केंद्र सरकार ने 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र बुलाकर एक बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक कदम उठाने की तैयारी की है। इस सत्र में नारी वंदन अधिनियम, 2023 यानी महिला आरक्षण कानून में संशोधन प्रस्ताव लाया जा सकता है। इस प्रस्ताव को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है और सरकार व विपक्ष आमने-सामने हैं। क्या है सरकार का प्रस्ताव? सूत्रों के मुताबिक, सरकार महिला आरक्षण कानून में दो बड़े बदलाव करने पर विचार कर रही है: परिसीमन (Delimitation) के लिए नई जनगणना की बजाय 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाना लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या में लगभग 50% तक बढ़ोतरी अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो: उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर 120 हो सकती हैं बिहार में 40 से 60 तमिलनाडु में 39 से 58 इस तरह कुल लोकसभा सीटें 543 से बढ़कर करीब 816 तक पहुंच सकती हैं, जिनमें लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। सरकार का क्या कहना है? केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने स्पष्ट किया है कि इस संशोधन को राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य महिला प्रतिनिधित्व को तेजी से लागू करना और प्रक्रिया को सरल बनाना है, ताकि 2029 तक इसे लागू किया जा सके। विपक्ष क्यों कर रहा विरोध? विपक्ष इस कदम को चुनावी रणनीति बता रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार महिला वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है राजीव शुक्ला ने इसे चुनावी लाभ के लिए उठाया गया कदम बताया कांग्रेस का दावा है कि महिला आरक्षण की पहल पहले उसी ने की थी OBC महिलाओं के आरक्षण की मांग समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने इस मुद्दे को और आगे बढ़ाते हुए OBC महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग उठाई है। उनका कहना है कि: केवल सामान्य महिला आरक्षण पर्याप्त नहीं है पिछड़ी जातियों की महिलाओं को अलग से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए क्या है असली सियासी गणित? विशेषज्ञों के अनुसार, यह संशोधन कई स्तरों पर असर डाल सकता है: महिला वोट बैंक को प्रभावित करेगा राज्यों में सीटों के पुनर्वितरण से राजनीतिक समीकरण बदलेंगे 2029 चुनाव से पहले बड़ा प्रभाव देखने को मिल सकता है पास होने में क्या है चुनौती? चूंकि यह एक संवैधानिक संशोधन है, इसलिए इसे संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। हालांकि कोई भी पार्टी खुले तौर पर महिला आरक्षण का विरोध नहीं कर रही, लेकिन: परिसीमन के आधार OBC आरक्षण समय और मंशा इन मुद्दों पर तीखी बहस तय मानी जा रही है। निष्कर्ष महिला आरक्षण बिल में प्रस्तावित संशोधन सिर्फ एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक बदलाव साबित हो सकता है। जहां सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी रणनीति करार दे रहा है।
दिसपुर, एजेंसियां। असम विधानसभा चुनाव के बीच राजनीतिक हलचल तेज होती जा रही है। इसी कड़ी में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने भी चुनावी मैदान में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। गांडेय विधायक कल्पना सोरेन ने बुधवार को असम के चबुआ विधानसभा क्षेत्र में पहुंचकर पार्टी प्रत्याशी भूबेन मुरारी के समर्थन में जोरदार प्रचार अभियान चलाया। उनके दौरे ने इलाके में चुनावी माहौल को और गरमा दिया है। कल्पना सोरेन और जोबा माझी प्रचार के दौरान कल्पना सोरेन के साथ सांसद जोबा माझी भी मौजूद रहीं। दोनों नेताओं ने चबुआ के चाय बागान क्षेत्रों का दौरा किया और वहां काम कर रहे मजदूरों से सीधे बातचीत की। इस दौरान उन्होंने मजदूरों की रोजमर्रा की परेशानियों को करीब से समझने की कोशिश की। मजदूरों ने भी खुलकर अपनी समस्याएं सामने रखीं। इनमें कम मजदूरी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, खराब आवास व्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं का अभाव जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। कल्पना सोरेन ने कहा कल्पना सोरेन ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि झामुमो सिर्फ चुनावी वादों की राजनीति नहीं करती, बल्कि जमीन से जुड़े मुद्दों को उठाने में विश्वास रखती है। उन्होंने जनता से अपील की कि वे भूबेन मुरारी को भारी मतों से जीताकर विधानसभा भेजें, ताकि क्षेत्र के विकास और मजदूर वर्ग की समस्याओं का समाधान सुनिश्चित हो सके।इस मौके पर झामुमो नेताओं ने यह भी साफ किया कि पार्टी असम में स्थानीय और जनजीवन से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता दे रही है। खासकर चाय बागान मजदूरों, गरीब तबकों और वंचित समुदायों के अधिकारों को लेकर पार्टी अपनी मजबूत राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है। कल्पना सोरेन और जोबा माझी के इस दौरे से साफ है कि झामुमो असम चुनाव में भी ग्राउंड कनेक्ट बनाने की कोशिश में जुटी है। आने वाले दिनों में विभिन्न राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं के दौरे के साथ चुनाव प्रचार और तेज होने की संभावना है।
नई दिल्ली/कोलकाता,एजेंसियां। पांच राज्यों असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों के बीच राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल में एक ओर भवानीपुर सीट पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी के बीच सीधी टक्कर की तैयारी है, वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग ने नदिया जिले के एक बीडीओ को निलंबित कर सख्त संदेश दिया है। चुनाव प्रशिक्षण के दौरान विवाद चुनाव आयोग ने नदिया जिले के हंसखली ब्लॉक में तैनात बीडीओ सायनतन भट्टाचार्य को निलंबित करने का आदेश दिया है। यह कार्रवाई 27 मार्च को चुनाव अधिकारियों की ट्रेनिंग के दौरान हुई हिंसा के बाद की गई। आरोप है कि प्रशिक्षण शुरू होने से पहले प्रोजेक्टर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सरकारी विज्ञापन दिखाया गया, जिस पर शिक्षक सैकत चट्टोपाध्याय ने आपत्ति जताई। इसके बाद कथित तौर पर उनके साथ मारपीट हुई और सिर में गंभीर चोट आई। इस मामले में एफआईआर भी दर्ज की गई है। आयोग ने माना गंभीर लापरवाही चुनाव आयोग ने कहा कि बीडीओ ट्रेनिंग कार्यक्रम के प्रभारी थे, लेकिन वे प्रोटोकॉल और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया का पालन कराने में विफल रहे। आयोग ने राज्य प्रशासन को आदेश दिया है कि निलंबन और विभागीय जांच की कार्रवाई तत्काल प्रभाव से लागू की जाए। भवानीपुर सीट पर सियासी घमासान पश्चिम बंगाल की सबसे चर्चित सीट भवानीपुर पर मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी दो अप्रैल को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में नामांकन भरेंगे। इसे भाजपा के शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आठ अप्रैल को कालीघाट से शक्ति जुलूस निकालकर नामांकन दाखिल करेंगी। अन्य चुनावी हलचल भाजपा ने पश्चिम बंगाल के लिए 13 उम्मीदवारों की चौथी सूची भी जारी की है। वहीं, केरल चुनाव में कांग्रेस के समर्थन में तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी एक और दो अप्रैल को प्रचार करेंगे।
दिसपुर,एजेंसियां। असम विधानसभा चुनाव प्रचार के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बुधवार को एक अलग और सहज अंदाज देखने को मिला। जनसभाओं से पहले वे अचानक डिब्रूगढ़ के एक चाय बागान पहुंचे, जहां उन्होंने महिला श्रमिकों के साथ मिलकर चाय की पत्तियां तोड़ीं और उनसे बातचीत की। हाथों में टोकरी और चेहरे पर मुस्कान के साथ उनकी तस्वीरें सामने आते ही सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगीं। इस दौरे को चुनावी माहौल के बीच एक प्रतीकात्मक और जनसंपर्क वाले कदम के रूप में देखा जा रहा है। महिला श्रमिकों से की बातचीत, बागान में बिताया समय प्रधानमंत्री ने चाय बागान में कुछ समय रुककर वहां काम कर रही महिलाओं से बातचीत की और उनके कामकाज को करीब से देखा। असम की पहचान चाय उद्योग से जुड़ी रही है, ऐसे में पीएम मोदी का यह दौरा राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों लिहाज से अहम माना जा रहा है। स्थानीय लोगों के बीच भी इस कार्यक्रम को लेकर उत्साह देखा गया। आज असम में दो बड़ी चुनावी रैलियां चाय बागान दौरे के बाद पीएम मोदी का असम में चुनावी कार्यक्रम भी काफी व्यस्त है। वे पहले धेमाजी के गोगामुख में एक रैली को संबोधित करेंगे। इसके बाद उनका विश्वनाथ जिले में दोपहर करीब एक बजे जनसभा को संबोधित करने का कार्यक्रम है। इन रैलियों के जरिए भाजपा चुनावी माहौल को और धार देने की कोशिश में है। भाजपा उम्मीदवारों के लिए करेंगे प्रचार पीएम मोदी की पहली रैली में रानोज पेगू और नबा कुमार डोले के समर्थन में प्रचार किया जाएगा। वहीं दूसरी सभा में वे पल्लब लोचन दास के लिए जनसमर्थन जुटाएंगे। असम चुनाव में भाजपा अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है, और प्रधानमंत्री का यह दौरा उसी रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। तस्वीरों ने खींचा लोगों का ध्यान राजनीतिक भाषणों से अलग चाय बागान में पीएम मोदी की मौजूदगी ने लोगों का ध्यान खास तौर पर खींचा है। चुनावी मौसम में यह विजुअल अपील भाजपा के लिए जनसंपर्क का मजबूत संदेश भी माना जा रहा है।
रांची। झारखंड में जल्द ही जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है, लेकिन इसके साथ ही इस मुद्दे पर सियासत भी तेज हो गई है। देश में पहली बार डिजिटल माध्यम से जनगणना कराने की घोषणा की गई है, जिसे सरकार प्रशासनिक सुधार और पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम बता रही है। वहीं विपक्षी दलों और क्षेत्रीय पार्टियों ने इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। खासकर सर्ना धर्म कोड को जनगणना में शामिल न किए जाने का मुद्दा फिर से गरमा गया है। दो चरणों में होगी जनगणना आगामी जनगणना दो चरणों में कराई जाएगी। पहले चरण में 1 से 15 मई 2026 तक स्व-गणना (Self Enumeration) की सुविधा दी जाएगी, जबकि 16 मई से 14 जून 2026 तक हाउस लिस्टिंग और मकान गणना का कार्य होगा। इसके बाद 2027 में पूर्ण जनगणना डिजिटल तरीके से पूरी की जाएगी। 33 सवालों के जवाब देना होगा अनिवार्य जनगणना में लोगों को कुल 33 सवालों के जवाब देने होंगे। इसमें केवल परिवार के सदस्यों की संख्या ही नहीं, बल्कि घर की बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी जानकारी भी ली जाएगी। जैसे पानी का स्रोत, शौचालय, बिजली, रसोई ईंधन, कचरा निकासी, स्नानघर और रसोई की स्थिति। साथ ही स्मार्टफोन, इंटरनेट, लैपटॉप, टीवी, रेडियो और वाहन जैसी डिजिटल व भौतिक संपत्तियों की जानकारी भी दर्ज की जाएगी। पहली बार मोबाइल ऐप और ऑनलाइन पोर्टल से होगी एंट्री इस बार प्रगणक मोबाइल ऐप के जरिए सीधे स्मार्टफोन से डेटा भरेंगे। आम नागरिकों को भी ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से स्वयं जानकारी दर्ज करने की सुविधा दी जाएगी। पोर्टल हिंदी और अंग्रेजी सहित 16 भाषाओं में उपलब्ध होगा। सफल पंजीकरण के बाद नागरिकों को एक स्व-गणना आईडी (SE ID) मिलेगी, जिसे बाद में प्रगणक के साथ साझा करना होगा। सर्ना धर्म कोड पर फिर छिड़ी बहस डिजिटल जनगणना के ऐलान के साथ ही झारखंड की राजनीति में सर्ना धर्म कोड का मुद्दा एक बार फिर उभर आया है। झामुमो ने इस बात पर नाराजगी जताई है कि जनगणना की रूपरेखा में सर्ना धर्म कोड का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। पार्टी का कहना है कि आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान को अलग मान्यता दिए बिना जनगणना अधूरी मानी जाएगी। बीजेपी ने सराहा, झामुमो-कांग्रेस ने उठाए सवाल जहां भाजपा ने डिजिटल जनगणना को तेज, सटीक और पारदर्शी प्रक्रिया बताया है, वहीं कांग्रेस और झामुमो ने इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभावों पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि तकनीक के नाम पर लोगों को भ्रमित किया जा सकता है, जबकि झामुमो का मानना है कि सर्ना कोड की अनदेखी से आदिवासी समाज में असंतोष बढ़ेगा। 16 साल बाद हो रही जनगणना पर सबकी नजर झारखंड में यह जनगणना 16 साल बाद हो रही है, इसलिए इसके आंकड़ों और राजनीतिक असर पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। सरकार ने कर्मचारियों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया है। आने वाले दिनों में यह सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बहस का भी बड़ा मुद्दा बनने जा रही है।
पिता योगेंद्र साव के निष्कासन से भड़कीं अंबा, बोलीं– एकतरफा कार्रवाई, न्याय के लिए जाएंगी केंद्रीय नेतृत्व के पास झारखंड की राजनीति में इन दिनों घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस की पूर्व विधायक और राष्ट्रीय सचिव अंबा प्रसाद ने पार्टी के खिलाफ खुलकर बगावती रुख अपना लिया है। उन्होंने न केवल प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व बल्कि राज्य की गठबंधन सरकार पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। यह विवाद तब और बढ़ गया जब उनके पिता और पूर्व मंत्री योगेंद्र साव को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। “कार्रवाई पूरी तरह एकतरफा” अंबा प्रसाद ने प्रेस वार्ता में कहा कि उनके पिता के खिलाफ की गई कार्रवाई पूरी तरह से एकतरफा और दबाव में ली गई है। उनका आरोप है कि न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही पक्ष रखने का मौका मिला। उन्होंने प्रदेश नेतृत्व के उस दावे को भी खारिज किया जिसमें चेतावनी दिए जाने की बात कही गई थी। 3 साल के लिए पार्टी से बाहर योगेंद्र साव झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने 20 मार्च को योगेंद्र साव को अनुशासनहीनता के आरोप में तीन वर्षों के लिए पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया था। पार्टी के अनुसार, उन्होंने सोशल मीडिया और फेसबुक लाइव के जरिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और गठबंधन सरकार के खिलाफ बयानबाजी की, जो संगठनात्मक नियमों के खिलाफ है। घर तोड़े जाने से बढ़ा विवाद अंबा प्रसाद ने बड़कागांव स्थित चट्टी बरियातू कोल माइंस परियोजना क्षेत्र में उनके आवास को बुलडोजर से गिराए जाने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने इस कार्रवाई को “तुगलकी फरमान” बताते हुए कहा कि बिना उचित मुआवजा और न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुए उनके घर को ध्वस्त किया गया, जिससे परिवार को गहरा आघात पहुंचा है। जांच रिपोर्ट पर उठाए सवाल उन्होंने यह भी सवाल खड़ा किया कि मामले की जांच के लिए बनाई गई कमेटी की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई। अंबा प्रसाद ने कांग्रेस नेतृत्व, गठबंधन सरकार, पुलिस-प्रशासन और NTPC Limited पर निशाना साधते हुए कहा कि उनका परिवार लंबे समय से टारगेट किया जा रहा है। “धमकियां मिलीं, करियर खत्म करने की कोशिश” अंबा प्रसाद ने दावा किया कि उनके पिता को लगातार धमकियां दी गईं और उनका राजनीतिक करियर खत्म करने की साजिश रची गई। उन्होंने कहा कि निष्कासन का फैसला दबाव में लिया गया है। केंद्रीय नेतृत्व से करेंगी न्याय की मांग उन्होंने साफ किया कि इस पूरे मामले को लेकर वे कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के पास जाएंगी और न्याय की मांग करेंगी।
पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी रणनीति पूरी तरह से बदल दी है। पिछली गलतियों से सबक लेते हुए पार्टी अब “अपनों” पर भरोसा जताने की नीति पर आगे बढ़ रही है। ‘बाहरी चेहरों’ से दूरी, पुराने कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता पिछले चुनाव में पार्टी ने बड़ी संख्या में अन्य दलों से आए नेताओं को टिकट दिया था, जिससे संगठन के भीतर असंतोष पैदा हुआ था। इस बार भाजपा ने साफ कर दिया है कि वह “किराए के नेताओं” पर निर्भर नहीं रहेगी। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के अनुसार, पार्टी इस बार केवल उन्हीं कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ा रही है, जो लंबे समय से संगठन से जुड़े रहे हैं। इससे जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। गुटबाजी खत्म कर एकजुटता पर जोर भाजपा नेतृत्व ने इस बार आंतरिक गुटबाजी को खत्म करने पर भी विशेष ध्यान दिया है। पिछली बार अलग-अलग नेताओं के अलग सुर पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हुए थे। अब पार्टी का दावा है कि सभी गुट एकजुट होकर चुनाव लड़ रहे हैं। केंद्रीय नेतृत्व, जिसमें अमित शाह और राज्य के प्रमुख नेता शुभेंदु अधिकारी शामिल हैं, संगठन को एक दिशा में ले जाने पर फोकस कर रहे हैं। एंटी-इनकंबेंसी पर भाजपा का दांव भाजपा इस बार तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी को बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पार्टी स्थानीय स्तर पर मुद्दों को उठाने और हर विधानसभा क्षेत्र में टीएमसी नेताओं के खिलाफ “चार्जशीट” पेश करने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी नेताओं का मानना है कि जनता के बीच स्थानीय समस्याओं को प्रमुखता से उठाकर चुनावी माहौल अपने पक्ष में किया जा सकता है। ‘लोकल मुद्दे, लोकल चेहरे’ पर फोकस भाजपा इस बार “लोकल मुद्दे और लोकल चेहरे” की रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है। संगठन का मानना है कि इससे जमीनी कनेक्ट मजबूत होगा और पिछले चुनाव की तुलना में बेहतर प्रदर्शन की संभावना बढ़ेगी।
रांची। रांची में बढ़ते अपराध और गैंगस्टर गतिविधियों को लेकर झारखंड की राजनीति गरमा गई है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कुख्यात गैंगस्टर प्रिंस खान और उसके गुर्गों द्वारा फैलाए जा रहे आतंक पर सरकार और पुलिस प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया है। सरकार और पुलिस पर लगाया ढुलमुल रवैये का आरोप मीडिया से बातचीत में बाबूलाल मरांडी ने कहा कि राज्य में अपराधियों का मनोबल सरकार और पुलिस की “लुंज-पुंज व्यवस्था” के कारण बढ़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रिंस खान और उसके गुर्गे खुलेआम दहशत फैला रहे हैं, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि उन्हें कहीं न कहीं संरक्षण मिल रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार ठोस कार्रवाई करे, तो अपराधियों को एक रात में भागने पर मजबूर किया जा सकता है। गुर्गों पर कार्रवाई की मांग मरांडी ने कहा कि भले ही प्रिंस खान देश से बाहर रहकर गैंग चला रहा हो, लेकिन उसके गुर्गे झारखंड में सक्रिय हैं। उन्होंने पुलिस को सख्त कार्रवाई करने की सलाह देते हुए कहा कि यदि 8-10 अपराधियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए, तो बाकी अपराधियों में भी डर पैदा होगा और अपराध पर लगाम लगेगी। विधानसभा में भी गूंजा मामला प्रिंस खान गैंग का मुद्दा झारखंड विधानसभा के बजट सत्र में भी उठ चुका है। नेता प्रतिपक्ष ने सदन में सरकार से इस पर जवाब मांगा और राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि गैंगस्टर विदेश में बैठकर अपने नेटवर्क के जरिए रंगदारी और अपराध का संचालन कर रहा है। हत्या और रंगदारी के मामलों का जिक्र मरांडी ने हाल के आपराधिक घटनाओं का हवाला देते हुए बताया कि रांची के टीटॉस होटल में गोलीबारी कर एक कर्मचारी की हत्या कर दी गई थी। इसके अलावा बोकारो में एक शोरूम संचालक से रंगदारी मांगे जाने का मामला भी सामने आया है। इन घटनाओं से व्यापारियों और आम लोगों में डर का माहौल बना हुआ है। कानून-व्यवस्था पर बढ़ी चिंता लगातार बढ़ती आपराधिक घटनाओं के बीच सरकार और पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति और बिगड़ सकती है।
झारखंड में रामनवमी जुलूस के दौरान चलंत डीजे बजाने पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। इस मुद्दे पर मंगलवार को विधानसभा के भीतर और बाहर जमकर हंगामा हुआ। विपक्षी दल भाजपा के विधायकों ने इस फैसले के विरोध में जोरदार प्रदर्शन किया, जबकि सरकार ने साफ कहा कि यह कदम अदालत के आदेशों के पालन के तहत उठाया गया है। विधानसभा परिसर में भाजपा का प्रदर्शन रामनवमी जुलूस में डीजे पर रोक को लेकर भाजपा विधायकों ने विधानसभा परिसर में विरोध जताया। उनका आरोप है कि सरकार हिंदू त्योहारों के समय अनावश्यक पाबंदियां लगाकर लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत कर रही है। भाजपा विधायक रोशनलाल ने कहा कि रामनवमी करोड़ों हिंदुओं की आस्था का पर्व है और जुलूस में डीजे पर प्रतिबंध लगाना अनुचित है। उन्होंने सरकार से मांग की कि इस फैसले को तुरंत वापस लिया जाए। भाजपा नेताओं का यह भी कहना है कि हर बार हिंदू त्योहारों के समय ही इस तरह के प्रतिबंध लगाए जाते हैं, जो तुष्टिकरण की राजनीति को दर्शाता है। सदन के अंदर भी गूंजे नारे विपक्ष का विरोध केवल विधानसभा परिसर तक सीमित नहीं रहा। जैसे ही सदन की कार्यवाही शुरू हुई, भाजपा विधायक नारेबाजी करते हुए विरोध दर्ज कराने लगे। इस दौरान भाजपा विधायक नवीन जायसवाल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अगर रामनवमी के जुलूस में डीजे नहीं बजाने दिया जाएगा तो क्या हिंदुओं को धर्म परिवर्तन करना पड़ेगा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हजारीबाग में प्रशासन लोगों को जुलूस के दौरान डीजे बजाने से रोकने के लिए दबाव बना रहा है। हजारीबाग की रामनवमी का दिया हवाला भाजपा विधायकों ने कहा कि हजारीबाग की रामनवमी देशभर में अपनी भव्यता और परंपरा के लिए जानी जाती है। यहां कई दिनों तक धार्मिक जुलूस, अखाड़ा प्रदर्शन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। ऐसे में डीजे पर प्रतिबंध लगाने से इस परंपरा पर असर पड़ेगा। सरकार ने कहा-सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन वहीं सत्ता पक्ष ने विपक्ष के आरोपों को खारिज कर दिया। कांग्रेस विधायक राजेश कच्छप ने कहा कि प्रशासन केवल न्यायालय के निर्देशों के अनुसार कार्रवाई कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत के आदेश के अनुसार रात 10 बजे के बाद तेज ध्वनि वाले डीजे और लाउडस्पीकर बजाने की अनुमति नहीं है। इसलिए प्रशासन इसी नियम का पालन सुनिश्चित करा रहा है। ‘यह किसी धर्म विशेष का मुद्दा नहीं’ संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने भी सदन में कहा कि यह मामला किसी धर्म विशेष से जुड़ा नहीं है। उन्होंने बताया कि अदालत के निर्देश के अनुसार रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक तेज ध्वनि वाले साउंड सिस्टम पर प्रतिबंध लागू है और सरकार केवल उसी का पालन कर रही है। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह इस मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम रंग देकर समाज का माहौल खराब करने की कोशिश कर रहा है। सड़क से सदन तक बढ़ा विवाद रामनवमी जैसे धार्मिक और आस्था से जुड़े पर्व के दौरान डीजे प्रतिबंध का मामला अब राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है। सड़क से लेकर विधानसभा तक उठ रही आवाजों के बीच यह मुद्दा फिलहाल शांत होता नहीं दिख रहा है और आने वाले दिनों में इस पर सियासत और तेज होने की संभावना है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा के 26वें चुनाव की तैयारियां अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। राज्य की राजनीतिक हलचल के बीच सभी की नजरें चुनाव आयोग की ओर टिकी हैं, जो जल्द ही मतदान की तारीखों का ऐलान कर सकता है। इसी बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संकेत दिया है कि 15 या 16 मार्च को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा संभव है। दरअसल, चुनाव आयोग की फुल बेंच हाल ही में दो दिनों तक पश्चिम बंगाल में चुनावी तैयारियों की समीक्षा करने के बाद दिल्ली लौट चुकी है। इसके बाद राज्य की राजनीति में चुनाव कार्यक्रम को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने अनुमान लगा रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस पर खुलकर टिप्पणी की है। चुनाव आयोग और भाजपा पर साधा निशाना अभिषेक बनर्जी के अनुरोध पर धरना समाप्त करने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रभाव में काम कर रहा है। ममता बनर्जी ने कहा कि अक्सर देखा गया है कि भाजपा की बड़ी राजनीतिक सभाओं के बाद ही चुनाव कार्यक्रम घोषित किया जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित ब्रिगेड परेड ग्राउंड रैली 14 मार्च को है, और संभव है कि उसके बाद ही चुनाव की तारीखों का ऐलान किया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा, “अगर ब्रिगेड की बैठक के बाद भी चुनाव की घोषणा होती है तो इसमें चिंता की कोई बात नहीं है। हमने पहले भी देखा है कि बड़ी रैली के बाद ही चुनाव कार्यक्रम घोषित किया जाता है।” सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का भी जिक्र ममता बनर्जी ने इस मुद्दे से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनाव आयोग को कड़ी टिप्पणी करते हुए फटकार लगाई है। मुख्यमंत्री के अनुसार, अदालत के आदेश में सभी बातें लिखित रूप में नहीं हैं, लेकिन वीडियो रिकॉर्डिंग में इसे देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई 25 तारीख को निर्धारित है। ममता बनर्जी ने इसे अपनी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई की “महत्वपूर्ण जीत” बताया और कहा कि इससे चुनाव आयोग के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं। चुनावी माहौल गर्म पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल लगातार गर्म होता जा रहा है। राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC )और भाजपा (BJP) के बीच तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। ऐसे में अब सभी की नजरें चुनाव आयोग पर टिकी हैं, जो किसी भी समय पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों की औपचारिक घोषणा कर सकता है। चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही राज्य में आचार संहिता लागू हो जाएगी और राजनीतिक दल पूरी ताकत के साथ चुनावी मैदान में उतर जाएंगे।
नाशिक: कांग्रेस सांसद Rahul Gandhi को सावरकर मानहानि मामले में बड़ी कानूनी राहत मिली है। नाशिक की अदालत ने इस मामले की पूरी कार्यवाही आधिकारिक रूप से समाप्त कर दी है, जिसके बाद अब इस केस में आगे कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी। यह मामला वर्ष 2022 में राहुल गांधी के बयान को लेकर दर्ज किया गया था, जो उन्होंने अपनी Bharat Jodo Yatra के दौरान दिया था। अदालत के इस फैसले के साथ ही यह मामला पूरी तरह खत्म हो गया है। क्या था मामला नवंबर 2022 में राहुल गांधी महाराष्ट्र के वाशिम और अकोला जिलों में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान पहुंचे थे। 17 नवंबर 2022 को अकोला में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी Vinayak Damodar Savarkar से जुड़े कुछ दस्तावेज दिखाते हुए उन पर गंभीर आरोप लगाए थे। राहुल गांधी के इसी बयान को आधार बनाकर नाशिक के सामाजिक कार्यकर्ता Devendra Bhutada ने उनके खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज कराया था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि राहुल गांधी के बयान से सावरकर की छवि को नुकसान पहुंचा और इससे करोड़ों लोगों की भावनाएं आहत हुईं। राहुल गांधी ने क्या कहा था कांग्रेस नेता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सावरकर द्वारा ब्रिटिश सरकार को लिखे गए एक पत्र का उल्लेख करते हुए दावा किया था कि उन्होंने डर के कारण अंग्रेजों से माफी मांगी थी और बाद में पेंशन भी ली थी। इस बयान को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा हो गया था। अदालत ने किया अंतिम निपटारा राहुल गांधी के वकीलों के अनुसार, नाशिक के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने इस मामले का अंतिम निपटारा करते हुए पूरी कार्यवाही समाप्त कर दी है। इससे पहले जुलाई 2025 में अदालत ने राहुल गांधी को इस मामले में जमानत दी थी, लेकिन अब अदालत के फैसले के बाद यह केस पूरी तरह बंद हो गया है। कांग्रेस ने बताया बड़ी राहत नाशिक कोर्ट के इस फैसले के बाद Rahul Gandhi एक बड़े कानूनी विवाद से मुक्त हो गए हैं। कांग्रेस नेताओं और समर्थकों ने इसे बड़ी राहत बताते हुए कहा कि अदालत के फैसले से मामले पर अब पूरी तरह विराम लग गया है।
संघर्ष की शुरुआत का साक्षी रहा सीतामढ़ी का लोहिया आश्रम बिहार की राजनीति में इन दिनों बड़े बदलाव की चर्चा तेज है। लंबे समय तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे Nitish Kumar के राज्यसभा जाने के फैसले ने उनके पुराने साथियों और समर्थकों को भावुक कर दिया है। सीतामढ़ी स्थित Lohia Ashram वह जगह है, जहां से नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन की कई महत्वपूर्ण यादें जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि उनके इस फैसले के बाद आश्रम से जुड़े लोगों के बीच उदासी का माहौल देखने को मिल रहा है। जेपी आंदोलन के दौर से जुड़ा रहा नीतीश का सफर साल 1974 में हुए ऐतिहासिक JP Movement के समय लोहिया आश्रम आंदोलन की गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। उस दौर में कई युवा नेता और सामाजिक कार्यकर्ता यहां जुटकर राजनीतिक रणनीतियों पर चर्चा करते थे। बताया जाता है कि इसी समय नीतीश कुमार भी इस आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े और कई बार लोहिया आश्रम आकर यहां कार्यकर्ताओं के साथ बैठकों में हिस्सा लेते थे। यही वह दौर था जब उनकी राजनीतिक पहचान मजबूत होने लगी और वे जनता के बीच लोकप्रिय होते गए। पुराने साथियों ने जताई भावनाएं सीतामढ़ी के किसान नेता Nagendra Prasad Singh, जिन्हें नीतीश कुमार का करीबी माना जाता है, ने कहा कि मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल बिहार के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार ने पिछले करीब 20 वर्षों में राज्य में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था के क्षेत्र में कई अहम सुधार किए। ऐसे में उनके मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने के फैसले से उनके समर्थकों को काफी दुख हुआ है। आंदोलन के साथियों ने भी किया याद जेपी आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता Dr. Ramashankar Prasad ने कहा कि छात्र आंदोलन के समय से ही उनका नीतीश कुमार के साथ जुड़ाव रहा है। उनके अनुसार, नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक जीवन में कई चुनौतियों का सामना किया और बिहार को विकास की नई दिशा देने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि उनके साथ बिताए गए आंदोलन के दिन आज भी लोगों को याद आते हैं। आश्रम से जुड़ी हैं कई पुरानी यादें लोहिया आश्रम के लोगों का कहना है कि राजनीति के शुरुआती दौर में नीतीश कुमार कई बार यहां आए और स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ घंटों चर्चा किया करते थे। उस समय यहां से आंदोलन और चुनावी रणनीतियों की योजनाएं भी बनाई जाती थीं। आज भी आश्रम में उनकी कई यादें जुड़ी हुई हैं, जिन्हें यहां के लोग गर्व के साथ याद करते हैं। समर्थकों का कहना-बिहार को नई पहचान दी आश्रम से जुड़े लोगों का मानना है कि नीतीश कुमार ने अपने लंबे राजनीतिक सफर में बिहार के विकास और सामाजिक बदलाव के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। हालांकि उनके राज्यसभा जाने के फैसले से यहां के लोग भावुक जरूर हैं, लेकिन वे यह भी मानते हैं कि बिहार की राजनीति में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा और उनके समर्थक उन्हें सम्मान के साथ याद करते रहेंगे।
संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण सोमवार, 9 मार्च से शुरू हो रहा है और इसके पहले ही दिन लोकसभा में हंगामे के आसार बन गए हैं। विपक्षी दलों द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने से संबंधित प्रस्ताव पर आज सदन में विचार किया जा सकता है। इस प्रस्ताव को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपने-अपने सांसदों को सदन में मौजूद रहने के लिए व्हिप जारी किया है। लोकसभा के नियमों के अनुसार, पीठासीन अधिकारी द्वारा बुलाए जाने पर कम से कम 50 सांसदों को इस प्रस्ताव के समर्थन में खड़ा होना होगा। यदि 50 सदस्य समर्थन में खड़े होते हैं, तो प्रस्ताव को सदन के विचार के लिए स्वीकार कर लिया जाएगा। इसके बाद इस पर चर्चा और मतदान कराया जाएगा। हालांकि यदि 50 सांसद समर्थन में खड़े नहीं होते हैं, तो प्रस्ताव पेश ही नहीं किया जा सकेगा। कांग्रेस के सांसद देंगे प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए कांग्रेस के तीन सांसद-मोहम्मद जावेद, के. सुरेश और मल्लू रवि-सदन की अनुमति मांगेंगे। इन सांसदों को प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन जुटाना होगा। यदि आवश्यक समर्थन मिल जाता है तो प्रस्ताव पर चर्चा होगी और इसके बाद मतदान कराया जाएगा। सदन में मौजूद रह सकते हैं ओम बिरला संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला नोटिस पर विचार के दौरान सदन में उपस्थित रह सकते हैं। वे प्रस्ताव पर अपना पक्ष भी रख सकते हैं और मतदान में हिस्सा भी ले सकते हैं। हालांकि जब इस विषय पर चर्चा होगी, उस दौरान वे सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करेंगे। भाजपा और कांग्रेस ने जारी किया व्हिप इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ने अपने-अपने सांसदों को सदन में उपस्थित रहने के लिए व्हिप जारी किया है। लोकसभा में वर्तमान संख्या बल को देखते हुए माना जा रहा है कि सरकार के पास स्पष्ट बहुमत है, इसलिए यह संभावना कम मानी जा रही है कि प्रस्ताव आगे बढ़ पाएगा। तृणमूल कांग्रेस (TMC) का समर्थन तृणमूल कांग्रेस ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन करने का संकेत दिया है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस लोकसभा के कई विपक्षी सदस्यों द्वारा लाए गए इस अविश्वास प्रस्ताव के साथ खड़ी है। कहां बैठ सकते हैं ओम बिरला? बताया जा रहा है कि यदि प्रस्ताव पर चर्चा होती है तो ओम बिरला सदन में सत्तापक्ष की प्रमुख पंक्तियों में बैठ सकते हैं। हालांकि इस स्थिति को लेकर नियम पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत ऐसे समय में हो रही है जब विपक्ष सरकार को कई मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है। ऐसे में पहले ही दिन लोकसभा में तीखी बहस और हंगामे की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।