एक समय था जब सफल करियर की पहचान एक तयशुदा पांच वर्षीय करियर प्लान से की जाती थी। स्कूल, कॉलेज, करियर काउंसलर और इंटरव्यू लेने वाले अक्सर यही सवाल पूछते थे कि "आप खुद को अगले पांच साल में कहां देखते हैं?" लेकिन बदलती तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और तेजी से बदलते जॉब मार्केट ने इस सोच को काफी हद तक बदल दिया है। आज की युवा पीढ़ी, खासकर Gen Z, निश्चित मंजिल की बजाय लचीलेपन, नए कौशल सीखने और बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस को अधिक महत्व दे रही है। करियर की परिभाषा बदल रही है आज के समय में करियर केवल पदोन्नति या ऊंचे पद तक पहुंचने का नाम नहीं रह गया है। युवा प्रोफेशनल्स ऐसे करियर की तलाश में हैं जहां वे नई चीजें सीख सकें, अलग-अलग भूमिकाओं में काम कर सकें और जरूरत पड़ने पर बिना हिचकिचाहट अपने करियर की दिशा बदल सकें। इस बदलाव के पीछे तेजी से बदलती तकनीक, AI का बढ़ता प्रभाव और लगातार बदलती उद्योगों की जरूरतें प्रमुख कारण हैं। ऐसे माहौल में एक तयशुदा पांच साल की योजना बनाना पहले जितना आसान या व्यावहारिक नहीं रह गया है। Deloitte Survey: नेतृत्व नहीं, संतुलित जीवन है प्राथमिकता Deloitte 2026 Gen Z and Millennial Survey के अनुसार, केवल 6 प्रतिशत Gen Z प्रोफेशनल्स ही नेतृत्व (Leadership) की भूमिका को अपना प्रमुख करियर लक्ष्य मानते हैं। जो युवा नेतृत्व की भूमिका नहीं चाहते, उनके प्रमुख कारण हैं- तनाव और बर्नआउट का डर अत्यधिक जिम्मेदारियां बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस बनाए रखना सर्वे में यह भी सामने आया कि केवल 25 प्रतिशत Gen Z और 21 प्रतिशत Millennials ही तेजी से प्रमोशन और बड़े पदों की दौड़ में शामिल होना चाहते हैं। इसके बजाय अधिकांश युवा नए अनुभव, अलग-अलग विभागों में काम करने, करियर बदलने और नई स्किल्स सीखने को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं। करियर लैडर नहीं, अब 'करियर जंगल जिम' की सोच आज के युवा करियर को सीढ़ी की तरह नहीं बल्कि एक ऐसे सफर की तरह देख रहे हैं, जहां अलग-अलग रास्तों पर चलकर नए अनुभव हासिल किए जा सकते हैं। इस सोच में शामिल हैं- साइड प्रोजेक्ट्स पर काम करना फ्रीलांसिंग नई प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन लेना क्रॉस-फंक्शनल रोल निभाना अंतरराष्ट्रीय अवसरों की तलाश AI और नई तकनीकों से जुड़ी स्किल्स सीखना यानी करियर अब एक सीधी रेखा नहीं बल्कि लगातार सीखने और बदलने की प्रक्रिया बनता जा रहा है। AI के दौर में सबसे जरूरी स्किल कौन-सी? भर्ती विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल तकनीकी ज्ञान पर्याप्त नहीं है। बदलते समय में सबसे महत्वपूर्ण कौशल Adaptability (अनुकूलन क्षमता) बन चुका है। आज कंपनियां ऐसे कर्मचारियों को प्राथमिकता दे रही हैं जो- नई तकनीक जल्दी सीख सकें बदलती परिस्थितियों में खुद को ढाल सकें समस्याओं का समाधान खोज सकें टीम के साथ बेहतर सहयोग कर सकें लगातार सीखने की मानसिकता रखें AI के कारण कई पारंपरिक नौकरियां बदल रही हैं, जबकि नई भूमिकाएं लगातार सामने आ रही हैं। ऐसे में सीखते रहने वाले प्रोफेशनल्स भविष्य के लिए अधिक तैयार माने जा रहे हैं। Gen Z क्यों चुन रही है फ्लेक्सिबिलिटी? Gen Z ने अपने करियर की शुरुआत ऐसे दौर में की है, जहां आर्थिक अनिश्चितता, बड़े पैमाने पर छंटनी, AI का तेजी से विस्तार और बदलते बिजनेस मॉडल सामान्य बात बन चुके हैं। इसी वजह से यह पीढ़ी केवल ऊंचे पदों की बजाय- मानसिक स्वास्थ्य काम और निजी जीवन का संतुलन लचीला कार्य वातावरण व्यक्तिगत विकास सीखने के अवसर को अधिक महत्व दे रही है। कंपनियां भी बदल रही हैं अपनी सोच विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की सफलता उन कर्मचारियों की होगी जो केवल एक क्षेत्र के विशेषज्ञ नहीं बल्कि कई तरह की परिस्थितियों में काम करने की क्षमता रखते हों। प्रोजेक्ट मैनेजमेंट, नेतृत्व, कम्युनिकेशन, सहयोग और समस्या समाधान जैसी ट्रांसफरेबल स्किल्स अब लगभग हर उद्योग में महत्वपूर्ण होती जा रही हैं। इंटरव्यू का सबसे अहम सवाल भी बदल सकता है पहले इंटरव्यू में पूछा जाता था- "आप खुद को पांच साल बाद कहां देखते हैं?" लेकिन अब विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे अधिक महत्वपूर्ण सवाल हो सकता है- "आप इस समय कौन-सी नई स्किल सीख रहे हैं?" क्योंकि आज के दौर में भविष्य की सटीक भविष्यवाणी करना मुश्किल है, लेकिन लगातार सीखने की क्षमता किसी भी प्रोफेशनल को लंबे समय तक सफल बना सकती है। बदलते समय में सफलता का नया मंत्र आज करियर में सफलता का मतलब केवल एक तय मंजिल तक पहुंचना नहीं है। बदलती तकनीक, AI और नए अवसरों के दौर में वही लोग आगे बढ़ेंगे जो नई चीजें सीखने, बदलाव को अपनाने और जरूरत पड़ने पर अपनी दिशा बदलने के लिए तैयार रहेंगे। पांच साल की योजना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन अब वह पहले की तरह कठोर नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार बदलने वाली रणनीति बन चुकी है।
कभी कॉर्पोरेट दुनिया में करियर ग्रोथ का सबसे बड़ा लक्ष्य मैनेजर बनना माना जाता था। लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। Microsoft की हालिया छंटनी के बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मैनेजरों की जगह लेने जा रहा है? विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा नहीं है। कंपनियां मैनेजरों को खत्म नहीं कर रहीं, बल्कि अनावश्यक मैनेजमेंट लेयर कम करके नेतृत्व की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित कर रही हैं। Microsoft की छंटनी ने बढ़ाई चर्चा Microsoft ने हालिया जॉब कट्स के दौरान अपनी मैनेजमेंट लेयर को भी कम किया है। कंपनी AI पर बड़े स्तर पर निवेश कर रही है और संगठन को अधिक तेज, चुस्त (Agile) और प्रभावी बनाने की दिशा में काम कर रही है। यही रणनीति Amazon, Meta और Shopify जैसी कई बड़ी टेक कंपनियां भी अपना रही हैं। इस ट्रेंड को अब कॉर्पोरेट जगत में "Management Diet" कहा जा रहा है, जिसमें संगठन के भीतर गैर-जरूरी मैनेजमेंट स्तरों को हटाकर निर्णय प्रक्रिया को सरल बनाया जा रहा है। AI नहीं, संगठनात्मक बदलाव है बड़ी वजह विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव केवल AI की वजह से नहीं हो रहा है। True Balance के चीफ ह्यूमन रिसोर्स ऑफिसर (CHRO) गौरव शर्मा का कहना है कि कंपनियां अब यह मूल्यांकन कर रही हैं कि कौन-सी मैनेजमेंट लेयर वास्तव में व्यवसाय को मूल्य दे रही है। यदि किसी स्तर की भूमिका केवल रिपोर्टिंग, समन्वय और प्रशासनिक कार्यों तक सीमित है, तो उसे अधिक प्रभावी तरीके से AI के जरिए संभाला जा सकता है। वहीं HireYou के CHRO अभिजीत घोष के मुताबिक कंपनियां अपने संगठन को अधिक तेज और लचीला बनाने के लिए संरचनात्मक बदलाव कर रही हैं। AI इस बदलाव को आसान बना रहा है क्योंकि अब कई प्रशासनिक जिम्मेदारियां तकनीक संभाल सकती है। AI किन मैनेजमेंट कार्यों को संभाल रहा है? आज AI कई ऐसे कार्य तेजी से कर रहा है जो पहले मिडिल मैनेजर की जिम्मेदारी माने जाते थे। इनमें शामिल हैं: प्रदर्शन (Performance) की निगरानी प्रोजेक्ट की प्रगति पर नजर रखना मीटिंग का सारांश तैयार करना कर्मचारियों की शेड्यूलिंग संसाधनों का आवंटन ऑनबोर्डिंग और रिपोर्टिंग अनुपालन (Compliance) की निगरानी इन कार्यों के ऑटोमेट होने से मैनेजरों का समय बच रहा है और संगठन कम मैनेजमेंट लेयर के साथ भी प्रभावी ढंग से काम कर पा रहे हैं। AI नहीं कर सकता नेतृत्व की जगह विशेषज्ञ मानते हैं कि AI डेटा और प्रशासनिक कार्यों में मदद कर सकता है, लेकिन इंसानी नेतृत्व की जगह नहीं ले सकता। कर्मचारियों को प्रेरित करना, विवाद सुलझाना, कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेना, टीम का विश्वास जीतना और सकारात्मक कार्य संस्कृति बनाना ऐसे काम हैं जिनमें मानवीय समझ और अनुभव की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि भविष्य में प्रभावी नेतृत्व की अहमियत और बढ़ने वाली है। मैनेजर की भूमिका कैसे बदल रही है? अब भविष्य का मैनेजर केवल टीम की निगरानी करने वाला व्यक्ति नहीं होगा। नई भूमिका में मैनेजर को इन जिम्मेदारियों पर अधिक ध्यान देना होगा: कर्मचारियों का विकास और कोचिंग रणनीतिक निर्णय लेना नवाचार को बढ़ावा देना अलग-अलग टीमों के बीच बेहतर सहयोग स्थापित करना व्यवसायिक समस्याओं का समाधान करना जो मैनेजर केवल अनुमोदन, रिपोर्टिंग और रोजमर्रा की निगरानी तक सीमित रहेंगे, उनके लिए भविष्य अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। करियर ग्रोथ का नया मतलब विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में करियर की सफलता केवल मैनेजर बनने से तय नहीं होगी। युवा पेशेवरों को अब इन कौशलों पर ध्यान देना होगा: AI टूल्स की समझ किसी क्षेत्र में गहरी विशेषज्ञता समस्या समाधान क्षमता विभिन्न टीमों के साथ सहयोग लगातार नई तकनीकों को सीखने की आदत व्यवसायिक परिणामों की जिम्मेदारी लेना यानी भविष्य में पदनाम (Designation) से अधिक महत्व कौशल और प्रभाव (Impact) का होगा। क्या भारत में भी दिखेगा यही ट्रेंड? विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की कंपनियां भी धीरे-धीरे इसी दिशा में आगे बढ़ेंगी। डिजिटल-फर्स्ट कंपनियां अपेक्षाकृत तेजी से फ्लैट संगठनात्मक ढांचे को अपनाएंगी, जबकि बड़े पारंपरिक संगठनों में यह बदलाव धीरे-धीरे देखने को मिलेगा। हालांकि अंतिम लक्ष्य सभी का लगभग एक जैसा होगा—कम मैनेजमेंट लेयर, तेज निर्णय प्रक्रिया और अधिक प्रभावी नेतृत्व। बदलते दौर में नेतृत्व ही बनेगा सबसे बड़ी ताकत AI के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद कंपनियों को अच्छे नेताओं की आवश्यकता बनी रहेगी। फर्क सिर्फ इतना होगा कि भविष्य में वही मैनेजर सबसे अधिक सफल होंगे जो लोगों को प्रेरित कर सकें, भरोसा कायम रखें, कठिन फैसले लें और लगातार बदलते कारोबारी माहौल में अपनी टीम का सही मार्गदर्शन कर सकें।
पटना, एजेंसियां। बिहार के चर्चित यूट्यूबर और जन सुराज नेता मनीष कश्यप एक नए विवाद को लेकर सुर्खियों में हैं। उन्होंने दावा किया था कि उनकी नई टोयोटा इनोवा हाइक्रॉस में E20 पेट्रोल भरवाने के बाद इंजन में गंभीर खराबी आ गई। इस दावे का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद E20 ईंधन को लेकर देशभर में बहस छिड़ गई। टोयोटा ने दावों को किया खारिज टोयोटा किर्लोस्कर मोटर ने वाहन की तकनीकी जांच के बाद कहा कि कार में आई खराबी E20 पेट्रोल की वजह से नहीं, बल्कि ईंधन में पानी/दूषित ईंधन होने के कारण हुई। कंपनी ने स्पष्ट किया कि इनोवा हाइक्रॉस E20 ईंधन के अनुरूप है। मनीष कश्यप के खिलाफ FIR दर्ज मामले के बाद टोयोटा ने मनीष कश्यप के खिलाफ FIR दर्ज कराई है। कंपनी का आरोप है कि बिना तकनीकी पुष्टि के किए गए दावों से उसकी छवि को नुकसान पहुंचा है। रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। सरकार ने भी दी सफाई विवाद बढ़ने पर पेट्रोलियम मंत्रालय ने भी बयान जारी कर कहा कि E20 पेट्रोल पूरी तरह परीक्षण के बाद लागू किया गया है और इससे संबंधित वायरल दावों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिला है। सरकार और ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों ने लोगों से अफवाहों पर विश्वास न करने की अपील की। सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस इस पूरे विवाद के बाद सोशल मीडिया पर E20 पेट्रोल, वाहन सुरक्षा और उपभोक्ता अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है। वहीं, मनीष कश्यप अपने दावों पर कायम हैं, जबकि टोयोटा और सरकार दोनों ने उनके आरोपों को तकनीकी जांच के आधार पर खारिज किया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।