Lok Sabha Speaker

TMC rebel MPs submit memorandum to Lok Sabha Speaker Om Birla seeking recognition as a separate group and merger with NCPI.
TMC में घमासान: बागी सांसदों के दावों पर फैसला लेने से पहले दोनों पक्षों को सुनेंगे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला

  तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी सियासी संकट के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला बागी सांसदों और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी गुट, दोनों पक्षों को सुनने के बाद ही कोई फैसला लेंगे। सूत्रों के अनुसार, टीएमसी से अलग हुए 20 सांसदों ने खुद को अलग समूह के रूप में मान्यता देने और नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का दावा करते हुए लोकसभा में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है। बागी सांसदों ने किया एनसीपीआई में विलय का दावा बागी गुट की नेता काकोली घोष दस्तीदार ने बताया कि लोकसभा अध्यक्ष को सौंपे गए ज्ञापन पर 20 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। उन्होंने दावा किया कि सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का फैसला किया है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने का निर्णय लिया है। टीएमसी का आरोप- केवल दो घंटे पहले दी गई मुलाकात की सूचना ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने आरोप लगाया कि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की सूचना केवल दो घंटे पहले दी गई। टीएमसी सूत्रों के मुताबिक, सोमवार दोपहर करीब दो बजे लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय की ओर से ई-मेल भेजकर शाम चार बजे मुलाकात के लिए कहा गया था। उस समय अभिषेक बनर्जी कोलकाता स्थित ईडी कार्यालय में पूछताछ में सहयोग कर रहे थे। कीर्ति आजाद ने स्पीकर कार्यालय को दी जानकारी सूत्रों के अनुसार, टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय को सूचित किया कि अभिषेक बनर्जी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में शामिल हैं और निर्धारित समय पर उपस्थित नहीं हो पाएंगे। बाद में आजाद ने स्वयं स्पीकर से मुलाकात कर स्थिति से अवगत कराया। कानूनी राय ले सकते हैं लोकसभा अध्यक्ष संसद से जुड़े सूत्रों का कहना है कि लोकसभा अध्यक्ष इस पूरे मामले पर केंद्रीय विधि मंत्रालय और संवैधानिक विशेषज्ञों की राय ले सकते हैं। इस मुद्दे पर कोई भी निर्णय संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले लिया जा सकता है, जो आमतौर पर जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है। संविधान विशेषज्ञों ने उठाए सवाल लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचारी का कहना है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार किसी राजनीतिक दल का विलय केवल राजनीतिक संगठन स्तर पर हो सकता है। सांसद या विधायक अपने स्तर पर किसी दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकते। वहीं, निर्वाचन आयोग के एक पूर्व अधिकारी ने टीएमसी के बागी सांसदों द्वारा एनसीपीआई में विलय की योजना को "असामान्य और कानूनी रूप से जटिल" बताया है। उनका कहना है कि ऐसी स्थिति का स्पष्ट उल्लेख न तो दलबदल विरोधी कानून में है और न ही जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में मिलता है। क्या है एनसीपीआई? नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) ने जनवरी 2023 में खुद को एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत कराया था। निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, इसका मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के संकराईल में स्थित है और राष्ट्रीय राजनीति में इसकी मौजूदगी अब तक सीमित रही है। क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला? अगर बागी सांसदों को अलग समूह के रूप में मान्यता मिलती है, तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति और लोकसभा में टीएमसी की स्थिति पर बड़ा असर डाल सकता है। वहीं, स्पीकर का फैसला दलबदल विरोधी कानून की व्याख्या और संसदीय परंपराओं के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।  

Deepshikha जून 17, 2026 0
Abhishek Banerjee addressing media as he writes to Lok Sabha Speaker seeking recognition of TMC as a unified party.
टीएमसी के बागियों को रोकने की आखिरी कोशिश! अभिषेक बनर्जी ने ओम बिरला को लिखा पत्र, कहा- सदन में TMC को एकल पार्टी माना जाए

  पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी सियासी संकट अब संसद के गलियारों तक पहुंच गया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि सदन में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) को केवल एक संयुक्त और एकल राजनीतिक दल के रूप में ही मान्यता दी जाए। अभिषेक बनर्जी का यह कदम ऐसे समय सामने आया है, जब पार्टी के भीतर बागी सांसदों के अलग गुट बनाने और स्वतंत्र पहचान की मांग के दावों से राजनीतिक हलचल तेज है। बागी गुट को मान्यता नहीं देने की मांग सूत्रों के मुताबिक, अपने पत्र में अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष से अनुरोध किया है कि सदन के भीतर किसी भी ऐसे समूह, धड़े या गुट को आधिकारिक मान्यता, दर्जा या सुविधाएं न दी जाएं, जो स्वयं को ‘असली टीएमसी’ बताने का दावा कर रहा हो। पत्र में कहा गया है कि लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व केवल पार्टी द्वारा अधिकृत नेता और आधिकारिक व्हिप के माध्यम से ही माना जाना चाहिए और पार्टी को एक एकीकृत संसदीय दल के रूप में देखा जाना चाहिए। संसद तक पहुंचा टीएमसी का अंदरूनी संकट पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद टीएमसी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। बागी नेताओं के अलग संसदीय गुट बनाने की अटकलों के बीच अभिषेक बनर्जी का यह पत्र पार्टी नेतृत्व की ओर से एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि कोई बागी गुट संसद में अलग पहचान की मांग करता है, तो उसके संवैधानिक और संसदीय पहलुओं पर अंतिम फैसला लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में होगा। स्पीकर के फैसले पर सबकी नजर अभिषेक बनर्जी के पत्र के बाद दिल्ली और कोलकाता के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।  लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कार्यालय की ओर से अभी तक इस पत्र पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। आने वाले दिनों में स्पीकर का रुख यह तय कर सकता है कि संसद में तृणमूल कांग्रेस एकजुट संसदीय दल के रूप में बनी रहती है या किसी संभावित बागी गुट को अलग पहचान मिलती है।  

Deepshikha जून 15, 2026 0
Lok Sabha Speaker Om Birla during parliamentary session as MPs debate removal motion in Parliament
लोकसभा में आज हो सकता है हंगामा: ओम बिरला को हटाने के प्रस्ताव पर फैसला

  संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण सोमवार, 9 मार्च से शुरू हो रहा है और इसके पहले ही दिन लोकसभा में हंगामे के आसार बन गए हैं। विपक्षी दलों द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने से संबंधित प्रस्ताव पर आज सदन में विचार किया जा सकता है। इस प्रस्ताव को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपने-अपने सांसदों को सदन में मौजूद रहने के लिए व्हिप जारी किया है। लोकसभा के नियमों के अनुसार, पीठासीन अधिकारी द्वारा बुलाए जाने पर कम से कम 50 सांसदों को इस प्रस्ताव के समर्थन में खड़ा होना होगा। यदि 50 सदस्य समर्थन में खड़े होते हैं, तो प्रस्ताव को सदन के विचार के लिए स्वीकार कर लिया जाएगा। इसके बाद इस पर चर्चा और मतदान कराया जाएगा। हालांकि यदि 50 सांसद समर्थन में खड़े नहीं होते हैं, तो प्रस्ताव पेश ही नहीं किया जा सकेगा।   कांग्रेस के सांसद देंगे प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए कांग्रेस के तीन सांसद-मोहम्मद जावेद, के. सुरेश और मल्लू रवि-सदन की अनुमति मांगेंगे। इन सांसदों को प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन जुटाना होगा। यदि आवश्यक समर्थन मिल जाता है तो प्रस्ताव पर चर्चा होगी और इसके बाद मतदान कराया जाएगा।   सदन में मौजूद रह सकते हैं ओम बिरला संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला नोटिस पर विचार के दौरान सदन में उपस्थित रह सकते हैं। वे प्रस्ताव पर अपना पक्ष भी रख सकते हैं और मतदान में हिस्सा भी ले सकते हैं। हालांकि जब इस विषय पर चर्चा होगी, उस दौरान वे सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करेंगे।   भाजपा और कांग्रेस ने जारी किया व्हिप इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ने अपने-अपने सांसदों को सदन में उपस्थित रहने के लिए व्हिप जारी किया है। लोकसभा में वर्तमान संख्या बल को देखते हुए माना जा रहा है कि सरकार के पास स्पष्ट बहुमत है, इसलिए यह संभावना कम मानी जा रही है कि प्रस्ताव आगे बढ़ पाएगा।   तृणमूल कांग्रेस (TMC) का समर्थन तृणमूल कांग्रेस ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन करने का संकेत दिया है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस लोकसभा के कई विपक्षी सदस्यों द्वारा लाए गए इस अविश्वास प्रस्ताव के साथ खड़ी है।   कहां बैठ सकते हैं ओम बिरला? बताया जा रहा है कि यदि प्रस्ताव पर चर्चा होती है तो ओम बिरला सदन में सत्तापक्ष की प्रमुख पंक्तियों में बैठ सकते हैं। हालांकि इस स्थिति को लेकर नियम पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत ऐसे समय में हो रही है जब विपक्ष सरकार को कई मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है। ऐसे में पहले ही दिन लोकसभा में तीखी बहस और हंगामे की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा।  

surbhi मार्च 9, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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kalpana जुलाई 27, 2026 0