Balendra Shah की सरकार ने नेपाल की विदेश नीति और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए पहली बार आम नागरिकों के लिए राजदूत बनने का रास्ता खोल दिया है। अब नेपाल में राजदूतों की नियुक्ति केवल राजनीतिक सिफारिश से नहीं, बल्कि खुले कॉम्पिटिशन और मेरिट के आधार पर की जाएगी। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने अलग-अलग देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में राजदूत तथा स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त करने के लिए योग्य नेपाली नागरिकों से आवेदन मांगे हैं। हालांकि मंत्रालय ने फिलहाल यह साफ नहीं किया है कि किन देशों के लिए नियुक्तियां की जाएंगी। किन देशों में हो सकती है नियुक्ति? पहले जारी जानकारी के अनुसार भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, इजरायल, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रिया, बहरीन, बांग्लादेश, मलेशिया, ओमान और सऊदी अरब जैसे देशों के लिए आवेदन मांगे जाने की चर्चा थी। बाद में मंत्रालय ने वह सूची हटा दी। पहले कैसे बनते थे राजदूत? नेपाल में लंबे समय से राजदूतों की नियुक्ति राजनीतिक दलों के बीच समझौते और राजनीतिक निष्ठा के आधार पर होती रही है। आम तौर पर आधे पद राजनीतिक नियुक्तियों और आधे विदेश सेवा के करियर डिप्लोमैट्स को दिए जाते थे। इस व्यवस्था की लगातार आलोचना हो रही थी। आरोप था कि कई नियुक्तियां योग्यता के बजाय राजनीतिक रिश्तों के आधार पर होती थीं। अब नई सरकार ने पहली बार प्रतियोगी चयन प्रक्रिया शुरू की है। राजदूत बनने के लिए क्या योग्यता तय की गई? नेपाल सरकार द्वारा जारी “टर्म्स ऑफ रेफरेंस (TOR)” के अनुसार उम्मीदवारों के लिए ये प्रमुख शर्तें रखी गई हैं: उम्र कम से कम 35 वर्ष हो न्यूनतम ग्रेजुएशन डिग्री जरूरी विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध या कूटनीति की समझ या अनुभव अंतरराष्ट्रीय संबंध, राजनीति विज्ञान, कानून, अर्थशास्त्र या पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर डिग्री वालों को प्राथमिकता अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ वियना कन्वेंशन और कूटनीतिक प्रक्रियाओं की जानकारी इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय व्यापार, बहुपक्षीय वार्ता, रिसर्च, अकादमिक लेखन और नेतृत्व अनुभव को अतिरिक्त योग्यता माना जाएगा। किन लोगों को नहीं मिलेगा मौका? सरकार ने कुछ सख्त नियम भी तय किए हैं। उम्मीदवार: किसी दूसरे देश की स्थायी या अस्थायी रेजिडेंसी न रखते हों भ्रष्टाचार या अनैतिक आचरण में दोषी न हों विदेशी फंड पाने वाले NGO में सक्रिय पद पर न हों जिस देश में पोस्टिंग होनी है वहां निजी हित या विवाद न रखते हों राजदूतों की क्या होंगी जिम्मेदारियां? नेपाल सरकार के अनुसार राजदूतों की मुख्य जिम्मेदारियां होंगी: विदेशों में नेपाल के राजनीतिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना निवेश और व्यापार बढ़ाना पर्यटन को प्रमोट करना विदेशों में रह रहे नेपाली नागरिकों की मदद करना अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेपाल का प्रतिनिधित्व करना जलवायु कूटनीति और सांस्कृतिक संबंध मजबूत करना कितना होगा कार्यकाल? नई व्यवस्था के तहत राजदूतों का कार्यकाल 4 साल का होगा। हालांकि जरूरत पड़ने पर सरकार उन्हें पहले भी वापस बुला सकती है। इच्छुक उम्मीदवारों को 5 जून तक आवेदन जमा करने के लिए कहा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह मॉडल सफल रहता है तो नेपाल की विदेश सेवा में पारदर्शिता और पेशेवर क्षमता दोनों बढ़ सकती हैं।
पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत से सिंधु जल संधि बहाल करने की अपील की है। ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय जल सम्मेलन में पाकिस्तान ने कहा कि इस संधि को रोकना दुनिया के कई देशों के लिए चिंता का कारण बन सकता है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की गुहार सम्मेलन में पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री Musadik Malik ने भारत पर साझा जल संसाधनों को राजनीति से जोड़ने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सीमा पार नदियों पर एकतरफा फैसले कई देशों के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकते हैं। पाकिस्तान ने भारत से सिंधु जल संधि का सम्मान करने और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने की अपील की। पहलगाम हमले के बाद भारत ने लिया था बड़ा फैसला भारत ने पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ कई सख्त कदम उठाए थे। इन्हीं में सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला भी शामिल था। भारत का कहना था कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। इसके बाद से दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर तनाव बना हुआ है। क्या है सिंधु जल संधि? Indus Waters Treaty भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई थी। विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुए इस समझौते के तहत सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर नियम तय किए गए थे। यह संधि लंबे समय तक दोनों देशों के बीच पानी के बंटवारे का आधार रही है। पाकिस्तान ने क्या चेतावनी दी? पाकिस्तान ने कहा कि अगर उसके हिस्से का पानी रोका गया तो इसे गंभीर कदम माना जाएगा। पाकिस्तान का दावा है कि उसकी खेती और पानी की जरूरतें काफी हद तक सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर हैं। जल संकट और बढ़ती चिंता सम्मेलन में पाकिस्तान ने जलवायु परिवर्तन का मुद्दा भी उठाया। पाकिस्तान का कहना है कि वह उन देशों में शामिल है जो ग्लोबल वार्मिंग और पानी की कमी से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बना हुआ है और आने वाले समय में यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और चर्चा में रह सकता है।
Sher Bahadur Deuba और उनकी पत्नी Arzu Rana Deuba को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी राहत मिली है। Supreme Court of Nepal ने उनकी गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी है। सोमवार को जस्टिस महेश शर्मा पौडेल और नित्यानंद पांडे की बेंच ने दंपती की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि गिरफ्तारी वारंट जारी करने में उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। काठमांडू जिला अदालत ने जारी किया था वारंट Kathmandu District Court ने 6 अप्रैल को देउबा दंपती के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। उस समय दोनों इलाज के लिए विदेश में थे। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक दोनों को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। इंटरपोल ने भी ठुकराया अनुरोध नेपाल पुलिस ने देउबा दंपती के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने के लिए इंटरपोल से संपर्क किया था। हालांकि, इंटरपोल ने दस्तावेजों को अपर्याप्त बताते हुए यह अनुरोध खारिज कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने किया था हमला पिछले साल जेन-जी प्रदर्शनकारियों ने देउबा के घर के बाहर प्रदर्शन किया था। इस दौरान हिंसा भी हुई, जिसमें दंपती घायल हो गए थे। सोशल मीडिया पर उस समय एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें नेपाली मुद्रा और अमेरिकी डॉलर जलाते हुए दिखाए गए थे। इसके बाद मनी लॉन्ड्रिंग विभाग ने मामले की जांच शुरू की और फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार कराई।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत और ममता बनर्जी की हार पर पड़ोसी देश बांग्लादेश से भी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं. खासकर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेताओं ने चुनाव परिणामों को लेकर हैरानी जताई है और भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर नई उम्मीदें व्यक्त की हैं. बांग्लादेश की राजधानी ढाका में BNP के सूचना सचिव अजीजुल बरी हेलाल ने कहा कि पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) की हार चौंकाने वाली है. उन्होंने भाजपा और शुभेंदु अधिकारी को जीत की बधाई भी दी. “टीएमसी की हार से स्तब्ध हूं” : अजीजुल बरी हेलाल BNP नेता अजीजुल बरी हेलाल ने कहा, “पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद टीएमसी की करारी हार देखकर मैं स्तब्ध हूं. मैं विजेता शुभेंदु अधिकारी और भाजपा को बधाई देता हूं.” उन्होंने उम्मीद जताई कि शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में पश्चिम Bengal और बांग्लादेश के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण बने रहेंगे और दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ेगा. तीस्ता जल समझौते को लेकर बढ़ीं उम्मीदें बांग्लादेश में सबसे ज्यादा चर्चा तीस्ता नदी जल बंटवारे को लेकर हो रही है. BNP नेताओं का मानना है कि ममता बनर्जी पहले इस समझौते का विरोध करती रही हैं, जिसकी वजह से भारत और बांग्लादेश के बीच यह मुद्दा वर्षों से अटका हुआ है. अजीजुल बरी हेलाल ने कहा, “पहले हमने देखा कि ममता बनर्जी ही तीस्ता बांध और जल समझौते में सबसे बड़ी बाधा थीं. अब भाजपा सरकार बनने के बाद उम्मीद है कि बांग्लादेश सरकार और मोदी सरकार मिलकर इस समझौते को आगे बढ़ा सकती हैं.” उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध दक्षिण एशिया की स्थिरता और विकास के लिए जरूरी हैं. भारत-बांग्लादेश संबंधों पर नजर बांग्लादेश के राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन का असर भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी पड़ सकता है. खासकर सीमा, व्यापार और जल बंटवारे जैसे मुद्दों पर नई राजनीतिक परिस्थितियां अहम भूमिका निभा सकती हैं. BNP नेता ने कहा कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद भारत और बांग्लादेश के बीच मजबूत और शांतिपूर्ण संबंध दोनों देशों के हित में हैं. उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में सहयोग और संवाद और मजबूत होगा.
नेपाल में सुप्रीम कोर्ट के नए चीफ जस्टिस की नियुक्ति को लेकर बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। करीब 70 साल से चली आ रही वरिष्ठता (सीनियरिटी) की परंपरा को तोड़ते हुए प्रधानमंत्री Balendra Shah की अगुवाई वाली संवैधानिक परिषद ने सुप्रीम कोर्ट के चौथे सबसे वरिष्ठ जज Manoj Kumar Sharma को मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश कर दी है। इस फैसले के बाद नेपाल की राजनीति और न्यायपालिका में तीखी बहस शुरू हो गई है। काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार परिषद ने वरिष्ठ जज Sapana Pradhan Malla, Kumar Regmi और Hari Prasad Phuyal को नजरअंदाज करते हुए मनोज कुमार शर्मा के नाम को आगे बढ़ाया। माना जा रहा है कि यह नेपाल के न्यायिक इतिहास में एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि अब तक परंपरा के अनुसार सबसे वरिष्ठ जज को ही चीफ जस्टिस बनाया जाता रहा है। परिषद में हुआ विरोध छह सदस्यीय संवैधानिक परिषद की बैठक में इस फैसले का विरोध भी हुआ। नेशनल असेंबली के अध्यक्ष और विपक्ष के नेता ने वरिष्ठता को दरकिनार करने पर आपत्ति जताई। परिषद के एक सदस्य ने कहा कि स्थापित प्रक्रिया और न्यायिक परंपरा को तोड़ना सही नहीं है, इसलिए विरोध लिखित रूप में दर्ज कराया गया। मार्च में पूर्व चीफ जस्टिस Prakash Man Singh Raut के रिटायर होने के बाद सपना प्रधान मल्ला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी संभाल रही थीं। ऐसे में उन्हें नजरअंदाज किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। PM बालेन शाह ने दिया यह तर्क बैठक में प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि केवल वरिष्ठता के आधार पर नियुक्तियां नहीं होनी चाहिए। उनके मुताबिक चयन प्रक्रिया में योग्यता, विशेषज्ञता और न्याय देने की क्षमता को भी महत्व मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि कार्यक्षमता भी अहम है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञ इस तर्क से पूरी तरह सहमत नजर नहीं आ रहे हैं। Kathmandu University School of Law के प्रोफेसर Bipin Adhikari ने कहा कि संविधान में वरिष्ठता अनिवार्य नहीं है, लेकिन अगर परंपरा तोड़ी जा रही है तो उसके पीछे बेहद मजबूत और पारदर्शी कारण होने चाहिए। उनके मुताबिक बिना ठोस वजह के जूनियर जज को आगे बढ़ाना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर सकता है। न्यायपालिका पर दबाव बढ़ने की आशंका विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से भविष्य में जजों पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। उन्हें डर हो सकता है कि सरकार की नाराजगी उनके प्रमोशन को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि नेपाल में इस नियुक्ति को केवल प्रशासनिक फैसला नहीं बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा माना जा रहा है। नेपाल की राजनीति में पहले ही अस्थिरता और सत्ता संघर्ष के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में चीफ जस्टिस की नियुक्ति को लेकर उठा यह विवाद आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
कुनार में भीषण हमला, कई नागरिकों की मौत अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हालिया युद्धविराम एक बार फिर गंभीर संकट में पड़ गया है। अफगान तालिबान सरकार ने आरोप लगाया है कि पाकिस्तान ने सोमवार को पूर्वी कुनार प्रांत में मोर्टार और मिसाइल हमले किए, जिनमें कम से कम सात लोगों की मौत हो गई, जबकि 80 से अधिक लोग घायल हुए हैं। इन हमलों में असदाबाद शहर और उसके आसपास के कई रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया गया। अफगान अधिकारियों के मुताबिक, सैयद जमालुद्दीन अफगानी विश्वविद्यालय भी हमले की चपेट में आ गया, जिससे उसके भवनों को भारी नुकसान पहुंचा। छात्रों और शिक्षकों में दहशत अफगानिस्तान के उच्च शिक्षा मंत्रालय ने बताया कि घायलों में करीब 30 छात्र और प्रोफेसर शामिल हैं। विश्वविद्यालय परिसर में मची अफरा-तफरी के बाद स्थानीय प्रशासन ने राहत और बचाव अभियान शुरू किया। तालिबान के उप-प्रवक्ता हमदुल्लाह फितरत ने इस हमले को "नागरिकों और शैक्षणिक संस्थानों के खिलाफ अक्षम्य युद्ध अपराध" करार दिया। पाकिस्तान ने आरोपों को किया खारिज वहीं, पाकिस्तान ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने कहा कि उसकी सेना ने किसी विश्वविद्यालय को निशाना नहीं बनाया। सरकार ने अपने बयान में कहा कि पाकिस्तान केवल सटीक और खुफिया जानकारी के आधार पर कार्रवाई करता है। हालांकि, उसने अफगान सीमा के भीतर किसी अन्य सैन्य कार्रवाई से स्पष्ट इनकार नहीं किया। युद्धविराम के बावजूद सीमा पर गोलाबारी दोनों देशों के अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि औपचारिक युद्धविराम लागू होने के बावजूद सीमा पर लगातार गोलीबारी जारी है। कुनार, पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा से लगा एक संवेदनशील प्रांत है, जहां तनाव लगातार बना हुआ है। इस ताजा घटना ने हाल ही में चीन के उरुमकी में हुई शांति वार्ता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। TTP बना सबसे बड़ा विवाद पाकिस्तान लंबे समय से अफगान तालिबान पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को पनाह देने का आरोप लगाता रहा है। इस आतंकी संगठन ने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में कई हमलों को अंजाम दिया है। हालांकि, अफगानिस्तान इन आरोपों को लगातार नकारता आया है। यही मुद्दा दोनों देशों के बीच तनाव की सबसे बड़ी वजह बना हुआ है। चीन की मध्यस्थता भी नहीं ला सकी समाधान अप्रैल की शुरुआत में चीन की मेजबानी में उरुमकी में दोनों देशों के बीच बातचीत हुई थी। लेकिन कोई ठोस समझौता नहीं हो सका। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक दोनों देश एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करेंगे और किसी लिखित समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे, तब तक स्थायी शांति की संभावना बेहद कम है। क्षेत्रीय स्थिरता पर मंडराया खतरा कतर, तुर्किये, सऊदी अरब और चीन जैसे देशों की मध्यस्थता के बावजूद हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। सीमा पर हर नई घटना युद्धविराम को और कमजोर कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जल्द ही कोई विश्वसनीय समाधान नहीं निकाला गया, तो दोनों देशों के बीच संघर्ष और गहरा सकता है।
नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ नई सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री Balendra Shah ने पूर्व और वर्तमान नेताओं व अधिकारियों की संपत्ति की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय पैनल गठित किया है। रिटायर्ड जज करेंगे पैनल की अगुवाई सरकार द्वारा बनाए गए इस पांच सदस्यीय पैनल की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज Rajendra Kumar Bhandari करेंगे। पैनल का मुख्य काम नेताओं और सरकारी अधिकारियों की संपत्तियों व परिसंपत्तियों की जांच करना होगा। निष्पक्ष जांच का दावा कैबिनेट प्रवक्ता Sasmit Pokharel ने बताया कि जांच प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष होगी और कानूनी मानकों ठोस सबूतों के आधार पर की जाएगी। रिपोर्ट के आधार पर होगी कार्रवाई सरकार ने स्पष्ट किया है कि पैनल अपनी रिपोर्ट और सिफारिशें संबंधित एजेंसियों को सौंपेगा, जिसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, अभी तक जांच पूरी करने की समयसीमा तय नहीं की गई है। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह का यह कदम नेपाल में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में बड़ा माना जा रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि जांच रिपोर्ट के बाद सरकार किस तरह की ठोस कार्रवाई करती है। 20.नेपाल में ‘सफेदपोश’ भ्रष्टाचार पर बड़ा प्रहार: 2006 से अब तक नेताओं की संपत्ति की होगी न्यायिक जांच नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री Balendra Shah की सरकार ने एक व्यापक न्यायिक आयोग गठित किया है। यह आयोग 2006 में राजतंत्र समाप्त होने के बाद से लेकर वित्तीय वर्ष 2025-26 तक सार्वजनिक पदों पर रहे नेताओं और अधिकारियों की संपत्ति की जांच करेगा। किन-किन पर होगी जांच? इस जांच के दायरे को बेहद व्यापक रखा गया है। इसमें शामिल हैं: पूर्व राजा Gyanendra Shah पूर्व राष्ट्रपति Ram Baran Yadav, Bidya Devi Bhandari वर्तमान राष्ट्रपति Ram Chandra Poudel पूर्व प्रधानमंत्री जैसे Pushpa Kamal Dahal, K. P. Sharma Oli, Sher Bahadur Deuba, Baburam Bhattarai, Madhav Kumar Nepal, Jhala Nath Khanal अंतरिम सरकारों के प्रमुख और वरिष्ठ नौकरशाह यहां तक कि दिवंगत नेताओं–जैसे गिरिजा प्रसाद कोइराला और सुशील कोइराला–की संपत्तियों की भी जांच की जाएगी, जिससे उनके परिवार और राजनीतिक उत्तराधिकारियों पर भी असर पड़ सकता है। अपने ही सहयोगी भी जांच के दायरे में सरकार ने इस आयोग को पूरी तरह स्वतंत्र और व्यापक बनाया है। वर्तमान स्पीकर और कुछ मौजूदा मंत्री यहां तक कि सत्तारूढ़ दल के नेता Rabi Lamichhane भी जांच के दायरे में आ सकते हैं। कौन कर रहा है जांच की अगुवाई? इस पांच सदस्यीय आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज Rajendra Kumar Bhandari कर रहे हैं। कैबिनेट प्रवक्ता Sasmit Pokharel के अनुसार, जांच पूरी तरह निष्पक्ष होगी कानूनी मानकों और सबूतों के आधार पर की जाएगी युवा आंदोलन के बाद बड़ा फैसला यह कदम मार्च 2025 के चुनाव में भारी जीत के बाद उठाया गया है, जो देश में हुए बड़े युवा-नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद संभव हुआ। नेपाल में यह पहली बार है जब इतने बड़े स्तर पर राजनीतिक और प्रशासनिक वर्ग की संपत्ति की जांच हो रही है। यह कदम देश में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में ऐतिहासिक माना जा रहा है–अब नजर इस पर रहेगी कि आयोग की रिपोर्ट के बाद क्या ठोस कार्रवाई होती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।