यूक्रेन के ओडेसा बंदरगाह से रवाना हुए MV Golden LEO नामक मालवाहक जहाज पर हुए मिसाइल हमले में चार भारतीय नागरिकों की मौत हो गई, जबकि एक अन्य भारतीय गंभीर रूप से घायल हो गया। घटना के बाद भारत सरकार ने हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे निर्दोष नागरिकों और वाणिज्यिक जहाजों पर अस्वीकार्य हमला बताया है। ओडेसा बंदरगाह से निकलते ही हुआ हमला विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, 19 जुलाई 2026 की शाम ओडेसा बंदरगाह से रवाना होते समय MV Golden LEO पर मिसाइल हमला किया गया। उस समय जहाज पर कुल 17 क्रू सदस्य मौजूद थे, जिनमें 5 भारतीय नागरिक भी शामिल थे। मंत्रालय ने बताया कि हमले में चार भारतीय नागरिकों की मौत हो गई, जबकि एक भारतीय नागरिक गंभीर रूप से घायल है और अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है। भारतीय मिशन लगातार स्थिति पर नजर रख रहा विदेश मंत्रालय ने कहा कि यूक्रेन स्थित भारतीय मिशन पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है और प्रभावित भारतीयों को हरसंभव सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। मंत्रालय ने मृतकों के परिजनों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए घायल भारतीय नागरिक के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की है। भारत ने हमले की कड़ी निंदा की भारत सरकार ने कहा कि वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना पूरी तरह अस्वीकार्य है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि निर्दोष क्रू सदस्यों की जान खतरे में डालना और समुद्री व्यापार एवं नौवहन की स्वतंत्रता को बाधित करना निंदनीय है। सरकार ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने और नागरिक जहाजों पर हमलों से बचने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। समुद्री सुरक्षा पर बढ़ी चिंता यह हमला ऐसे समय हुआ है जब क्षेत्र में जारी संघर्ष के कारण ब्लैक सी (काला सागर) में समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वाणिज्यिक जहाजों पर हमले वैश्विक व्यापार और समुद्री परिवहन के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर सकते हैं।
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव पर भारत ने पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने क्षेत्र में लगातार बढ़ते हमलों पर गहरी चिंता जताते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने और तनाव कम करने की अपील की है। भारत ने स्पष्ट कहा कि मौजूदा संकट का स्थायी समाधान सैन्य कार्रवाई से नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों से ही संभव है। पश्चिम एशिया की स्थिति पर भारत की चिंता विदेश मंत्रालय ने बुधवार को जारी बयान में कहा कि हाल के घटनाक्रम, विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों के बाद क्षेत्र की स्थिति और गंभीर हो गई है। मंत्रालय के अनुसार, इससे क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा और स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। भारत ने कहा कि मौजूदा हालात को देखते हुए सभी संबंधित देशों को संयम दिखाना चाहिए और ऐसे कदमों से बचना चाहिए जो तनाव को और बढ़ा सकते हैं। बातचीत और कूटनीति पर दिया जोर भारत ने अपने बयान में कहा कि किसी भी विवाद का शांतिपूर्ण और स्थायी समाधान केवल संवाद और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से ही निकाला जा सकता है। विदेश मंत्रालय ने सभी पक्षों से आग्रह किया कि वे संघर्ष को बढ़ाने के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाएं। ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार पर चिंता भारत ने कहा कि उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को बिना किसी बाधा के जारी रखना शामिल है। विदेश मंत्रालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए और ऐसी किसी भी कार्रवाई से बचना चाहिए जिससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो। हमलों के बाद बढ़ा तनाव मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कथित तौर पर ईरान की ओर से हुए हमलों के जवाब में अमेरिका ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर कार्रवाई की है। वहीं, ईरान की ओर से कुवैत और बहरीन की दिशा में मिसाइलें दागे जाने की भी खबरें सामने आई हैं। इन घटनाओं के बाद क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है और बड़े सैन्य संघर्ष की आशंकाएं भी तेज हो गई हैं। ट्रंप ने दी आगे की कार्रवाई की चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि हालिया घटनाओं के बाद युद्ध-विराम की स्थिति समाप्त हो चुकी है और अमेरिका आगे की सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार है। उनके इस बयान के बाद पूरे पश्चिम एशिया में हालात और अधिक संवेदनशील हो गए हैं। भारत ने ऐसे समय में संयम और कूटनीति की अपील करते हुए स्पष्ट संकेत दिया है कि वह क्षेत्र में शांति, स्थिरता और संवाद के पक्ष में है।
नई दिल्ली: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर विदेश मंत्रालय (MEA) के नाम का दुरुपयोग कर लोगों को ठगने का मामला सामने आया है। कुछ फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट खुद को विदेश मंत्रालय का सलाहकार बताकर व्यापार, प्रवासन (Migration) और अन्य नीतिगत मामलों में विशेषज्ञ होने का दावा कर रहे हैं। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए विदेश मंत्रालय ने आम जनता के लिए आधिकारिक चेतावनी जारी की है। विदेश मंत्रालय ने फर्जी दावों से किया किनारा विदेश मंत्रालय के आधिकारिक फैक्ट-चेक X (पूर्व में ट्विटर) हैंडल पर जारी बयान में कहा गया कि मंत्रालय के संज्ञान में आया है कि कुछ लोग सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट साझा कर रहे हैं, जिनसे यह आभास होता है कि वे व्यापार, माइग्रेशन और अन्य नीतिगत विषयों पर विदेश मंत्रालय को सलाह दे रहे हैं। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे किसी भी व्यक्ति या संस्था का विदेश मंत्रालय से कोई संबंध नहीं है और उनके दावे पूरी तरह भ्रामक हैं। पैसे लेकर ट्रेनिंग और सलाह देने का झांसा विदेश मंत्रालय के मुताबिक, ये फर्जी अकाउंट केवल झूठे दावे ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि मंत्रालय के साथ काम करने का तरीका सिखाने और नीतिगत मामलों में मार्गदर्शन देने के नाम पर लोगों से पैसे भी वसूल रहे हैं। बताया गया कि कुछ लोग सशुल्क (Paid) ट्रेनिंग सेशन, वेबिनार और सलाहकारी कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को ठगी का शिकार बना रहे हैं। MEA ने लोगों से की सतर्क रहने की अपील विदेश मंत्रालय ने नागरिकों से अपील करते हुए कहा कि वे सोशल मीडिया पर प्रसारित ऐसे किसी भी भ्रामक पोस्ट, विज्ञापन या दावे पर भरोसा न करें। मंत्रालय ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति खुद को विदेश मंत्रालय का सलाहकार बताकर पैसे मांगता है या किसी ट्रेनिंग कार्यक्रम में शामिल होने के लिए शुल्क लेता है, तो उससे सावधान रहें। ऐसे करें खुद का बचाव विदेश मंत्रालय ने लोगों को सलाह दी है कि— केवल विदेश मंत्रालय के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट और वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी पर ही भरोसा करें। किसी भी व्यक्ति के मंत्रालय से जुड़े होने के दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करें। सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाले सशुल्क सलाहकार या ट्रेनिंग कार्यक्रमों से पहले पूरी जांच-पड़ताल करें। किसी भी संदिग्ध गतिविधि या फर्जी अकाउंट की जानकारी संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और साइबर अपराध पोर्टल पर दें। विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि वह सोशल मीडिया के माध्यम से इस तरह की निजी सलाहकार सेवाएं या सशुल्क प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित नहीं करता है। लोगों से अपील की गई है कि वे सतर्क रहें और किसी भी फर्जी दावे के झांसे में आकर आर्थिक नुकसान न उठाएं।
विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs) के उस बयान के बाद राजनीतिक विवाद गहरा गया है, जिसमें कहा गया कि पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज है और इसे नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी को लेकर कांग्रेस, AIMIM और एनसीपी (शरद पवार गुट) सहित विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का कहना है कि इस बयान से आम जनता में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। सरकार के बयान पर विवाद की शुरुआत विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि पासपोर्ट मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला दस्तावेज है और यह नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है। मंत्रालय ने कहा कि यह कानूनी स्थिति नई नहीं है और लंबे समय से लागू है। इसी बयान के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया। कांग्रेस का सवाल—नागरिकता साबित कैसे हो? कांग्रेस नेता Supriya Shrinate ने सरकार पर निशाना साधते हुए पूछा कि यदि पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी जैसे दस्तावेज भी नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं, तो फिर आम नागरिक अपनी नागरिकता कैसे साबित करे। उन्होंने इसे जनता के लिए भ्रम पैदा करने वाला मुद्दा बताया। ओवैसी ने उठाए कानूनी सवाल AIMIM प्रमुख Asaduddin Owaisi ने भी सरकार की टिप्पणी पर सवाल उठाते हुए कहा कि कानून के अनुसार पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा है तो नागरिकता के प्रमाण को लेकर स्पष्टता जरूरी है। एनसीपी (शरद पवार) का हमला एनसीपी (शरदचंद्र पवार गुट) के प्रवक्ता ने कहा कि पहले आधार कार्ड, फिर वोटर आईडी और अब पासपोर्ट—लगातार प्रमुख दस्तावेजों की वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। उन्होंने पूछा कि यदि ये सभी प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं तो नागरिकता साबित करने का वास्तविक आधार क्या है। राजनीतिक बहस तेज यह मुद्दा अब संसद से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा का केंद्र बन गया है। विपक्ष सरकार से नागरिकता प्रमाण को लेकर स्पष्ट नीति की मांग कर रहा है, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि पासपोर्ट नियमों में कोई बदलाव नहीं हुआ है और बयान केवल मौजूदा कानूनी स्थिति की व्याख्या है।
नई दिल्ली: विदेश मंत्रालय (MEA) के एक हालिया बयान के बाद भारतीय नागरिकता को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। आमतौर पर पासपोर्ट को किसी व्यक्ति की पहचान और राष्ट्रीयता का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है, लेकिन विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट अपने आप में भारतीय नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं है। इस बयान के बाद लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि यदि पासपोर्ट भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो आखिर भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कौन-से दस्तावेज मान्य हैं? पासपोर्ट क्यों माना जाता है महत्वपूर्ण दस्तावेज? पासपोर्ट वह आधिकारिक दस्तावेज है, जिसके आधार पर कोई भारतीय नागरिक विदेश यात्रा कर सकता है, अन्य देशों में अपनी पहचान स्थापित कर सकता है और विदेश में किसी आपात स्थिति में भारतीय दूतावास से सहायता प्राप्त कर सकता है। पासपोर्ट जारी करने से पहले सरकार आवेदक के दस्तावेजों की जांच करती है और कई मामलों में पुलिस सत्यापन भी कराया जाता है। इसी वजह से अधिकांश लोग इसे नागरिकता का सबसे मजबूत प्रमाण मानते हैं। फिर पासपोर्ट को अंतिम प्रमाण क्यों नहीं माना जाता? विदेश मंत्रालय के अनुसार, पासपोर्ट नागरिकता का एक महत्वपूर्ण प्रमाण जरूर है, लेकिन यह अंतिम और निर्विवाद प्रमाण नहीं है। इसका मुख्य कारण यह है कि यदि बाद में यह साबित हो जाए कि किसी व्यक्ति ने गलत जानकारी, फर्जी दस्तावेज या झूठे दावे के आधार पर पासपोर्ट प्राप्त किया है, तो सरकार उसके पासपोर्ट को रद्द या जब्त कर सकती है। यानी पासपोर्ट नागरिकता की पुष्टि करने वाला दस्तावेज है, लेकिन उसकी वैधता मूल दस्तावेजों और कानूनी स्थिति पर निर्भर करती है। पासपोर्ट अधिनियम क्या कहता है? पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत केवल भारतीय नागरिकों को ही पासपोर्ट जारी किया जा सकता है। आवेदन प्रक्रिया के दौरान संबंधित अधिकारी यह सुनिश्चित करते हैं कि आवेदक भारतीय नागरिक है। यदि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है, तो उसे पासपोर्ट जारी नहीं किया जा सकता। कानून सरकार को यह अधिकार भी देता है कि यदि बाद में नागरिकता संबंधी जानकारी गलत पाई जाती है, तो पासपोर्ट निरस्त किया जा सकता है। भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज मान्य हैं? भारतीय नागरिकता का निर्धारण मुख्य रूप से नागरिकता अधिनियम, 1955 और उससे जुड़े नियमों के आधार पर किया जाता है। परिस्थितियों के अनुसार निम्नलिखित दस्तावेज नागरिकता साबित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं— जन्म प्रमाण पत्र माता-पिता की नागरिकता से जुड़े दस्तावेज नागरिकता प्रमाणपत्र (यदि नागरिकता पंजीकरण या प्राकृतिककरण के माध्यम से प्राप्त हुई हो) भारतीय पासपोर्ट सरकारी अभिलेखों में दर्ज नागरिकता संबंधी रिकॉर्ड अन्य सहायक दस्तावेज, जिन्हें सक्षम प्राधिकारी स्वीकार करे क्यों बढ़ी है इस मुद्दे पर चर्चा? हाल के वर्षों में मतदाता सूची संशोधन, नागरिकता सत्यापन और पहचान से जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हुई है। ऐसे में विदेश मंत्रालय के इस बयान ने नागरिकता और पहचान से जुड़े कानूनी पहलुओं को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि पासपोर्ट एक मजबूत और विश्वसनीय दस्तावेज है, लेकिन नागरिकता का अंतिम निर्धारण कानून और मूल अभिलेखों के आधार पर ही किया जाता है। नागरिकों के लिए क्या है संदेश? यदि आपके पास वैध भारतीय पासपोर्ट है तो सामान्य परिस्थितियों में आपकी पहचान और नागरिकता पर कोई सवाल नहीं उठता। नागरिकता से जुड़े किसी कानूनी विवाद या जांच की स्थिति में सरकार मूल दस्तावेजों और कानूनी रिकॉर्ड के आधार पर अंतिम निर्णय ले सकती है। यही कारण है कि नागरिकता से जुड़े सभी मूल दस्तावेजों को सुरक्षित रखना और उनकी जानकारी अद्यतन रखना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
ओमान के तट के निकट भारतीय चालक दल वाले एक वाणिज्यिक जहाज पर हुए हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। इस घटना में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई, जिसके बाद ईरान ने अमेरिकी कार्रवाई की कड़ी आलोचना की है। वहीं भारत ने भी घटना की निंदा करते हुए क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर चिंता व्यक्त की है। ईरान ने अमेरिकी कार्रवाई की आलोचना की ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी बयान में भारतीय नागरिकों की मौत पर शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस घटना ने समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। बगाई ने अमेरिकी कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को समुद्री मार्गों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए। भारतीय नागरिकों के प्रति जताई संवेदना ईरानी प्रवक्ता ने मृत भारतीय नाविकों के परिवारों, मित्रों, भारतीय जनता और भारत सरकार के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि निर्दोष नागरिकों की मौत किसी भी परिस्थिति में दुखद है और ऐसी घटनाओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। भारत ने भी की हमले की निंदा भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने ओमान के तट के पास वाणिज्यिक जहाज ‘सेटेबेलो’ पर हुए हमले की निंदा की। मंत्रालय ने बताया कि जहाज पर सवार 24 भारतीय चालक दल के सदस्यों में से 21 को सुरक्षित बचा लिया गया था, जबकि तीन भारतीयों के लापता होने की सूचना मिली थी। बाद में खोज एवं बचाव अभियान के दौरान तीनों नाविकों के शव बरामद किए गए। मृत भारतीय नाविकों की पहचान केंद्रीय शिपिंग मंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने मृतकों की पहचान की पुष्टि करते हुए शोक व्यक्त किया। मृत नाविकों में: हिमाचल प्रदेश के डेक कैडेट आदित्य शर्मा उत्तर प्रदेश के इंजन फिटर शिवानंद चौरसिया आंध्र प्रदेश के चीफ इंजीनियर पटनाला सुरेश शामिल थे। ये सभी पलाऊ के झंडे वाले जहाज एमटी सेटेबेलो के चालक दल का हिस्सा थे। होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर भारत की चिंता विदेश मंत्रालय ने कहा कि क्षेत्र में वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं। मंत्रालय के अनुसार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय नौवहन की सुरक्षा सुनिश्चित करना वैश्विक समुदाय की साझा जिम्मेदारी है। भारत ने कहा कि क्षेत्र में जारी संघर्ष और अस्थिरता का असर अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर पड़ रहा है, जिससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है। कूटनीतिक समाधान पर जोर भारत ने सभी पक्षों से संयम बरतने और तनाव कम करने की अपील दोहराई है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि मौजूदा विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से निकाला जाना चाहिए। बयान में कहा गया कि क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता के लिए जारी कूटनीतिक प्रयासों को आगे बढ़ाना आवश्यक है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
नई दिल्ली: ओमान के तट के पास एक वाणिज्यिक जहाज पर हुए हमले के बाद भारत ने कड़ा कूटनीतिक रुख अपनाया है। हमले में चालक दल के 24 भारतीय सदस्यों में से तीन अब भी लापता बताए जा रहे हैं। घटना पर गंभीर चिंता जताते हुए भारत सरकार ने अमेरिका के चार्ज डी’अफेयर्स जेसन मीक्स को तलब कर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। 24 भारतीय सवार, 21 को सुरक्षित निकाला गया विदेश मंत्रालय के अनुसार, हमले के समय कमर्शियल पोत सेट्टेबेलो पर 24 भारतीय चालक दल के सदस्य मौजूद थे। इनमें से 21 को सुरक्षित बचा लिया गया है, जबकि तीन भारतीयों की तलाश जारी है। ओमान में स्थित भारतीय दूतावास स्थानीय प्रशासन और संबंधित एजेंसियों के साथ मिलकर खोज एवं बचाव अभियान की निगरानी कर रहा है। लापता भारतीयों का पता लगाने के लिए प्रयास लगातार जारी हैं। भारत ने अमेरिका के सामने दर्ज कराया विरोध सरकारी सूत्रों के मुताबिक, विदेश मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव (अमेरिका) नागराज नायडू ने अमेरिकी चार्ज डी’अफेयर्स जेसन मीक्स को तलब कर घटना पर भारत की चिंता और आपत्ति से अवगत कराया। भारत ने क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और नागरिक जहाजों पर हो रहे हमलों को गंभीर सुरक्षा चुनौती बताते हुए ऐसे घटनाक्रमों पर चिंता व्यक्त की है। व्यावसायिक जहाजों को निशाना बनाना अस्वीकार्य: भारत विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि ओमान तट के निकट वाणिज्यिक पोत पर हुआ हमला बेहद चिंताजनक है। मंत्रालय ने जोर देकर कहा कि कमर्शियल जहाजों और नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की घटनाएं तुरंत बंद होनी चाहिए। भारत ने सभी पक्षों से संयम बरतने और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का आग्रह किया है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव बना चिंता का कारण विदेश मंत्रालय का मानना है कि हाल के दिनों में जहाजों पर बढ़ते हमले पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और क्षेत्रीय तनाव का परिणाम हैं। भारत ने सभी संबंधित देशों से कूटनीतिक समाधान की दिशा में प्रयास तेज करने और तनाव कम करने की अपील की है। भारत ने कहा कि क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक समुद्री व्यापार की सुरक्षा के लिए संवाद और शांति ही सबसे प्रभावी रास्ता है। दो दिन पहले भी भारतीयों वाला जहाज बना था निशाना इस घटना से पहले सोमवार को पलाऊ के झंडे वाले तेल टैंकर एमटी मारिवेक्स पर भी हमला हुआ था। उस जहाज में सवार 24 भारतीय चालक दल के सदस्यों को सुरक्षित बचा लिया गया था। भारत सरकार ने उस समय बचाव अभियान में सहयोग के लिए ओमान सरकार का आभार व्यक्त किया था। लगातार दो जहाजों पर हुए हमलों ने क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं। लापता भारतीयों की सुरक्षित वापसी पर फोकस सरकार ने स्पष्ट किया है कि उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता लापता तीन भारतीय नागरिकों का जल्द से जल्द पता लगाना और उनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करना है। विदेश मंत्रालय स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और ओमान सहित संबंधित देशों के संपर्क में है।
भारत सरकार ने देश में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई तेज करने के संकेत दिए हैं। विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि कानून के अनुसार सभी अवैध विदेशी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और राष्ट्रीयता की पुष्टि होने के बाद बांग्लादेशी नागरिकों को उनके देश वापस भेजा जाएगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया ब्रीफिंग के दौरान बताया कि भारत ने 2,680 से अधिक संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों से जुड़े मामलों की सूची ढाका को सौंपी है। इन मामलों में संबंधित व्यक्तियों की नागरिकता की पुष्टि की जानी है। नागरिकता की पुष्टि के बाद होगी कार्रवाई विदेश मंत्रालय के अनुसार, कई मामलों में सत्यापन प्रक्रिया पिछले पांच वर्षों से लंबित है। भारत को उम्मीद है कि बांग्लादेश सरकार जल्द इन मामलों पर जवाब देगी ताकि निर्वासन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सके। रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत और बांग्लादेश के बीच मौजूद द्विपक्षीय समझौतों के तहत अवैध रूप से रह रहे लोगों को वापस भेजने की कार्रवाई की जाएगी। नस्लवाद पर भारत का सख्त रुख अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ कथित नस्लीय भेदभाव से जुड़े वायरल वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि किसी भी प्रकार का नस्लवाद स्वीकार्य नहीं है। जायसवाल ने कहा कि भारत नस्लवाद के हर रूप की निंदा करता है और विदेशों में भारतीय नागरिकों के साथ होने वाले भेदभाव को गंभीरता से लेता है। उन्होंने कहा कि भारतीयों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा भारत की प्राथमिकता है। आसियान देशों के साथ व्यापार वार्ता जारी विदेश मंत्रालय ने बताया कि आसियान देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर बातचीत जारी है। फिलहाल इस संबंध में कोई नई जानकारी साझा नहीं की गई है। सरकार का कहना है कि क्षेत्रीय व्यापार सहयोग को मजबूत करने के लिए वार्ता लगातार जारी है। म्यांमार राष्ट्रपति की होगी पहली आधिकारिक भारत यात्रा विदेश मंत्रालय ने जानकारी दी कि म्यांमार के राष्ट्रपति जल्द भारत की आधिकारिक यात्रा पर आएंगे। यह उनकी पहली आधिकारिक भारत यात्रा होगी। भारत ने म्यांमार को अपनी ‘नेबरहुड फर्स्ट’, ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘महासागर’ नीति का महत्वपूर्ण साझेदार बताया है। माना जा रहा है कि इस यात्रा से दोनों देशों के संबंध और मजबूत होंगे। फारस की खाड़ी में अब भी मौजूद हैं 11 भारतीय जहाज विदेश मंत्रालय के अनुसार, फारस की खाड़ी क्षेत्र में अभी भी 11 भारतीय ध्वज वाले जहाज मौजूद हैं। वहीं 14 भारतीय जहाज सुरक्षित रूप से वापस लौट चुके हैं। अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुई अनिश्चितता के कारण हाल के महीनों में समुद्री यातायात प्रभावित हुआ था। भारत स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। इजराइल के साथ संबंधों पर भी दिया बयान इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के हालिया बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत और इजराइल के संबंध मजबूत, मित्रवत और सौहार्दपूर्ण हैं। हाल ही में नेतन्याहू ने भारत को एक बड़ी वैश्विक शक्ति बताते हुए कहा था कि भारतीय जनता के बीच इजराइल के प्रति सकारात्मक भावना देखने को मिलती है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग कई क्षेत्रों में लगातार मजबूत हो रहा है।
सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू हुआ कूटनीतिक विवाद अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एक पॉडकास्टर की विवादित पोस्ट को शेयर किए जाने के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में हल्का तनाव देखने को मिला है। इस पोस्ट में भारत को “hell-hole” जैसे आपत्तिजनक शब्दों से संबोधित किया गया था, जिससे राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। भारत सरकार की कड़ी प्रतिक्रिया: “अज्ञानपूर्ण और अस्वीकार्य टिप्पणी” भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस मामले पर स्पष्ट और सख्त बयान जारी किया। मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि सोशल मीडिया पर की गई यह टिप्पणी “स्पष्ट रूप से अज्ञानपूर्ण, अनुचित और खराब स्वाद वाली” है। MEA ने यह भी कहा कि ये टिप्पणियां भारत-अमेरिका संबंधों की वास्तविकता को नहीं दर्शातीं, जो लंबे समय से आपसी सम्मान और साझा हितों पर आधारित रहे हैं। अमेरिका की सफाई और बैकफुट पर बयान विवाद बढ़ने के बाद अमेरिकी दूतावास की ओर से एक स्पष्टीकरण जारी किया गया। इसमें कहा गया कि डोनाल्ड ट्रंप भारत को एक “महान देश” मानते हैं और वहां के नेतृत्व के प्रति उनके सकारात्मक संबंध हैं। यह बयान भारतीय मीडिया में उठे सवालों के जवाब में दिया गया, ताकि विवाद को शांत किया जा सके। सोशल मीडिया पोस्ट पर हंगामा और वैश्विक प्रतिक्रिया यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब ट्रंप ने एक रेडियो होस्ट की टिप्पणी साझा की थी, जिसमें भारत, चीन और कुछ अन्य देशों को आपत्तिजनक शब्दों से संबोधित किया गया था। पोस्ट वायरल होते ही सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई। भारतीय मूल के संगठनों ने भी इस पर नाराजगी जताई। हिंदू-अमेरिकन फाउंडेशन ने कहा कि ऐसी टिप्पणियां भारतीय और एशियाई समुदायों के खिलाफ नफरत को बढ़ावा देती हैं और सामाजिक तनाव को और बढ़ा सकती हैं। भारत-अमेरिका संबंधों पर असर की चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की बयानबाजी से दोनों देशों के रिश्तों पर अस्थायी असर पड़ सकता है, हालांकि सरकारों के बीच औपचारिक कूटनीतिक संवाद अभी भी मजबूत बना हुआ है। MEA ने अपने बयान में साफ किया कि दोनों देशों के बीच साझेदारी रणनीतिक और लंबे समय से स्थिर रही है, जिसे इस तरह की व्यक्तिगत टिप्पणियां प्रभावित नहीं कर सकतीं। राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई भारत में राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देखने को मिली। कई नेताओं ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर इस बयान की आलोचना की और इसे भारत की छवि के खिलाफ बताया। कूटनीति मजबूत, लेकिन बयानबाजी से तनाव पूरा विवाद भले ही सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू हुआ हो, लेकिन इसने एक बार फिर यह दिखाया कि वैश्विक राजनीति में शब्दों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सम्मान और तथ्यहीन टिप्पणियों के बीच संतुलन जरूरी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।