बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सैन्य तथा खुफिया सहयोग बढ़ने की खबरों ने भारत की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश की सैन्य खुफिया एजेंसी डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस (DGFI) का छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल 15 अगस्त को पाकिस्तान पहुंचा। इस दौरे को दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों के बीच बढ़ते संपर्क के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इस दौरे के एजेंडे और पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के साथ हुई कथित बातचीत को लेकर सार्वजनिक रूप से विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। इसलिए इसे लेकर किए जा रहे सुरक्षा संबंधी आकलनों को फिलहाल दावों और रिपोर्टों के स्तर पर ही देखा जाना चाहिए। छह सदस्यीय DGFI प्रतिनिधिमंडल ने किया पाकिस्तान का दौरा रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेशी प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई कर्नल मगफूज-उल-बारी ने की। टीम में विंग कमांडर इम्नुल कैस, मोहिउद्दीन मोहम्मद आसिफ, स्क्वाड्रन लीडर रेहान मोहम्मद चौधरी, मुराद हुसैन तुषार और खंडोकर आरिफुल इस्लाम शामिल थे। यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सैन्य एवं रणनीतिक संपर्कों को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। रिपोर्ट में इससे पहले अप्रैल में DGFI के तत्कालीन महानिदेशक मेजर जनरल कैसर राशिद चौधरी की इस्लामाबाद यात्रा का भी उल्लेख किया गया है। शेख हसीना सरकार के बाद बदले क्षेत्रीय समीकरण अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश की विदेश और सुरक्षा नीति में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। इसी अवधि में ढाका और इस्लामाबाद के बीच संपर्क बढ़ने की खबरें सामने आती रही हैं। पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के बढ़ते सैन्य संपर्क को भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दोनों देश भारत के पड़ोसी हैं। यदि सैन्य और खुफिया सहयोग लंबे समय तक मजबूत होता है, तो इसका असर दक्षिण एशिया के रणनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है। हालांकि, किसी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा को सीधे तौर पर किसी खुफिया अभियान या भारत विरोधी गतिविधि का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। इसके लिए ठोस आधिकारिक जानकारी और जांच के निष्कर्ष जरूरी होंगे। तारिक रहमान सरकार की भारत नीति भी चर्चा में रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तारिक रहमान के सत्ता में आने के बाद भी भारत-बांग्लादेश संबंधों में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। भारत और बांग्लादेश के बीच कई मुद्दों पर बातचीत जारी है, जबकि शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा भी दोनों देशों के संबंधों में संवेदनशील विषय बना हुआ है। तारिक रहमान की भारत यात्रा को लेकर भी दोनों देशों के बीच बातचीत की खबरें सामने आई हैं, लेकिन अभी तक यह यात्रा नहीं हो सकी है। दूसरी ओर, बांग्लादेश की पाकिस्तान और चीन के साथ बढ़ती सक्रियता क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है DGFI-Pakistan संपर्क? भारत की चिंता केवल पाकिस्तान-बांग्लादेश संबंधों को लेकर नहीं, बल्कि पूर्वी सीमा की सुरक्षा और क्षेत्रीय खुफिया सहयोग को लेकर भी है। भारत की बांग्लादेश के साथ लंबी सीमा है और दोनों देशों के बीच व्यापार, आवागमन तथा सुरक्षा से जुड़े कई साझा मुद्दे हैं। यदि बांग्लादेश और पाकिस्तान की सैन्य या खुफिया एजेंसियों के बीच सहयोग व्यापक होता है, तो भारत को सीमा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी कार्रवाई और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन के स्तर पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
नई दिल्ली: पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक कार्यक्रम का कथित वीडियो सामने आने के बाद कश्मीर में आतंकवाद को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। मौलवी नसीर मदनी ने कथित तौर पर दावा किया कि लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद ने कश्मीर में 10 हजार आतंकियों को भेजा था। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। मदनी के इस बयान पर भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडेय ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आतंकवादियों के खिलाफ जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की कार्रवाई का जिक्र करते हुए मदनी पर तंज कसा और कहा कि आतंकवाद का रास्ता चुनने वालों का अंत सुरक्षा बलों की कार्रवाई में हुआ है। लश्कर से जुड़े कार्यक्रम में मदनी का दावा रिपोर्ट के मुताबिक, 14 अगस्त को पाकिस्तान के बहावलनगर में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक कार्यक्रम में नसीर मदनी मंच पर नजर आया। कथित भाषण के दौरान उसने हाफिज सईद की तारीफ करते हुए दावा किया कि सईद ने कश्मीर में 10 हजार आतंकियों को भेजा था। यह दावा ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान से संचालित आतंकी संगठनों और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के बीच संबंध लंबे समय से भारत की सुरक्षा चिंताओं का प्रमुख मुद्दा रहे हैं। हालांकि, मदनी द्वारा बताए गए 10 हजार के आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। पूर्व सैन्य अधिकारी ने दिया तीखा जवाब मदनी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडेय ने भारतीय सेना, चिनार कोर और जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा आतंकवाद विरोधी अभियानों का हवाला दिया। उन्होंने अपने बयान में संकेत दिया कि कश्मीर में आतंकवाद फैलाने वाले कई आतंकियों को सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मार गिराया गया। इसी संदर्भ में उन्होंने मदनी के बयान पर कटाक्ष करते हुए उसके लिए भी ‘विदाई’ जैसी टिप्पणी की। हार्ट अटैक के बाद फिर चर्चा में मदनी नसीर मदनी इससे पहले जुलाई में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के जहानियां में एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान अचानक गिरने के बाद चर्चा में आया था। रिपोर्टों के अनुसार, उसे अस्पताल ले जाया गया और बाद में उसकी हालत स्थिर बताई गई थी। अब अगस्त में लश्कर से जुड़े कार्यक्रम में उसकी कथित मौजूदगी और कश्मीर को लेकर दिए गए बयान ने उसे फिर सुर्खियों में ला दिया है। हाफिज सईद का नाम फिर चर्चा में हाफिज सईद लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा प्रमुख चेहरा रहा है और भारत लंबे समय से उसके संगठनात्मक नेटवर्क तथा आतंकवादी गतिविधियों को लेकर पाकिस्तान पर सवाल उठाता रहा है। ऐसे में नसीर मदनी के कथित बयान ने कश्मीर में सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
इस्लामाबाद: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में सिंधु नदी पर निर्माणाधीन डायमर-भाशा बांध एक बार फिर विवादों में है। परियोजना को लेकर पर्यावरण और जल विशेषज्ञों के साथ-साथ पुरातत्व एवं सांस्कृतिक विरासत से जुड़े जानकार भी चिंता जता रहे हैं। आशंका है कि बांध के जलाशय से क्षेत्र में मौजूद हजारों साल पुराने बौद्ध शिलालेख और अन्य पुरातात्विक अवशेष प्रभावित हो सकते हैं। यह क्षेत्र प्राचीन सिल्क रूट का अहम हिस्सा रहा है। सदियों तक इस मार्ग के जरिए भारत, चीन, मध्य एशिया और फारस के बीच व्यापार के साथ धर्म, संस्कृति और विचारों का भी आदान-प्रदान हुआ। ऊपरी सिंधु घाटी में आज भी इस ऐतिहासिक संपर्क के प्रमाण के रूप में बड़ी संख्या में चट्टानी शिलालेख, बौद्ध प्रतीक और पुरातात्विक अवशेष मौजूद हैं। बांध से हजारों साल पुरानी विरासत को खतरा डायमर-भाशा बांध के निर्माण से बनने वाले जलाशय के दायरे में सिंधु नदी के किनारे स्थित कई ऐतिहासिक स्थल आने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, क्षेत्र में मौजूद कई प्राचीन शिलालेख पानी में डूब सकते हैं। इनमें ब्राह्मी और तिब्बती समेत विभिन्न प्राचीन लिपियों के प्रमाण मिलते हैं। ये शिलालेख केवल धार्मिक इतिहास की जानकारी नहीं देते, बल्कि दक्षिण एशिया में प्राचीन व्यापार, यात्राओं और सांस्कृतिक संपर्कों को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। अगर इन स्थलों को संरक्षित नहीं किया गया तो एक बड़ी ऐतिहासिक विरासत हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है। तक्षशिला को लेकर भी उठे संरक्षण के सवाल पाकिस्तान की प्राचीन बौद्ध विरासत पर चर्चा ऐसे समय तेज हुई है, जब तक्षशिला जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि प्रसिद्ध और अपेक्षाकृत आसानी से पहुंच वाले ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण में चुनौतियां मौजूद हैं, तो गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे दुर्गम क्षेत्र में मौजूद प्राचीन अवशेषों को सुरक्षित रखना और भी बड़ी चुनौती है। यही वजह है कि डायमर-भाशा परियोजना को लेकर विशेषज्ञ विकास और विरासत संरक्षण के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दे रहे हैं। पर्यावरण पर भी विशेषज्ञों की चिंता विशेषज्ञों के मुताबिक सिंधु नदी पाकिस्तान के लिए केवल जल संसाधन नहीं, बल्कि कृषि, पारिस्थितिकी और ऐतिहासिक विरासत का भी आधार है। नदी के प्रवाह में बड़े बदलाव से निचले क्षेत्रों की खेती और स्थानीय पर्यावरण प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा बांध परियोजना की लागत और दीर्घकालिक आर्थिक व्यवहार्यता को लेकर भी कुछ विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि सौर ऊर्जा और बैटरी स्टोरेज जैसी तकनीकों के तेजी से विस्तार के दौर में बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का गंभीर मूल्यांकन जरूरी है। भारत क्यों कर रहा है विरोध? डायमर-भाशा बांध को लेकर भारत का विरोध केवल पर्यावरण और विरासत से जुड़ा नहीं है। भारत गिलगित-बाल्टिस्तान को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से संबंधित अपना क्षेत्र मानता है और इस क्षेत्र में पाकिस्तान की ओर से किए जा रहे निर्माण कार्यों को संप्रभुता से जुड़ा गंभीर मुद्दा मानता है। चीन की भागीदारी वाली परियोजनाओं को लेकर भी भारत लगातार आपत्ति दर्ज कराता रहा है। भारत का कहना है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में पाकिस्तान या किसी तीसरे देश द्वारा कराया जा रहा निर्माण स्वीकार्य नहीं है। विकास बनाम विरासत की बड़ी बहस डायमर-भाशा बांध अब केवल एक जलविद्युत परियोजना नहीं रह गया है। इसके साथ ऊर्जा जरूरत, पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय हित, पुरातात्विक विरासत और क्षेत्रीय राजनीति जैसे कई सवाल जुड़े हुए हैं। बांध के समर्थक इसे पाकिस्तान की जल और ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि किसी भी विकास परियोजना की कीमत हजारों साल पुरानी ऐतिहासिक विरासत को खत्म करके नहीं चुकाई जानी चाहिए।
इस्लामाबाद: पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के संस्थापक इमरान खान की जेल में मौत होने की खबर ने बुधवार को पाकिस्तान समेत भारत में भी हलचल पैदा कर दी। एक पत्रकार की रिपोर्ट में दावा किया गया कि जेल में हिरासत के दौरान इमरान खान की मौत हो गई है। हालांकि, पाकिस्तानी सेना ने इस दावे को खारिज करते हुए इसे गलत और अफवाह बताया है। विवाद बढ़ने के बाद रिपोर्ट प्रकाशित करने वाले पत्रकार वजाहत सईद खान ने भी अपनी रिपोर्ट को लेकर सफाई दी। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके सूत्रों ने इमरान खान की मौत की पुष्टि नहीं की थी। उनके मुताबिक, सेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने इमरान खान की स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जरूर जताई थी, लेकिन उनके पास उनकी मौत का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं था। तीन वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों का हवाला वजाहत सईद खान के मुताबिक, पाकिस्तान सेना के तीन वरिष्ठ अधिकारियों ने इमरान खान की हालत और उनके भविष्य को लेकर चिंता जताई थी। अधिकारियों की बातचीत से ऐसी आशंका जरूर सामने आई थी कि स्थिति गंभीर हो सकती है। लेकिन पत्रकार के अनुसार, इन अधिकारियों ने इमरान खान की मौत की पुष्टि नहीं की थी। बाद में वजाहत ने स्पष्ट किया कि उनकी रिपोर्ट का उद्देश्य सेना पर यह दबाव बनाना था कि वह इमरान खान के जीवित होने का स्पष्ट प्रमाण सामने रखे। इस सफाई के बाद मौत की खबर को लेकर फैली अटकलों पर फिलहाल विराम लगा है। पाकिस्तानी सेना ने क्या कहा? मामला सामने आने के बाद पाकिस्तानी सेना के मीडिया विंग इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) ने इमरान खान की मौत की खबरों को खारिज कर दिया। सेना ने पत्रकार की रिपोर्ट को गलत बताया और इमरान खान की मौत से जुड़े दावों को खारिज किया। इसके बाद वजाहत सईद खान ने भी कहा कि उन्हें इस बात की खुशी है कि ISPR ने सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया दी। इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिस रिपोर्ट ने इमरान खान की मौत को लेकर सवाल खड़े किए थे, उसके लेखक ने बाद में स्वयं यह स्पष्ट किया कि उनके पास मौत की पुष्टि करने वाला कोई सबूत नहीं था। इमरान खान की जेल में स्थिति पर फिर उठे सवाल मौत की खबर भले ही खारिज कर दी गई हो, लेकिन इस पूरे विवाद ने इमरान खान की जेल में स्थिति को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। इमरान खान लंबे समय से जेल में बंद हैं और उनके समर्थक लगातार उनकी रिहाई की मांग करते रहे हैं। उनकी हिरासत और स्वास्थ्य को लेकर समय-समय पर तरह-तरह के दावे और राजनीतिक आरोप सामने आते रहे हैं। ऐसे माहौल में किसी वरिष्ठ राजनीतिक नेता की मौत की अपुष्ट खबर का तेजी से फैलना पाकिस्तान के राजनीतिक और सूचना तंत्र की संवेदनशीलता को भी दिखाता है। कई मामलों में फंसे हैं पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की राजनीतिक मुश्किलें अप्रैल 2022 में उनकी सरकार गिरने के बाद तेज हुईं। इसके बाद उनके खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए। मई 2023 में उनकी गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान में व्यापक राजनीतिक तनाव देखने को मिला। अगस्त 2023 में उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया गया और तब से अलग-अलग मामलों के कारण उनकी जेल से रिहाई नहीं हो सकी। कुछ मामलों में उन्हें राहत मिली, लेकिन अन्य मामलों में कानूनी कार्रवाई जारी रही। रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल वह अल-कादिर ट्रस्ट मामले में 14 साल की सजा काट रहे हैं। अफवाह ने क्यों पकड़ा जोर? इमरान खान पाकिस्तान के सबसे प्रभावशाली और विवादित राजनीतिक नेताओं में से एक हैं। लंबे समय से जेल में रहने और उनकी स्थिति को लेकर सीमित सार्वजनिक जानकारी के बीच सोशल मीडिया पर किसी भी अपुष्ट दावे के तेजी से फैलने की संभावना ज्यादा रहती है। इस मामले में भी एक पत्रकार की रिपोर्ट के बाद मौत की खबर तेजी से चर्चा में आ गई। लेकिन सेना के खंडन और पत्रकार की बाद की सफाई ने स्पष्ट कर दिया कि मौत की पुष्टि करने वाला विश्वसनीय प्रमाण सामने नहीं आया था। इसलिए फिलहाल इमरान खान की मौत की खबर को अफवाह और अपुष्ट दावा ही माना जाना चाहिए। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री की स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी जानकारी को लेकर पारदर्शिता कितनी है। आने वाले दिनों में इमरान खान की स्थिति पर कोई आधिकारिक और विश्वसनीय जानकारी सामने आती है या नहीं, इस पर नजर रहेगी।
नई दिल्ली: लाल सागर के बेहद संवेदनशील बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में एक कमर्शियल कार्गो जहाज पर हुए दोहरे हमले ने समुद्री सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता बढ़ा दी है। यमन सरकार के अनुसार, ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने खाद्य सामग्री ले जा रहे मालवाहक जहाज ‘तिहामा’ को दो बार निशाना बनाया। हमले में कम से कम छह लोगों की मौत हुई है, जबकि कई लोग घायल बताए जा रहे हैं। मृतकों में जहाज के चालक दल के चार सदस्य और बचाव अभियान में शामिल दो कर्मी शामिल हैं। चालक दल के मृतकों में तीन पाकिस्तानी और एक इंडोनेशियाई नागरिक बताए गए हैं। जहाज पर दागी गईं तीन बैलिस्टिक मिसाइलें यमन के परिवहन मंत्रालय के मुताबिक, हूती विद्रोहियों ने तिहामा जहाज पर तीन बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले के बाद जहाज में भीषण आग लग गई और चालक दल के कई सदस्य इसकी चपेट में आ गए। पहले हमले में चार चालक दल सदस्यों की मौत हुई। इनमें तीन पाकिस्तान और एक इंडोनेशिया के नागरिक थे। चार अन्य चालक दल सदस्य और एक बचावकर्मी घायल हुए। हमले के बाद जहाज पर फंसे लोगों को बचाने के लिए खोज और बचाव अभियान शुरू किया गया था। बचाव अभियान के दौरान फिर हुआ हमला यमन के अधिकारियों के अनुसार, सबसे गंभीर चिंता की बात यह रही कि राहत और बचाव अभियान शुरू होने के दौरान ही जहाज को दोबारा निशाना बनाया गया। दूसरे हमले में बचाव अभियान में शामिल लोगों को भी नुकसान पहुंचा। यमनी तटरक्षक बल ने बाद में पुष्टि की कि मरने वालों में दो बचावकर्मी भी शामिल हैं। इसके बाद मृतकों की कुल संख्या छह हो गई। यह घटनाक्रम लाल सागर में काम कर रहे व्यापारिक जहाजों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर नई चिंता पैदा करता है। जाजान की अरामको रिफाइनरी को भी निशाना बनाने का दावा इसी बीच हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के जाजान स्थित अरामको रिफाइनरी पर भी ड्रोन हमले का दावा किया है। हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी के अनुसार, यह हमला सादा और हज्जा प्रांतों में कथित सऊदी ड्रोन हमलों के जवाब में किया गया। हूती पक्ष ने दावा किया कि हमले के बाद रिफाइनरी में आग लग गई। सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्रालय ने भी रिफाइनरी में आग लगने की पुष्टि की, हालांकि अधिकारियों के अनुसार आग पर बाद में काबू पा लिया गया। लाल सागर में क्यों बढ़ी चिंता? बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। यहां किसी व्यावसायिक जहाज पर हमला केवल जहाज में मौजूद चालक दल की सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक समुद्री व्यापार, बीमा लागत और माल ढुलाई पर भी पड़ सकता है। लगातार हमलों के कारण इस क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों के लिए सुरक्षा जोखिम बढ़ता है और कंपनियों को वैकल्पिक समुद्री मार्गों पर विचार करना पड़ सकता है। मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की भी परीक्षा हूती हमलों के बीच हाल में पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जाजान पर हमले के बाद इस समझौते की प्रभावशीलता को लेकर चर्चा तेज हुई है। हालांकि, किसी सैन्य समझौते की वास्तविक क्षमता का आकलन केवल एक घटना के आधार पर करना जल्दबाजी होगी। फिर भी लाल सागर और सऊदी क्षेत्र में लगातार सामने आ रहे हमले क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था के लिए चुनौती जरूर हैं। समुद्री सुरक्षा के सामने बड़ी चुनौती तिहामा जहाज पर दो बार हुआ हमला इस बात को रेखांकित करता है कि संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में राहत और बचाव अभियान भी जोखिम से मुक्त नहीं हैं। खासकर तब, जब हमलावर दूसरे हमले के जरिए बचाव अभियान को भी निशाना बनाने की क्षमता रखते हों। लाल सागर में बढ़ता तनाव आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों की आवाजाही और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बना रह सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। पाकिस्तान की ओर से 5 अगस्त को ‘यौम-ए-इस्तेहसाल’ के नाम पर भारत और जम्मू-कश्मीर को लेकर की गई बयानबाजी पर भारत सरकार ने कड़ा विरोध जताया है। विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भारत के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण प्रचार और गलत सूचना फैलाने की कोशिश की जा रही है। पाकिस्तान के दावों को भारत ने किया खारिज भारत ने पाकिस्तान की ओर से जम्मू-कश्मीर को लेकर की गई टिप्पणियों को पूरी तरह खारिज कर दिया। सरकार ने कहा कि पाकिस्तान का यह अभियान उसके अपने रिकॉर्ड से ध्यान भटकाने की कोशिश है। भारत का कहना है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न हिस्से हैं और पाकिस्तान की ओर से इन क्षेत्रों को लेकर किए जाने वाले दावों का कोई आधार नहीं है। ‘यौम-ए-इस्तेहसाल’ को लेकर बढ़ा विवाद पाकिस्तान हर साल 5 अगस्त को ‘यौम-ए-इस्तेहसाल’ के रूप में मनाता है। इस दिन 2019 में भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर से संबंधित संवैधानिक बदलाव किए जाने को लेकर पाकिस्तान विरोध दर्ज कराता है। भारत ने पाकिस्तान के इस कदम को खारिज करते हुए कहा कि वह अपने देश की आंतरिक चुनौतियों से ध्यान हटाने के लिए भारत के आंतरिक मामलों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश कर रहा है। आतंकवाद और मानवाधिकार रिकॉर्ड पर भारत का पलटवार भारत सरकार ने पाकिस्तान के आरोपों का जवाब देते हुए उसके मानवाधिकार रिकॉर्ड और आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर भी सवाल उठाए। भारत का आरोप है कि पाकिस्तान को पहले अपने यहां की स्थिति और आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। सरकार ने पाकिस्तान के भारत विरोधी प्रचार को खारिज करते हुए कहा कि इस तरह के प्रयास अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गुमराह नहीं कर सकते। भारत ने दोहराया जम्मू-कश्मीर पर अपना रुख भारत ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न हिस्से थे, हैं और रहेंगे। सरकार ने पाकिस्तान की ओर से इस मुद्दे पर की जाने वाली बयानबाजी को भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताया। इस घटनाक्रम से दोनों देशों के बीच पहले से जारी कूटनीतिक तनाव के बीच एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है।
पाकिस्तान की राजनीति में एक बार फिर तख्तापलट की चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। इसकी वजह बने हैं शहबाज शरीफ सरकार के गृह मंत्री मोहसिन नकवी, जिन्हें सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर का करीबी माना जाता है। नकवी ने सार्वजनिक रूप से देश की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए दावा किया कि पाकिस्तान की संस्थाओं में वर्षों से गहरे स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। उनके बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है। 21 साल पुराने कथित घोटाले का किया दावा मीडिया से बातचीत में मोहसिन नकवी ने कहा कि पाकिस्तान के इतिहास में शायद ही कभी इतना बड़ा घोटाला सामने आया हो। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 21 वर्षों से अवैध वित्तीय लेन-देन का सिलसिला चलता रहा और इसमें कई प्रभावशाली लोग शामिल रहे। नकवी ने कहा कि इस कथित घोटाले में न्यायपालिका, नौकरशाही, राजनेता और बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े लोग भी शामिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार इस मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि पाकिस्तान के इतिहास में कभी इतना बड़ा घोटाला हुआ है, जिसमें जज, नौकरशाह, राजनेता और बैंकर सभी शामिल रहे हों। 21 सालों तक अवैध लेन-देन चलता रहा और लोग इसका लाभ उठाते रहे। अब हर जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।" हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह कथित घोटाला किस मामले से जुड़ा है और इसमें किन लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है। बयान के बाद क्यों बढ़ीं तख्तापलट की चर्चाएं? मोहसिन नकवी का बयान ऐसे समय आया है, जब पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और संस्थागत टकराव का सामना कर रहा है। चूंकि नकवी को सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर का करीबी माना जाता है, इसलिए उनके इस बयान को लेकर कई तरह की राजनीतिक अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि, अब तक पाकिस्तान में सेना की ओर से किसी तख्तापलट या सत्ता परिवर्तन को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है। इसलिए तख्तापलट की चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। पाकिस्तान में तख्तापलट का इतिहास पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में सेना कई बार सत्ता अपने हाथ में ले चुकी है। 1958: पहला सैन्य तख्तापलट राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा ने संविधान निलंबित कर मार्शल लॉ लागू किया। कुछ ही दिनों बाद जनरल अय्यूब खान ने इस्कंदर मिर्जा को सत्ता से हटाकर खुद देश की कमान संभाल ली। अय्यूब खान 1969 तक सत्ता में रहे। 1977: दूसरा तख्तापलट जनरल जिया-उल-हक ने प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार को हटाकर सत्ता पर कब्जा कर लिया। बाद में भुट्टो को गिरफ्तार किया गया और 1979 में उन्हें फांसी दे दी गई। जिया-उल-हक 1988 तक शासन करते रहे। 1999: तीसरा तख्तापलट कारगिल युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ के बीच टकराव बढ़ गया। सेना ने नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर सत्ता अपने हाथ में ले ली। जनरल परवेज मुशर्रफ 2008 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे। क्या फिर बदल सकती है पाकिस्तान की सियासत? मोहसिन नकवी के बयान ने पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था और सरकारी संस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि देश में सैन्य तख्तापलट की तैयारी चल रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में सरकार की कार्रवाई, जांच की दिशा और सेना का रुख यह तय करेगा कि पाकिस्तान की राजनीति किस ओर बढ़ती है।
PoK Protest News: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में महंगाई, बिजली संकट, आटे की कमी और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर जारी विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई हिंसक झड़पों में 100 से अधिक लोगों की मौत होने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। महंगाई और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर प्रदर्शन मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में लोग महंगाई, बिजली संकट, आटे की कमी और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि शांतिपूर्ण आंदोलन पर सुरक्षा बलों ने बल प्रयोग किया और गोलियां चलाईं। दूसरी ओर, स्थानीय प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई की गई और कुछ प्रदर्शनकारी हिंसक गतिविधियों में शामिल थे। मस्जिदों से विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील मुजफ्फराबाद समेत कई इलाकों में मस्जिदों के लाउडस्पीकरों के जरिए लोगों से प्रदर्शन में शामिल होने और एकजुट रहने की अपील की जा रही है। इस बीच, जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एस.पी. वैद ने कहा कि अतीत में जिस तरीके का इस्तेमाल पाकिस्तान भारत के खिलाफ करता था, अब उसी तरह के तरीकों का उपयोग पाकिस्तान के खिलाफ होता दिखाई दे रहा है। युवाओं पर सबसे ज्यादा असर रावलाकोट में राहत कार्य से जुड़े एक डॉक्टर के अनुसार, गोली लगने वाले अधिकांश लोग 15 से 35 वर्ष आयु वर्ग के हैं। उन्होंने बताया कि प्राथमिक उपचार की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन सिर, सीने और पेट में गंभीर गोली लगने वाले घायलों को बड़े अस्पतालों में भेजना पड़ रहा है। बड़ी संख्या में घायल आने से स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दबाव बढ़ गया है। परिजनों का आरोप- अधिकार मांगने पर मिली गोलियां मृतकों और घायलों के परिजनों का कहना है कि वे केवल सस्ती बिजली, आटा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे थे। कई परिवारों ने आरोप लगाया कि उनके परिजन किसी हिंसक गतिविधि में शामिल नहीं थे, बल्कि अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन कर रहे थे। सरकार और JAAC के दावे आमने-सामने JAAC का आरोप है कि पाकिस्तान और PoK प्रशासन ने अक्टूबर 2025 में हुए समझौते को लागू नहीं किया, जिससे लोगों का आक्रोश बढ़ा। वहीं, स्थानीय प्रशासन का कहना है कि संगठन पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है और उसके कुछ सदस्यों के हथियारबंद होने की जानकारी मिली है। पाकिस्तानी प्रशासन का आरोप है कि आंदोलन का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करना है, जबकि प्रदर्शनकारी इसे अपने अधिकारों की लोकतांत्रिक लड़ाई बता रहे हैं। पाकिस्तान के लिए बढ़ी चुनौती लगातार जारी विरोध प्रदर्शन और बढ़ता जनाक्रोश पाकिस्तान के लिए बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बनता जा रहा है। मौजूदा हालात ने क्षेत्र में सुरक्षा और शासन व्यवस्था को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।
Pakistan-US Relations: पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्री अताउल्लाह तरार ने अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि पाकिस्तान के खिलाफ संगठित दुष्प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा एजेंसियों ने एक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार किया है, जिसका संबंध अमेरिका से था और जिसे कथित तौर पर पाकिस्तान विरोधी डिजिटल प्रचार के लिए विदेश से भुगतान किया जा रहा था। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी एक वीडियो संदेश में तरार ने कहा कि कुछ दिन पहले गिरफ्तार किया गया व्यक्ति डिजिटल मार्केटिंग सेवाएं प्रदान करता था और प्रारंभिक जांच में उसके अमेरिका से जुड़े होने के संकेत मिले हैं। 'अमेरिका से हो रही थी पेमेंट' अताउल्लाह तरार ने दावा किया कि जांच के दौरान सामने आया कि आरोपी को अमेरिका से भुगतान किया जा रहा था। उनके मुताबिक पूछताछ में यह भी पता चला कि वह कथित 'बॉट फार्म' के जरिए सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चला रहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस नेटवर्क के माध्यम से पाकिस्तान सरकार, सेना, सेना प्रमुख, सरकारी संस्थानों और विभिन्न सरकारी विभागों के खिलाफ भ्रामक और नकारात्मक सामग्री सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही थी। सरकार और सेना को निशाना बनाने का आरोप पाकिस्तानी मंत्री ने कहा कि कथित अभियान का उद्देश्य केवल सरकार की आलोचना करना नहीं था, बल्कि देश की संस्थाओं पर लोगों का भरोसा कमजोर करना भी था। उन्होंने दावा किया कि इस सामग्री को अमेरिका से संचालित नेटवर्क के जरिए बड़े स्तर पर वायरल किया जा रहा था। हालांकि, तरार ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई सार्वजनिक दस्तावेज, जांच रिपोर्ट या अन्य ठोस सबूत पेश नहीं किए। वहीं अमेरिका की ओर से भी इन आरोपों पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों के बीच नया विवाद यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के वर्षों में अमेरिका और पाकिस्तान के बीच संबंधों में सुधार की चर्चा रही है। दोनों देशों के बीच सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और कूटनीतिक सहयोग को लेकर कई स्तरों पर बातचीत होती रही है। ऐसे माहौल में पाकिस्तान सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा अमेरिका पर पाकिस्तान विरोधी प्रचार अभियान चलाने का आरोप लगाना दोनों देशों के रिश्तों में नई बहस को जन्म दे सकता है। फिलहाल यह मामला पाकिस्तान के दावों तक सीमित है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
Pakistan Swat Suicide Attack: पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के स्वात जिले में रविवार को एक बड़ा आत्मघाती हमला हुआ। काबल पुलिस स्टेशन के बाहर आतंकवाद विरोधी जनसभा के दौरान एक फिदायीन हमलावर ने खुद को विस्फोट से उड़ा लिया। इस हमले में 14 लोगों की मौत हो गई, जबकि 18 से अधिक लोग घायल हुए हैं। मृतकों में पुलिसकर्मी और आम नागरिक दोनों शामिल हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने इलाके को घेरकर जांच शुरू कर दी है। पुलिस स्टेशन के बाहर खुद को उड़ाया पाकिस्तानी अखबार डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, हमला उस समय हुआ जब काबल पुलिस स्टेशन के बाहर बड़ी संख्या में लोग आतंकवाद के खिलाफ आयोजित रैली में शामिल थे। स्वात के जिला पुलिस अधिकारी (DPO) उमर खान ने बताया कि पुलिसकर्मियों ने एक संदिग्ध व्यक्ति को पुलिस स्टेशन के प्रवेश द्वार पर रोककर उसकी तलाशी लेने की कोशिश की। इसी दौरान उसने अपने शरीर पर बंधे विस्फोटकों में धमाका कर दिया। आतंकवाद विरोधी रैली के दौरान मचा हड़कंप रविवार को स्वात घाटी में बढ़ती आतंकी गतिविधियों के विरोध में सैकड़ों लोग काबल चौक पर एकत्र हुए थे। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, रैली का अंतिम वक्ता मंच से संबोधित कर रहा था, तभी जोरदार धमाका हुआ। विस्फोट के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई और लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। 14 मौतों की पुष्टि, दो घायलों की हालत गंभीर स्वात पुलिस के प्रवक्ता नासिर इकबाल करीमी ने 14 लोगों की मौत की पुष्टि की है। रेस्क्यू 1122 के अनुसार, नौ शवों को सैदु शरीफ केंद्रीय अस्पताल और पांच शवों को काबल अस्पताल भेजा गया है। घायलों में दो की हालत गंभीर बनी हुई है। फिलहाल किसी भी आतंकी संगठन ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है। पुलिस और फोरेंसिक टीम घटनास्थल से सबूत जुटाने में लगी हैं। प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर उठाए सवाल रैली में शामिल लोगों ने स्वात में लगातार बढ़ रही उग्रवादी गतिविधियों को लेकर सरकार की आलोचना की। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि सुरक्षा एजेंसियां आम नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई कर रही हैं, जबकि आतंकवादी खुलेआम सक्रिय हैं। वक्ताओं ने कहा कि सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हालात नहीं सुधरे तो जनता का आक्रोश और बढ़ सकता है। राष्ट्रपति जरदारी ने की निंदा पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने हमले की कड़ी निंदा करते हुए मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की और घायलों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा, "आतंकवादी शांति, राष्ट्रीय एकता और राज्य व्यवस्था को कमजोर करने के अपने नापाक मंसूबों में कभी सफल नहीं होंगे।" खैबर पख्तूनख्वा के राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने भी घटना की निंदा करते हुए विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। पाकिस्तान में बढ़ रही आतंकी घटनाएं यह हमला ऐसे समय हुआ है जब पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाओं में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। हाल ही में हांगू जिले में एक पुलिस चौकी पर हुए हमले में नौ पुलिसकर्मियों की मौत हुई थी, जबकि पेशावर-इस्लामाबाद मोटरवे पर हुए IED विस्फोट में दो पुलिसकर्मी घायल हुए थे। Pakistan Institute for Conflict and Security Studies (PICSS) के अनुसार, जुलाई महीने में केवल खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवाद से जुड़ी घटनाओं में 154 लोगों की मौत हुई, जबकि जून में यह संख्या 75 थी। यानी एक महीने में आतंकी हिंसा से होने वाली मौतों में करीब 105 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जिसने पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है।
Pakistan Coal Mine Blast: पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में एक कोयला खदान में हुए भीषण विस्फोट में 32 मजदूरों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य खनिकों के अब भी खदान में फंसे होने की आशंका है। अधिकारियों के अनुसार, यह हादसा संभवतः मीथेन गैस विस्फोट के कारण हुआ। राहत एवं बचाव अभियान लगातार जारी है। मीथेन गैस विस्फोट बना हादसे की वजह पीटीआई के मुताबिक, यह दुर्घटना बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा के बाहरी इलाके स्थित एक कोयला खदान में हुई। सरकारी खान निरीक्षक गनी बलोच ने बताया कि प्रारंभिक जांच में विस्फोट की वजह मीथेन गैस मानी जा रही है। उन्होंने कहा कि मीथेन गैस में विस्फोट के बाद खदान के भीतर ऑक्सीजन का स्तर लगभग शून्य हो जाता है, जिससे जीवित बचने की संभावना बेहद कम हो जाती है। 10 मजदूर अब भी लापता अधिकारियों के अनुसार, हादसे के बाद पहले सात शव निकाले गए, जबकि बाद में राहत टीमों ने 25 अन्य शव बरामद किए। अब भी करीब 10 खनिकों के फंसे होने की आशंका है, जिसके चलते मृतकों की संख्या बढ़ सकती है। बचाव दल कठिन परिस्थितियों में खदान के भीतर लगातार तलाश अभियान चला रहे हैं। बचाव अभियान जारी प्रांतीय आपदा प्रबंधन एजेंसी (PDMA) ने बताया कि राहत एवं बचाव अभियान तब तक जारी रहेगा, जब तक सभी फंसे मजदूरों का पता नहीं चल जाता। अधिकारियों ने कहा कि खदान के अंदर गैस की मौजूदगी के कारण बचाव कार्य बेहद सावधानी से किया जा रहा है। मृतकों के परिजनों को मिलेगा मुआवजा बलूचिस्तान के खदान एवं खनिज मंत्री शोएब नोशेरवानी ने हादसे पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि प्रांतीय सरकार मृतकों के प्रत्येक परिवार को 5-5 लाख पाकिस्तानी रुपये की आर्थिक सहायता देगी। उन्होंने कहा कि प्रशासन प्रभावित परिवारों की हरसंभव मदद करेगा और हादसे के कारणों की विस्तृत जांच भी कराई जाएगी। खदानों की सुरक्षा पर फिर उठे सवाल इस दर्दनाक हादसे के बाद पाकिस्तान में कोयला खदानों की सुरक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि गैस निगरानी, वेंटिलेशन और सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन नहीं होने के कारण इस तरह की दुर्घटनाएं बार-बार सामने आती रही हैं। फिलहाल प्रशासन ने पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है।
पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने देश की मौजूदा शासन व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए चेतावनी दी है कि यदि युवाओं की नाराजगी और जन असंतोष को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो पाकिस्तान भी बड़े जन आंदोलनों का सामना कर सकता है। इस्लामाबाद में आयोजित पाकिस्तान इकोनॉमिक समिट में दिए गए उनके बयान की अब राजनीतिक हलकों में व्यापक चर्चा हो रही है। 'मौजूदा सिस्टम पूरी तरह विफल' जियो न्यूज के मुताबिक, मोहसिन नकवी ने कहा कि वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था देश की समस्याओं का समाधान करने में सक्षम नहीं है। उन्होंने कहा, "जिस व्यवस्था के तहत हम रह रहे हैं, वह पूरी तरह विफल हो चुकी है। इस सिस्टम से देश की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। अगर व्यापक सुधार नहीं किए गए, तो 10 साल बाद भी हम इन्हीं मुद्दों पर बहस करते रहेंगे।" युवाओं का किया जिक्र अपने संबोधन में नकवी ने कहा कि पाकिस्तान के युवाओं को मुफ्त सहायता नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण व्यवस्था और रोजगार के अवसर चाहिए। उन्होंने कहा कि आम लोगों की सबसे बड़ी मांग है कि— योग्यता के आधार पर अवसर मिलें, न्याय सुनिश्चित हो, युवाओं के लिए रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध हों। 'कॉकरोच' वाली टिप्पणी बनी चर्चा का विषय भाषण के दौरान मोहसिन नकवी ने युवाओं की एकजुटता का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर असंतुष्ट युवा संगठित हो जाएं, तो बड़ा बदलाव ला सकते हैं। समा टीवी के अनुसार उन्होंने कहा, "चाहे आप उस युवा को युवा कहें, कॉकरोच कहें या कुछ और... अगर ये 'कॉकरोच' एकजुट हो जाएं, तो सब कुछ पलट सकते हैं।" उनकी यह टिप्पणी अब पाकिस्तान की राजनीति और सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। प्रशासनिक सुधारों की वकालत गृह मंत्री ने कहा कि देश की शासन व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए बड़े प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता है। उन्होंने नए प्रशासनिक यूनिट बनाने और स्थानीय सरकारों को अधिक अधिकार देने की भी पैरवी की, ताकि लोगों तक बेहतर शासन और सेवाएं पहुंच सकें। आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों के बीच आया बयान मोहसिन नकवी का यह बयान ऐसे समय आया है, जब पाकिस्तान आर्थिक संकट, बढ़ती बेरोजगारी, राजनीतिक अस्थिरता और बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे माहौल में उनका यह बयान देश की मौजूदा व्यवस्था और युवाओं के बढ़ते असंतोष को लेकर गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
Pakistan Politics: पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि मौजूदा सिस्टम पूरी तरह विफल हो चुका है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते शासन व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो पाकिस्तान को बड़े जनआंदोलनों और राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है। एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए नकवी ने कहा कि देश की मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था लोगों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही है। उन्होंने कहा कि केवल समस्याओं पर चर्चा करने से हालात नहीं बदलेंगे, बल्कि जवाबदेह और प्रभावी शासन व्यवस्था स्थापित करनी होगी। लोकतंत्र के साथ मजबूत प्रशासन भी जरूरी मोहसिन नकवी ने कहा कि वह लोकतंत्र के समर्थक हैं, लेकिन लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब प्रशासन पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी हो। उन्होंने कहा कि यदि मौजूदा व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले वर्षों में भी देश को उन्हीं समस्याओं से जूझना पड़ेगा जिनका सामना आज करना पड़ रहा है। युवाओं के बढ़ते असंतोष का किया जिक्र अपने संबोधन में नकवी ने युवाओं की बढ़ती नाराजगी को गंभीर चिंता का विषय बताया। उन्होंने कहा कि आज की Gen-Z केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजगार, पारदर्शिता, बेहतर शासन, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं जैसे विषयों पर भी मुखर हो रही है। इसी दौरान उन्होंने भारत में हुए CJP आंदोलन का भी उल्लेख करते हुए कहा कि दक्षिण एशिया में युवाओं की राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी लगातार बढ़ रही है। उनके अनुसार, यदि सरकारें युवाओं की अपेक्षाओं को नजरअंदाज करेंगी, तो व्यापक असंतोष पैदा हो सकता है। चुनावी वादों पर भी उठाए सवाल पाकिस्तानी गृह मंत्री ने राजनीतिक नेतृत्व की आलोचना करते हुए कहा कि चुनावों के दौरान बड़े पैमाने पर संसाधन खर्च किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद आम लोगों को बेहतर आर्थिक अवसर और बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पातीं। उन्होंने कहा कि इससे जनता, खासकर युवाओं का व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है। यदि सरकारें लोगों की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं करेंगी, तो राजनीतिक व्यवस्था के प्रति विश्वास और कम होता जाएगा। सुधार की जरूरत पर दिया जोर मोहसिन नकवी ने कहा कि पाकिस्तान इस समय आर्थिक चुनौतियों, राजनीतिक तनाव और प्रशासनिक कमजोरियों से जूझ रहा है। ऐसे में केवल बयानबाजी से काम नहीं चलेगा, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व, प्रशासन और समाज के सभी वर्गों को मिलकर शासन व्यवस्था में सुधार के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे। उन्होंने कहा कि देश के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए पारदर्शी प्रशासन, जवाबदेही और जनविश्वास को मजबूत करना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
PoK Election Violence: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में क्षेत्रीय चुनावों के बीच हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। रावलकोट, मीरपुर और आसपास के इलाकों में सुरक्षा बलों और जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के कार्यकर्ताओं के बीच कई दिनों से हिंसक झड़पें जारी हैं। प्रदर्शनकारी संगठन का दावा है कि गोलीबारी और कार्रवाई में 37 लोगों की मौत हुई है, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इस दावे को खारिज किया है और आधिकारिक तौर पर इतनी मौतों की पुष्टि नहीं की है। 12 विधानसभा सीटों को लेकर जारी है आंदोलन पीटीआई न्यूज एजेंसी के अनुसार, JAAC पिछले करीब दो महीनों से PoK विधानसभा की 12 विवादित सीटों को लेकर आंदोलन चला रहा है। संगठन का आरोप है कि पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान इन सीटों का इस्तेमाल अपनी पसंद की सरकार बनाने के लिए करता है। प्रदर्शनकारी मुजफ्फराबाद तक मार्च निकालने की मांग पर अड़े हुए हैं और चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने की मांग कर रहे हैं। लगातार विरोध प्रदर्शनों के कारण क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। मौतों के आंकड़ों पर विवाद JAAC का आरोप है कि निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की, जिसमें अब तक कम से कम 37 लोगों की मौत हो चुकी है और कई लोग घायल हुए हैं। वहीं पाकिस्तान सरकार ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि प्रदर्शनकारियों के बीच प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से जुड़े तत्व मौजूद हैं और सुरक्षा बल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई कर रहे हैं। सरकार ने अब तक 37 मौतों की पुष्टि नहीं की है। भारत ने चुनावों को बताया अवैध भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कराए जा रहे चुनावों को एक बार फिर अवैध करार दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, जिसमें PoK भी शामिल है, भारत का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने कहा कि वहां हो रहे विरोध प्रदर्शन क्षेत्र में आर्थिक शोषण, प्रशासनिक दमन और लोगों के अधिकारों के हनन का परिणाम हैं। भारत का कहना है कि पाकिस्तान इन चुनावों के जरिए अपने अवैध कब्जे को वैध ठहराने की कोशिश कर रहा है। मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता PoK में हिंसा की खबरों के बाद एमनेस्टी इंटरनेशनल और पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (HRCP) ने भी चिंता जताई है। दोनों संगठनों ने पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराने की मांग की है। हालांकि पाकिस्तान सरकार का कहना है कि कानून-व्यवस्था से समझौता नहीं किया जाएगा और हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी। बढ़ सकता है तनाव चुनावों के बीच जारी विरोध, हिंसक झड़पों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के कारण पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थिति लगातार संवेदनशील बनी हुई है। प्रदर्शनकारियों और सरकार के बीच गतिरोध खत्म होने के फिलहाल कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
PoK Protest: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को "भारत की तरह दुश्मन" बताते हुए कहा कि सरकार उनके साथ किसी भी तरह की बातचीत नहीं करेगी। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारी संगठन ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) का दावा है कि सुरक्षा बलों के साथ झड़पों में अब तक 20 कार्यकर्ताओं की मौत हो चुकी है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। प्रदर्शनकारियों से बातचीत से किया इनकार पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि सरकार प्रदर्शनकारियों के साथ कोई वार्ता नहीं करेगी। उन्होंने कहा, "मैं उन्हें भारत की ही श्रेणी में मानता हूं और उन्हें पाकिस्तान का दुश्मन समझता हूं।" उनके इस बयान से PoK में पहले से जारी तनाव और बढ़ गया है। वहीं, कानून प्रवर्तन एजेंसियों का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बलों पर गोलीबारी की, जबकि प्रदर्शनकारी संगठन इन आरोपों से इनकार कर रहा है। सलाहकार बोले- प्रदर्शनकारी कब्जे की कोशिश कर रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के सलाहकार राणा सनाउल्लाह ने कहा कि JAAC ने पहले सरकार के साथ बैठक कर 38 मांगें रखी थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारी मुजफ्फराबाद और मीरपुर पर बलपूर्वक कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं। सनाउल्लाह ने दावा किया कि उनकी गतिविधियां भारत जैसी रणनीति से प्रेरित हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में किसी की मौत नहीं हुई, जो JAAC के दावों से अलग है। JAAC का दावा- 20 कार्यकर्ताओं की मौत प्रतिबंधित संगठन ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने दावा किया है कि सोमवार से सुरक्षा बलों के साथ हुई झड़पों में उसके कम से कम 20 कार्यकर्ता मारे गए हैं और कई अन्य घायल हुए हैं। संगठन का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया। इस बीच, बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट के अनुसार, मीरपुर में विरोध के चलते बाजार और दुकानें बंद रहीं और कई इलाकों में सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ। चुनाव के बीच बढ़ा विवाद PoK की तथाकथित विधानसभा की 13 सीटों के लिए पहले चरण का मतदान सोमवार को हुआ, जिसमें पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) ने नौ सीटों पर जीत दर्ज की। शेष 32 सीटों के लिए दूसरे और तीसरे चरण का मतदान क्रमशः 2 अगस्त और 10 अगस्त को होना है। मुख्य मुकाबला PML-N और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के बीच माना जा रहा है, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने चुनाव का बहिष्कार किया है। 12 सीटों को लेकर आंदोलन JAAC पिछले महीने से विधानसभा की 12 विवादित सीटों को लेकर प्रदर्शन कर रही है। संगठन का आरोप है कि पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान इन सीटों के जरिए अपनी पसंद की सरकार बनवाने के लिए चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रहा है। भारत ने चुनावों पर जताई आपत्ति भारत ने भी PoK में कराए जा रहे चुनावों पर कड़ी आपत्ति जताई है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान इन चुनावों के जरिए अपने अवैध कब्जे और क्षेत्र में मानवाधिकार उल्लंघनों को छिपाने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने दोहराया कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा केंद्र शासित प्रदेश, जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले क्षेत्र भी शामिल हैं, भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। भारत ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि PoK पर उसका रुख पहले की तरह स्पष्ट और अपरिवर्तित है।
PoK Protest Violence: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के रावलाकोट में क्षेत्रीय चुनाव के पहले चरण के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़प हुई। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, इस घटना में कम से कम 19 प्रदर्शनकारियों की मौत होने का दावा किया गया है, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। हालांकि, मौतों और वायरल वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। रावलाकोट में हिंसा, कई घायल रिपोर्ट के अनुसार, 27 जुलाई को चुनाव के दौरान विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया। सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में कई लोग खून से लथपथ जमीन पर पड़े दिखाई दे रहे हैं। बताया गया है कि 19 मृतकों की पहचान हो चुकी है, जबकि एक अन्य शव की पहचान अभी बाकी है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उठाए सवाल मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने घटना पर गंभीर चिंता जताते हुए पाकिस्तान सरकार से सुरक्षा बलों की कार्रवाई की स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराने की मांग की है। संगठन की दक्षिण एशिया की कार्यवाहक क्षेत्रीय निदेशक इसाबेल लासी ने कहा कि रावलाकोट से सामने आ रही खबरें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित अत्यधिक बल प्रयोग की ओर इशारा करती हैं। उन्होंने कहा कि मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं बंद होने के कारण घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि करना मुश्किल हो गया है। एमनेस्टी ने मांग की कि सरकार संचार सेवाएं जल्द बहाल करे और मीडिया व स्वतंत्र पर्यवेक्षकों को प्रभावित क्षेत्रों में जाने की अनुमति दे। JAAC पर प्रतिबंध को लेकर भी चिंता एमनेस्टी इंटरनेशनल ने जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) पर लगाए गए प्रतिबंध की भी आलोचना की। संगठन का कहना है कि इस कदम ने चुनाव के दौरान तनाव और बढ़ा दिया है। एमनेस्टी ने पाकिस्तान सरकार से आतंकवाद विरोधी कानूनों का इस्तेमाल कर आंदोलनकारियों को निशाना बनाना बंद करने और JAAC पर लगाए गए प्रतिबंध की समीक्षा करने की अपील की। दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग JAAC का दावा है कि सुरक्षा बलों की गोलीबारी में 19 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई और कई अन्य घायल हुए। वहीं, पुलिस का कहना है कि झड़प के दौरान उसके दो जवान भी घायल हुए हैं। दोनों पक्षों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हो सकी है। चुनाव से पहले बढ़ा तनाव एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, 5 जून से पूरे क्षेत्र में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद हैं। इसी दिन JAAC को आतंकवाद निरोधक कानून, 2014 के तहत प्रतिबंधित संगठन घोषित किया गया था। मानवाधिकार संगठन ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव से पहले हुई हिंसा में अब तक कम से कम 40 लोगों की मौत होने की खबर है। इनमें 34 प्रदर्शनकारी और छह पुलिस एवं अर्द्धसैनिक बल के जवान शामिल बताए गए हैं। मानवाधिकारों पर बढ़ी चिंता चुनावी हिंसा और इंटरनेट प्रतिबंध के बीच PoK में सुरक्षा और मानवाधिकारों को लेकर चिंता बढ़ गई है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि पारदर्शी जांच और स्वतंत्र मीडिया की पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि घटना की वास्तविक परिस्थितियां सामने आ सकें और जवाबदेही तय हो सके।
PoK Violence: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में तथाकथित विधानसभा चुनाव के पहले चरण से पहले हिंसा भड़क गई है। रावलाकोट से मुजफ्फराबाद तक निकाले गए विरोध मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों के बाद हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने दावा किया है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई में उसके 14 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई है, जबकि दो दर्जन से अधिक लोग घायल हुए हैं। हालांकि, इन दावों की अब तक स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। मौतों के दावों पर पुलिस ने उठाए सवाल पीटीआई के मुताबिक, PoK के पुलिस प्रमुख लियाकत अली मलिक ने 14 लोगों की मौत के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक शव बरामद नहीं होते और पोस्टमार्टम नहीं कराया जाता, तब तक किसी भी मौत की आधिकारिक पुष्टि नहीं की जा सकती। उन्होंने बताया कि झड़प के दौरान एक रेंजर्स जवान की मौत हुई है, जबकि दो रेंजर्स और दो पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। JAAC और पुलिस के दावे आमने-सामने JAAC का आरोप है कि उसका 'लॉन्ग मार्च' पूरी तरह शांतिपूर्ण था और प्रदर्शनकारी निहत्थे थे। संगठन का कहना है कि सुरक्षा बलों ने बिना किसी उकसावे के गोलीबारी की। वहीं, पुलिस का दावा है कि प्रदर्शनकारियों के पास आधुनिक हथियार थे और उन्होंने पहले सुरक्षाबलों पर फायरिंग की, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई की गई। 12 आरक्षित सीटों को लेकर कई हफ्तों से विरोध JAAC पिछले कई सप्ताह से विधानसभा की 12 शरणार्थी आरक्षित सीटों को समाप्त करने की मांग कर रहा है। संगठन का आरोप है कि पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान इन सीटों के जरिए अपनी पसंद की सरकार बनवाने की कोशिश करता है। इसी मांग को लेकर रावलाकोट से मुजफ्फराबाद तक 'लॉन्ग मार्च' निकाला गया था, जो अब हिंसक झड़प में बदल गया। इंटरनेट बंद, मीडिया पर भी पाबंदियां हिंसा के बाद PoK के कई इलाकों में इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गई हैं और मीडिया कवरेज पर भी प्रतिबंध लगाए जाने की खबर है। पाक प्रशासन और JAAC के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकल सका है। भारत पहले भी उठा चुका है मुद्दा भारत पहले भी PoK में जारी विरोध प्रदर्शनों को वहां के लोगों के कथित शोषण और प्रशासनिक दमन का परिणाम बता चुका है। चुनावी प्रक्रिया के बीच बढ़ते तनाव और हिंसा ने पूरे क्षेत्र की स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। फिलहाल, मौतों और घायल होने के दावों की स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार है, जबकि इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।
मुजफ्फराबाद, एजेंसियां। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में स्थानीय प्रदर्शनकारियों और पाकिस्तान की सुरक्षा बलों के बीच तनाव बढ़ गया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आरोप लगा है। इस घटना में कई लोगों के घायल होने की खबर है, हालांकि घायलों की आधिकारिक संख्या की पुष्टि नहीं हुई है। महंगाई और अधिकारों को लेकर जारी है विरोध रिपोर्टों के मुताबिक, प्रदर्शनकारी लंबे समय से महंगाई, बिजली दरों, कर व्यवस्था और स्थानीय अधिकारों को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। हाल के दिनों में कई स्थानों पर प्रदर्शन तेज हो गए, जिसके बाद सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई। प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि प्रदर्शन को नियंत्रित करने के दौरान बल प्रयोग किया गया। हालांकि, पाकिस्तानी प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई किए जाने की बात कही है। मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता घटना के बाद मानवाधिकार संगठनों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग के आरोपों पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने मामले की निष्पक्ष जांच और घायल लोगों को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की मांग की है। क्षेत्र में तनाव बरकरार गोलीबारी के आरोपों के बाद PoK के कई इलाकों में तनाव बना हुआ है। प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है और संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त बल तैनात किया गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि स्थिति सामान्य करने के लिए शांतिपूर्ण संवाद और भरोसेमंद समाधान की जरूरत है।
न्यूयॉर्क, एजेंसियां। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की बैठक में पाकिस्तान द्वारा सिंधु जल संधि का मुद्दा उठाए जाने पर भारत ने कड़ा जवाब दिया। भारत ने स्पष्ट कहा कि सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) फिलहाल स्थगित रहेगी और जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता, तब तक इस फैसले में कोई बदलाव नहीं होगा। आतंकवाद और जल संधि को अलग नहीं देखा जा सकता संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने कहा कि पाकिस्तान द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सिंधु जल संधि का मुद्दा उठाना भ्रामक और निराधार है। भारत ने दोहराया कि सीमा पार आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते। भारतीय पक्ष के अनुसार पाकिस्तान लगातार आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा है, इसलिए मौजूदा परिस्थितियों में संधि को पहले की तरह लागू रखना संभव नहीं है। पाकिस्तान के आरोपों को भारत ने किया खारिज भारत ने पाकिस्तान के उन आरोपों को भी सिरे से खारिज किया, जिनमें कहा गया था कि भारत सिंधु जल संधि का उल्लंघन कर रहा है। भारतीय प्रतिनिधि ने स्पष्ट किया कि संधि को स्थगित रखने का फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा और मौजूदा हालात को ध्यान में रखकर लिया गया है। भारत ने यह भी कहा कि यदि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ विश्वसनीय और ठोस कदम उठाता है, तभी भविष्य में द्विपक्षीय मुद्दों पर सकारात्मक माहौल बन सकता है।
Pakistan Fuel Price Hike: पाकिस्तान सरकार ने एक बार फिर पेट्रोल और हाई-स्पीड डीजल (HSD) की कीमतों में बढ़ोतरी कर दी है। नई दरें 22 जुलाई से लागू हो गई हैं। इस फैसले के बाद पेट्रोल 4.93 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर और हाई-स्पीड डीजल 7.15 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर महंगा हो गया है। बढ़ती ईंधन कीमतों का असर परिवहन, माल ढुलाई और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ने की आशंका है। क्या हैं नई कीमतें? नई कीमतों के लागू होने के बाद पाकिस्तान में: पेट्रोल: 320.73 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर हाई-स्पीड डीजल (HSD): 367.21 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर भारतीय मुद्रा के हिसाब से यह कीमतें लगभग इस प्रकार हैं: ईंधन भारत पाकिस्तान (भारतीय रुपये में लगभग) पेट्रोल ₹102.12/लीटर ₹111.21/लीटर डीजल ₹95.20/लीटर ₹127.33/लीटर अप्रैल के रिकॉर्ड स्तर से अभी भी कम कीमतें हालांकि मौजूदा कीमतें बढ़ी हैं, लेकिन ये इस साल अप्रैल में दर्ज रिकॉर्ड स्तर से अभी भी काफी नीचे हैं। डीजल 3 अप्रैल को बढ़कर 520.35 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया था। पेट्रोल भी 3 अप्रैल को 458.41 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कुछ नरमी आने से ईंधन दरों में कमी दर्ज की गई थी। अब रोजाना तय होंगे पेट्रोल-डीजल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव को देखते हुए पाकिस्तान सरकार ने ईंधन मूल्य निर्धारण की नीति में बड़ा बदलाव किया है। पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने घोषणा की है कि अब पेट्रोल और डीजल की कीमतें साप्ताहिक के बजाय रोजाना तय की जाएंगी। सरकार का कहना है कि इससे वैश्विक बाजार के अनुरूप कीमतों में तेजी से बदलाव किया जा सकेगा। डीलर्स एसोसिएशन ने किया विरोध सरकार के इस फैसले का ऑल पाकिस्तान पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने विरोध किया है। एसोसिएशन का कहना है कि रोजाना कीमतें बदलने से कारोबार प्रभावित होगा और उपभोक्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा होगी। संगठन ने इस फैसले के खिलाफ प्रदर्शन की चेतावनी भी दी है। महंगाई पर पड़ेगा सीधा असर विशेषज्ञों का मानना है कि ईंधन महंगा होने से सबसे अधिक असर मध्यम और निम्न आय वर्ग पर पड़ेगा। पेट्रोल महंगा होने से निजी वाहन, मोटरसाइकिल और ऑटो रिक्शा चलाने वालों का खर्च बढ़ेगा। डीजल की कीमत बढ़ने से ट्रक, बस, माल ढुलाई और बिजली उत्पादन की लागत बढ़ेगी। इसका असर खाद्य पदार्थों समेत रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। पाकिस्तान में हर महीने करीब 7 से 8 लाख टन पेट्रोल और डीजल की खपत होती है, इसलिए ईंधन की कीमतों में मामूली बदलाव भी देश की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर बड़ा प्रभाव डालता है।
Pakistan Fuel Price Hike: पाकिस्तान में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी के बाद महंगाई का दबाव और बढ़ गया है। ईंधन महंगा होने के साथ ही देशभर में सार्वजनिक परिवहन, माल ढुलाई और अन्य परिवहन सेवाओं के किराए भी बढ़ा दिए गए हैं। इसका सीधा असर आम लोगों और कारोबारियों की जेब पर पड़ रहा है। ईंधन महंगा होने से बढ़े ट्रांसपोर्ट के किराए ईरान-अमेरिका तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर पाकिस्तान पर भी पड़ा है। सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए जाने के बाद ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों ने भी किराए में इजाफा कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, अब एक स्टॉप से दूसरे स्टॉप तक का न्यूनतम किराया 50 पाकिस्तानी रुपये (PKR) कर दिया गया है। वहीं माल ढुलाई का खर्च भी काफी बढ़ गया है। कराची से पेशावर तक माल भेजना हुआ महंगा पाकिस्तानी अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, कराची से पेशावर तक सामान ले जाने वाले ट्रेलरों का किराया बढ़कर 7 लाख पाकिस्तानी रुपये तक पहुंच गया है। इससे व्यापारियों की लागत बढ़ने और बाजार में महंगाई और तेज होने की आशंका जताई जा रही है। रावलपिंडी में भी बढ़ा यात्रियों का किराया रावलपिंडी में लोकल ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों ने प्रति यात्री किराए में 20 पाकिस्तानी रुपये की बढ़ोतरी की है। वहीं आसपास के इलाकों में चलने वाली परिवहन सेवाओं ने प्रति यात्री 30 पाकिस्तानी रुपये अतिरिक्त वसूलना शुरू कर दिया है। इसके अलावा कई ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर अब यात्रियों के सामान के लिए अलग से शुल्क भी ले रहे हैं। बच्चों से भी लिया जा रहा पूरा किराया नई व्यवस्था के तहत कई बस ऑपरेटरों ने 8 वर्ष या उससे अधिक उम्र के बच्चों से भी पूरा किराया लेना शुरू कर दिया है। वहीं लंबी दूरी की बस सेवाओं में टिकट की कीमत 100 से 250 पाकिस्तानी रुपये प्रति यात्री तक बढ़ा दी गई है। रावलपिंडी से मरी के बीच चलने वाली एसी कोच सेवा का किराया भी बढ़ाकर 700 पाकिस्तानी रुपये कर दिया गया है। रिक्शा और बाइक टैक्सी के किराए भी बढ़े ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का असर स्थानीय परिवहन पर भी दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार— चिंगची रिक्शा चालकों ने किराया बढ़ा दिया है। बाइक टैक्सी और मोटरसाइकिल सेवाओं के किराए में भी वृद्धि हुई है। लोडर रिक्शा संचालकों ने सामान ढुलाई का शुल्क 500 पाकिस्तानी रुपये तक बढ़ा दिया है। महंगाई से बढ़ी आम लोगों की परेशानी पाकिस्तान पहले से ही ऊंची महंगाई, बढ़ती जीवन-यापन लागत और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में पेट्रोल-डीजल की नई कीमतों के बाद परिवहन और माल ढुलाई महंगी होने से रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम भी बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है, तो आने वाले दिनों में पाकिस्तान में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।