Pakistan Occupied Kashmir: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) को लेकर भारत ने अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। अखबार द्वारा अपनी रिपोर्ट में PoK को 'Pakistani Kashmir' लिखे जाने पर भारत ने इसे भ्रामक और तथ्यात्मक रूप से गलत बताया है। अमेरिका स्थित भारतीय दूतावास ने स्पष्ट कहा कि "कोई पाकिस्तानी कश्मीर नहीं है, केवल पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (Pakistan Occupied Kashmir - PoK) है।" भारतीय दूतावास ने क्या कहा? सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी बयान में भारतीय दूतावास ने कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं और हमेशा रहेंगे। दूतावास ने यह भी कहा कि पाकिस्तान ने इन क्षेत्रों के कुछ हिस्सों पर अवैध कब्जा कर रखा है और वहां रहने वाले लोगों के खिलाफ हिंसा तथा दमन की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। भारत ने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया को ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर सही और आधिकारिक शब्दावली का इस्तेमाल करना चाहिए। किस रिपोर्ट पर उठा विवाद? दरअसल, द न्यूयॉर्क टाइम्स ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हालिया चुनाव और हिंसा को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। रिपोर्ट में मीरपुर में सुरक्षा बलों और जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के कार्यकर्ताओं के बीच हुई झड़प का उल्लेख किया गया था। अखबार ने बताया कि इस घटना में कम से कम दो लोगों की मौत हुई, जबकि मानवाधिकार संगठनों ने निष्पक्ष जांच की मांग की है। हालांकि, रिपोर्ट में JAAC की ओर से पुलिस कार्रवाई में कई लोगों के मारे जाने के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होने का भी उल्लेख किया गया था। भारत ने दोहराया अपना पुराना रुख भारत लंबे समय से यह स्पष्ट करता रहा है कि पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा है, जबकि पाकिस्तान कुछ क्षेत्रों पर अवैध कब्जा किए हुए है। इसी नीति के तहत भारत ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों से अपेक्षा की है कि वे इस क्षेत्र का उल्लेख करते समय 'Pakistan Occupied Kashmir (PoK)' जैसी मान्य और तथ्यात्मक शब्दावली का ही उपयोग करें। भारत का कहना है कि गलत भौगोलिक शब्दों का इस्तेमाल न केवल तथ्यों को विकृत करता है, बल्कि संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भ्रम भी पैदा करता है।
लखनऊ, एजेंसियां। समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव ने सोनम वांगचुक के अनशन खत्म करने के बाद केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए कहा कि अगर समस्या की जड़ में बीमारी है तो सिर्फ ऊपर-ऊपर का समाधान करने से बात नहीं बनेगी। अखिलेश ने सरकार पर साधा निशाना अखिलेश यादव ने अपने बयान में लिखा कि "जब बीमारी ROOT में है तो FRUIT के इलाज से कोई नहीं मानने वाला"। उन्होंने इस बयान के जरिए सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि समस्याओं का स्थायी समाधान मूल कारणों को दूर करने से ही संभव है। सोनम वांगचुक ने 26 दिन बाद तोड़ा अनशन लद्दाख से जुड़े मुद्दों और छात्रों के समर्थन में अनशन कर रहे सोनम वांगचुक ने सरकार के आश्वासन के बाद अपना अनशन समाप्त किया। इसके बाद अखिलेश यादव की यह प्रतिक्रिया सामने आई। बीजेपी पर भी किया हमला अखिलेश यादव ने अपने पोस्ट में बीजेपी पर निशाना साधते हुए लिखा कि देश की कई समस्याओं की जड़ राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ी हुई है। उन्होंने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए और बदलाव की जरूरत बताई। सपा नेताओं ने भी दी प्रतिक्रिया सपा नेताओं ने सोनम वांगचुक के अनशन खत्म करने के फैसले का स्वागत किया। पार्टी नेताओं का कहना है कि जीवन की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन जिन मुद्दों को लेकर आंदोलन हुआ है, उनका समाधान होना चाहिए।
नई दिल्ली, एजेंसियां। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने आज दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचकर सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक से मुलाकात की। वांगचुक लंबे समय से जारी अनशन के जरिए परीक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों, पेपर लीक और छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दों को उठा रहे हैं। पवन खेड़ा ने सरकार पर साधा निशाना सोनम वांगचुक से मुलाकात के बाद पवन खेड़ा ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि छात्रों की समस्याओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उन्होंने वांगचुक की बिगड़ती सेहत को लेकर चिंता जताई और सरकार से बातचीत कर समाधान निकालने की अपील की। अनशन में उठाए जा रहे हैं छात्रों से जुड़े मुद्दे सोनम वांगचुक का यह आंदोलन परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, पेपर लीक की घटनाओं पर कार्रवाई और युवाओं के हितों से जुड़े मुद्दों को लेकर है। उनके अनशन को लेकर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं ने समर्थन जताया है। स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता लंबे समय से अनशन पर रहने के कारण सोनम वांगचुक की सेहत को लेकर चिंता जताई जा रही है। डॉक्टरों के अनुसार उनका वजन भी काफी कम हुआ है और लगातार निगरानी रखी जा रही है। लद्दाख के मुद्दों से भी जुड़े रहे हैं वांगचुक सोनम वांगचुक इससे पहले लद्दाख को राज्य का दर्जा देने, संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और स्थानीय अधिकारों की मांग को लेकर भी आंदोलन कर चुके हैं। लेकिन वर्तमान अनशन का मुख्य मुद्दा परीक्षा व्यवस्था और छात्रों से जुड़ी मांगें हैं।
नई दिल्ली: फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप ने सामाजिक कार्यकर्ता और इंजीनियर सोनम वांगचुक के आमरण अनशन का समर्थन करते हुए सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने पोस्ट में अनुराग कश्यप ने कहा कि लंबे समय से जारी भूख हड़ताल के बावजूद सरकार की चुप्पी चिंता का विषय है। सोनम वांगचुक पिछले कई दिनों से जंतर-मंतर पर अपनी विभिन्न मांगों को लेकर आमरण अनशन पर हैं। उनकी सेहत को लेकर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों और समर्थकों ने भी चिंता जताई है तथा उनसे अनशन समाप्त करने की अपील की है। अनुराग कश्यप ने क्या कहा? अनुराग कश्यप ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर लिखा कि एक समय भूख हड़ताल लोकतांत्रिक विरोध का एक प्रभावी माध्यम माना जाता था और लोग गंभीर मुद्दों पर ही इस रास्ते को अपनाते थे। उन्होंने लिखा कि किसी व्यक्ति का आमरण अनशन पर बैठना इस बात का संकेत है कि वह न्याय और अपने मुद्दे को लेकर पूरी प्रतिबद्धता के साथ संघर्ष कर रहा है। अनुराग ने यह भी कहा कि वे स्वयं इस तरह का कदम उठाने की हिम्मत नहीं रखते, लेकिन सोनम वांगचुक के समर्थन में खड़े हैं। सरकार की चुप्पी पर जताई नाराजगी अपने पोस्ट में अनुराग कश्यप ने सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि लंबे समय तक किसी प्रकार की प्रतिक्रिया न आना चिंताजनक है। उन्होंने सत्ता पक्ष की चुप्पी की आलोचना करते हुए तीखी भाषा का इस्तेमाल किया और इसे लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उनके एक अन्य सोशल मीडिया पोस्ट में भी सरकार के प्रति कड़ी आलोचना देखने को मिली, जिसमें उन्होंने अपनी असहमति व्यक्त करते हुए कठोर शब्दों का प्रयोग किया। कई कलाकार भी जता चुके हैं चिंता सोनम वांगचुक के अनशन को लेकर फिल्म और कला जगत की कई हस्तियों ने भी चिंता व्यक्त की है। कई कलाकारों ने उनकी सेहत को ध्यान में रखते हुए उनसे आमरण अनशन समाप्त करने की अपील की है। क्या हैं सोनम वांगचुक की प्रमुख मांगें? सोनम वांगचुक जंतर-मंतर पर अपनी विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके प्रमुख मुद्दों में: NEET पेपर लीक मामले में जवाबदेही तय करने की मांग। केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग। लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग। वांगचुक का कहना है कि यदि उनकी प्रमुख मांगों पर सकारात्मक निर्णय लिया जाता है तो वह अपना अनशन समाप्त करने पर विचार करेंगे। स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता लंबे समय से जारी भूख हड़ताल के कारण सोनम वांगचुक की सेहत को लेकर चिंता बढ़ गई है। डॉक्टर लगातार उनकी स्वास्थ्य जांच कर रहे हैं और समर्थक उनसे अनशन समाप्त करने की अपील कर रहे हैं। फिलहाल सरकार की ओर से उनकी मांगों पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। वहीं, यह मामला सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
Sonam Wangchuk Story: बॉलीवुड फिल्म 3 Idiots में आमिर खान द्वारा निभाया गया 'रैंचो' का किरदार आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस किरदार की प्रेरणा लद्दाख के प्रसिद्ध इंजीनियर, इनोवेटर और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक से जुड़ी मानी जाती है। शिक्षा व्यवस्था में बदलाव और बच्चों को बेहतर सीखने का अवसर देने के लिए वर्षों से काम कर रहे सोनम वांगचुक इन दिनों एक बार फिर चर्चा में हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रही उनकी भूख हड़ताल ने देशभर का ध्यान शिक्षा प्रणाली, परीक्षा व्यवस्था और जवाबदेही जैसे मुद्दों की ओर आकर्षित किया है। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल परीक्षा पास कराना नहीं, बल्कि बच्चों की प्रतिभा और सोचने की क्षमता को विकसित करना होना चाहिए। 'रैंचो' की प्रेरणा बने सोनम वांगचुक साल 2009 में रिलीज हुई फिल्म 3 Idiots में 'रैंचो' का किरदार पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था को चुनौती देता है और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देता है। माना जाता है कि इस किरदार की प्रेरणा सोनम वांगचुक के जीवन और उनके शिक्षा सुधार के कार्यों से ली गई थी। बताया जाता है कि फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले 2008 में आमिर खान की मुलाकात सोनम वांगचुक से एक सम्मान समारोह में हुई थी, जहां उनके जीवन और शिक्षा सुधार के प्रयासों पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री भी दिखाई गई थी। शिक्षा के लिए समर्पित पूरा जीवन लद्दाख के रहने वाले सोनम वांगचुक ने अपना जीवन ऐसे बच्चों के लिए समर्पित किया है जिन्हें पारंपरिक शिक्षा प्रणाली अक्सर पीछे छोड़ देती है। साल 1988 में उन्होंने अपने साथियों के साथ Students' Educational and Cultural Movement of Ladakh (SECMOL) की स्थापना की। इस पहल का उद्देश्य उन छात्रों को नई दिशा देना था जिन्हें पारंपरिक परीक्षा प्रणाली 'असफल' मानती थी। SECMOL ने हजारों छात्रों को आत्मविश्वास, व्यावहारिक शिक्षा और कौशल आधारित सीखने का अवसर दिया। यहां से पढ़े कई छात्र आगे चलकर वैज्ञानिक, इंजीनियर और विभिन्न क्षेत्रों में सफल पेशेवर बने। इंजीनियरिंग से शिक्षा सुधार तक का सफर सोनम वांगचुक ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। छात्र जीवन में उन्होंने लेह का पहला कोचिंग सेंटर शुरू किया, जहां पढ़ाते समय उन्हें महसूस हुआ कि कई प्रतिभाशाली छात्र केवल शिक्षा प्रणाली की कमियों के कारण पीछे रह जाते हैं। यही अनुभव उनके शिक्षा सुधार मिशन की नींव बना। उन्होंने ऐसी शिक्षा प्रणाली की वकालत की जिसमें रटने के बजाय समझ, नवाचार और वास्तविक जीवन से जुड़ी सीख को प्राथमिकता मिले। पर्यावरण संरक्षण में भी निभाई अहम भूमिका शिक्षा के अलावा सोनम वांगचुक पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी अपने नवाचारों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने 'आइस स्तूप' (Ice Stupa) तकनीक विकसित की, जिसके जरिए सर्दियों के पानी को कृत्रिम ग्लेशियर के रूप में संरक्षित कर गर्मियों में सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है। इस मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली है। शिक्षा सुधार की मांग को लेकर भूख हड़ताल इन दिनों सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने कथित परीक्षा गड़बड़ियों और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग करते हुए शिक्षा मंत्रालय से ठोस कार्रवाई की अपील की है। उनका कहना है कि देश के छात्रों का भविष्य किसी भी व्यवस्था से बड़ा है और शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। क्यों चर्चा में हैं सोनम वांगचुक? सोनम वांगचुक केवल एक इंजीनियर या इनोवेटर नहीं, बल्कि ऐसे शिक्षा सुधारक हैं जिन्होंने वर्षों से बच्चों की रचनात्मकता, कौशल और व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ावा देने का काम किया है। उनकी पहल ने यह संदेश दिया कि सफलता केवल परीक्षा के अंकों से नहीं, बल्कि सीखने की क्षमता और नवाचार से तय होती है। आज उनका आंदोलन एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, व्यावहारिक और छात्र-केंद्रित बनाने की आवश्यकता है।
नई दिल्ली: नई कार खरीदते समय ज्यादातर परिवार माइलेज और कीमत के साथ-साथ सुरक्षा को भी सबसे बड़ी प्राथमिकता देते हैं। खासकर अगर घर में छोटे बच्चे हों, तो मजबूत बॉडी, चाइल्ड सेफ्टी फीचर्स और बेहतर क्रैश टेस्ट रेटिंग वाली कार चुनना बेहद जरूरी हो जाता है। भारतीय बाजार में कई ऐसी कारें उपलब्ध हैं, जिन्हें बच्चों और परिवार की सुरक्षा के लिहाज से बेहतर माना जाता है। इनमें टाटा मोटर्स, स्कोडा और वॉक्सवैगन जैसी कंपनियों के मॉडल शामिल हैं। आइए जानते हैं ऐसी 5 कारों के बारे में जो एडवांस सेफ्टी फीचर्स और बेहतर क्रैश टेस्ट प्रदर्शन के लिए जानी जाती हैं। 1. Tata Safari टाटा सफारी फैमिली SUV सेगमेंट की लोकप्रिय कारों में से एक है। यह मजबूत बॉडी स्ट्रक्चर और आधुनिक सुरक्षा तकनीकों के साथ आती है। शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत: लगभग ₹13.39 लाख मुख्य सेफ्टी फीचर्स: 7 एयरबैग इलेक्ट्रॉनिक स्टेबिलिटी प्रोग्राम (ESP) ADAS (लेवल-2) फीचर्स इलेक्ट्रॉनिक पार्किंग ब्रेक ऑटो होल्ड इमरजेंसी और ब्रेकडाउन कॉल ISOFIX चाइल्ड सीट सपोर्ट 2. Tata Harrier अगर आपकी फैमिली बड़ी है और आप प्रीमियम SUV खरीदना चाहते हैं, तो टाटा हैरियर एक मजबूत विकल्प हो सकती है। शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत: लगभग ₹12.99 लाख मुख्य सेफ्टी फीचर्स: 7 एयरबैग एडवांस ESP ADAS टायर प्रेशर मॉनिटरिंग सिस्टम (TPMS) OMEGARC प्लेटफॉर्म इमरजेंसी कॉलिंग सिस्टम 3. Skoda Kushaq स्कोडा कुशाक कॉम्पैक्ट SUV सेगमेंट की लोकप्रिय कार है, जिसमें परिवार की सुरक्षा के लिए कई आधुनिक फीचर्स दिए गए हैं। शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत: लगभग ₹10.69 लाख इंजन विकल्प: 1.0 लीटर टर्बो पेट्रोल 1.5 लीटर टर्बो पेट्रोल मुख्य सेफ्टी फीचर्स: 6 एयरबैग इलेक्ट्रॉनिक स्टेबिलिटी कंट्रोल (ESC) ABS के साथ EBD ISOFIX चाइल्ड सीट माउंट मल्टी-कोलिजन ब्रेक TPMS 4. Volkswagen Virtus अगर आप सेडान पसंद करते हैं, तो Volkswagen Virtus सुरक्षा के मामले में मजबूत विकल्प मानी जाती है। शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत: लगभग ₹10.70 लाख मुख्य सेफ्टी फीचर्स: 6 एयरबैग इलेक्ट्रॉनिक स्टेबिलिटी कंट्रोल (ESC) ISOFIX चाइल्ड सीट एंकरेज हिल होल्ड कंट्रोल मल्टी-कोलिजन ब्रेक पार्क डिस्टेंस कंट्रोल 5. Skoda Slavia स्कोडा स्लाविया भी फैमिली सेडान सेगमेंट में सुरक्षा के लिहाज से अच्छी मानी जाती है। शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत: लगभग ₹9.99 लाख इंजन विकल्प: 1.0 लीटर टर्बो पेट्रोल 1.5 लीटर टर्बो पेट्रोल मुख्य सेफ्टी फीचर्स: 6 एयरबैग ABS के साथ EBD सभी सीटों पर 3-पॉइंट सीट बेल्ट ट्रैक्शन कंट्रोल हिल होल्ड कंट्रोल मल्टी-कोलिजन ब्रेक रियर पार्किंग कैमरा ISOFIX चाइल्ड सीट माउंट बच्चों की सुरक्षा के लिए कार खरीदते समय किन बातों का रखें ध्यान? कार खरीदते समय केवल एयरबैग की संख्या ही नहीं, बल्कि इन बातों पर भी ध्यान दें: ISOFIX चाइल्ड सीट माउंट की उपलब्धता इलेक्ट्रॉनिक स्टेबिलिटी कंट्रोल (ESC) ABS और EBD मजबूत क्रैश टेस्ट रेटिंग 3-पॉइंट सीट बेल्ट ADAS जैसे एडवांस ड्राइवर असिस्टेंस फीचर्स (यदि उपलब्ध हों) अगर आपकी प्राथमिकता परिवार और बच्चों की सुरक्षा है, तो बेहतर क्रैश टेस्ट रेटिंग, मजबूत बॉडी स्ट्रक्चर और आधुनिक सेफ्टी फीचर्स वाली कार चुनना लंबे समय में अधिक सुरक्षित और फायदेमंद साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: भारत अपनी उत्तरी सीमाओं की सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित हाई-एल्टीट्यूड एयरशिप को जल्द ही लद्दाख में तैनात किया जाएगा। यह अत्याधुनिक प्रणाली सीमावर्ती क्षेत्रों में 24 घंटे निगरानी रखने और सेना को रियल टाइम खुफिया जानकारी उपलब्ध कराने में मदद करेगी। 20 किलोमीटर की ऊंचाई से रखेगा नजर जानकारी के अनुसार, यह एयरशिप लगभग 20 किलोमीटर (करीब 66,000 फीट) की ऊंचाई तक संचालित हो सकेगा। इतनी ऊंचाई से यह सीमावर्ती इलाकों में होने वाली हर गतिविधि पर लगातार नजर रखेगा और किसी भी संदिग्ध हलचल की तत्काल जानकारी सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंचाएगा। आधुनिक सेंसर और रडार से लैस एयरशिप में अत्याधुनिक कैमरे, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, रडार और अन्य निगरानी उपकरण लगाए जा रहे हैं। ये उपकरण दिन और रात, दोनों परिस्थितियों में लंबी दूरी तक निगरानी करने में सक्षम होंगे। इससे सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ, सैन्य गतिविधियों और अन्य सुरक्षा चुनौतियों का समय रहते पता लगाया जा सकेगा। DRDO ने किया विकसित इस परियोजना का विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) कर रहा है। इसे विशेष रूप से ऊंचाई वाले दुर्गम और कठिन इलाकों में प्रभावी निगरानी के लिए डिजाइन किया गया है, जहां पारंपरिक निगरानी प्रणालियों को संचालन में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अंतिम चरण में है परीक्षण रक्षा सूत्रों के मुताबिक, हाई-एल्टीट्यूड एयरशिप का परीक्षण अंतिम चरण में है। परीक्षण सफल होने के बाद इसे सबसे पहले लद्दाख में तैनात किया जाएगा। भविष्य में आवश्यकता के अनुसार अन्य संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में भी इसकी तैनाती की जा सकती है। सीमा सुरक्षा को मिलेगा नया आयाम रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक के इस्तेमाल से भारतीय सेना की निगरानी क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। लगातार निगरानी और रियल टाइम अलर्ट मिलने से घुसपैठ की कोशिशों को समय रहते विफल किया जा सकेगा और किसी भी आपात स्थिति में सेना की प्रतिक्रिया पहले से अधिक तेज और प्रभावी होगी। वैश्विक तकनीक की दिशा में भारत का कदम दुनिया के कई देश पहले से ही उन्नत हवाई निगरानी प्रणालियों का उपयोग कर रहे हैं। अमेरिका लंबे समय से निगरानी एयरशिप, ड्रोन और उपग्रह आधारित नेटवर्क का इस्तेमाल करता रहा है, जबकि चीन ने तिब्बत और सीमावर्ती क्षेत्रों में अपने निगरानी ढांचे को मजबूत किया है। रूस के पास भी सीमा सुरक्षा के लिए उन्नत हवाई निगरानी प्रणाली मौजूद है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह हाई-एल्टीट्यूड एयरशिप देश की रक्षा तैयारियों को नई तकनीकी क्षमता देगा और सीमाओं की सुरक्षा को अधिक आधुनिक, प्रभावी और भरोसेमंद बनाएगा।
केंद्र शासित प्रदेश Ladakh में प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। उपराज्यपाल Vinai Kumar Saxena ने पांच नए जिलों के गठन को मंजूरी दे दी है। कौन-कौन से बने नए जिले? लद्दाख में अब जिन पांच नए जिलों का गठन होगा, वे हैं: Nubra Sham Changthang Zanskar Drass इसके साथ ही लद्दाख में जिलों की कुल संख्या 2 से बढ़कर 7 हो जाएगी। अभी तक केवल Leh और Kargil ही जिले थे। क्यों है यह फैसला खास? उपराज्यपाल ने इसे लद्दाख के लिए "ऐतिहासिक दिन" बताया। उनका कहना है कि यह लंबे समय से चली आ रही स्थानीय लोगों की मांग थी। इस कदम से: प्रशासन लोगों के और करीब पहुंचेगा दूरदराज इलाकों में सरकारी सेवाएं तेजी से मिलेंगी रोजगार और उद्यमिता के नए अवसर पैदा होंगे स्थानीय शासन व्यवस्था मजबूत होगी पहले ही मिल चुकी थी केंद्र की मंजूरी गृह मंत्रालय ने अगस्त 2024 में ही इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। यह फैसला प्रधानमंत्री Narendra Modi के विकसित और समृद्ध लद्दाख के विजन के अनुरूप बताया जा रहा है। 2019 में बना था केंद्र शासित प्रदेश 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। तब से यह सीधे केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन है। यह फैसला लद्दाख के दूरस्थ और सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।