Datia By-Election 2026: मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के उम्मीदवार की घोषणा के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। पार्टी ने पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया है। इस फैसले से नाराज मिश्रा समर्थकों ने देर रात सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान नेशनल हाईवे-44 जाम कर दिया गया और पुलिस पर पथराव की घटना भी सामने आई। टिकट कटने के बाद समर्थकों का प्रदर्शन बीजेपी की उम्मीदवार सूची जारी होने के बाद नरोत्तम मिश्रा के हजारों समर्थक दतिया में सड़कों पर उतर आए। विरोध प्रदर्शन के दौरान समर्थकों ने नेशनल हाईवे-44 पर जाम लगा दिया, जिससे लंबी दूरी तक वाहनों की कतारें लग गईं और यातायात प्रभावित हुआ। स्थिति तनावपूर्ण होने पर पुलिस मौके पर पहुंची। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई तथा पुलिस पर पथराव भी किया गया। हालात को नियंत्रित करने के लिए इलाके में भारी पुलिस बल तैनात किया गया। नरोत्तम मिश्रा को टिकट मिलने की थी उम्मीद पार्टी सूत्रों के अनुसार, डॉ. नरोत्तम मिश्रा को पूरा भरोसा था कि उन्हें उपचुनाव का टिकट मिलेगा। बताया जा रहा है कि उन्होंने नामांकन पत्र भी खरीद लिया था। ऐसे में अंतिम समय में टिकट कटना उनके समर्थकों के लिए बड़ा झटका साबित हुआ। आशुतोष तिवारी बने बीजेपी उम्मीदवार बीजेपी ने दतिया उपचुनाव के लिए आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया है। सेवढ़ा निवासी तिवारी लंबे समय से प्रदेश संगठन में सक्रिय रहे हैं। उम्मीदवार घोषित होने के बाद उन्होंने पार्टी नेतृत्व का आभार जताया और कहा कि डॉ. नरोत्तम मिश्रा उनके लिए वरिष्ठ नेता और अभिभावक समान हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि मिश्रा ने उन्हें समर्थन देने और चुनाव प्रचार में सहयोग करने का भरोसा दिया है। दतिया सीट पर उपचुनाव क्यों हो रहा है? दतिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव इसलिए कराया जा रहा है क्योंकि वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने डॉ. नरोत्तम मिश्रा को हराया था। हालांकि, अप्रैल 2026 में दिल्ली की एक अदालत ने धोखाधड़ी के एक मामले में राजेंद्र भारती को तीन वर्ष की सजा सुनाई, जिसके बाद उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो गई। इसी कारण यह सीट रिक्त हुई और निर्वाचन आयोग ने उपचुनाव की घोषणा की। बाद में भारती को जमानत मिल गई, लेकिन उनकी सदस्यता बहाल नहीं हुई। 30 जुलाई को होगा मतदान दतिया विधानसभा सीट पर 30 जुलाई को मतदान होना है। बीजेपी उम्मीदवार की घोषणा के बाद शुरू हुए विरोध ने चुनावी मुकाबले को और अधिक राजनीतिक रूप से दिलचस्प बना दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि पार्टी अपने नाराज कार्यकर्ताओं और समर्थकों को किस तरह मनाती है तथा इसका चुनावी परिणाम पर कितना असर पड़ता है।
रांची। झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की सुरक्षा को लेकर सामने आई खबरों के बाद रविवार को उनके रांची स्थित आवास पर समर्थकों, कार्यकर्ताओं और शुभचिंतकों की भारी भीड़ जुट गई। पलामू और उनके विधानसभा क्षेत्र छत्तरपुर समेत विभिन्न इलाकों से बड़ी संख्या में लोग मंत्री से मिलने पहुंचे। समर्थकों ने कहा कि वे मंत्री की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं और आवश्यकता पड़ने पर उनकी सुरक्षा के लिए स्वयं आगे आने को तैयार हैं। हालांकि, राधाकृष्ण किशोर ने सभी समर्थकों को शांत रहने की अपील करते हुए उन्हें वापस लौटा दिया और सरकारी कार्यक्रमों में उनके साथ नहीं आने का आग्रह किया। बिना सुरक्षा घेरे के कार्यक्रमों में पहुंचे मंत्री रविवार को वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर महानगर कांग्रेस के 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में शामिल होने के लिए कॉर्निवेल हॉल पहुंचे। इसके बाद उन्होंने एचईसी परिसर स्थित पारस अस्पताल का भी दौरा किया। पूरे दिन मंत्री बिना किसी सुरक्षा घेरे के नजर आए। हालांकि, उनकी सुरक्षा में तैनात स्पेशल ब्रांच और जैप के जवान दूर से उनकी गतिविधियों और आवास पर आने-जाने वालों पर नजर बनाए रहे। बारिश के बावजूद सुरक्षा कर्मी सड़क किनारे तैनात रहे और पूरे दिन स्थिति पर निगरानी रखते रहे। संयुक्त सचिव के नोटिस पर मांगी रिपोर्ट इस बीच वित्त मंत्री ने चार जुलाई को वित्त सचिव प्रशांत कुमार को पत्र लिखकर विभाग के संयुक्त सचिव पंकज सिंह द्वारा सरकारी वाहन लौटाने संबंधी नोटिस पर आपत्ति जताई है। उन्होंने पूछा है कि यह नोटिस किस नियम और अधिकार के तहत जारी किया गया। यदि यह पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर भेजा गया है, तो संबंधित आदेश की प्रति उपलब्ध कराने को भी कहा है। मंत्री ने पूरे मामले की जांच कर 10 दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने और दोषी अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। राधाकृष्ण किशोर ने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार से कोई नाराजगी नहीं है। उनका कहना है कि वे केवल प्रशासनिक जवाबदेही और राजकीय मर्यादा बनाए रखने की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार में सभी अधिकारियों को अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर कार्य करना चाहिए और प्रशासनिक व्यवस्था की गरिमा का पालन करना आवश्यक है।
कोलकाता: Mahua Moitra ने दावा किया है कि उनके घर (या कार्यालय परिसर) के बाहर कुछ लोगों ने अंडे और सड़े बैंगन फेंके। उन्होंने घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा करते हुए इसके लिए भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों को जिम्मेदार ठहराया और सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। वीडियो शेयर कर लगाए गंभीर आरोप महुआ मोइत्रा ने अपने पोस्ट में आरोप लगाया कि भाजपा समर्थक उनके परिसर के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उन्होंने पश्चिम बंगाल पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। अपने पोस्ट में उन्होंने कई विपक्षी नेताओं, जिनमें Mamata Banerjee, Rahul Gandhi, Akhilesh Yadav, Supriya Sule, M. K. Stalin और Arvind Kejriwal को टैग किया। वीडियो में क्या दिखाई देता है? करीब एक मिनट के वीडियो में एक व्यस्त सड़क पर भीड़, पुलिसकर्मी और कई लोग मोबाइल से वीडियो बनाते दिखाई देते हैं। वीडियो ऊपरी मंजिल से रिकॉर्ड किया गया प्रतीत होता है। महुआ मोइत्रा का कहना है कि वे करीब एक घंटे तक अपने कार्यालय के अंदर ही रहीं क्योंकि बाहर का माहौल तनावपूर्ण था। उन्होंने वीडियो में यह भी कहा कि केंद्रीय सुरक्षा बल (CRPF) के जवान मौके पर मौजूद थे, लेकिन उन्होंने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। पहले भी दी थी चेतावनी महुआ मोइत्रा ने इससे पहले सार्वजनिक रूप से कहा था कि यदि कोई उन पर अंडे फेंकेगा या इस तरह का हमला करेगा तो वह संबंधित लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराएंगी और कानूनी कार्रवाई करेंगी। सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं घटना का वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ यूज़र्स ने घटना की आलोचना की, जबकि कुछ ने राजनीतिक टिप्पणी करते हुए इसे लेकर व्यंग्यात्मक पोस्ट भी साझा किए। आधिकारिक पुष्टि नहीं फिलहाल इस मामले में आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। उपलब्ध जानकारी मुख्य रूप से महुआ मोइत्रा द्वारा साझा किए गए वीडियो और उनके सार्वजनिक बयानों पर आधारित है। इस संबंध में पुलिस या अन्य संबंधित एजेंसियों की विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।
रांची। नगड़ी में बन रहे रिम्स 2 के विरोध में आदिवासी संगठन गुरुवार को सड़क पर उतरे। इस आंदोलन में आदिवासी समाज, किसान और ग्रामीण शामिल हुए। इनका आक्रोश सड़कों पर फूटा। हजारों की संख्या में लोग नगड़ी से मुख्यमंत्री आवास तक पैदल मार्च के लिए निकले, रास्ते में उन्हें जगह जगह रोका गया, लेकिन ये लोग नदी और खेत से होते हुए मोराबादी पहुंच गए। अब प्रशासन ने उन्हें ऑक्सीजन पार्क के पास बैरिकेडिंग कर रोक दिया है। धरने पर बैठे प्रदर्शनकारी इसके बाद प्रदर्शनकारी वहीं धरने पर बैठ गए और अपने नारेबाजी कर रहे हैं। आजीविका छीनने का आरोप प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार विकास के नाम पर उनकी खेती-किसानी और आजीविका छीन रही है। उनका कहना है कि जिस जमीन पर रिम्स-2 बनाने की योजना है, वह इलाके की सबसे उपजाऊ कृषि भूमि में शामिल है, जहां सैकड़ों परिवार खेती पर निर्भर हैं। ऐसे में अस्पताल निर्माण के लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण किसानों के भविष्य पर सीधा प्रहार होगा। बंजर या गैरकृषि भूमि पर बने रिम्स-2.. प्रदर्शन में शामिल ग्रामीणों ने कहा कि वे स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसके लिए बंजर या गैर-कृषि भूमि का चयन किया जाना चाहिए। उनका सवाल है कि जब राज्य में अन्य वैकल्पिक जमीन उपलब्ध है, तो फिर उपजाऊ खेतों को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है। खेतो और नदी के रास्ते मोरहाबादी पहुंचे रोक के बावजूद प्रदर्शनकारियों का उत्साह कम नहीं हुआ। कई ग्रामीण खेतों और नदी के रास्ते होते हुए ऑक्सीजन पार्क तक पहुंचे। उनका आरोप है कि मार्च को रोकने के लिए जगह-जगह पुलिस बल तैनात किया गया था, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग आंदोलन स्थल तक पहुंचने में सफल रहे। कांके ब्लॉक में भी रोका गयाः आदिवासी संगठनों और नगड़ी जमीन बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले बड़ी संख्या में ग्रामीण, किसान और आदिवासी समाज के लोग सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों को लेकर मुख्यमंत्री आवास तक पैदल मार्च शुरू किया, लेकिन प्रशासन ने उन्हें कांके के ब्लॉक चौक के पास रोक दिया। आंदोलन में शामिल लोगों का कहना है कि यह सिर्फ जमीन का नहीं बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति और भविष्य का सवाल है। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट कहा कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर किसानों की उपजाऊ जमीन को खत्म करना स्वीकार नहीं करेंगे। प्रदर्शनकारियों को प्रशासन ने रोका प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बड़ी संख्या में पुरुषों, महिलाओं और युवाओं ने रैली में भाग लिया. मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को प्रशासन ने कांके ब्लॉक चौक के समीप बैरिकेडिंग लगाकर रोक दिया। इसके बाद रैली को कांके प्रखंड कार्यालय की ओर डायवर्ट करने का प्रयास किया गया।
रांची। आज मंगलवार की सुबह राजधानी रांची में झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा के लोगों ने जमकर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन का मुख्य कारण अपनी पहचान, पेंशन, अस्मिता और अन्य लंबित मांगों को लेकर आंदोलनकारी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आवास का घेराव करने निकले । हालांकि, सुरक्षा व्यवस्था के तहत प्रशासन ने उन्हें मोहराबादी इलाके में ही रोक दिया, जहां बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी एकत्र होकर नारेबाजी कर रहे हैं। सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए आंदोलन को देखते हुए राजधानी में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। मोहराबादी मैदान से लेकर मुख्यमंत्री आवास तक जाने वाले सभी प्रमुख मार्गों पर पुलिस बल की तैनाती की गई है। सिटी एसपी, ग्रामीण एसपी, डीएसपी, थाना प्रभारियों सहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी स्वयं सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल भी तैनात किया गया है। प्रशासन के अनुसार सुरक्षा के मद्देनजर करीब 600 सुरक्षाकर्मियों को विभिन्न स्थानों पर लगाया गया है। इनमें तीन कंपनियां रैपिड एक्शन पुलिस, एसआईआरबी, जैप और इको बल के जवान शामिल हैं। हथियारबंद जवानों के साथ-साथ लाठी पार्टी भी तैनात की गई है ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके। ब्रज वाहन, फायर ब्रिगेड वाहन, रंगीन पानी इसके अलावा मोहराबादी मैदान और मुख्यमंत्री आवास के आसपास ब्रज वाहन, फायर ब्रिगेड वाहन, रंगीन पानी के टैंकर और आंसू गैस स्क्वॉड को भी तैयार रखा गया है। प्रशासन की प्राथमिकता प्रदर्शनकारियों को मोहराबादी क्षेत्र तक सीमित रखना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। फिलहाल प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से जारी है, लेकिन आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी मांगों पर लंबे समय से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। वहीं प्रशासन स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी होने के कारण कई मार्गों पर आवाजाही भी प्रभावित हुई है। प्रदर्शन को देखते हुए पूरे क्षेत्र में सतर्कता बढ़ा दी गई है।
नई दिल्ली: डिजिटल संगठन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन को देखते हुए शनिवार को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय (आईजीआई) हवाई अड्डे, दिल्ली की सीमाओं तथा अन्य संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त बल तैनात किया है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी संभावित स्थिति से निपटने के लिए सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह सतर्क हैं। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने इस महीने की शुरुआत में समर्थकों और छात्रों से दिल्ली में आयोजित होने वाले प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की थी। उन्होंने अपने समर्थकों से 6 जून को दिल्ली एयरपोर्ट पर उनसे मिलने का भी आह्वान किया था। सूत्रों के अनुसार, प्रदर्शन के लिए दिल्ली पुलिस को कोई औपचारिक अनुमति आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है। सोशल मीडिया गतिविधियों और अन्य खुफिया सूचनाओं के आधार पर एहतियातन सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं। राजधानी में बढ़ाई गई सुरक्षा पुलिस सूत्रों के मुताबिक, नई दिल्ली जिले समेत कई रणनीतिक स्थानों पर 1,000 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। आईजीआई एयरपोर्ट, प्रमुख रेलवे स्टेशन, अंतरराज्यीय बस टर्मिनल और दिल्ली की सीमाओं पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। इसके अलावा प्रमुख बाजारों, चौराहों और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। एयरपोर्ट परिसर के बाहर बहुस्तरीय बैरिकेडिंग की गई है, जबकि दिल्ली की सीमाओं और मध्य दिल्ली की ओर जाने वाले प्रमुख मार्गों पर वाहनों की जांच भी तेज कर दी गई है। अभिजीत दीपके के दिल्ली पहुंचने का दावा सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने दावा किया है कि अभिजीत दीपके दिल्ली पहुंच चुके हैं और इसकी जानकारी उन्होंने सोशल मीडिया पर भी साझा की है। रांका के अनुसार, दीपके दिल्ली पुलिस से प्रदर्शन की अनुमति लेने के लिए संबंधित थाने जाएंगे, जिसके बाद जंतर-मंतर पर धरना आयोजित करने की योजना है। उन्होंने कहा कि यह दिन भारतीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है और संगठन अपने मुद्दों को लोकतांत्रिक तरीके से उठाना चाहता है। वरिष्ठ अधिकारियों ने की समीक्षा शुक्रवार को पुलिस उपायुक्त (आईजीआई) विचित्र वीर समेत वरिष्ठ अधिकारियों ने एयरपोर्ट और आसपास के इलाकों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की। पुलिस सूत्रों के अनुसार, एक उच्चस्तरीय बैठक में सुरक्षा हालात का आकलन किया गया और सभी फील्ड इकाइयों को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए। जिला पुलिस इकाइयों को पर्याप्त संख्या में बल तैयार रखने और पूरे घटनाक्रम पर कड़ी नजर बनाए रखने के लिए कहा गया है। खुफिया एजेंसियों के साथ समन्वय अधिकारियों ने बताया कि दिल्ली पुलिस खुफिया एजेंसियों और अन्य सुरक्षा संस्थानों के साथ लगातार समन्वय बनाए हुए है। पुलिस का कहना है कि आम नागरिकों की सुरक्षा और यात्रियों की सुगम आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं। साथ ही राजधानी में कानून-व्यवस्था प्रभावित करने वाली किसी भी गतिविधि पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी उठापटक के बीच तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को फेसबुक लाइव के जरिए भाजपा और राज्य प्रशासन पर तीखा हमला बोला। पार्टी के कुछ विधायकों के दल बदलने और संगठन में बढ़ती हलचल के बीच ममता ने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस को तोड़ने की कोशिश की जा रही है, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं होगा। अपने संबोधन में ममता बनर्जी ने कहा कि केंद्रीय एजेंसियों, धनबल और प्रशासनिक दबाव के सहारे उनकी पार्टी को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने विरोधियों को चेतावनी देते हुए कहा, "अगर कोई यह खेल खेल रहा है तो उसे बता दूं कि मैं भी बड़ी खिलाड़ी हूं। समय आने पर इसका जवाब जरूर दूंगी।" विधायकों को धमकाने का आरोप ममता बनर्जी ने दावा किया कि उनकी पार्टी के चार विधायकों ने उनसे शिकायत की है कि कुछ पुलिस अधिकारी उन्हें पार्टी की बैठकों में शामिल न होने की चेतावनी दे रहे हैं। उनके अनुसार, विधायकों को कहा गया है कि यदि वे कालीघाट या तृणमूल कांग्रेस की संगठनात्मक बैठकों में हिस्सा लेते हैं तो उनके खिलाफ आर्म्स एक्ट या मादक पदार्थों से जुड़े मामलों में कार्रवाई की जा सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ अधिकारी विधायकों को भाजपा नेताओं के संपर्क में आने की सलाह भी दे रहे हैं। हालांकि इन आरोपों पर सरकार या पुलिस की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पार्टी छोड़ने वालों पर साधा निशाना हाल में पार्टी से निष्कासित नेताओं का नाम लिए बिना ममता बनर्जी ने कहा कि कुछ लोगों की कोई विचारधारा नहीं होती और वे केवल अपने स्वार्थ के लिए राजनीति करते हैं। उन्होंने ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाने पर खेद जताया और जनता से माफी भी मांगी। उन्होंने कहा कि राजनीति में अवसर देने के बावजूद कुछ लोगों ने पार्टी के साथ विश्वासघात किया, जिसका उन्हें अफसोस रहेगा। कार्यकर्ताओं के भरोसे संगठन मजबूत करने का दावा ममता बनर्जी ने कहा कि कुछ नेता दबाव या लालच में आकर पार्टी छोड़ सकते हैं, लेकिन तृणमूल कांग्रेस की असली ताकत उसके जमीनी कार्यकर्ता हैं। उन्होंने दावा किया कि पार्टी का संगठन कार्यकर्ताओं की बदौलत मजबूत बना रहेगा। उन्होंने बताया कि वह स्वयं संगठनात्मक गतिविधियों की निगरानी कर रही हैं और कार्यकर्ताओं की समस्याओं को सीधे सुन रही हैं। जरूरत पड़ने पर पार्टी की ओर से कानूनी सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। धरने से पहले बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी ममता बनर्जी का यह बयान ऐसे समय आया है जब तृणमूल कांग्रेस 2 जून को कोलकाता में बड़े विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फेसबुक लाइव के जरिए ममता ने अपने समर्थकों को संदेश देने के साथ-साथ भाजपा सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इन आरोपों पर राज्य सरकार और भाजपा की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है और आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।
चेन्नई: प्रस्तावित परिसीमन विधेयक को लेकर देश में सियासी माहौल गर्माता जा रहा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस बिल के खिलाफ अपना विरोध तेज करते हुए इसकी कॉपी जला दी। उन्होंने इस कानून को “काला कानून” करार देते हुए राज्यभर में आंदोलन शुरू करने का ऐलान किया है। ‘तमिलों को हाशिये पर धकेल देगा यह कानून’ स्टालिन का आरोप है कि अगर यह परिसीमन लागू हुआ, तो तमिलनाडु जैसे राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो जाएगी। उन्होंने कहा कि इससे “तमिल लोग अपनी ही जमीन पर शरणार्थी बन जाएंगे।” उनका तर्क है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण दक्षिण भारत के उन राज्यों के लिए नुकसानदेह होगा, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। सोशल मीडिया पर साझा किया विरोध एम. के. स्टालिन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर वीडियो और तस्वीरें साझा करते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा: “फासीवादी बीजेपी का घमंड चकनाचूर हो” “आज मैंने एक और आग जलाई है, उस काले कानून की प्रति जलाकर” “यह आग पूरे द्रविड़ भूमि में फैलेगी” उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए हिंदी विरोध आंदोलन का जिक्र किया और कहा कि “तब भी तमिलनाडु झुका नहीं था और अब भी नहीं झुकेगा।” क्यों हो रहा है विरोध? परिसीमन का मतलब है—जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों का पुनर्निर्धारण। दक्षिण भारत के राज्यों की मुख्य चिंताएं: जनसंख्या नियंत्रण के बावजूद सीटें कम होने का डर उत्तर भारत के ज्यादा आबादी वाले राज्यों को फायदा राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असंतुलन केंद्र का क्या है रुख? केंद्र सरकार का कहना है कि परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है और इसका मकसद सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व देना है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा। बढ़ सकता है सियासी टकराव तमिलनाडु में इस मुद्दे पर विरोध तेज होने के बाद अन्य दक्षिणी राज्यों में भी प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। ऐसे में परिसीमन विधेयक को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच टकराव और बढ़ने के आसार हैं।
बिहार की राजनीति में उस समय हलचल तेज हो गई जब मुख्यमंत्री Nitish Kumar के राज्यसभा जाने की अटकलें सामने आईं। इन खबरों के बाद उनकी पार्टी Janata Dal (United) के भीतर असंतोष की स्थिति दिखने लगी है। गुरुवार सुबह पटना स्थित मुख्यमंत्री आवास के बाहर बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता जमा हो गए और उन्होंने जोरदार नारेबाजी करते हुए नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की मांग की। प्रदर्शन कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना था कि यदि नेतृत्व में बदलाव करना है तो जनता के बीच जाकर दोबारा चुनाव कराया जाए। उनका दावा है कि जनता ने नीतीश कुमार के नाम पर वोट दिया था, इसलिए वे अपना कार्यकाल पूरा करें। मंत्री पर हमला, सुरक्षा बढ़ाई गई प्रदर्शन के दौरान मुख्यमंत्री आवास के पास माहौल तनावपूर्ण हो गया। इस बीच राज्य के मंत्री Surendra Mehta जब आवास परिसर में प्रवेश कर रहे थे, तब उन पर कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा हमला किए जाने की खबर सामने आई। स्थिति को देखते हुए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती बढ़ा दी गई। मौके पर आईजी, एसएसपी और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे, जबकि राज्य के डीजीपी भी मुख्यमंत्री आवास में मौजूद बताए गए। कार्यकर्ताओं ने जताई नाराजगी जेडीयू नेता Rajiv Ranjan Patel के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने कहा कि यदि मुख्यमंत्री राज्यसभा के लिए नामांकन भरने जाते हैं तो वे उन्हें ऐसा करने से रोकने का प्रयास करेंगे। उनका कहना है कि पार्टी कार्यकर्ताओं ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के लिए कड़ी मेहनत की है और वे चाहते हैं कि वे ही राज्य की कमान संभाले रखें। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई राजनीतिक फैसला लिया जाता है तो उसमें कार्यकर्ताओं की राय भी ली जानी चाहिए। उनका सुझाव था कि नीतीश कुमार की जगह किसी और को भेजना हो तो उनके बेटे Nishant Kumar को राज्यसभा भेजा जा सकता है, लेकिन मुख्यमंत्री पद पर बदलाव नहीं होना चाहिए। पार्टी नेतृत्व का अलग रुख वहीं जेडीयू के एक अन्य नेता Sanjay Singh ने कहा कि पार्टी के सर्वोच्च नेता नीतीश कुमार हैं और यदि उन्होंने राज्यसभा जाने का फैसला लिया है तो कार्यकर्ताओं को उसका सम्मान करना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि राज्य की बड़ी आबादी चाहती है कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद पर ही बने रहें। बेटे की राजनीति में एंट्री की चर्चा इसी बीच यह भी चर्चा है कि नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार जल्द ही सक्रिय राजनीति में कदम रख सकते हैं और पार्टी की सदस्यता ले सकते हैं। इस संभावना ने भी जेडीयू के अंदर राजनीतिक हलचल को और बढ़ा दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि नीतीश कुमार वास्तव में राज्यसभा जाते हैं तो यह बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है, क्योंकि लंबे समय से वे राज्य की सत्ता के केंद्र में रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।