भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद के बीच नेपाल सरकार ने एक अहम फैसला लिया है। सरकार ने नए डिजाइन वाले एक रुपये और दो रुपये के सिक्कों को मंजूरी दे दी है। नए डिजाइन के तहत एक रुपये के सिक्के से विवादित राजनीतिक नक्शा हटाया जाएगा, जिसमें लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था। इसे भारत-नेपाल संबंधों में सकारात्मक पहल के तौर पर देखा जा रहा है। कैबिनेट ने दी नए सिक्कों को मंजूरी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुरुवार को नेपाल की मंत्रिपरिषद ने नेपाल राष्ट्र बैंक के प्रस्ताव को मंजूरी दी। इसके तहत एक रुपये और दो रुपये के सिक्कों का नया डिजाइन तैयार किया जाएगा। नए एक रुपये के सिक्के पर अब विवादित नक्शे की जगह मुस्तांग जिले के मारंग गांव स्थित ऐतिहासिक 'लो ध्याकर मठ' की तस्वीर होगी, जिसे नेपाल के सबसे प्राचीन बौद्ध मठों में गिना जाता है। 2020 में शामिल किया गया था विवादित नक्शा मई 2020 में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था, जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था। भारत ने उस समय इस कदम का कड़ा विरोध किया था और इन क्षेत्रों को अपना अभिन्न हिस्सा बताया था। दो रुपये के सिक्के पर रहेगा नक्शा कैबिनेट सूत्रों के अनुसार, दो रुपये के सिक्के पर फिलहाल पहले से मौजूद नक्शा बना रहेगा। इसके दूसरी ओर जनकपुर स्थित जानकी मंदिर की तस्वीर होगी। फैसले का नेपाल में विरोध नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता भीम रावल ने सरकार के फैसले की आलोचना की है। उन्होंने इसे देश की क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ बताया और सरकार से इस फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा। रावल का कहना है कि यदि सरकार ने वास्तव में एक रुपये के सिक्के से विवादित नक्शा हटाने का फैसला किया है, तो यह राष्ट्रीय हितों के खिलाफ कदम माना जाएगा। नए सिक्कों में होंगे ये बदलाव नेपाल राष्ट्र बैंक के प्रवक्ता गुरु प्रसाद पौडेल ने बताया कि सिक्कों का आकार और वजन कम करने के लिए नया डिजाइन तैयार किया गया है। नए सिक्कों की खास बातें: एक रुपये के सिक्के से विवादित नक्शा हटेगा। सिक्के पर लो ध्याकर मठ की तस्वीर होगी। दो रुपये के सिक्के पर पहले वाला नक्शा और दूसरी तरफ जानकी मंदिर की तस्वीर रहेगी। एक रुपये के सिक्के का वजन 4 ग्राम से घटाकर 3.2 ग्राम किया जाएगा। दो रुपये के सिक्के का वजन 5 ग्राम से घटाकर 3.8 ग्राम होगा। नए सिक्के मिश्रित धातु की बजाय स्टील से बनाए जाएंगे और उनका रंग पीले की जगह सफेद (स्टील जैसा) होगा। भारत-नेपाल रिश्तों के लिए सकारात्मक संकेत विशेषज्ञों का मानना है कि एक रुपये के सिक्के से विवादित नक्शा हटाने का फैसला भारत और नेपाल के बीच संबंधों में आई नरमी का संकेत हो सकता है। हालांकि, सीमा विवाद पर दोनों देशों का आधिकारिक रुख अब भी बरकरार है, लेकिन इस कदम को द्विपक्षीय रिश्तों में विश्वास बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक पहल माना जा रहा है।
नई दिल्ली: कराची में सिंध रेंजर्स मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले को लेकर पाकिस्तान द्वारा भारत पर लगाए गए आरोपों को भारत ने सख्ती से खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि बिना किसी सबूत के भारत पर आरोप लगाने के बजाय पाकिस्तान को अपनी धरती पर सक्रिय आतंकी ढांचे के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने रविवार को कहा कि पाकिस्तान की ओर से लगाए गए आरोप पूरी तरह निराधार हैं और भारत उन्हें स्पष्ट रूप से खारिज करता है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को दूसरों पर उंगली उठाने के बजाय अपने भीतर झांकना चाहिए और आतंकवाद के खिलाफ विश्वसनीय कदम उठाने चाहिए। क्या है पूरा मामला? शनिवार रात पाकिस्तान के कराची स्थित सिंध रेंजर्स मुख्यालय पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया। पाकिस्तान के सुरक्षा बलों ने दावा किया कि उन्होंने छह आतंकवादियों को मार गिराया, जबकि एक हमलावर को घायल अवस्था में गिरफ्तार कर लिया गया। इस हमले में अर्द्धसैनिक बल के चार जवानों की भी मौत हुई। हमले के बाद पाकिस्तान सरकार के कुछ मंत्रियों ने बिना कोई सबूत सार्वजनिक किए भारत पर हमले में शामिल होने का आरोप लगाया। पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने भी हमले की निंदा करते हुए भारत की भूमिका का दावा किया। भारत ने दिया सख्त जवाब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि भारत के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अपनी धरती पर मौजूद आतंकी नेटवर्क के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय कार्रवाई करनी चाहिए, न कि हर आतंकी घटना के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करनी चाहिए। आतंकवाद पर पाकिस्तान को दी नसीहत भारत ने अपने बयान में यह भी कहा कि पाकिस्तान को "सरकार प्रायोजित आतंकवाद" पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति छोड़नी चाहिए। विदेश मंत्रालय का कहना है कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए पाकिस्तान को अपने यहां मौजूद आतंकवादी ढांचे को खत्म करने की दिशा में गंभीर प्रयास करने होंगे। भारत ने दोहराया कि वह आतंकवाद के खिलाफ अपनी नीति पर कायम है और किसी भी तरह के निराधार आरोपों को स्वीकार नहीं करता।
इस्लामाबाद/मुजफ्फराबाद: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में सरकार विरोधी आंदोलन के बीच हालात लगातार बिगड़ने के दावे सामने आ रहे हैं। स्थानीय लोगों, ट्रक चालकों और प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पाकिस्तान प्रशासन ने खाद्य सामग्री, ईंधन और दवाओं की आपूर्ति सीमित कर आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की है। पाकिस्तान सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया है, लेकिन विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कई इलाकों में आवश्यक वस्तुओं की कमी की शिकायतें बढ़ रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में चल रहे विरोध प्रदर्शन और बंद के कारण आम लोगों की परेशानियां बढ़ गई हैं। राजधानी मुजफ्फराबाद सहित कई शहरों में बाजार बंद हैं और इंटरनेट सेवाओं में भी रुकावट की खबरें सामने आई हैं। खाद्य सामग्री और दवाओं की कमी का दावा स्थानीय निवासियों का कहना है कि आटा, चावल, दाल, चीनी, दवाइयों और अन्य जरूरी सामान की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है। दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों का आरोप है कि राशन डिपो पर कई दिनों तक इंतजार करने के बावजूद उन्हें आवश्यक वस्तुएं नहीं मिल रही हैं, जबकि खुले बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं। ईंधन संकट से बढ़ी मुश्किलें ईंधन की कमी भी लोगों के लिए बड़ी समस्या बन गई है। कई जिलों में पेट्रोल पंप बंद होने की खबरें हैं। वाहन चालकों का दावा है कि उन्हें ब्लैक मार्केट से ऊंचे दामों पर पेट्रोल खरीदना पड़ रहा है, जिससे आम लोगों और व्यापारियों दोनों की परेशानियां बढ़ गई हैं। जरूरी सामान लाने वालों को रोके जाने के आरोप रिपोर्टों के अनुसार, कई लोग आवश्यक सामान खरीदने के लिए पाकिस्तान के अन्य शहरों जैसे रावलपिंडी और इस्लामाबाद जा रहे हैं। कुछ स्थानीय लोगों का आरोप है कि लौटते समय उन्हें खाद्य सामग्री, दवाइयां और ईंधन लेकर PoK में प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि पुलिस ने चेकपोस्ट पर उनके वाहनों को रोककर सामान वापस ले जाने या फेंकने के लिए दबाव बनाया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ट्रकों की आवाजाही प्रभावित होने का दावा स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, आवश्यक वस्तुओं से भरे कई ट्रकों को रास्ते में रोके जाने के कारण सप्लाई प्रभावित हुई है। ट्रक चालकों का कहना है कि कई वाहन घंटों और कुछ मामलों में कई दिनों तक रास्ते में खड़े रहे, जिससे खराब होने वाला सामान भी नुकसान का शिकार हुआ। पाकिस्तान प्रशासन ने आरोपों से किया इनकार पाकिस्तान प्रशासन ने खाद्य सामग्री और ईंधन की आपूर्ति रोकने के आरोपों को खारिज किया है। अधिकारियों का कहना है कि आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई सामान्य रूप से जारी है और किसी भी वाहन को जानबूझकर नहीं रोका गया है। कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि आंदोलन को कमजोर करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कुछ रणनीतिक कदम उठाए गए हैं। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। क्या है पूरे विवाद की वजह? PoK में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत विधानसभा की उन 12 आरक्षित सीटों को लेकर हुई, जो भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर से आए शरणार्थियों के लिए निर्धारित हैं। आंदोलनकारी संगठनों का आरोप है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित करता है। इसी मुद्दे को लेकर ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया। बाद में पाकिस्तान सरकार ने JAAC को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर उसके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। आंदोलन के और तेज होने के संकेत रिपोर्टों के अनुसार, PoK के कई शहरों और कस्बों में प्रदर्शन लगातार फैल रहे हैं। आंदोलनकारी संगठन दावा कर रहे हैं कि रावलाकोट में चल रहे धरने में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए हैं। JAAC ने आने वाले दिनों में रावलाकोट से मुजफ्फराबाद तक बड़े मार्च का भी आह्वान किया है। इस बीच क्षेत्र में तनाव बना हुआ है और प्रशासन स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है।
नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि यदि उनके देश की जल सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ, तो पाकिस्तान सैन्य कार्रवाई जैसे विकल्पों पर विचार कर सकता है। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब पाकिस्तान पहले से ही गंभीर जल संकट और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। भारत द्वारा पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल समझौते को स्थगित किए जाने के फैसले का असर पाकिस्तान के कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों पर दिखाई देने लगा है। क्या है विवाद की वजह? अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने 1960 के सिंधु जल समझौते को निलंबित कर दिया था। भारत ने स्पष्ट किया था कि जब तक सीमा पार आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह फैसला लागू रहेगा। हाल ही में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल के उस बयान के बाद पाकिस्तान की चिंता और बढ़ गई, जिसमें संकेत दिया गया था कि आने वाले वर्षों में पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी के उपयोग को लेकर भारत अपनी रणनीति मजबूत कर सकता है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर क्यों है असर? सिंधु नदी प्रणाली पाकिस्तान के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। देश की लगभग 80 प्रतिशत खेती इसी जल स्रोत पर निर्भर है। कृषि क्षेत्र— पाकिस्तान की GDP में लगभग 23 प्रतिशत योगदान देता है। कुल कार्यबल के 40 प्रतिशत से अधिक लोगों को रोजगार देता है। ग्रामीण आबादी के बड़े हिस्से की आजीविका का आधार है। कपास और टेक्सटाइल उद्योग पर बढ़ी चिंता पाकिस्तान का टेक्सटाइल उद्योग उसकी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र है। देश के कुल निर्यात का लगभग आधा हिस्सा इसी सेक्टर से आता है और इससे अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा अर्जित होती है। कपास की खेती के लिए सिंधु नदी का पानी बेहद महत्वपूर्ण है। यदि पानी की उपलब्धता प्रभावित होती है, तो इसका असर कपास उत्पादन और उससे जुड़े पूरे टेक्सटाइल उद्योग पर पड़ सकता है। बढ़ सकता है क्षेत्रीय तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि जल सुरक्षा से जुड़े मुद्दे दक्षिण एशिया में संवेदनशील विषय हैं और दोनों देशों के बीच किसी भी प्रकार का तनाव क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। ऐसे मामलों में कूटनीतिक संवाद और अंतरराष्ट्रीय समझौतों की भूमिका अहम मानी जाती है।
वॉशिंगटन/बर्गेनस्टॉक: स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही महत्वपूर्ण वार्ता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी सैन्य चेतावनी दी है। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को बंद करने की कोशिश की, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। ट्रंप के इस बयान ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है। ईरान को ट्रंप की सीधी चेतावनी फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल को चेतावनी देते हुए कहा, "अगर तुम होर्मुज बंद करने की कोशिश करोगे, तो अपने देश तक भी वापस नहीं पहुंच पाओगे।" उनके इस बयान को ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे सख्त चेतावनियों में से एक माना जा रहा है। ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका किसी भी कीमत पर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार को बाधित नहीं होने देगा। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिका का सख्त रुख ट्रंप ने कहा कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ता विफल हो जाती है, तो वाशिंगटन होर्मुज जलडमरूमध्य पर सीधे नियंत्रण स्थापित करने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर सकता है। उन्होंने कहा, "जरूरत पड़ी तो हम होर्मुज का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकते हैं।" ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ऐसी स्थिति में अमेरिका वहां से गुजरने वाले जहाजों पर टैक्स या टोल लगाने का कदम उठा सकता है। जहाजों पर 20 प्रतिशत तक टोल लगाने की चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि यदि ईरान समझौते के रास्ते पर नहीं आता है, तो होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर उनके तेल कार्गो के मूल्य का लगभग 20 प्रतिशत तक टोल लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसा कदम वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। लेबनान और हिज्बुल्लाह का भी किया जिक्र ट्रंप ने ईरान से लेबनान में सक्रिय संगठन हिज्बुल्लाह पर नियंत्रण रखने की भी मांग की। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय संघर्षों को बढ़ाने वाली गतिविधियों पर रोक लगनी चाहिए और ईरान को अपने सहयोगी समूहों की गतिविधियों को नियंत्रित करना होगा। स्विट्जरलैंड में जारी है अहम वार्ता अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक मुद्दों पर महत्वपूर्ण बातचीत चल रही है। हालांकि, ट्रंप के ताजा बयान के बाद इन वार्ताओं के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। विश्लेषकों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ट्रंप की चेतावनी केवल ईरान पर दबाव बनाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा मार्गों पर अमेरिकी रणनीतिक पकड़ को मजबूत करने का भी संकेत है।
नई दिल्ली: अभिनेत्री मृणाल ठाकुर इन दिनों अपनी फिल्म 'है जवानी तो इश्क होना है' के प्रमोशन में व्यस्त हैं, लेकिन हाल ही में उन्होंने ग्लैमरस प्रमोशनल लुक्स से अलग एक बेहद खूबसूरत एथनिक अंदाज से फैशन प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। एक करीबी दोस्त की मेहंदी सेरेमनी में मृणाल ने दिल्ली की डिजाइनर हीना कोचर के लेबल का आकर्षक अनारकली कुर्ता सेट पहना, जिसने पारंपरिक गोटा वर्क को खूबसूरती से उभार दिया। रंगों और शिल्पकारी का बेहतरीन मेल मृणाल का यह आउटफिट डिजाइनर हीना कोचर के 2023 के 'हम-नफस' कलेक्शन का हिस्सा है, जिसे 'हिकमत' नाम दिया गया है। इस सेट की खासियत इसका क्रॉप्ड चंदेरी सिल्क अनारकली कुर्ता है, जिसमें हाथ से तैयार किए गए गोटा मोटिफ्स पैनल और योक पर बेहद बारीकी से सजाए गए हैं। इस लुक में बैंगनी रंग की चंदेरी सिल्क सलवार शामिल थी, जिसके बॉर्डर पर भी खूबसूरत गोटा वर्क किया गया था। वहीं, सैप ग्रीन रंग की टिश्यू ओढ़नी ने पूरे आउटफिट में तीसरा रंग जोड़ते हुए इसे और आकर्षक बना दिया। ओढ़नी पर भी गोटा वर्क की थीम को बरकरार रखा गया था। गोल्डन किरण लेस ने बढ़ाई शाही झलक पूरे आउटफिट के बॉर्डर्स पर लगी चमकदार गोल्डन किरण लेस ने इसे पारंपरिक उत्तर भारतीय वेडिंग आउटफिट्स जैसा रॉयल टच दिया। मृणाल का यह लुक इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि सही कलर ब्लॉकिंग के साथ बोल्ड रंगों को भी दिन के समय होने वाले शादी समारोहों में बेहद खूबसूरती से पहना जा सकता है। ज्वेलरी और मेकअप रखा मिनिमल मृणाल ने अपने इस लुक को ज्यादा हैवी न रखते हुए पोल्की और जेमस्टोन जुमकों के साथ कड़े पहने। आराम को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने मेटैलिक जूतियों का चयन किया। साथ ही स्टाइलिश सनग्लासेस ने उनके पूरे लुक में मॉडर्न टच जोड़ दिया। मेकअप की बात करें तो अभिनेत्री ने नो-मेकअप मेकअप लुक अपनाया। हल्के आई मेकअप, सॉफ्ट ब्लश, न्यूड लिप शेड और छोटी सी बिंदी ने उनके एथनिक अंदाज को और निखारा। वहीं, हाफ-अप और हाफ-डाउन हेयरस्टाइल ने उनके लुक को सहज और फ्रेश फील दिया। मृणाल ठाकुर का यह अनारकली सेट दिन के समय होने वाली शादी, मेहंदी, हल्दी या किसी भी फेस्टिव गेट-टुगेदर के लिए एक परफेक्ट इंस्पिरेशन माना जा सकता है।
ढाका: बांग्लादेश के बोगुरा जिले के मोकामतला इलाके में एक ही रात में तीन हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ की घटना सामने आई है। अज्ञात बदमाशों ने कई देवी-देवताओं की मूर्तियों को क्षतिग्रस्त कर दिया, जिसके बाद इलाके में तनाव और चिंता का माहौल है। पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने मामले की जांच शुरू कर दी है। तीन मंदिरों को बनाया गया निशाना स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बदमाशों ने कनाचगारी क्षेत्र स्थित शिव मंदिर, शीतला मंदिर और महाश्मशान मंदिर को निशाना बनाया। आशंका है कि यह घटना शुक्रवार रात को अंजाम दी गई। शनिवार दोपहर जब श्रद्धालु नियमित पूजा-अर्चना के लिए मंदिर पहुंचे, तो उन्होंने मूर्तियों को टूटी हुई अवस्था में देखा। इसके बाद तत्काल स्थानीय प्रशासन और पुलिस को सूचना दी गई। मंदिर प्रबंधन समिति के अनुसार, घटना में कम से कम चार से पांच देवी-देवताओं की मूर्तियों को नुकसान पहुंचाया गया है। श्रद्धालुओं ने सबसे पहले देखी टूटी मूर्तियां कांचगरी श्मशान घाट प्रबंधन समिति के सदस्य उज्जल ने बताया कि उनकी पत्नी हर महीने की तरह शनिवार सुबह पूजा के लिए मंदिर गई थीं। वहां पहुंचने पर उन्होंने मूर्तियों को क्षतिग्रस्त पाया और तुरंत समिति तथा प्रशासन को इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस घटना से स्थानीय हिंदू समुदाय में गहरी नाराजगी और असुरक्षा की भावना पैदा हुई है। मौके पर पहुंचे प्रशासनिक अधिकारी घटना की जानकारी मिलते ही शिबगंज पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी (ओसी) मोहम्मद शाहीनुज्जमान और शिबगंज उपजिला के कार्यकारी अधिकारी (यूएनओ) मोहम्मद जियाउर रहमान घटनास्थल पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया। यूएनओ जियाउर रहमान ने स्थानीय मीडिया से कहा, "फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि तोड़फोड़ की घटना किस समय हुई। प्रशासन पूरे मामले की गंभीरता से जांच कर रहा है।" उन्होंने बताया कि तीनों मंदिर मुख्य आबादी से कुछ दूरी पर स्थित हैं, जिससे आरोपियों के लिए वारदात को अंजाम देना अपेक्षाकृत आसान रहा होगा। पुलिस जुटा रही जानकारी पुलिस अधिकारियों के अनुसार, कुछ मंदिर श्मशान घाट और खुले मैदानों के पास स्थित हैं। प्रारंभिक जांच में ऐसा प्रतीत होता है कि तोड़फोड़ की घटना कुछ दिन पहले हुई हो सकती है और इसकी जानकारी बाद में स्थानीय लोगों को मिली। ओसी मोहम्मद शाहीनुज्जमान ने कहा, "पुलिस आसपास के क्षेत्रों से जानकारी जुटा रही है और घटना के पीछे शामिल लोगों की पहचान करने का प्रयास किया जा रहा है।" लिखित शिकायत के बाद होगी कानूनी कार्रवाई पुलिस ने बताया कि अब तक मंदिर समिति या स्थानीय लोगों की ओर से कोई औपचारिक लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। अधिकारियों का कहना है कि शिकायत मिलते ही कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी। स्थानीय लोगों में चिंता घटना के बाद इलाके में बेचैनी का माहौल है। स्थानीय हिंदू समुदाय ने दोषियों की जल्द पहचान कर उनकी गिरफ्तारी की मांग की है। लोगों का कहना है कि धार्मिक स्थलों पर इस तरह की घटनाएं सामाजिक सौहार्द और समुदायों के बीच विश्वास को प्रभावित करती हैं। प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जाएगी और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
Balendra Shah की सरकार ने नेपाल की विदेश नीति और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए पहली बार आम नागरिकों के लिए राजदूत बनने का रास्ता खोल दिया है। अब नेपाल में राजदूतों की नियुक्ति केवल राजनीतिक सिफारिश से नहीं, बल्कि खुले कॉम्पिटिशन और मेरिट के आधार पर की जाएगी। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने अलग-अलग देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में राजदूत तथा स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त करने के लिए योग्य नेपाली नागरिकों से आवेदन मांगे हैं। हालांकि मंत्रालय ने फिलहाल यह साफ नहीं किया है कि किन देशों के लिए नियुक्तियां की जाएंगी। किन देशों में हो सकती है नियुक्ति? पहले जारी जानकारी के अनुसार भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, इजरायल, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रिया, बहरीन, बांग्लादेश, मलेशिया, ओमान और सऊदी अरब जैसे देशों के लिए आवेदन मांगे जाने की चर्चा थी। बाद में मंत्रालय ने वह सूची हटा दी। पहले कैसे बनते थे राजदूत? नेपाल में लंबे समय से राजदूतों की नियुक्ति राजनीतिक दलों के बीच समझौते और राजनीतिक निष्ठा के आधार पर होती रही है। आम तौर पर आधे पद राजनीतिक नियुक्तियों और आधे विदेश सेवा के करियर डिप्लोमैट्स को दिए जाते थे। इस व्यवस्था की लगातार आलोचना हो रही थी। आरोप था कि कई नियुक्तियां योग्यता के बजाय राजनीतिक रिश्तों के आधार पर होती थीं। अब नई सरकार ने पहली बार प्रतियोगी चयन प्रक्रिया शुरू की है। राजदूत बनने के लिए क्या योग्यता तय की गई? नेपाल सरकार द्वारा जारी “टर्म्स ऑफ रेफरेंस (TOR)” के अनुसार उम्मीदवारों के लिए ये प्रमुख शर्तें रखी गई हैं: उम्र कम से कम 35 वर्ष हो न्यूनतम ग्रेजुएशन डिग्री जरूरी विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध या कूटनीति की समझ या अनुभव अंतरराष्ट्रीय संबंध, राजनीति विज्ञान, कानून, अर्थशास्त्र या पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर डिग्री वालों को प्राथमिकता अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ वियना कन्वेंशन और कूटनीतिक प्रक्रियाओं की जानकारी इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय व्यापार, बहुपक्षीय वार्ता, रिसर्च, अकादमिक लेखन और नेतृत्व अनुभव को अतिरिक्त योग्यता माना जाएगा। किन लोगों को नहीं मिलेगा मौका? सरकार ने कुछ सख्त नियम भी तय किए हैं। उम्मीदवार: किसी दूसरे देश की स्थायी या अस्थायी रेजिडेंसी न रखते हों भ्रष्टाचार या अनैतिक आचरण में दोषी न हों विदेशी फंड पाने वाले NGO में सक्रिय पद पर न हों जिस देश में पोस्टिंग होनी है वहां निजी हित या विवाद न रखते हों राजदूतों की क्या होंगी जिम्मेदारियां? नेपाल सरकार के अनुसार राजदूतों की मुख्य जिम्मेदारियां होंगी: विदेशों में नेपाल के राजनीतिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना निवेश और व्यापार बढ़ाना पर्यटन को प्रमोट करना विदेशों में रह रहे नेपाली नागरिकों की मदद करना अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेपाल का प्रतिनिधित्व करना जलवायु कूटनीति और सांस्कृतिक संबंध मजबूत करना कितना होगा कार्यकाल? नई व्यवस्था के तहत राजदूतों का कार्यकाल 4 साल का होगा। हालांकि जरूरत पड़ने पर सरकार उन्हें पहले भी वापस बुला सकती है। इच्छुक उम्मीदवारों को 5 जून तक आवेदन जमा करने के लिए कहा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह मॉडल सफल रहता है तो नेपाल की विदेश सेवा में पारदर्शिता और पेशेवर क्षमता दोनों बढ़ सकती हैं।
पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत से सिंधु जल संधि बहाल करने की अपील की है। ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय जल सम्मेलन में पाकिस्तान ने कहा कि इस संधि को रोकना दुनिया के कई देशों के लिए चिंता का कारण बन सकता है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की गुहार सम्मेलन में पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री Musadik Malik ने भारत पर साझा जल संसाधनों को राजनीति से जोड़ने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सीमा पार नदियों पर एकतरफा फैसले कई देशों के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकते हैं। पाकिस्तान ने भारत से सिंधु जल संधि का सम्मान करने और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने की अपील की। पहलगाम हमले के बाद भारत ने लिया था बड़ा फैसला भारत ने पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ कई सख्त कदम उठाए थे। इन्हीं में सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला भी शामिल था। भारत का कहना था कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। इसके बाद से दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर तनाव बना हुआ है। क्या है सिंधु जल संधि? Indus Waters Treaty भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई थी। विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुए इस समझौते के तहत सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर नियम तय किए गए थे। यह संधि लंबे समय तक दोनों देशों के बीच पानी के बंटवारे का आधार रही है। पाकिस्तान ने क्या चेतावनी दी? पाकिस्तान ने कहा कि अगर उसके हिस्से का पानी रोका गया तो इसे गंभीर कदम माना जाएगा। पाकिस्तान का दावा है कि उसकी खेती और पानी की जरूरतें काफी हद तक सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर हैं। जल संकट और बढ़ती चिंता सम्मेलन में पाकिस्तान ने जलवायु परिवर्तन का मुद्दा भी उठाया। पाकिस्तान का कहना है कि वह उन देशों में शामिल है जो ग्लोबल वार्मिंग और पानी की कमी से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बना हुआ है और आने वाले समय में यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और चर्चा में रह सकता है।
Sher Bahadur Deuba और उनकी पत्नी Arzu Rana Deuba को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी राहत मिली है। Supreme Court of Nepal ने उनकी गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी है। सोमवार को जस्टिस महेश शर्मा पौडेल और नित्यानंद पांडे की बेंच ने दंपती की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि गिरफ्तारी वारंट जारी करने में उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। काठमांडू जिला अदालत ने जारी किया था वारंट Kathmandu District Court ने 6 अप्रैल को देउबा दंपती के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। उस समय दोनों इलाज के लिए विदेश में थे। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक दोनों को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। इंटरपोल ने भी ठुकराया अनुरोध नेपाल पुलिस ने देउबा दंपती के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने के लिए इंटरपोल से संपर्क किया था। हालांकि, इंटरपोल ने दस्तावेजों को अपर्याप्त बताते हुए यह अनुरोध खारिज कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने किया था हमला पिछले साल जेन-जी प्रदर्शनकारियों ने देउबा के घर के बाहर प्रदर्शन किया था। इस दौरान हिंसा भी हुई, जिसमें दंपती घायल हो गए थे। सोशल मीडिया पर उस समय एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें नेपाली मुद्रा और अमेरिकी डॉलर जलाते हुए दिखाए गए थे। इसके बाद मनी लॉन्ड्रिंग विभाग ने मामले की जांच शुरू की और फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार कराई।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत और ममता बनर्जी की हार पर पड़ोसी देश बांग्लादेश से भी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं. खासकर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेताओं ने चुनाव परिणामों को लेकर हैरानी जताई है और भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर नई उम्मीदें व्यक्त की हैं. बांग्लादेश की राजधानी ढाका में BNP के सूचना सचिव अजीजुल बरी हेलाल ने कहा कि पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) की हार चौंकाने वाली है. उन्होंने भाजपा और शुभेंदु अधिकारी को जीत की बधाई भी दी. “टीएमसी की हार से स्तब्ध हूं” : अजीजुल बरी हेलाल BNP नेता अजीजुल बरी हेलाल ने कहा, “पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद टीएमसी की करारी हार देखकर मैं स्तब्ध हूं. मैं विजेता शुभेंदु अधिकारी और भाजपा को बधाई देता हूं.” उन्होंने उम्मीद जताई कि शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में पश्चिम Bengal और बांग्लादेश के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण बने रहेंगे और दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ेगा. तीस्ता जल समझौते को लेकर बढ़ीं उम्मीदें बांग्लादेश में सबसे ज्यादा चर्चा तीस्ता नदी जल बंटवारे को लेकर हो रही है. BNP नेताओं का मानना है कि ममता बनर्जी पहले इस समझौते का विरोध करती रही हैं, जिसकी वजह से भारत और बांग्लादेश के बीच यह मुद्दा वर्षों से अटका हुआ है. अजीजुल बरी हेलाल ने कहा, “पहले हमने देखा कि ममता बनर्जी ही तीस्ता बांध और जल समझौते में सबसे बड़ी बाधा थीं. अब भाजपा सरकार बनने के बाद उम्मीद है कि बांग्लादेश सरकार और मोदी सरकार मिलकर इस समझौते को आगे बढ़ा सकती हैं.” उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध दक्षिण एशिया की स्थिरता और विकास के लिए जरूरी हैं. भारत-बांग्लादेश संबंधों पर नजर बांग्लादेश के राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन का असर भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी पड़ सकता है. खासकर सीमा, व्यापार और जल बंटवारे जैसे मुद्दों पर नई राजनीतिक परिस्थितियां अहम भूमिका निभा सकती हैं. BNP नेता ने कहा कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद भारत और बांग्लादेश के बीच मजबूत और शांतिपूर्ण संबंध दोनों देशों के हित में हैं. उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में सहयोग और संवाद और मजबूत होगा.
नेपाल में सुप्रीम कोर्ट के नए चीफ जस्टिस की नियुक्ति को लेकर बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। करीब 70 साल से चली आ रही वरिष्ठता (सीनियरिटी) की परंपरा को तोड़ते हुए प्रधानमंत्री Balendra Shah की अगुवाई वाली संवैधानिक परिषद ने सुप्रीम कोर्ट के चौथे सबसे वरिष्ठ जज Manoj Kumar Sharma को मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश कर दी है। इस फैसले के बाद नेपाल की राजनीति और न्यायपालिका में तीखी बहस शुरू हो गई है। काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार परिषद ने वरिष्ठ जज Sapana Pradhan Malla, Kumar Regmi और Hari Prasad Phuyal को नजरअंदाज करते हुए मनोज कुमार शर्मा के नाम को आगे बढ़ाया। माना जा रहा है कि यह नेपाल के न्यायिक इतिहास में एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि अब तक परंपरा के अनुसार सबसे वरिष्ठ जज को ही चीफ जस्टिस बनाया जाता रहा है। परिषद में हुआ विरोध छह सदस्यीय संवैधानिक परिषद की बैठक में इस फैसले का विरोध भी हुआ। नेशनल असेंबली के अध्यक्ष और विपक्ष के नेता ने वरिष्ठता को दरकिनार करने पर आपत्ति जताई। परिषद के एक सदस्य ने कहा कि स्थापित प्रक्रिया और न्यायिक परंपरा को तोड़ना सही नहीं है, इसलिए विरोध लिखित रूप में दर्ज कराया गया। मार्च में पूर्व चीफ जस्टिस Prakash Man Singh Raut के रिटायर होने के बाद सपना प्रधान मल्ला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी संभाल रही थीं। ऐसे में उन्हें नजरअंदाज किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। PM बालेन शाह ने दिया यह तर्क बैठक में प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि केवल वरिष्ठता के आधार पर नियुक्तियां नहीं होनी चाहिए। उनके मुताबिक चयन प्रक्रिया में योग्यता, विशेषज्ञता और न्याय देने की क्षमता को भी महत्व मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि कार्यक्षमता भी अहम है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञ इस तर्क से पूरी तरह सहमत नजर नहीं आ रहे हैं। Kathmandu University School of Law के प्रोफेसर Bipin Adhikari ने कहा कि संविधान में वरिष्ठता अनिवार्य नहीं है, लेकिन अगर परंपरा तोड़ी जा रही है तो उसके पीछे बेहद मजबूत और पारदर्शी कारण होने चाहिए। उनके मुताबिक बिना ठोस वजह के जूनियर जज को आगे बढ़ाना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर सकता है। न्यायपालिका पर दबाव बढ़ने की आशंका विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से भविष्य में जजों पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। उन्हें डर हो सकता है कि सरकार की नाराजगी उनके प्रमोशन को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि नेपाल में इस नियुक्ति को केवल प्रशासनिक फैसला नहीं बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा माना जा रहा है। नेपाल की राजनीति में पहले ही अस्थिरता और सत्ता संघर्ष के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में चीफ जस्टिस की नियुक्ति को लेकर उठा यह विवाद आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
कुनार में भीषण हमला, कई नागरिकों की मौत अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हालिया युद्धविराम एक बार फिर गंभीर संकट में पड़ गया है। अफगान तालिबान सरकार ने आरोप लगाया है कि पाकिस्तान ने सोमवार को पूर्वी कुनार प्रांत में मोर्टार और मिसाइल हमले किए, जिनमें कम से कम सात लोगों की मौत हो गई, जबकि 80 से अधिक लोग घायल हुए हैं। इन हमलों में असदाबाद शहर और उसके आसपास के कई रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया गया। अफगान अधिकारियों के मुताबिक, सैयद जमालुद्दीन अफगानी विश्वविद्यालय भी हमले की चपेट में आ गया, जिससे उसके भवनों को भारी नुकसान पहुंचा। छात्रों और शिक्षकों में दहशत अफगानिस्तान के उच्च शिक्षा मंत्रालय ने बताया कि घायलों में करीब 30 छात्र और प्रोफेसर शामिल हैं। विश्वविद्यालय परिसर में मची अफरा-तफरी के बाद स्थानीय प्रशासन ने राहत और बचाव अभियान शुरू किया। तालिबान के उप-प्रवक्ता हमदुल्लाह फितरत ने इस हमले को "नागरिकों और शैक्षणिक संस्थानों के खिलाफ अक्षम्य युद्ध अपराध" करार दिया। पाकिस्तान ने आरोपों को किया खारिज वहीं, पाकिस्तान ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने कहा कि उसकी सेना ने किसी विश्वविद्यालय को निशाना नहीं बनाया। सरकार ने अपने बयान में कहा कि पाकिस्तान केवल सटीक और खुफिया जानकारी के आधार पर कार्रवाई करता है। हालांकि, उसने अफगान सीमा के भीतर किसी अन्य सैन्य कार्रवाई से स्पष्ट इनकार नहीं किया। युद्धविराम के बावजूद सीमा पर गोलाबारी दोनों देशों के अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि औपचारिक युद्धविराम लागू होने के बावजूद सीमा पर लगातार गोलीबारी जारी है। कुनार, पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा से लगा एक संवेदनशील प्रांत है, जहां तनाव लगातार बना हुआ है। इस ताजा घटना ने हाल ही में चीन के उरुमकी में हुई शांति वार्ता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। TTP बना सबसे बड़ा विवाद पाकिस्तान लंबे समय से अफगान तालिबान पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को पनाह देने का आरोप लगाता रहा है। इस आतंकी संगठन ने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में कई हमलों को अंजाम दिया है। हालांकि, अफगानिस्तान इन आरोपों को लगातार नकारता आया है। यही मुद्दा दोनों देशों के बीच तनाव की सबसे बड़ी वजह बना हुआ है। चीन की मध्यस्थता भी नहीं ला सकी समाधान अप्रैल की शुरुआत में चीन की मेजबानी में उरुमकी में दोनों देशों के बीच बातचीत हुई थी। लेकिन कोई ठोस समझौता नहीं हो सका। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक दोनों देश एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करेंगे और किसी लिखित समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे, तब तक स्थायी शांति की संभावना बेहद कम है। क्षेत्रीय स्थिरता पर मंडराया खतरा कतर, तुर्किये, सऊदी अरब और चीन जैसे देशों की मध्यस्थता के बावजूद हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। सीमा पर हर नई घटना युद्धविराम को और कमजोर कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जल्द ही कोई विश्वसनीय समाधान नहीं निकाला गया, तो दोनों देशों के बीच संघर्ष और गहरा सकता है।
नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ नई सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री Balendra Shah ने पूर्व और वर्तमान नेताओं व अधिकारियों की संपत्ति की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय पैनल गठित किया है। रिटायर्ड जज करेंगे पैनल की अगुवाई सरकार द्वारा बनाए गए इस पांच सदस्यीय पैनल की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज Rajendra Kumar Bhandari करेंगे। पैनल का मुख्य काम नेताओं और सरकारी अधिकारियों की संपत्तियों व परिसंपत्तियों की जांच करना होगा। निष्पक्ष जांच का दावा कैबिनेट प्रवक्ता Sasmit Pokharel ने बताया कि जांच प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष होगी और कानूनी मानकों ठोस सबूतों के आधार पर की जाएगी। रिपोर्ट के आधार पर होगी कार्रवाई सरकार ने स्पष्ट किया है कि पैनल अपनी रिपोर्ट और सिफारिशें संबंधित एजेंसियों को सौंपेगा, जिसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, अभी तक जांच पूरी करने की समयसीमा तय नहीं की गई है। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह का यह कदम नेपाल में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में बड़ा माना जा रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि जांच रिपोर्ट के बाद सरकार किस तरह की ठोस कार्रवाई करती है। 20.नेपाल में ‘सफेदपोश’ भ्रष्टाचार पर बड़ा प्रहार: 2006 से अब तक नेताओं की संपत्ति की होगी न्यायिक जांच नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री Balendra Shah की सरकार ने एक व्यापक न्यायिक आयोग गठित किया है। यह आयोग 2006 में राजतंत्र समाप्त होने के बाद से लेकर वित्तीय वर्ष 2025-26 तक सार्वजनिक पदों पर रहे नेताओं और अधिकारियों की संपत्ति की जांच करेगा। किन-किन पर होगी जांच? इस जांच के दायरे को बेहद व्यापक रखा गया है। इसमें शामिल हैं: पूर्व राजा Gyanendra Shah पूर्व राष्ट्रपति Ram Baran Yadav, Bidya Devi Bhandari वर्तमान राष्ट्रपति Ram Chandra Poudel पूर्व प्रधानमंत्री जैसे Pushpa Kamal Dahal, K. P. Sharma Oli, Sher Bahadur Deuba, Baburam Bhattarai, Madhav Kumar Nepal, Jhala Nath Khanal अंतरिम सरकारों के प्रमुख और वरिष्ठ नौकरशाह यहां तक कि दिवंगत नेताओं–जैसे गिरिजा प्रसाद कोइराला और सुशील कोइराला–की संपत्तियों की भी जांच की जाएगी, जिससे उनके परिवार और राजनीतिक उत्तराधिकारियों पर भी असर पड़ सकता है। अपने ही सहयोगी भी जांच के दायरे में सरकार ने इस आयोग को पूरी तरह स्वतंत्र और व्यापक बनाया है। वर्तमान स्पीकर और कुछ मौजूदा मंत्री यहां तक कि सत्तारूढ़ दल के नेता Rabi Lamichhane भी जांच के दायरे में आ सकते हैं। कौन कर रहा है जांच की अगुवाई? इस पांच सदस्यीय आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज Rajendra Kumar Bhandari कर रहे हैं। कैबिनेट प्रवक्ता Sasmit Pokharel के अनुसार, जांच पूरी तरह निष्पक्ष होगी कानूनी मानकों और सबूतों के आधार पर की जाएगी युवा आंदोलन के बाद बड़ा फैसला यह कदम मार्च 2025 के चुनाव में भारी जीत के बाद उठाया गया है, जो देश में हुए बड़े युवा-नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद संभव हुआ। नेपाल में यह पहली बार है जब इतने बड़े स्तर पर राजनीतिक और प्रशासनिक वर्ग की संपत्ति की जांच हो रही है। यह कदम देश में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में ऐतिहासिक माना जा रहा है–अब नजर इस पर रहेगी कि आयोग की रिपोर्ट के बाद क्या ठोस कार्रवाई होती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।