रांची। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अब पंजाब में संगठन विस्तार और चुनावी जमीन तैयार करने में जुटी है। 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी राज्य में अपनी रणनीति को धार देने में लगी है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि क्या पंजाब भी आने वाले समय में बंगाल की तरह भाजपा और विपक्ष के बीच सीधी राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बनेगा। बीजेपी पंजाब में कानून-व्यवस्था, नशे की समस्या, किसानों से जुड़े मुद्दों और विकास के एजेंडे को प्रमुखता से उठा रही है। पार्टी का प्रयास शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी अपने संगठन को मजबूत करना है। इसके लिए बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और नए चेहरों को जोड़ने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। राघव चड्ढा फैक्टर पर नजर पंजाब की राजनीति में राघव चड्ढा का नाम लगातार चर्चा में बना हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आम आदमी पार्टी के प्रमुख चेहरों में रहे राघव चड्ढा को लेकर चल रही अटकलों ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दी है। हालांकि, उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक किसी बड़े बदलाव की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद उनका नाम पंजाब की बदलती सियासी तस्वीर में अहम माना जा रहा है। क्या पंजाब में दोहराएगा बंगाल वाला समीकरण? विशेषज्ञों का कहना है कि पंजाब की राजनीतिक परिस्थितियां पश्चिम बंगाल से काफी अलग हैं। यहां आम आदमी पार्टी सत्ता में है, जबकि शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और बीजेपी चार प्रमुख ताकतों के रूप में मैदान में हैं। ऐसे में बीजेपी के लिए चुनौती आसान नहीं होगी। फिर भी पार्टी संगठन का विस्तार, नए सामाजिक समीकरण और आक्रामक चुनावी रणनीति के जरिए खुद को मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है।आप के दो पूर्व नेता रेस में हैं। पंजाब की सियासी ताकत की बात करे तो पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं। विधानसभा में बीजेपी के दो MLA हैं।पंजाब में लोकसभा की कुल सीटें 13 हैं। बीजेपी के पास कोई सीट नहीं है।पंजाब में राज्यसभा की कुल सीटें सात हैं। इनमें छह बीजेपी के पास हैं। आप के दो पूर्व नेता हैं रेस में इधर पश्चिम बंगाल की जीत के बाद पंजाब को गंभीरता से ले रही बीजेपी राज्य को केंद्रीय मंत्रिमंडल फेरबदल में अधिक तवज्जो दे सकती है। चर्चा है कि पंजाब में AAP छोड़कर आए नेताओं को इनाम मिल सकता है। इनमें सेलिब्रेटी फेस राघव चड्ढा का नाम सबसे आगे है। उनके साथ अशोक मित्तल (लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी) का भी नाम चल रहा है। चर्चा है कि दोनों में किसी एक को मंत्री बनाया जा सकता है, लेकिन अभी फैसला नहीं हुआ है। रवनीत बिट्टू को बीजेपी चुनावों में झोंकना चाहती है। उनकी जगह पर हाल ही में मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद बने तरुण चुघ को लाया जा सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कद्दावर नेता चुघ पंजाब चुनाव में पार्टी को मजबूती देंगे। वह पंजाब से ही आते हैं। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि 2027 के विधानसभा चुनाव तक पंजाब की सियासत किस ओर करवट बैठती है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। और क्या बीजेपी राज्य में वैसी ही राजनीतिक बढ़त हासिल कर पाएगी जैसी उसने बंगाल या अन्य राज्यों में दर्ज की है?
पुणे, एजेंसियां। चर्चित केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। पुलिस ने मामले के मुख्य आरोपी चेतन चौधरी का गेट (Gait) एनालिसिस कराने का फैसला लिया है। जांच एजेंसियों का मानना है कि इस वैज्ञानिक परीक्षण से हत्या वाले दिन चेतन की गतिविधियों और घटनास्थल पर उसकी मौजूदगी से जुड़े महत्वपूर्ण सुराग मिल सकते हैं। इसी कड़ी में पुलिस मंगलवार को चेतन को लेकर एक बार फिर लोहागढ़ किला पहुंची, जहां पूरे घटनाक्रम का पुनर्निर्माण (क्राइम सीन रीक्रिएशन) किया जाएगा। पुलिस हिरासत पांच दिन और बढ़ी सोमवार को महाराष्ट्र की एक अदालत ने मुख्य आरोपी सिया गोयल और चेतन चौधरी की पुलिस हिरासत पांच दिन के लिए बढ़ा दी। पुलिस ने अदालत को बताया कि मामले की जांच अभी जारी है और आरोपियों से पूछताछ के साथ-साथ घटनास्थल पर साक्ष्यों की पुष्टि के लिए उनका पुलिस हिरासत में रहना जरूरी है। पासपोर्ट जलाने का भी आरोप पुलिस जांच के अनुसार, सिया गोयल ने कथित तौर पर केतन का पासपोर्ट चोरी कर उसे फाड़कर जला दिया था। दावा है कि परिवार की प्रस्तावित बाली यात्रा को रोकने और केतन के साथ विदेश जाने से बचने के लिए उसने ऐसा किया। जांच में कार चालक के बयान को भी अहम माना जा रहा है, जिसने बताया कि यात्रा के दौरान सिया कुछ देर के लिए अकेले कार तक गई थी। हत्या की साजिश के मिले संकेत पुलिस का आरोप है कि 18 जून को लोहागढ़ किले पर केतन अग्रवाल को खाई में धक्का देकर हत्या की गई। शुरुआत में इसे हादसा माना गया था, लेकिन बाद की जांच में हत्या की आशंका सामने आई। पुलिस के मुताबिक, सिया और चेतन के बीच पिछले छह महीनों में 2,000 से अधिक फोन कॉल और लगभग 238 घंटे की बातचीत हुई थी। जांच एजेंसियों को शक है कि इन्हीं बातचीत के दौरान कथित साजिश रची गई। पुलिस यह भी दावा कर रही है कि घटना से पहले भी केतन को खाई में धक्का देने की एक असफल कोशिश की गई थी। अब गेट एनालिसिस, क्राइम सीन रीक्रिएशन और अन्य फॉरेंसिक जांच के आधार पर पुलिस इस हाई-प्रोफाइल मामले की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है।
नई दिल्ली: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के महासचिव डी राजा ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की राजनीतिक दिशा और संगठनात्मक स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पार्टी को अपने भीतर उभर रही चुनौतियों पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब पार्टी से जुड़े कुछ नेताओं और सांसदों के इस्तीफों को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज है। डी राजा ने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल की मजबूती उसकी वैचारिक स्पष्टता और संगठनात्मक एकजुटता पर निर्भर करती है। उनके अनुसार, यदि वरिष्ठ नेता और सांसद लगातार पार्टी छोड़ रहे हैं, तो नेतृत्व को इसके कारणों पर खुलकर बात करनी चाहिए। टीएमसी की वैचारिक दिशा पर सवाल सीपीआई नेता ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी राजनीतिक और वैचारिक प्राथमिकताएं क्या हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद असंतोष जताकर अलग रास्ता चुन रहे हैं, तो इसके पीछे के कारणों पर चर्चा होनी चाहिए। डी राजा ने कहा कि किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करे। इस्तीफों के बाद बढ़ी राजनीतिक चर्चा डी राजा की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब तृणमूल कांग्रेस से जुड़े कुछ नेताओं और राज्यसभा सदस्यों के इस्तीफों को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा चल रही है। विपक्षी दल इन घटनाओं को पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि टीएमसी की ओर से इस पर अलग दृष्टिकोण सामने रखा जा रहा है। राजनीतिक बहस तेज राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्षी दलों द्वारा टीएमसी पर लगातार हमले किए जा रहे हैं और आगामी राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए इस तरह के बयान आने वाले दिनों में और तेज हो सकते हैं। वहीं, तृणमूल कांग्रेस के सामने संगठनात्मक मजबूती और राजनीतिक संदेश को लेकर नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। फिलहाल डी राजा के बयान ने पश्चिम बंगाल की राजनीति और विपक्षी खेमे में नई बहस को जन्म दे दिया है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश Markandey Katju द्वारा कथित तौर पर शुरू की गई ‘इश्क करो पार्टी’ को लेकर सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई है। इस बीच तृणमूल कांग्रेस की सांसद Mahua Moitra का नाम भी चर्चा में आ गया है। सोशल मीडिया पर वायरल दावों को लेकर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। ‘इश्क करो पार्टी’ को लेकर क्या है दावा? सोशल मीडिया और कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने ‘इश्क करो पार्टी’ (IKP) नामक एक राजनीतिक मंच की घोषणा की है। बताया जा रहा है कि इस मंच का उद्देश्य समाज में बढ़ती नफरत और विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ प्रेम, सामाजिक एकता और संवाद को बढ़ावा देना है। रिपोर्ट्स के अनुसार, काटजू ने लोगों से जाति, धर्म और क्षेत्रीय विभाजन से ऊपर उठकर सामाजिक सद्भाव के लिए काम करने की अपील की है। महुआ मोइत्रा का नाम क्यों आया चर्चा में? कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि काटजू ने तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा को भी इस नए राजनीतिक मंच से जुड़ने का न्योता दिया है। साथ ही यह भी कहा गया कि उन्होंने पश्चिम बंगाल की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और टीएमसी के भीतर चल रही कथित चुनौतियों का जिक्र किया। इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है और न ही इस संबंध में कोई आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए कथित जवाब वायरल दावों में यह भी कहा गया कि महुआ मोइत्रा ने जस्टिस काटजू की टिप्पणियों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। कथित जवाब में उन्होंने अपने राजनीतिक रुख और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि संबंधित पोस्ट या बयान दोनों पक्षों के आधिकारिक सोशल मीडिया खातों पर स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में इन दावों की सत्यता को लेकर सवाल बने हुए हैं। आधिकारिक पुष्टि का इंतजार राजनीतिक गलियारों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चर्चा जरूर है, लेकिन अभी तक न तो जस्टिस मार्कंडेय काटजू की ओर से और न ही महुआ मोइत्रा की ओर से कोई औपचारिक बयान जारी किया गया है, जिससे वायरल दावों की पुष्टि हो सके। विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक हस्तियों से जुड़े कई दावे तेजी से वायरल हो जाते हैं, इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक जानकारी का इंतजार करना जरूरी है। क्यों चर्चा में है मामला? ‘इश्क करो पार्टी’ नाम की वजह से सोशल मीडिया पर बहस तेज। महुआ मोइत्रा का नाम जुड़ने से राजनीतिक दिलचस्पी बढ़ी। वायरल दावों की अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं। दोनों पक्षों की ओर से स्पष्ट बयान आने का इंतजार। फिलहाल यह मामला सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं तक सीमित है तथा वायरल दावों की सत्यता को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
सोशल मीडिया पर चर्चा में रही "कॉकरोच जनता पार्टी" को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। RSS के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख Sunil Ambekar ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र इतना मजबूत है कि वह सभी विचारों, भावनाओं और मतों को अपने भीतर समाहित कर सकता है। नागपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान आंबेकर ने कहा कि भारत में लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत हैं और लोगों को देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भरोसा रखना चाहिए। लोकतंत्र में हर विचार के लिए जगह: आंबेकर कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर पूछे गए सवाल पर आंबेकर ने कहा कि भारत में पारदर्शी चुनाव, स्वतंत्र मीडिया और खुली अभिव्यक्ति की व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में अलग-अलग विचारों और चर्चाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विभिन्न मुद्दे उठना स्वाभाविक है और उन्हें सुलझाने के लिए संवैधानिक तथा लोकतांत्रिक तरीके मौजूद हैं। 'जेन-Z' को देश और संविधान पर भरोसा आंबेकर ने कहा कि भारत का 'जेन-Z' यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी युवा पीढ़ी बेहद आशावादी है। उनके अनुसार, देश के युवाओं का भारत और उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहरा विश्वास है। उन्होंने कहा कि युवा संवैधानिक ढांचे के भीतर रहकर अपनी बात रखते हैं और लोकतांत्रिक माध्यमों से बदलाव में विश्वास करते हैं। RSS ने लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जताया भरोसा RSS नेता ने कहा कि भारत की जनता, लोकतांत्रिक संस्थाएं और राजनीतिक व्यवस्था मजबूत हैं। उन्होंने कहा कि देश का लोकतंत्र हर नागरिक की आवाज और भावनाओं को समायोजित करने की क्षमता रखता है। आंबेकर के मुताबिक, मीडिया स्वतंत्र है, राजनीतिक दल सक्रिय हैं और किसी भी संस्था को कमजोर नहीं माना जा सकता। पाकिस्तान से संवाद पर भी रखी राय पाकिस्तान के साथ बातचीत को लेकर RSS सरकार्यवाह Dattatreya Hosabale के हालिया बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए आंबेकर ने कहा कि संघ हमेशा लोगों के बीच संवाद का समर्थक रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकारों के बीच औपचारिक वार्ता राजनीतिक और कूटनीतिक निर्णय का विषय है, लेकिन लोगों के बीच संपर्क और संवाद जारी रहना चाहिए। उनका मानना है कि व्यापार, सामाजिक संपर्क और संवाद से दोनों देशों के संबंधों में सुधार की संभावना बनी रहती है। विभाजन पर RSS का पुराना रुख दोहराया आंबेकर ने कहा कि RSS ऐतिहासिक रूप से भारत के विभाजन का विरोध करता रहा है। उन्होंने दावा किया कि यदि उस समय संगठन अधिक मजबूत स्थिति में होता तो देश का विभाजन टाला जा सकता था। उन्होंने कहा कि संघ आज भी राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को अपनी प्राथमिकता मानता है।
मुंबई, एजेंसियां। कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने सोशल मीडिया पर फिल्म धुरंधर की तारीफ करते हुए एक पोस्ट की। साथ ही एक यूजर को जवाब देते हुए कहा कि फिल्म में मुसलमानों को नहीं, बल्कि पाकिस्तानियों को नेगेटिव तरीके से दिखाया गया है। दरअसल, शमा ने ऑफिशियल X अकाउंट पर लिखा कि उन्होंने हाल ही में फिल्म धुरंधर देखी और उन्हें इसका डायरेक्शन, स्क्रिप्ट और एक्टिंग काफी पसंद आई। उन्होंने एक्टर रणवीर सिंह की एक्टिंग की तारीफ की और डायरेक्टर आदित्य धर की सराहना करते हुए कहा कि फिल्म में पुराने हिंदी गानों को सीन्स से जोड़ने का तरीका शानदार था। यूजर ने फिल्म को बताया प्रोपेगेंडा मूवी शमा की पोस्ट पर कमेंट करते हुए एक यूजर ने कहा, ‘तुम यह कैसे पोस्ट कर सकती हो? इस प्रोपेगेंडा फिल्म में मुसलमानों को गलत तरीके से दिखाया गया है। तुम्हें शर्म आनी चाहिए।’ इस पर शमा ने जवाब देते हुए कहा, ‘इस फिल्म में मुसलमानों को गलत नहीं दिखाया गया, बल्कि पाकिस्तानियों को गलत दिखाया गया है। दोनों को एक जैसा बताना गलत है। तुम्हारे जैसे लोग भारत में मुसलमानों की इमेज खराब करते हैं। अगर तुम्हें भारत से इतनी दिक्कत है, तो तुम पाकिस्तान की नागरिकता ले सकते हो।’ धुरंधर ने 1,307 करोड़ रुपए कमाए थे धुरंधर 5 दिसंबर 2025 को ग्लोबली रिलीज हुई थी। फिल्म में रणवीर सिंह के साथ संजय दत्त, अक्षय खन्ना, आर माधवन, अर्जुन रामपाल और सारा अर्जुन नजर आए थे। फिल्म आदित्य धर ने डायरेक्ट की थी। सैकनिल्क के अनुसार, धुरंधर ने भारत और अंतरराष्ट्रीय बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया और दुनियाभर में करीब 1,307 करोड़ रुपए कमाए। भारत में फिल्म का ग्रॉस कलेक्शन 1,005.85 करोड़ रुपए रहा, जबकि नेट कलेक्शन लगभग 840 करोड़ रुपए हुआ। विदेशी बाजारों में भी फिल्म को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला। ओवरसीज में इसने करीब 299.5 करोड़ रुपए कमाए। अमेरिका और कनाडा में 193.06 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई कर बाहुबली 2 का रिकॉर्ड भी तोड़ा। दूसरा पार्ट 19 मार्च को रिलीज हुआ था धुरंधर का दूसरा पार्ट ग्लोबली 19 मार्च 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुआ था। फिल्म की अब तक की कुल दुनिया भर में कमाई 1,792 करोड़ रुपए हो चुकी है। भारत में फिल्म का कुल नेट कलेक्शन 1,141 करोड़ रुपए और कुल ग्रॉस कलेक्शन 1,365 करोड़ रुपए तक हो गया है। फिल्म ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों से अब तक 426 करोड़ रुपए की कमाई की है।
संवाददाता भारत में महिला आरक्षण का मुद्दा केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि दशकों पुरानी राजनीतिक रस्साकशी का केंद्र रहा है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023) के पारित होने के बाद भी, 2026 तक आते-आते यह विषय और अधिक जटिल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गया है। पेश है राजनीति की परत खोलती ये रिपोर्टः भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 'महिला आरक्षण' एक ऐसा शब्द है जो संसद की दहलीज पर पिछले तीन दशकों से गूंज रहा है। सितंबर 2023 में संसद के विशेष सत्र के दौरान नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संवैधानिक संशोधन) का पारित होना एक ऐतिहासिक घटना थी। लेकिन आज, 2026 में, इसके क्रियान्वयन की समयसीमा और शर्तों ने इसे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक बड़े राजनीतिक युद्ध के मैदान में धकेल दिया है। 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' और वर्तमान गतिरोध कानूनः लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित किया जा चुका है। परंतु अप्रैल 2026 में केंद्र की मोदी सरकार जो संशोधन प्रस्ताव लेकर आई, उसका विरोध शुरू हो गया है। इतना ही नहीं, नारी शक्ति वंदन विधेयक संशोधन प्रस्ताव लोकसभा में पास भी नहीं हो सका। संशोधन में इस कानून के साथ दो प्रमुख शर्तें जुड़ी हैं: अगली जनगणना (Census): आरक्षण लागू होने से पहले नई जनगणना का होना अनिवार्य है। परिसीमन (Delimitation): जनगणना के आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाएगा, जिसके बाद ही सीटें आरक्षित होंगी। राजनीतिक विवाद की जड़: विपक्षी दलों का तर्क है कि सरकार ने आरक्षण को "भविष्य की तारीख" (Post-2029) पर धकेल कर महिलाओं के साथ वादाखिलाफी की है। वहीं, सरकार का कहना है कि यह एक पारदर्शी और संवैधानिक प्रक्रिया है, ताकि कोई कानूनी अड़चन न आए। हालिया घटनाक्रम-131वां संशोधन विधेयकः हाल ही में (अप्रैल 2026), केंद्र सरकार ने 131वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया, जिसका उद्देश्य जनगणना और परिसीमन की कड़ी को सरल बनाना था, ताकि आरक्षण को 2029 के चुनावों तक लागू किया जा सके। सरकार का प्रस्ताव: लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव दिया गया, ताकि किसी भी मौजूदा सांसद की सीट कम किए बिना महिलाओं को 33% कोटा दिया जा सके। विपक्ष का विरोध और हार: विपक्षी दलों ने इस 'लिंकेज' (सीटों की संख्या बढ़ाना और परिसीमन) का कड़ा विरोध किया। परिणामस्वरुप, यह विधेयक लोकसभा में आवश्यक बहुमत प्राप्त करने में विफल रहा, जिसे प्रधानमंत्री ने "लोकतंत्र के लिए दुखद" और विपक्ष की "महिला विरोधी मानसिकता" करार दिया। राजनीति के मुख्य केंद्र बिंदुः 'आरक्षण के भीतर आरक्षण' (OBC कोटा) कांग्रेस समेत अधिकांश विपक्षी दलों की मुख्य मांग है कि 33% कोटे के भीतर OBC महिलाओं के लिए अलग से उप-कोटा (Sub-quota) सुनिश्चित किया जाए।"बिना ओबीसी आरक्षण के, यह बिल केवल सवर्ण महिलाओं तक सीमित रह जाएगा।" - यह विपक्ष का प्रमुख नैरेटिव बन चुका है, जिससे सरकार को पिछड़ा वर्ग की राजनीति के मोर्चे पर रक्षात्मक होना पड़ रहा है। दक्षिण बनाम उत्तर भारत का विवादः लोकसभा सीटों के विस्तार और परिसीमन ने क्षेत्रीय राजनीति को गर्मा दिया है। तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है, इसलिए आबादी के आधार पर सीटें बढ़ने से उत्तर भारतीय राज्यों का वर्चस्व बढ़ेगा और दक्षिणी राज्यों का राजनीतिक वजन कम होगा। जाति जनगणना (Caste Census) की मांगः विपक्ष ने महिला आरक्षण को जाति जनगणना से जोड़ दिया है। उनका तर्क है कि जब तक यह पता नहीं चलेगा कि किस जाति की कितनी आबादी है, तब तक आरक्षण का वास्तविक लाभ हाशिए पर खड़ी महिलाओं तक नहीं पहुंचेगा। सांख्यिकीय आईना की वर्तमान स्थितिः भले ही कानून बन गया हो, लेकिन विधायी संस्थाओं में महिलाओं की उपस्थिति अभी भी चिंताजनक है: लोकसभा में 543 सांसद हैं, जिनमें 74 महिलाएं हैं। महिलाओं का प्रतिशत मात्र 13.6% है, जो चिंताजनक है। केंद्र की मोदी सरकार 33 प्रतिशत तक पहुंचाने की कोशिश का दावा कर रही है। आगामी चुनाव और नैरेटिव की जंग 2029 के आम चुनाव अब दूर नहीं हैं। बीजेपी इसे 'नारी शक्ति' के सम्मान और विपक्ष द्वारा बाधा डालने के रूप में पेश कर रही है। दूसरी ओर, 'इंडिया' (I.N.D.I.A.) गठबंधन इसे 'चुनावी जुमला' और 'परिसीमन का डर' दिखाकर मतदाताओं को गोलबंद कर रहा है। महिला आरक्षण आज केवल सशक्तिकरण का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह संघवाद (Federalism), सामाजिक न्याय (Social Justice) और क्षेत्रीय संतुलन की एक जटिल पहेली बन गया है। जब तक जनगणना और परिसीमन पर राजनीतिक सर्वसम्मति नहीं बनती, तब तक आधी आबादी का पूरा हक फाइलों और चुनावी रैलियों तक ही सीमित रहने की आशंका है। यदि जनगणना 2027 तक पूरी हो जाती है, तो परिसीमन आयोग को अपना काम खत्म करने में कम से कम 2 साल लगेंगे। ऐसे में 2029 के चुनाव में महिला आरक्षण का लागू होना एक बड़ी चुनौती और राजनीतिक संभावना, दोनों है।
पटना में मीडिया से बातचीत के दौरान राष्ट्रीय जनता दल (RJD) नेता तेज प्रताप यादव ने कांग्रेस के नेतृत्व को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि कांग्रेस को बेहतर तरीके से सिर्फ प्रियंका गांधी ही चला सकती हैं और राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए। ‘प्रियंका गांधी ही संभाल सकती हैं पार्टी’ तेज प्रताप यादव ने कहा, “कांग्रेस को सिर्फ प्रियंका गांधी ही चला सकती हैं, वो इंदिरा गांधी जैसी हैं। राहुल गांधी से पार्टी चलने वाली नहीं है।” उन्होंने राहुल गांधी की राजनीतिक शैली पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि “यात्रा करने से या बुलेट पर बैठने से कुछ नहीं होता, असली सवाल यह है कि उनका मकसद क्या है?” राहुल के बयान पर पलटवार तेज प्रताप का यह बयान राहुल गांधी द्वारा नीतीश कुमार को “समझौता किया हुआ नेता” कहे जाने के बाद आया है। बिहार की राजनीति में हालिया बदलाव–जहां नीतीश कुमार के अलग होने के बाद सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने–को लेकर भी उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व पर निशाना साधा। पहले भी उठ चुके हैं सवाल राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर यह पहली बार सवाल नहीं उठे हैं। इससे पहले कांग्रेस के पूर्व नेता शकील अहमद ने भी पार्टी के अंदर आंतरिक लोकतंत्र की कमी का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि पार्टी में फैसले सीमित दायरे में लिए जाते हैं और वरिष्ठ नेताओं की भूमिका कम हो गई है। बढ़ती राजनीतिक बहस तेज प्रताप यादव और अन्य नेताओं के बयानों से यह साफ है कि कांग्रेस के नेतृत्व को लेकर बहस अब पार्टी के बाहर भी तेज हो गई है। प्रियंका गांधी को आगे लाने की मांग अब विपक्षी दलों के नेताओं की तरफ से भी उठने लगी है, जिससे कांग्रेस की आंतरिक चुनौतियां और गहरी होती दिख रही हैं।
भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद समान प्रतिनिधित्व पर टिकी है, जहां हर नागरिक का वोट बराबर महत्व रखता है। इसी सिद्धांत को “एक व्यक्ति, एक वोट” कहा जाता है। लेकिन मौजूदा हालात में निर्वाचन क्षेत्रों के बीच मतदाताओं की संख्या में भारी असमानता इस सिद्धांत को कमजोर करती नजर आ रही है। ऐसे में अब परिसीमन (Delimitation) की जरूरत को लेकर बहस तेज हो गई है। क्या है समस्या? देश के अलग-अलग संसदीय क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में बहुत बड़ा अंतर है। उदाहरण के तौर पर: Malkajgiri में करीब 37.80 लाख मतदाता हैं जबकि Lakshadweep में केवल 58 हजार मतदाता इसी तरह: Ghaziabad में करीब 30 लाख वोटर हैं वहीं छोटे क्षेत्रों में यह संख्या कुछ लाख से भी कम है ऐसी स्थिति में कम आबादी वाले क्षेत्र के मतदाता का प्रभाव अधिक हो जाता है, जो लोकतांत्रिक समानता के सिद्धांत के विपरीत है। ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ क्यों हो रहा कमजोर? जब किसी क्षेत्र में बहुत अधिक मतदाता होते हैं: वहां का सांसद हर व्यक्ति तक पहुंच नहीं बना पाता लोगों की समस्याएं और अपेक्षाएं पूरी तरह सामने नहीं आ पातीं दूसरी ओर, कम मतदाताओं वाले क्षेत्रों में: प्रतिनिधि अपेक्षाकृत कम लोगों का प्रतिनिधित्व करता है वहां मतदाताओं की आवाज ज्यादा प्रभावी हो जाती है यही असंतुलन “एक व्यक्ति, एक वोट” के मूल सिद्धांत को कमजोर करता है। क्या है परिसीमन? परिसीमन का मतलब है: लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण हर सीट पर मतदाताओं की संख्या को संतुलित करना जब लोकसभा सीटों का परिसीमन होता है, तो उसके अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीटों की संरचना भी बदल जाती है। सरकार का क्या कहना है? केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने संसद में कहा कि: अधिक मतदाताओं वाले क्षेत्रों के सांसद सभी की अपेक्षाएं पूरी नहीं कर पाते इसलिए परिसीमन जरूरी है ताकि हर सीट पर मतदाताओं की संख्या संतुलित हो सके उन्होंने यह भी कहा कि “एक व्यक्ति, एक वोट” का सिद्धांत तभी सही मायनों में लागू होगा, जब यह असमानता दूर की जाए। महिला आरक्षण से भी जुड़ा है मामला सरकार के अनुसार: महिला आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए भी परिसीमन जरूरी है सीटों का सही बंटवारा और संख्या तय होने के बाद ही आरक्षण का लाभ सही तरीके से मिल सकेगा जनसंख्या बढ़ी, लेकिन सीटें नहीं 1971 में भारत की जनसंख्या करीब 54 करोड़ थी आज यह बढ़कर 140 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है लेकिन लोकसभा सीटों की संख्या लंबे समय से लगभग स्थिर है। विशेषज्ञों का मानना है कि: सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 तक करने पर विचार होना चाहिए इससे बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होगा बड़े और छोटे संसदीय क्षेत्र (उदाहरण) सबसे बड़े क्षेत्र: मलकाजगिरि – 37.80 लाख बेंगलुरु उत्तर – 32.15 लाख गाजियाबाद – 29.48 लाख गौतम बुद्ध नगर – 26.81 लाख पश्चिमी दिल्ली – 25.92 लाख सबसे छोटे क्षेत्र: लक्षद्वीप – 58 हजार दमन और दीव – 1.34 लाख लद्दाख – 1.90 लाख दादरा और नगर हवेली – 2.83 लाख अंडमान और निकोबार – 3.15 लाख
Sonia Gandhi ने महिला आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि असली मुद्दा “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” नहीं, बल्कि परिसीमन (Delimitation) है। उन्होंने Narendra Modi पर राजनीतिक फायदा उठाने का आरोप लगाया। परिसीमन को बताया “खतरनाक” सोनिया गांधी ने कहा कि प्रस्तावित परिसीमन: सिर्फ गणितीय नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी न्यायसंगत होना चाहिए गलत तरीके से लागू हुआ तो यह संविधान पर असर डाल सकता है इसे जल्दबाजी में लाना “खतरनाक” हो सकता है PM मोदी की मंशा पर सवाल अपने लेख में उन्होंने आरोप लगाया कि: सरकार जाति आधारित जनगणना को टालना चाहती है संसद के विशेष सत्र में बिल लाकर विपक्ष को दबाव में डालने की कोशिश की जा रही है चुनावी माहौल (Tamil Nadu और West Bengal) के बीच यह कदम राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया महिला आरक्षण कानून पर क्या कहा? सोनिया गांधी ने याद दिलाया कि: Nari Shakti Vandan Adhiniyam 2023 पहले ही 2023 में पास हो चुका है इसमें लोकसभा और विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण का प्रावधान है इसे जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होना था “30 महीने बाद फैसला क्यों बदला?” उन्होंने सवाल उठाया: सरकार को अपना रुख बदलने में 30 महीने क्यों लगे? अगर संशोधन जरूरी था, तो कुछ हफ्ते और इंतजार क्यों नहीं किया गया? सोनिया गांधी का साफ कहना है कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर परिसीमन और राजनीतिक रणनीति को आगे बढ़ा रही है। इस मुद्दे पर अब सरकार और विपक्ष के बीच टकराव और तेज होने की संभावना है।
महाराष्ट्र की सियासत में बारामती उपचुनाव ने नया मोड़ ले लिया है। नामांकन के दौरान दाखिल चुनावी हलफनामों ने पवार परिवार की संपत्ति को लेकर बहस छेड़ दी है। Sunetra Pawar की कुल संपत्ति करीब ₹122 करोड़ सामने आई है, जो उनके ससुर Sharad Pawar की घोषित संपत्ति (करीब ₹61 करोड़) से लगभग दोगुनी है। हालांकि परिवार के भीतर तुलना करें तो Sunetra Pawar अपनी ननद Supriya Sule से अभी भी पीछे हैं, जिनकी कुल संपत्ति लगभग ₹167 करोड़ बताई गई है। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद बारामती की सियासत में ‘परिवार बनाम संपत्ति’ की चर्चा तेज हो गई है। इस बीच चुनावी मुकाबला भी अब दिलचस्प हो गया है। Indian National Congress ने बारामती सीट से अधिवक्ता आकाश विश्वनाथ मोरे को उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतार दिया है। पार्टी अध्यक्ष Mallikarjun Kharge की मंजूरी के बाद यह फैसला लिया गया, जिससे मुकाबला अब एकतरफा नहीं रहा। बारामती सीट लंबे समय से पवार परिवार का गढ़ मानी जाती रही है। पूर्व उपमुख्यमंत्री Ajit Pawar ने यहां से लगातार आठ बार जीत हासिल की थी। उनके निधन के बाद यह सीट खाली हुई और अब उनकी पत्नी Sunetra Pawar इस उपचुनाव में अपनी किस्मत आजमा रही हैं। पहले इस सीट पर निर्विरोध जीत की चर्चा थी, लेकिन कांग्रेस के मैदान में आने से अब सीधा और कड़ा मुकाबला तय माना जा रहा है। इस चुनाव में अब केवल राजनीतिक विरासत ही नहीं, बल्कि उम्मीदवारों की संपत्ति और छवि भी अहम मुद्दा बनती दिख रही है। निर्वाचन आयोग के अनुसार, बारामती और राहुरी सीटों पर 23 अप्रैल 2026 को मतदान होगा, जबकि मतगणना 4 मई 2026 को की जाएगी। ऐसे में आने वाले दिनों में यह चुनाव और भी ज्यादा हाई-प्रोफाइल होने की संभावना है।
रांची। गर्मी की छुट्टियों में बढ़ती भीड़ को देखते हुए रेलवे ने अजमेर और रांची के बीच साप्ताहिक स्पेशल ट्रेन चलाने का फैसला किया है। इससे ट्रेन से सफर करने वाले यात्रियों को काफी राहत मिलेगी। 17 अप्रैल से 10 जुलाई तक चलेगी गाड़ी संख्या 09619 अजमेर-रांची साप्ताहिक स्पेशल ट्रेन 17 अप्रैल से 10 जुलाई तक चलेगी। यह ट्रेन हर शुक्रवार रात 11:05 बजे अजमेर से चलेगी और रविवार सुबह 7:30 बजे रांची पहुंचेगी। रांची से अजमेर जाने का समय गाड़ी संख्या 09620 रांची-अजमेर स्पेशल ट्रेन 19 अप्रैल से 12 जुलाई तक चलेगी। यह ट्रेन हर रविवार सुबह 10:50 बजे रांची से रवाना होगी और सोमवार शाम 6:35 बजे अजमेर पहुंचेगी। ट्रेन में मिलेंगी ये सुविधाए इस स्पेशल ट्रेन में यात्रियों की सुविधा के लिए सेकेंड एसी, थर्ड एसी, स्लीपर और सामान्य श्रेणी के कुल 20 कोच लगाए जाएंगे। यात्रियों को फायदा रेलवे के इस फैसले से झारखंड और राजस्थान के बीच यात्रा करने वाले यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी।
झारखंड में रामनवमी, सरहूल और ईद जैसे प्रमुख त्योहारों पर डीजे बजाने को लेकर सियासत गरमा गई है। विधानसभा के बाहर दिए गए एक बयान ने इस मुद्दे को और तूल दे दिया है, जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने नजर आ रहे हैं। “डीजे हर हाल में बजेगा” - मंत्री का बड़ा बयान राज्य के स्वास्थ्य एवं खाद्य आपूर्ति मंत्री इरफान अंसारी ने साफ शब्दों में कहा कि झारखंड में त्योहारों के दौरान डीजे बजेगा और हर साल बजेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार ने कभी डीजे पर पूरी तरह रोक लगाने की बात नहीं कही, बल्कि इसके संभावित दुष्परिणामों को लेकर लोगों को जागरूक करने की कोशिश की गई थी। मंत्री ने यह भी बताया कि जुलूसों के दौरान किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए सिविल सर्जनों को साथ रहने का निर्देश दिया गया है। कोर्ट के आदेश बनाम राजनीतिक बयानबाजी सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि वह कोर्ट के निर्देशों का पालन कर रही है, जबकि विपक्ष इसे आम लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता में दखल बता रहा है। अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हफिजुल हसन ने भी साफ किया कि सरकार किसी भी त्योहार के खिलाफ नहीं है और केवल नियमों का पालन करवा रही है। विपक्ष का विरोध, जुलूस निकालने की चेतावनी विधायक निर्मल महतो, मनीष प्रसाद और रौशन लाल चौधरी समेत कई नेताओं ने जुलूस पर किसी भी तरह की रोक का विरोध किया है। उनका कहना है कि: रामनवमी और अन्य त्योहारों के जुलूस हर हाल में निकलेंगे सरकार को अनुमति देनी ही होगी यदि अनुमति नहीं मिली, तो भी जुलूस निकाला जाएगा “धार्मिक उन्माद फैलाने की कोशिश”-सरकार का पलटवार मंत्री दीपिका सिंह पांडेय ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा अफवाह और धार्मिक उन्माद फैलाकर राजनीति कर रही है। उन्होंने कहा कि अगर किसी को नियमों पर आपत्ति है, तो वह संबंधित संस्थाओं से अनुमति ले सकता है। बाबूलाल मरांडी का बड़ा बयान प्रतिपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने कहा कि किसी भी धार्मिक आयोजन पर रोक लगाना गलत है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक सड़कों पर जुलूस निकालना सभी का अधिकार है और किसी भी डर या दबाव में इसे रोका नहीं जाना चाहिए। “सरकार लोगों को कर रही परेशान”-नीरा यादव विधायक नीरा यादव ने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर ऐसे फैसले ले रही है, जिससे आम लोगों को परेशानी हो। उन्होंने कहा कि सभी लोग मिलकर त्योहार मनाएंगे और डीजे भी बजाएंगे। मुद्दा बना राजनीतिक टकराव का कारण यह विवाद अब सिर्फ प्रशासनिक या कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। सत्ता पक्ष कोर्ट के आदेश और सुरक्षा व्यवस्था की बात कर रहा है विपक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़ रहा है
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।