सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अस्पताल में भर्ती होने के बाद अब 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च का नेतृत्व उनकी पत्नी डॉ. गीतांजलि आंग्मो करेंगी। उन्होंने कहा कि वह अपने पति का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रदर्शन में शामिल होंगी और आंदोलन को शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा। "मैं सोनम वांगचुक का प्रतिनिधित्व करूंगी" न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में डॉ. गीतांजलि आंग्मो ने कहा कि उन्होंने वांगचुक को दूसरे अस्पताल में स्थानांतरित करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन अनुमति नहीं मिली। उन्होंने कहा कि यदि स्थानांतरण की मंजूरी मिल जाती तो वांगचुक भी मार्च में शामिल हो सकते थे। अब वह स्वयं उनके प्रतिनिधि के रूप में संसद मार्च में शामिल होंगी। छात्रों और अभिभावकों से की शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अपील गीतांजलि आंग्मो ने प्रदर्शन में शामिल होने वाले छात्रों और अभिभावकों से संयम बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि मार्च पूरी तरह शांतिपूर्ण होना चाहिए और किसी भी ऐसे तत्व से सावधान रहना होगा जो आंदोलन का माहौल बिगाड़ने या उसे अलग दिशा देने की कोशिश करे। उन्होंने यह भी बताया कि सोनम वांगचुक अब भी अपना अनशन जारी रखना चाहते हैं। डॉक्टरों द्वारा तरल पदार्थ लेने की सलाह के बावजूद उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया है, हालांकि वे पानी पी रहे हैं। सरकार पर लगाए गंभीर आरोप गीतांजलि आंग्मो ने आरोप लगाया कि सरकार को वांगचुक के नेतृत्व में होने वाले संसद मार्च से डर है। उनके अनुसार, यदि वांगचुक स्वयं मार्च का नेतृत्व करते तो देशभर से बड़ी संख्या में लोग इस आंदोलन से जुड़ सकते थे। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से स्वास्थ्य को लेकर जताई जा रही चिंता केवल दिखावा है। हाई कोर्ट से नहीं मिली राहत इस बीच दिल्ली हाई कोर्ट ने डॉ. गीतांजलि आंग्मो की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल से छुट्टी देकर मेदांता अस्पताल स्थानांतरित करने की मांग की थी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि वांगचुक हिरासत में नहीं हैं और उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने के फैसले को मनमाना नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने तत्काल अस्पताल बदलने की मांग स्वीकार करने से इनकार कर दिया। क्या है पूरा मामला? सोनम वांगचुक कथित NEET-UG पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनके समर्थकों का आरोप है कि उन्हें जंतर-मंतर से हटाकर उनकी इच्छा के विरुद्ध अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि प्रशासन का कहना है कि यह कदम उनकी स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया। इस बीच संसद मार्च को लेकर राजधानी दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी गई है।
संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के साथ ही राजधानी दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गई है। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आह्वान पर आयोजित 'संसद मार्च' को देखते हुए जंतर-मंतर और संसद मार्ग के आसपास पूरे इलाके को सुरक्षा घेरे में बदल दिया गया है। दिल्ली पुलिस और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के 5,000 से अधिक जवान तैनात किए गए हैं। जंतर-मंतर पर जुटने लगे प्रदर्शनकारी देश के अलग-अलग राज्यों से बड़ी संख्या में लोग जंतर-मंतर पहुंच रहे हैं। हल्की बारिश के बावजूद प्रदर्शनकारियों का उत्साह कम नहीं दिखा। हाथों में तिरंगा लेकर लोग देशभक्ति के नारे लगा रहे हैं और शांतिपूर्ण प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं। संसद मार्च की अनुमति नहीं दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया है कि जंतर-मंतर से संसद तक मार्च निकालने की अनुमति नहीं दी गई है। इलाके में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 163 लागू कर दी गई है, जिसके तहत बड़ी संख्या में लोगों के एकत्र होने पर प्रतिबंध रहेगा। पुलिस ने चेतावनी दी है कि नियमों का उल्लंघन होने पर कार्रवाई और गिरफ्तारी की जा सकती है। तीन-स्तरीय सुरक्षा घेरा सुरक्षा व्यवस्था के तहत दिल्ली पुलिस, CAPF और RAF की 25 से अधिक कंपनियों को तैनात किया गया है। स्पेशल सीपी, जॉइंट सीपी और डीसीपी स्तर के अधिकारी स्वयं पूरे ऑपरेशन की निगरानी कर रहे हैं। संसद मार्ग और आसपास के इलाकों में बैरिकेडिंग, चेकिंग और निगरानी बढ़ा दी गई है। कई मेट्रो स्टेशन अस्थायी रूप से बंद संसद मार्च के मद्देनज़र दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) ने राजीव चौक, जनपथ, पटेल चौक, केंद्रीय सचिवालय और सेवा तीर्थ मेट्रो स्टेशनों पर अगले आदेश तक प्रवेश और निकास बंद कर दिया है। यात्रियों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने की सलाह दी गई है। बातचीत के लिए तैयार आंदोलनकारी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि प्रशासन ने सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत की पहल की है। उनके अनुसार संगठन संवाद के लिए तैयार है और अब फैसला सरकार को करना है। उन्होंने बताया कि सोनम वांगचुक की तबीयत स्थिर है और उनका अनशन जारी है। चंद्रशेखर आजाद ने दिया समर्थन आजाद समाज पार्टी के सांसद चंद्रशेखर आजाद भी जंतर-मंतर पहुंचकर प्रदर्शनकारियों के समर्थन में खड़े हुए। उन्होंने कहा कि युवाओं की आवाज उठाना उनका कर्तव्य है और इस मुद्दे को संसद के भीतर भी पूरी मजबूती से उठाया जाएगा। CJP का दावा- ऐतिहासिक होगा मार्च CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने दावा किया कि यह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मार्च साबित होगा। उन्होंने कहा कि देशभर से लोग दिल्ली पहुंच रहे हैं और आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ेगा। सोनम वांगचुक ने रखी हैं तीन शर्तें इस बीच अस्पताल में भर्ती सोनम वांगचुक ने कहा है कि यदि सरकार परीक्षा प्रणाली में कथित गड़बड़ियों पर जवाबदेही तय करती है या उनकी बात सांसदों तक पहुंचाने का रास्ता देती है, तो वे अपना अनशन समाप्त करने पर विचार करेंगे। फिलहाल उनकी मांगों को लेकर सरकार की ओर से किसी आधिकारिक निर्णय का इंतजार है।
नई दिल्ली: फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप ने सामाजिक कार्यकर्ता और इंजीनियर सोनम वांगचुक के आमरण अनशन का समर्थन करते हुए सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने पोस्ट में अनुराग कश्यप ने कहा कि लंबे समय से जारी भूख हड़ताल के बावजूद सरकार की चुप्पी चिंता का विषय है। सोनम वांगचुक पिछले कई दिनों से जंतर-मंतर पर अपनी विभिन्न मांगों को लेकर आमरण अनशन पर हैं। उनकी सेहत को लेकर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों और समर्थकों ने भी चिंता जताई है तथा उनसे अनशन समाप्त करने की अपील की है। अनुराग कश्यप ने क्या कहा? अनुराग कश्यप ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर लिखा कि एक समय भूख हड़ताल लोकतांत्रिक विरोध का एक प्रभावी माध्यम माना जाता था और लोग गंभीर मुद्दों पर ही इस रास्ते को अपनाते थे। उन्होंने लिखा कि किसी व्यक्ति का आमरण अनशन पर बैठना इस बात का संकेत है कि वह न्याय और अपने मुद्दे को लेकर पूरी प्रतिबद्धता के साथ संघर्ष कर रहा है। अनुराग ने यह भी कहा कि वे स्वयं इस तरह का कदम उठाने की हिम्मत नहीं रखते, लेकिन सोनम वांगचुक के समर्थन में खड़े हैं। सरकार की चुप्पी पर जताई नाराजगी अपने पोस्ट में अनुराग कश्यप ने सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि लंबे समय तक किसी प्रकार की प्रतिक्रिया न आना चिंताजनक है। उन्होंने सत्ता पक्ष की चुप्पी की आलोचना करते हुए तीखी भाषा का इस्तेमाल किया और इसे लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उनके एक अन्य सोशल मीडिया पोस्ट में भी सरकार के प्रति कड़ी आलोचना देखने को मिली, जिसमें उन्होंने अपनी असहमति व्यक्त करते हुए कठोर शब्दों का प्रयोग किया। कई कलाकार भी जता चुके हैं चिंता सोनम वांगचुक के अनशन को लेकर फिल्म और कला जगत की कई हस्तियों ने भी चिंता व्यक्त की है। कई कलाकारों ने उनकी सेहत को ध्यान में रखते हुए उनसे आमरण अनशन समाप्त करने की अपील की है। क्या हैं सोनम वांगचुक की प्रमुख मांगें? सोनम वांगचुक जंतर-मंतर पर अपनी विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके प्रमुख मुद्दों में: NEET पेपर लीक मामले में जवाबदेही तय करने की मांग। केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग। लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग। वांगचुक का कहना है कि यदि उनकी प्रमुख मांगों पर सकारात्मक निर्णय लिया जाता है तो वह अपना अनशन समाप्त करने पर विचार करेंगे। स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता लंबे समय से जारी भूख हड़ताल के कारण सोनम वांगचुक की सेहत को लेकर चिंता बढ़ गई है। डॉक्टर लगातार उनकी स्वास्थ्य जांच कर रहे हैं और समर्थक उनसे अनशन समाप्त करने की अपील कर रहे हैं। फिलहाल सरकार की ओर से उनकी मांगों पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। वहीं, यह मामला सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
PoK Protests: पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoK) में सरकार विरोधी आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने बुधवार को मुजफ्फराबाद तक 'लॉन्ग मार्च' का आह्वान किया है। संभावित प्रदर्शन को देखते हुए पूरे क्षेत्र में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है और बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है। सरकार के खिलाफ जारी है आंदोलन JAAC लंबे समय से अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की रिहाई, सुरक्षा बलों की कार्रवाई रोकने, इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बहाल करने तथा बिजली और आवश्यक वस्तुओं की बेहतर उपलब्धता जैसी मांगों को लेकर आंदोलन चला रही है। संगठन का कहना है कि सरकार को पहले ही अल्टीमेटम दिया गया था, लेकिन मांगों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। कई जिलों से मुजफ्फराबाद पहुंचेंगे प्रदर्शनकारी सूत्रों के मुताबिक रावलकोट, मीरपुर, कोटली, बाग समेत कई जिलों से बड़ी संख्या में लोग मुजफ्फराबाद पहुंच सकते हैं। प्रदर्शन के दौरान बाजार बंद रहने और कई प्रमुख सड़कों पर यातायात प्रभावित होने की भी संभावना जताई गई है। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी संभावित विरोध प्रदर्शन को देखते हुए प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की है। प्रमुख मार्गों और सरकारी प्रतिष्ठानों की निगरानी बढ़ा दी गई है। स्थानीय प्रशासन किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए अलर्ट पर है। JAAC की प्रमुख मांगें गिरफ्तार नेताओं और कार्यकर्ताओं की रिहाई सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर रोक इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं की बहाली बिजली और आवश्यक वस्तुओं की बेहतर उपलब्धता शासन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में सुधार आंदोलन और तेज होने की चेतावनी JAAC ने कहा है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर सकारात्मक कदम नहीं उठाए, तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा। संगठन का दावा है कि मौजूदा आंदोलन केवल बुनियादी सुविधाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजनीतिक सुधारों की मांग भी प्रमुख मुद्दा बनेगी। राजनीतिक असर पर नजर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े पैमाने पर प्रदर्शन होता है, तो इससे पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक स्थिति और तनावपूर्ण हो सकती है। वहीं, प्रदर्शन के दौरान किसी भी प्रकार की सख्ती या बल प्रयोग की स्थिति पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर रहेगी.
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के आगामी मॉनसून सत्र से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस ने 16 जुलाई को अपने शीर्ष नेताओं और सांसदों की अहम रणनीतिक बैठक बुलाई है, जिसमें सत्र के दौरान सरकार को किन मुद्दों पर घेरा जाएगा, इस पर चर्चा होगी। दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने 19 जुलाई को सभी राजनीतिक दलों की सर्वदलीय बैठक बुलाने का फैसला किया है। सरकार और विपक्ष दोनों कर रहे तैयारी कांग्रेस महंगाई, बेरोजगारी, कृषि, राष्ट्रीय सुरक्षा और अन्य प्रमुख मुद्दों को संसद में उठाने की तैयारी कर रही है। वहीं सरकार भी मॉनसून सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पेश करने की रणनीति बना रही है। संविधान संशोधन विधेयक पर हो सकता है हंगामा सूत्रों के अनुसार, इस सत्र में प्रस्तावित 130वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस होने की संभावना है। विपक्ष पहले से ही इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की तैयारी में जुटा है। 20 जुलाई से शुरू होगा मॉनसून सत्र संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने वाला है। इससे पहले होने वाली कांग्रेस की रणनीति बैठक और सर्वदलीय बैठक को सत्र की दिशा तय करने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। राजनीतिक दल अपने-अपने एजेंडे को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं।
न्यूयॉर्क: अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र (UN) मुख्यालय के बाहर गुरुवार को एक व्यक्ति ने कथित तौर पर खुद को आग लगा ली। गंभीर रूप से झुलसे 52 वर्षीय व्यक्ति को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। घटना के बाद इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई और पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। बौद्ध भिक्षु जैसे वस्त्र पहनकर पहुंचा था व्यक्ति प्रत्यक्षदर्शियों और सामने आए वीडियो के अनुसार, व्यक्ति पारंपरिक बौद्ध भिक्षु जैसे वस्त्र पहने हुए था। उसने पहले फुटपाथ पर तिब्बती झंडा रखा और फिर खुद को आग के हवाले कर दिया। कुछ ही सेकंड में वह सड़क पर गिर पड़ा। मौके पर मौजूद लोगों ने तुरंत पुलिस और आपातकालीन सेवाओं को सूचना दी। 'चीन तिब्बत छोड़ो' लिखे पर्चे बरामद न्यूयॉर्क पुलिस विभाग (NYPD) के अनुसार, घटनास्थल से "China Out of Tibet" (चीन तिब्बत छोड़ो) लिखे कई पर्चे बरामद किए गए हैं। शुरुआती जांच में घटना को तिब्बत से जुड़े विरोध प्रदर्शन से जोड़कर देखा जा रहा है, पुलिस ने अभी तक किसी आधिकारिक निष्कर्ष की पुष्टि नहीं की है। मृतक की पहचान फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है, क्योंकि पहले उसके परिजनों को सूचना देना जरूरी है। 20 वर्षों से अमेरिका में रहने का दावा कुछ मीडिया रिपोर्टों में मृतक की पहचान लोबगा रांगजेन के रूप में की गई है। बताया गया है कि वह लगभग 20 वर्षों से अमेरिका में रह रहा था। अधिकारियों ने अभी तक इस पहचान की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। UN ने क्या कहा? संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता ने बताया कि घटना उस समय हुई जब दिनभर की आधिकारिक बैठकें समाप्त हो चुकी थीं। इसलिए इस घटना का संयुक्त राष्ट्र के नियमित कामकाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तिब्बत मुद्दे पर पहले भी हो चुके हैं आत्मदाह तिब्बत से जुड़े संगठनों के अनुसार, वर्ष 2009 से अब तक 150 से अधिक तिब्बती चीन के शासन के विरोध में आत्मदाह कर चुके हैं। इनमें बौद्ध भिक्षु, साध्वियां, छात्र, किसान और आम नागरिक शामिल रहे हैं। तिब्बती संगठनों का कहना है कि ऐसे विरोध प्रदर्शन धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक पहचान की रक्षा, तिब्बती भाषा के संरक्षण और दलाई लामा की तिब्बत वापसी जैसी मांगों से जुड़े रहे हैं। वहीं, चीन का आरोप है कि इन घटनाओं के पीछे निर्वासित तिब्बती नेतृत्व लोगों को उकसाता है। दूसरी ओर, निर्वासित तिब्बती प्रशासन इन आरोपों को खारिज करते हुए कहता है कि लोग चीन की नीतियों और बढ़ते सरकारी दबाव के विरोध में ऐसा कदम उठाते हैं। जांच जारी न्यूयॉर्क पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। अधिकारी आत्मदाह के पीछे की परिस्थितियों, घटनास्थल से मिले दस्तावेजों और उपलब्ध वीडियो फुटेज की जांच कर रहे हैं। फिलहाल घटना के कारणों को लेकर कोई आधिकारिक निष्कर्ष जारी नहीं किया गया है।
गढ़वा: झारखंड के बरवाडीह को छत्तीसगढ़ के चिरमिरी और अंबिकापुर से जोड़ने वाली प्रस्तावित रेल लाइन के रूट में बदलाव को लेकर स्थानीय लोगों का विरोध तेज हो गया है। बरवाडीह-चिरमिरी-अंबिकापुर रेल लाइन निर्माण संघर्ष समिति ने मांग की है कि परियोजना का निर्माण पुराने प्रस्तावित मार्ग से ही किया जाए। समिति ने चेतावनी दी है कि यदि रूट बदला गया तो क्षेत्रव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। बड़गड़ में हुई संघर्ष समिति की बैठक संघर्ष समिति के आह्वान पर बुधवार को गढ़वा जिले के बड़गड़ स्थित राजकीय मध्य विद्यालय परिसर में एक बैठक आयोजित की गई। इसमें बड़गड़, भंडरिया और पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले से बड़ी संख्या में ग्रामीण, जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए। बैठक में प्रस्तावित रेल परियोजना का मार्ग बदलने के निर्णय का सर्वसम्मति से विरोध किया गया। 'रूट बदला तो पिछड़ जाएगा पूरा इलाका' बैठक को संबोधित करते हुए संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने कहा कि यदि पुराने सर्वेक्षण वाले मार्ग को छोड़कर नई रेल लाइन किसी अन्य रूट से बनाई गई तो बड़गड़ और भंडरिया जैसे क्षेत्र रेल संपर्क से वंचित रह जाएंगे, जिससे विकास पर गंभीर असर पड़ेगा। समिति के पदाधिकारी जयप्रकाश मिंज ने कहा कि बरवाडीह-चिरमिरी-अंबिकापुर रेल परियोजना इस आदिवासी और पिछड़े इलाके के विकास की आधारशिला है। रूट बदलने से स्थानीय लोगों के रोजगार, शिक्षा और व्यापार के अवसर प्रभावित होंगे। 'वर्षों की तैयारी को नजरअंदाज किया जा रहा' समिति के सदस्य आनंद सोनी ने कहा कि पुराने रेल मार्ग के लिए वर्षों पहले सर्वेक्षण सहित कई तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी थीं। ऐसे में अचानक नया रूट तय करना क्षेत्र की जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सरकार से पुराने प्रस्तावित मार्ग को बहाल करने की मांग की। 65 एकड़ रेलवे जमीन पर अवैध कब्जे का आरोप बैठक में छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले से पहुंचे प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि परियोजना के तहत प्रस्तावित रेलवे जंक्शन पहले सरनाडीह गांव में बनाया जाना था। उनका दावा है कि रेलवे की करीब 65 एकड़ भूमि आज भी सरकारी रिकॉर्ड में रेलवे के नाम दर्ज है, लेकिन उस पर कुछ प्रभावशाली लोगों ने कथित रूप से अवैध कब्जा कर रखा है। इस मामले की शिकायत जिला प्रशासन से की जा चुकी है और मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में भी लंबित बताया गया। जनजागरण अभियान और आंदोलन की चेतावनी बैठक में निर्णय लिया गया कि पुराने प्रस्तावित रेल मार्ग को बहाल कराने के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। साथ ही रेल मंत्रालय, जनप्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा जाएगा। संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया कि यदि उनकी मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा। बड़ी संख्या में लोग रहे मौजूद बैठक में जिला परिषद प्रतिनिधि राधेश्याम जायसवाल, मुखिया प्रतिनिधि दिनेश लकड़ा, सत्यानंद बाखला, विधायक प्रतिनिधि ओमप्रकाश, भाजपा मंडल अध्यक्ष बजरंग प्रसाद, झामुमो प्रखंड अध्यक्ष अर्जुन मिंज सहित विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि तथा सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह रेल परियोजना क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इसके मूल रूट में किसी भी बदलाव का वे पुरजोर विरोध करेंगे।
रांची। नगड़ी में बन रहे रिम्स 2 के विरोध में आदिवासी संगठन गुरुवार को सड़क पर उतरे। इस आंदोलन में आदिवासी समाज, किसान और ग्रामीण शामिल हुए। इनका आक्रोश सड़कों पर फूटा। हजारों की संख्या में लोग नगड़ी से मुख्यमंत्री आवास तक पैदल मार्च के लिए निकले, रास्ते में उन्हें जगह जगह रोका गया, लेकिन ये लोग नदी और खेत से होते हुए मोराबादी पहुंच गए। अब प्रशासन ने उन्हें ऑक्सीजन पार्क के पास बैरिकेडिंग कर रोक दिया है। धरने पर बैठे प्रदर्शनकारी इसके बाद प्रदर्शनकारी वहीं धरने पर बैठ गए और अपने नारेबाजी कर रहे हैं। आजीविका छीनने का आरोप प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार विकास के नाम पर उनकी खेती-किसानी और आजीविका छीन रही है। उनका कहना है कि जिस जमीन पर रिम्स-2 बनाने की योजना है, वह इलाके की सबसे उपजाऊ कृषि भूमि में शामिल है, जहां सैकड़ों परिवार खेती पर निर्भर हैं। ऐसे में अस्पताल निर्माण के लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण किसानों के भविष्य पर सीधा प्रहार होगा। बंजर या गैरकृषि भूमि पर बने रिम्स-2.. प्रदर्शन में शामिल ग्रामीणों ने कहा कि वे स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसके लिए बंजर या गैर-कृषि भूमि का चयन किया जाना चाहिए। उनका सवाल है कि जब राज्य में अन्य वैकल्पिक जमीन उपलब्ध है, तो फिर उपजाऊ खेतों को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है। खेतो और नदी के रास्ते मोरहाबादी पहुंचे रोक के बावजूद प्रदर्शनकारियों का उत्साह कम नहीं हुआ। कई ग्रामीण खेतों और नदी के रास्ते होते हुए ऑक्सीजन पार्क तक पहुंचे। उनका आरोप है कि मार्च को रोकने के लिए जगह-जगह पुलिस बल तैनात किया गया था, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग आंदोलन स्थल तक पहुंचने में सफल रहे। कांके ब्लॉक में भी रोका गयाः आदिवासी संगठनों और नगड़ी जमीन बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले बड़ी संख्या में ग्रामीण, किसान और आदिवासी समाज के लोग सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों को लेकर मुख्यमंत्री आवास तक पैदल मार्च शुरू किया, लेकिन प्रशासन ने उन्हें कांके के ब्लॉक चौक के पास रोक दिया। आंदोलन में शामिल लोगों का कहना है कि यह सिर्फ जमीन का नहीं बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति और भविष्य का सवाल है। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट कहा कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर किसानों की उपजाऊ जमीन को खत्म करना स्वीकार नहीं करेंगे। प्रदर्शनकारियों को प्रशासन ने रोका प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बड़ी संख्या में पुरुषों, महिलाओं और युवाओं ने रैली में भाग लिया. मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को प्रशासन ने कांके ब्लॉक चौक के समीप बैरिकेडिंग लगाकर रोक दिया। इसके बाद रैली को कांके प्रखंड कार्यालय की ओर डायवर्ट करने का प्रयास किया गया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।