Denmark Azaan Ban: डेनमार्क सरकार देशभर में मस्जिदों से लाउडस्पीकर के जरिए अजान के प्रसारण पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रही है। सरकार का कहना है कि यह कदम सामाजिक एकीकरण को मजबूत करने और सार्वजनिक जीवन में बढ़ते 'इस्लामीकरण' को लेकर उठाई जा रही चिंताओं के मद्देनजर प्रस्तावित किया जा रहा है। इमिग्रेशन एवं इंटीग्रेशन मंत्री मोर्टेन बॉडस्कोव ने कहा कि डेनमार्क की पहचान स्पष्ट रहनी चाहिए और लोगों को ऐसा महसूस नहीं होना चाहिए कि वे किसी दूसरे देश के माहौल में रह रहे हैं। देशभर में लागू हो सकता है नया कानून डेनमार्क सरकार मस्जिदों से लाउडस्पीकर के जरिए होने वाली अजान पर रोक लगाने के लिए कानूनी ढांचे की समीक्षा फिर से शुरू करने जा रही है। फिलहाल इस तरह के प्रसारण स्थानीय शोर नियंत्रण नियमों के दायरे में आते हैं, लेकिन सरकार अब पूरे देश के लिए एक समान कानून लाने की तैयारी कर रही है। सरकार का कहना है कि प्रस्ताव का उद्देश्य सार्वजनिक जीवन में समान नियम लागू करना और सामाजिक एकीकरण को मजबूत करना है। मंत्री बोले- डेनमार्क की पहचान बनी रहनी चाहिए इमिग्रेशन एवं इंटीग्रेशन मंत्री मोर्टेन बॉडस्कोव ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर लाउडस्पीकर के जरिए होने वाली धार्मिक घोषणाएं डेनमार्क के सामाजिक वातावरण के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने कहा कि देश के कुछ इलाकों को लेकर लोगों में ऐसी भावना नहीं बननी चाहिए कि वे डेनमार्क में नहीं, बल्कि किसी दूसरे देश के माहौल में रह रहे हैं। मंत्री ने यह भी कहा कि डेनमार्क की छतों पर नमाज की आवाज सुनाई नहीं देनी चाहिए। संसद में पेश होगा प्रस्ताव सरकार संसद में ऐसा प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर लाउडस्पीकर के जरिए अजान या अन्य धार्मिक घोषणाओं के प्रसारण पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान होगा। सरकार के मुताबिक यह धार्मिक अभिव्यक्ति पर रोक लगाने का प्रयास नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक एकीकरण से जुड़ी व्यापक नीति का हिस्सा है। पहले भी उठ चुके हैं ऐसे प्रस्ताव करीब 60 लाख आबादी वाले डेनमार्क में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 5 प्रतिशत है। देश में लगभग 100 मस्जिदें हैं। इससे पहले वर्ष 2020 और 2025 में भी इसी तरह के प्रस्ताव सामने आए थे, लेकिन वे संसद से पारित नहीं हो सके। अब सरकार तीसरी बार इस दिशा में पहल कर रही है। कोपेनहेगन में पहले से लागू हैं नियम राजधानी कोपेनहेगन में शोर नियंत्रण संबंधी नियमों के कारण मस्जिदों को खुले लाउडस्पीकर से अजान प्रसारित करने की अनुमति नहीं है। इसी वजह से शहर की प्रमुख मस्जिदों में बाहरी लाउडस्पीकर का उपयोग नहीं किया जाता। आव्रजन और धार्मिक नियमों पर पहले भी रही सख्ती प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन के नेतृत्व वाली सरकार यूरोप की सबसे सख्त आव्रजन नीतियों में गिनी जाती है। डेनमार्क ने वर्ष 2018 में सार्वजनिक स्थानों पर पूरे चेहरे को ढकने वाले कपड़ों, जैसे बुर्का और नकाब, पर प्रतिबंध लगाया था। अब सरकार इस प्रतिबंध को स्कूलों और विश्वविद्यालयों तक बढ़ाने पर भी विचार कर रही है। कुरान जलाने की घटनाओं के बाद बदला था कानून वर्ष 2023 में सार्वजनिक रूप से कुरान की प्रतियां जलाने की घटनाओं के बाद कई मुस्लिम देशों ने डेनमार्क की आलोचना की थी। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच सरकार ने धार्मिक ग्रंथों का अपमान करने और उन्हें जलाने पर रोक लगाने वाला कानून लागू किया था। अभी प्रस्ताव पर अंतिम फैसला नहीं फिलहाल लाउडस्पीकर से अजान पर प्रतिबंध का प्रस्ताव विचाराधीन है। सरकार कानूनी समीक्षा कर रही है और किसी भी नए कानून को लागू करने से पहले उसे संसद की मंजूरी लेनी होगी।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान नीति के मोर्चे पर बड़ी राजनीतिक जीत मिली है। अमेरिकी सीनेट ने उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रपति की ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने की शक्तियों पर कांग्रेस का नियंत्रण बढ़ाना था। मतदान के दौरान दो रिपब्लिकन सीनेटरों के अंतिम समय में रुख बदलने से ट्रंप प्रशासन को राहत मिल गई। प्रस्ताव के रुकने के बाद ट्रंप ने इसे ईरान के लिए "कड़ा संदेश" बताया और अपने सहयोगी सांसदों का धन्यवाद किया। ट्रंप ने जताई खुशी, बोले- ईरान के लिए चेतावनी सीनेट में मतदान के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, "वाह! सीनेट ने ईरान पर अपना वोट बदल दिया। रैंड पॉल और बिल कैसिडी ने अपना रुख बदला। नेता जॉन थ्यून, लिंडसे ग्राहम, बर्नी मोरेनो और सभी का धन्यवाद। यह वोट ईरान के लिए एक चेतावनी है।" ट्रंप का कहना है कि राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव अमेरिका की कूटनीतिक और रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता था। राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों पर लगाम लगाने की कोशिश नाकाम सीनेट में पेश किए गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान से पहले कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी आवश्यक हो। सीनेट ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और इस तरह राष्ट्रपति की मौजूदा युद्ध शक्तियों को सीमित करने की कोशिश फिलहाल विफल हो गई। दो रिपब्लिकन सांसदों ने बदला फैसला इस मतदान का सबसे बड़ा मोड़ दो रिपब्लिकन सांसदों के रुख बदलने से आया। सीनेटर रैंड पॉल ने इस बार 'प्रेजेंट' वोट किया, यानी उन्होंने पक्ष या विपक्ष में मतदान नहीं किया। सीनेटर बिल कैसिडी ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के खिलाफ मतदान किया। अंतिम मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका और परिणाम 47-50-1 रहा। रैंड पॉल बोले- शांति वार्ता के लिए दिया राष्ट्रपति को मौका मतदान से पहले रैंड पॉल ने सोशल मीडिया पर कहा कि उनकी युद्ध शक्तियों को लेकर राय नहीं बदली है। उन्होंने लिखा कि उनका 'प्रेजेंट' वोट राष्ट्रपति को स्थायी शांति के लिए बातचीत करने की अधिक गुंजाइश देने के उद्देश्य से है। बिल कैसिडी ने पहले उठाए सवाल, फिर बदला रुख सीनेटर बिल कैसिडी ने पहले ट्रंप प्रशासन से ईरान संघर्ष को लेकर कई सवाल पूछे थे। उनका कहना था कि सांसदों और जनता को युद्ध की वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए। बाद में उन्होंने बताया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने उन्हें विस्तृत जानकारी दी, जिससे उनकी कई चिंताएं दूर हो गईं। इसके बाद उन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। कुछ रिपब्लिकन ने किया समर्थन, डेमोक्रेट में भी दिखी अलग राय रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स और लिसा मुर्कोव्स्की ने राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को सीमित करने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं डेमोक्रेटिक सीनेटर जॉन फेटरमैन ने प्रस्ताव का विरोध किया। इससे साफ हुआ कि ईरान नीति को लेकर मतभेद केवल पार्टी लाइनों तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्रपति की शक्तियों पर बहस जारी अमेरिका में राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों का तर्क है कि यदि कोई फैसला अमेरिका को बड़े सैन्य संघर्ष की ओर ले जा सकता है, तो उसमें कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी अनिवार्य होनी चाहिए। वहीं ट्रंप समर्थकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के समय राष्ट्रपति के पास त्वरित निर्णय लेने की पर्याप्त संवैधानिक शक्तियां बनी रहनी चाहिए। ईरान को लेकर जारी तनाव के बीच सीनेट का यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक जीत माना जा रहा है, जबकि राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में बहस आगे भी जारी रहने के संकेत हैं।
ढाका/बीजिंग: भारत की सुरक्षा और सामरिक हितों से जुड़े संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के करीब स्थित तीस्ता नदी परियोजना को लेकर चीन और बांग्लादेश के बीच सहयोग और गहरा होने जा रहा है। बीजिंग में हुई उच्चस्तरीय बैठक में दोनों देशों ने तीस्ता समेत अन्य नदियों के जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और नदी पुनरुद्धार परियोजनाओं पर सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने चीन से तीस्ता परियोजना के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता मांगी, जिस पर बीजिंग ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। यह घटनाक्रम भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि तीस्ता नदी परियोजना भारत के अत्यंत संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर के नजदीक स्थित है, जो पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला एकमात्र संकरा भू-मार्ग है। बीजिंग में हुई अहम बैठक बांग्लादेश की सरकारी समाचार एजेंसी बीएसएस (Bangladesh Sangbad Sangstha) के अनुसार, चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग ने बीजिंग में प्रधानमंत्री तारिक रहमान से मुलाकात की। इस दौरान दोनों नेताओं ने तीस्ता और अन्य साझा नदियों के बेहतर प्रबंधन को लेकर सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह तारिक रहमान का दूसरा विदेश दौरा है। इससे पहले उन्होंने मलेशिया की यात्रा की थी। चीन दौरे के दौरान उनकी मुलाकात राष्ट्रपति शी चिनफिंग, प्रधानमंत्री ली च्यांग और अन्य वरिष्ठ चीनी नेताओं से भी प्रस्तावित है। बाढ़ नियंत्रण और जल प्रबंधन में चीन से मांगी मदद बैठक के दौरान तारिक रहमान ने कहा कि उनकी सरकार देशभर में नदी पुनरुद्धार और खुदाई अभियान चला रही है ताकि बाढ़ की समस्या कम हो, पर्यावरण संरक्षण हो सके और जल संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। उन्होंने चीन से— नदी किनारों के कटाव को रोकने, सिंचाई व्यवस्था को आधुनिक बनाने, अंतर्देशीय जल परिवहन मजबूत करने, तथा तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता की मांग की। चीन ने दिया पूरा सहयोग का भरोसा चीनी जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग ने कहा कि चीन जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में बांग्लादेश को हरसंभव सहयोग देगा। उन्होंने वर्ष 2005 के दोनों देशों के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) और हाल के वर्षों में चीनी विशेषज्ञों की यात्राओं का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देशों का सहयोग शोध और तकनीकी आधार पर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने बांग्लादेश के जल विशेषज्ञों और अधिकारियों को प्रशिक्षण के लिए चीन आने का भी निमंत्रण दिया। भारत के लिए क्यों अहम है तीस्ता परियोजना? तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर सिक्किम, पश्चिम बंगाल और फिर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। बांग्लादेश में यह सिंचाई और कृषि के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। रणनीतिक दृष्टि से इसकी सबसे बड़ी अहमियत यह है कि प्रस्तावित तीस्ता परियोजना भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब स्थित है। लगभग 20-22 किलोमीटर चौड़ा यह गलियारा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को मुख्य भूमि से जोड़ता है। ऐसे में इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी को भारत की सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। भारत की पेशकश ठुकरा चुका है बांग्लादेश भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे का मुद्दा लंबे समय से लंबित है। वर्ष 2024 में भारत ने तीस्ता बेसिन के संरक्षण और तकनीकी विकास में सहयोग देने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन बांग्लादेश ने इस दिशा में आगे बढ़ने के बजाय चीन के साथ सहयोग का रास्ता चुना। पिछले महीने बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने भी बीजिंग दौरे के दौरान औपचारिक रूप से चीन से तीस्ता नदी पुनरुद्धार परियोजना में सहयोग का अनुरोध किया था। गंगा जल संधि पर भी टिकी हैं निगाहें भारत और बांग्लादेश के बीच जल साझेदारी का एक और महत्वपूर्ण मुद्दा 1996 की गंगा जल संधि है, जिसकी 30 वर्षीय अवधि इस वर्ष पूरी हो रही है। यदि दोनों देश इसे आगे बढ़ाने पर सहमत नहीं होते, तो यह समझौता समाप्त हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में तीस्ता परियोजना और गंगा जल बंटवारा दोनों ही भारत-बांग्लादेश संबंधों के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक और कूटनीतिक मुद्दों में शामिल रहेंगे।
Washington: ईरान के मिनाब स्कूल पर हुए घातक मिसाइल हमले को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने कहा कि अब तक ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो सके कि स्कूल पर हमला अमेरिकी मिसाइल से किया गया था। उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान कई पक्षों की ओर से लगातार मिसाइलें दागी जा रही थीं, इसलिए हमले के लिए जिम्मेदार पक्ष की पहचान करना आसान नहीं है। 'हमारी मिसाइल थी, इसका कोई प्रमाण नहीं' हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने कहा कि कुछ लोगों ने दावा किया कि मिनाब स्कूल पर अमेरिकी मिसाइल से हमला हुआ, लेकिन उनके पास इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है। उन्होंने कहा, "युद्ध के दौरान हर दिशा से मिसाइलें दागी जा रही थीं। ऐसे में यह तय करना बेहद मुश्किल है कि किस मिसाइल ने हमला किया। मुझे ऐसा कोई सबूत नहीं दिखा जिससे यह कहा जा सके कि वह हमारी मिसाइल थी।" 28 फरवरी को हुआ था भीषण हमला ईरान-अमेरिका संघर्ष के पहले दिन यानी 28 फरवरी को मिनाब स्थित एक स्कूल पर मिसाइल हमला हुआ था। इस हमले में 150 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जिनमें बड़ी संख्या में स्कूली छात्राएं शामिल थीं। घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली और हमले की निष्पक्ष जांच की मांग उठी। अमेरिका पर लगे थे गंभीर आरोप हमले के तुरंत बाद कई मीडिया रिपोर्टों और विश्लेषकों ने आशंका जताई थी कि इसके पीछे अमेरिकी सैन्य कार्रवाई हो सकती है। अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने अब तक इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है और मामले की जांच जारी होने की बात कही है। ट्रंप ने जांच पर भी जताया संदेह डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इतने बड़े सैन्य संघर्ष के दौरान यह तय करना बेहद कठिन है कि किसी विशेष हमले के लिए कौन जिम्मेदार था। उन्होंने यह भी कहा कि संभव है कि इस मामले की पूरी सच्चाई कभी सामने ही न आ सके। उनके मुताबिक, युद्ध क्षेत्र में लगातार हो रहे हमलों और अलग-अलग पक्षों की सैन्य गतिविधियों के कारण जांच एजेंसियों के सामने भी बड़ी चुनौती है। दुनिया की नजर जांच रिपोर्ट पर मिनाब स्कूल पर हुआ हमला ईरान-अमेरिका संघर्ष की सबसे दर्दनाक घटनाओं में गिना जा रहा है। बड़ी संख्या में बच्चों और नागरिकों की मौत के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है। अब दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि जांच एजेंसियां इस हमले के लिए जिम्मेदार पक्ष की पहचान कर पाती हैं या नहीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 27 से 29 जून तक हिंद महासागर के द्वीपीय देश सेशेल्स की तीन दिवसीय राजकीय यात्रा पर जाएंगे। इस दौरान वह सेशेल्स के राष्ट्रीय दिवस के स्वर्ण जयंती समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा, समुद्री सुरक्षा और विकास सहयोग सहित कई अहम मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी के निमंत्रण पर होगा दौरा विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह यात्रा सेशेल्स के राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी के निमंत्रण पर करेंगे। अपने प्रवास के दौरान प्रधानमंत्री राष्ट्रपति हर्मिनी के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे, जिसमें दोनों देशों के संबंधों की समीक्षा की जाएगी और क्षेत्रीय व वैश्विक मुद्दों पर विचार-विमर्श होगा। राष्ट्रीय दिवस के स्वर्ण जयंती समारोह में होंगे शामिल प्रधानमंत्री मोदी सेशेल्स के राष्ट्रीय दिवस के 50वें वर्ष के समारोह में विशेष अतिथि के रूप में हिस्सा लेंगे। इस अवसर पर भारतीय सशस्त्र बलों का एक दल और भारतीय नौसेना के दो युद्धपोत भी समारोह में भाग लेंगे, जो दोनों देशों के रक्षा सहयोग और मजबूत रणनीतिक संबंधों का प्रतीक माना जा रहा है। संसद को करेंगे संबोधित, भारतीय समुदाय से भी मिलेंगे यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी सेशेल्स की संसद को संबोधित करेंगे। इसके अलावा वह वहां रह रहे भारतीय समुदाय के सदस्यों से भी मुलाकात करेंगे और दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक एवं जन-से-जन संबंधों को मजबूत करने पर जोर देंगे। भारत-सेशेल्स संबंधों को मिलेगी नई मजबूती विदेश मंत्रालय का कहना है कि यह दौरा भारत और सेशेल्स के बीच दशकों पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों को नई दिशा देगा। दोनों देशों के बीच समुद्री सुरक्षा, क्षमता निर्माण, विकास परियोजनाओं और आर्थिक सहयोग को और मजबूत करने पर विशेष ध्यान रहेगा। हिंद महासागर में भारत का अहम साझेदार है सेशेल्स सेशेल्स हिंद महासागर क्षेत्र में भारत का एक महत्वपूर्ण समुद्री साझेदार है। भारत की 'सागर' (Security and Growth for All in the Region) नीति, समुद्री सुरक्षा रणनीति और ग्लोबल साउथ देशों के साथ सहयोग बढ़ाने में सेशेल्स की अहम भूमिका मानी जाती है। यही वजह है कि इस यात्रा को क्षेत्रीय रणनीति और हिंद महासागर में भारत की बढ़ती भूमिका के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 2015 के बाद प्रधानमंत्री मोदी की पहली सेशेल्स यात्रा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे पहले वर्ष 2015 में सेशेल्स की यात्रा पर गए थे। लगभग एक दशक बाद हो रही यह यात्रा दोनों देशों के रणनीतिक, आर्थिक और समुद्री सहयोग को नई गति देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि यदि उनके देश की जल सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ, तो पाकिस्तान सैन्य कार्रवाई जैसे विकल्पों पर विचार कर सकता है। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब पाकिस्तान पहले से ही गंभीर जल संकट और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। भारत द्वारा पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल समझौते को स्थगित किए जाने के फैसले का असर पाकिस्तान के कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों पर दिखाई देने लगा है। क्या है विवाद की वजह? अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने 1960 के सिंधु जल समझौते को निलंबित कर दिया था। भारत ने स्पष्ट किया था कि जब तक सीमा पार आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह फैसला लागू रहेगा। हाल ही में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल के उस बयान के बाद पाकिस्तान की चिंता और बढ़ गई, जिसमें संकेत दिया गया था कि आने वाले वर्षों में पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी के उपयोग को लेकर भारत अपनी रणनीति मजबूत कर सकता है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर क्यों है असर? सिंधु नदी प्रणाली पाकिस्तान के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। देश की लगभग 80 प्रतिशत खेती इसी जल स्रोत पर निर्भर है। कृषि क्षेत्र— पाकिस्तान की GDP में लगभग 23 प्रतिशत योगदान देता है। कुल कार्यबल के 40 प्रतिशत से अधिक लोगों को रोजगार देता है। ग्रामीण आबादी के बड़े हिस्से की आजीविका का आधार है। कपास और टेक्सटाइल उद्योग पर बढ़ी चिंता पाकिस्तान का टेक्सटाइल उद्योग उसकी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र है। देश के कुल निर्यात का लगभग आधा हिस्सा इसी सेक्टर से आता है और इससे अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा अर्जित होती है। कपास की खेती के लिए सिंधु नदी का पानी बेहद महत्वपूर्ण है। यदि पानी की उपलब्धता प्रभावित होती है, तो इसका असर कपास उत्पादन और उससे जुड़े पूरे टेक्सटाइल उद्योग पर पड़ सकता है। बढ़ सकता है क्षेत्रीय तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि जल सुरक्षा से जुड़े मुद्दे दक्षिण एशिया में संवेदनशील विषय हैं और दोनों देशों के बीच किसी भी प्रकार का तनाव क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। ऐसे मामलों में कूटनीतिक संवाद और अंतरराष्ट्रीय समझौतों की भूमिका अहम मानी जाती है।
वॉशिंगटन/बर्गेनस्टॉक: स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही महत्वपूर्ण वार्ता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी सैन्य चेतावनी दी है। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को बंद करने की कोशिश की, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। ट्रंप के इस बयान ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है। ईरान को ट्रंप की सीधी चेतावनी फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल को चेतावनी देते हुए कहा, "अगर तुम होर्मुज बंद करने की कोशिश करोगे, तो अपने देश तक भी वापस नहीं पहुंच पाओगे।" उनके इस बयान को ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे सख्त चेतावनियों में से एक माना जा रहा है। ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका किसी भी कीमत पर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार को बाधित नहीं होने देगा। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिका का सख्त रुख ट्रंप ने कहा कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ता विफल हो जाती है, तो वाशिंगटन होर्मुज जलडमरूमध्य पर सीधे नियंत्रण स्थापित करने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर सकता है। उन्होंने कहा, "जरूरत पड़ी तो हम होर्मुज का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकते हैं।" ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ऐसी स्थिति में अमेरिका वहां से गुजरने वाले जहाजों पर टैक्स या टोल लगाने का कदम उठा सकता है। जहाजों पर 20 प्रतिशत तक टोल लगाने की चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि यदि ईरान समझौते के रास्ते पर नहीं आता है, तो होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर उनके तेल कार्गो के मूल्य का लगभग 20 प्रतिशत तक टोल लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसा कदम वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। लेबनान और हिज्बुल्लाह का भी किया जिक्र ट्रंप ने ईरान से लेबनान में सक्रिय संगठन हिज्बुल्लाह पर नियंत्रण रखने की भी मांग की। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय संघर्षों को बढ़ाने वाली गतिविधियों पर रोक लगनी चाहिए और ईरान को अपने सहयोगी समूहों की गतिविधियों को नियंत्रित करना होगा। स्विट्जरलैंड में जारी है अहम वार्ता अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक मुद्दों पर महत्वपूर्ण बातचीत चल रही है। हालांकि, ट्रंप के ताजा बयान के बाद इन वार्ताओं के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। विश्लेषकों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ट्रंप की चेतावनी केवल ईरान पर दबाव बनाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा मार्गों पर अमेरिकी रणनीतिक पकड़ को मजबूत करने का भी संकेत है।
US Iran War Cost: अमेरिका और ईरान के बीच 108 दिनों तक चले सैन्य संघर्ष के बाद दोनों देशों ने अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव फिलहाल थमता नजर आ रहा है। हालांकि इस युद्ध की कीमत दोनों देशों को भारी चुकानी पड़ी है, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर अमेरिका को भी बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 28 फरवरी से शुरू होकर 16 जून तक चले इस संघर्ष के दौरान अमेरिका ने केवल सैन्य अभियानों पर ही लगभग 113 अरब डॉलर खर्च किए। वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभावों को जोड़ने पर कुल नुकसान 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। शुरुआती छह दिनों में ही खर्च हुए 11.3 अरब डॉलर अमेरिकी रक्षा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक युद्ध के शुरुआती छह दिनों में ही करीब 11.3 अरब डॉलर खर्च हो चुके थे। इसके बाद प्रतिदिन औसतन लगभग 1 अरब डॉलर (करीब ₹94,475 करोड़) का खर्च दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल सैन्य अभियानों का अनुमानित खर्च है। वास्तविक आर्थिक बोझ इससे कहीं अधिक हो सकता है। मिसाइल और सैन्य तैनाती पर भारी खर्च युद्ध के शुरुआती चरण में अमेरिका ने मिसाइलों, गोला-बारूद और रक्षा उपकरणों पर लगभग 25 अरब डॉलर खर्च किए। पैट्रियट मिसाइल की एक यूनिट की कीमत लगभग 40 लाख डॉलर बताई जाती है। खाड़ी क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती और लॉजिस्टिक सपोर्ट पर भी अरबों डॉलर खर्च हुए। ट्रंप प्रशासन ने शुरुआत में इस युद्ध के लिए लगभग 200 अरब डॉलर के बजट की मांग की थी। अमेरिका पर कुल आर्थिक बोझ 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान अर्थशास्त्रियों और कई अमेरिकी नेताओं का मानना है कि युद्ध का असर केवल रक्षा बजट तक सीमित नहीं रहा। युद्ध के कारण: तेल की कीमतों में उछाल आया। ऊर्जा लागत बढ़ी। वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई। अमेरिकी उपभोक्ताओं और कंपनियों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ा। कुछ अनुमानों के मुताबिक अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर कुल प्रभाव 630 अरब डॉलर से लेकर 1 ट्रिलियन डॉलर तक हो सकता है। ईरान के पुनर्निर्माण पर भी भारी खर्च युद्ध में ईरान के कई महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, तेल रिफाइनरियां और पावर ग्रिड प्रभावित हुए। इनके पुनर्निर्माण के लिए करीब 300 अरब डॉलर की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अंतरिम समझौते के तहत अमेरिका ने इस पुनर्निर्माण प्रक्रिया में सहयोग करने पर सहमति जताई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि इस फंडिंग में खाड़ी देशों की भी भूमिका रहेगी। आम लोगों पर भी पड़ा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का असर सीधे आम उपभोक्ताओं पर पड़ा। अनुमान है कि केवल ऊर्जा कीमतों में वृद्धि के कारण अमेरिकी नागरिकों को 40 अरब डॉलर से अधिक का अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ा। हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि वास्तविक नुकसान इससे कहीं अधिक हो सकता है। प्रमुख आंकड़े एक नजर में युद्ध की अवधि: 108 दिन सैन्य खर्च: लगभग 113 अरब डॉलर शुरुआती 6 दिनों का खर्च: 11.3 अरब डॉलर प्रतिदिन औसत खर्च: लगभग 1 अरब डॉलर ईरान के पुनर्निर्माण की अनुमानित लागत: 300 अरब डॉलर कुल संभावित आर्थिक प्रभाव: 1 ट्रिलियन डॉलर तक
अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14 सूत्रीय समझौते (MoU) के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। समझौते के तहत अगले 60 दिनों तक व्यापारिक जहाजों को बिना किसी शुल्क के इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने की अनुमति दी गई है, लेकिन ईरान ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि इसके बाद जहाजों से टोल (शुल्क) वसूला जा सकता है। ईरान ने क्या कहा? ईरानी संसद के स्पीकर और अमेरिका के साथ बातचीत में प्रमुख भूमिका निभाने वाले मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य अब युद्ध से पहले जैसी स्थिति में नहीं लौटेगा। उन्होंने कहा, "होर्मुज पर ईरान का संप्रभु अधिकार है और वहां दी जाने वाली सेवाओं के बदले शुल्क लेना स्वाभाविक है।" इस बयान को इस संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि ईरान भविष्य में इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से राजस्व कमाने की औपचारिक व्यवस्था लागू कर सकता है। समझौते में क्या प्रावधान है? अमेरिका-ईरान समझौते के पांचवें अनुच्छेद के अनुसार: • अगले 60 दिनों तक व्यापारिक जहाजों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। • ईरान समुद्री बारूदी सुरंगों और अन्य बाधाओं को हटाकर जहाजों की आवाजाही सामान्य करेगा। • 30 दिनों के भीतर युद्ध के दौरान प्रभावित समुद्री मार्गों को पूरी तरह बहाल करने का लक्ष्य रखा गया है। समझौते में 60 दिनों के बाद शुल्क व्यवस्था पर कोई स्थायी प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। तेल टैंकरों से अरबों डॉलर की कमाई की उम्मीद विश्लेषकों का मानना है कि यदि ईरान प्रति बैरल तेल पर लगभग 1 डॉलर के बराबर शुल्क भी लगाता है, तो उसे सालाना अरबों डॉलर का अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की आपूर्ति गुजरती है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे प्रमुख ऊर्जा उत्पादकों का अधिकांश निर्यात इसी मार्ग पर निर्भर करता है। ट्रंप के रुख में आया बदलाव ईरान लंबे समय से होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर टोल लगाने की बात करता रहा है। पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस विचार का विरोध करते रहे थे और उन्होंने ईरान तथा ओमान दोनों को चेतावनी भी दी थी। लेकिन अब हुए समझौते में 60 दिनों बाद शुल्क लगाने पर कोई रोक नहीं होने से माना जा रहा है कि अमेरिका ने अप्रत्यक्ष रूप से ईरान के लिए यह विकल्प खुला छोड़ दिया है।
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक बड़ा कूटनीतिक कदम उठाया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। समझौते के लागू होने के साथ ही दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव कम करने, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और आर्थिक एवं परमाणु मुद्दों पर व्यापक बातचीत शुरू करने का रास्ता साफ हो गया है। अमेरिकी प्रशासन ने इस दस्तावेज को ‘संयुक्त राज्य अमेरिका और इस्लामी गणराज्य ईरान के बीच इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन’ के रूप में जारी किया है। समझौते का उद्देश्य 60 दिनों के विस्तारित युद्धविराम को लागू करना और लंबित मुद्दों पर अंतिम समझौते की रूपरेखा तैयार करना है। होर्मुज जलडमरूमध्य तुरंत खोलने पर सहमति समझौते का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी समुद्री मार्ग से होता है। समझौते के तहत ईरान ने 60 दिनों तक फारस की खाड़ी और ओमान सागर के बीच वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षित और निर्बाध मार्ग देने पर सहमति जताई है। प्रतिबंधों में चरणबद्ध राहत का रोडमैप अमेरिका ने ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की प्रतिबद्धता जताई है। इसके तहत ईरानी तेल निर्यात, बैंकिंग, बीमा और परिवहन सेवाओं को तत्काल राहत देने का प्रावधान किया गया है। साथ ही अमेरिका ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों और धनराशि को भी जारी करने पर सहमत हुआ है। परमाणु कार्यक्रम पर आगे होगी विस्तृत बातचीत समझौते में ईरान ने एक बार फिर दोहराया है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा और न ही उन्हें हासिल करने की कोशिश करेगा। दोनों देशों ने संवर्धित यूरेनियम भंडार, यूरेनियम संवर्धन और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अन्य मुद्दों पर अंतिम समझौते के तहत विस्तृत चर्चा करने पर सहमति जताई है। 14 सूत्रीय समझौते की प्रमुख बातें सभी सैन्य अभियानों और युद्ध गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से रोकना। एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना। 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते की दिशा में काम करना। अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया शुरू करना। होर्मुज जलडमरूमध्य से वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित और मुफ्त आवाजाही सुनिश्चित करना। ईरान के लिए 300 अरब डॉलर की आर्थिक पुनर्निर्माण योजना तैयार करना। संयुक्त राष्ट्र और अमेरिकी प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाने का रोडमैप बनाना। ईरान द्वारा परमाणु हथियार नहीं बनाने की प्रतिबद्धता दोहराना। अंतिम समझौते तक दोनों देशों द्वारा यथास्थिति बनाए रखना। ईरानी तेल निर्यात, बैंकिंग और बीमा सेवाओं को तत्काल राहत देना। ईरान की जमी हुई संपत्तियों और धनराशि को जारी करना। समझौते के अनुपालन के लिए विशेष निगरानी तंत्र स्थापित करना। अंतिम समझौते के लिए औपचारिक वार्ता शुरू करना। अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बाध्यकारी प्रस्ताव के माध्यम से वैधता प्रदान करना। पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा मोड़ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता तय शर्तों के अनुसार लागू होता है, तो इससे न केवल अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा टकराव समाप्त होगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, तेल बाजार, क्षेत्रीय सुरक्षा और पश्चिम एशिया की भू-राजनीति पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार में स्थिरता आने की उम्मीद भी बढ़ गई है।
नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते के संकेतों के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में राहत की उम्मीद बढ़ गई है। इस बीच भारत के लिए भी एक सकारात्मक खबर सामने आई है। पिछले तीन महीनों से अधिक समय से फारस की खाड़ी क्षेत्र में रुका भारतीय एलएनजी (Liquefied Natural Gas) टैंकर 'दिशा' (Disha) अब होर्मुज जलडमरूमध्य की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। यदि समझौते के बाद होर्मुज जलमार्ग आधिकारिक रूप से खुलता है, तो यह भारतीय टैंकर इस रणनीतिक मार्ग से गुजरने वाला पहला जहाज बन सकता है। क्यों अहम है होर्मुज जलडमरूमध्य? होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है। खाड़ी देशों से निकलने वाले तेल और प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से एशिया और यूरोप तक पहुंचता है। फरवरी के अंत में क्षेत्र में बढ़े तनाव और अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद इस मार्ग पर गतिविधियां लगभग ठप हो गई थीं, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई और ऊर्जा कीमतों में उछाल देखने को मिला। कहां पहुंच चुका है भारतीय टैंकर? शिप-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, भारत की एक सरकारी आयातक कंपनी द्वारा दीर्घकालिक लीज पर लिया गया एलएनजी टैंकर 'दिशा' इस समय संयुक्त अरब अमीरात के उत्तर में ओमान के करीब पहुंच चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस जहाज ने लगभग 1 मार्च के आसपास कतर के रास लफ्फान एलएनजी टर्मिनल से गैस की खेप लोड की थी। इसके बाद क्षेत्रीय तनाव के कारण इसकी आवाजाही प्रभावित हुई। समझौते से वैश्विक बाजार को राहत यदि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पूरी तरह लागू होता है और दोनों ओर की नाकेबंदी समाप्त होती है, तो इसका सीधा फायदा— भारत सहित ऊर्जा आयात करने वाले देशों, यूरोप और एशिया के गैस बाजार, और वैश्विक तेल व्यापार को मिलेगा। मार्च से एलएनजी सप्लाई में आई कमी के कारण गैस की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई थी। अब सप्लाई सामान्य होने से कीमतों में नरमी आने की संभावना जताई जा रही है। कच्चे तेल की कीमतों पर भी असर होर्मुज के खुलने की उम्मीद के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में शुरुआती कारोबार के दौरान चार प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों का मानना है कि ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होने से बाजार में स्थिरता लौट सकती है। अभी भी बनी हुई हैं चुनौतियां विशेषज्ञों के अनुसार, समझौते के बाद भी स्थिति पूरी तरह सामान्य होने में समय लग सकता है। कई जहाज अपनी वास्तविक लोकेशन छिपाने के लिए ट्रांसपोंडर बंद कर रहे हैं, जिससे समुद्री गतिविधियों की सही तस्वीर सामने आना मुश्किल हो रहा है। इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का रणनीतिक प्रभाव भविष्य में भी इस मार्ग को संवेदनशील बनाए रख सकता है।
उत्तर कोरिया पर ड्रोन ऑपरेशन से जुड़ा मामला, सत्ता से हटाए जा चुके हैं यून दक्षिण कोरिया की एक अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति Yoon Suk Yeol को बड़ा झटका देते हुए 30 साल की जेल की सजा सुनाई है। अदालत ने उन्हें उत्तर कोरिया के ऊपर सैन्य ड्रोन भेजने की साजिश और सत्ता के दुरुपयोग का दोषी पाया है। यह मामला अक्टूबर 2024 में प्योंगयांग के ऊपर कथित ड्रोन घुसपैठ से जुड़ा हुआ है। अदालत ने क्या कहा? Seoul Central District Court ने अपने फैसले में कहा कि यून शुरू से ही उस ड्रोन ऑपरेशन की योजना में शामिल थे, जिसके तहत उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग के ऊपर सैन्य ड्रोन भेजे गए थे। अदालत के अनुसार यह कार्रवाई बाद में दिसंबर 2024 में मार्शल लॉ लागू करने के लिए माहौल बनाने की कोशिश का हिस्सा थी। अदालत ने यून को "दुश्मन की सहायता करने" और "सत्ता के दुरुपयोग" का दोषी ठहराया। पहले भी मिल चुकी है उम्रकैद यह फैसला यून के खिलाफ आया दूसरा बड़ा न्यायिक झटका है। इससे पहले फरवरी 2026 में उन्हें मार्शल लॉ लागू करने की कोशिश से जुड़े विद्रोह (Insurrection) मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है। यून को पिछले वर्ष संवैधानिक अदालत द्वारा महाभियोग को बरकरार रखने के बाद राष्ट्रपति पद से हटा दिया गया था। इसके बाद हुए विशेष चुनाव में Lee Jae Myung ने जीत हासिल कर देश की सत्ता संभाली। यून ने आरोपों से किया इनकार पूर्व राष्ट्रपति यून ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया है। उनके वकीलों का कहना है कि उन्होंने न तो ड्रोन मिशन का आदेश दिया और न ही उसे मंजूरी दी। बचाव पक्ष के अनुसार यह अभियान उत्तर कोरिया द्वारा दक्षिण कोरिया की सीमा में कचरे से भरे गुब्बारे भेजने की घटनाओं के जवाब में किया गया था और इसका मार्शल लॉ से कोई संबंध नहीं था। अपील का रास्ता खुला अभियोजन पक्ष ने अप्रैल में यून के लिए 30 साल की सजा की मांग की थी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। हालांकि यून अभी भी इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दे सकते हैं। वह पहले से सुनाई गई उम्रकैद की सजा के खिलाफ भी अपील कर चुके हैं। दक्षिण कोरिया की राजनीति में बढ़ी हलचल पूर्व राष्ट्रपति के खिलाफ लगातार आ रहे फैसलों ने दक्षिण कोरिया की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला देश के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक और संवैधानिक संकटों में से एक माना जाएगा।
ईरान पर हमले रोकने के फैसले से चौंके नेतन्याहू अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों के बीच एक नई रिपोर्ट ने पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu को उस समय बड़ा झटका लगा जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमले रोकने और कूटनीतिक रास्ता अपनाने का फैसला किया। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप ने यह फैसला तब लिया जब उन्हें संकेत मिले कि ईरानी नेतृत्व युद्ध समाप्त करने के लिए तैयार किए गए एक प्रारूप समझौते पर सहमत हो गया है। बताया जा रहा है कि नेतन्याहू को इस बातचीत की पूरी जानकारी नहीं थी और वे अमेरिकी प्रशासन के करीबी लोगों से इसके बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहे थे। क्या इजरायल को वार्ता से दूर रखा गया? सूत्रों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में इजरायल सीधे तौर पर शामिल नहीं है। जब ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ईरान के साथ समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, तो इजरायल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने स्पष्ट किया कि वह इस प्रस्तावित समझौते का हिस्सा नहीं है। यही कारण है कि यह सवाल उठने लगा है कि क्या क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर इजरायल को वार्ता प्रक्रिया से अलग रखा गया। 'इस्लामाबाद समझौता' बन सकता है नया मोड़ रिपोर्ट्स के मुताबिक, कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता में तैयार किए जा रहे इस समझौते को "इस्लामाबाद एग्रीमेंट" नाम दिया जा सकता है। प्रस्तावित समझौते में कई अहम बिंदु शामिल हैं। इसके तहत Strait of Hormuz को तुरंत फिर से खोलने, समुद्री व्यापार सामान्य करने, ईरान को सीमित प्रतिबंध राहत देने और 60 दिनों के युद्धविराम को आगे बढ़ाने जैसे प्रावधान शामिल बताए जा रहे हैं। इस दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी आगे बातचीत हो सकती है। इजरायल की शर्तें अब भी सख्त नेतन्याहू लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने की मांग करते रहे हैं। इजरायल चाहता है कि ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम भंडार को हटाए, परमाणु संवर्धन ढांचे को खत्म करे, मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाए और क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों को समर्थन देना बंद करे। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित समझौते में इजरायल की इन मांगों को कितना स्थान मिला है। ट्रंप और नेतन्याहू के बीच बढ़ रही दूरी? रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि हाल के दिनों में ट्रंप और नेतन्याहू के संबंधों में तनाव बढ़ा है। दोनों नेताओं की रणनीति में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। जहां ट्रंप युद्ध को जल्द समाप्त कर क्षेत्र में स्थिरता लाना चाहते हैं, वहीं नेतन्याहू ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के खिलाफ अधिक कठोर और लंबी रणनीति के पक्षधर माने जा रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि बढ़ती तेल कीमतों, वैश्विक आर्थिक दबाव और घरेलू राजनीतिक चुनौतियों के कारण ट्रंप युद्ध को जल्द खत्म करना चाहते हैं, जबकि इजरायल अपनी सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता दे रहा है। पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव यदि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता अंतिम रूप ले लेता है, तो यह पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। इससे न केवल क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार को भी राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि इजरायल की चिंताओं और उसकी भविष्य की रणनीति पर अभी भी कई सवाल बने हुए हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति लाता है या नए राजनीतिक मतभेदों को जन्म देता है।
युद्धविराम की दिशा में बड़ी प्रगति, समझौते का मसौदा तैयार अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और सैन्य संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों देशों ने शांति समझौते के एक ड्राफ्ट (मसौदा) के शब्दों पर सहमति बना ली है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि समझौते का अंतिम मसौदा तैयार हो चुका है और मध्यस्थ देश इसे अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में शांति स्थापित करने की दिशा में यह अब तक की सबसे महत्वपूर्ण प्रगति है और समझौता पहले से कहीं ज्यादा करीब दिखाई दे रहा है। ट्रंप और ईरान के विदेश मंत्री ने भी दिए सकारात्मक संकेत अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने भी संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच समझौता जल्द हो सकता है। वहीं ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा कि किसी समझौते के इतने करीब दोनों देश पहले कभी नहीं पहुंचे थे। हालांकि ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मसौदा अभी आंतरिक समीक्षा के दौर से गुजर रहा है और अंतिम मंजूरी मिलना बाकी है। क्या जल्द होगा समझौते पर हस्ताक्षर? ईरान की ओर से संकेत मिले हैं कि आने वाले दिनों में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि हस्ताक्षर किसी आमने-सामने बैठक के बजाय ऑनलाइन या दूरस्थ माध्यम से भी किए जा सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, इस प्रारंभिक समझौते का मुख्य उद्देश्य युद्ध को समाप्त करना और क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करना है। परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों को फिलहाल इस समझौते से अलग रखा गया है और उन पर बाद में अलग चरण में बातचीत की जाएगी। किन मुद्दों पर अब भी बनी हुई है असहमति? हालांकि बातचीत में काफी प्रगति हुई है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं। ईरान चाहता है कि उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में राहत मिले और विदेशों में जमा उसकी संपत्तियां मुक्त की जाएं। दूसरी ओर अमेरिका का कहना है कि किसी भी राहत से पहले ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कुछ कदम उठाने होंगे। यही कारण है कि अंतिम समझौते से पहले कुछ शर्तों पर और बातचीत हो सकती है। भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता? इस संभावित समझौते का भारत पर भी सीधा असर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, समझौते में Strait of Hormuz को फिर से पूरी तरह खोलने की दिशा में कदम शामिल हो सकते हैं। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। यदि इस क्षेत्र में तनाव कम होता है और जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है, तो तेल की कीमतों में स्थिरता आने की संभावना बढ़ जाएगी। इजरायल अभी भी बातचीत का हिस्सा नहीं रिपोर्ट्स के अनुसार, Israel इस वार्ता प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। इजरायली नेतृत्व पहले ही संकेत दे चुका है कि वह अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रख सकता है और जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र रूप से फैसले लेने का अधिकार सुरक्षित रखता है। अगले कुछ दिन होंगे बेहद अहम कूटनीतिक सूत्रों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के भीतर सभी स्तरों पर मंजूरी मिल जाती है, तो आने वाले कुछ दिनों में आधिकारिक समझौते की घोषणा हो सकती है। इससे पश्चिम एशिया में जारी तनाव कम होने, वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत मिलने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों की सुरक्षा बहाल होने की उम्मीद बढ़ जाएगी।
लंदन: ब्रिटेन की राजधानी लंदन में भारतीय मूल के एक परिवार की दर्दनाक मौत ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है। भारतीय मूल के राकेश पई, उनकी पत्नी अदिति पारलकर और उनके नौ वर्षीय बेटे सिड की 36वीं मंजिल से गिरने के बाद मौत हो गई। घटना की जांच जारी है और स्थानीय पुलिस ने अभी तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से इनकार किया है। ब्रिटिश मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह परिवार लंदन के एक हाई-राइज टावर ब्लॉक की 36वीं मंजिल पर स्थित अपार्टमेंट में रहता था। 27 मई को हुई इस घटना के बाद इलाके में सनसनी फैल गई। आपातकालीन सेवाओं को तुरंत मौके पर बुलाया गया, लेकिन तीनों को बचाया नहीं जा सका। मुंबई से लंदन तक का सफर रिपोर्ट्स के अनुसार, 47 वर्षीय राकेश पई और 46 वर्षीय अदिति पारलकर वर्ष 2000 के दशक में मुंबई से लंदन चले गए थे। राकेश वित्तीय सलाहकार के रूप में कार्यरत थे, जबकि अदिति निर्माण क्षेत्र में वरिष्ठ पद पर काम कर रही थीं। दोनों ने ब्रिटेन में सफल पेशेवर जीवन स्थापित किया था। उनके बेटे सिड की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं ने परिवार के सामने लगातार चुनौतियां खड़ी कर दी थीं। बताया जाता है कि सिड कई स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों से जूझ रहा था और उसे विशेष शैक्षणिक एवं चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता थी। बेटे की बीमारी बनी बड़ी चुनौती मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिड किडनी संबंधी गंभीर बीमारी से पीड़ित था और बोलने में भी असमर्थ था। उसकी देखभाल की मुख्य जिम्मेदारी अदिति पारलकर पर थी। उन्होंने बेटे की विशेष जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उसे घर पर ही पढ़ाने और उसकी देखभाल करने का निर्णय लिया था। परिवार के करीबी लोगों का कहना है कि लगातार देखभाल और जिम्मेदारियों का दबाव परिवार के लिए भावनात्मक और मानसिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा था। इलाज के लिए भारत लौटे, फिर ब्रिटेन वापस गए करीबी सूत्रों के अनुसार, परिवार करीब छह वर्ष पहले बेहतर इलाज की तलाश में लंदन छोड़कर मुंबई लौट आया था। बाद में चिकित्सा विकल्प सीमित होने के कारण वे दोबारा ब्रिटेन चले गए। इस दौरान परिवार कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था। परिवार के एक मित्र ने ब्रिटिश मीडिया से बातचीत में कहा कि अदिति पर नौकरी, घर और बेटे की देखभाल का भारी दबाव था। उनके अनुसार, ब्रिटेन में परिवार का कोई करीबी सहारा भी मौजूद नहीं था, जिससे हालात और चुनौतीपूर्ण हो गए थे। पुलिस जांच जारी, कारणों पर सस्पेंस इस घटना को लेकर ब्रिटिश मीडिया में विभिन्न तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं, लेकिन स्थानीय पुलिस ने मामले को फिलहाल "अप्रत्याशित मौत" (Unexplained Death) के रूप में दर्ज किया है। बर्मंडसी और ओल्ड साउथवार्क से सांसद नील कॉयल ने घटना पर दुख जताते हुए इसे बेहद त्रासद बताया। उन्होंने कहा कि कुछ स्थानीय लोगों ने इस घटना को अपनी आंखों से देखा था और पूरा समुदाय इस घटना से स्तब्ध है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मौत की परिस्थितियों की जांच की जा रही है और अभी किसी भी संभावना को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। मृतकों के परिजनों को घटना की जानकारी दे दी गई है और उन्हें आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। जांच पूरी होने का इंतजार परिवार के मित्रों और परिचितों ने घटना को लेकर सामने आ रहे कुछ दावों पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि जांच पूरी होने से पहले किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। फिलहाल सभी की नजरें पुलिस जांच पर टिकी हैं, जिससे इस दर्दनाक घटना की वास्तविक परिस्थितियां सामने आ सकें।
वॉशिंगटन/होर्मुज स्ट्रेट: पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच होर्मुज स्ट्रेट के निकट एक अमेरिकी सैन्य अपाचे हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। राहत की बात यह रही कि हेलीकॉप्टर में सवार दोनों पायलटों और चालक दल के अन्य सदस्यों को समय रहते सुरक्षित बचा लिया गया। अमेरिकी अधिकारियों ने हादसे की पुष्टि करते हुए बताया कि दुर्घटना के कारणों की जांच की जा रही है। बचाव अभियान में सुरक्षित निकाला गया चालक दल रिपोर्टों के अनुसार, हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त होने के तुरंत बाद अमेरिकी सैन्य बलों ने रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। बचाव दल ने चालक दल के सभी सदस्यों को सुरक्षित निकाल लिया। प्रारंभिक जानकारी में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है। अमेरिकी प्रशासन की ओर से अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि हेलीकॉप्टर तकनीकी खराबी, मौसम संबंधी कारणों या किसी अन्य वजह से दुर्घटनाग्रस्त हुआ। रणनीतिक क्षेत्र में हुआ हादसा होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस क्षेत्र में अमेरिका, ईरान और अन्य देशों की सैन्य गतिविधियां लगातार बनी रहती हैं। ऐसे में अमेरिकी सैन्य हेलीकॉप्टर का दुर्घटनाग्रस्त होना सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है। अमेरिका-ईरान तनाव के बीच बढ़ी संवेदनशीलता यह घटना ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव को कम करने तथा संभावित समझौते को लेकर कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। हाल के दिनों में क्षेत्र में बढ़ी सैन्य गतिविधियों और संघर्ष की घटनाओं ने पहले ही सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि हादसे का सीधा संबंध किसी सैन्य कार्रवाई से है या नहीं, इसका पता जांच पूरी होने के बाद ही चल सकेगा। जांच एजेंसियां जुटीं अमेरिकी रक्षा विभाग ने दुर्घटना के कारणों का पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी है। हेलीकॉप्टर के फ्लाइट डेटा, तकनीकी रिकॉर्ड और घटनास्थल से जुटाए गए साक्ष्यों का विश्लेषण किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने तक दुर्घटना के कारणों को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। क्षेत्रीय हालात पर बनी हुई है नजर होर्मुज स्ट्रेट और आसपास के क्षेत्र में जारी रणनीतिक गतिविधियों के मद्देनजर अमेरिकी सैन्य बल स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। फिलहाल चालक दल के सुरक्षित होने से राहत जरूर मिली है, लेकिन दुर्घटना के वास्तविक कारणों का खुलासा जांच रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजराइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के बीच लेबनान में जारी सैन्य कार्रवाई को लेकर तीखी बातचीत हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने हिजबुल्लाह के खिलाफ इजराइल के बढ़ते हमलों पर नाराजगी जताते हुए नेतन्याहू से सीधे सवाल किए। माना जा रहा है कि इस मुद्दे ने वॉशिंगटन और तेल अवीव के बीच उभरते मतभेदों को भी सामने ला दिया है। लेबनान में बढ़े हमलों से बढ़ी क्षेत्रीय तनाव की आशंका रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजराइल ने हाल के दिनों में लेबनान की राजधानी बेरूत के दक्षिणी इलाकों में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हमले तेज कर दिए हैं। इसके साथ ही दक्षिणी लेबनान में जमीनी सैन्य अभियान भी आगे बढ़ाया गया है। इन घटनाओं के बाद पूरे क्षेत्र में बड़े संघर्ष की आशंका बढ़ गई है। अमेरिका को चिंता है कि क्षेत्र में बढ़ता तनाव ईरान के साथ चल रही कूटनीतिक वार्ताओं को प्रभावित कर सकता है। वहीं, ईरान ने भी चेतावनी दी है कि ऐसी सैन्य कार्रवाइयां शांति प्रयासों को कमजोर कर सकती हैं। रिपोर्ट में ट्रंप की कड़ी प्रतिक्रिया का दावा डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म Axios की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने फोन पर नेतन्याहू के फैसलों को लेकर तीखी नाराजगी जताई। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप का मानना है कि इजराइल की मौजूदा रणनीति उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग कर सकती है और अमेरिका की कूटनीतिक कोशिशों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि बातचीत के दौरान ट्रंप ने नेतन्याहू के रवैये पर बेहद कठोर टिप्पणी की और कहा कि उनके कदमों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। “आखिर आप कर क्या रहे हैं?”: रिपोर्ट एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि फोन वार्ता के दौरान ट्रंप ने नेतन्याहू से नाराजगी भरे लहजे में पूछा, “आखिर आप कर क्या रहे हैं?” रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति का मानना था कि लगातार सैन्य कार्रवाई क्षेत्रीय हालात को और जटिल बना सकती है। इन दावों पर व्हाइट हाउस या इजराइली प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। बेरूत में हमलों के बाद बढ़ी लोगों की चिंता सोमवार को नेतन्याहू और इजराइल के रक्षा मंत्री ने बेरूत के दहियेह इलाके में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर कार्रवाई का आदेश दिया। इजराइल का आरोप है कि हिजबुल्लाह युद्धविराम समझौते का उल्लंघन कर रहा है और उसके क्षेत्र पर हमले कर रहा है। हमलों की खबर के बाद बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में दहशत का माहौल बन गया। संभावित हवाई हमलों की आशंका के बीच कई लोगों ने सुरक्षित स्थानों की ओर रुख किया। ईरान ने दी नई चेतावनी Iran ने कहा है कि लेबनान में जारी इजराइली सैन्य अभियान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ताओं को प्रभावित कर सकता है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए लेबनान में युद्धविराम बनाए रखना आवश्यक है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि लेबनान मोर्चे पर तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर न केवल इजराइल-हिजबुल्लाह संघर्ष पर पड़ेगा, बल्कि अमेरिका-ईरान संबंधों और पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता पर भी दिखाई दे सकता है।
अमेरिका में आव्रजन नियमों के उल्लंघन के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत करीब 30 भारतीय नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है। अधिकारियों के अनुसार, ये लोग अवैध रूप से अमेरिका में रह रहे थे और कमर्शियल ट्रक ड्राइवर के रूप में काम कर रहे थे। कार्रवाई एरिजोना में चलाए गए विशेष अभियान ‘ऑपरेशन चेकमेट’ के दौरान की गई। अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि अभियान के दौरान कुल 52 अवैध प्रवासियों को हिरासत में लिया गया, जिनमें 36 लोग कमर्शियल ट्रक चलाते पाए गए। जांच में इनमें से लगभग 30 लोगों के भारतीय नागरिक होने की पुष्टि हुई है। अधिकारियों का कहना है कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें भारत भेजा जा सकता है। कई राज्यों के ड्राइविंग लाइसेंस मिले गिरफ्तार किए गए ट्रक ड्राइवरों में भारतीयों के अलावा मेक्सिको, अल सल्वाडोर और रूस के नागरिक भी शामिल हैं। जांच में पाया गया कि कुछ लोगों के पास कैलिफोर्निया, न्यूयॉर्क, वर्जीनिया और वॉशिंगटन जैसे राज्यों के कमर्शियल ड्राइवर लाइसेंस थे, जबकि कुछ बिना किसी वैध लाइसेंस के वाहन चला रहे थे। अधिकारियों के मुताबिक, अधिकांश लोगों के पास रोजगार प्राधिकरण दस्तावेज (Employment Authorization Documents) थे, जो पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में जारी किए गए थे, लेकिन अब वैध नहीं माने जा रहे हैं। क्या है ‘ऑपरेशन चेकमेट’? ‘ऑपरेशन चेकमेट’ अमेरिकी एजेंसियों का एक विशेष अभियान है, जिसका उद्देश्य अवैध रूप से रह रहे ऐसे लोगों की पहचान करना है जो कमर्शियल वाहनों का संचालन कर रहे हैं। अधिकारियों का मानना है कि बिना वैध दस्तावेजों के ट्रक या बस चलाने वाले लोग सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं। अमेरिकी सीमा गश्त के युमा सेक्टर के कार्यवाहक प्रमुख डस्टिन कॉडल ने कहा कि इस अभियान का मकसद सड़कों को सुरक्षित बनाना और आव्रजन कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना है। ट्रंप प्रशासन ने अपनाया सख्त रुख अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने हाल के महीनों में अवैध प्रवास और कमर्शियल वाहन संचालन को लेकर सख्ती बढ़ाई है। प्रशासन ने परिवहन विभाग को निर्देश दिया है कि अयोग्य विदेशी नागरिकों को ट्रक और बस चलाने के लिए कमर्शियल लाइसेंस जारी न किए जाएं। अधिकारियों का कहना है कि सड़क सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए ऐसे मामलों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। पिछले कुछ समय में भारतीय मूल के कुछ ट्रक ड्राइवरों से जुड़े सड़क हादसों और कानूनी मामलों ने भी इस मुद्दे को चर्चा में ला दिया था। कानूनी प्रक्रिया के बाद होगी आगे की कार्रवाई अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, गिरफ्तार किए गए सभी लोगों के दस्तावेजों और आव्रजन स्थिति की जांच की जा रही है। प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनके खिलाफ निर्वासन (डिपोर्टेशन) समेत आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अब मिस्र भी दोनों देशों के बीच संभावित समझौते की कोशिशों में सक्रिय हो गया है। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल-फतह अल-सीसी ने कहा है कि उनका देश अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक शांति समझौता कराने के लिए विभिन्न पक्षों के साथ लगातार संपर्क में है। मैक्रों से बातचीत में सामने आया मिस्र का रुख मिस्र के राष्ट्रपति ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ फोन पर क्षेत्रीय हालात पर चर्चा की। इस दौरान अल-सीसी ने कहा कि काहिरा अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने और एक व्यापक समझौते का रास्ता निकालने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर मिस्र का रुख अंतरराष्ट्रीय कानून, देशों की संप्रभुता और उनके संसाधनों के सम्मान के सिद्धांतों पर आधारित है। उनका मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बातचीत और कूटनीति ही सबसे प्रभावी रास्ता है। मध्य पूर्व में स्थिरता पर फ्रांस का जोर बातचीत के दौरान फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व को नए संघर्ष और अराजकता से बचाना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकता होनी चाहिए। मैक्रों ने विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से जहाजों की निर्बाध आवाजाही बेहद महत्वपूर्ण है। ट्रंप बोले- समझौते के करीब हैं दोनों देश इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान परमाणु समझौते के काफी करीब पहुंच चुके हैं। उन्होंने कहा कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और दोनों पक्षों के बीच कई मुद्दों पर सहमति बनी है। व्हाइट हाउस में दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि उनकी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल न कर सके। उन्होंने कहा कि यदि समझौता हो जाता है तो यह सभी पक्षों के लिए बेहतर होगा। परमाणु हथियार नहीं बनाने की बात पर सहमति ट्रंप के अनुसार, ईरान इस बात पर सहमत हुआ है कि वह न तो परमाणु हथियार विकसित करेगा और न ही किसी अन्य देश से हासिल करेगा। उन्होंने कहा कि बातचीत के दौरान इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई और शर्तों को और स्पष्ट किया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण गारंटी यही है कि ईरान के पास किसी भी परिस्थिति में परमाणु हथियार न हों। उन्होंने दावा किया कि इस दिशा में सकारात्मक प्रगति हुई है। सैन्य विकल्प अब भी खुला ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बातचीत किसी नतीजे तक नहीं पहुंचती है तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प अब भी खुला रहेगा। उन्होंने कहा कि वह कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन अमेरिका की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। ट्रंप ने बातचीत को जटिल और कठिन बताया, लेकिन साथ ही विश्वास जताया कि धीरे-धीरे दोनों पक्ष किसी समाधान की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान वार्ता और मध्य पूर्व की राजनीति पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी सेना ने दावा किया है कि उसने ईरान के गोरुक और केशम द्वीप पर स्थित ड्रोन कमांड और रडार ठिकानों पर हमला किया है। वाशिंगटन का कहना है कि यह कार्रवाई आत्मरक्षा में की गई, क्योंकि ईरान ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र के ऊपर उड़ रहे एक अमेरिकी ड्रोन को मार गिराया था। अमेरिकी ड्रोन गिराए जाने के बाद की कार्रवाई अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, ईरान ने एक अमेरिकी MQ-1 ड्रोन को निशाना बनाया था। इसके जवाब में अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने ईरानी हवाई सुरक्षा प्रणालियों, एक ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और दो हमलावर ड्रोन को नष्ट कर दिया। अमेरिकी सेना ने कहा कि कार्रवाई के दौरान उसके किसी भी सैनिक या सैन्य उपकरण को नुकसान नहीं पहुंचा। वाशिंगटन ने इसे क्षेत्र में अपनी सुरक्षा और सैन्य हितों की रक्षा के लिए उठाया गया कदम बताया है। ईरान ने भी किया जवाबी हमला अमेरिकी हमले के बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई का दावा किया है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा कि उसकी एयरोस्पेस फोर्स ने उस एयरबेस को निशाना बनाया, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर सिरिक द्वीप पर एक दूरसंचार टावर पर अमेरिकी हमले के लिए किया गया था। ईरान ने यह नहीं बताया कि संबंधित एयरबेस कहां स्थित है और हमले में कितना नुकसान हुआ। पिछले सप्ताह भी हुई थी सैन्य कार्रवाई दोनों देशों के बीच यह टकराव नया नहीं है। पिछले सप्ताह भी अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास संचालित एक ईरानी ड्रोन अभियान को निशाना बनाया था। इसके बाद ईरान ने भी अमेरिकी हितों से जुड़े एक ठिकाने पर हमला करने का दावा किया था। लगातार हो रही सैन्य कार्रवाइयों ने क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष टकराव का खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है। समझौते की बात, लेकिन जारी है तनाव दिलचस्प बात यह है कि एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ संभावित समझौते की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई का सिलसिला जारी है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में होने वाला कोई समझौता अमेरिका की सुरक्षा संबंधी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता है, तो सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू की जा सकती है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना हर परिस्थिति के लिए तैयार है। ट्रंप ने समझौते के मसौदे में मांगे बदलाव मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ प्रस्तावित समझौते के मसौदे को संशोधन के लिए वापस भेज दिया है। बताया जा रहा है कि उन्होंने कई अहम बदलाव सुझाए हैं और समझौते को अंतिम रूप देने में जल्दबाजी नहीं दिखा रहे हैं। ऐसे में कूटनीतिक बातचीत और सैन्य तनाव साथ-साथ चलते दिखाई दे रहे हैं, जिससे पश्चिम एशिया की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।
पूर्वोत्तर म्यांमार में खनन कार्यों में इस्तेमाल होने वाले विस्फोटकों के एक गोदाम में हुए भीषण धमाके में 45 से अधिक लोगों की मौत हो गई, जबकि 70 से ज्यादा लोग घायल हो गए। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि आसपास के इलाके में भारी तबाही मच गई और 100 से अधिक घर क्षतिग्रस्त हो गए। खनन विस्फोटकों से भरी इमारत में हुआ धमाका स्थानीय मीडिया और बचावकर्मियों के अनुसार यह हादसा रविवार को नामखाम कस्बे के कौंगटुप गांव में हुआ। जिस इमारत में विस्फोट हुआ, वहां खनन गतिविधियों में उपयोग होने वाली विस्फोटक सामग्री रखी गई थी। धमाके के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई और बड़ी संख्या में लोग इसकी चपेट में आ गए। छह बच्चों समेत 46 शव बरामद बचाव अभियान में जुटे कर्मियों ने बताया कि रविवार शाम तक छह बच्चों सहित 46 शव बरामद किए जा चुके थे। सभी शवों को अंतिम संस्कार के लिए भेज दिया गया है। राहतकर्मियों के मुताबिक मृतकों की संख्या बढ़ सकती है, क्योंकि कई लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। 74 घायलों का अस्पताल में इलाज जारी धमाके में घायल हुए 74 लोगों को नामखाम के अस्पताल में भर्ती कराया गया है। कई घायलों की हालत गंभीर बनी हुई है, जिसके कारण मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय प्रशासन और राहत एजेंसियां घायलों के इलाज और राहत कार्य में जुटी हुई हैं। 100 से अधिक घरों को पहुंचा नुकसान विस्फोट की तीव्रता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आसपास स्थित 100 से अधिक घर क्षतिग्रस्त हो गए। कई मकान पूरी तरह तबाह हो गए, जिससे दर्जनों परिवार बेघर हो गए हैं। राहत एजेंसियां प्रभावित परिवारों के लिए अस्थायी आश्रय और जरूरी सहायता उपलब्ध कराने में जुटी हैं। विद्रोही संगठन के नियंत्रण वाले इलाके में हुआ हादसा कौंगटुप गांव चीन सीमा से लगभग 20 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यह क्षेत्र Ta'ang National Liberation Army (टीएनएलए) के नियंत्रण में है। टीएनएलए म्यांमार की सैन्य समर्थित सरकार के खिलाफ संघर्ष कर रहा एक प्रमुख जातीय सशस्त्र संगठन है। इस कारण घटना की स्वतंत्र जांच और आधिकारिक जानकारी जुटाना भी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। जांच जारी फिलहाल विस्फोट के सटीक कारणों का पता नहीं चल पाया है। स्थानीय अधिकारियों और राहत एजेंसियों ने जांच शुरू कर दी है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, गोदाम में बड़ी मात्रा में विस्फोटक सामग्री रखी गई थी, जिसके कारण धमाका इतना विनाशकारी साबित हुआ।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।