Jharkhand treasury scam

Jharkhand Treasury Scam
Jharkhand Treasury Scam: बाबूलाल मरांडी ने CBI जांच की मांग की

रांची।  झारखंड में सरकारी खजाने (ट्रेजरी) से करोड़ों रुपये की अवैध निकासी के मामले ने राज्य की सियासत में भूचाल ला दिया है। विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने इस प्रकरण की तुलना बहुचर्चित 'चारा घोटाले' से करते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखा है। उन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच सीबीआई (CBI) या किसी न्यायिक एजेंसी से कराने की पुरजोर मांग की है। राज्य के पुलिस विभाग सहित अन्य महत्वपूर्ण विभागों में हुई इस वित्तीय हेराफेरी के कारण प्रदेश का वित्तीय प्रबंधन पूरी तरह चरमरा गया है।   चारा घोटाले की तर्ज पर सरकारी खजाने में सेंध नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' के जरिए सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल पुलिस विभाग ही नहीं, बल्कि ऊर्जा, पेयजल और पर्यटन जैसे विभागों के खजानों से भी अवैध रूप से करोड़ों रुपये निकाले गए हैं। मरांडी का आरोप है कि सरकारी संरक्षण के बिना इतनी बड़ी राशि की हेराफेरी संभव नहीं है। उन्होंने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में आग्रह किया है कि दोषियों को सजा दिलाने और सच्चाई सामने लाने के लिए निष्पक्ष जांच जरूरी है, जो केवल केंद्रीय एजेंसियों के माध्यम से ही संभव है।   सीआईडी जांच का विरोध और सीबीआई-ईडी की मांग भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राज्य सरकार द्वारा कराई जा रही सीआईडी (CID) जांच पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ट्रेजरी में निकासी के जिम्मेदार अधिकारी (DDO) अक्सर एएसपी या डीएसपी स्तर के होते हैं, और सीआईडी में जांच करने वाले अधिकारी भी इसी रैंक के होते हैं। ऐसे में पुलिसकर्मी ही अपने विभाग के दूसरे पुलिसकर्मियों की निष्पक्ष जांच कैसे करेंगे? भाजपा ने मांग की है कि इस घोटाले के तार कई राज्यों से जुड़े होने के कारण इसमें प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सीबीआई को शामिल किया जाना चाहिए। सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि घोटाले का पैसा अन्य राज्यों के बैंक खातों में स्थानांतरित किया गया है, जिसकी गहराई से जांच आवश्यक है।   वेतन संकट: 2.80 लाख से अधिक परिवारों की टूटी कमर ट्रेजरी घोटाले का सबसे भयावह असर राज्य के सरकारी कर्मचारियों पर पड़ा है। प्रदेश के इतिहास में संभवतः यह पहली बार हुआ है कि महीने की 11 तारीख बीत जाने के बाद भी कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला है। आंकड़ों के अनुसार, राज्य के पेरोल पर मौजूद 2,35,930 नियमित अधिकारी व कर्मचारी और लगभग 45,000 संविदाकर्मी वर्तमान में भारी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं। प्रतुल शाहदेव ने वित्तीय प्रबंधन की विफलता पर चिंता जताते हुए कहा कि कर्मचारियों के घरों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। वेतन न मिलने से लोगों की बैंकों की ईएमआई (EMI) बाउंस हो रही है और दैनिक खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। सरकार की स्थिति यह है कि कर्ज लेने के बावजूद वह अपने कर्मचारियों को समय पर भुगतान करने में असमर्थ सिद्ध हो रही है।   मास्टरमाइंड की ऐयाशी और प्रशासनिक ढिलाई इस पूरे घोटाले में 'शंभू' नामक मास्टरमाइंड की भूमिका चर्चा का केंद्र बनी हुई है। खबरों के अनुसार, घोटाले की राशि का उपयोग विलासिता के लिए किया गया और आरोपी हेलीकॉप्टर से दीघा (पश्चिम बंगाल) जाकर पार्टी कर रहा था। भाजपा ने आरोप लगाया है कि जब सरकारी खजाने की लूट हो रही थी, तब प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। विपक्षी दलों का मानना है कि यदि इस मामले में तुरंत कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो यह देश के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक बनकर उभरेगा। फिलहाल, राज्य में इस मुद्दे पर जनआक्रोश और राजनीतिक तनाव चरम पर है।

Anjali Kumari अप्रैल 11, 2026 0
Jharkhand treasury scam
झारखंड में बड़ा ट्रेजरी घोटाला: पुलिसकर्मियों के 12 साल के वेतन भुगतान की होगी जांच, सरकार ने दिए सख्त आदेश

रांची। झारखंड के पुलिस महकमे में वेतन निकासी के नाम पर करोड़ों रुपये के संभावित फर्जीवाड़े को लेकर राज्य सरकार ने अब तक का सबसे बड़ा अभियान छेड़ने का निर्णय लिया है। बोकारो और हजारीबाग जैसे जिलों के ट्रेजरी (कोषागार) से अवैध तरीके से पैसे निकालने के मामले उजागर होने के बाद, प्रशासन ने अब पूरे प्रदेश में पुलिसकर्मियों के वेतन भुगतान की फाइलों को खंगालने का निर्देश दिया है। इस व्यापक जांच के दायरे में पिछले 12 वर्षों का रिकॉर्ड शामिल किया गया है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सिस्टम में कहां और किस स्तर पर सेंधमारी की गई है।   राज्यव्यापी ऑडिट और 12 वर्षों के रिकॉर्ड का मिलान वित्त विभाग और पुलिस मुख्यालय के समन्वय से शुरू होने वाली इस जांच का मुख्य केंद्र बिंदु यह पता लगाना है कि कहीं कागजी पुलिसकर्मियों के नाम पर वेतन की निकासी तो नहीं की जा रही थी। अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे सभी जिलों और विभिन्न पुलिस इकाइयों में तैनात रहे कर्मियों के वेतन डेटा का मिलान करें। जांच दल वर्ष 2014 से लेकर अब तक के सभी वित्तीय लेन-देन, आवंटित बजट और वास्तविक भुगतान की कड़ियों को जोड़ेगा।   प्रारंभिक रिपोर्टों में कुछ विशेष क्षेत्रों में गंभीर विसंगतियां पाई गई हैं, जिसके बाद यह तय किया गया कि केवल वर्तमान भुगतान प्रक्रिया की जांच पर्याप्त नहीं होगी। अधिकारियों के अनुसार, पिछले एक दशक से अधिक समय के दस्तावेजों को खंगालने से इस सिंडिकेट की कार्यप्रणाली और इसमें शामिल रसूखदारों का चेहरा सामने आ सकेगा।   डीडीओ की भूमिका और बैंक खातों का होगा सूक्ष्म सत्यापन इस पूरे घोटाले की पड़ताल के लिए आहरण एवं वितरण अधिकारियों (DDO) की भूमिका की विशेष रूप से समीक्षा की जाएगी। विभाग का मानना है कि बिना उच्चाधिकारियों या संबंधित बाबू की मिलीभगत के ट्रेजरी से अवैध निकासी संभव नहीं है। जांच के दौरान वेतन बिलों की स्वीकृति प्रक्रिया, पासिंग सिस्टम और सबसे महत्वपूर्ण बात—उन बैंक खातों की जांच होगी जिनमें पैसा ट्रांसफर किया गया है। जांच के दौरान उन कर्मियों के सेवा अभिलेखों (Service Records) का भी भौतिक सत्यापन किया जाएगा जिनके नाम पर भारी-भरकम राशि का भुगतान हुआ है। यह देखा जाएगा कि क्या संबंधित कर्मी उस अवधि में वाकई उस जिले या यूनिट में तैनात थे या केवल फाइलों में उनका नाम चल रहा था। यदि किसी भी स्तर पर दस्तावेजों में विसंगति या संदिग्ध लेन-देन पाया जाता है, तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब-तलब कर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जाएगी।   पारदर्शिता बहाल करने और सिंडिकेट को ध्वस्त करने की तैयारी सरकार के इस कदम का प्राथमिक उद्देश्य सरकारी खजाने की लूट को रोकना और भविष्य के लिए भुगतान प्रणाली को पूरी तरह सुरक्षित बनाना है। वित्त मंत्रालय को संदेह है कि इस फर्जीवाड़े के पीछे एक संगठित सिंडिकेट काम कर रहा है, जो तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर वर्षों से सक्रिय है। बोकारो में वित्त विभाग की टीम पहले ही डेरा डाल चुकी है और वहां मिले सुरागों के आधार पर ही राज्यव्यापी जांच का खाका तैयार किया गया है।   विभागीय अधिकारियों ने सभी जिलों से एक निश्चित समय सीमा के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट मांगी है। इस रिपोर्ट के आधार पर न केवल दोषियों पर एफआईआर दर्ज की जाएगी, बल्कि राज्य की ट्रेजरी प्रणाली में बड़े सुधारात्मक बदलाव भी किए जाएंगे। सरकार का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि जनता की गाढ़ी कमाई का एक-एक पैसा सही हकदार तक पहुंचे और भ्रष्टाचार की हर गुंजाइश को जड़ से खत्म किया जा सके।

Anjali Kumari अप्रैल 11, 2026 0
Fraud case Bokaro accountant
बोकारोः दरोगा के वेतन के नाम पर अकाउंटेंट ने ट्रेज़री से निकाले 4.29 करोड़, गिरफ्तार

बोकारो। बोकारो में ट्रेजरी से एक रिटायर्ड पुलिसकर्मी के नाम पर करोड़ों रुपये के गबन का मामला सामने आया है। मामले में उस अकाउंटेंट को गिरफ्तार कर लिया गया है, जिसने पैसे की निकासी की। उसकी पत्नी को भी इस मामले में शामिल बताया जा रहा है।  4 करोड़ 29 लाख 71 हजार की अवैध निकासी बोकारो एसपी के अनुसार, एक हवलदार के नाम पर बीते करीब 25 महीनों में कुल 4 करोड़ 29 लाख 71 हजार की अवैध निकासी की गई है। इस मामले में पुलिस ने आरोपी अकाउंटेंट कौशल कुमार पाण्डे को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। चौंकाने वाले खुलासे जांच के दौरान चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। बताया गया कि ट्रेजरी पोर्टल में जन्म तिथि और बैंक खाता संख्या में बदलाव कर इस फर्जीवाड़े को अंजाम दिया गया। पूछताछ में आरोपी ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि निकाली गई पूरी राशि उसने अपनी पत्नी अनु पाण्डेय के खाते में ट्रांसफर कर दी थी।   सुनियोजित तरीके से गबनः    एसपी ने बताया कि वेतन मद के नाम पर बार-बार रकम निकाली जाती रही, जिससे यह साफ होता है कि यह सुनियोजित तरीके से किया गया घोटाला है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मामले में शामिल सभी दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इस पूरे फर्जीवाड़े में ट्रेजरी और पुलिस विभाग के अन्य कर्मियों की भूमिका क्या रही। विभागीय समन्वय में कहीं लापरवाही या मिलीभगत तो नहीं हुई, इसकी भी गहन पड़ताल जारी है।

Anjali Kumari अप्रैल 8, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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