अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के खिलाफ प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल कुछ समय के लिए टाल दिया है। ट्रंप ने कहा कि खाड़ी देशों के शीर्ष नेताओं की अपील और ईरान के साथ जारी गंभीर बातचीत को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। ट्रंप के मुताबिक, Tamim bin Hamad Al Thani, Mohammed bin Salman और Mohammed bin Zayed Al Nahyan ने उनसे सीधे संपर्क कर सैन्य कार्रवाई को कुछ दिनों के लिए टालने का अनुरोध किया था। “समझौते की संभावना बढ़ी” ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर जारी बयान में कहा कि खाड़ी देशों की ईरान के साथ “गंभीर बातचीत” चल रही है और कूटनीतिक समाधान की संभावना पहले से अधिक मजबूत दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि इन देशों का मानना है कि यदि अमेरिका कुछ समय इंतजार करे तो बातचीत के जरिए ऐसा समझौता हो सकता है, जिससे ईरान परमाणु हथियार हासिल न कर सके। “उम्मीद है हमला हमेशा के लिए टल जाए” ट्रंप ने कहा कि उन्होंने सैन्य कार्रवाई को “कुछ समय के लिए” रोका है और उम्मीद जताई कि शायद इसकी जरूरत कभी न पड़े। उन्होंने कहा, “अगर बिना बमबारी के मामला सुलझ जाए तो मुझे बहुत खुशी होगी।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बातचीत विफल रहती है तो अमेरिका बड़े सैन्य अभियान के लिए तैयार रहेगा। अमेरिकी सेना को अलर्ट रहने के निर्देश ट्रंप ने बताया कि उन्होंने अमेरिकी रक्षा मंत्री Pete Hegseth, ज्वाइंट चीफ्स चेयरमैन Daniel Caine और अमेरिकी सेना को किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए हैं। खाड़ी देशों में बढ़ी चिंता पिछले कुछ महीनों में कतर, सऊदी अरब और यूएई पर ईरान समर्थित हमलों का दबाव बढ़ा है। ईरान ने 28 फरवरी के बाद हुए हमलों के जवाब में अमेरिकी सहयोगी देशों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी दी थी। ऐसे में खाड़ी देशों का एकजुट होकर अमेरिका से सैन्य कार्रवाई टालने का अनुरोध करना क्षेत्रीय तनाव को कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। पाकिस्तान फिर मध्यस्थ की भूमिका में रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। बताया गया है कि ईरान का संशोधित शांति प्रस्ताव पाकिस्तान के जरिए अमेरिका तक पहुंचाया गया। हालांकि अमेरिकी प्रशासन इस प्रस्ताव से पूरी तरह संतुष्ट नहीं बताया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, नए प्रस्ताव में पहले की तुलना में केवल सीमित बदलाव किए गए हैं। परमाणु कार्यक्रम बना सबसे बड़ा विवाद अमेरिका और ईरान के बीच मुख्य विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बना हुआ है। अमेरिका का दावा है कि ईरान के पास बड़ी मात्रा में संवर्धित यूरेनियम मौजूद है और वह परमाणु हथियार क्षमता की दिशा में बढ़ सकता है। वहीं ईरान ने यूरेनियम संवर्धन के अधिकार से पीछे हटने से इनकार कर दिया है। तेहरान प्रतिबंधों में राहत, जब्त संपत्तियों की वापसी और भविष्य में सैन्य कार्रवाई न होने की गारंटी की मांग कर रहा है। CENTCOM ने जारी रखी नाकेबंदी इस बीच United States Central Command (CENTCOM) ने कहा है कि अमेरिकी सेना ईरानी बंदरगाहों पर लागू प्रतिबंधों को सख्ती से लागू कर रही है। CENTCOM के अनुसार, अब तक 85 व्यावसायिक जहाजों का रास्ता बदला जा चुका है ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों और नाकेबंदी का पालन सुनिश्चित किया जा सके। कूटनीति और सैन्य दबाव दोनों जारी अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन अब भी बातचीत के जरिए समाधान चाहता है, लेकिन साथ ही सैन्य विकल्पों को भी खुला रखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ दिन पश्चिम एशिया की स्थिति के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के चीन दौरे से लौटने के बाद एक बार फिर मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं तो अमेरिका ईरान पर दोबारा बड़े हवाई हमले कर सकता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी रक्षा मुख्यालय Pentagon संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तैयारी में जुटा हुआ है। ‘शांति प्रस्ताव पसंद नहीं आया’ रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की ओर से भेजे गए हालिया शांति प्रस्ताव को ट्रंप ने खारिज कर दिया। उन्होंने कथित तौर पर कहा, “मैंने उस प्रस्ताव को देखा और उसकी पहली लाइन ही मुझे पसंद नहीं आई, इसलिए मैंने उसे फेंक दिया।” ट्रंप के इस बयान को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 2.0’ की तैयारी? अमेरिकी अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पिछले संघर्ष के दौरान रोके गए “Operation Epic Fury” को नए रूप में फिर शुरू करने की योजना बनाई जा रही है। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन की ओर से आधिकारिक तौर पर “Operation Epic Fury 2.0” नाम की किसी सैन्य कार्रवाई की पुष्टि नहीं की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी और इजरायली सेनाएं संयुक्त युद्धाभ्यास और सैन्य तैयारियों में लगी हुई हैं। अगले सप्ताह हमले की आशंका? मध्य पूर्व के कुछ अधिकारियों के हवाले से दावा किया गया है कि सैन्य तैयारियां काफी आगे बढ़ चुकी हैं और जरूरत पड़ने पर अगले सप्ताह की शुरुआत में कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। होर्मुज स्ट्रेट बना वैश्विक चिंता का केंद्र तनाव के बीच Strait of Hormuz को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। दुनिया के कई देश चाहते हैं कि वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित होने से बचाने के लिए इस समुद्री मार्ग को खुला रखा जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बढ़ता है तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार, शिपिंग और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। सीजफायर के बाद फिर बढ़ा तनाव पिछले महीने संघर्षविराम के बाद कुछ समय के लिए हालात शांत हुए थे, लेकिन अब दोनों पक्षों के बयानों और सैन्य गतिविधियों ने एक बार फिर तनाव बढ़ा दिया है। ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि किसी भी हमले का जवाब दिया जाएगा, जबकि अमेरिका लगातार यह कहता रहा है कि वह ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा। दुनिया की नजर मध्य पूर्व पर मध्य पूर्व में जारी घटनाक्रम पर दुनिया की नजर बनी हुई है। अमेरिका, ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों के बीच बढ़ती गतिविधियों ने क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। किसी आधिकारिक सैन्य कार्रवाई की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट्स और राजनीतिक बयानों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को फिर से सक्रिय कर दिया है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और समुद्री सुरक्षा चिंताओं के बीच भारत के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। भारत के लिए एलपीजी लेकर आ रहे दो टैंकर सुरक्षित रूप से होर्मुज स्ट्रेट पार कर चुके हैं। अधिकारियों के मुताबिक, क्षेत्र में तनाव के बावजूद भारतीय जहाजों की आवाजाही जारी है और अब तक 13 भारतीय पोत इस अहम समुद्री मार्ग को सफलतापूर्वक पार कर चुके हैं। दो एलपीजी टैंकर सुरक्षित भारत की ओर रवाना बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव Mukesh Mangal ने बताया कि ‘सिमी’ नाम का एलपीजी टैंकर 13 मई को होर्मुज स्ट्रेट पार कर गया। वहीं ‘एनवी सनशाइन’ टैंकर ने भी गुरुवार को सुरक्षित रूप से यह मार्ग पार कर लिया। अधिकारियों के अनुसार, दोनों जहाज भारत के लिए एलपीजी लेकर आ रहे हैं और उनकी सुरक्षित आवाजाही भारत की ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से अहम मानी जा रही है। कांडला और मंगलूरु पहुंचेंगे टैंकर मार्शल द्वीप के ध्वज वाला ‘सिमी’ टैंकर करीब 19,965 टन एलपीजी लेकर भारत आ रहा है। इसके 16 मई को Kandla पहुंचने की संभावना है। वहीं वियतनाम के ध्वज वाला ‘एनवी सनशाइन’ संयुक्त अरब अमीरात की रुवैस रिफाइनरी से 46,427 टन एलपीजी लेकर रवाना हुआ है और इसके 18 मई को Mangaluru पहुंचने की उम्मीद है। दोनों जहाजों में मौजूद एलपीजी Indian Oil Corporation यानी IOC का बताया जा रहा है। अब तक 13 भारतीय जहाजों ने पार किया मार्ग अधिकारियों के मुताबिक, अमेरिका-इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बाद यह समुद्री क्षेत्र कुछ समय के लिए प्रभावित हुआ था। इसके बावजूद अब तक कुल 13 भारतीय जहाज होर्मुज स्ट्रेट पार कर चुके हैं। इनमें देश गरिमा, शिवालिक, ग्रीन सान्वी, नंदा देवी, पाइन गैस और एमवी सर्वशक्ति जैसे पोत शामिल हैं। हालांकि अभी भी खाड़ी क्षेत्र में करीब 12 भारतीय जहाज फंसे हुए बताए जा रहे हैं। ओमान के पास हमले में डूबी भारतीय नौका इसी बीच भारत के ध्वज वाली ‘हाजी अली’ नाम की मशीनी पाल नौका ओमान के जलक्षेत्र में हमले का शिकार हो गई। हमले के बाद लकड़ी से बनी इस पारंपरिक नौका में आग लग गई और बाद में यह समुद्र में डूब गई। यह नौका सोमालिया से UAE के शारजाह जा रही थी। अधिकारियों के मुताबिक नौका पर सवार चालक दल के सभी 14 सदस्यों को ओमान तटरक्षक बल ने सुरक्षित बचा लिया है। चालक दल सुरक्षित, भारत लाने की तैयारी अधिकारियों ने बताया कि सभी चालक दल के सदस्यों को ओमान के डिब्बा बंदरगाह पहुंचाया गया है और उनकी स्थिति सुरक्षित है। भारत सरकार ओमान प्रशासन और भारतीय दूतावास के संपर्क में है और उन्हें जल्द भारत वापस लाने की तैयारी की जा रही है। ऊर्जा आपूर्ति पर बनी हुई है नजर पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कई विदेशी जहाजों की आवाजाही भी प्रभावित हुई है। ऐसे में भारत लगातार अपनी ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों पर नजर बनाए हुए है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है।
United States और Iran के बीच बढ़ते तनाव का असर अब सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका आर्थिक दबाव भी तेजी से बढ़ रहा है। United States Department of Defense (पेंटागन) ने हाल ही में इस संघर्ष की लागत 29 अरब डॉलर बताई है। खास बात यह है कि दो हफ्ते पहले यही अनुमान 25 अरब डॉलर था। यानी केवल 14 दिनों में खर्च का अनुमान 4 अरब डॉलर बढ़ गया। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों के अनुसार नए आंकड़ों में हथियारों की मरम्मत, पुराने उपकरणों को बदलने और सैन्य ऑपरेशन की लागत को शामिल किया गया है। विशेषज्ञ बोले- असली खर्च कहीं ज्यादा हो सकता है हालांकि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार द्वारा बताए जा रहे आंकड़े वास्तविक लागत से काफी कम हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार पहले जारी किए गए 25 अरब डॉलर के अनुमान में मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हुए नुकसान और उनकी मरम्मत का खर्च पूरी तरह शामिल नहीं था। इसी वजह से अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या अमेरिकी प्रशासन जनता के सामने युद्ध की वास्तविक आर्थिक तस्वीर नहीं रख रहा। हार्वर्ड विशेषज्ञ ने जताई 1 ट्रिलियन डॉलर खर्च की आशंका Harvard Kennedy School की सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ Linda Bilmes ने चेतावनी दी है कि यह युद्ध अमेरिकी टैक्सपेयर्स पर कम से कम 1 ट्रिलियन डॉलर का बोझ डाल सकता है। उनके मुताबिक इतिहास बताता है कि युद्धों की वास्तविक लागत शुरुआती अनुमानों से कई गुना ज्यादा होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि इराक युद्ध को शुरू में सस्ता बताया गया था, लेकिन बाद में उसकी लागत 5 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा पहुंच गई। क्यों तेजी से बढ़ रहा है सैन्य खर्च? विशेषज्ञों के अनुसार युद्ध की लागत कई स्तरों पर बढ़ती है। अल्पकालिक खर्च मिसाइल और बम इंटरसेप्टर सिस्टम लड़ाकू विमानों का रखरखाव सैनिकों का वेतन और तैनाती सबसे महंगी चीज- हथियारों की रिप्लेसमेंट कॉस्ट उदाहरण के तौर पर, सेना के स्टॉक में मौजूद Tomahawk missile की पुरानी लागत करीब 20 लाख डॉलर थी, लेकिन अब उसी मिसाइल को दोबारा बनाने या खरीदने में 35 लाख डॉलर तक खर्च हो रहा है। दीर्घकालिक खर्च सैन्य ठिकानों की मरम्मत नई रक्षा तकनीकों की खरीद मध्य पूर्व में तैनात लगभग 55,000 अमेरिकी सैनिकों की स्वास्थ्य सेवाएं पूर्व सैनिक कल्याण (Veterans Care) विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध खत्म होने के बाद भी इसका आर्थिक बोझ कई वर्षों तक बना रहता है। आम अमेरिकी नागरिक पर भी पड़ रहा असर युद्ध का असर अब अमेरिकी आम जनता की जिंदगी में भी दिखाई देने लगा है। ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रह सकती हैं। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर तनाव कम नहीं हुआ तो अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत 5 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच सकती है। इसका सीधा असर महंगाई, ट्रांसपोर्ट खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
मिडिल ईस्ट: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। अमेरिकी वायुसेना का KC-135 Stratotanker इमरजेंसी सिग्नल भेजने के बाद अचानक रडार से गायब हो गया, जिससे सुरक्षा एजेंसियों में हड़कंप मच गया है। 7700 कोड भेजते ही गायब हुआ विमान फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, इस टैंकर विमान ने कतर के पास उड़ान के दौरान “7700” स्क्वॉक कोड ट्रांसमिट किया। यह एक अंतरराष्ट्रीय इमरजेंसी सिग्नल होता है, जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब विमान किसी गंभीर संकट का सामना कर रहा हो। इसके कुछ ही समय बाद विमान रडार से गायब हो गया। आखिरी लोकेशन: होर्मुज़ जलडमरूमध्य रिपोर्ट्स के मुताबिक, विमान ने अपनी ऊंचाई कम की और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के ऊपर सिग्नल खो दिया। माना जा रहा है कि यह उस समय एयर-टू-एयर रीफ्यूलिंग मिशन पर था और किसी सैन्य बेस की ओर बढ़ रहा था। एक घंटे बाद पूरी तरह बंद हुआ सिग्नल मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इमरजेंसी कोड भेजे जाने के करीब एक घंटे बाद विमान का ट्रांसपोंडर सिग्नल पूरी तरह बंद हो गया। हालांकि केवल सिग्नल खोना किसी दुर्घटना की पुष्टि नहीं करता, लेकिन इमरजेंसी अलर्ट के बाद ऐसा होना चिंता बढ़ा रहा है। क्या हो सकती हैं वजहें? विशेषज्ञों के अनुसार 7700 कोड कई कारणों से ट्रिगर हो सकता है, जैसे: तकनीकी खराबी इंजन या सिस्टम फेल होना आग लगना मेडिकल इमरजेंसी बाहरी खतरा या हमले की आशंका फिलहाल किसी भी वजह की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। नहीं मिला कोई मलबा या SOS संकेत अब तक न तो किसी मलबे का पता चला है, न ही कोई डिस्टेस कॉल (SOS) या रेस्क्यू ऑपरेशन की पुष्टि हुई है। विमान में मौजूद क्रू मेंबर्स की संख्या भी स्पष्ट नहीं है, हालांकि KC-135 आमतौर पर सीमित क्रू के साथ उड़ान भरता है। क्यों अहम है यह घटना? होर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का सबसे अहम मार्ग माना जाता है। इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य या तकनीकी घटना का असर सिर्फ क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। ऐसे में इस अमेरिकी टैंकर विमान का अचानक गायब होना रणनीतिक और सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। तनाव के बीच बढ़ी चिंता ईरान-अमेरिका तनाव के बीच इस तरह की घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं–क्या यह तकनीकी खराबी थी या किसी बड़े घटनाक्रम का संकेत? फिलहाल सभी की नजरें आधिकारिक बयान और आगे आने वाली जानकारी पर टिकी हैं।
‘रोल प्ले’ के नाम पर रची गई खौफनाक साजिश बेंगलुरु से एक सनसनीखेज हत्या का मामला सामने आया है, जिसने सभी को झकझोर कर रख दिया है। पुलिस जांच में खुलासा हुआ है कि 29 वर्षीय किरण की हत्या उसकी प्रेमिका प्रेमा ने बेहद सुनियोजित तरीके से की। आरोपी ने ‘रोल प्ले’ का बहाना बनाकर किरण को अपने घर बुलाया, जहां पहले उसे रस्सी से बांधा गया और फिर उस पर केरोसिन डालकर आग लगा दी गई। रिश्ते में दरार और जलन बनी हत्या की वजह पुलिस के अनुसार, किरण और प्रेमा एक मोबाइल सर्विस स्टोर में साथ काम करते थे और दोनों के बीच प्रेम संबंध था। प्रेमा इस रिश्ते को शादी तक ले जाना चाहती थी, लेकिन किरण इससे दूरी बनाने लगा था। मामला तब और बिगड़ गया जब किरण ने अपनी एक्स गर्लफ्रेंड से दोबारा संपर्क किया और उसके साथ जन्मदिन मनाया। यह बात प्रेमा को नागवार गुजरी और इसी से उसके मन में बदले की भावना पैदा हुई। पहले से की थी हत्या की पूरी तैयारी जांच में सामने आया है कि प्रेमा ने इस वारदात को अंजाम देने से पहले पूरी योजना बना ली थी। उसने पेट्रोल, केरोसिन और रस्सी का इंतजाम पहले ही कर लिया था। इसके बाद उसने अकेले में मिलने के बहाने किरण को अपने घर बुलाया और वारदात को अंजाम दिया। घटना के बाद मची अफरा-तफरी घटना के बाद आसपास के लोगों ने आग बुझाने की कोशिश की, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। सूचना मिलने पर पुलिस और फायर ब्रिगेड मौके पर पहुंची। किरण के पिता की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया और पूछताछ में प्रेमा ने अपना जुर्म कबूल कर लिया। पुलिस जांच जारी पुलिस ने आरोपी के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया है और आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि रिश्तों में बढ़ती असुरक्षा और भावनात्मक असंतुलन किस तरह खतरनाक रूप ले सकता है।
सीजफायर के बीच फिर शुरू हो सकती है बातचीत Donald Trump ने ईरान-अमेरिका तनाव के बीच बड़ा संकेत देते हुए कहा है कि अगले 36 से 72 घंटों में शांति वार्ता को लेकर “अच्छी खबर” आ सकती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देशों के बीच दूसरी दौर की बातचीत की संभावना बन रही है, हालांकि स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। पाकिस्तान बना मध्यस्थ, बैकचैनल बातचीत तेज Pakistan इस पूरे मामले में अहम भूमिका निभा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस्लामाबाद के जरिए बैकचैनल डिप्लोमेसी जारी है, जिससे बातचीत दोबारा शुरू होने की उम्मीद बढ़ी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों पक्षों के बीच सीजफायर अभी तक काफी हद तक कायम है, जो सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। ईरान से ‘एकजुट प्रस्ताव’ का इंतजार Donald Trump ने हाल ही में सीजफायर को आगे बढ़ाने का ऐलान किया था और कहा था कि अमेरिका, Iran की ओर से एक “संयुक्त प्रस्ताव” का इंतजार कर रहा है। इसके बाद ही आगे की वार्ता शुरू होगी। हालांकि, ईरान ने अभी तक नए दौर की बातचीत में शामिल होने की पुष्टि नहीं की है। होर्मुज जलडमरूमध्य में हमले, बढ़ी चिंता इस बीच Strait of Hormuz में हालात फिर तनावपूर्ण हो गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने तीन जहाजों पर हमला किया, जिनमें से दो को कब्जे में ले लिया गया। यह इलाका दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है, ऐसे में यहां बढ़ती गतिविधियां वैश्विक चिंता का कारण बन रही हैं। लेबनान में भी जारी हिंसा Lebanon में भी स्थिति स्थिर नहीं है। दक्षिणी इलाके में एक वाहन पर हुए हमले में दो लोगों की मौत हो गई। यह हमला सीजफायर लागू होने के बावजूद हुआ, जिससे क्षेत्रीय शांति पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों की राय: उम्मीद और खतरे दोनों विशेषज्ञों का मानना है कि एक तरफ बातचीत की संभावना बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर जारी हिंसा शांति प्रक्रिया को कमजोर कर सकती है। अगर अगले 72 घंटों में सकारात्मक संकेत मिलते हैं, तो यह मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है।
दक्षिणी लेबनान में फिर भड़की हिंसा, सीजफायर पर सवाल इजरायल और लेबनान के बीच जारी अस्थायी सीजफायर के बावजूद एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। दक्षिणी लेबनान में इजरायली हवाई हमले में एक महिला पत्रकार सहित कुल 5 लोगों की मौत हो गई है। इस घटना ने पहले से ही कमजोर चल रहे सीजफायर समझौते पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हमला लेबनान के अत-तिरी गांव और आसपास के इलाकों में किया गया, जहां दो वाहनों और बाद में एक इमारत को निशाना बनाया गया। पत्रकारों पर हमला, अमल खलील की मौत घटना के दौरान दो पत्रकार मौके पर कवरेज के लिए पहुंचे थे, तभी दूसरा हवाई हमला हुआ। इस हमले में दोनों पत्रकार गंभीर रूप से घायल हो गए। बाद में मलबे से निकालने के दौरान महिला पत्रकार अमल खलील की मौत हो गई। अमल खलील स्थानीय मीडिया संस्थान “अल-अखबार” के लिए काम करती थीं। उनकी मौत के बाद मीडिया जगत में शोक की लहर है और पत्रकार सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है। इजरायली सेना का दावा – हिज्बुल्लाह को बनाया निशाना इजरायल डिफेंस फोर्स (IDF) ने बयान जारी करते हुए कहा है कि यह हमला हिज्बुल्लाह की गतिविधियों के जवाब में किया गया। सेना के अनुसार, दक्षिणी लेबनान में दो संदिग्ध लोग इजरायली सैनिकों के करीब पहुंच रहे थे, जिसके बाद खतरे को देखते हुए कार्रवाई की गई। इजरायल का दावा है कि हिज्बुल्लाह सीजफायर का उल्लंघन कर रहा है और सैन्य ठिकानों के पास गतिविधियां बढ़ा रहा है। लेबनान ने लगाया आरोप, पत्रकारों पर हमला निंदनीय लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इजरायली हमले की कड़ी निंदा की है। वहीं सूचना मंत्री ने कहा कि बचाव कार्य के दौरान भी हमला किया गया, जो बेहद गंभीर और अस्वीकार्य है। सरकार ने इसे मीडिया की स्वतंत्रता और मानवीय सुरक्षा पर हमला बताया है। सीजफायर पर फिर मंडराया संकट इस ताजा घटना के बाद इजरायल-लेबनान सीजफायर एक बार फिर खतरे में दिख रहा है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं, जिससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयासों पर अनिश्चितता गहराती जा रही है। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि ईरान के परमाणु ठिकानों को “पूरी तरह तबाह” कर दिया गया है, जिससे बातचीत की संभावनाओं पर भी असर पड़ सकता है। ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ का दावा ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर कहा कि “ऑपरेशन मिडनाइट हैमर” के तहत ईरान के परमाणु ठिकानों को खाक कर दिया गया है। उनके मुताबिक, इन ठिकानों को दोबारा उपयोग में लाना अब बेहद मुश्किल होगा और इसके लिए लंबा समय लगेगा। उन्होंने इस दौरान अमेरिकी मीडिया–खासकर CNN–पर भी निशाना साधते हुए “फेक न्यूज” करार दिया और आरोप लगाया कि उनकी उपलब्धियों को जानबूझकर कम करके दिखाया जा रहा है। ईरान का पलटवार–‘धमकियों में बातचीत नहीं’ ईरान ने ट्रंप के इन दावों और दबाव की रणनीति को सिरे से खारिज कर दिया है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका बातचीत को “आत्मसमर्पण” में बदलना चाहता है, जिसे तेहरान कभी स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर हालात बिगड़ते हैं, तो ईरान भी अपने नए सैन्य कदम उठाने के लिए तैयार है और “मैदान-ए-जंग में नए पत्ते खोल सकता है।” सीजफायर पर भी असमंजस इस बीच ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि 22 अप्रैल को खत्म हो रहे युद्धविराम को आगे बढ़ाने के पक्ष में वे नहीं हैं। इससे क्षेत्र में फिर से टकराव बढ़ने की आशंका गहरा गई है। हालांकि पहले यह योजना थी कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल–जिसमें जेडी वेंस और जैरेड कुशनर जैसे नाम शामिल थे–इस्लामाबाद जाकर बातचीत करेगा, लेकिन ईरान की अनिच्छा के कारण यह पहल अधर में लटकी हुई है। बढ़ता तनाव, घटती बातचीत की उम्मीद एक तरफ अमेरिका सैन्य दबाव बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर ईरान सख्त रुख अपनाए हुए है। ऐसे में साफ संकेत मिल रहे हैं कि फिलहाल कूटनीतिक रास्ता मुश्किल होता जा रहा है और हालात फिर से टकराव की ओर बढ़ सकते हैं।
Iran US Tension: ईरान और अमेरिका के बीच संभावित बातचीत की अटकलों के बीच तेहरान ने सख्त रुख अपनाया है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिकी दबाव और धमकियों के बीच किसी भी वार्ता को स्वीकार नहीं करेगा। ईरान का तीखा बयान ईरानी संसद (मजलिस) के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अमेरिका पर तीखा हमला बोला। उन्होंने लिखा: “ट्रंप घेराबंदी और युद्धविराम तोड़कर बातचीत की मेज़ को आत्मसमर्पण की मेज़ बनाना चाहते हैं या फिर युद्ध को सही ठहराना चाहते हैं।” ग़ालिबाफ़ ने साफ कहा कि ईरान “धमकियों के साये में बातचीत” नहीं करेगा। ‘मैदान-ए-जंग में नए पत्ते खोलने की तैयारी’ ग़ालिबाफ़ ने अपने बयान में संकेत दिया कि ईरान सैन्य विकल्पों के लिए भी तैयार है। उन्होंने कहा: “पिछले दो हफ्तों से हमने मैदान-ए-जंग में नए पत्ते खोलने की तैयारी कर ली है।” यह बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है। ट्रंप की रणनीति पर सवाल अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump लगातार ईरान पर दबाव बना रहे हैं और समझौते की बात कर रहे हैं। लेकिन ईरान का आरोप है कि: अमेरिका एक तरफ बातचीत की बात करता है दूसरी तरफ सैन्य दबाव और नाकेबंदी जारी रखता है पाकिस्तान में वार्ता पर अनिश्चितता Islamabad में दूसरे दौर की बातचीत की तैयारियां चल रही हैं। अमेरिका ने अपना प्रतिनिधिमंडल भेजने की बात कही है। हालांकि, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा: अभी तक वार्ता को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है ईरान फिलहाल स्थिति का आकलन कर रहा है पहले दौर की बातचीत का संदर्भ ईरान और अमेरिका के बीच पहले दौर की बातचीत पहले ही हो चुकी है, जिसमें Mohammad Bagher Ghalibaf ने ईरान का नेतृत्व किया था। हालांकि, वह वार्ता किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी।
US Iran War: ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। इस्लामाबाद में प्रस्तावित दूसरे दौर की वार्ता फिलहाल स्थगित हो गई है, क्योंकि ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह फिलहाल किसी भी बातचीत में शामिल होने के मूड में नहीं है। इसी बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत की खबर सामने आई है। ईरान ने बातचीत से किया इनकार ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने साफ कहा है कि तेहरान के पास फिलहाल अमेरिका के साथ किसी भी नए दौर की वार्ता की कोई योजना नहीं है। यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान में शांति वार्ता की कोशिशें तेज थीं और मध्यस्थता की तैयारी चल रही थी। मुनीर-ट्रंप फोन कॉल में क्या हुआ? रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत की। इस बातचीत में बताया गया कि: होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव वार्ता के लिए सबसे बड़ा रोड़ा है ईरान की स्थिति के कारण बातचीत आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा है बताया जा रहा है कि ट्रंप ने इस मुद्दे पर “गंभीरता से विचार करने” की बात कही है। होर्मुज संकट बना मुख्य वजह होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका और ईरान दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। हाल ही में: अमेरिका ने ईरानी ध्वज वाले मालवाहक पोत को रोका ईरान ने इसे “समुद्री डकैती” बताया दोनों देशों के बीच समुद्री तनाव और बढ़ गया अमेरिकी कार्रवाई और ईरान की चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, ईरानी जहाज “तुस्का” को रुकने की चेतावनी दी गई और फिर उसे नियंत्रित कर लिया गया। अमेरिका का दावा है कि: जहाज प्रतिबंधों से बचने की कोशिश कर रहा था अमेरिकी मरीन ने उसे सुरक्षित रूप से कब्जे में लिया वहीं ईरान ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है। पहली बार नाकेबंदी के बाद बड़ी घटना अमेरिकी नाकेबंदी अभियान शुरू होने के बाद यह पहली बड़ी घटना है जब किसी ईरानी पोत को सीधे रोका गया है। ईरान का कहना है कि यह: समुद्री डकैती जैसा कदम है और युद्धविराम की शर्तों का उल्लंघन है सीजफायर पर भी खतरा ईरान और अमेरिका के बीच जारी 14 दिनों का सीजफायर 22 अप्रैल को खत्म हो रहा है। ऐसे में: वार्ता की अनिश्चितता बढ़ गई है होर्मुज तनाव ने स्थिति और जटिल बना दी है पाकिस्तान की मध्यस्थता पर भी सवाल उठ रहे हैं
मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं। Gulf of Oman में United States और Iran के बीच सीधा सैन्य टकराव जैसी स्थिति बन गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका द्वारा ईरानी मर्चेंट शिप पर कार्रवाई के बाद तेहरान ने जवाबी कदम उठाते हुए अमेरिकी युद्धपोतों की ओर ड्रोन भेजे हैं। क्या हुआ ओमान की खाड़ी में? ईरानी मीडिया के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार: अमेरिकी सेना ने ईरान के एक व्यापारिक जहाज़ को निशाना बनाया जहाज़ को रोककर उसे वापस ईरानी समुद्री सीमा में भेजने की कोशिश की गई इस कार्रवाई को ईरान ने “उकसावे वाली” कार्रवाई बताया इसके जवाब में: ईरान की सेना और Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) ने अमेरिकी युद्धपोतों की दिशा में ड्रोन तैनात किए IRGC का दावा है कि अमेरिकी नौसेना को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है, जिससे स्थिति और धुंधली बनी हुई है। होर्मुज और खाड़ी की रणनीतिक अहमियत Strait of Hormuz और Gulf of Oman वैश्विक तेल व्यापार के सबसे अहम मार्गों में गिने जाते हैं। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है यहां किसी भी तरह का सैन्य टकराव सीधे तेल कीमतों और सप्लाई पर असर डाल सकता है इसी वजह से इस क्षेत्र में बढ़ती हर गतिविधि को वैश्विक स्तर पर गंभीरता से देखा जा रहा है। जहाज़ ‘टूस्का’ पर कार्रवाई अमेरिका ने एक और बड़ा दावा करते हुए कहा कि उसने ‘टूस्का’ नाम के ईरानी जहाज़ को रोक लिया है। United States Central Command (CENTCOM) के अनुसार कई बार चेतावनी देने के बाद भी जहाज़ नहीं रुका इसके बाद अमेरिकी युद्धपोत USS Spruance ने उसके इंजन रूम पर फायरिंग की जहाज़ को निष्क्रिय कर अमेरिका ने अपने कब्जे में ले लिया इस कार्रवाई की पुष्टि Donald Trump ने भी की है। ईरान का पलटवार और आरोप ईरान ने इस पूरी घटना को “समुद्री डकैती” करार दिया है। तेहरान का कहना है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा है IRGC ने चेतावनी दी है कि अगर नाकेबंदी जारी रही तो होर्मुज पूरी तरह बंद रहेगा साथ ही, ईरान ने कुछ विदेशी टैंकरों को भी रास्ते से वापस भेजा है, जिससे तनाव और बढ़ गया है। सीजफायर पर भी सवाल ईरान ने आरोप लगाया है कि 8 अप्रैल को घोषित युद्धविराम का अमेरिका ने उल्लंघन किया है। तेहरान का कहना है कि पहले अमेरिका अपनी नाकेबंदी हटाए तभी किसी भी तरह की बातचीत संभव होगी यानी कूटनीतिक रास्ते फिलहाल कमजोर पड़ते दिख रहे हैं। क्या बढ़ सकता है युद्ध? विशेषज्ञ मानते हैं कि हालात बेहद नाजुक हैं: दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं छोटे-छोटे टकराव बड़े संघर्ष में बदल सकते हैं ड्रोन, नौसैनिक कार्रवाई और नाकेबंदी–तीनों मिलकर जोखिम बढ़ा रहे हैं ओमान की खाड़ी में हुआ यह घटनाक्रम सिर्फ एक क्षेत्रीय झड़प नहीं, बल्कि वैश्विक संकट का संकेत हो सकता है। एक ओर अमेरिका अपनी सैन्य ताकत दिखा रहा है, तो दूसरी ओर ईरान भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि: क्या यह टकराव कूटनीति से सुलझेगा या फिर मिडिल ईस्ट एक बड़े युद्ध की ओर बढ़ रहा है
वैश्विक व्यापार मार्गों की सुरक्षा के लिए 51 देशों की बैठक के बाद फैसला होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और समुद्री व्यापार पर खतरे को देखते हुए अब यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस ने एक बड़ा कदम उठाया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने घोषणा की है कि दोनों देश मिलकर एक बहुराष्ट्रीय (Multinational) रक्षा मिशन का नेतृत्व करेंगे, जिसका उद्देश्य समुद्री व्यापार मार्गों को सुरक्षित रखना होगा। यह फैसला 51 देशों की एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद लिया गया है, जिसमें कई देशों ने इस मिशन में सहयोग देने की इच्छा जताई है। मिशन होगा पूरी तरह शांतिपूर्ण और रक्षात्मक ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने साफ कहा है कि यह मिशन किसी भी तरह की आक्रामक कार्रवाई के लिए नहीं होगा। इसका उद्देश्य केवल: वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा समुद्री मार्गों की निगरानी और बारूदी सुरंगों (माइन) को हटाना होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह मिशन तब पूरी तरह लागू होगा जब क्षेत्र में चल रहा संघर्ष समाप्त हो जाएगा। होर्मुज़ जलडमरूमध्य क्यों है अहम? होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। इसी रास्ते से बड़े पैमाने पर तेल और गैस का परिवहन होता है। हाल ही में इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने के बाद वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला था, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव से बढ़ी स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, हाल के संघर्ष के दौरान ईरान पर इस जलमार्ग को बाधित करने के आरोप लगे थे। हालांकि बाद में ईरान के विदेश मंत्री ने दावा किया कि यह मार्ग अब पूरी तरह खुला है। उधर, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी बयान दिया कि समुद्री रास्ते फिर से चालू हो गए हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने नाटो की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उसे “जरूरत के समय कमजोर” बताया। ब्रिटेन और फ्रांस की संयुक्त अगुवाई कीर स्टारमर और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि इस मिशन में दर्जनों देश शामिल हो सकते हैं। कई देशों ने अपने सैन्य और तकनीकी संसाधन देने की पेशकश भी की है। मैक्रों ने कहा कि हालात में सुधार के संकेत जरूर हैं, लेकिन अभी सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि इस क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। जर्मनी समेत कई देशों का समर्थन जर्मनी ने भी इस मिशन का समर्थन करते हुए कहा है कि वह नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। साथ ही, यह भी माना जा रहा है कि अमेरिका की भागीदारी इस मिशन को और मजबूत बना सकती है। अगले हफ्ते आएगा पूरा रोडमैप ब्रिटेन सरकार ने बताया है कि इस मिशन की विस्तृत योजना अगले हफ्ते लंदन में होने वाली सैन्य बैठक के बाद सार्वजनिक की जाएगी।
हॉर्मुज संकट के बाद ट्रंप का तीखा बयान अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) पर कड़ा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जब हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव चरम पर था, तब NATO ने कोई प्रभावी मदद नहीं की, लेकिन स्थिति सामान्य होने के बाद सहायता की पेशकश की गई। “अब आपकी मदद की जरूरत नहीं” – ट्रंप एरिजोना में आयोजित Turning Point USA कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने कहा कि NATO ने अमेरिका से तब संपर्क किया जब हालात लगभग स्थिर हो चुके थे। उन्होंने कहा कि अगर मदद चाहिए थी, तो “दो महीने पहले चाहिए थी, अब नहीं।” ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “वे उस समय पूरी तरह बेकार साबित हुए जब हमें उनकी जरूरत थी। लेकिन सच यह है कि हमें उनकी जरूरत कभी नहीं थी, उन्हें हमारी जरूरत थी।” हॉर्मुज संकट और वैश्विक तनाव यह बयान उस समय आया है जब हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के चलते हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक सुर्खियों में रहा। यह वही समुद्री मार्ग है, जिससे दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का परिवहन होता है। हालांकि अब स्थिति कुछ हद तक स्थिर बताई जा रही है, लेकिन क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। नाटो को बताया ‘पेपर टाइगर’ ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में NATO को “पेपर टाइगर” तक कह दिया। उन्होंने लिखा कि संकट के दौरान संगठन कमजोर और निष्क्रिय रहा, लेकिन अब जब स्थिति सुधर रही है, तो मदद की बात कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर NATO को सहयोग करना ही है, तो वे “तेल ले जाने के लिए जहाज भर सकते हैं।” क्षेत्रीय देशों की तारीफ अपने बयान में ट्रंप ने खाड़ी क्षेत्र के कुछ देशों की तारीफ भी की। उन्होंने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर का उल्लेख करते हुए कहा कि इन देशों ने संकट के दौरान स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। ईरान और हॉर्मुज को लेकर स्थिति ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पुष्टि की है कि युद्धविराम अवधि में सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहेगा। हालांकि अमेरिका ने इस क्षेत्र में कड़ा रुख बनाए रखा है और नौसैनिक दबाव जारी है। ट्रंप का यह बयान एक बार फिर अमेरिका और NATO के बीच मतभेद को उजागर करता है। साथ ही यह भी दिखाता है कि हॉर्मुज संकट ने वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों पर गहरा असर डाला है।
नई दिल्ली: करीब 45 दिनों के तनाव के बाद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की अहम धुरी Strait of Hormuz को पूरी तरह जहाजों के लिए खोल दिया गया है। इस फैसले से भारत समेत दुनिया भर के आयातकों को बड़ी राहत मिली है। भारत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल और गैस का इसी मार्ग से आता है, ऐसे में सप्लाई सामान्य होने की उम्मीद बढ़ गई है। 41 जहाज भारत आने को तैयार मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, India की ओर बढ़ रहे 41 जहाज इस समय होर्मुज पार करने के लिए तैयार हैं। इनमें: 15 भारतीय जहाज 26 विदेशी जहाज इन जहाजों में कच्चा तेल, LPG, LNG और उर्वरक (फर्टिलाइजर) लदा हुआ है। खास बात यह है कि एक दर्जन से ज्यादा जहाजों में फर्टिलाइजर है, जो आगामी खरीफ सीजन के लिए बेहद जरूरी माना जा रहा है। क्या-क्या आ रहा है भारत? भारतीय जहाजों में: 10 जहाज कच्चा तेल (Crude Oil) 4 जहाज LPG 3 जहाज LNG लेकर आ रहे हैं यह सप्लाई देश में ऊर्जा संकट की आशंका को काफी हद तक कम कर सकती है। क्यों बंद हुआ था होर्मुज? 28 फरवरी को United States और Israel द्वारा Iran पर हमले के बाद ईरान ने इस जलमार्ग को बंद कर दिया था। इससे वैश्विक बाजार में हड़कंप मच गया था, क्योंकि दुनिया का करीब: 20% कच्चा तेल 30% प्राकृतिक गैस इसी रास्ते से गुजरती है। कीमतों में गिरावट, व्यापार को बढ़ावा Strait of Hormuz के खुलने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि: फ्रेट रेट्स कम होंगे निर्यात-आयात सस्ता होगा सप्लाई चेन सामान्य होगी निर्यातकों को भी राहत निर्यातकों को उम्मीद है कि पश्चिम एशिया में मांग फिर से बढ़ेगी। साथ ही यूरोप तक सामान भेजने का रास्ता भी छोटा और तेज हो जाएगा। इससे भारत के व्यापार को नई गति मिल सकती है। आने वाले दिनों में स्थिति होगी साफ अधिकारियों के मुताबिक, आने वाले कुछ दिनों में और जहाजों के इस रूट से गुजरने के बाद पूरी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। आमतौर पर होर्मुज पार करने के बाद जहाजों को भारत पहुंचने में 4 से 6 दिन का समय लगता है।
ईरान के बयान से बढ़ी उलझन हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर एक बड़ा बयान सामने आया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि युद्धविराम अवधि के दौरान यह समुद्री रास्ता सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए “पूरी तरह खुला” रहेगा। लेकिन इसी घोषणा के बाद स्थिति और अधिक जटिल हो गई है। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड की सख्त शर्तें ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड ने साफ किया है कि इस मार्ग से गुजरने वाले हर जहाज को पहले उनकी अनुमति लेनी होगी। साथ ही तय मार्ग का ही उपयोग करना होगा। सैन्य जहाजों के प्रवेश पर अब भी रोक जारी है। इसे गार्ड ने “नई व्यवस्था” बताया है। ईरान के अंदर ही बयान पर असहमति ईरान के ही कुछ सरकारी मीडिया संस्थानों ने विदेश मंत्री के बयान पर सवाल उठाए हैं। तस्नीम न्यूज ने इसे “अधूरा और भ्रम पैदा करने वाला” बताया, जबकि मेहर न्यूज ने कहा कि रणनीतिक हालात को देखते हुए यह मार्ग पूरी तरह बंद रहना चाहिए। अमेरिका और ट्रंप का दावा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह खुल चुका है और उन्होंने ईरान को धन्यवाद भी दिया। हालांकि बाद में उन्होंने यह भी कहा कि समुद्री नाकेबंदी तब तक जारी रहेगी जब तक समझौता पूरा नहीं हो जाता। तेल बाजार पर असर इस घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, तेल कीमतें करीब 10 प्रतिशत तक नीचे आ गई हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बड़ा असर पड़ा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान के अलग-अलग बयानों और सैन्य शर्तों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। इससे वैश्विक व्यापार और तेल बाजार पर आने वाले दिनों में भी असर देखने को मिल सकता है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और लाल सागर में हमलों के बीच अमेरिका ने अपनी नौसैनिक रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। दुनिया के सबसे ताकतवर युद्धपोतों में शामिल USS George H. W. Bush (CVN-77) अब सीधा रास्ता छोड़कर अफ्रीका का लंबा चक्कर लगाते हुए मिडिल ईस्ट की ओर बढ़ रहा है। क्यों बदला गया रास्ता? माना जा रहा है कि यह फैसला लाल सागर में बढ़ते खतरे को देखते हुए लिया गया है। Houthi movement द्वारा ड्रोन और मिसाइल हमलों के कारण यह इलाका बेहद संवेदनशील हो गया है। 2024–25 में कई जहाजों पर हमले बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री रास्ते पर खतरा अमेरिकी और व्यापारिक जहाज निशाने पर इसी वजह से अमेरिकी नौसेना ने जोखिम भरे रेड सी रूट से बचने का विकल्प चुना। कौन सा रास्ता अपना रहा है युद्धपोत? यह परमाणु ऊर्जा से चलने वाला एयरक्राफ्ट कैरियर: अफ्रीका के दक्षिणी छोर से होकर Cape of Good Hope के रास्ते अटलांटिक से हिंद महासागर में प्रवेश करेगा हाल ही में इसे Namibia के तट के पास देखा गया। मिडिल ईस्ट में बढ़ेगी अमेरिकी ताकत माना जा रहा है कि यह जहाज मिडिल ईस्ट में पहले से तैनात USS Abraham Lincoln (CVN-72) के साथ मिलकर ऑपरेशन को और मजबूत करेगा। यह तैनाती ऐसे समय हो रही है जब Iran के साथ तनाव चरम पर है Strait of Hormuz के आसपास सैन्य गतिविधियां बढ़ रही हैं कितना लंबा हो गया सफर? सामान्य रूट (रेड सी): ~8,000–9,000 नॉटिकल माइल नया रूट (अफ्रीका के जरिए): ~13,000–15,000 नॉटिकल माइल यानी करीब डेढ़ गुना लंबा सफर, जो खतरे की गंभीरता को दिखाता है। क्या यह ‘डर’ है या रणनीति? पेंटागन ने आधिकारिक तौर पर कारण नहीं बताया है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इसे “रणनीतिक एहतियात” मानते हैं, न कि सीधे तौर पर डर। लाल सागर अब दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री इलाकों में बदल चुका है अमेरिका का यह कदम दिखाता है कि हूती हमलों और क्षेत्रीय तनाव ने वैश्विक समुद्री सुरक्षा को गंभीर चुनौती दी है। सुपरपावर भी अब जोखिम से बचने के लिए अपने रास्ते बदलने को मजबूर है–जो मिडिल ईस्ट संकट की गंभीरता को दर्शाता है।
वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका का एक बेहद महंगा और एडवांस जासूसी ड्रोन हादसे का शिकार हो गया है। अमेरिकी नेवी ने पुष्टि की है कि MQ-4C Triton ड्रोन फारस की खाड़ी में क्रैश हो गया। इसकी कीमत करीब 200–240 मिलियन डॉलर (करीब 1600–2000 करोड़ रुपये) बताई जा रही है। होर्मुज स्ट्रेट के पास हुआ हादसा ड्रोन 9 अप्रैल को होर्मुज जलडमरूमध्य के पास ऑपरेशन के दौरान अचानक गायब हो गया। ड्रोन ने “कोड 7700” इमरजेंसी सिग्नल भेजा इसके बाद संपर्क पूरी तरह टूट गया बाद में पुष्टि हुई कि यह समुद्र में क्रैश हो गया अमेरिकी नेवल कमांड ने 14 अप्रैल को इसकी आधिकारिक पुष्टि की। F-35 से भी महंगा ड्रोन यह MQ-4C Triton ड्रोन अमेरिका के सबसे एडवांस निगरानी सिस्टम में शामिल है। लंबी दूरी तक समुद्री निगरानी में सक्षम घंटों तक ऊंचाई पर उड़ान भर सकता है हाई-टेक सेंसर और सर्विलांस सिस्टम से लैस इसकी कीमत दो F-35 Lightning II लड़ाकू विमानों से भी ज्यादा बताई जा रही है। ईरान पर शक, लेकिन पुष्टि नहीं ड्रोन के क्रैश होने के बाद कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। क्या तकनीकी खराबी थी? या किसी हमले में गिराया गया? कुछ रिपोर्ट्स में आशंका जताई जा रही है कि इसे ईरान ने निशाना बनाया हो सकता है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ‘क्लास A मिशैप’ माना गया हादसा अमेरिकी नियमों के अनुसार, 2.5 मिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान होने पर उसे “Class A Mishap” कहा जाता है। इस मामले में: नुकसान 240 मिलियन डॉलर से ज्यादा इसे बेहद गंभीर सैन्य हादसा माना जा रहा है बढ़ सकता है तनाव यह घटना ऐसे समय पर हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच पहले से ही तनाव चरम पर है। अगर यह साबित होता है कि ड्रोन को गिराया गया, तो क्षेत्र में हालात और बिगड़ सकते हैं। फिलहाल, अमेरिका इस पूरे मामले की जांच कर रहा है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच J. D. Vance ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि Islamabad में हुई शांति वार्ता में “अच्छी प्रगति” हुई है, लेकिन अब अगला कदम Tehran को उठाना होगा। वेंस ने साफ कहा–“गेंद अब ईरान के पाले में है।” 21 घंटे चली वार्ता, लेकिन समझौता नहीं अमेरिका और Iran के बीच वीकेंड पर इस्लामाबाद में करीब 21 घंटे तक चली लंबी बातचीत किसी ठोस समझौते पर खत्म नहीं हो सकी। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि ईरान ने न्यूक्लियर फ्यूल एनरिचमेंट रोकने की शर्त मानने से इनकार कर दिया। ‘सही दिशा में बढ़ी बातचीत’ Fox News को दिए इंटरव्यू में वेंस ने कहा कि हालात बिगड़े नहीं हैं, बल्कि बातचीत सही दिशा में आगे बढ़ी है। उन्होंने कहा: “कुछ पॉजिटिव संकेत मिले हैं” “सामने वाला पक्ष भी आगे बढ़ा” “हालांकि, उम्मीद के मुताबिक प्रगति नहीं हुई” न्यूक्लियर एम्बिशन पर अमेरिका सख्त वेंस ने जोर देकर कहा कि अगर ईरान अपने न्यूक्लियर एम्बिशन पर अमेरिका की शर्तें मान लेता है, तो दोनों देशों के बीच बड़ा समझौता संभव है। उन्होंने कहा, “क्या हम आगे बातचीत करेंगे? क्या समझौता होगा? यह अब ईरान पर निर्भर करता है।” क्यों रुकी बातचीत? वेंस के मुताबिक, ईरानी डेलिगेशन के पास अंतिम फैसला लेने का अधिकार नहीं था। उन्होंने कहा: “टीम को तेहरान लौटना पड़ा” “अंतिम मंजूरी के लिए शीर्ष नेतृत्व से सहमति जरूरी है” किन नेताओं ने लिया हिस्सा? इस हाई-लेवल वार्ता में दोनों देशों के बड़े नेता शामिल हुए: अमेरिका की ओर से: J. D. Vance, Steve Witkoff, Jared Kushner ईरान की ओर से: Mohammad Bagher Ghalibaf, Abbas Araghchi आगे क्या? इस्लामाबाद वार्ता के बाद अब नजरें तेहरान पर हैं। अगर ईरान अमेरिका की शर्तों पर नरमी दिखाता है, तो क्षेत्र में तनाव कम हो सकता है। फिलहाल, कूटनीतिक हल की उम्मीद कायम है, लेकिन स्थिति अभी भी संवेदनशील बनी हुई है।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। अमेरिका और इजरायल के हमलों के बावजूद ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम लगभग सुरक्षित बना हुआ है। हमलों का सीमित असर The Wall Street Journal की रिपोर्ट के मुताबिक, हफ्तों तक चले हवाई हमलों और मिसाइल स्ट्राइक के बाद भी ईरान के परमाणु ढांचे को पूरी तरह नुकसान नहीं पहुंचाया जा सका। कुछ लैब्स और ‘येलोकेक’ साइट्स जरूर प्रभावित हुई हैं, लेकिन मुख्य इंफ्रास्ट्रक्चर अब भी सक्रिय है। गुप्त सुरंगों में छिपा यूरेनियम रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने अपने वेपन्स-ग्रेड यूरेनियम का बड़ा हिस्सा गहरी भूमिगत सुरंगों में सुरक्षित रखा हुआ है। International Atomic Energy Agency के अनुसार, ईरान के पास करीब 450 किलोग्राम उच्च संवर्धित यूरेनियम मौजूद है, जो परमाणु हथियार बनाने के लिए अहम माना जाता है। सेंट्रीफ्यूज और टेक्नोलॉजी बरकरार विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के पास अब भी उन्नत सेंट्रीफ्यूज और ऐसे गुप्त ठिकाने हैं, जहां यूरेनियम को हथियार-स्तर तक संवर्धित किया जा सकता है। इससे साफ है कि ईरान की परमाणु क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इस्फहान साइट बनी अहम केंद्र रिपोर्ट के मुताबिक, यूरेनियम का एक बड़ा हिस्सा Isfahan स्थित परमाणु साइट के नीचे गहरी सुरंगों में सुरक्षित रखा गया है। यह जगह ईरान के परमाणु कार्यक्रम का महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई है। वैश्विक चिंता बढ़ी इस खुलासे के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन बंद करे, लेकिन ईरान इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने Iran के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा समुद्री कदम उठाया है। United States Central Command (CENTCOM) ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि 13 अप्रैल (सोमवार) सुबह 10 बजे से ईरान के सभी बंदरगाहों पर आने-जाने वाले जहाजों पर नाकेबंदी लागू कर दी जाएगी। यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के निर्देश के बाद लिया गया है और इसे ईरान पर आर्थिक व रणनीतिक दबाव बढ़ाने की बड़ी कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है। समुद्र से घेराबंदी: क्या है पूरा प्लान? अमेरिका की यह रणनीति सीधे ईरान के समुद्री व्यापार को निशाना बनाती है। CENTCOM के अनुसार: ईरान के सभी पोर्ट्स पर आने-जाने वाले जहाजों पर रोक लगेगी यह नियम हर देश के जहाजों पर समान रूप से लागू होगा जहाजों की पहचान, निगरानी और जरूरत पड़ने पर उन्हें रोका जाएगा ईरानी तटीय क्षेत्रों में भी कड़ी निगरानी रखी जाएगी इस कदम का मकसद ईरान की आर्थिक गतिविधियों को सीमित करना और उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करना है। हॉर्मुज स्ट्रेट: टकराव का सबसे बड़ा केंद्र इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम बिंदु Strait of Hormuz है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है यह खाड़ी देशों को वैश्विक बाजार से जोड़ता है यहां किसी भी सैन्य या रणनीतिक कार्रवाई का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है CENTCOM ने स्पष्ट किया है कि गैर-ईरानी बंदरगाहों के लिए जाने वाले जहाजों को फिलहाल छूट दी जाएगी, लेकिन ईरान से जुड़े हर जहाज पर सख्त नजर रखी जाएगी। जहाजों के लिए चेतावनी और सुरक्षा निर्देश अमेरिकी नौसेना ने इस संवेदनशील स्थिति को देखते हुए सभी व्यापारिक जहाजों और शिपिंग कंपनियों के लिए एडवाइजरी जारी की है: ‘Notice to Mariners’ (आधिकारिक अलर्ट) को नियमित रूप से चेक करें Gulf of Oman और हॉर्मुज क्षेत्र में अतिरिक्त सतर्कता बरतें किसी भी आपात स्थिति में चैनल 16 पर अमेरिकी नौसेना से संपर्क करें जोखिम वाले क्षेत्रों से गुजरते समय वैकल्पिक मार्गों की योजना रखें पेट्रोडॉलर सिस्टम पर सीधा असर इस पूरी कार्रवाई के पीछे सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक रणनीति भी छिपी हुई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि: कुछ जहाज डॉलर के बजाय दूसरी करेंसी (जैसे चीनी युआन) में लेन-देन कर रहे हैं यह लंबे समय से चले आ रहे पेट्रोडॉलर सिस्टम के लिए चुनौती है अमेरिका इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठा रहा है पेट्रोडॉलर सिस्टम वह व्यवस्था है जिसमें दुनिया भर में कच्चे तेल का व्यापार मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर में होता है, जिससे अमेरिका को वैश्विक आर्थिक बढ़त मिलती है। चीन-ईरान समीकरण और अमेरिका की चिंता इस कदम का एक बड़ा लक्ष्य China और ईरान के बीच बढ़ती नजदीकियां भी हैं। चीन ईरान से बड़े पैमाने पर तेल खरीद रहा है दोनों देश डॉलर के विकल्प तलाश रहे हैं रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी मजबूत हो रही है अमेरिका इसे अपने वैश्विक प्रभाव के लिए खतरा मानता है और इसी कारण अब दबाव की रणनीति अपना रहा है। बढ़ते तनाव के संभावित असर विशेषज्ञों का मानना है कि इस नाकेबंदी के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं: कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल वैश्विक सप्लाई चेन में बाधा मिडिल ईस्ट में सैन्य टकराव का खतरा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अनिश्चितता इसके अलावा, अगर ईरान जवाबी कार्रवाई करता है, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। क्या हो सकता है आगे? ईरान की ओर से सैन्य या आर्थिक प्रतिक्रिया संभव कूटनीतिक प्रयास तेज हो सकते हैं, लेकिन सफलता अनिश्चित अमेरिका अपनी नौसैनिक मौजूदगी और बढ़ा सकता है क्षेत्र में अन्य देशों की भूमिका भी अहम हो सकती है
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।