati Bhavan At Home Invitation: स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 15 अगस्त को राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले पारंपरिक 'एट होम' (At Home) समारोह के लिए इस बार तैयार किए गए निमंत्रण पत्र अपनी अनूठी थीम और भारतीय लोक कला के शानदार प्रदर्शन के कारण चर्चा का विषय बने हुए हैं। इस वर्ष राष्ट्रपति भवन ने निमंत्रण पत्र और स्मृति-उपहारों के जरिए छत्तीसगढ़, गोवा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक कला और हस्तशिल्प को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान देने का प्रयास किया है। इस पहल का उद्देश्य भारत की विविध सांस्कृतिक पहचान को प्रदर्शित करने के साथ-साथ स्थानीय कलाकारों और शिल्पकारों को प्रोत्साहन देना भी है। निमंत्रण पत्र में दिखी भारतीय संस्कृति की झलक राष्ट्रपति भवन की ओर से तैयार की गई इस विशेष निमंत्रण किट को भारतीय संस्कृति और पारंपरिक कला को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है। किट में राष्ट्रपति भवन की आकृति वाला विशेष निमंत्रण कार्ड, पारंपरिक कलाकृतियों से सजा आकर्षक फोल्डर, हस्तनिर्मित सजावटी प्लेटें, कलात्मक शोपीस, स्थानीय बुनकरों द्वारा तैयार किया गया पारंपरिक गमछा और राष्ट्रपति भवन की नक्काशी वाली लकड़ी की स्मृति पट्टिका शामिल है। निमंत्रण पत्र में छत्तीसगढ़ की जनजातीय कला, गोवा की नीले-सफेद सिरेमिक शैली, मध्य प्रदेश की पारंपरिक लोक चित्रकला और महाराष्ट्र की हस्तशिल्प कला को बेहद आकर्षक तरीके से उकेरा गया है। हर कलाकृति अपने राज्य की सांस्कृतिक पहचान और लोक परंपरा की कहानी बयां करती है। 'वोकल फॉर लोकल' और 'मेक इन इंडिया' को मिलेगा बढ़ावा राष्ट्रपति भवन हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस के 'एट होम' समारोह के लिए किसी न किसी भारतीय कला, संस्कृति या हस्तशिल्प को थीम बनाता है। इस बार चार राज्यों की लोक कला को शामिल कर 'वोकल फॉर लोकल' और 'मेक इन इंडिया' की सोच को भी बढ़ावा दिया गया है। इस पहल के जरिए स्थानीय कारीगरों, बुनकरों और हस्तशिल्प कलाकारों की कला को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का प्रयास किया गया है। राष्ट्रपति भवन का मानना है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है और ऐसे आयोजनों के माध्यम से देश की पारंपरिक कलाओं को नई पहचान मिलती है। किन-किन राज्यों की कला को मिली जगह? इस वर्ष के निमंत्रण पत्र और स्मृति किट में जिन चार राज्यों की कला को प्रमुखता दी गई है, उनमें— छत्तीसगढ़ की जनजातीय और पारंपरिक लोक कला, गोवा की प्रसिद्ध नीले-सफेद सिरेमिक शैली, मध्य प्रदेश की पारंपरिक लोक चित्रकारी, महाराष्ट्र की हस्तनिर्मित शिल्प कला और पारंपरिक डिजाइनों को विशेष रूप से शामिल किया गया है। इन कलाओं के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विविधता और हस्तशिल्प की समृद्ध परंपरा को प्रदर्शित किया गया है। किन लोगों को मिलता है 'एट होम' समारोह का निमंत्रण? राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाला 'एट होम' समारोह देश के सबसे प्रतिष्ठित आयोजनों में से एक माना जाता है। इस समारोह में देश की विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट हस्तियों को आमंत्रित किया जाता है। इनमें— उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद, भारत के मुख्य न्यायाधीश, राज्यों के राज्यपाल और मुख्यमंत्री, वरिष्ठ प्रशासनिक एवं सैन्य अधिकारी, विभिन्न देशों के राजदूत और उच्चायुक्त, पद्म पुरस्कार विजेता, वैज्ञानिक, खिलाड़ी, कलाकार और साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोग, पारंपरिक कारीगर, जनजातीय समाज के प्रतिनिधि, 'अनसंग हीरोज' और स्वतंत्रता सेनानियों एवं उनके परिवारों को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता है। भारतीय विरासत को सम्मान देने की पहल राष्ट्रपति भवन की यह पहल केवल एक निमंत्रण पत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की समृद्ध लोक कला, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने का एक प्रयास है। इस वर्ष का 'एट होम' निमंत्रण पत्र देश की विविध संस्कृति, पारंपरिक शिल्पकला और स्थानीय कलाकारों के योगदान को राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करता है। साथ ही यह संदेश भी देता है कि आधुनिक भारत अपनी जड़ों, संस्कृति और लोक परंपराओं को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है।
NEET UG 2026: नीट-यूजी 2026 परीक्षा एक बार फिर विवादों में है। छह अभ्यर्थियों ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) पर OMR शीट की स्कैन कॉपी में उत्तर बदलने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। सुप्रीम कोर्ट ने काउंसिलिंग शुरू होने से पहले मामले की जल्द सुनवाई पर सहमति जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई को दी मंजूरी प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की उस मांग को स्वीकार किया, जिसमें काउंसिलिंग प्रक्रिया शुरू होने से पहले मामले की शीघ्र सुनवाई की अपील की गई थी। क्या है छात्रों का आरोप? याचिकाकर्ता छात्रों का कहना है कि परीक्षा के दौरान उन्होंने OMR शीट में जो उत्तर भरे थे, NTA की वेबसाइट पर अपलोड की गई स्कैन कॉपी में वे उत्तर अलग दिखाई दे रहे हैं। छात्रों के अनुसार: कई प्रश्नों के उत्तर बदले हुए या गलत दर्ज किए गए हैं। इससे उनके वास्तविक अंक प्रभावित हुए हैं। यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ तो उनकी मेरिट रैंक और मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पर असर पड़ सकता है। 600 से अधिक अंक पाने वाले छात्रों का दावा अदालत में छात्रों के वकील ने बताया कि याचिकाकर्ताओं ने परीक्षा में 600 से 650 से अधिक अंक प्राप्त किए हैं। उनका कहना है कि OMR शीट में कथित गड़बड़ी के कारण उन्हें नुकसान हुआ है और मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है। NTA से संपर्क के बावजूद नहीं मिला समाधान याचिका के मुताबिक, छात्रों ने OMR शीट में कथित विसंगतियों को लेकर NTA को कई ईमेल भेजे और कुछ अभ्यर्थी व्यक्तिगत रूप से एजेंसी के कार्यालय भी पहुंचे। हालांकि, उनका आरोप है कि NTA की ओर से कोई संतोषजनक जवाब या समाधान नहीं मिला, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। पहले भी उठ चुके हैं ऐसे सवाल NEET-UG 2026 में OMR शीट और परिणामों को लेकर इससे पहले भी कई कानूनी विवाद सामने आ चुके हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट, झारखंड हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में भी अभ्यर्थियों ने OMR शीट और घोषित अंकों में अंतर का आरोप लगाते हुए याचिकाएं दायर की थीं। पेपर लीक के बाद दोबारा हुई थी परीक्षा गौरतलब है कि NEET-UG 2026 की परीक्षा पहले 3 मई को आयोजित की गई थी। प्रश्नपत्र लीक के आरोपों के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई और 21 जून को दोबारा परीक्षा कराई गई। अब OMR शीट में कथित गड़बड़ी को लेकर परीक्षा एक बार फिर विवादों में आ गई है।
Tamil Nadu Politics: अभिनेत्री और बीजेपी नेता खुशबू सुंदर ने अभिनेत्री तृषा को लेकर उदयनिधि स्टालिन की कथित दोहरे अर्थ वाली टिप्पणी की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि यदि किसी में हिम्मत है तो इशारों में नहीं, बल्कि खुलकर नाम लेकर बात करनी चाहिए। खुशबू ने इस तरह की टिप्पणियों को महिलाओं का अपमान बताया। तृषा को लेकर टिप्पणी पर बढ़ा विवाद सोमवार (3 अगस्त) को तंजावुर में आयोजित एक विरोध प्रदर्शन के दौरान भीड़ ने "तृषा-तृषा" के नारे लगाए। इसके जवाब में उदयनिधि स्टालिन ने मुस्कुराते हुए कथित तौर पर दोहरे अर्थ वाली टिप्पणी की। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे अभिनेत्री तृषा पर टिप्पणी माना, जिसके बाद मामला विवादों में आ गया। खुशबू सुंदर ने क्या कहा? एक मीडिया बातचीत में खुशबू सुंदर ने कहा कि उन्हें उदयनिधि स्टालिन की टिप्पणी पर कोई हैरानी नहीं हुई। उन्होंने कहा, "अगर किसी में हिम्मत है तो इशारों में नहीं, बल्कि खुलकर नाम लेकर बात करनी चाहिए। किसी महिला पर सार्वजनिक मंच से इस तरह की टिप्पणी करना बेहद शर्मनाक है।" 'महिलाओं के प्रति भेदभाव डीएमके की विरासत' खुशबू सुंदर ने आरोप लगाया कि डीएमके की राजनीति में महिलाओं के प्रति भेदभाव और सेक्सिस्ट सोच लंबे समय से मौजूद है। उन्होंने कहा कि वह खुद भी पहले कई बार महिलाओं के खिलाफ की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों का सामना कर चुकी हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि युवा नेता होने के नाते उदयनिधि स्टालिन अलग सोच रखेंगे, लेकिन उनकी टिप्पणी बेहद निराशाजनक रही। हिरासत के बाद रिहा हुए उदयनिधि तृषा को लेकर विवादित टिप्पणी के मामले में उदयनिधि स्टालिन को मंगलवार (4 अगस्त) को महिला की गरिमा का अपमान करने समेत कई आरोपों में हिरासत में लिया गया था। पूछताछ के बाद उन्हें उसी दिन शाम को रिहा कर दिया गया। 'राजनीतिक लाभ के लिए महिलाओं का अपमान गलत' खुशबू सुंदर ने कहा कि राजनीतिक लाभ के लिए महिलाओं को निशाना बनाना स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा, "किसी महिला का अपमान करके कोई मजबूत नेता नहीं बन जाता। अगर आप खुद को जननेता कहते हैं, तो अपनी भाषा और व्यवहार में भी वही गरिमा दिखनी चाहिए।" उदयनिधि स्टालिन की टिप्पणी को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस जारी है, जबकि इस पूरे मामले पर संबंधित पक्षों की प्रतिक्रियाओं का इंतजार है।
India-Iran Relations: भारत सरकार ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच वरिष्ठ भारतीय विदेश सेवा (IFS) अधिकारी विश्वेश नेगी को ईरान में भारत का नया राजदूत नियुक्त किया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने इसकी आधिकारिक घोषणा करते हुए कहा कि वह जल्द ही तेहरान में अपना कार्यभार संभालेंगे। विदेश मंत्रालय ने जारी की नियुक्ति विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार, 2002 बैच के आईएफएस अधिकारी विश्वेश नेगी वर्तमान में मंत्रालय में संयुक्त सचिव (Joint Secretary) के पद पर कार्यरत हैं। उन्हें अब ईरान में भारत का अगला राजदूत नियुक्त किया गया है। रक्षा और कूटनीति का लंबा अनुभव विश्वेश नेगी को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और रणनीतिक मामलों का व्यापक अनुभव है। विदेश मंत्रालय में आने से पहले वे रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव (अंतरराष्ट्रीय सहयोग) के रूप में कार्य कर चुके हैं। इसके अलावा विभिन्न देशों में भारतीय मिशनों में भी उन्होंने अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं। तनावपूर्ण माहौल में हुई नियुक्ति यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। भारत लगातार होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) में वाणिज्यिक जहाजों और भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जता रहा है तथा क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सभी पक्षों से संवाद बनाए हुए है। जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री से की बातचीत हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से टेलीफोन पर बातचीत की। इस दौरान उन्होंने वाणिज्यिक जहाजों और नाविकों पर किसी भी तरह के हमले रोकने की आवश्यकता पर जोर दिया। जयशंकर ने कहा कि भारत पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को लेकर गंभीर रूप से चिंतित है और सभी पक्षों से संवाद और कूटनीति के माध्यम से समाधान निकालने की अपील करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत किसी भी पक्ष द्वारा वाणिज्यिक जहाजों या नाविकों पर किए जाने वाले हमलों का विरोध करता है। क्षेत्रीय घटनाक्रम पर भी चर्चा बातचीत के दौरान ईरानी विदेश मंत्री ने क्षेत्र की मौजूदा सुरक्षा स्थिति और जारी कूटनीतिक प्रयासों की जानकारी भी साझा की। भारत ने दोहराया कि वह हमेशा शांतिपूर्ण समाधान, बातचीत और कूटनीति का समर्थक रहा है। अमेरिका-ईरान वार्ता पर भी नजर इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि मध्यस्थों के जरिए अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत फिर शुरू होने वाली है। वहीं, ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार, ईरान और ओमान के बीच समुद्री व्यापार मार्गों के संचालन से जुड़े संयुक्त तंत्र पर भी अंतिम चरण की वार्ता चल रही है। भारत की ओर से नए राजदूत की नियुक्ति को ऐसे समय में महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम माना जा रहा है, जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों को लेकर वैश्विक चिंता बनी हुई है।
India-Uzbekistan Relations: भारत और उज्बेकिस्तान ने रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी साझेदारी को नई ऊंचाई देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर और उज्बेकिस्तान के विदेश मंत्री बख्तियोर सईदोव के बीच हुई बैठक में दोनों देशों ने व्यापार, माइनिंग, रेयर अर्थ मिनरल्स, ऊर्जा, डिजिटल टेक्नोलॉजी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। चार दिवसीय भारत दौरे पर हैं उज्बेकिस्तान के विदेश मंत्री चार दिवसीय भारत यात्रा पर आए उज्बेकिस्तान के विदेश मंत्री बख्तियोर सईदोव ने सोमवार को विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की। बैठक में द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत बनाने तथा नए क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर विस्तृत चर्चा हुई। माइनिंग और रेयर अर्थ मिनरल्स पर रहेगा विशेष फोकस बैठक के बाद एस. जयशंकर ने कहा कि भारत, उज्बेकिस्तान को अपने "विस्तारित पड़ोस (Extended Neighbourhood)" का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक संबंध अब नई आर्थिक साझेदारी में बदल रहे हैं। जयशंकर ने बताया कि निर्माण, ऊर्जा, डिजिटल टेक्नोलॉजी, स्वास्थ्य और शिक्षा के बाद अब दोनों देश माइनिंग सेक्टर, विशेष रूप से रेयर अर्थ मिनरल्स के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर काम करेंगे। व्यापार बढ़ाने पर भी जोर विदेश मंत्री ने कहा कि वर्तमान में भारत और उज्बेकिस्तान के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 1 अरब डॉलर का है, लेकिन दोनों देशों की क्षमता इससे कहीं अधिक है। इसलिए व्यापार और निवेश को बढ़ाने के लिए नई पहल की जाएगी। राष्ट्रपति मुर्मू ने बताईं नई संभावनाएं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी दोनों देशों के बीच रेयर अर्थ मिनरल्स, कृषि, फार्मास्यूटिकल्स, सूचना प्रौद्योगिकी और माइनिंग में सहयोग की व्यापक संभावनाओं पर जोर दिया। उन्होंने भारत-उज्बेकिस्तान बिजनेस फोरम का स्वागत करते हुए कहा कि इससे दोनों देशों के उद्योगों और निवेशकों को नए अवसर मिलेंगे। राष्ट्रपति ने बताया कि भारत के ITEC और छात्रवृत्ति कार्यक्रमों के तहत अब तक 3,000 से अधिक उज्बेक अधिकारी, पेशेवर और छात्र प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं, जबकि 16,000 से अधिक भारतीय छात्र फिलहाल उज्बेकिस्तान में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। NAM और BRICS पर भी हुई चर्चा बैठक के दौरान भारत ने 2027-29 के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की अध्यक्षता के लिए उज्बेकिस्तान को अपना समर्थन देने की घोषणा की। साथ ही, BRICS में साझेदार देश के रूप में भारत की अध्यक्षता के दौरान सहयोग के लिए उज्बेकिस्तान का आभार भी व्यक्त किया गया। आतंकवाद पर साझा रुख एस. जयशंकर ने कहा कि भारत और उज्बेकिस्तान आतंकवाद, उग्रवाद और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे मुद्दों पर समान सोच रखते हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने हर प्रकार के आतंकवाद और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई है। रिश्तों को नई ऊंचाई देने पर सहमति दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि लगातार उच्चस्तरीय संवाद, व्यापार, निवेश, तकनीकी सहयोग और मध्य एशिया में रणनीतिक साझेदारी के जरिए भारत-उज्बेकिस्तान संबंधों को आने वाले वर्षों में और अधिक मजबूत बनाया जाएगा।
नई दिल्ली: असम में भीषण बाढ़ से प्रभावित परिवारों के लिए देशभर से मदद के हाथ आगे बढ़ रहे हैं। इसी कड़ी में पंजाबी गायक और गीतकार गुरु रंधावा ने भी राहत कार्य में योगदान दिया है। उन्होंने असम बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए 5 लाख रुपये की आर्थिक मदद देने का ऐलान किया है। गुरु रंधावा ने यह राशि असम के यूट्यूबर और डिजिटल इन्फ्लुएंसर डिंपू बरुआ के ‘हेलो लाइफ फाउंडेशन’ के जरिए उपलब्ध कराई है। इसका उद्देश्य राहत सामग्री और जरूरी मदद को प्रभावित लोगों तक सीधे और पारदर्शी तरीके से पहुंचाना है। डिंपू बरुआ के फाउंडेशन के जरिए पहुंचाई जाएगी मदद डिंपू बरुआ इन दिनों ऊपरी असम के बाढ़ प्रभावित इलाकों में जमीनी स्तर पर राहत अभियान चला रहे हैं। उनका ‘हेलो लाइफ फाउंडेशन’ स्थानीय स्तर पर प्रभावित परिवारों तक भोजन, कपड़े, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान पहुंचाने के लिए काम कर रहा है। जानकारी के मुताबिक, फाउंडेशन को लोगों से मिले सहयोग के जरिए 16.64 लाख रुपये से अधिक की राशि जुटाई जा चुकी है। संस्था अगस्त के दौरान प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचकर जरूरतमंद परिवारों को सीधे सहायता उपलब्ध कराने की योजना पर काम कर रही है। असम में बाढ़ से भारी नुकसान असम के ऊपरी इलाकों में बाढ़ ने बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित किया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, बाढ़ से अब तक 85 लोगों की मौत हुई है, जबकि करीब 1.35 लाख लोग प्रभावित बताए जा रहे हैं। शिवसागर सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में शामिल है, जहां 55 हजार से अधिक लोग बाढ़ की चपेट में आए हैं। इसके अलावा चराइदेव में लगभग 40 हजार और जोरहाट में 22 हजार से अधिक लोगों के प्रभावित होने की जानकारी सामने आई है। बाढ़ के कारण कई परिवारों के सामने भोजन, सुरक्षित आवास, दवाइयों और रोजमर्रा की जरूरतों का संकट खड़ा हुआ है। ऐसे समय में सरकारी एजेंसियों के साथ सामाजिक संगठनों और आम लोगों की मदद भी राहत अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही है। रंधावा ने लोगों से मदद की अपील की गुरु रंधावा ने असम के हालात को बेहद पीड़ादायक बताते हुए लोगों से प्रभावित परिवारों की मदद के लिए आगे आने की अपील की है। उनका कहना है कि बचाव दल और प्रशासन लगातार राहत एवं बचाव कार्य में जुटे हैं, लेकिन इस मुश्किल घड़ी में समाज के हर वर्ग का सहयोग जरूरी है। रंधावा का यह योगदान केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। उन्होंने लोगों का ध्यान असम में जारी मानवीय संकट की ओर खींचते हुए राहत कार्यों में सहयोग करने की अपील भी की है। पंजाब बाढ़ के दौरान भी कर चुके हैं मदद गुरु रंधावा इससे पहले भी प्राकृतिक आपदा के समय राहत कार्यों में योगदान दे चुके हैं। वर्ष 2025 में पंजाब में आई बाढ़ के दौरान उन्होंने डेरा बाबा नानक और धारोवाली में राहत शिविरों के जरिए प्रभावित लोगों की मदद की थी। बताया गया था कि उन्होंने बाढ़ प्रभावित इलाकों में मवेशियों के लिए चारे की व्यवस्था करने, क्षतिग्रस्त घरों के पुनर्निर्माण में आर्थिक मदद देने और किसानों को खेती दोबारा शुरू करने के लिए गेहूं के बीज उपलब्ध कराने में सहयोग किया था। असम में उनकी ताजा पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब बाढ़ प्रभावित परिवारों को राहत और पुनर्वास के लिए लगातार बाहरी सहयोग की जरूरत है। गुरु रंधावा की 5 लाख रुपये की सहायता इसी राहत अभियान में एक योगदान है।
Security in Jammu Kashmir: 15 अगस्त से पहले किसी भी संभावित घुसपैठ या आतंकी साजिश को नाकाम करने के लिए सुरक्षा एजेंसियों ने चौकसी बढ़ा दी है। इसी क्रम में जम्मू पुलिस और सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर संयुक्त एंटी-टनल सर्च ऑपरेशन चलाया। इस अभियान के दौरान किसी भी संदिग्ध गतिविधि या सुरंग का पता नहीं चला। स्वतंत्रता दिवस से पहले बढ़ाई गई निगरानी भारत अगले सप्ताह 15 अगस्त 2026 को अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। इसे देखते हुए देशभर में सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं। खासकर पाकिस्तान से सटी सीमाओं पर घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों की आशंका को देखते हुए निगरानी और तलाशी अभियान तेज कर दिए गए हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमा पर चला एंटी-टनल सर्च ऑपरेशन जम्मू पुलिस और BSF ने संयुक्त रूप से बॉर्डर पुलिस पोस्ट अल्लाह के अधिकार क्षेत्र में आने वाले बॉर्डर आउट पोस्ट (BOP) पीतल इलाके में एंटी-टनल सर्च ऑपरेशन चलाया। अभियान का उद्देश्य सीमा के आसपास जमीन के नीचे बनी संभावित सुरंगों और किसी भी संदिग्ध गतिविधि का पता लगाना था, जिनका इस्तेमाल घुसपैठ के लिए किया जा सकता है। नहीं मिला कोई संदिग्ध सुराग सुरक्षा बलों ने पूरे क्षेत्र की गहन तलाशी ली। अभियान के दौरान कोई सुरंग, संदिग्ध गतिविधि या अवैध घुसपैठ का संकेत नहीं मिला। अधिकारियों के अनुसार, ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरा हुआ और सीमा क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था सामान्य बनी हुई है। नियमित रूप से चलाए जाते हैं ऐसे अभियान जम्मू पुलिस, BSF और अन्य सुरक्षा एजेंसियां सीमा क्षेत्रों में लगातार संयुक्त अभियान चलाती रहती हैं। इन अभियानों का उद्देश्य सीमा पार से होने वाली घुसपैठ, हथियारों की तस्करी और अन्य सुरक्षा खतरों को समय रहते रोकना है। दिल्ली समेत प्रमुख शहरों में भी सुरक्षा कड़ी स्वतंत्रता दिवस समारोह को देखते हुए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित देश के कई महत्वपूर्ण शहरों में भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। दिल्ली पुलिस, केंद्रीय सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों को किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं। सार्वजनिक स्थानों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा जांच और निगरानी बढ़ा दी गई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।