तेहरान: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार को लेकर तैयारियां जारी हैं। इस बीच उनके बेटे मोजतबा खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने को लेकर बड़ा बयान सामने आया है। ईरान के सुप्रीम लीडर के भारत स्थित प्रतिनिधि आयतुल्ला हकीम इलाही ने कहा है कि सुरक्षा कारणों से मोजतबा खामेनेई के सार्वजनिक रूप से अंतिम संस्कार में शामिल होने की संभावना बेहद कम है। सुरक्षा एजेंसियों ने सार्वजनिक उपस्थिति पर जताई चिंता इंडिया टुडे से बातचीत में आयतुल्ला हकीम इलाही ने बताया कि मौजूदा हालात में मोजतबा खामेनेई की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है। इसी वजह से उन्हें सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहने की सलाह दी गई है। उन्होंने कहा कि मोजतबा लोगों के बीच जाकर उनसे मिलना चाहते हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां इसकी अनुमति नहीं दे रही हैं। अधिकारियों का मानना है कि इस समय उनकी सार्वजनिक मौजूदगी सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकती है। तेहरान रवाना होने से पहले दिया बयान नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से तेहरान रवाना होने से पहले इलाही ने कहा कि पिछले सप्ताह उनकी ईरान यात्रा के दौरान उन लोगों से मुलाकात हुई थी, जो मोजतबा खामेनेई के संपर्क में थे। उन्हीं से मिली जानकारी के आधार पर उन्होंने यह बात साझा की। ईरान में कई दिनों तक चलेगा राजकीय शोक आयतुल्ला हकीम इलाही के अनुसार, अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद ईरान में कई दिनों तक राजकीय शोक और अंतिम संस्कार से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन आयोजनों का उद्देश्य इस्लामिक गणराज्य के प्रति जनता की एकजुटता और समर्थन को प्रदर्शित करना है। देशभर में शोक का माहौल उन्होंने कहा कि खामेनेई के निधन से पूरे ईरान में गहरा शोक है। बड़ी संख्या में लोग उन्हें देश का मजबूत नेतृत्वकर्ता और प्रेरणा का स्रोत मानते थे। उनके समर्थकों का मानना है कि उनकी कमी की भरपाई करना आसान नहीं होगा। इलाही ने कहा कि ईरान के विभिन्न प्रांतों के अलावा कई अन्य देशों से भी लोग तेहरान पहुंच रहे हैं, ताकि दिवंगत नेता को अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित कर सकें। अंतिम संस्कार में अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के पहुंचने की उम्मीद सूत्रों के अनुसार, अंतिम संस्कार में कई देशों के प्रतिनिधियों और धार्मिक नेताओं के शामिल होने की संभावना है। वहीं, सुरक्षा एजेंसियां पूरे कार्यक्रम के दौरान व्यापक सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने में जुटी हुई हैं। फिलहाल मोजतबा खामेनेई की सार्वजनिक मौजूदगी को लेकर अंतिम निर्णय सुरक्षा एजेंसियों की सलाह के आधार पर लिया जाएगा।
वॉशिंगटन/तेहरान: पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी प्रशासन द्वारा यह दावा किए जाने के बाद कि ईरान ने अमेरिकी सेना के एक अपाचे हेलीकॉप्टर को निशाना बनाया, अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास ईरानी सैन्य ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की है। वहीं ईरान ने भी अमेरिका को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि किसी भी सैन्य कार्रवाई का उचित जवाब दिया जाएगा। दक्षिणी ईरान में कई स्थानों पर हमले अमेरिकी कार्रवाई के बाद दक्षिणी ईरान के विभिन्न इलाकों से विस्फोटों की खबरें सामने आई हैं। ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, होर्मोजगान प्रांत, बंदर अब्बास, सीरिक क्षेत्र और केश्म द्वीप के आसपास कई धमाकों की आवाजें सुनी गईं। स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ हमले रणनीतिक सैन्य ठिकानों और निगरानी प्रणालियों को निशाना बनाकर किए गए। बताया जा रहा है कि कार्रवाई में लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल किया गया। हेलीकॉप्टर हादसे के बाद बढ़ा तनाव पूरा घटनाक्रम उस समय शुरू हुआ जब अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य के ऊपर गश्त के दौरान एक अमेरिकी अपाचे हेलीकॉप्टर पर हमला किया गया। अमेरिका का आरोप है कि हेलीकॉप्टर को एक ईरानी ड्रोन ने निशाना बनाया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि हेलीकॉप्टर में सवार दोनों पायलट सुरक्षित हैं और उन्हें सफलतापूर्वक बचा लिया गया। उन्होंने संकेत दिया था कि अमेरिका इस घटना का जवाब देगा। एयर डिफेंस सिस्टम बने निशाना अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार, जवाबी कार्रवाई में ईरान के कई एयर डिफेंस सिस्टम, रडार प्रतिष्ठानों और निगरानी ठिकानों को निशाना बनाया गया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने इस अभियान को "आत्मरक्षा में उठाया गया कदम" बताया है। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि यह कार्रवाई क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैन्य बलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई। ईरान ने दी सख्त प्रतिक्रिया ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी हमलों के बाद कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि ईरान किसी भी सैन्य दबाव या धमकी के आगे झुकने वाला नहीं है और देश की सशस्त्र सेनाएं हर चुनौती का जवाब देने के लिए तैयार हैं। अराघची ने विदेशी सैन्य बलों को क्षेत्र छोड़ने की सलाह देते हुए कहा कि बाहरी हस्तक्षेप क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ाता है और इससे गंभीर परिणाम हो सकते हैं। पहले भी दिया था जवाबी कार्रवाई का संकेत ईरानी मीडिया ने हमलों से पहले सैन्य सूत्रों के हवाले से कहा था कि यदि हेलीकॉप्टर घटना को आधार बनाकर ईरान के खिलाफ कोई नई सैन्य कार्रवाई की गई तो उसका "निर्णायक जवाब" दिया जाएगा। ईरान ने अमेरिकी आरोपों को लेकर आधिकारिक तौर पर विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी है और हेलीकॉप्टर गिराने के दावे पर भी स्पष्ट टिप्पणी से परहेज किया है। वैश्विक बाजारों की बढ़ी चिंता अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। ऐसे में क्षेत्र में किसी भी सैन्य टकराव का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ता है, तो इसका प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के इस्तीफे की खबरों ने राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। कुछ विदेशी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि देश की निर्णय प्रक्रिया में बढ़ते सैन्य प्रभाव और सरकार की सीमित भूमिका से नाराज होकर उन्होंने इस्तीफा देने की पेशकश की है। ईरानी सरकार और राष्ट्रपति कार्यालय ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। रिपोर्ट में क्या किया गया दावा? ब्रिटिश-ईरानी मीडिया संस्थान 'ईरान इंटरनेशनल' की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने दावा किया कि राष्ट्रपति पेजेशकियन ने सर्वोच्च नेतृत्व को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। रिपोर्ट में कहा गया कि महत्वपूर्ण राष्ट्रीय फैसलों में सरकार की भूमिका कम होने से वह असंतुष्ट थे। राष्ट्रपति कार्यालय ने बताया निराधार राष्ट्रपति कार्यालय के अधिकारियों ने इन खबरों को अफवाह करार देते हुए कहा कि पेजेशकियन सामान्य रूप से अपने सभी सरकारी दायित्व निभा रहे हैं। राष्ट्रपति कार्यालय के संचार विभाग ने कहा कि विदेशी मीडिया द्वारा फैलाई जा रही खबरों का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। तस्नीम एजेंसी ने भी किया खंडन आईआरजीसी से संबद्ध तस्नीम न्यूज एजेंसी ने सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा कि राष्ट्रपति ने इस्तीफा नहीं दिया है और सरकार अपना कामकाज सामान्य रूप से चला रही है। सरकार और सुरक्षा संस्थाओं के रिश्तों पर चर्चा पिछले कुछ महीनों से ईरान की निर्वाचित सरकार और सैन्य-सुरक्षा संस्थाओं के बीच मतभेदों की खबरें सामने आती रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में इस्तीफे की अटकलों को बल मिला। हालांकि, सरकार का कहना है कि देश की एकता और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर फैलाई जा रही ऐसी खबरों का कोई आधार नहीं है। सत्ता के केंद्र को लेकर बहस जारी विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की नीतिगत निर्णय प्रक्रिया में कई प्रभावशाली संस्थाओं और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका रहती है। लेकिन फिलहाल राष्ट्रपति के इस्तीफे को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और सरकार लगातार इन दावों को भ्रामक प्रचार बता रही है।
दुनिया के चर्चित इतिहासकार Yuval Noah Harari ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजराइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu की राजनीति पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि डर, ताकत और नफरत की राजनीति दुनिया को कमजोर बना रही है। नेतन्याहू पर हरारी का बड़ा आरोप एक इंटरव्यू में हरारी ने कहा कि इजराइल के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा नेता रहा हो जिसने समाज को उतना बांटा हो जितना नेतन्याहू ने किया। उनके मुताबिक, नेतन्याहू ने लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया और देश के भीतर गहरी राजनीतिक खाई पैदा की। हरारी ने कहा कि राष्ट्रवाद का मतलब अपने लोगों से प्रेम और जुड़ाव होना चाहिए, न कि समाज में नफरत फैलाना। ट्रम्प की राजनीति पर भी निशाना हरारी ने ट्रम्प की राजनीति की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि ट्रम्पवाद की सोच यह है कि कमजोर देश हमेशा ताकतवर देशों के सामने झुक जाएं। हरारी के मुताबिक यह सोच खतरनाक है, क्योंकि इससे दुनिया में हथियारों की दौड़ और संघर्ष बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि अगर दुनिया सिर्फ ताकत के नियम पर चलेगी, तो हर देश अपने संसाधन विकास की जगह हथियारों पर खर्च करेगा। “सहयोग से आगे बढ़ी इंसानी सभ्यता” हरारी ने कहा कि इंसानों की सबसे बड़ी ताकत युद्ध नहीं बल्कि सहयोग है। उन्होंने बताया कि इंसान इसलिए सफल हुआ क्योंकि लोग मिलकर समाज, कानून, बाजार और तकनीक बना सके। उन्होंने कहा कि अगर केवल ताकत ही सबकुछ होती, तो इंसान आज भी छोटे-छोटे समूहों में रह रहा होता। राष्ट्रवाद पर क्या बोले हरारी? हरारी ने कहा कि राष्ट्रवाद अपने आप में गलत नहीं है। उनके मुताबिक, राष्ट्रवाद का असली मतलब उन लोगों के लिए अपनापन महसूस करना है जिन्हें हम व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते, लेकिन फिर भी उनके लिए त्याग करने को तैयार रहते हैं। उन्होंने कहा कि भारत, इजराइल और चीन जैसे बड़े देशों में करोड़ों लोग रहते हैं, फिर भी राष्ट्रवाद लोगों को जोड़ने का काम करता है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब राष्ट्रवाद नफरत और विभाजन का रूप ले लेता है, तब यह समाज के लिए खतरा बन जाता है। AI को बताया सबसे बड़ा खतरा हरारी ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को भविष्य का सबसे बड़ा खतरा बताया। उन्होंने कहा कि AI केवल मशीन नहीं रह गया है, बल्कि अब वह इंसानों जैसी बातचीत और भावनाओं की नकल करना सीख रहा है। हरारी के मुताबिक आने वाले समय में लोग असली रिश्तों की जगह AI पर ज्यादा निर्भर हो सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर AI पर नियंत्रण कमजोर हुआ, तो यह इंसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।