Sanatan Dharma

Devotee offering prayers to a spiritual guru during Guru Purnima, symbolizing the sacred tradition of Guru Mantra and devotion.
Guru Purnima 2026: गुरु मंत्र को क्यों रखा जाता है अत्यंत गोपनीय? जानिए शास्त्रों में बताए गए आध्यात्मिक नियम और इसका महत्व

गुरु पूर्णिमा भारतीय सनातन परंपरा का एक अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गुरु ही शिष्य को अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं और आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। शास्त्रों के अनुसार, जिस व्यक्ति पर आपकी पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा हो, उसी को अपना गुरु बनाना चाहिए। एक बार गुरु से दीक्षा और गुरु मंत्र प्राप्त होने के बाद शिष्य का कर्तव्य है कि वह गुरु की आज्ञा का पालन करे, उनके बताए मार्ग पर चले और गुरु मंत्र को सदैव गोपनीय रखे। गुरु मंत्र को गोपनीय रखने की परंपरा क्यों है? धर्मग्रंथों में गुरु मंत्र को अत्यंत गोपनीय रखने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि गुरु द्वारा दिया गया मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं होता, बल्कि वह आध्यात्मिक ऊर्जा और साधना का माध्यम होता है। शास्त्रों के अनुसार, गुरु मंत्र की शक्ति तभी प्रभावी होती है जब साधक उसका नियमित और निष्ठापूर्वक जप करता है तथा उसे अनावश्यक रूप से दूसरों के सामने प्रकट नहीं करता। प्रकृति भी देती है यही संदेश धार्मिक व्याख्याओं में गुरु मंत्र की तुलना प्रकृति के नियमों से की गई है। जैसे— बीज मिट्टी के भीतर छिपकर ही विशाल वृक्ष बनता है। गर्भ में पल रहा जीवन पूर्ण विकसित होने तक सुरक्षित और गोपनीय रहता है। संचित ऊर्जा समय आने पर सबसे अधिक प्रभावशाली रूप में प्रकट होती है। उसी प्रकार गुरु मंत्र भी साधक के अंतर्मन में मौन रूप से विकसित होने वाली आध्यात्मिक शक्ति माना जाता है। इसलिए इसे गोपनीय रखने की परंपरा बनाई गई है। गुरु मंत्र सार्वजनिक करने से क्या माना जाता है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि साधक बार-बार अपने गुरु मंत्र की चर्चा करता है, तो उसका ध्यान साधना से हटकर दूसरों की प्रतिक्रिया, प्रशंसा, शंका या तुलना की ओर जा सकता है। ऐसी स्थिति में साधना का केंद्र भीतर की बजाय बाहर हो जाता है, जिससे आध्यात्मिक एकाग्रता प्रभावित हो सकती है। इसी कारण गुरु मंत्र को निजी साधना का विषय माना गया है। शास्त्रों में क्या कहा गया है? धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि व्यक्ति के कल्याण के लिए कुछ बातों को सदैव गोपनीय रखना चाहिए और उनमें गुरु मंत्र प्रमुख है। मान्यता के अनुसार— गुरु मंत्र किसी भी व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए। परिवार, मित्र या परिचितों के बीच भी इसे साझा नहीं करना चाहिए। गुरु द्वारा दी गई मंत्र-जप की विशेष विधि भी गोपनीय रखनी चाहिए। गुरु के निर्देशों का श्रद्धापूर्वक पालन करना ही शिष्य का धर्म माना गया है। पति-पत्नी को भी गुरु मंत्र साझा न करने की सलाह परंपरागत धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि पति ने गुरु मंत्र प्राप्त किया है तो उसे अपनी पत्नी को भी वह मंत्र नहीं बताना चाहिए। इसी प्रकार यदि पत्नी ने गुरु मंत्र प्राप्त किया है तो उसे भी अपने पति के साथ मंत्र साझा नहीं करना चाहिए। इसी कारण कई परंपराओं में पति-पत्नी एक साथ गुरु से मंत्र दीक्षा ग्रहण करते हैं, ताकि दोनों अपनी-अपनी साधना गुरु के निर्देशानुसार कर सकें। एक गुरु और एक मंत्र पर निष्ठा का महत्व धार्मिक ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि जिस प्रकार पूर्ण श्रद्धा के साथ किसी एक आराध्य की उपासना करने से साधक को आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है, उसी प्रकार एक गुरु से प्राप्त गुरु मंत्र का नियमित जप और गुरु के प्रति अटूट निष्ठा साधना को सफल बनाने का माध्यम माना गया है।  

surbhi जुलाई 1, 2026 0
Devotees worshipping Lord Vishnu during Nirjala Ekadashi with kalash, tulsi leaves and traditional rituals
निर्जला एकादशी 2026: व्रत पारण का शुभ समय, संपूर्ण विधि और पद्म पुराण में बताए गए नियम

नई दिल्ली: सनातन धर्म में निर्जला एकादशी का व्रत सबसे महत्वपूर्ण और पुण्यदायी एकादशी व्रतों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने से वर्षभर की सभी एकादशियों के व्रत के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। यही कारण है कि इसे अत्यंत विशेष स्थान दिया गया है। पद्म पुराण और धर्मशास्त्रों में भी इस व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि महाभारत काल में भीमसेन ने इसी व्रत का पालन किया था। व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए द्वादशी तिथि पर विधिपूर्वक पारण करना आवश्यक माना गया है। निर्जला एकादशी व्रत पारण का शुभ समय धार्मिक पंचांग के अनुसार, निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। वहीं व्रत का पारण 26 जून 2026, शुक्रवार को द्वादशी तिथि में किया जाएगा। व्रत पारण का शुभ समय: सुबह 5:41 बजे से 8:25 बजे तक धर्मशास्त्रों के अनुसार द्वादशी तिथि में निर्धारित समय पर व्रत खोलना शुभ माना जाता है। समय पर पारण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। क्यों खास है निर्जला एकादशी? मान्यता है कि जो व्यक्ति सभी एकादशी व्रत नहीं कर पाता, वह श्रद्धा और नियमपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत रखकर वर्षभर की सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त कर सकता है। इस दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की उपासना की जाती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यह व्रत पापों का नाश करने वाला, सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला और मोक्षदायक माना गया है। पद्म पुराण के अनुसार व्रत पारण की संपूर्ण विधि 1. प्रातःकाल स्नान और शुद्धि द्वादशी तिथि के दिन ब्रह्म मुहूर्त या सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 2. भगवान विष्णु की पूजा स्नान के बाद भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करें। पूजा में गंध, धूप, दीप, पुष्प और सुंदर वस्त्र अर्पित करें। 3. जल कलश का संकल्प पद्म पुराण में जल से भरे घड़े के दान का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा के समय जल से भरे कलश का संकल्प करें। 4. मंत्र का उच्चारण जल के घड़े का संकल्प करते समय यह मंत्र बोलें— "देवदेव हृषीकेश संसारार्णवतारक। उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥" अर्थ: हे संसार सागर से पार लगाने वाले भगवान हृषीकेश! इस जलघट के दान से मुझे परम गति प्रदान करें। 5. दान और ब्राह्मण भोजन पूजन के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं तथा यथाशक्ति दान-दक्षिणा दें। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे व्रत का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। 6. व्रत पारण ब्राह्मण भोजन और पूजा के पश्चात स्वयं व्रत का पारण करें। परंपरा के अनुसार व्रत सबसे पहले जल और तुलसी दल ग्रहण करके खोला जाता है। इसके बाद सात्विक भोजन करना शुभ माना जाता है। व्रत करने से क्या मिलता है फल? पद्म पुराण के अनुसार विधिपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत और द्वादशी पर पारण करने वाला व्यक्ति पापों से मुक्ति प्राप्त करता है। साथ ही उसे भगवान विष्णु का आशीर्वाद, सुख-समृद्धि, पारिवारिक खुशहाली और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।  

surbhi जून 25, 2026 0
Devotees worship Lord Vishnu during Nirjala Ekadashi with lamps, tulsi leaves, and traditional offerings.
Nirjala Ekadashi 2026: कब है निर्जला एकादशी? जानिए क्यों इस एक व्रत से मिलता है पूरे साल की 24 एकादशियों का पुण्य

Nirjala Ekadashi 2026 Date: हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे पूरे वर्ष की 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है और व्रती पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर उपवास रखते हैं। इसलिए इसे सबसे कठिन और सबसे फलदायी एकादशी भी कहा जाता है। कब है निर्जला एकादशी 2026? पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 24 जून 2026, बुधवार को शाम 6:13 बजे से होगा और इसका समापन 25 जून 2026, गुरुवार को शाम 8:10 बजे पर होगा। उदया तिथि के आधार पर निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। तिथि समय एकादशी तिथि प्रारंभ 24 जून 2026, शाम 6:13 बजे एकादशी तिथि समाप्त 25 जून 2026, शाम 8:10 बजे निर्जला एकादशी व्रत 25 जून 2026, गुरुवार क्यों माना जाता है निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ? शास्त्रों के अनुसार, निर्जला एकादशी का महत्व अत्यंत विशेष है। पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है कि इस दिन बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु का स्मरण और उपवास करने से मनुष्य को बड़े से बड़े पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। इस दिन किए गए स्नान, दान, जप और पूजा का फल अक्षय माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत से मेरु पर्वत के समान बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। भीमसेनी एकादशी क्यों कहलाती है? निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों में से भीमसेन अपनी प्रबल भूख के कारण नियमित व्रत नहीं रख पाते थे। तब उन्होंने महर्षि वेदव्यास से ऐसा उपाय पूछा, जिससे उन्हें सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो सके। महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी पर निर्जल रहकर व्रत करने का उपदेश दिया। भीमसेन ने इस कठिन व्रत का पालन किया और उन्हें वर्षभर की सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त हुआ। तभी से इसे भीमसेनी एकादशी कहा जाने लगा। क्यों मिलता है 24 एकादशियों के बराबर फल? धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो लोग पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का व्रत करने में सक्षम नहीं होते, उनके लिए निर्जला एकादशी विशेष महत्व रखती है। कहा जाता है कि केवल इस एक व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से वर्षभर में आने वाली सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है। निर्जला एकादशी व्रत की विधि प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन करें। पीले वस्त्र, तुलसी दल, फल और पंचामृत अर्पित करें। दिनभर अन्न और जल का त्याग कर उपवास रखें। विष्णु मंत्र और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। जरूरतमंदों को दान करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक व्रत का पारण करें।

surbhi जून 23, 2026 0
Tulsi leaves and Gangajal offered during Hindu last rites as described in Garuda Purana
गरुड़ पुराण: मृत्यु के समय मुंह में तुलसी और गंगाजल क्यों डाला जाता है? जानिए इसका आध्यात्मिक रहस्य

हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 संस्कारों का वर्णन मिलता है। इनमें अंतिम संस्कार को अंत्येष्टि संस्कार कहा जाता है। मृत्यु के समय व्यक्ति के मुख में तुलसी का पत्ता और गंगाजल डालने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। गरुड़ पुराण में इस परंपरा के पीछे गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक कारण बताए गए हैं। मृत्यु के समय तुलसी का पत्ता रखने का महत्व गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु निकट होती है तो उसकी आत्मा शरीर छोड़ने की तैयारी करती है। मान्यता है कि उस समय यमदूत जीवात्मा को लेने आते हैं, जिससे आत्मा भयभीत हो सकती है। शास्त्रों में तुलसी को भगवान विष्णु की अत्यंत प्रिय माना गया है और इसे ‘हरिप्रिया’ कहा जाता है। माना जाता है कि मृत्यु के समय यदि व्यक्ति के मुख, सिर या छाती पर तुलसी का पत्ता रखा जाए तो यमदूत उसके पास नहीं आते। इसके बजाय भगवान विष्णु के दूत उसकी आत्मा का मार्गदर्शन करते हैं और उसे शुभ लोकों की ओर ले जाते हैं। गंगाजल को क्यों माना गया है मोक्षदायी? सनातन परंपरा में गंगा नदी को केवल जलधारा नहीं, बल्कि मां गंगा का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गंगाजल अत्यंत पवित्र होता है और यह व्यक्ति के पापों का नाश करने वाला माना गया है। गरुड़ पुराण में वर्णन मिलता है कि यदि मृत्यु के समय गंगाजल की कुछ बूंदें व्यक्ति के कंठ से नीचे उतर जाएं तो उसके जीवनभर के अनेक पापों का क्षय होता है। ऐसा माना जाता है कि इससे आत्मा को सांसारिक बंधनों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। यमलोक की यातनाओं से मुक्ति की मान्यता धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी और गंगाजल का स्पर्श आत्मा को शांति प्रदान करता है। यह माना जाता है कि इनके प्रभाव से आत्मा को यमलोक की कठोर यातनाओं का सामना नहीं करना पड़ता और उसे शुभ गति प्राप्त होती है। शास्त्रों में वर्णित श्लोक गरुड़ पुराण में इस परंपरा के महत्व को दर्शाते हुए एक प्रसिद्ध श्लोक का उल्लेख मिलता है— तुलसीदलयुक्तं जलं यो पिबेत् मरणे काले। स गच्छति परं धाम यत्र न म्रियते पुनः।। अर्थ: जो व्यक्ति मृत्यु के समय तुलसी युक्त जल का सेवन करता है, वह परम धाम को प्राप्त करता है, जहां पहुंचने के बाद उसे पुनः जन्म और मृत्यु के चक्र में नहीं आना पड़ता। धार्मिक आस्था और परंपरा का संगम तुलसी और गंगाजल से जुड़ी यह परंपरा हिंदू धर्म में आस्था, श्रद्धा और मोक्ष की अवधारणा से गहराई से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि आज भी अधिकांश हिंदू परिवार मृत्यु के अंतिम क्षणों में अपने प्रियजनों को तुलसी और गंगाजल अर्पित करते हैं, ताकि उनकी आत्मा को शांति और शुभ गति प्राप्त हो सके।  

surbhi जून 16, 2026 0
Devotees worshipping Lord Rama, Lakshmana and Goddess Sita on Adhik Ram Lakshman Dwadashi.
अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी कब है? जानें सही तिथि, पूजा विधि और धार्मिक महत्व

सनातन धर्म में अधिक मास यानी पुरुषोत्तम मास का विशेष महत्व माना गया है। यह पवित्र मास लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है और इसमें किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल अक्षय माना जाता है। ज्येष्ठ अधिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाने वाली अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी इस वर्ष 12 जून 2026 को पड़ रही है। इस बार यह तिथि कई शुभ योगों के साथ आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और उन्मीलिनी महाद्वादशी का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे इस व्रत और पूजा का महत्व और भी बढ़ गया है। भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता की होती है विशेष पूजा अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी के दिन भगवान श्रीराम, उनके अनुज लक्ष्मण जी और माता सीता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह पर्व भाईचारे, पारिवारिक प्रेम और धर्म के आदर्श मूल्यों का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और सच्चे मन से इस व्रत को करने वाले भक्तों के जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। 'चंपक द्वादशी' के नाम से भी प्रसिद्ध है यह पर्व अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी को "चंपक द्वादशी" भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु, श्रीराम या श्रीकृष्ण को चंपा के फूल अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा विधि प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। सूर्य देव को अर्घ्य देकर व्रत का संकल्प लें। एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। भगवान को पीले या सफेद वस्त्र, चंदन और चंपा के फूल अर्पित करें। मौसमी फल और सात्विक मिठाई का भोग लगाएं। दीपक और धूप जलाकर रामलक्ष्मण द्वादशी व्रत कथा का पाठ करें। श्रीराम के मंत्रों का जाप करें और अंत में आरती करके पूजा संपन्न करें। अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी का धार्मिक महत्व रुके हुए कार्यों में मिलती है सफलता मान्यता है कि इस दिन श्रीराम और लक्ष्मण जी की पूजा करने से लंबे समय से रुके हुए कार्यों में सफलता मिलने लगती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। परिवार में बढ़ता है प्रेम और सौहार्द यह पर्व भगवान राम और लक्ष्मण के आदर्श भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। इस दिन पूजा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और भाइयों के बीच प्रेम और विश्वास मजबूत होता है। अक्षय पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति पुरुषोत्तम मास में किए गए दान-पुण्य का फल कभी समाप्त नहीं होता। इस दिन अन्न, वस्त्र या धन का दान करने से दरिद्रता दूर होने की मान्यता है और साधक के लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। श्रद्धा और भक्ति का विशेष दिन अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के आदर्शों और पारिवारिक मूल्यों को जीवन में अपनाने का संदेश भी देती है। इस पावन अवसर पर श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई पूजा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और सुख-समृद्धि लाने वाली मानी जाती है।  

surbhi जून 9, 2026 0
Newly inaugurated Sri Ganesha Hindu Temple in Berlin after 21 years of construction and community efforts.
21 साल की तपस्या पूरी: बर्लिन में भव्य श्री गणेश हिंदू मंदिर के खुले द्वार

  जर्मनी की राजधानी बर्लिन में 21 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद श्री गणेश हिंदू मंदिर का भव्य उद्घाटन हो गया। प्राण प्रतिष्ठा और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मंदिर को श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। यह मंदिर न केवल प्रवासी भारतीयों की आस्था का केंद्र बनेगा, बल्कि भारतीय संस्कृति और जर्मन समाज के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण मंच भी साबित होगा। प्रवासी भारतीयों के लिए बना सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र उद्घाटन समारोह में शामिल श्रद्धालुओं ने कहा कि यह मंदिर जर्मनी में रहने वाले भारतीयों, छात्रों, आईटी पेशेवरों और नए प्रवासियों के लिए एक महत्वपूर्ण मिलन स्थल बनेगा। मंदिर में धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ संगीत, नृत्य, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामुदायिक आयोजन भी आयोजित किए जाएंगे, जिससे विभिन्न समुदायों के बीच आपसी जुड़ाव बढ़ेगा। श्रद्धा और दान से साकार हुआ 21 वर्षों का सपना श्री गणेश हिंदू मंदिर की स्थापना 24 सितंबर 2005 को की गई थी। इसके बाद मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हुआ, जो करीब दो दशक तक चलता रहा। आखिरकार 7 जून 2026 को प्राण प्रतिष्ठा समारोह के साथ मंदिर का औपचारिक उद्घाटन किया गया। मंदिर निर्माण पूरी तरह श्रद्धालुओं के दान, सेवा और सामुदायिक सहयोग से संभव हो पाया। यही कारण है कि इसे प्रवासी हिंदू समाज की सामूहिक आस्था और समर्पण का प्रतीक माना जा रहा है। गंगा और बर्लिन के जल से हुआ विशेष अभिषेक मंदिर उद्घाटन से पहले 3 से 7 जून तक पांच दिवसीय धार्मिक महोत्सव आयोजित किया गया। इस समारोह का सबसे विशेष क्षण तब आया, जब गंगा नदी और बर्लिन से लाए गए जल से मंदिर के 17 मीटर ऊंचे विमानम (शिखर) का अभिषेक किया गया। क्रेन की सहायता से शिखर पर जल चढ़ाकर पारंपरिक वैदिक विधि से अनुष्ठान सम्पन्न किया गया। इस अनूठे आयोजन ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और स्थानीय संस्कृति के संगम का संदेश दिया। यूरोप के प्रमुख हिंदू मंदिरों में शामिल आज यह मंदिर यूरोप के बड़े हिंदू मंदिरों में गिना जाता है। मंदिर का संचालन 10 स्वयंसेवी बोर्ड सदस्यों और तीन पुजारियों द्वारा किया जाता है। जर्मनी के कर विभाग ने इसे आधिकारिक रूप से एक पंजीकृत गैर-लाभकारी संस्था का दर्जा दिया है, जिससे धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों को संस्थागत आधार मिला है। सभी हिंदू परंपराओं के लिए खुले हैं द्वार बर्लिन के हाजेनहाइड क्षेत्र में स्थित यह मंदिर प्रतिदिन श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है। यहां नियमित रूप से सुबह और शाम आरती आयोजित की जाती है। मंदिर प्रबंधन के अनुसार, यह किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं है। वैष्णव, शैव, शाक्त और स्मार्ट सहित सभी हिंदू परंपराओं के अनुयायी यहां पूजा-अर्चना कर सकते हैं। इसके अलावा स्थानीय जर्मन नागरिक, छात्र, शोधार्थी और विभिन्न धर्मों के लोग भी मंदिर में स्वागत योग्य हैं। तमिलनाडु के पत्थरों से बनी अनूठी वास्तुकला मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारतीय शैली पर आधारित है। वर्ष 2015 में इसके भव्य गोपुरम का निर्माण शुरू हुआ था। तमिलनाडु से मंगाए गए काले ग्रेनाइट पत्थरों को भारतीय शिल्पकारों ने हाथों से तराशकर मंदिर को विशिष्ट पहचान दी। आज यह विशाल गोपुरम बर्लिन के सांस्कृतिक परिदृश्य का एक नया प्रतीक बन चुका है और दूर से ही श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करता है। जर्मनी में हिंदू उपस्थिति को मिली नई पहचान श्री गणेश हिंदू मंदिर का उद्घाटन जर्मनी में भारतीय और हिंदू समुदाय की बढ़ती उपस्थिति का प्रतीक माना जा रहा है। इससे पहले 2014 में बर्लिन के ब्रिट्ज क्षेत्र में भगवान मुरुगन को समर्पित मंदिर की स्थापना हुई थी। अब श्री गणेश मंदिर के खुलने के साथ बर्लिन में हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को एक नया आयाम मिलने की उम्मीद है।  

Deepshikha जून 8, 2026 0
Devotee chanting Gayatri Mantra during morning prayer with rosary and rising sun
गायत्री मंत्र का अर्थ, जप का सही समय और जरूरी नियम, जानें क्यों माना जाता है इसे सबसे प्रभावशाली मंत्र

सनातन धर्म में गायत्री मंत्र को अत्यंत पवित्र, शक्तिशाली और कल्याणकारी मंत्रों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप करने से मन को शांति मिलती है, बुद्धि का विकास होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, इस मंत्र के जप के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना भी आवश्यक माना गया है। गायत्री मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।। गायत्री मंत्र का अर्थ गायत्री मंत्र का अर्थ है— "हम उस परम प्रकाशमान, सर्वशक्तिमान और दिव्य परमात्मा के तेज का ध्यान करते हैं। वह परम तेज हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे और हमें सत्य तथा सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करे।" यह मंत्र ज्ञान, विवेक और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक माना जाता है। गायत्री मंत्र जप का सही समय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गायत्री मंत्र का जप विशेष रूप से इन समयों में शुभ माना जाता है— सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय के समय सूर्यास्त के बाद संध्या काल में मान्यता है कि इन समयों में वातावरण अपेक्षाकृत शांत और सात्विक होता है, जिससे ध्यान और मंत्र जप में एकाग्रता बढ़ती है। गायत्री मंत्र जप के प्रमुख नियम 1. स्वच्छता का रखें विशेष ध्यान मंत्र जप से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। शारीरिक और मानसिक पवित्रता पर विशेष बल दिया जाता है। 2. शांत स्थान का चयन करें जप के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करें जहां शांति हो और ध्यान भंग न हो। मंत्र जप शुरू करने से पहले माता गायत्री का स्मरण और ध्यान करें। 3. रुद्राक्ष की माला का प्रयोग परंपरागत मान्यताओं के अनुसार गायत्री मंत्र के जप के लिए रुद्राक्ष की माला का उपयोग शुभ माना जाता है। 4. 108 बार जप का महत्व एक माला में 108 मनके होते हैं। इसलिए कम से कम 108 बार मंत्र जप करना शुभ माना जाता है। 5. सकारात्मक भाव रखें मंत्र जप करते समय मन में सकारात्मक विचार और शुभ संकल्प रखना चाहिए। मान्यता है कि श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किया गया जप अधिक फलदायी माना जाता है। 6. संध्या से पहले जप करते समय मौन रहें कुछ धार्मिक परंपराओं में माना जाता है कि यदि सूर्यास्त से पहले जप किया जाए तो यथासंभव मौन रहकर जप करना चाहिए। क्या कोई भी कर सकता है गायत्री मंत्र का जप? इस विषय में विभिन्न धार्मिक परंपराओं और मतों में अलग-अलग विचार मिलते हैं। कई परंपराएं मानती हैं कि गायत्री मंत्र का जप गुरु से दीक्षा लेकर करना चाहिए और गुरु द्वारा बताए गए नियमों का पालन करना चाहिए। वहीं कई आधुनिक आध्यात्मिक संस्थाएं श्रद्धा और उचित उच्चारण के साथ सभी लोगों को गायत्री मंत्र जप की अनुमति देती हैं। यदि आप किसी विशेष धार्मिक परंपरा का पालन करते हैं, तो अपने गुरु या आध्यात्मिक मार्गदर्शक से परामर्श लेना उचित रहेगा। गायत्री मंत्र जप के बताए गए लाभ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नियमित गायत्री मंत्र जप से— मानसिक शांति प्राप्त होती है। एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है। सकारात्मक सोच विकसित होती है। आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। निर्णय लेने की क्षमता बेहतर हो सकती है। विद्यार्थियों को अध्ययन में लाभ मिलने की मान्यता है। हालांकि इन लाभों को धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।  

surbhi जून 4, 2026 0
Goddess Mahakali in her fierce form standing over Lord Shiva after slaying the demon Raktabija
महाकाली की कथा: जब भगवान शिव ने मां काली के प्रचंड क्रोध को किया शांत

रक्तबीज के आतंक से कांप उठे थे तीनों लोक हिंदू धर्म में काली को आदिशक्ति का सबसे उग्र और शक्तिशाली स्वरूप माना जाता है। वह दुष्ट शक्तियों के विनाश और धर्म की रक्षा के लिए जानी जाती हैं। उनकी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा रक्तबीज नामक राक्षस के वध और उसके बाद शांत हुए उनके प्रचंड क्रोध से जुड़ी है। मान्यता है कि रक्तबीज ने कठोर तपस्या करके भगवान ब्रह्मा से ऐसा वरदान प्राप्त किया था कि उसके रक्त की हर बूंद से उसके जैसा ही एक नया दैत्य पैदा हो जाता था। इस वरदान के बल पर उसने देवताओं, ऋषियों और समस्त प्राणियों को परेशान करना शुरू कर दिया। देवताओं की पुकार पर प्रकट हुईं महाकाली जब देवता रक्तबीज का सामना करने में असफल हो गए, तब उन्होंने आदिशक्ति से सहायता की प्रार्थना की। देवताओं की विनती सुनकर देवी दुर्गा ने अपना विकराल और उग्र स्वरूप धारण किया, जिसे महाकाली कहा जाता है। महाकाली का स्वरूप अत्यंत भयावह बताया गया है। उनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र, गले में मुंडमाला और बाहर निकली हुई लंबी जिह्वा उनके रौद्र रूप का प्रतीक मानी जाती है। हालांकि यह रूप दुष्टों के लिए विनाशकारी और भक्तों के लिए रक्षक माना जाता है। कैसे हुआ रक्तबीज का अंत? युद्ध के दौरान जब भी रक्तबीज घायल होता, उसके शरीर से गिरने वाली रक्त की बूंदों से हजारों नए राक्षस पैदा हो जाते। इससे युद्ध लगातार कठिन होता जा रहा था। तब महाकाली ने अपनी विशाल जिह्वा फैला दी और रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को धरती पर गिरने से पहले ही ग्रहण करना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप रक्त की एक भी बूंद भूमि पर नहीं गिर सकी और नए राक्षसों का जन्म रुक गया। अंततः मां काली ने रक्तबीज का वध कर तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त कराया। रक्तबीज वध के बाद भी शांत नहीं हुआ क्रोध रक्तबीज के संहार के बाद भी मां काली का रौद्र रूप शांत नहीं हुआ। उनका क्रोध इतना प्रचंड था कि संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई। देवताओं को भय होने लगा कि यदि यह क्रोध जारी रहा तो ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ सकता है। तब सभी देवता सहायता के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे। जब भगवान शिव मां काली के चरणों में लेट गए देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव ने मां काली को शांत करने का प्रयास किया, लेकिन उनका क्रोध कम नहीं हुआ। आखिरकार भगवान शिव स्वयं मां काली के मार्ग में लेट गए। युद्ध के उन्माद में आगे बढ़ती मां काली का पैर जैसे ही शिवजी के वक्षस्थल पर पड़ा, वे अचानक ठहर गईं। अपने आराध्य पति को अपने चरणों के नीचे देखकर उन्हें अपनी स्थिति का एहसास हुआ। उसी क्षण उनका क्रोध शांत हो गया और उन्होंने अपना उग्र रूप त्याग दिया। इसी घटना के कारण मां काली की कई प्रतिमाओं में उन्हें भगवान शिव के ऊपर खड़े हुए दिखाया जाता है। क्या संदेश देती है यह कथा? यह पौराणिक कथा केवल एक धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि शक्ति और संतुलन का प्रतीक भी मानी जाती है। मां काली धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं, जबकि भगवान शिव उस शक्ति के नियंत्रण और संतुलन का। यह कथा बताती है कि शक्ति चाहे कितनी भी महान क्यों न हो, उसका संयम और संतुलन भी उतना ही आवश्यक है। नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में कथा के विवरण में कुछ भिन्नताएं मिल सकती हैं।  

surbhi जून 2, 2026 0
Sacred banyan leaves placed near a Hindu temple during traditional religious rituals and worship
बरगद का पत्ता किन देवी-देवताओं को नहीं चढ़ाना चाहिए? जानिए धार्मिक मान्यताएं और पूजा के नियम

पूजा में हर वस्तु का होता है विशेष महत्व सनातन धर्म में पूजा-पाठ के दौरान इस्तेमाल होने वाली प्रत्येक वस्तु का अपना धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। अलग-अलग देवी-देवताओं की प्रिय सामग्री भी अलग होती है। इसी कारण कुछ वस्तुएं कुछ देवताओं को अर्पित की जाती हैं, जबकि कुछ वस्तुओं का उपयोग वर्जित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद (वट वृक्ष) का पत्ता कुछ देवी-देवताओं की पूजा में अर्पित नहीं किया जाता। आइए जानते हैं इसके पीछे की मान्यताएं। भगवान विष्णु को क्यों नहीं चढ़ाया जाता बरगद का पत्ता? Lord Vishnu की पूजा में तुलसी दल का विशेष महत्व माना गया है। तुलसी को भक्ति, पवित्रता और सात्विकता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद का वृक्ष तप, वैराग्य और स्थिरता का प्रतीक है, जबकि भगवान विष्णु को कोमल और सात्विक अर्पण अधिक प्रिय माने जाते हैं। इसी कारण उनकी पूजा में बरगद के पत्ते चढ़ाने की परंपरा नहीं है। मां लक्ष्मी की पूजा में क्यों माना जाता है वर्जित? Goddess Lakshmi धन, वैभव और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद का वृक्ष स्थायित्व, तपस्या और मोक्ष का प्रतीक माना जाता है। गृहस्थ जीवन में लक्ष्मी पूजा के दौरान कमल, गुलाब और अन्य शुभ पुष्पों का प्रयोग अधिक शुभ माना जाता है। इसलिए मां लक्ष्मी को बरगद का पत्ता अर्पित करने की परंपरा नहीं है। गणेश जी की पूजा में भी नहीं होता उपयोग Lord Ganesha की पूजा में दूर्वा, मोदक और लाल पुष्पों का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश जी को ऐसी वस्तुएं अर्पित की जाती हैं जो मंगल, सौभाग्य और शुभता का प्रतीक हों। बरगद का पत्ता वैराग्य और कठोर तपस्या से जुड़ा माना जाता है, इसलिए इसे गणेश पूजा में उपयोग नहीं किया जाता। बरगद के वृक्ष का धार्मिक महत्व हालांकि कुछ देवताओं की पूजा में बरगद का पत्ता अर्पित नहीं किया जाता, लेकिन वट वृक्ष स्वयं हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है। Vat Savitri Vrat और वट पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों में बरगद के वृक्ष की विशेष पूजा की जाती है। इसे दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। पूजा करते समय रखें इन बातों का ध्यान देवी-देवताओं की प्रिय और वर्जित वस्तुओं की जानकारी रखें। ताजे और स्वच्छ फूल-पत्तियों का ही उपयोग करें। श्रद्धा और विधि-विधान के साथ पूजा करें। पूजा सामग्री का चयन धार्मिक परंपराओं के अनुसार करें। धार्मिक मान्यता क्या कहती है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा में बरगद का पत्ता अर्पित नहीं किया जाता। माना जाता है कि प्रत्येक देवता की प्रिय सामग्री अलग होती है और उसी के अनुरूप पूजा करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। नोट: यह जानकारी प्रचलित धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं में मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं।  

surbhi जून 2, 2026 0
Devotees worshipping Lord Vishnu on Padmini Ekadashi with flowers, Tulsi leaves and traditional offerings
पद्मिनी एकादशी 2026: कल है भगवान विष्णु की विशेष पूजा, अभी नोट कर लें संपूर्ण पूजा सामग्री और विधि

Padmini Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में पद्मिनी एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और इसे कमला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष पद्मिनी एकादशी का व्रत 27 मई 2026, बुधवार को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने से पापों का नाश होता है तथा साधक को यज्ञ और कठोर तपस्या के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। पद्मिनी एकादशी 2026 का शुभ मुहूर्त एकादशी तिथि प्रारंभ: 26 मई 2026, सुबह 5:10 बजे एकादशी तिथि समाप्त: 27 मई 2026, सुबह 6:21 बजे व्रत रखने की तिथि (उदयातिथि): 27 मई 2026, बुधवार पारण का समय: 28 मई 2026, सुबह 5:25 बजे से 7:56 बजे तक पूजा के लिए जरूरी सामग्री यदि आप पद्मिनी एकादशी का व्रत करने जा रहे हैं तो पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें -  भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर लकड़ी की चौकी पीला वस्त्र गंगाजल दूध दही घी शहद देसी घी का दीपक धूपबत्ती अगरबत्ती कपूर पीला चंदन कुमकुम हल्दी अक्षत (चावल) ताजे फूल तुलसी दल मौसमी फल मिठाई या प्रसाद पद्मिनी एकादशी पूजा विधि पद्मिनी एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान की सफाई कर गंगाजल का छिड़काव करें। इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत और पूजा का संकल्प लें। चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। फिर जल, दूध और गंगाजल से भगवान का अभिषेक करें। इसके बाद चंदन, अक्षत, फूल और तुलसी दल अर्पित करें। पूजा के दौरान धूप, दीप और अगरबत्ती जलाएं तथा भगवान विष्णु को फल और मिठाई का भोग लगाएं। इसके पश्चात विष्णु मंत्रों का जाप करें, पद्मिनी एकादशी व्रत कथा सुनें या पढ़ें और विष्णु चालीसा का पाठ करें। अंत में कपूर या दीपक से भगवान की आरती करें। व्रत पारण कब करें? एकादशी व्रत का पारण अगले दिन यानी 28 मई 2026 को स्नान और पूजा के बाद निर्धारित शुभ मुहूर्त में करना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सही समय पर पारण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है। पद्मिनी एकादशी का महत्व धार्मिक ग्रंथों में पद्मिनी एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति करने से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का आगमन होता है। साथ ही व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त होता है।  

surbhi मई 26, 2026 0
Devotees offering prayers to River Ganga during Ganga Saptami and Ganga Dussehra celebrations
गंगा दशहरा और गंगा सप्तमी को एक समझने की भूल न करें, जानिए दोनों पर्वों में क्या है बड़ा अंतर

Ganga Dussehra और Ganga Saptami सनातन धर्म में मां गंगा को समर्पित दो बेहद पवित्र पर्व माने जाते हैं। दोनों ही त्योहारों पर गंगा स्नान, पूजा-पाठ और दान का विशेष महत्व होता है। हालांकि, कई लोग इन दोनों पर्वों को एक ही समझ लेते हैं, जबकि इनकी तिथि, पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व पूरी तरह अलग हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार मां गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि मोक्ष प्रदान करने वाली देवी हैं। आइए जानते हैं गंगा सप्तमी और गंगा दशहरा के बीच क्या अंतर है। तिथि और समय में अंतर दोनों पर्व हिंदू पंचांग के अलग-अलग महीनों में मनाए जाते हैं। Ganga Saptami वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। Ganga Dussehra ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। गंगा सप्तमी और गंगा दशहरा का महत्व Ganga Saptami को मां गंगा का जन्मोत्सव माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन मां गंगा भगवान ब्रह्मा के कमंडल से प्रकट हुई थीं। कहा जाता है कि उन्होंने भगवान विष्णु के चरणों को पवित्र जल से धोकर स्वर्ग में स्थान प्राप्त किया था। वहीं Ganga Dussehra मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण का पर्व माना जाता है। इसी दिन मां गंगा स्वर्ग से धरती पर उतरी थीं और भगवान शिव ने उनके प्रचंड वेग को अपनी जटाओं में धारण किया था। गंगा सप्तमी से जुड़ी कथा पौराणिक कथा के अनुसार जब मां गंगा स्वर्ग से प्रवाहित हो रही थीं, तब उनके तेज बहाव से ऋषि जह्नु की कुटिया और पूजा सामग्री बह गई। इससे क्रोधित होकर ऋषि जह्नु ने पूरी गंगा नदी को पी लिया। बाद में देवताओं और राजा भगीरथ की प्रार्थना पर ऋषि जह्नु ने वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन अपने कान से गंगा को पुनः बाहर निकाला। इसी कारण इस दिन को मां गंगा का ‘दूसरा जन्म’ भी कहा जाता है। इस घटना के बाद मां गंगा को ‘जाह्नवी’ नाम मिला। गंगा दशहरा की पौराणिक कथा Ganga Dussehra का संबंध राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से जुड़ा है। मान्यता है कि राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए हजारों वर्षों तक तप किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा ने मां गंगा को पृथ्वी पर भेजने की अनुमति दी। लेकिन गंगा के तीव्र वेग को संभालना संभव नहीं था। तब भगवान शिव ने मां गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया और बाद में शांत धारा के रूप में पृथ्वी पर प्रवाहित किया। दोनों पर्वों का धार्मिक महत्व दोनों ही पर्वों पर गंगा स्नान, दान-पुण्य और पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दिनों गंगा स्नान करने से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।  

surbhi मई 23, 2026 0
Udhayanidhi Stalin speaking in Tamil Nadu Assembly during controversy over his Sanatan Dharma remarks.
उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म वाले बयान पर फिर विवाद, बीजेपी ने साधा निशाना

Udhayanidhi Stalin ने एक बार फिर सनातन धर्म को लेकर विवादित बयान दिया है। तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में अपने पहले भाषण के दौरान उन्होंने कहा कि “सनातन धर्म लोगों को बांटता है, इसलिए इसे समाप्त हो जाना चाहिए।” उनके इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। बीजेपी ने इसे हिंदू विरोधी मानसिकता बताते हुए डीएमके पर तीखा हमला बोला है। तमिल थाई वझुथु मुद्दे का भी किया जिक्र विधानसभा में अपने संबोधन के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने “तमिल थाई वझुथु” के कथित अपमान का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि तमिल संस्कृति और पहचान का सम्मान किया जाना चाहिए। हालांकि, उनके सनातन धर्म संबंधी बयान ने ज्यादा राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा की और सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस पर बहस तेज हो गई। बीजेपी बोली- जनता माफ नहीं करेगी Shehzad Poonawalla ने डीएमके और उदयनिधि स्टालिन पर तीखा हमला करते हुए कहा कि विपक्षी दल वोट बैंक की राजनीति के लिए सनातन धर्म के खिलाफ नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में चुनावी हार के बावजूद डीएमके ने कोई सबक नहीं सीखा है और पार्टी अब भी सनातन धर्म का अपमान कर रही है। पूनावाला ने कहा कि “तमिलनाडु की जनता उन्हें माफ नहीं करेगी।” 2023 में भी दिया था ऐसा ही बयान यह पहला मौका नहीं है जब उदयनिधि स्टालिन के बयान पर विवाद हुआ हो। सितंबर 2023 में भी उन्होंने सनातन धर्म की तुलना “डेंगू और मलेरिया” जैसी बीमारियों से करते हुए कहा था कि इसे खत्म कर देना चाहिए। उस बयान पर देशभर में राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ था और कई नेताओं ने उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। बीजेपी ने बताया वोट बैंक राजनीति का हिस्सा बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि विपक्षी दलों द्वारा बार-बार सनातन धर्म को निशाना बनाना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ दल धार्मिक भावनाओं को भड़काकर वोट बैंक मजबूत करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछले बयान पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की थी और इसे नफरती भाषण बताया गया था। राजनीतिक बयानबाजी से बढ़ा विवाद उदयनिधि स्टालिन के इस बयान के बाद तमिलनाडु समेत देशभर में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। बीजेपी और डीएमके के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, जबकि सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है।  

surbhi मई 13, 2026 0
Devotees offering prayers to Lord Shiva during Pradosh Vrat in May 2026
May 2026 Pradosh Vrat Calendar: मई में कब-कब रखा जाएगा प्रदोष व्रत? नोट करें सही तिथियां और मुहूर्त

हिंदू धर्म में Shiva की आराधना के लिए प्रदोष व्रत बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत हर महीने की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है और प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में पूजा का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि इस समय भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तों के सभी कष्टों का निवारण करते हैं। मई 2026 का महीना शिव भक्तों के लिए खास है, क्योंकि इस बार दोनों प्रदोष व्रत गुरुवार के दिन पड़ रहे हैं, जिससे Guru Pradosh Vrat का शुभ संयोग बन रहा है। यह संयोग विशेष रूप से ज्ञान, सौभाग्य और सफलता देने वाला माना जाता है। मई 2026 प्रदोष व्रत की तिथियां पहला प्रदोष व्रत – 14 मई 2026 (गुरु प्रदोष) पक्ष: ज्येष्ठ माह, कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 14 मई, सुबह 11:20 बजे त्रयोदशी तिथि समाप्त: 15 मई, सुबह 08:31 बजे इस दिन शाम के समय प्रदोष काल में पूजा करना सबसे फलदायी रहेगा। दूसरा प्रदोष व्रत – 28 मई 2026 (गुरु प्रदोष) पक्ष: ज्येष्ठ माह, शुक्ल पक्ष त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 28 मई, सुबह 07:56 बजे त्रयोदशी तिथि समाप्त: 29 मई, सुबह 09:50 बजे इस दिन भी सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में पूजा का विशेष महत्व है। प्रदोष व्रत का महत्व शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष व्रत के दिन Shiva कैलाश पर्वत पर आनंदित होकर नृत्य करते हैं। इस समय की गई पूजा और उपासना कई गुना अधिक फल देती है। गुरु प्रदोष व्रत के लाभ: शत्रुओं पर विजय जीवन में सुख-शांति ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि करियर और कार्यों में सफलता पूजा विधि (सरल तरीके से) अगर आप प्रदोष व्रत रख रहे हैं, तो इस विधि से पूजा कर सकते हैं: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें दिनभर फलाहार या व्रत रखें शाम को प्रदोष काल में शिव मंदिर जाएं या घर पर पूजा करें शिवलिंग का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें बेलपत्र, धतूरा, अक्षत और सफेद फूल अर्पित करें शिव चालीसा और प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें अंत में आरती करें

surbhi मई 2, 2026 0
Earthen pot filled with water kept for public service during the holy Jyeshtha month
Jyeshtha Month 2026: शुरू हुआ ज्येष्ठ माह, इस महीने करें ये एक काम–मिलेगा अक्षय पुण्य

हिंदू धर्म में ज्येष्ठ माह को तप, त्याग और सेवा का महीना माना जाता है। वर्ष 2026 में इस पवित्र माह की शुरुआत 2 मई से हो चुकी है और इसका समापन 29 जून को होगा। पंचांग के अनुसार प्रतिपदा तिथि 1 मई की रात से आरंभ हुई, लेकिन उदयातिथि के आधार पर 2 मई से ज्येष्ठ मास की गणना की जाती है। यह हिंदी कैलेंडर का तीसरा महीना है और इस दौरान सूर्य की तपिश अपने चरम पर होती है, जिससे भीषण गर्मी पड़ती है। अधिक मास का विशेष संयोग, बढ़ेगा पुण्य का प्रभाव इस बार ज्येष्ठ माह में Adhik Maas का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिसे Purushottam Maas भी कहा जाता है। यह 17 मई से 15 जून तक रहेगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस अवधि में किए गए जप, तप, दान और सेवा का फल कई गुना अधिक मिलता है। यह समय आत्मशुद्धि, भक्ति और भगवान के प्रति समर्पण का सर्वोत्तम काल माना जाता है। नौतपा: तप और सेवा की असली परीक्षा ज्येष्ठ माह में पड़ने वाला Nautapa वर्ष का सबसे गर्म समय माना जाता है। इन दिनों में सूर्य की किरणें अत्यंत प्रचंड होती हैं और तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है। इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षी भी पानी के लिए तरसते हैं पेड़-पौधों और प्रकृति पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ता है ऐसे समय में दया और सेवा का महत्व और भी बढ़ जाता है। यही कारण है कि शास्त्रों में इस माह को “सेवा का महीना” भी कहा गया है। पूजा-पाठ और धार्मिक महत्व ज्येष्ठ माह का आरंभ कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से होता है और समापन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर होता है। पूरे महीने में स्नान, दान, व्रत और पूजा-पाठ करने का विशेष महत्व बताया गया है। इस दौरान विशेष रूप से भगवान Vishnu के Vamana Avatar (त्रिविक्रम रूप) की पूजा की जाती है। मान्यता है कि: भगवान विष्णु की आराधना से जीवन के कष्ट दूर होते हैं पापों का नाश होता है व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग मिलता है सिर्फ एक काम–जल दान, मिलेगा महान फल अगर कोई व्यक्ति पूरे विधि-विधान से पूजा नहीं कर सकता, तो भी इस माह में एक बेहद सरल उपाय करके वह महान पुण्य कमा सकता है–जल दान। जल दान को ज्येष्ठ माह का सबसे बड़ा और श्रेष्ठ दान माना गया है। आप इन आसान तरीकों से इसे कर सकते हैं: प्यासे लोगों को ठंडा पानी पिलाएं घर या दुकान के बाहर मिट्टी का घड़ा (मटका) रखकर उसमें पानी भरें राहगीरों के लिए छांव और पानी की व्यवस्था करें पक्षियों के लिए छत या आंगन में पानी रखें पशुओं के लिए भी पानी की व्यवस्था करें धार्मिक मान्यता है कि इस छोटे से कार्य से भी व्यक्ति को अपार पुण्य प्राप्त होता है और भगवान की विशेष कृपा बनी रहती है। सेवा, दया और प्रकृति से जुड़ने का संदेश ज्येष्ठ माह केवल पूजा-पाठ का ही नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवों के प्रति संवेदनशीलता दिखाने का भी समय है। यह हमें सिखाता है कि दूसरों की मदद करना ही सच्ची भक्ति है सेवा और दया के जरिए ही ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है

surbhi मई 2, 2026 0
Goddess Chhinnamasta idol depicting her fierce headless form with divine energy and symbolic blood streams
छिन्नमस्ता जयंती 2026: बिना सिर वाली देवी की पूजा से मिलता है अद्भुत साहस, जानिए रहस्यमयी शक्ति का महत्व

30 अप्रैल को मनाई जाएगी छिन्नमस्ता जयंती सनातन धर्म में मां शक्ति के अनेक स्वरूपों की पूजा की जाती है। इनमें मां छिन्नमस्ता का स्वरूप सबसे रहस्यमयी, उग्र और अद्वितीय माना जाता है। दस महाविद्याओं में शामिल मां छिन्नमस्ता त्याग, आत्मबल और दिव्य शक्ति की प्रतीक हैं। उनकी साधना विशेष रूप से तांत्रिक परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। वर्ष 2026 में छिन्नमस्ता जयंती 30 अप्रैल, गुरुवार को मनाई जाएगी। यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आता है। छिन्नमस्ता जयंती 2026 का शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, चतुर्दशी तिथि 29 अप्रैल 2026 को शाम 7:51 बजे प्रारंभ होगी और 30 अप्रैल 2026 को रात 9:12 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर छिन्नमस्ता जयंती 30 अप्रैल को मनाना शुभ रहेगा। मां छिन्नमस्ता का अनोखा और रहस्यमयी स्वरूप मां छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यंत विलक्षण है। वे अपने ही कटे हुए सिर को एक हाथ में धारण करती हैं, जबकि दूसरे हाथ में तलवार रहती है। उनकी गर्दन से बहने वाली रक्त की तीन धाराएं जीवन ऊर्जा, त्याग और ब्रह्मांडीय शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। इनमें से एक धारा स्वयं देवी ग्रहण करती हैं, जबकि शेष दो उनकी सहचरियां पीती हैं। यह स्वरूप आत्मसंयम, बलिदान और शक्ति के अनंत प्रवाह का संदेश देता है। क्यों खास है मां छिन्नमस्ता की साधना? दस महाविद्याओं में मां छिन्नमस्ता को छठा स्थान प्राप्त है। उनका उग्र रूप साधकों को भय, मोह और नकारात्मकता से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। यही कारण है कि तांत्रिक, योगी, अघोरी और नाथ संप्रदाय के साधक उनकी विशेष उपासना करते हैं। यह साधना सामान्य पूजा से अलग होती है और इसमें विशेष नियमों एवं विधियों का पालन किया जाता है। मां छिन्नमस्ता की पूजा से मिलते हैं ये लाभ मन से भय और असुरक्षा की भावना दूर होती है। आत्मविश्वास और साहस में वृद्धि होती है। जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है। शारीरिक कष्टों और रोगों से राहत प्राप्त होती है। साधक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने पर जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। रजरप्पा मंदिर: मां छिन्नमस्ता का प्रमुख धाम झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित रजरप्पा मंदिर मां छिन्नमस्ता का सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यह पवित्र मंदिर रांची से लगभग 80 किलोमीटर दूर दामोदर और भैरवी नदियों के संगम पर स्थित है। तांत्रिक साधना के लिए यह स्थल विशेष महत्व रखता है। नवरात्रि और छिन्नमस्ता जयंती के अवसर पर यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। श्रद्धा और शक्ति का अद्भुत संगम मां छिन्नमस्ता केवल उग्रता की प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे आत्मबल, त्याग और जीवन ऊर्जा का साक्षात स्वरूप हैं। उनकी उपासना साधक को भयमुक्त बनाकर जीवन में सफलता और साहस प्रदान करती है। छिन्नमस्ता जयंती का पर्व शक्ति साधना के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।  

surbhi अप्रैल 29, 2026 0
Devotees worshipping Lord Vishnu during Varuthini Ekadashi with lamps and offerings.
Varuthni Ekadashi 2026: सही तिथि, महत्व और राशि अनुसार दान-पुण्य के विशेष उपाय

वैशाख मास को हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है और इसी माह में आने वाली वरुथिनी एकादशी का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पंडित आनंद भारद्वाज के अनुसार, यदि इस दिन राशि अनुसार दान-पुण्य और उपाय किए जाएं तो पूरे वर्ष लक्ष्मी-नारायण की कृपा बनी रहती है। कब है वरुथिनी एकादशी 2026? वैदिक पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 13 अप्रैल 2026 को रात 1:17 बजे से प्रारंभ होकर 14 अप्रैल 2026 को रात 1:08 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर 13 अप्रैल 2026 (सोमवार) को व्रत रखा जाएगा और पारण 14 अप्रैल को द्वादशी तिथि में किया जाएगा। क्या है इस एकादशी का महत्व? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वरुथिनी एकादशी का व्रत व्यक्ति को पापों से मुक्ति दिलाता है और जीवन में आ रही बाधाओं को दूर करता है। इस दिन किए गए दान-पुण्य का फल कई गुना बढ़कर मिलता है। राशि अनुसार करें ये खास उपाय मेष: भगवान विष्णु को लाल फूल अर्पित करें, जीवन में सुख-शांति बनी रहेगी। वृषभ: सफेद वस्तुओं का भोग लगाएं, भगवान शीघ्र प्रसन्न होंगे। मिथुन: हरे वस्त्र अर्पित करें, हर कार्य में सफलता मिलेगी। कर्क: खीर का भोग लगाएं, रुके हुए कार्य पूरे होंगे। सिंह: पीले वस्त्र अर्पित करें और स्वयं भी धारण करें, विशेष फल मिलेगा। कन्या: सफेद मिठाई और केसर चढ़ाएं, आर्थिक समस्याएं दूर होंगी। तुला: सफेद वस्तुओं का दान करें, वैवाहिक जीवन में मधुरता आएगी। वृश्चिक: गुड़ का दान करें, नौकरी और व्यापार में तरक्की होगी। धनु: पीले वस्त्र, चंदन और फल अर्पित करें, शुभ परिणाम मिलेंगे। मकर: दही और इलायची का भोग लगाएं, मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। कुंभ: पीपल के नीचे तिल के तेल का दीपक जलाएं, लक्ष्मी-नारायण की कृपा बनी रहेगी। मीन: गरीबों की सेवा करें और मिश्री का भोग लगाएं, पारिवारिक कलह दूर होगी। वरुथिनी एकादशी केवल व्रत रखने का दिन नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, दान-पुण्य और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर है। यदि इस दिन श्रद्धा और राशि अनुसार उपाय किए जाएं, तो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।  

surbhi अप्रैल 9, 2026 0
Devotees performing Kalashtami night worship of Lord Kaal Bhairav with oil lamps and offerings.
Kalashtami 2026: 9 या 10 अप्रैल? जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

अप्रैल 2026 में पड़ने वाली कालाष्टमी को लेकर लोगों के बीच काफी भ्रम बना हुआ है। कई लोग 9 अप्रैल को व्रत रखने की बात कर रहे हैं, जबकि कुछ 10 अप्रैल को। ऐसे में पंचांग के आधार पर सही तिथि और पूजा का शुभ समय जानना बेहद जरूरी है। हिंदू धर्म में हर माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी का व्रत रखा जाता है, जो भगवान शिव के उग्र स्वरूप काल भैरव को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस दिन काल भैरव का प्राकट्य हुआ था। इस व्रत को रखने और विधिपूर्वक पूजा करने से भय, नकारात्मक ऊर्जा और बाधाओं से मुक्ति मिलती है तथा जीवन में सुख-शांति आती है। सही तिथि क्या है? वैदिक पंचांग के अनुसार, वैशाख माह की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि 9 अप्रैल 2026 की रात 9:19 बजे से शुरू होकर 10 अप्रैल 2026 की रात 11:15 बजे तक रहेगी। चूंकि व्रत उदयातिथि के आधार पर रखा जाता है, इसलिए कालाष्टमी का व्रत 10 अप्रैल 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा। पूजा का शुभ मुहूर्त काल भैरव की पूजा रात में करना विशेष फलदायी माना जाता है। इस बार 10 अप्रैल को रात 9:00 बजे से 11:00 बजे तक पूजा का सबसे शुभ समय रहेगा। कालाष्टमी पूजा विधि सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। व्रत का संकल्प लें। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करें। फिर काल भैरव का अभिषेक कर उन्हें तिलक लगाएं। पूजा में काले तिल, सरसों का तेल, गुड़, काली उरद, कच्चा दूध और मीठी रोटी अर्पित करें। दीप जलाकर आरती करें और अंत में शिव चालीसा एवं भैरव चालीसा का पाठ करें। विशेष उपाय इस दिन काले कुत्ते को भोजन कराना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से काल भैरव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। (Disclaimer: यह जानकारी सामान्य धार्मिक मान्यताओं और पंचांग पर आधारित है।)  

surbhi अप्रैल 9, 2026 0
Devotee offering water to Moon during Chaitra Purnima under night sky
चैत्र पूर्णिमा 2026: आज चंद्रमा को अर्घ्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र पूर्णिमा का विशेष महत्व है। यह हिंदू नववर्ष की पहली पूर्णिमा मानी जाती है, जिसमें पूजा, व्रत, दान और स्नान का अत्यंत पुण्य फल बताया गया है। इस दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, चंद्रदेव और हनुमान जी की उपासना की जाती है। इस वर्ष 1 अप्रैल 2026 को व्रत और चंद्र पूजन किया जाएगा, जबकि 2 अप्रैल को स्नान-दान और हनुमान जयंती मनाई जाएगी। तिथि और शुभ मुहूर्त पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 1 अप्रैल 2026, सुबह 07:06 बजे पूर्णिमा तिथि समाप्त: 2 अप्रैल 2026, सुबह 07:41 बजे व्रत और चंद्र अर्घ्य: 1 अप्रैल (संध्या समय) स्नान-दान और हनुमान जयंती: 2 अप्रैल (उदयातिथि के अनुसार) शास्त्रों के अनुसार, जिस दिन पूर्णिमा की तिथि शाम और रात में रहती है, उसी दिन व्रत और चंद्रमा की पूजा करना श्रेष्ठ माना जाता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने की विधि चैत्र पूर्णिमा की शाम चंद्रोदय के समय अर्घ्य देना विशेष फलदायी माना जाता है। चांदी या तांबे के पात्र में जल लें उसमें कच्चा दूध, अक्षत (चावल), सफेद फूल और थोड़ी चीनी मिलाएं चंद्रमा को देखते हुए धीरे-धीरे जल अर्पित करें “ॐ सोमाय नमः” मंत्र का जाप करें अंत में हाथ जोड़कर सुख-समृद्धि और मानसिक शांति की कामना करें प्रमुख मंत्र ॐ सोमाय नमः ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः ॐ क्लीं सोम मंत्राय नमः ॐ नमः शशांकशेखराय नियम और सावधानियां तामसिक भोजन से बचें (लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा) क्रोध और विवाद से दूर रहें अर्घ्य के बाद सफेद वस्तुओं (चावल, चीनी, दूध, वस्त्र) का दान करें सत्यनारायण कथा का पाठ या श्रवण करें धार्मिक महत्व मान्यता है कि पूर्णिमा की रात चंद्रदेव अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होते हैं। इस दिन अर्घ्य देने से मानसिक शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होती है। साथ ही, यह दिन आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मकता को बढ़ाने वाला माना जाता है।  

surbhi अप्रैल 1, 2026 0
Lord Hanuman illustration symbolizing eight divine siddhis and immense spiritual strength
हनुमान जयंती 2026: इन 8 दिव्य सिद्धियों ने बनाया बजरंगी को ‘महाबली’

सनातन परंपरा में हनुमान जी को शक्ति, भक्ति और सेवा का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि वे अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के दाता हैं। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में उनके पराक्रम और चमत्कारिक शक्तियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, यदि इन आठ सिद्धियों में से एक भी किसी व्यक्ति को प्राप्त हो जाए, तो उसका जीवन सफल और धन्य हो जाता है। यही सिद्धियां बजरंगी को ‘महाबली’ बनाती हैं। 1. अणिमा सिद्धि इस सिद्धि के माध्यम से कोई भी व्यक्ति स्वयं को अत्यंत सूक्ष्म, यानी अणु के समान छोटा कर सकता है। हनुमान जी ने इसी शक्ति से लंका में प्रवेश किया और सुरसा के मुख से सुरक्षित बाहर निकले। 2. महिमा सिद्धि महिमा सिद्धि से शरीर का आकार विशाल किया जा सकता है। हनुमान जी ने समुद्र पार करते समय और माता सीता को आश्वस्त करने के लिए इस शक्ति का उपयोग किया। 3. गरिमा सिद्धि इस शक्ति से शरीर को इतना भारी बनाया जा सकता है कि कोई उसे हिला भी न सके। भीम के साथ प्रसंग में हनुमान जी ने इसी सिद्धि से उनके अभिमान को तोड़ा। 4. लघिमा सिद्धि लघिमा सिद्धि से शरीर अत्यंत हल्का हो जाता है, जिससे व्यक्ति हवा से भी तेज गति से चल सकता है। हनुमान जी ने अशोक वाटिका में स्वयं को छिपाने के लिए इसका उपयोग किया। 5. प्राप्ति सिद्धि इस सिद्धि के माध्यम से किसी भी वस्तु या ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। माना जाता है कि हनुमान जी ने सीता माता का पता लगाने के लिए जीव-जंतुओं से संवाद करने में इसका उपयोग किया। 6. प्राकाम्य सिद्धि यह सिद्धि इच्छाओं को पूर्ण करने और लोक-परलोक के ज्ञान की प्राप्ति कराती है। इसके प्रभाव से व्यक्ति कहीं भी, किसी भी रूप में जा सकता है। 7. ईशित्व सिद्धि इस शक्ति से व्यक्ति देवतुल्य बन जाता है और नेतृत्व करने की क्षमता प्राप्त करता है। हनुमान जी ने लंका युद्ध में वानर सेना का नेतृत्व इसी सिद्धि के बल पर किया। 8. वशित्व सिद्धि वशित्व सिद्धि से व्यक्ति अपनी इंद्रियों और मन को नियंत्रित कर सकता है। यह आत्मसंयम और वैराग्य का सर्वोच्च रूप है, जो हनुमान जी के चरित्र में स्पष्ट दिखाई देता है। धार्मिक महत्व इन अष्ट सिद्धियों के कारण हनुमान जी को ‘अतुलित बल का धाम’ कहा जाता है। उनकी भक्ति न केवल शक्ति प्रदान करती है, बल्कि व्यक्ति को संयम, समर्पण और आत्मविश्वास भी सिखाती है।  

surbhi अप्रैल 1, 2026 0
Different colored Kalava sacred threads tied on wrist during Hindu rituals symbolizing protection, peace and prosperity
कलावा के रंगों का रहस्य: कौन सा धागा देता है किस तरह का लाभ, जानें धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व

  कलावा के रंगों का रहस्य: कौन सा धागा देता है किस तरह का लाभ, जानें धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान हाथ में कलावा या मौली बांधने की परंपरा सदियों पुरानी है। इसे केवल एक साधारण धागा नहीं माना जाता, बल्कि आस्था, सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक समझा जाता है। आमतौर पर लोग लाल रंग का कलावा बांधते हैं, लेकिन ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग रंग के कलावे का अपना अलग महत्व बताया गया है। माना जाता है कि यदि व्यक्ति अपनी जरूरत या उद्देश्य के अनुसार कलावा धारण करता है, तो उसे जीवन में विशेष लाभ मिल सकता है।   लाल कलावा: शक्ति और साहस का प्रतीक लाल रंग का कलावा सबसे अधिक प्रचलित है और इसे ऊर्जा, शक्ति और साहस का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे धारण करने से व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है और जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है। इसे भगवान हनुमान और देवी दुर्गा की कृपा से भी जोड़ा जाता है, इसलिए पूजा-पाठ के समय अक्सर यही कलावा बांधा जाता है।   पीला कलावा: गुरु कृपा और ज्ञान की वृद्धि पीले रंग का कलावा गुरु ग्रह से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि इसे धारण करने से ज्ञान, बुद्धि और शुभता में वृद्धि होती है। शिक्षा, अध्यात्म या ज्ञान से जुड़े कार्य करने वाले लोगों के लिए पीला कलावा विशेष रूप से शुभ माना जाता है।   काला कलावा: नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा काले रंग का कलावा आमतौर पर बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियों से बचाव के लिए बांधा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्यक्ति को नजर दोष से बचाने के साथ-साथ शनि से जुड़ी परेशानियों को कम करने में भी सहायक माना जाता है।   हरा कलावा: स्वास्थ्य और तरक्की का संकेत हरा रंग समृद्धि, विकास और उन्नति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि हरा कलावा बांधने से स्वास्थ्य में सुधार होता है और जीवन में प्रगति के नए अवसर मिलते हैं। ज्योतिष के अनुसार यह रंग बुध ग्रह से भी जुड़ा हुआ माना जाता है।   सफेद कलावा: शांति और पवित्रता का प्रतीक सफेद रंग शांति, पवित्रता और संतुलन का प्रतीक है। सफेद कलावा धारण करने से मन में स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। इसे चंद्रमा और शुक्र ग्रह की कृपा से भी जोड़ा जाता है।   नीला कलावा: कर्म और सफलता के लिए नीला रंग धैर्य, अनुशासन और कर्म का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि नीला कलावा पहनने से व्यक्ति अपने कार्यों में एकाग्रता बनाए रखता है और सफलता की ओर आगे बढ़ता है। कई लोग इसे शनि से जुड़ी सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए भी धारण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलावा केवल एक धागा नहीं, बल्कि आस्था और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। सही उद्देश्य और श्रद्धा के साथ इसे धारण करने से जीवन में मानसिक संतुलन, सुरक्षा और सफलता की भावना को बल मिलता है।  

surbhi मार्च 13, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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abhishek singh जुलाई 2, 2026 0