रांची। झारखंड में कथित हजारों करोड़ रुपये के ट्रेजरी घोटाले को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। प्रदेश भाजपा ने राज्य सरकार, वित्त मंत्री और सीआईडी की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। भाजपा प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने कहा कि सरकार अपने करीबी अधिकारियों को बचाने का प्रयास कर रही है और जांच को सही दिशा में नहीं ले जाया जा रहा है। वित्त मंत्री के बयान का हवाला देते हुए भाजपा ने साधा निशाना प्रतुल शाहदेव ने कहा कि खुद वित्त मंत्री यह स्वीकार कर चुके हैं कि पिछले कुछ वर्षों में करीब 10 हजार करोड़ रुपये के सरकारी धन का हिसाब नहीं मिल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा शुरुआत से ही इस मामले में बड़े अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग करती रही है, लेकिन सरकार केवल छोटे स्तर के लोगों पर कार्रवाई कर रही है। SIT की निष्पक्षता पर भी उठाए सवाल भाजपा नेता ने ट्रेजरी घोटाले की जांच के लिए गठित एसआईटी पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच टीम में ऐसे अधिकारियों को शामिल किया गया है, जिनके कार्यकाल में संबंधित जिलों में घोटाले सामने आए थे। उन्होंने कहा कि ऐसे में निष्पक्ष जांच की उम्मीद करना मुश्किल है। CID जांच को बताया ‘लीपापोती का जरिया’ प्रतुल शाहदेव ने आरोप लगाया कि झारखंड में बड़े मामलों को दबाने के लिए अक्सर सीआईडी जांच का सहारा लिया जाता है। उन्होंने कहा कि ट्रेजरी घोटाले में डीडीओ और ट्रेजरी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए थी, क्योंकि सरकारी धन की निकासी में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराने का लगाया आरोप भाजपा ने दावा किया कि राज्य सरकार ने स्पेशल ऑडिट के लिए मांगे गए जरूरी दस्तावेज अब तक उपलब्ध नहीं कराए हैं। प्रतुल शाहदेव के अनुसार, प्रिंसिपल अकाउंटेंट जनरल कार्यालय ने गृह विभाग से कई दस्तावेज मांगे थे, लेकिन दो महीने से ज्यादा समय बीतने के बाद भी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। सरकार ने आरोपों को खारिज नहीं किया, जांच पर टिकी नजर भाजपा ने पूरे मामले में सीबीआई या निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराने की मांग दोहराई है। पार्टी का कहना है कि दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए और सरकारी धन के दुरुपयोग की पूरी सच्चाई सामने आनी चाहिए। वहीं, मामले में आगे की जांच और कार्रवाई पर सभी की नजर बनी हुई है।
झारखंड में ट्रेजरी घोटाला रूकने का नाम ही नहीं ले रहा। हर दिन एक नये कोषागार में गड़बड़ी के खुलासे हो रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक घोटाले की आंच राज्य के 15 जिलों तक पहुंच गई और गड़बड़ी की राशि का आंकड़ा 150 करोड़ पार कर चुका है। मतलब बड़ा घोटाला है ये, पिछले एक दशक से चल रहा था और राज्य को दीमक की तरह चाट रहा था। झारखंड ट्रेजरी घोटाला-2026 एक बड़े वित्तीय संकट और प्रशासनिक विफलता के रूप में उभरा है। यह घोटाला मुख्य रूप से पुलिस विभाग और कोषागार (Treasury) के बीच डेटा हेरफेर और फर्जी वेतन निकासी से जुड़ा है। कैसे होता रहा घोटाला यह घोटाला कोई एकमुश्त डकैती नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर बैठे लोगों द्वारा किया गया एक डिजिटल फ्रॉड है। जांच में ये खुलासे हुएः डेटा हेरफेर: पुलिस विभाग के अकाउंटेंट और कंप्यूटर ऑपरेटरों ने विभागीय कंप्यूटर डेटा में हेरफेर किया। फर्जी वेतन निकासी: मृत पुलिसकर्मियों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों या काल्पनिक नामों के आधार पर फर्जी बैंक खाते जोड़े गए और सालों तक उनमें वेतन और भत्ते (TA/DA) भेजे गए। OTP का खेल: आहरण एवं संवितरण अधिकारियों (DDO) के मोबाइल पर आने वाले OTP का दुरुपयोग कर डिजिटल हस्ताक्षर के जरिए अवैध भुगतान को मंजूरी दी गई। पारिवारिक खातों का उपयोग: मुख्य आरोपियों ने सरकारी पैसा सीधे अपनी पत्नियों या रिश्तेदारों के खातों में ट्रांसफर किया। घोटाले की व्यापकता और प्रभावित जिले शुरुआत में यह मामला बोकारो से शुरू हुआ था, लेकिन अब इसकी आंच राज्य के 15 जिलों तक फैल चुकी है: हजारीबाग: यहां सबसे बड़ी अवैध निकासी करीब ₹15-28 करोड़ की बात सामने आई है। बोकारो: करीब ₹6 करोड़ से ज्यादा का गबन पकड़ा गया है। चाईबासा (पश्चिम सिंहभूम): यहां के पुलिस कोषागार से लगभग ₹26 लाख की अवैध निकासी की पुष्टि हुई है। अन्य जिले: रांची, पलामू, जमशेदपुर, देवघर और रामगढ़ भी जांच के दायरे में हैं। अनुमान है कि यह आंकड़ा ₹150 करोड़ से लेकर ₹500 करोड़ तक जा सकता है। जांच की वर्तमान स्थिति (Status of Investigation)... सरकार ने इस मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए कई स्तरों पर जांच शुरू की है: CID और SIT पूरे मामले की जांच सीआईडी (CID) की विशेष जांच टीम (SIT) कर रही है। हजारीबाग, बोकारो और चाईबासा में कई एफआईआर (FIR) दर्ज की जा चुकी हैं। प्रमुख गिरफ्तारियां अब तक कई छोटे-बड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें बोकारो के अकाउंटेंट कौशल कुमार पांडे, चाईबासा के सिपाही अकाउंटेंट देवनारायण मुर्मू और उनके सहयोगी शामिल हैं। 21 से अधिक बैंक खाते फ्रीज सीआईडी ने 21 से अधिक संदिग्ध बैंक खातों को फ्रीज कर दिया है और आरोपियों की संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया शुरू की है। हाई-लेवल कमेटी कर रही जांच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देश पर आईएएस अधिकारियों और एजी (AG) ऑफिस के विशेषज्ञों की एक संयुक्त कमेटी बनाई गई है, जो सभी 24 जिलों की 33 ट्रेजरी का ऑडिट कर रही है। घोटाले का असर वेतन पर रोक: जांच के कारण राज्य के लगभग 70,000 से 80,000 पुलिसकर्मियों का वेतन मार्च 2026 से रुक गया था, क्योंकि डेटा वेरिफिकेशन की प्रक्रिया चल रही है। इसके अलावा अन्य विभागों का वेतन भुगतान भी लंबित है। विपक्ष का हमला बीजेपी ने इसे "सफेदपोशों" का संरक्षण प्राप्त घोटाला बताते हुए CBI जांच की मांग की है। बाबूलाल मरांडी और अन्य नेताओं ने सरकार पर प्रशासनिक ढिलाई के आरोप लगाए हैं। प्रशासनिक बदलाव सरकार ने आदेश दिया है कि 3 साल से अधिक समय से एक ही ट्रेजरी या विभाग में जमे कर्मचारियों का तुरंत तबादला किया जाए। जांच की आंच कहां तक पहुंची? वर्तमान में जांच केवल निचले स्तर के क्लर्कों या अकाउंटेंट तक ही सीमित नहीं है। सीआईडी इस बात की जांच कर रही है कि क्या इतने बड़े पैमाने पर निकासी बिना उच्च अधिकारियों (DDO और ट्रेजरी ऑफिसर्स) की मिलीभगत के संभव थी? यह भी खुलासा हुआ है कि राज्य के पांच जिलों के एसपी के खाते में पैसे ट्रांसफर हुए हैं। जांच अब उस 'सिंडिकेट' को खोजने की ओर बढ़ रही है, जो राज्य भर के कोषागारों में एक ही पैटर्न पर फ्रॉड कर रहा था। यदि बड़े अधिकारियों की संलिप्तता के प्रमाण मिलते हैं, तो आने वाले दिनों में कुछ कड़े प्रशासनिक निलंबन देखने को मिल सकते हैं।
रांची। झारखंड ट्रेजरी घोटाले की आंच 14 जिलों तक पहुंच गई है। इसके दायरे में अब कई एसपी और डीएसपी भी आने लगे हैं। बड़ा मामला यह है कि कई जिलों के एसपी ने नियम-कायदों को ताक पर रखकर अपने पदनाम से बैंक में खाते खोल रखे थे। जो पैसे सरकारी खजाने में रहने चाहिए थे, वो पैसे सीधे इन खातों में आते थे। फिर एसपी चेक के माध्यम से भुगतान करते थे, जबकि ट्रेजरी कोड में साफ कहा गया है कि जिसके लिए बिल ट्रेजरी भेजा जाएगा, भुगतान उसी के खाते में होगा। 5 जिले में मिले हैं सबूत जांच टीम को बोकारो, सरायकेला, रामगढ़, पलामू और जमशेदपुर में इसके सबूत मिले हैं। जमशेदपुर में वित्त वर्ष 2016-17 में एसपी के खाते में करीब 38 लाख रुपए आए थे, जो सिपाहियों को चेक से भुगतान किया गया था। फिलहाल 14 जिलों में ऐसी गड़बड़ी की आशंका है। एजी ऑफिस और वित्त विभाग के अधिकारी इसकी जांच में जुट गए हैं। जांच की जद में कई और एसपी व डीएसपी (डीडीओ) भी हैं। जांच में पता चला है कि सप्लायर से लेकर अन्य लोगों को किए गए भुगतान में भी कई गड़बड़ियां सामने आई हैं। वर्ष 2016-17 से ऐसे भुगतान लगातार हो रहे हैं। वित्त विभाग अब पीएमयू के डेटा बेस से इन एसपी ऑफिस से हुए भुगतान की विस्तृत जांच कर रहा है। बोकारो में डेटा हटाए गए, रिकॉर्ड भी गायब इधर, ट्रेजरी घोटाला उजागर होने के बाद पुलिस विभाग के अंदरूनी सिस्टम पर भी सवाल उठने लगे हैं। जांच में पता चला है कि वेतन निकासी से जुड़े रिकॉर्ड और खाते के डेटा से छेडछाड़ की गई है। इसमें एसपी ऑफिस से जुड़े सिस्टम भी जांच के दायरे में हैं। बोकारो में तो डेटा ही डिलीट कर दिया गया है, जबकि कुछ मामलों में रिकॉर्ड मिसिंग या बदला हुआ पाया गया है। जांच में यह भी पता लगाया जा रहा है कि किन-किन खातों के डेटा को जान-बूझकर हटाया या छिपाया गया है। जांच एजेंसियों का मानना है कि डेटा में छेड़छाड़ और रिकॉर्ड गायब होना इस घोटाले की सबसे अहम कड़ी है। किसी एसपी ऑफिस का यह घोटाला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संगठित नेटवर्क के जरिए किया गया है। हालांकि फिलहाल किसी एसपी पर सीधे आरोप तय नहीं हुए हैं, लेकिन गड़बड़ी को देखते हुए जांच का दायर वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंच सकता है। क्योंकि, अब इसकी भी जांच होगी कि डीआई बजट कार्यालय से लेकर डीडीओ ऑफिस में ट्रेजरी कोड का कितना उल्लंघन होता था। इनकी संपत्ति का पता लगा रही एसआईटी एसआईटी हजारीबाग से गिरफ्तार आरक्षी रजनीश कुमार सिंह, रजनीश की पत्नी खुशबू सिंह, आरक्षी धीरेंद्र सिंह, बोकारो से गिरफ्तार कौशल कुमार पांडेय और सतीश कुमार की संपत्ति की जानकारी जुटा रही है। अब तक की जांच में पता चला है कि आरक्षी रजनीश कुमार सिंह के नाम पर हजारीबाग के मसीपिढ़ी इलाके में दो मंजिला मकान है। वहीं आरक्षी धीरेंद्र सिंह का बिहार के बोधगया में एक बड़ा अपार्टमेंट है। हजारीबाग में एसआईटी ने की जांच हजारीबाग और बोकारो ट्रेजरी से हुई अवैध निकासी मामले में सीआईडी की विशेष जांच टीम (एसआईटी) हजारीबाग के लौहसिंघना थाना पहुंची। टीम ने एफआईआर के साथ जमा किए गए दस्तावेज और आरोपियों से जब्त सामग्री को अपने कब्जे में लिया। एसआईटी अब यह पता लगा रही है कि आरोपियों ने फर्जीवाड़ा कर निकाली गई राशि कहां निवेश किया, ताकि उन संपत्तियों की पहचान कर उन्हें जब्त करने की कार्रवाई कर सके। साथ ही सरकारी धन की वसूली हो सके। एसआईटी को पता चला है कि हजारीबाग से गिरफ्तार सिपाही शंभू कुमार ने इन पैसों का सबसे अधिक निवेश किया है। शंभू कुमार का बिहार के गयाजी जिले के पॉश इलाके एपी कॉलोनी में दो आलीशान मकान बनवाया है। पत्नी काजल कुमारी के नाम पर 18 कट्ठा जमीन खरीदी है। शंभू कुमार के नाम 9 व्यावसायिक और कृषि भूमि है। इनमें से बोधगया क्षेत्र में 7.84 डिसमिल जमीन भी शामिल है, जो शंभू की पत्नी काजल कुमारी और एक अन्य सहयोगी सोनी देवी के नाम पर है। एसआईटी जल्द ही इस मामले में हजारीबाग से गिरफ्तार शंभू कुमार और बोकारो से गिरफ्तार कौशल कुमार पांडेय से पूछताछ करेगी।
रांची। झारखंड में वेतन निकासी से जुड़े एक बड़े ट्रेजरी घोटाले का खुलासा महालेखाकार (AG) की ऑडिट रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के 33 में से 14 कोषागारों में तैनात कर्मचारियों ने सिस्टम की तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर एक ही महीने में दो-दो बार वेतन और एरियर की निकासी कर ली। इस गड़बड़ी में डीएसपी से लेकर सिपाही और अन्य सरकारी कर्मचारी तक शामिल पाए गए हैं। ऑडिट रिपोर्ट में क्या आया सामने? ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया है कि कुल 614 कर्मचारियों ने इस फर्जीवाड़े को अंजाम दिया, जिससे सरकारी खजाने को 31.47 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इनमें से करीब 7.67 करोड़ रुपये केवल दोहरे वेतन भुगतान के कारण निकाले गए। यह मामला वित्तीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। घोटाले की सबसे चौंकाने वाली बात क्या है? घोटाले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि डीएसपी से लेकर सिपाही स्तर के कर्मचारियों ने सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर करोड़ो रुपये की अवैध निकासी की। डीएसपी स्तर के अधिकारियों नौशाद आलम, राजेश यादव, मणिभूषण प्रसाद और मुकेश कुमार महतो पर आरोप है कि उन्होंने अपनी पदस्थापनाओं के दौरान नियमों की अनदेखी करते हुए दोहरा वेतन और एरियर प्राप्त किया। इसके अलावा बड़ी संख्या में सिपाही, सहायक शिक्षक और चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी भी इस सूची में शामिल हैं। 14 कोषागार महालेखाकार द्वारा चिन्हित 14 कोषागार रांची, हजारीबाग, बोकारो, देवघर, पलामू, गोड्डा, जमशेदपुर, गुमला, खूंटी और रामगढ़ सहित अन्य जिलों में स्थित हैं। इन सभी स्थानों पर वेतन भुगतान प्रणाली में गंभीर खामियां उजागर हुई हैं। जांच में कई सिपाहियों और कर्मचारियों के नाम भी सामने आए हैं, जिन्होंने तकनीकी लूपहोल का लाभ उठाकर अवैध भुगतान प्राप्त किया। महालेखाकार ने इस पूरे मामले को गंभीर वित्तीय अनियमितता मानते हुए राज्य सरकार को दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और अवैध रूप से निकाली गई राशि की वसूली सुनिश्चित करने की सिफारिश की है। यह घोटाला सरकारी वित्तीय प्रणालियों में कई खामियां पर सवाल खड़ा करता है। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तकनीकी सुधार, पारदर्शिता और कड़ी निगरानी व्यवस्था लागू करना बेहद जरूरी है।
रांची। झारखंड में सामने आए ट्रेजरी घोटाले को लेकर अब जांच और तेज हो गई है। राज्य सरकार की मंजूरी के बाद Jharkhand CID ने इस मामले को अपने हाथ में ले लिया है। घोटाले की गंभीरता को देखते हुए 9 सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया है, जिसकी अध्यक्षता आईजी पंकज कंबोज कर रहे हैं। टीम ने मामले की गहन जांच शुरू कर दी है। बड़ी वित्तीय गड़बड़ी की आशंका प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि ट्रेजरी से वेतन और अन्य मदों के नाम पर बड़े पैमाने पर अवैध निकासी की गई है। इस घोटाले के पीछे संगठित नेटवर्क होने की आशंका जताई जा रही है। जांच का फोकस इस पूरे नेटवर्क का खुलासा करने और इसमें शामिल सभी लोगों की पहचान करने पर है। बोकारो और हजारीबाग से खुला मामला घोटाले की परतें तब खुलनी शुरू हुईं जब बोकारो और हजारीबाग जिलों में ट्रेजरी से संदिग्ध निकासी के मामले सामने आए। जांच में पाया गया कि फर्जी तरीके से वेतन के नाम पर राशि निकाली गई थी। इस खुलासे के बाद वित्त विभाग और ट्रेजरी कार्यालयों में हड़कंप मच गया। विभागीय कार्रवाई भी जारी मामले के सामने आते ही कई अधिकारियों और कर्मचारियों को चिन्हित किया गया। कुछ को निलंबित किया गया है, जबकि कई के खिलाफ विभागीय जांच शुरू हो चुकी है। कुछ आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भी भेजा गया है। साथ ही, सिस्टम में पारदर्शिता लाने के लिए निगरानी बढ़ाई गई है। हाई लेवल कमिटी भी कर रही जांच सीआईडी जांच के समानांतर, वित्त विभाग ने भी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है, जो मामले के प्रशासनिक पहलुओं की जांच कर रही है। पूरे नेटवर्क का होगा खुलासा अब सीआईडी की एसआईटी यह पता लगाने में जुटी है कि घोटाले में किस स्तर तक मिलीभगत रही, पैसे की निकासी कैसे हुई और इसमें कौन-कौन लोग शामिल थे। आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना है।
हजारीबाग। जिले में शिक्षकों ने दो महीने से वेतन नहीं मिलने के विरोध में काला बिल्ला लगाकर प्रदर्शन किया। ट्रेजरी घोटाले के बाद मार्च से सैलरी बंद होने के कारण शिक्षक आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। गुरुवार को बड़ी संख्या में शिक्षक अपने-अपने स्कूल पहुंचे और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराया। समय पर वेतन की मांग तेज शिक्षक संगठनों का कहना है कि मार्च और अप्रैल जैसे महीनों में खर्च अधिक होता है, ऐसे में वेतन नहीं मिलने से उन्हें गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। शिक्षकों ने प्रशासन से जल्द वेतन भुगतान की मांग की है। उनका कहना है कि ट्रेजरी घोटाले से उनका कोई लेना-देना नहीं है, फिर भी उन्हें इसकी सजा भुगतनी पड़ रही है। सहायक आचार्यों की स्थिति और खराब शिक्षकों के अनुसार, सहायक आचार्यों की नियुक्ति हुए करीब 9 महीने हो चुके हैं, लेकिन अब तक उनका वेतन शुरू नहीं हुआ है। इससे नए नियुक्त शिक्षक भी आर्थिक रूप से परेशान हैं। संगठनों ने इसे प्रशासन की लापरवाही बताया है। आंदोलन तेज करने की चेतावनी शिक्षक नेताओं ने कहा कि यदि जल्द वेतन जारी नहीं किया गया, तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा। फिलहाल विरोध के पहले चरण में काला बिल्ला लगाकर प्रदर्शन किया गया है। प्रशासन को दी गई जानकारी इस पूरे मामले की जानकारी जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के अधिकारियों को दे दी गई है। शिक्षकों को उम्मीद है कि जल्द समाधान निकलेगा, अन्यथा आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शन और तेज हो सकता है।
रांची। झारखंड के ट्रेजरी घोटाले में सनसनीखेज खुलासा हुआ है। जांच में पता चला है 7 जिलों में वेतन के नाम पर 150 करोड़ रुपए से ज्यादा की अवैध निकासी की गई है। इस घोटाले को अंजाम देने वाले कोई बाहरी नहीं, बल्कि वही अधिकारी और कर्मचारी हैं, जिन पर पैसों की निगरानी करने की जिम्मेदारी थी। इस खुलासे के बाद वित्त सचिव प्रशांत कुमार ने कड़ा आदेश जारी किया है। उन्होंने कहा है कि तीन साल से एक ही जगह जमे अधिकारियों-कर्मचारियों का तत्काल तबादला करें। यह तबादला वहां नहीं होना चाहिए, जहां ये पहले रह चुके हैं। ट्रेजरी में तैनात कर्मियों ने ही की गड़बड़ी वित्त सचिव ने कहा कि अभी सात जिलों बोकारो, हजारीबाग, पलामू, जमशेदपुर, देवघर, रामगढ़ व रांची ट्रेजरी से वेतन के नाम पर यह निकासी हुई है। इसमें ट्रेजरी, सब ट्रेजरी, पेंशन एवं लेखा कार्यालय ओर स्टेट ऑडिट में तैनात कर्मचारियों की भूमिका सामने आ रही है। इन कार्यालयों में लंबे समय से जमे कई कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। इसलिए ट्रेजरी निदेशालय, ऑडिट निदेशालय और लेखा निदेशालय संदिग्ध कर्मचारियों को फौरन वहां से हटाएं। दरअसल सरकार का मानना है कि तीन साल से जमे कर्मियों को हटाने से पुराने सिंडिकेट की कड़ियां बिखरेंगी। स्टेट ऑडिट भी जांच के घेरे मे जानकारी के मुताबिक जांच में पता चला है कि यह सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि सिस्टम में बैठे लोगों की मिलीभगत का परिणाम हो सकता है। डीडीओ और ट्रेजरी अफसर के अलावा स्टेट ऑडिट के सीनियर ऑडिटर, ऑडिट अफसर, लेखा निदेशालय के लेखा सहायक व वरीय लेखा सहायक और ट्रेजरी के लिपिक व कंप्यूटर ऑपरेटर पर शक की सुई है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिन पदों पर वित्तीय निगरानी और ऑडिट की जिम्मेदारी थी, वही लोग अब शक के घेरे में हैं। जिलावार अवैध निकासी हजारीबाग 50-70 करोड़ बोकारो 30-50 करोड़ रांची 10-20 करोड़ जमशेदपुर 5-10 करोड़ देवघर 3-5 करोड़ रामगढ़ 3-4 करोड़ पलामू 3-4 करोड़ हालांकि फर्जी निकासी का अंतिम आंकड़ा ऑडिट और सीआईडी जांच के बाद ही सामने आएगा। ऐसी गड़बड़ी रोकने के लिए सरकार क्या कर सकती है तीन साल से ज्यादा समय से एक ही जगह जमे कर्मियों को हटाकर सरकार पुराने सिंडिकेट की कड़ियां बिखेरेगी। अवैध ढंग से निकासी की गई राशि की रिकवरी के लिए दोषियों की संपत्ति अटैच करने जैसे कदम भी उठा सकती है। यही नहीं, भविष्य में ऐसी चोरी रोकने के लिए ट्रेजरी के सॉफ्टवेयर में भी बड़े बदलाव किए जा सकते हैं, ताकि घोटालेबाज आसानी से ऐसी गड़बड़ी न कर सकें। सीआईडी को ट्रांसफर होगा हजारीबाग-बोकारो केस सरकार ने गृह विभाग को हजारीबाग और बोकारो थाने में दर्ज केस सीआईडी को ट्रांसफर करने का आदेश दिया था। अब जल्दी ही केस सीआईडी को ट्रांसफर करेगा। उधर, सरकार ने मामले की विस्तृत जांच के लिए उत्पाद विभाग के प्रधान सचिव अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में आठ सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति बनाई है। इस समिति ने भी जांच शुरू कर दी है। तबादले के साथ होगी विभागीय कार्यवाही वित्त सचिव के आदेश के बाद जल्दी ही बड़े पैमाने पर तबादलों की सूची जारी हो सकती है। साथ ही विभागीय कार्यवाही और आपराधिक जांच भी तेजी से बढ़ सकती है। अगर सरकार ने इसके साथ टेक्नोलॉजी और जवाबदेही को जोड़ा तो यह कदम भविष्य में बड़े घोटालों पर लगाम लगाने में निर्णायक साबित हो सकता है। रांची में डीडीओ के सर्टिफिकेट के बाद ही वेतन भुगतान घोटाला उजागर होने के बाद राजधानी रांची में ट्रेजरी के कामकाज का तरीका बदल गया है। क्योंकि रांची डीसी ने डीडीओ के सर्टिफिकेट के बिना वेतन भुगतान पर रोक लगा दी है। सभी डीडीओ को कार्यालय में स्वीकृत पद और कार्यरत कर्मचारियों के आंकड़ों के साथ बिल भेजने का निर्देश दिया गया है। सर्टिफिकेट में यह भी बताना है कि कर्मचारियों के वेतन और उनके बैंक खातों का सत्यापन कर लिया गया है। अगर इसमें कोई त्रुटि होती है, तो इसके लिए वे खुद जिम्मेदार होंगे। ट्रेजरी में जिस डीडीओ की ओर से ये सर्टिफिकेट दिया जा रहा है, उसी कार्यालय के कर्मचारियों के वेतन का भुगतान हो रहा है। इसके कारण वेतन जारी होने की प्रक्रिया काफी धीमी है। कांके पशुपालन केंद्र में फाइलों की जांच शुरू इधर, पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन संस्थान, कांके के अकाउंटेंट मुनिंद्र कुमार एवं उसके करीबी संजीव कुमार के वेतन मद में 2.94 करोड़ रुपए की निकासी का मामला सामने आने के बाद उच्चस्तरीय कमेटी संस्थान के सभी फाइलों की जांच कर रही है। मुनिंद्र जहां भी कार्यरत रहा, वहां से जुड़े खातों को भी खंगाला जा रहा है। दूसरी ओर वित्त विभाग और एजी की ओर से भी रांची ट्रेजरी की फाइलों को ऑनलाइन खंगाला जा रहा है।
रांची। झारखंड के बोकारो, हजारीबाग और रांची में सामने आए करोड़ों रुपये के ट्रेजरी घोटाले ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को झकझोर दिया है। इस घोटाले के बाद सरकार अब वित्तीय प्रक्रियाओं को लेकर बेहद सतर्क हो गई है। खासकर वेतन भुगतान से जुड़े मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सख्त कदम उठाए जा रहे हैं। इसी क्रम में होमगार्ड्स के कर्तव्य भत्ते की निकासी को लेकर नई गाइडलाइंस जारी की गई हैं। सत्यापन के बाद ही होगा भुगतान होमगार्ड डीजी ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि अब बिना सत्यापन के किसी भी होमगार्ड को वेतन या भत्ता नहीं दिया जाएगा। वित्त विभाग के निर्देश के अनुसार, हर होमगार्ड को निर्धारित प्रपत्र भरकर अपनी सभी जानकारी और दस्तावेज जमा करने होंगे। इसके बाद ही वेतन निकासी की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। सभी जिला समादेष्टाओं को निर्देश दिया गया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में तैनात होमगार्ड्स से आवश्यक कागजात इकट्ठा कर उनका सत्यापन सुनिश्चित करें। अनिवार्य दस्तावेज और जानकारी नई व्यवस्था के तहत होमगार्ड्स को अपने पे आईडी, नाम, सैन्य संख्या, मोबाइल नंबर, जन्मतिथि, आधार और पैन नंबर, बैंक खाता विवरण और IFSC कोड जैसी जानकारियां देनी होंगी। इसके साथ ही आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक पासबुक या कैंसिल चेक की स्वप्रमाणित प्रतियां जमा करनी होंगी। इसके अलावा एक घोषणा पत्र भी देना होगा, जिसमें होमगार्ड यह प्रमाणित करेगा कि दी गई सभी जानकारी सही है और गलत पाए जाने पर वह स्वयं जिम्मेदार होगा। पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर सरकार का मानना है कि इस नई व्यवस्था से फर्जी भुगतान और वित्तीय अनियमितताओं पर रोक लगेगी। ट्रेजरी घोटाले के बाद यह कदम प्रशासनिक सुधार की दिशा में अहम माना जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि आने वाले समय में अन्य विभागों में भी इसी तरह की सख्ती लागू की जा सकती है, ताकि सरकारी धन के दुरुपयोग को रोका जा सके।
रांची। झारखंड के ट्रेजरी घोटाले ने सरकार और प्रशासन की नींद उड़ा दी है। बोकारो और हजारीबाग ट्रेजरी से पुलिस वेतन मद में करोड़ों की अवैध निकासी मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आईएएस कमेटी और सीआईडी जांच के आदेश दिये हैं। राज्य के सभी 33 ट्रेजरी की जांच शुरू हो गई है। वित्त मंत्री के प्रस्ताव पर बनी आइएएस कमेटी तकनीकी और आपराधिक दोनों पहलुओं की जांच कर रही है, जिससे पुलिस महकमे में हड़कंप है। झारखंड के बोकारो और हजारीबाग जिले में ट्रेजरी से करोड़ों रुपये की अवैध निकासी के मामले ने राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। इस घोटाले में पुलिस अधिकारियों के वेतन के नाम पर सरकारी खजाने में सेंध लगाई गई है। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के नेतृत्व में वित्त विभाग की एक विशेष कमेटी का गठन किया गया है। वहीं, इस पूरे मामले में रची गई आपराधिक साजिश की परतें सीआईडी की तफ्तीश में खुलने लगी हैं। सीआइडी ने सभी एफआइआर की कॉपी ली वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर के अनुसार, अब तक दर्ज सभी प्राथमिकियों को सीआईडी को ट्रांसफर किया जा रहा है। जहां आईएएस कमेटी वित्तीय अनियमितताओं और विभागीय खामियों की जांच करेगी। वहीं, सीआईडी ये पता लगाएगी कि इस सुनियोजित चोरी के पीछे कौन से माफिया या अपराधी सक्रिय थे। जांच का दायरा केवल दो जिलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सभी जिलों में भी संभावित गड़बड़ियों की पड़ताल की जाएगी। तकनीकी जांच में एजी की मदद झारखंड ट्रेजरी घोटाले की गहराई और तकनीकी बारीकियों को देखते हुए, वित्त विभाग ने प्रधान महालेखाकार (AG Office) से संपर्क किया है। सरकार चाहती है कि एजी ऑफिस के किसी अनुभवी अधिकारी को इस उच्चस्तरीय कमेटी का सदस्य बनाया जाए। इससे ट्रेजरी सॉफ्टवेयर और बिलिंग प्रक्रिया में हुई हेराफेरी को पकड़ने में आसानी होगी और दोषियों के खिलाफ ठोस सबूत जुटाए जा सकेंगे। 25 महीने में निकाली 63 बार सैलरी बोकारो ट्रेजरी से एक रिटायर पुलिसकर्मी के नाम पर 4 करोड़ 29 लाख रुपये से अधिक की अवैध निकासी हुई। आशंका है कि ये पूरा घोटाला 50 करोड़ रुपये या उससे भी अधिक का हो सकता है। जुलाई 2016 में रिटायर हो चुके उपेंद्र सिंह को कागजों पर दोबारा नौकरी में दिखाया गया। नवंबर 2023 से मार्च 2026 के बीच पिछले 25 महीनों में कुल 63 बार फर्जी तरीके से वेतन निकाला गया। इस मामले में एसपी कार्यालय के अकाउंटेंट कौशल किशोर पांडेय को गिरफ्तार किया गया। उस पर बिल मैनेजमेंट सिस्टम (DDO Level) में छेड़छाड़ कर फर्जी वेतन बिल बनाने का गंभीर आरोप है। जांच में खुलासा हुआ कि आरोपी अकाउंटेंट ने घोटाले की रकम पहले अपने बैंक खाते में और बाद में अपनी पत्नी (अनु पांडेय) के खाते में ट्रांसफर की। पुलिस ने दोनों के खातों में जमा भारी राशि को फ्रीज कर दिया है। झारखंड में इस बड़े वित्तीय घोटाले के सामने आने के बाद पूरे प्रशासनिक विभाग में हड़कंप मच गया है। रडार पर सार्जेंट मेजर और डीएसपी स्तर के अधिकारी सरकारी विभाग में वेतन निकासी की प्रक्रिया काफी जटिल होती है, जिसमें पुलिस लाइन से मास्टर रोल पर सार्जेंट मेजर के हस्ताक्षर होते हैं। इसके बाद लेखापाल, बड़ा बाबू और अंत में डीएसपी (निकासी एवं व्ययन पदाधिकारी) के हस्ताक्षर से ट्रेजरी से भुगतान होता है। ऐसे में जांच की आंच डीएसपी, सार्जेंट मेजर और लेखा शाखा के क्लर्कों तक पहुंचना तय माना जा रहा है। इसी तर्ज पर कभी बिहार-झारखंड में चारा घोटाला हुआ था। सिपाही से इंस्पेक्टर तक के वेतन में खेल शुरुआती जांच में पता चला है कि सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर स्तर तक के कर्मचारियों के वेतन बिलों में छेड़छाड़ कर ये अवैध निकासी की गई है। मास्टर रोल से लेकर ट्रेजरी तक की चेन में शामिल हर अधिकारी अब जांच के दायरे में है। वित्त मंत्री ने उम्मीद जताई है कि उच्चस्तरीय कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद जल्द ही इस बड़े घोटाले का पर्दाफाश होगा और दोषियों को सजा मिलेगी।
रांची। झारखंड में सरकारी खजाने (ट्रेजरी) से करोड़ों रुपये की अवैध निकासी के मामले ने राज्य की सियासत में भूचाल ला दिया है। विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने इस प्रकरण की तुलना बहुचर्चित 'चारा घोटाले' से करते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखा है। उन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच सीबीआई (CBI) या किसी न्यायिक एजेंसी से कराने की पुरजोर मांग की है। राज्य के पुलिस विभाग सहित अन्य महत्वपूर्ण विभागों में हुई इस वित्तीय हेराफेरी के कारण प्रदेश का वित्तीय प्रबंधन पूरी तरह चरमरा गया है। चारा घोटाले की तर्ज पर सरकारी खजाने में सेंध नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' के जरिए सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल पुलिस विभाग ही नहीं, बल्कि ऊर्जा, पेयजल और पर्यटन जैसे विभागों के खजानों से भी अवैध रूप से करोड़ों रुपये निकाले गए हैं। मरांडी का आरोप है कि सरकारी संरक्षण के बिना इतनी बड़ी राशि की हेराफेरी संभव नहीं है। उन्होंने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में आग्रह किया है कि दोषियों को सजा दिलाने और सच्चाई सामने लाने के लिए निष्पक्ष जांच जरूरी है, जो केवल केंद्रीय एजेंसियों के माध्यम से ही संभव है। सीआईडी जांच का विरोध और सीबीआई-ईडी की मांग भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राज्य सरकार द्वारा कराई जा रही सीआईडी (CID) जांच पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ट्रेजरी में निकासी के जिम्मेदार अधिकारी (DDO) अक्सर एएसपी या डीएसपी स्तर के होते हैं, और सीआईडी में जांच करने वाले अधिकारी भी इसी रैंक के होते हैं। ऐसे में पुलिसकर्मी ही अपने विभाग के दूसरे पुलिसकर्मियों की निष्पक्ष जांच कैसे करेंगे? भाजपा ने मांग की है कि इस घोटाले के तार कई राज्यों से जुड़े होने के कारण इसमें प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सीबीआई को शामिल किया जाना चाहिए। सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि घोटाले का पैसा अन्य राज्यों के बैंक खातों में स्थानांतरित किया गया है, जिसकी गहराई से जांच आवश्यक है। वेतन संकट: 2.80 लाख से अधिक परिवारों की टूटी कमर ट्रेजरी घोटाले का सबसे भयावह असर राज्य के सरकारी कर्मचारियों पर पड़ा है। प्रदेश के इतिहास में संभवतः यह पहली बार हुआ है कि महीने की 11 तारीख बीत जाने के बाद भी कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला है। आंकड़ों के अनुसार, राज्य के पेरोल पर मौजूद 2,35,930 नियमित अधिकारी व कर्मचारी और लगभग 45,000 संविदाकर्मी वर्तमान में भारी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं। प्रतुल शाहदेव ने वित्तीय प्रबंधन की विफलता पर चिंता जताते हुए कहा कि कर्मचारियों के घरों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। वेतन न मिलने से लोगों की बैंकों की ईएमआई (EMI) बाउंस हो रही है और दैनिक खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। सरकार की स्थिति यह है कि कर्ज लेने के बावजूद वह अपने कर्मचारियों को समय पर भुगतान करने में असमर्थ सिद्ध हो रही है। मास्टरमाइंड की ऐयाशी और प्रशासनिक ढिलाई इस पूरे घोटाले में 'शंभू' नामक मास्टरमाइंड की भूमिका चर्चा का केंद्र बनी हुई है। खबरों के अनुसार, घोटाले की राशि का उपयोग विलासिता के लिए किया गया और आरोपी हेलीकॉप्टर से दीघा (पश्चिम बंगाल) जाकर पार्टी कर रहा था। भाजपा ने आरोप लगाया है कि जब सरकारी खजाने की लूट हो रही थी, तब प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। विपक्षी दलों का मानना है कि यदि इस मामले में तुरंत कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो यह देश के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक बनकर उभरेगा। फिलहाल, राज्य में इस मुद्दे पर जनआक्रोश और राजनीतिक तनाव चरम पर है।
रांची। झारखंड के पुलिस महकमे में वेतन निकासी के नाम पर करोड़ों रुपये के संभावित फर्जीवाड़े को लेकर राज्य सरकार ने अब तक का सबसे बड़ा अभियान छेड़ने का निर्णय लिया है। बोकारो और हजारीबाग जैसे जिलों के ट्रेजरी (कोषागार) से अवैध तरीके से पैसे निकालने के मामले उजागर होने के बाद, प्रशासन ने अब पूरे प्रदेश में पुलिसकर्मियों के वेतन भुगतान की फाइलों को खंगालने का निर्देश दिया है। इस व्यापक जांच के दायरे में पिछले 12 वर्षों का रिकॉर्ड शामिल किया गया है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सिस्टम में कहां और किस स्तर पर सेंधमारी की गई है। राज्यव्यापी ऑडिट और 12 वर्षों के रिकॉर्ड का मिलान वित्त विभाग और पुलिस मुख्यालय के समन्वय से शुरू होने वाली इस जांच का मुख्य केंद्र बिंदु यह पता लगाना है कि कहीं कागजी पुलिसकर्मियों के नाम पर वेतन की निकासी तो नहीं की जा रही थी। अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे सभी जिलों और विभिन्न पुलिस इकाइयों में तैनात रहे कर्मियों के वेतन डेटा का मिलान करें। जांच दल वर्ष 2014 से लेकर अब तक के सभी वित्तीय लेन-देन, आवंटित बजट और वास्तविक भुगतान की कड़ियों को जोड़ेगा। प्रारंभिक रिपोर्टों में कुछ विशेष क्षेत्रों में गंभीर विसंगतियां पाई गई हैं, जिसके बाद यह तय किया गया कि केवल वर्तमान भुगतान प्रक्रिया की जांच पर्याप्त नहीं होगी। अधिकारियों के अनुसार, पिछले एक दशक से अधिक समय के दस्तावेजों को खंगालने से इस सिंडिकेट की कार्यप्रणाली और इसमें शामिल रसूखदारों का चेहरा सामने आ सकेगा। डीडीओ की भूमिका और बैंक खातों का होगा सूक्ष्म सत्यापन इस पूरे घोटाले की पड़ताल के लिए आहरण एवं वितरण अधिकारियों (DDO) की भूमिका की विशेष रूप से समीक्षा की जाएगी। विभाग का मानना है कि बिना उच्चाधिकारियों या संबंधित बाबू की मिलीभगत के ट्रेजरी से अवैध निकासी संभव नहीं है। जांच के दौरान वेतन बिलों की स्वीकृति प्रक्रिया, पासिंग सिस्टम और सबसे महत्वपूर्ण बात—उन बैंक खातों की जांच होगी जिनमें पैसा ट्रांसफर किया गया है। जांच के दौरान उन कर्मियों के सेवा अभिलेखों (Service Records) का भी भौतिक सत्यापन किया जाएगा जिनके नाम पर भारी-भरकम राशि का भुगतान हुआ है। यह देखा जाएगा कि क्या संबंधित कर्मी उस अवधि में वाकई उस जिले या यूनिट में तैनात थे या केवल फाइलों में उनका नाम चल रहा था। यदि किसी भी स्तर पर दस्तावेजों में विसंगति या संदिग्ध लेन-देन पाया जाता है, तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब-तलब कर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जाएगी। पारदर्शिता बहाल करने और सिंडिकेट को ध्वस्त करने की तैयारी सरकार के इस कदम का प्राथमिक उद्देश्य सरकारी खजाने की लूट को रोकना और भविष्य के लिए भुगतान प्रणाली को पूरी तरह सुरक्षित बनाना है। वित्त मंत्रालय को संदेह है कि इस फर्जीवाड़े के पीछे एक संगठित सिंडिकेट काम कर रहा है, जो तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर वर्षों से सक्रिय है। बोकारो में वित्त विभाग की टीम पहले ही डेरा डाल चुकी है और वहां मिले सुरागों के आधार पर ही राज्यव्यापी जांच का खाका तैयार किया गया है। विभागीय अधिकारियों ने सभी जिलों से एक निश्चित समय सीमा के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट मांगी है। इस रिपोर्ट के आधार पर न केवल दोषियों पर एफआईआर दर्ज की जाएगी, बल्कि राज्य की ट्रेजरी प्रणाली में बड़े सुधारात्मक बदलाव भी किए जाएंगे। सरकार का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि जनता की गाढ़ी कमाई का एक-एक पैसा सही हकदार तक पहुंचे और भ्रष्टाचार की हर गुंजाइश को जड़ से खत्म किया जा सके।
बोकारो। बोकारो में ट्रेजरी से एक रिटायर्ड पुलिसकर्मी के नाम पर करोड़ों रुपये के गबन का मामला सामने आया है। मामले में उस अकाउंटेंट को गिरफ्तार कर लिया गया है, जिसने पैसे की निकासी की। उसकी पत्नी को भी इस मामले में शामिल बताया जा रहा है। 4 करोड़ 29 लाख 71 हजार की अवैध निकासी बोकारो एसपी के अनुसार, एक हवलदार के नाम पर बीते करीब 25 महीनों में कुल 4 करोड़ 29 लाख 71 हजार की अवैध निकासी की गई है। इस मामले में पुलिस ने आरोपी अकाउंटेंट कौशल कुमार पाण्डे को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। चौंकाने वाले खुलासे जांच के दौरान चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। बताया गया कि ट्रेजरी पोर्टल में जन्म तिथि और बैंक खाता संख्या में बदलाव कर इस फर्जीवाड़े को अंजाम दिया गया। पूछताछ में आरोपी ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि निकाली गई पूरी राशि उसने अपनी पत्नी अनु पाण्डेय के खाते में ट्रांसफर कर दी थी। सुनियोजित तरीके से गबनः एसपी ने बताया कि वेतन मद के नाम पर बार-बार रकम निकाली जाती रही, जिससे यह साफ होता है कि यह सुनियोजित तरीके से किया गया घोटाला है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मामले में शामिल सभी दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इस पूरे फर्जीवाड़े में ट्रेजरी और पुलिस विभाग के अन्य कर्मियों की भूमिका क्या रही। विभागीय समन्वय में कहीं लापरवाही या मिलीभगत तो नहीं हुई, इसकी भी गहन पड़ताल जारी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।