Primary Sclerosing Cholangitis (PSC) जैसी गंभीर लिवर बीमारी के जोखिम का पहले से ज्यादा सटीक अनुमान लगाने में अब नई इमेजिंग तकनीक मदद कर सकती है। एक अंतरराष्ट्रीय मल्टी-सेंटर स्टडी में दावा किया गया है कि Quantitative MRCP यानी मैग्नेटिक रेजोनेंस कोलांजियोपैंक्रियाटोग्राफी आधारित नई तकनीक PSC मरीजों में बीमारी की गंभीरता और भविष्य के जोखिम को बेहतर तरीके से पहचान सकती है। क्या है PSC बीमारी? Primary Sclerosing Cholangitis एक क्रॉनिक लिवर डिजीज है, जिसमें बाइल डक्ट्स यानी पित्त नलिकाओं में सूजन और फाइब्रोसिस होने लगता है। इससे धीरे-धीरे: लिवर को नुकसान पहुंचता है बाइल डक्ट्स संकरी हो जाती हैं और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है इस बीमारी में: Cholangiocarcinoma (बाइल डक्ट कैंसर) और Gallbladder Carcinoma (गॉलब्लैडर कैंसर) का जोखिम भी बढ़ जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक PSC का पता चलने के बाद मरीजों में लिवर ट्रांसप्लांट या मृत्यु तक का औसत समय लगभग 13 से 21 साल माना जाता है। फिलहाल लिवर ट्रांसप्लांट ही इसका एकमात्र स्थायी इलाज है। स्टडी में क्या सामने आया? इस रिसर्च में 457 PSC मरीजों के Quantitative MRCP डेटा का विश्लेषण किया गया। इनमें से 320 मरीजों पर विस्तृत प्रोग्नोस्टिक एनालिसिस किया गया। शोधकर्ताओं ने एक नया रिस्क मॉडल तैयार किया जिसमें: MRCP इमेजिंग डेटा उम्र Inflammatory Bowel Disease की स्थिति लिवर बायोकेमिस्ट्री और बाइल डक्ट्स में बदलाव जैसे फैक्टर्स शामिल किए गए। पुराने स्कोरिंग सिस्टम से बेहतर निकला मॉडल रिसर्च में पाया गया कि Quantitative MRCP आधारित नया मॉडल PSC के जोखिम का अनुमान लगाने में मौजूदा कई स्कोरिंग सिस्टम्स से बेहतर साबित हुआ। यह मॉडल: MayoRisk Score और अन्य पारंपरिक प्रोग्नोस्टिक मॉडल्स से ज्यादा सटीक पाया गया। Bootstrap analysis में qmAOM मॉडल का प्रदर्शन: qmAOM: 0.82 AOM: 0.75 M+BA: 0.70 रिकॉर्ड किया गया। डॉक्टरों को कैसे मिलेगा फायदा? अभी तक PSC की जांच में इस्तेमाल होने वाले कई रेडियोलॉजिकल स्कोरिंग सिस्टम डॉक्टरों की विजुअल व्याख्या पर निर्भर करते हैं। इससे अलग-अलग विशेषज्ञों के बीच रिपोर्टिंग में अंतर आ सकता है। लेकिन नई MRCP+ तकनीक: एल्गोरिदम आधारित है ऑब्जेक्टिव डेटा देती है और इंटरऑब्जर्वर वैरिएशन कम करती है यानी मरीज की स्थिति का ज्यादा भरोसेमंद आकलन संभव हो सकता है। दवा रिसर्च में भी मिल सकती है मदद शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में: PSC के लिए नई दवाओं के ट्रायल क्लिनिकल रिसर्च और प्रोग्नोस्टिक टूल्स को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।
यूरोप में न्यूरोइमेजिंग यानी दिमाग और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों की जांच के लिए इस्तेमाल होने वाले CT और MRI स्कैन का उपयोग पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। नई स्टडी के मुताबिक 2015 से 2022 के बीच यूरोप के 29 देशों में CT और MRI जांचों की संख्या 40% से ज्यादा बढ़ गई। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बढ़ती निर्भरता जहां बेहतर डायग्नोसिस की ओर इशारा करती है, वहीं दूसरी तरफ हेल्थकेयर सिस्टम पर बढ़ते दबाव और रेडियोलॉजिस्ट्स में बर्नआउट जैसी चिंताएं भी सामने ला रही है। किन बीमारियों में बढ़ा इस्तेमाल? Neuroimaging का इस्तेमाल खासतौर पर इन बीमारियों की पहचान और निगरानी में किया जाता है: Stroke Brain Tumor Multiple Sclerosis CT और MRI स्कैन में कितनी बढ़ोतरी हुई? स्टडी में Eurostat और OECD के डेटा का विश्लेषण किया गया। CT स्कैन 2015 में: प्रति 1 लाख आबादी पर 10,872 स्कैन 2022 में: बढ़कर 15,312 स्कैन कुल वृद्धि: 40.8% MRI स्कैन 2015 में: प्रति 1 लाख आबादी पर 5,746 स्कैन 2022 में: बढ़कर 8,244 स्कैन कुल वृद्धि: 43.5% स्कैन मशीनों की संख्या उतनी तेजी से नहीं बढ़ी जहां स्कैनिंग की मांग तेजी से बढ़ी, वहीं इंफ्रास्ट्रक्चर उतनी रफ्तार से नहीं बढ़ पाया। CT स्कैनर 2015: प्रति 1 लाख आबादी पर 2.3 मशीनें 2022: बढ़कर 2.68 MRI स्कैनर 2015: 1.43 मशीनें 2022: बढ़कर 2.11 रिपोर्ट के मुताबिक: पश्चिमी यूरोप में सबसे ज्यादा स्कैनिंग हुई जबकि पूर्वी यूरोप में सबसे तेज ग्रोथ दर्ज की गई हालांकि कोविड-19 महामारी के दौरान 2020 में स्कैनिंग गतिविधियों में अस्थायी गिरावट देखी गई थी। क्यों बढ़ रही है Neuroimaging की जरूरत? विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं: 1. बदलते इलाज के तरीके अब स्ट्रोक जैसी बीमारियों में: मल्टीमोडल इमेजिंग और परफ्यूजन स्टडीज का इस्तेमाल बढ़ गया है। 2. उम्रदराज आबादी यूरोपीय यूनियन की 20% से ज्यादा आबादी अब 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र की है। बढ़ती उम्र के साथ दिमाग और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ता है। 3. बेहतर तकनीक नई इमेजिंग तकनीक: ज्यादा तेज ज्यादा सटीक और पहले से ज्यादा आसानी से उपलब्ध हो गई है, जिससे डॉक्टर ज्यादा स्कैन लिख रहे हैं। बढ़ती चिंता: रेडियोलॉजिस्ट्स पर दबाव स्टडी में चेतावनी दी गई है कि स्कैन की संख्या इंफ्रास्ट्रक्चर और वर्कफोर्स की तुलना में तेजी से बढ़ रही है। इससे: वेटिंग टाइम बढ़ सकता है डॉक्टरों पर काम का दबाव बढ़ सकता है और बर्नआउट का खतरा बढ़ सकता है रिपोर्ट के अनुसार रेडियोलॉजी क्षेत्र में बर्नआउट की दर 33% से 88% तक देखी गई है। “Low-Value Imaging” पर भी सवाल रिसर्चर्स ने “Low-Value Imaging” को लेकर भी चिंता जताई। इसका मतलब ऐसे स्कैन से है जिनका मरीज को बहुत कम या कोई वास्तविक क्लिनिकल फायदा नहीं होता। अनुमान है कि दुनियाभर में: 20% से 50% तक इमेजिंग टेस्ट कम उपयोगी या अनावश्यक हो सकते हैं। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि यूरोप में Evidence-Based Imaging Guidelines को और मजबूत करने की जरूरत है ताकि संसाधनों का सही इस्तेमाल हो सके और मरीजों को बेहतर देखभाल मिलती रहे।
King’s College London और University of Porto के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च में यह सामने आया है कि दिमाग में मौजूद Histamine केवल एलर्जी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, याददाश्त, भावनाओं और व्यवहार को भी गहराई से प्रभावित कर सकता है। शोधकर्ताओं ने पहली बार ऐसा विस्तृत “Brain Histamine Map” तैयार किया है, जो यह दिखाता है कि जीवन के अलग-अलग चरणों में Histamine से जुड़े जीन दिमाग के विकास, सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक बीमारियों से कैसे जुड़े होते हैं। Histamine सिर्फ एलर्जी तक सीमित नहीं आमतौर पर Histamine को एलर्जी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यह दिमाग में एक महत्वपूर्ण न्यूरोमॉड्यूलेटर की तरह काम करता है। यह कई जरूरी कार्यों में भूमिका निभाता है, जैसे: भावनाओं को नियंत्रित करना नींद और जागने का चक्र याददाश्त व्यवहारिक लचीलापन सीखने की क्षमता लाखों डेटा पॉइंट्स का किया गया विश्लेषण इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने कई आधुनिक तकनीकों और डेटा सेट्स का इस्तेमाल किया। अध्ययन में शामिल थे: 49,495 brain cell nuclei का RNA sequencing analysis 24 से 57 वर्ष की उम्र के postmortem brain samples गर्भावस्था के 8 सप्ताह से लेकर 40 वर्ष तक के developmental brain data PET imaging और neurotransmitter receptor mapping इन सभी डेटा को मिलाकर वैज्ञानिकों ने दिमाग में Histamine सिस्टम का विस्तृत अध्ययन किया। मानसिक बीमारियों से मिला सीधा संबंध रिसर्च में पाया गया कि Histamine receptors का संबंध कई मानसिक और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से हो सकता है। वैज्ञानिकों ने Histamine expression patterns को इन स्थितियों से जुड़ा पाया: Attention Deficit Hyperactivity Disorder Major Depressive Disorder Schizophrenia Anorexia Nervosa शोधकर्ताओं के अनुसार दिमाग के frontal और limbic क्षेत्रों में Histamine activity ज्यादा देखी गई, जबकि occipital cortex में इसका स्तर कम पाया गया। उम्र के साथ बदलता है Histamine सिस्टम अध्ययन में यह भी सामने आया कि: Histidine decarboxylase नामक enzyme का स्तर शुरुआती विकास में सबसे ज्यादा था जबकि H3 receptor expression उम्र बढ़ने के साथ adulthood तक बढ़ता गया इससे संकेत मिलता है कि Histamine सिस्टम जीवनभर दिमाग के विकास और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। भविष्य में नई मानसिक स्वास्थ्य थेरेपी का रास्ता वैज्ञानिकों का मानना है कि यह रिसर्च मानसिक बीमारियों के इलाज में नई संभावनाएं खोल सकती है। यह “Brain Histamine Atlas” भविष्य में: Depression ADHD Schizophrenia Neurodevelopmental disorders के लिए targeted therapies विकसित करने में मदद कर सकता है। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि अभी और रिसर्च की जरूरत है, ताकि यह समझा जा सके कि Histamine signaling को नियंत्रित करके मानसिक स्वास्थ्य उपचार को कितना बेहतर बनाया जा सकता है।
अस्थमा को अब तक मुख्य रूप से मरीज के लक्षणों और हालिया अटैक (exacerbation) के आधार पर नियंत्रित या स्थिर माना जाता रहा है। लेकिन एक नई रिसर्च ने इस धारणा को चुनौती देते हुए दिखाया है कि समान लक्षणों वाले अस्थमा मरीजों के शरीर में बीमारी की जैविक गतिविधियां पूरी तरह अलग हो सकती हैं। हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने मेटाबोलोमिक्स-आधारित ब्लड एनालिसिस के जरिए अस्थमा के ऐसे छिपे हुए जैविक सबटाइप (endotypes) की पहचान की है, जो सामान्य क्लिनिकल जांच में दिखाई नहीं देते। यह रिसर्च भविष्य में अस्थमा के इलाज को अधिक व्यक्तिगत और सटीक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। क्या था अध्ययन का उद्देश्य? यह एक prospective observational study थी, जिसमें उन वयस्क मरीजों को शामिल किया गया जो नियमित inhaled corticosteroid therapy ले रहे थे और जिनका अस्थमा क्लिनिकली “well-controlled” माना जा रहा था। शोधकर्ताओं का उद्देश्य यह जानना था कि क्या खून में मौजूद मेटाबोलाइट्स की प्रोफाइलिंग के जरिए बीमारी के भीतर चल रही अलग-अलग जैविक प्रक्रियाओं को पहचाना जा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने liquid chromatography–tandem mass spectrometry तकनीक का उपयोग करते हुए untargeted plasma metabolomic profiling की। इसके बाद consensus clustering analysis के माध्यम से मरीजों को तीन अलग-अलग जैविक समूहों में वर्गीकृत किया गया। तीन अलग-अलग अस्थमा एंडोटाइप की पहचान अध्ययन में पाया गया कि भले ही सभी मरीजों में लक्षण और हालिया अटैक लगभग समान थे, लेकिन फेफड़ों की कार्यक्षमता, एयरवे की संरचना और इम्यून सिस्टम की गतिविधियों में बड़ा अंतर मौजूद था। 1. “Remodeling-Prone” समूह (C1) इस समूह के मरीजों में glycerophospholipid-related metabolites की मात्रा अधिक पाई गई। इन मरीजों में: Post-bronchodilator FEV1 कम था एयरवे वॉल्स अधिक मोटी थीं Innate lymphoid cells का स्तर बढ़ा हुआ था वैज्ञानिकों के अनुसार यह संकेत देता है कि मरीजों में लक्षण नियंत्रित होने के बावजूद फेफड़ों की संरचना में बदलाव और एयरवे remodeling की प्रक्रिया जारी रह सकती है। 2. “Biologically Stable” समूह (C2) यह समूह सबसे अधिक स्थिर माना गया। इन मरीजों में: एयरवे वॉल्स पतली थीं Post-bronchodilator FEV1 बेहतर था फेफड़ों की संरचना अपेक्षाकृत सामान्य बनी हुई थी रिसर्चर्स का मानना है कि यह समूह वास्तव में नियंत्रित बीमारी वाले मरीजों का प्रतिनिधित्व कर सकता है। 3. “T2-High” समूह (C3) इस समूह में type-2 inflammation से जुड़े मेटाबोलाइट्स की पहचान हुई। इन मरीजों में: Fractional exhaled nitric oxide (FeNO) का स्तर अधिक था Blood eosinophil counts बढ़े हुए थे हालांकि, इनकी एयरवे संरचना अभी काफी हद तक सुरक्षित बनी हुई थी। क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज? अब तक अस्थमा नियंत्रण का मूल्यांकन मुख्य रूप से लक्षणों और हालिया अटैक पर आधारित रहा है। लेकिन यह अध्ययन दिखाता है कि केवल लक्षण देखकर बीमारी की वास्तविक स्थिति को समझना संभव नहीं है। कई मरीज बाहर से स्थिर दिख सकते हैं, जबकि उनके फेफड़ों में सूजन, airway remodeling या इम्यून एक्टिविटी लगातार जारी हो सकती है। यही कारण है कि भविष्य में कुछ मरीजों में बीमारी अचानक गंभीर रूप ले सकती है। Precision Medicine की दिशा में बड़ा कदम विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिसर्च precision medicine आधारित अस्थमा उपचार को मजबूत करेगी। यदि मेटाबोलोमिक प्रोफाइलिंग को भविष्य में नियमित क्लिनिकल प्रैक्टिस में शामिल किया जाता है, तो डॉक्टर: बीमारी के वास्तविक जैविक स्वरूप को पहचान सकेंगे हाई-रिस्क मरीजों की पहले से पहचान कर सकेंगे अधिक targeted therapies चुन सकेंगे लंबे समय में फेफड़ों की क्षति को कम कर सकेंगे हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि अभी और बड़े अध्ययन की जरूरत है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ये metabolite-defined subgroups भविष्य में बीमारी की प्रगति और इलाज के प्रति प्रतिक्रिया को किस तरह प्रभावित करते हैं।
हाल ही में सामने आई एक पायलट स्टडी में टाइप-2 डायबिटीज मेलिटस (T2DM) और कोरोनरी आर्टेरियोस्क्लेरोटिक हार्ट डिजीज के बीच गट माइक्रोबायोटा और मेटाबोलिक बदलावों को लेकर महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि ये बदलाव कार्डियोमेटाबोलिक बीमारियों के संभावित बायोमार्कर हो सकते हैं। स्टडी में क्या किया गया अध्ययन? शोधकर्ताओं ने कुल 30 प्रतिभागियों के फीकल और प्लाज्मा सैंपल का विश्लेषण किया, जिनमें शामिल थे— 10 स्वस्थ व्यक्ति 10 टाइप-2 डायबिटीज मरीज 10 ऐसे मरीज जिनमें डायबिटीज के साथ हार्ट डिजीज भी थी इस दौरान मेटाजीनोमिक सीक्वेंसिंग और लिक्विड क्रोमैटोग्राफी–मास स्पेक्ट्रोमेट्री (LC-MS) तकनीक का उपयोग किया गया। गट माइक्रोबायोटा में क्या बदलाव मिले? स्टडी में कई बैक्टीरियल स्पीशीज में अंतर पाया गया, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं: Prevotella disiens Bacteroides sp._CAG_875 Sutterella wadsworthensis Paraprevotella clara Anaerobutyricum hallii शोधकर्ताओं के अनुसार, खासकर Bacteroides sp._CAG_875 एक महत्वपूर्ण संभावित बायोमार्कर के रूप में उभरा, जो स्वस्थ व्यक्तियों और T2DM-CAD मरीजों के बीच स्पष्ट अंतर दिखाने में सक्षम रहा। हालांकि कुल माइक्रोबायोटा विविधता में बड़ा अंतर नहीं पाया गया, लेकिन विशिष्ट बैक्टीरिया में महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए। मेटाबोलिक बदलाव और संभावित संकेत शोध में 42 अलग-अलग मेटाबोलाइट्स की पहचान की गई, जिनमें शामिल हैं: फ्रक्टोज गैलिक एसिड पाइरोग्लूटामिक एसिड एडिपिक एसिड सबेरिक एसिड 12-ketolithocholic acid (12-ketoLCA) इनमें 12-ketoLCA को सबसे अहम संभावित बायोमार्कर माना गया, जो बाइल एसिड मेटाबॉलिज्म और मेटाबोलिक डिसफंक्शन से जुड़ा हो सकता है। “गट-हार्ट एक्सिस” पर बड़ा संकेत स्टडी में यह भी पाया गया कि गट माइक्रोब्स और मेटाबोलाइट्स के बीच गहरा संबंध है, जो “gut–heart axis” की ओर संकेत करता है। यह डायबिटीज से जुड़ी हार्ट बीमारियों में एक अहम भूमिका निभा सकता है। इसके अलावा अमीनो एसिड, लिनोलिक एसिड और ग्लूटामेट मेटाबॉलिज्म जैसे पाथवे में भी बदलाव देखे गए, जो इंसुलिन रेजिस्टेंस और कार्डियोवस्कुलर डिजीज से जुड़े हैं। सीमाएं और आगे की जरूरत शोधकर्ताओं ने माना कि यह एक छोटा पायलट अध्ययन था, इसलिए निष्कर्षों को अभी शुरुआती स्तर का माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि: सैंपल साइज छोटा था मेकैनिज्म की पुष्टि बाकी है बड़े और लंबे समय के अध्ययन की जरूरत है
फ्रांस में नई रिसर्च के बाद गर्भवती महिलाओं में बढ़ी Cytomegalovirus जांच और एंटीवायरल इलाज गर्भावस्था के दौरान होने वाले संक्रमणों को लेकर एक नई स्टडी में अहम जानकारी सामने आई है। रिसर्च के मुताबिक, Cytomegalovirus Infection की जांच और इलाज में फ्रांस में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव देखा गया है। 2020 में प्रकाशित एक बड़े क्लिनिकल ट्रायल के बाद गर्भवती महिलाओं में CMV स्क्रीनिंग और Valacyclovir उपचार का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। खास बात यह रही कि जांच बढ़ने के बावजूद गर्भपात (Termination of Pregnancy) के मामलों में वृद्धि नहीं हुई। क्या है Cytomegalovirus (CMV)? Cytomegalovirus Infection एक वायरल संक्रमण है, जो नवजात बच्चों में सुनने की क्षमता कम होने, न्यूरोलॉजिकल समस्याओं और मानसिक विकास में देरी जैसी गंभीर दिक्कतों का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार: फ्रांस में लगभग 0.4% नवजात congenital CMV infection से प्रभावित होते हैं गर्भावस्था की शुरुआती तिमाही में संक्रमण होने पर खतरा ज्यादा बढ़ जाता है स्क्रीनिंग में बड़ा उछाल स्टडी में 2017 से 2023 के बीच 451 गर्भावस्थाओं के डेटा का विश्लेषण किया गया। रिसर्च में पाया गया कि: 2017-2020 के बीच CMV स्क्रीनिंग दर 22% थी 2021-2023 में यह बढ़कर 40% हो गई वहीं महिलाओं द्वारा खुद टेस्ट की मांग करने के मामलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। Valacyclovir इलाज से क्या फायदा मिला? 2020 की स्टडी में पाया गया था कि गर्भावस्था की शुरुआती अवस्था में Valacyclovir देने से मां से बच्चे में संक्रमण फैलने का खतरा लगभग दो-तिहाई तक कम हो सकता है। इसके बाद: एंटीवायरल थेरेपी का इस्तेमाल 27.7% से बढ़कर 59.8% हो गया यूरोप के कई विशेषज्ञ समूहों ने शुरुआती गर्भावस्था में CMV संक्रमण होने पर Valacyclovir इस्तेमाल की सिफारिश भी की। MRI और अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट ने तय किए फैसले स्टडी में पाया गया कि जिन मामलों में: MRI या अल्ट्रासाउंड में दिमाग से जुड़ी गंभीर असामान्यताएं दिखीं, उन्हीं मामलों में गर्भपात के फैसले लिए गए। इन समस्याओं में शामिल थीं: Microcephaly Ventriculomegaly Brain calcifications Cerebellar hypoplasia गर्भपात के मामलों में आई कमी शुरुआती CMV संक्रमण वाले मामलों में कुल Termination Rate 20.7% रही। हालांकि 2020 के बाद इसमें गिरावट देखी गई: पहले: 25.9% बाद में: 13% रिसर्च में यह भी सामने आया कि जिन महिलाओं को Valacyclovir नहीं मिला, उनमें गर्भपात की संभावना ज्यादा रही। अब भी बने हुए हैं कई सवाल हालांकि फ्रांस ने मई 2025 में ही राष्ट्रीय स्तर पर CMV स्क्रीनिंग की सिफारिशें लागू की हैं, लेकिन पूरे यूरोप में अभी भी अलग-अलग नीतियां अपनाई जा रही हैं। विशेषज्ञों की कुछ चिंताएं अब भी बनी हुई हैं: गर्भवती महिलाओं में मानसिक तनाव हाई-डोज Valacyclovir के संभावित साइड इफेक्ट्स जरूरत से ज्यादा मेडिकल हस्तक्षेप फिर भी रिसर्चर्स का मानना है कि अब CMV जांच और इलाज को नियमित गर्भावस्था देखभाल का हिस्सा बनाने की दिशा में स्वीकार्यता बढ़ रही है।
इंजेक्शन बंद करने के बाद भी वजन कंट्रोल रखने में मददगार साबित हुई नई ओरल GLP-1 दवा मोटापे और वजन घटाने की दवाओं को लेकर नई रिसर्च में अहम जानकारी सामने आई है। एक नए क्लिनिकल ट्रायल में पाया गया कि Orforglipron नाम की ओरल दवा उन लोगों में वजन को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखने में मदद कर सकती है, जिन्होंने पहले GLP-1 इंजेक्शन थेरेपी से वजन कम किया था। ATTAIN-MAINTAIN ट्रायल के निष्कर्षों के अनुसार, जिन मरीजों ने इंजेक्शन बंद करने के बाद रोजाना Orforglipron पिल ली, उनमें वजन दोबारा बढ़ने की संभावना काफी कम रही। क्या था ट्रायल? इस स्टडी में अमेरिका के 376 प्रतिभागियों को शामिल किया गया था। ये सभी लोग पहले: Tirzepatide या Semaglutide जैसी इंजेक्टेबल GLP-1 दवाओं का इस्तेमाल कर चुके थे और एक साल से ज्यादा समय में उनका वजन कम हुआ था। इसके बाद प्रतिभागियों को एक साल तक: Orforglipron पिल या Placebo (डमी दवा) दी गई। Tirzepatide लेने वालों में क्या रहा असर? जिन लोगों ने पहले Tirzepatide इंजेक्शन लिया था और बाद में Orforglipron पिल शुरू की: उन्होंने अपने पहले घटे वजन का 74.7% तक बनाए रखा वहीं placebo लेने वालों में यह आंकड़ा केवल 49.2% रहा। Semaglutide ग्रुप में और बेहतर नतीजे Semaglutide इंजेक्शन बंद करने वाले मरीजों में: Orforglipron लेने वालों ने 79.3% वजन घटाव बनाए रखा Placebo ग्रुप में यह केवल 37.6% रहा यानी दोनों समूहों के बीच लगभग 41.7% का बड़ा अंतर देखा गया। रिसर्चर्स ने क्या कहा? विशेषज्ञों का कहना है कि कई मरीज और कुछ डॉक्टर यह मान लेते हैं कि एक बार वजन कम हो जाने के बाद मोटापे की दवाएं बंद की जा सकती हैं। लेकिन दवा बंद करने के बाद वजन दोबारा बढ़ना आम समस्या है। रिसर्चर्स के अनुसार: वजन दोबारा बढ़ने से cardiometabolic फायदे कम हो सकते हैं वजन में बार-बार उतार-चढ़ाव स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है ऐसे में Orforglipron जैसी दवाएं लंबे समय तक वजन नियंत्रित रखने में मददगार हो सकती हैं। कितनी हुई औसत वजन में कमी? ट्रायल में Orforglipron लेने वाले प्रतिभागियों में: Tirzepatide ग्रुप: औसतन 5 किलोग्राम अतिरिक्त वजन कम हुआ Semaglutide ग्रुप: लगभग 1 किलोग्राम वजन कम हुआ क्यों खास मानी जा रही है यह दवा? अब तक GLP-1 आधारित अधिकतर लोकप्रिय वजन घटाने वाली दवाएं इंजेक्शन के रूप में उपलब्ध हैं। लेकिन Orforglipron एक ओरल पिल है, जिसे रोजाना लिया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि: गोली के रूप में दवा लेना कई मरीजों के लिए आसान होगा यह बड़े स्तर पर उपलब्ध कराना ज्यादा सरल हो सकता है लंबे समय तक वजन प्रबंधन में यह नई उम्मीद बन सकती है फिलहाल यह दवा अमेरिका में उपलब्ध है और जल्द ही ब्रिटेन में भी लॉन्च हो सकती है।
एक नई 52-सप्ताह की Phase 3b क्लिनिकल स्टडी में सामने आया है कि Tildrakizumab दवा का असर मोटापे से प्रभावित नहीं होता। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह दवा मध्यम से गंभीर स्कैल्प सोरायसिस से पीड़ित मरीजों में समान रूप से प्रभावी और सुरक्षित पाई गई, चाहे मरीज मोटापे से ग्रस्त हों या नहीं। यह अध्ययन ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब लंबे समय से यह चिंता जताई जाती रही है कि मोटापा और शरीर में बढ़ी हुई सूजन बायोलॉजिक थेरेपी की प्रभावशीलता को कम कर सकती है। हालांकि इस शोध ने संकेत दिया है कि IL-23 को टारगेट करने वाली बायोलॉजिक थेरेपी मोटापे वाले मरीजों में भी असरदार बनी रह सकती है। 16वें सप्ताह में बेहतर परिणाम शोधकर्ताओं ने मरीजों को दो समूहों में बांटा। एक समूह को Tildrakizumab 100 mg दिया गया, जबकि दूसरे को प्लेसीबो। मरीजों को BMI के आधार पर मोटापे और गैर-मोटापे वाली श्रेणियों में विभाजित किया गया। अध्ययन में शामिल लगभग आधे मरीज मोटापे की श्रेणी में थे। 16वें सप्ताह तक दोनों समूहों में दवा लेने वाले मरीजों में बेहतर सुधार देखने को मिला। मोटापे वाले मरीजों में: 48.8% मरीजों ने स्कैल्प रिस्पॉन्स हासिल किया प्लेसीबो लेने वालों में यह आंकड़ा सिर्फ 10% रहा गैर-मोटापे वाले मरीजों में: 50% मरीजों में सकारात्मक सुधार देखा गया प्लेसीबो समूह में केवल 4.8% मरीजों को फायदा मिला PSSI 90 स्कोर में भी शानदार सुधार स्टडी में Psoriasis Scalp Severity Index (PSSI) 90 स्कोर में भी महत्वपूर्ण सुधार दर्ज किया गया। यह स्कोर स्कैल्प सोरायसिस में 90% तक सुधार को दर्शाता है। मोटापे वाले मरीजों में: 62.8% मरीजों ने PSSI 90 हासिल किया प्लेसीबो समूह में केवल 10% मरीज इस स्तर तक पहुंचे गैर-मोटापे वाले मरीजों में: 58.7% मरीजों ने PSSI 90 हासिल किया प्लेसीबो समूह में कोई भी मरीज इस लक्ष्य तक नहीं पहुंचा 52 सप्ताह तक बना रहा असर अध्ययन में यह भी सामने आया कि मरीजों में स्कैल्प की खुजली और प्रभावित हिस्से में उल्लेखनीय कमी आई। शोधकर्ताओं के अनुसार, Tildrakizumab का असर पूरे 52 सप्ताह तक स्थिर और प्रभावी बना रहा। सुरक्षा के लिहाज से भी दवा सुरक्षित पाई गई। मोटापे और गैर-मोटापे वाले मरीजों में किसी नए साइड इफेक्ट या गंभीर सुरक्षा जोखिम की पहचान नहीं हुई। सोरायसिस और मोटापे के संबंध पर नई उम्मीद Psoriasis को मोटापे से जुड़ी प्रमुख बीमारियों में से एक माना जाता है। पहले के कई अध्ययनों में यह दावा किया गया था कि मोटापे के कारण शरीर में बढ़ने वाली सूजन दवाओं के असर को कम कर सकती है। हालांकि इस नए अध्ययन ने संकेत दिया है कि Tildrakizumab जैसी आधुनिक बायोलॉजिक दवाएं BMI से प्रभावित हुए बिना लंबे समय तक प्रभावी रह सकती हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि यह उप-विश्लेषण सांख्यिकीय अंतर को पूरी तरह मापने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया था, इसलिए भविष्य में बड़े स्तर पर और अध्ययन की जरूरत हो सकती है। इसके बावजूद विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि यह दवा मोटापे और गैर-मोटापे दोनों तरह के मरीजों में सुरक्षित और प्रभावी साबित हुई है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI अब महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं, खासकर ओवरी से जुड़ी बीमारियों के इलाज और पहचान में बड़ी भूमिका निभा सकता है। एक नई सिस्टमेटिक रिव्यू और मेटा-एनालिसिस में पाया गया है कि AI तकनीक ओवेरियन कैंसर और अन्य ओवेरियन कंडीशंस की पहचान और इलाज को ज्यादा सटीक और पर्सनलाइज्ड बना सकती है। रिसर्च के अनुसार, AI आधारित मॉडल्स ने ओवेरियन कैंसर की पहचान में काफी बेहतर प्रदर्शन किया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत बना सकती है। ओवेरियन कैंसर पहचानने में AI की बड़ी सफलता स्टडी में पाया गया कि AI मॉडल्स ने अल्ट्रासाउंड स्कैन और ब्लड टेस्ट डेटा को मिलाकर ओवेरियन कैंसर की पहचान लगभग 90 प्रतिशत मामलों में सही तरीके से की। रिपोर्ट के मुताबिक, AI सिस्टम्स ने कैंसर की मौजूदगी पहचानने में 89 से 94 प्रतिशत तक की सटीकता दिखाई। वहीं जिन मरीजों में कैंसर नहीं था, उन्हें सही तरीके से पहचानने की क्षमता भी 85 से 91 प्रतिशत तक रही। सर्जरी और IVF में भी मददगार AI सिर्फ कैंसर की पहचान तक सीमित नहीं है। रिसर्च में बताया गया कि Explainable AI टूल्स एडवांस ओवेरियन कैंसर में सर्जिकल प्लानिंग में भी प्रभावी साबित हुए। इन टूल्स ने यह अनुमान लगाने में मदद की कि सर्जरी के दौरान सभी दिखाई देने वाले कैंसर सेल्स को पूरी तरह हटाया जा सकेगा या नहीं। इसके अलावा IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन प्रक्रिया में भी AI उपयोगी साबित हुआ। AI एल्गोरिद्म ने ओवेरियन स्टिम्युलेशन प्रोटोकॉल को बेहतर बनाने और फॉलिकल ग्रोथ का अनुमान लगाने में डॉक्टरों की मदद की। PCOS जैसी समस्याओं में भी संभावनाएं रिसर्चर्स के मुताबिक, AI तकनीक Polycystic Ovary Syndrome जैसी जटिल हार्मोनल समस्याओं की पहचान और इलाज को भी अधिक सटीक बना सकती है। AI की मदद से मरीज की स्थिति के अनुसार पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान तैयार करना संभव हो सकता है। अभी भी मौजूद हैं कई चुनौतियां हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी माना कि रिसर्च के अच्छे नतीजों के बावजूद AI को रोजमर्रा की क्लिनिकल प्रैक्टिस में लागू करना अभी आसान नहीं है। 81 स्टडीज के विश्लेषण में पाया गया कि कई रिसर्च अलग-अलग AI सिस्टम्स और रेट्रोस्पेक्टिव डेटा पर आधारित थीं। सिर्फ 22 प्रतिशत स्टडीज में मल्टीसेंटर और प्रॉस्पेक्टिव वैलिडेशन किया गया था। इसी वजह से वैज्ञानिकों ने मजबूत वैलिडेशन, स्टैंडर्ड रिपोर्टिंग सिस्टम और क्लिनिकल वर्कफ्लो में बेहतर इंटीग्रेशन की जरूरत बताई है। जिम्मेदार AI उपयोग पर जोर रिसर्चर्स ने कहा कि हेल्थकेयर सेक्टर में AI का उपयोग करते समय एथिकल और जिम्मेदार गवर्नेंस बेहद जरूरी है। मरीजों की प्राइवेसी, डेटा सुरक्षा और मेडिकल फैसलों की पारदर्शिता को प्राथमिकता देना अहम होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में AI महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा बदलाव ला सकता है, खासकर ओवेरियन कैंसर, IVF और हार्मोनल डिसऑर्डर्स के इलाज में।
Topical Corticosteroids यानी त्वचा पर इस्तेमाल होने वाली स्टेरॉयड क्रीम और लोशन को आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है। इनका इस्तेमाल एक्जिमा, सोरायसिस और अन्य सूजन वाली त्वचा संबंधी बीमारियों के इलाज में लंबे समय से किया जाता रहा है। लेकिन अब एक नई रिसर्च में दावा किया गया है कि इन दवाओं का लंबे समय तक या ज्यादा ताकत वाली मात्रा में इस्तेमाल Type 2 Diabetes के खतरे को बढ़ा सकता है। लाखों लोगों पर हुई स्टडी यह बड़ी रिसर्च दक्षिण कोरिया में की गई, जिसमें 6.85 लाख से ज्यादा वयस्कों के स्वास्थ्य डेटा का विश्लेषण किया गया। स्टडी में शामिल सभी लोग शुरुआत में डायबिटीज से मुक्त थे। शोधकर्ताओं ने पांच साल की अवधि में Topical Corticosteroids के इस्तेमाल का अध्ययन किया। इसमें दवा की ताकत (Potency), उपयोग की अवधि और कितनी बार दवा लिखी गई, जैसे पहलुओं को शामिल किया गया। इसके बाद प्रतिभागियों को अगले छह साल तक फॉलो किया गया ताकि नए Type 2 Diabetes मामलों की पहचान की जा सके। सामान्य इस्तेमाल में नहीं मिला बड़ा खतरा रिसर्च में यह पाया गया कि सामान्य तरीके से इस्तेमाल की जाने वाली स्टेरॉयड क्रीम और लोशन से डायबिटीज का जोखिम उल्लेखनीय रूप से नहीं बढ़ा। हालांकि, जब शोधकर्ताओं ने दवा के उपयोग के तरीके और अवधि का विस्तार से अध्ययन किया, तब कुछ अहम जोखिम सामने आए। ज्यादा ताकत वाली स्टेरॉयड से बढ़ा जोखिम स्टडी के अनुसार– High-Potency स्टेरॉयड इस्तेमाल करने वालों में Type 2 Diabetes का खतरा 15% ज्यादा पाया गया जिन लोगों को 10 या उससे ज्यादा बार यह दवाएं प्रिस्क्राइब की गईं, उनमें जोखिम 26% तक बढ़ा छह महीने या उससे ज्यादा समय तक लगातार इस्तेमाल करने वालों में डायबिटीज का खतरा 45% तक बढ़ गया वहीं कम ताकत वाली स्टेरॉयड, कम अवधि तक इस्तेमाल और 10 से कम प्रिस्क्रिप्शन वाले मरीजों में जोखिम काफी कम या सामान्य रहा। क्यों बढ़ सकता है खतरा? शोधकर्ताओं का मानना है कि लंबे समय तक या ज्यादा ताकत वाली स्टेरॉयड के इस्तेमाल से शरीर में दवा का अवशोषण बढ़ सकता है। इससे ग्लूकोज कंट्रोल और मेटाबॉलिज्म प्रभावित हो सकता है, जो आगे चलकर डायबिटीज के खतरे को बढ़ा सकता है। डॉक्टरों को क्या सलाह दी गई? विशेषज्ञों ने कहा कि इस रिसर्च का मतलब यह नहीं है कि Topical Steroids का इस्तेमाल बंद कर दिया जाए। लेकिन डॉक्टरों को सलाह दी गई है कि वे– कम से कम प्रभावी ताकत वाली दवा दें इलाज की अवधि छोटी रखें लंबे समय तक इलाज कराने वाले मरीजों की नियमित मॉनिटरिंग करें मरीजों के लिए क्या जरूरी है? विशेषज्ञों का कहना है कि बिना डॉक्टर की सलाह के लंबे समय तक स्टेरॉयड क्रीम का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। खासकर वे लोग जो पहले से मोटापा, हाई ब्लड शुगर या डायबिटीज के जोखिम से जूझ रहे हैं, उन्हें अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है। यह रिसर्च Topical Steroids की सामान्य सुरक्षा को लेकर भरोसा तो देती है, लेकिन साथ ही लंबे और ज्यादा शक्तिशाली इस्तेमाल के दौरान सतर्क रहने की भी सलाह देती है।
हृदय रोग Hypertrophic Cardiomyopathy (HCM) में अचानक हृदय मृत्यु (Sudden Cardiac Death) का जोखिम लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। अब एक नई स्टडी में पाया गया है कि MRI से निकाला गया एक नया मापदंड – Left Atrioventricular Coupling Index (LACI) – जोखिम का अनुमान लगाने में मौजूदा मॉडल्स से भी बेहतर मदद कर सकता है। क्या है LACI और क्यों है महत्वपूर्ण? LACI दिल के बाएं एट्रियम और वेंट्रिकल के बीच के संबंध को दर्शाता है। इसे बाएं एट्रियम और बाएं वेंट्रिकल के एंड-डायस्टोलिक वॉल्यूम के अनुपात से मापा जाता है। यह इंडेक्स दिल की कार्यप्रणाली के उस पहलू को पकड़ता है, जिसे पारंपरिक पैरामीटर पूरी तरह नहीं दर्शा पाते। बड़े अध्ययन से मिले अहम संकेत इस रिसर्च में 2,240 HCM मरीजों को औसतन 4 साल तक फॉलो किया गया। इस दौरान: 128 मरीजों (5.7%) में Sudden Cardiac Death की घटनाएं दर्ज हुईं जिन मरीजों में घटना हुई, उनमें LACI का स्तर ज्यादा था साथ ही Late Gadolinium Enhancement (LGE) भी अधिक और हृदय की पंपिंग क्षमता (Ejection Fraction) कम पाई गई मौजूदा मॉडल्स से बेहतर प्रदर्शन अध्ययन में यह भी पाया गया कि LACI, पारंपरिक जोखिम कारकों और LGE के साथ मिलकर Sudden Cardiac Death का स्वतंत्र भविष्यवक्ता (independent predictor) बना रहा। जब इसे ESC और ACC/AHA के मौजूदा जोखिम मॉडल्स में जोड़ा गया, तो जोखिम आकलन की सटीकता और बेहतर हो गई। डॉक्टरों के लिए क्या मतलब? इस नई जानकारी से डॉक्टरों को यह तय करने में मदद मिल सकती है कि किन मरीजों में अचानक हृदय मृत्यु का खतरा ज्यादा है। इससे इलाज और मॉनिटरिंग की रणनीति और अधिक सटीक बनाई जा सकती है। अभी और रिसर्च की जरूरत हालांकि यह अध्ययन रेट्रोस्पेक्टिव था, इसलिए इसके आधार पर सीधे कारण-परिणाम का निष्कर्ष निकालना सीमित है। साथ ही, अलग-अलग आबादी (जैसे लिंग और जातीयता) पर इसके प्रभाव को समझने के लिए और शोध जरूरी है।
मध्यम से गंभीर Atopic Dermatitis के इलाज में Ultraviolet B phototherapy (UVB) लंबे समय से प्रभावी विकल्प माना जाता है, खासकर उन मरीजों के लिए जो टॉपिकल स्टेरॉयड जैसे उपचारों से पर्याप्त लाभ नहीं पा रहे हैं। अब एक नई रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल ने narrowband और broadband UVB के बीच तुलना करते हुए अहम निष्कर्ष सामने रखे हैं। स्टडी कैसे की गई? इस अध्ययन में 18 वर्ष से अधिक उम्र के 69 मरीज शामिल किए गए, जिन्हें मध्यम से गंभीर और ट्रीटमेंट-रेफ्रैक्टरी एटोपिक डर्मेटाइटिस था। मरीजों को दो समूहों में बांटा गया: एक को broadband UVB दूसरे को narrowband UVB दोनों समूहों को 12 हफ्तों तक फुल-बॉडी फोटोथेरेपी दी गई, साथ ही उनकी मौजूदा टॉपिकल थेरेपी जारी रही। अध्ययन का मुख्य मापदंड Eczema Area and Severity Index (EASI) स्कोर में बदलाव था। असर में नहीं दिखा बड़ा अंतर रिजल्ट्स के मुताबिक, दोनों ही थेरेपी ने बीमारी की गंभीरता में उल्लेखनीय सुधार किया: Broadband UVB: EASI में औसत −8.1 की कमी Narrowband UVB: EASI में औसत −8.9 की कमी दोनों के बीच का अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था, यानी प्रभाव लगभग समान रहा। इसके अलावा vIGA, POEM, PP-NRS, DLQI और RECAP जैसे अन्य क्लिनिकल और मरीज-आधारित मापदंडों में भी दोनों ग्रुप्स के बीच कोई खास अंतर नहीं पाया गया। सहनशीलता में बड़ा फर्क हालांकि, टॉलरबिलिटी (सहनशीलता) के मामले में फर्क देखने को मिला: Broadband UVB ग्रुप में 4 मरीजों ने साइड इफेक्ट्स के कारण इलाज छोड़ दिया Narrowband UVB ग्रुप में कोई भी मरीज बीच में नहीं छोड़ा यह दर्शाता है कि narrowband UVB ज्यादा सुरक्षित और बेहतर सहन किया जाने वाला विकल्प हो सकता है। क्या है इसका मतलब? इस अध्ययन से यह साफ होता है कि दोनों UVB थेरेपी प्रभावी हैं, लेकिन बेहतर सहनशीलता के कारण narrowband UVB को प्राथमिकता दी जा सकती है। यह निष्कर्ष डॉक्टरों को इलाज का सही विकल्प चुनने में मदद कर सकता है, खासकर उन मरीजों के लिए जिनकी बीमारी लंबे समय से नियंत्रण में नहीं आ रही।
क्रोनिक किडनी डिजीज से जूझ रहे मरीजों के लिए एक नई स्टडी ने अहम जानकारी सामने रखी है। Chronic Kidney Disease से जुड़ी खुजली, जिसे CKD-associated pruritus कहा जाता है, होम हीमोडायलिसिस लेने वाले मरीजों में भी एक आम और गंभीर समस्या बनी हुई है। करीब एक-तिहाई मरीज प्रभावित इस क्रॉस-सेक्शनल स्टडी में घर पर हीमोडायलिसिस करवा रहे 59 मरीजों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि करीब 31% मरीज (18 लोग) CKD-प्रुरिटस से प्रभावित थे। यह आंकड़ा उन मरीजों के बराबर है जो अस्पताल या डायलिसिस सेंटर में इलाज कराते हैं, जिससे साफ होता है कि घर पर इलाज करने के बावजूद यह समस्या बनी रहती है। जीवन की गुणवत्ता पर बड़ा असर स्टडी में यह भी सामने आया कि जिन मरीजों को खुजली की समस्या थी, उनकी जीवन गुणवत्ता (Quality of Life) काफी खराब पाई गई। EQ-5D स्कोर के अनुसार, प्रुरिटस वाले मरीजों का स्कोर 0.760 रहा, जबकि बिना इस समस्या वाले मरीजों का स्कोर 1.00 था। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह लक्षण रोजमर्रा के जीवन और मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डालता है। खुजली की तीव्रता और असर में नहीं मिला सीधा संबंध दिलचस्प बात यह है कि खुजली की गंभीरता (इंटेंसिटी) और मरीजों के अनुभव–जैसे एंग्जायटी, डिप्रेशन या नींद की समस्या–के बीच सीधा संबंध नहीं पाया गया। यानी हल्की खुजली भी मरीजों के जीवन पर बड़ा असर डाल सकती है, या फिर अन्य कारक भी उनकी स्थिति को प्रभावित कर रहे हो सकते हैं। इलाज और मैनेजमेंट पर नया फोकस जरूरी विशेषज्ञों का मानना है कि CKD-associated pruritus और मरीजों के अनुभव के बीच संबंध अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है। इसलिए बड़े और लंबी अवधि वाले शोध की जरूरत है, ताकि बेहतर इलाज और मैनेजमेंट रणनीतियां विकसित की जा सकें। भविष्य के लिए अहम संकेत जैसे-जैसे होम हीमोडायलिसिस का चलन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ऐसे लक्षणों की पहचान और उनका प्रभावी समाधान जरूरी हो गया है। मरीजों के समग्र स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए इस दिशा में और ध्यान देने की आवश्यकता है।
मानसिक स्वास्थ्य उपचार के क्षेत्र में उभर रही साइकेडेलिक थेरेपी को लेकर मीडिया कवरेज पर एक नई रिसर्च ने महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। Natural Language Processing के जरिए किए गए इस विश्लेषण में पाया गया कि 2017 से 2024 के बीच साइकेडेलिक उपचारों को पारंपरिक दवाओं की तुलना में अधिक सकारात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गया। साइकेडेलिक थेरेपी को मिला ज्यादा सकारात्मक कवरेज अध्ययन में 6,805 मीडिया पब्लिकेशंस का विश्लेषण किया गया, जिसमें पाया गया कि डिप्रेशन और Post-Traumatic Stress Disorder जैसे मानसिक रोगों के इलाज में उपयोग होने वाली साइकेडेलिक थेरेपी को अधिक सकारात्मक भावनाओं और भाषा के साथ जोड़ा गया। इसके विपरीत, FDA-स्वीकृत एंटीडिप्रेसेंट दवाओं को अक्सर जोखिम, साइड इफेक्ट्स और नकारात्मक पहलुओं के संदर्भ में दिखाया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि पारंपरिक उपचारों को अपेक्षाकृत अधिक आलोचनात्मक नजर से प्रस्तुत किया जा रहा है। क्या पूरी तरह सकारात्मक है कवरेज? हालांकि स्टडी में यह भी सामने आया कि साइकेडेलिक उपचारों की कवरेज पूरी तरह एकतरफा नहीं है। कुछ रिपोर्ट्स में इनके जोखिम और नकारात्मक पहलुओं को भी उजागर किया गया। वहीं, पारंपरिक एंटीडिप्रेसेंट्स को ‘रिवॉर्ड’ यानी लाभ से जुड़े संदर्भों में भी दिखाया गया। मरीजों की सोच पर पड़ सकता है असर विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की असंतुलित मीडिया कवरेज मरीजों की सोच और फैसलों को प्रभावित कर सकती है। अगर किसी नए उपचार को अधिक सकारात्मक और पुराने उपचार को अधिक नकारात्मक रूप में दिखाया जाता है, तो मरीज पारंपरिक दवाओं से दूरी बना सकते हैं या नए विकल्पों से अवास्तविक उम्मीदें रख सकते हैं। डॉक्टरों के लिए बढ़ी जिम्मेदारी इस स्थिति में स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे मरीजों को संतुलित और साक्ष्य-आधारित जानकारी दें। इससे मरीज सही निर्णय ले सकेंगे और उपचार प्रक्रिया पर भरोसा बना रहेगा। संतुलित रिपोर्टिंग की जरूरत यह अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि मानसिक स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विषयों पर मीडिया की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। जैसे-जैसे साइकेडेलिक थेरेपी पर रिसर्च आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे संतुलित और तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग जरूरी होगी ताकि आम लोगों को सही और पूरी जानकारी मिल सके।
स्वास्थ्य विज्ञान की दुनिया में आई एक अहम स्टडी ने दिल और दिमाग के संबंध को लेकर नई समझ विकसित की है। ताजा शोध के मुताबिक, हार्ट अटैक, स्ट्रोक या हार्ट फेल्योर जैसी गंभीर हृदय बीमारियों से कई साल पहले ही दिमाग की कार्यक्षमता में गिरावट शुरू हो सकती है। यह निष्कर्ष भविष्य में हृदय रोगों की शुरुआती पहचान और रोकथाम की रणनीतियों को बदल सकता है। रिसर्च क्या कहती है? यह अध्ययन ASPREE trial और उसके एक्सटेंशन ASPREE-XT के डेटा पर आधारित है। इसमें ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 19,000 से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया। करीब 11 वर्षों तक चले इस अध्ययन में 1,934 प्रतिभागियों में हृदय संबंधी घटनाएं दर्ज की गईं। विश्लेषण से पता चला कि जिन लोगों को बाद में दिल की बीमारी हुई, उनमें 3 से 8 साल पहले ही कॉग्निटिव गिरावट के संकेत दिखने लगे थे। किन मानसिक क्षमताओं पर पड़ा असर? शोध में यह सामने आया कि प्रभावित लोगों में कई अहम संज्ञानात्मक क्षमताएं धीरे-धीरे कमजोर होने लगीं: सोचने-समझने की क्षमता (Global cognition) याददाश्त (Episodic memory) प्रोसेसिंग स्पीड (Processing speed) भाषा और शब्दों के उपयोग की क्षमता (Verbal fluency) इनमें सबसे पहले असर प्रोसेसिंग स्पीड पर देखा गया, जो घटना से करीब 8 साल पहले ही धीमी पड़ने लगी थी। क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज? अब तक यह धारणा रही है कि दिल की बीमारी होने के बाद दिमाग पर असर पड़ता है। लेकिन यह स्टडी इस सोच को चुनौती देती है और बताती है कि दिमाग में बदलाव पहले शुरू हो सकते हैं। इसका अर्थ है कि अगर इन शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचाना जाए, तो हृदय रोगों की रोकथाम के लिए पहले से कदम उठाए जा सकते हैं। इलाज और जांच में क्या बदलाव संभव? विशेषज्ञों का मानना है कि अब बुजुर्गों की नियमित स्वास्थ्य जांच में केवल हार्ट और ब्लड टेस्ट ही नहीं, बल्कि कॉग्निटिव टेस्टिंग को भी शामिल किया जाना चाहिए। इससे जोखिम वाले लोगों की पहचान पहले हो सकेगी और समय रहते इलाज शुरू किया जा सकेगा। आगे क्या? आने वाले शोध इस दिशा में आगे बढ़ेंगे कि क्या शुरुआती स्तर पर ही हृदय संबंधी रोकथाम उपाय अपनाकर कॉग्निटिव गिरावट को धीमा किया जा सकता है। यदि ऐसा संभव हुआ, तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
हाल ही में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन में यह सामने आया है कि लाइफस्टाइल फैक्टर्स का असर सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे पुरुषों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालता है। इस रिसर्च में पाया गया कि रोजमर्रा की आदतें—जैसे व्यायाम, धूम्रपान और बॉडी वेट—सीधे तौर पर मरीजों की सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक स्थिति को प्रभावित करती हैं। एक्सरसाइज से बेहतर हुआ दिमाग और मूड अध्ययन के अनुसार, जो मरीज नियमित रूप से शारीरिक गतिविधियों में शामिल रहे, उनकी कॉग्निटिव परफॉर्मेंस (सोचने और समझने की क्षमता) और भावनात्मक स्थिति बेहतर पाई गई। शोध में यह संबंध सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण (p<0.05) पाया गया, जिससे स्पष्ट होता है कि एक्सरसाइज न केवल शरीर बल्कि दिमाग को भी मजबूत बनाती है। स्मोकिंग और ज्यादा वजन बना खतरा इसके विपरीत, धूम्रपान करने वाले मरीजों में कॉग्निटिव स्कोर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों ही कमजोर पाए गए। इसी तरह, जिन लोगों का BMI (बॉडी मास इंडेक्स) ज्यादा था, उनमें भी सोचने-समझने की क्षमता और भावनात्मक स्थिरता कम देखी गई। यह संकेत देता है कि खराब लाइफस्टाइल आदतें मानसिक गिरावट का कारण बन सकती हैं। हेल्दी लाइफस्टाइल से मिल सकता है फायदा रिसर्च में यह भी पाया गया कि जिन मरीजों की जीवनशैली संतुलित और स्वस्थ थी, उनके मानसिक और भावनात्मक स्कोर बेहतर थे। यह पैटर्न सभी परीक्षणों में लगातार देखने को मिला, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लाइफस्टाइल में बदलाव कर मरीज अपनी स्थिति में सुधार ला सकते हैं। इलाज में बदलाव की जरूरत विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों में मानसिक समस्याएं अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती हैं। इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि इलाज के दौरान लाइफस्टाइल सुधार—जैसे नियमित व्यायाम और वजन नियंत्रण—को भी प्राथमिकता देनी चाहिए। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन निष्कर्षों से सीधे कारण-परिणाम संबंध साबित नहीं होता, लेकिन इनके बीच मजबूत संबंध जरूर है। आगे की रिसर्च जरूरी अध्ययन के आधार पर विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि भविष्य में और विस्तृत शोध किए जाने चाहिए, ताकि यह समझा जा सके कि किस तरह के लाइफस्टाइल बदलाव से मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य में सबसे ज्यादा सुधार संभव है।
एक नई मेडिकल स्टडी ने Diabetes से जूझ रहे लोगों के लिए चिंता बढ़ा दी है। शोध के अनुसार, डायबिटीज के मरीजों में Adhesive Capsulitis यानी ‘फ्रोजन शोल्डर’ होने का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में लगभग 4 गुना ज्यादा होता है। क्या कहती है स्टडी? 2026 की इस बड़ी समीक्षा और मेटा-एनालिसिस में 3.5 लाख से ज्यादा लोगों के डेटा का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि डायबिटीज के मरीजों में फ्रोजन शोल्डर होने की संभावना 3.69 गुना अधिक है। यह स्थिति कंधे में दर्द और धीरे-धीरे मूवमेंट कम होने से जुड़ी होती है, खासकर हाथ को बाहर की ओर घुमाने में परेशानी होती है। क्यों बढ़ता है खतरा? विशेषज्ञों के अनुसार, डायबिटीज में लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड शुगर (हाइपरग्लाइसीमिया) शरीर में कई बदलाव लाता है: कोलेजन की संरचना प्रभावित होती है कंधे के टिश्यू सख्त होने लगते हैं फाइब्रोसिस (टिश्यू का कठोर होना) बढ़ता है शरीर में हल्की लेकिन लगातार सूजन बनी रहती है ये सभी कारक मिलकर कंधे की गतिशीलता को कम कर देते हैं। किन लोगों में ज्यादा जोखिम? स्टडी में कुछ अतिरिक्त जोखिम कारक भी सामने आए: खराब शुगर कंट्रोल मोटापा हाई कोलेस्ट्रॉल (हाइपरलिपिडेमिया) हाई ब्लड प्रेशर थायरॉयड की समस्या 40 से 65 वर्ष की उम्र महिलाओं में ज्यादा जोखिम धूम्रपान और शराब का सेवन इलाज और बचाव क्यों जरूरी? डॉक्टरों का कहना है कि डायबिटीज के मरीज अगर कंधे में दर्द या जकड़न महसूस करें, तो इसे नजरअंदाज न करें। शुरुआती पहचान और सही इलाज से कंधे की मूवमेंट को बेहतर किया जा सकता है। लंबे समय से अनियंत्रित डायबिटीज वाले मरीजों के लिए नियमित स्क्रीनिंग भी जरूरी बताई गई है। स्टडी की सीमाएं हालांकि, यह स्टडी मुख्य रूप से ऑब्जर्वेशनल डेटा पर आधारित है, इसलिए सीधे कारण-परिणाम का निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है। उम्र, वजन और शारीरिक गतिविधि जैसे कारक भी इस संबंध को प्रभावित कर सकते हैं।
दुनियाभर में बढ़ते एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) संकट को लेकर वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता लगातार गहराती जा रही है। अनुमान है कि 2025 तक यह संकट हर साल करीब 1 करोड़ लोगों की जान को खतरे में डाल सकता है। इसी बीच ESCMID Global 2026 में पेश किए गए नए शोध में बताया गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इस समस्या से निपटने में बड़ी भूमिका निभा सकता है–लेकिन इसके इस्तेमाल में सावधानी बेहद जरूरी है। AI कैसे कर सकता है AMR से मुकाबला यूके की University of Hertfordshire से जुड़ी शोधकर्ता Rasha Elshenawy ने अपने अध्ययन में बताया कि AI आधारित मशीन लर्निंग एल्गोरिदम अस्पतालों में एंटीबायोटिक के सही उपयोग, समय पर हस्तक्षेप और संक्रमण के जोखिम का पूर्वानुमान लगाने में मददगार साबित हो रहे हैं। उनके अनुसार, AI सिस्टम अस्पतालों में एंटीबायोटिक उपयोग के पैटर्न का विश्लेषण कर यह संकेत दे सकता है कि कहां दवाओं के प्रति प्रतिरोध (resistance) बढ़ने की संभावना है, जिससे डॉक्टर समय रहते सही कदम उठा सकें। रिसर्च में मिले प्रभावशाली नतीजे अध्ययन के दौरान: AI ने 84.7% सटीकता के साथ सही प्रिस्क्रिप्शन का अनुमान लगाया 156 संभावित दवा-इंटरैक्शन की पहचान की गई 89 मामलों में डोज़ एडजस्टमेंट की जरूरत बताई गई डेटा की सटीकता 99.2% पाई गई यह सिस्टम महामारी के दौरान बढ़े हुए 40% कार्यभार के बावजूद प्रभावी बना रहा, जो इसकी मजबूती को दर्शाता है। लो-इनकम देशों में बड़ी चुनौतियां हालांकि, AMR का सबसे ज्यादा असर लो और मिडिल-इनकम देशों (LMICs) में देखने को मिलता है, जहां संसाधनों की कमी, नीति और प्रशिक्षण के अभाव जैसी कई बाधाएं मौजूद हैं। रिसर्च में यह भी सामने आया कि इन देशों में AI लागू करना तकनीकी रूप से संभव तो है, लेकिन इसके लिए मजबूत वित्तीय समर्थन, प्रशिक्षण और स्थानीय स्तर पर नवाचार की जरूरत है। जिम्मेदार AI उपयोग पर जोर विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि AI का इस्तेमाल बिना उचित जांच और सत्यापन के नहीं किया जाना चाहिए। Rasha Elshenawy ने स्पष्ट कहा कि किसी भी AI सिस्टम को लागू करने से पहले उसकी विश्वसनीयता और सटीकता सुनिश्चित करना अनिवार्य है, ताकि मरीजों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़े। उन्होंने यह भी जोर दिया कि अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों को AI अपनाने से पहले मजबूत परीक्षण प्रक्रिया और स्पष्ट दिशानिर्देश तैयार करने होंगे। आगे की राह विशेषज्ञों के मुताबिक, AMR से लड़ाई में AI एक शक्तिशाली उपकरण बन सकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है: मजबूत वैलिडेशन और टेस्टिंग हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स की ट्रेनिंग मरीज-केंद्रित दृष्टिकोण नीति और वित्तीय समर्थन अगर इन पहलुओं पर ध्यान दिया जाए, तो AI न केवल एंटीबायोटिक के सही उपयोग को बढ़ावा देगा, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य संकट को कम करने में भी मददगार साबित हो सकता है।
कैंसर इलाज के दौरान समान और सम्मानजनक देखभाल की जरूरत को रेखांकित करते हुए एक नई रिसर्च में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार, ट्रांसजेंडर, जेंडर-नॉनकनफॉर्मिंग (GNC) और नॉन-बाइनरी (NB) मरीजों को स्वास्थ्य सेवाओं में अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य परिणामों पर पड़ता है। भेदभाव और खराब स्वास्थ्य के बीच मजबूत संबंध रिसर्च में कुल 1,476 कैंसर सर्वाइवर्स को शामिल किया गया, जिनमें 246 ट्रांसजेंडर, GNC और NB व्यक्ति थे। आंकड़ों के मुताबिक: 63.8% ट्रांसजेंडर, GNC और NB मरीजों ने हेल्थकेयर में भेदभाव का अनुभव किया जबकि 48.5% सिसजेंडर महिलाओं और 29.8% सिसजेंडर पुरुषों ने ऐसा अनुभव किया इतना ही नहीं, इन मरीजों में खराब स्वास्थ्य की शिकायत करने की संभावना तीन गुना से अधिक पाई गई। मरीजों ने यह भी बताया कि उन्हें अक्सर नजरअंदाज किया गया, कम सम्मान मिला और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता भी कमजोर रही। कैंसर देखभाल में असमानताएं क्यों चिंता का विषय हैं कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में इलाज लंबा और जटिल होता है। ऐसे में मरीज का अनुभव, डॉक्टर का व्यवहार और समय पर सही इलाज मिलना बेहद जरूरी होता है। लेकिन जब किसी समूह को बार-बार भेदभाव का सामना करना पड़े, तो उनका इलाज और रिकवरी दोनों प्रभावित हो सकते हैं। डॉक्टरों की तैयारी में कमी रिपोर्ट के अनुसार, National Institutes of Health द्वारा फंड किए गए प्रोजेक्ट्स में से सिर्फ 0.8% ही जेंडर और सेक्सुअल माइनॉरिटी हेल्थ पर केंद्रित हैं। वहीं, एक सर्वे में सामने आया कि अमेरिका में केवल 5 में से 1 ऑन्कोलॉजिस्ट ही ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी मरीजों का इलाज करने में आत्मविश्वास महसूस करते हैं, हालांकि अधिकांश डॉक्टर इस क्षेत्र में प्रशिक्षण लेना चाहते हैं। यूरोप और UK में भी समान स्थिति यूरोप में भी LGBTQ+ समुदाय के कैंसर मरीजों को इलाज में देरी, स्क्रीनिंग की कमी और भेदभाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसी तरह British Medical Association ने भी ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी मरीजों के लिए बेहतर और समान स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया है। स्क्रीनिंग और डायग्नोसिस में भी अंतर रिपोर्ट के अनुसार: LGBTQ+ समुदाय में मैमोग्राफी और सर्वाइकल स्क्रीनिंग की दर सामान्य आबादी से कम है इससे कैंसर का समय पर पता नहीं चल पाता और इलाज में देरी होती है आगे का रास्ता: सिस्टम स्तर पर बदलाव जरूरी विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ भेदभाव खत्म करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पूरे हेल्थकेयर सिस्टम में बदलाव की जरूरत है। इसमें शामिल हैं: डॉक्टरों की बेहतर ट्रेनिंग समावेशी (inclusive) स्क्रीनिंग नीतियां सामाजिक स्तर पर जागरूकता और समर्थन हालांकि यह अध्ययन स्वयं-रिपोर्टेड डेटा पर आधारित है और इससे कारण-परिणाम का सीधा निष्कर्ष निकालना सीमित हो सकता है, फिर भी यह स्वास्थ्य सेवाओं में गहरी असमानताओं की ओर इशारा करता है।
अंतरराष्ट्रीय मेडिकल सम्मेलन ESCMID Global 2026 में पेश एक नए अध्ययन ने गंभीर चिंता बढ़ा दी है। शोध के अनुसार, नवजात शिशुओं में जन्म के कुछ घंटों के भीतर ही एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जीन (ARGs) पाए जा रहे हैं, जो भविष्य में संक्रमण के इलाज को जटिल बना सकते हैं। जन्म के 72 घंटे के भीतर की जांच शोधकर्ताओं ने 105 नवजात शिशुओं के meconium (पहला मल) के नमूनों का विश्लेषण किया, जिन्हें जन्म के 72 घंटों के भीतर नवजात गहन देखभाल इकाई (NICU) में भर्ती किया गया था। इन नमूनों में 56 प्रकार के एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जीन की जांच की गई। अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता Argyro Ftergioti ने बताया कि यह अपने प्रकार का सबसे बड़ा अध्ययन है, जो नवजातों में शुरुआती माइक्रोबियल और जेनेटिक एक्सपोजर को समझने के लिए किया गया। शुरुआती घंटों में ही मौजूद रेजिस्टेंस अध्ययन में पाया गया कि: oqxA जीन 98% नमूनों में qnrS जीन 96% नमूनों में मौजूद था ये दोनों जीन आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक्स के खिलाफ बैक्टीरिया को मजबूत बनाते हैं। इसके अलावा, कई नमूनों में beta-lactamase एंजाइम बनाने वाले जीन भी पाए गए, जैसे: blaCTXM (55%) blaCMY (51%) blaSHV (39%) ये एंजाइम महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक्स को निष्क्रिय कर सकते हैं। चौंकाने वाली बात यह रही कि 21% नमूनों में carbapenem रेजिस्टेंस से जुड़े जीन भी मिले–ये एंटीबायोटिक्स आमतौर पर “last-resort” मानी जाती हैं। औसतन 8 रेजिस्टेंस जीन प्रति नवजात हर नमूने में औसतन 8 अलग-अलग रेजिस्टेंस जीन पाए गए, जिससे यह संकेत मिलता है कि नवजात का आंत (gut) पहले से ही “resistome” यानी रेजिस्टेंस जीन के संग्रह से भरा हो सकता है। मां और अस्पताल का असर अध्ययन में यह भी सामने आया कि: गर्भावस्था के दौरान मां के अस्पताल में भर्ती रहने से msrA जीन की मौजूदगी जुड़ी थी जन्म के पहले 24 घंटों में कैथेटर लगाने वाले बच्चों में ज्यादा रेजिस्टेंस जीन पाए गए इससे साफ होता है कि अस्पताल का वातावरण और शुरुआती मेडिकल हस्तक्षेप भी इन जीन के प्रसार में भूमिका निभा सकते हैं। क्या है खतरा और आगे का रास्ता विशेषज्ञों का मानना है कि नवजातों में इतनी जल्दी रेजिस्टेंस जीन का पाया जाना चिंताजनक है। इससे भविष्य में संक्रमण का इलाज कठिन हो सकता है। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि ये जीन आगे चलकर बच्चों के माइक्रोबायोम और स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करेंगे। इसके लिए और रिसर्च की जरूरत है।
दक्षिण कोरिया में किए गए एक बड़े अध्ययन में यह सामने आया है कि शुरुआती उम्र में होने वाला Atopic Dermatitis (AD) बच्चों में आगे चलकर Asthma के जोखिम को काफी बढ़ा सकता है। यह रिसर्च “एटॉपिक मार्च” की अवधारणा को और मजबूत करती है, जिसमें एलर्जी से जुड़ी बीमारियां क्रमिक रूप से विकसित होती हैं। कम उम्र में सबसे ज्यादा खतरा इस अध्ययन में 11 लाख से अधिक बच्चों के डेटा का विश्लेषण किया गया, जिन्हें दो साल की उम्र से पहले एटॉपिक डर्मेटाइटिस हुआ था। रिसर्च के मुताबिक, तीन साल की उम्र में अस्थमा का खतरा सबसे ज्यादा देखा गया, जहां करीब 29% बच्चों में यह समस्या सामने आई। हालांकि उम्र बढ़ने के साथ यह प्रतिशत घटकर 15 साल की उम्र तक 0.5% रह गया, लेकिन यह सामान्य बच्चों की तुलना में लगातार अधिक रहा। किन बच्चों में ज्यादा जोखिम? अध्ययन में कुछ प्रमुख जोखिम कारकों की पहचान भी की गई: लड़कों में ज्यादा खतरा समय से पहले जन्म (Preterm birth) लंबे समय तक बने रहने वाला एटॉपिक डर्मेटाइटिस फूड एलर्जी शुरुआती उम्र में श्वसन संक्रमण, जैसे Respiratory Syncytial Virus इसके अलावा, 2010 से पहले AD से ग्रसित बच्चों में अस्थमा का खतरा अधिक पाया गया, जबकि एक साल की उम्र के बाद AD होने वाले बच्चों में यह जोखिम अपेक्षाकृत कम था। पर्यावरण और सामाजिक स्थिति का असर अध्ययन में यह भी सामने आया कि बेहतर सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के बच्चों में अस्थमा का जोखिम कम था। इससे संकेत मिलता है कि बीमारी के विकास में केवल जैविक ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय कारक भी अहम भूमिका निभाते हैं। डॉक्टर्स के लिए क्या संकेत? विशेषज्ञों का मानना है कि जिन बच्चों में शुरुआती उम्र में एटॉपिक डर्मेटाइटिस होता है, उनकी नियमित निगरानी जरूरी है–खासकर पहले कुछ वर्षों में। समय रहते पहचान और सही देखभाल से अस्थमा के खतरे को कम किया जा सकता है। क्या है इसका महत्व? दुनियाभर में बच्चों में एलर्जी और अस्थमा के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में यह अध्ययन संकेत देता है कि शुरुआती जीवन में जोखिम कारकों को नियंत्रित कर लंबे समय तक होने वाली गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।