Healthy Chutney Recipes: कम समय, आसान सामग्री और बेहतरीन स्वाद के साथ तैयार करें 10 हेल्दी चटनियां, जानें बनाने की विधि, कुकिंग ट्रिक्स, कैलोरी और हेल्थ बेनिफिट्स मोमोज, इडली, डोसा, उत्तपम, पराठा, चीला या पकौड़े—हर स्नैक का स्वाद एक अच्छी चटनी के बिना अधूरा माना जाता है। हालांकि, बाजार में मिलने वाली तैयार चटनियों में अक्सर अधिक नमक, प्रिजर्वेटिव और अतिरिक्त तेल होता है। ऐसे में घर पर बनी ताजी चटनियां स्वाद के साथ पोषण भी देती हैं। अच्छी बात यह है कि इन 10 हेल्दी चटनियों को सिर्फ 20 मिनट में आसानी से तैयार किया जा सकता है। 1. नारियल की चटनी आवश्यक सामग्री ताजा नारियल भुनी चना दाल हरी मिर्च अदरक नमक राई करी पत्ता बनाने की विधि: नारियल, चना दाल, अदरक और मिर्च को पीस लें। ऊपर से राई और करी पत्ते का तड़का लगाएं। कुकिंग ट्रिक: थोड़ा दही मिलाने से चटनी अधिक क्रीमी बनती है। कैलोरी व हेल्थ बेनिफिट्स: लगभग 75 kcal (2 टेबलस्पून) | हेल्दी फैट, फाइबर और मैंगनीज का अच्छा स्रोत। 2. टमाटर-लहसुन चटनी आवश्यक सामग्री टमाटर लहसुन सूखी लाल मिर्च नमक बनाने की विधि: टमाटर और लहसुन को हल्का भूनकर पीस लें। कुकिंग ट्रिक: टमाटर को ज्यादा न पकाएं ताकि ताजगी बनी रहे। कैलोरी व हेल्थ बेनिफिट्स: लगभग 22 kcal | लाइकोपीन और विटामिन C से भरपूर। 3. पुदीना-धनिया चटनी आवश्यक सामग्री पुदीना हरा धनिया अदरक हरी मिर्च नींबू बनाने की विधि: सभी सामग्री को पीसकर ताजी चटनी तैयार करें। कुकिंग ट्रिक: नींबू का रस अंत में डालें ताकि रंग हरा बना रहे। कैलोरी व हेल्थ बेनिफिट्स: लगभग 18 kcal | पाचन में सहायक और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर। 4. मूंगफली चटनी आवश्यक सामग्री भुनी मूंगफली लहसुन लाल मिर्च नमक बनाने की विधि: सभी सामग्री को पीस लें। चाहें तो हल्का तड़का लगाएं। कुकिंग ट्रिक: थोड़ा दही मिलाने से स्वाद और टेक्सचर बेहतर होता है। कैलोरी व हेल्थ बेनिफिट्स: लगभग 95 kcal | प्रोटीन, हेल्दी फैट और विटामिन E का अच्छा स्रोत। 5. तिल-टमाटर चटनी आवश्यक सामग्री सफेद तिल टमाटर लहसुन लाल मिर्च बनाने की विधि: तिल और टमाटर को हल्का भूनकर पीस लें। कुकिंग ट्रिक: तिल को हमेशा धीमी आंच पर भूनें। कैलोरी व हेल्थ बेनिफिट्स: लगभग 65 kcal | कैल्शियम, आयरन और मैग्नीशियम से भरपूर। 6. दही-पुदीना चटनी आवश्यक सामग्री गाढ़ा दही पुदीना हरा धनिया जीरा पाउडर बनाने की विधि: सभी सामग्री को अच्छी तरह फेंटकर मिलाएं। कुकिंग ट्रिक: ठंडा और गाढ़ा दही इस्तेमाल करें। कैलोरी व हेल्थ बेनिफिट्स: लगभग 35 kcal | प्रोबायोटिक्स और कैल्शियम का अच्छा स्रोत। 7. कच्चे आम की चटनी आवश्यक सामग्री कच्चा आम पुदीना हरी मिर्च गुड़ नमक बनाने की विधि: सभी सामग्री को पीस लें। कुकिंग ट्रिक: थोड़ा भुना जीरा डालने से स्वाद बढ़ जाता है। कैलोरी व हेल्थ बेनिफिट्स: लगभग 28 kcal | विटामिन C और फाइबर से भरपूर। 8. चुकंदर-दही चटनी आवश्यक सामग्री उबला चुकंदर दही लहसुन काली मिर्च बनाने की विधि: सभी सामग्री को ब्लेंड कर लें। कुकिंग ट्रिक: चुकंदर पहले से उबालकर ठंडा कर लें। कैलोरी व हेल्थ बेनिफिट्स: लगभग 40 kcal | आयरन, फोलेट और एंटीऑक्सीडेंट का अच्छा स्रोत। 9. भुनी शिमला मिर्च चटनी आवश्यक सामग्री लाल शिमला मिर्च टमाटर लहसुन जैतून का तेल बनाने की विधि: शिमला मिर्च और टमाटर को भूनकर पीस लें। कुकिंग ट्रिक: शिमला मिर्च का छिलका हटाने से चटनी ज्यादा स्मूद बनती है। कैलोरी व हेल्थ बेनिफिट्स: लगभग 30 kcal | विटामिन A और विटामिन C से भरपूर। 10. हरी मटर-पुदीना चटनी आवश्यक सामग्री उबली हरी मटर पुदीना हरा धनिया नींबू नमक बनाने की विधि: सभी सामग्री को ब्लेंड करें और तुरंत परोसें। कुकिंग ट्रिक: मटर को ज्यादा न उबालें ताकि रंग और पोषण बना रहे। कैलोरी व हेल्थ बेनिफिट्स: लगभग 48 kcal | प्लांट प्रोटीन, फाइबर और विटामिन K का अच्छा स्रोत। हेल्दी चटनियां क्यों हैं बेहतर? घर पर बनी चटनियां ताजी सामग्री से तैयार होती हैं और इनमें कृत्रिम रंग, प्रिजर्वेटिव, अतिरिक्त नमक और अनावश्यक तेल नहीं होता। नारियल, मूंगफली, तिल, टमाटर, दही और हरी जड़ी-बूटियां शरीर को विटामिन, मिनरल्स, हेल्दी फैट, प्रोटीन और एंटीऑक्सीडेंट प्रदान करती हैं। ये चटनियां पाचन सुधारने के साथ भोजन का स्वाद और पोषण दोनों बढ़ाती हैं। जरूरी टिप्स हमेशा ताजी सामग्री का इस्तेमाल करें। चटनियों को एयरटाइट कंटेनर में फ्रिज में स्टोर करें। हरी चटनियां 2–3 दिन और नारियल की चटनी 24 घंटे के भीतर उपयोग करें। जरूरत से ज्यादा पानी न मिलाएं, इससे स्वाद और शेल्फ लाइफ दोनों प्रभावित होती हैं। अगर आप रोज एक जैसी चटनी खाकर बोर हो चुके हैं, तो इन 10 हेल्दी चटनियों को अपनी रसोई में जरूर शामिल करें। ये मोमोज, इडली, डोसा, उत्तपम, पराठा, चीला, सैंडविच और पकौड़ों का स्वाद कई गुना बढ़ा देंगी।
नई दिल्ली, एजेंसियां। डायबिटीज से जूझ रहे लाखों मरीजों के लिए राहत भरी खबर है। डेनमार्क की दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने भारत में दुनिया का पहला लंबे समय तक असर करने वाला साप्ताहिक बेसल इंसुलिन 'अविक्ली' (इंसुलिन आइकोडेक) लॉन्च किया है। कंपनी का दावा है कि अब कई मरीजों को रोजाना इंसुलिन इंजेक्शन लेने की आवश्यकता नहीं होगी और सप्ताह में केवल एक बार इंजेक्शन लेने से ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी। भारत को दुनिया की 'डायबिटीज कैपिटल' कहा जाता है इसका कारण हैं करोड़ों लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं। टाइप-1 और कई टाइप-2 डायबिटीज मरीजों को रोजाना इंसुलिन लेना पड़ता है। गंभीर मामलों में मरीजों को दिन में दो या तीन बार भी इंजेक्शन लगवाने पड़ते हैं। ऐसे में नई साप्ताहिक इंसुलिन थेरेपी मरीजों के जीवन को अधिक सुविधाजनक बना सकती है। कंपनी के अनुसार कंपनी के अनुसार, अविक्ली पहला ऐसा बेसल इंसुलिन है जिसे क्लिनिकल उपयोग के लिए मंजूरी मिली है। इससे सालभर में लगने वाले इंसुलिन इंजेक्शनों की संख्या 365 से घटकर केवल 52 रह जाएगी। यह दवा टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित वयस्क मरीजों के लिए विकसित की गई है। हालांकि, डॉक्टर मरीज की स्वास्थ्य स्थिति, ब्लड शुगर के स्तर और अन्य चिकित्सीय जरूरतों का आकलन करने के बाद ही इसकी सलाह देंगे। नोवो नॉर्डिस्क इंडिया के प्रबंध नोवो नॉर्डिस्क इंडिया के प्रबंध निदेशक विक्रांत श्रोत्रिय के अनुसार, 700 यूनिट वाले 1 एमएल पेन की कीमत 2,611 रुपये और 2,100 यूनिट वाले 3 एमएल पेन की कीमत 7,833 रुपये रखी गई है। कंपनी का कहना है कि इसकी प्रति यूनिट लागत लगभग 3.73 रुपये पड़ती है, जो पारंपरिक दैनिक बेसल इंसुलिन की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत तक किफायती हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नई तकनीक इंसुलिन थेरेपी को अधिक सुविधाजनक बनाएगी, लेकिन मरीजों को बिना चिकित्सकीय सलाह के उपचार में कोई बदलाव नहीं करना चाहिए। डॉक्टर की निगरानी में ही इस नई दवा का उपयोग सुरक्षित और प्रभावी माना जाएगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत में डायबिटीज के इलाज के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। वैश्विक दवा कंपनी Novo Nordisk ने Awiqli नामक दुनिया की पहली सप्ताह में एक बार दी जाने वाली बेसल इंसुलिन भारत में लॉन्च कर दी है। इससे टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों को रोजाना इंसुलिन इंजेक्शन लेने की आवश्यकता नहीं होगी। रोज 365 नहीं, साल में सिर्फ 52 इंजेक्शन अब तक इंसुलिन पर निर्भर मरीजों को हर दिन इंजेक्शन लेना पड़ता था। नई Awiqli इंसुलिन के आने से मरीजों को सप्ताह में केवल एक बार इंजेक्शन लेना होगा। यानी पूरे साल में 365 की जगह केवल 52 इंजेक्शन ही पर्याप्त होंगे। टाइप-1 और टाइप-2 दोनों मरीजों के लिए उपयोगी कंपनी के अनुसार, यह दवा टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज दोनों प्रकार के मरीजों के लिए विकसित की गई है। क्लिनिकल ट्रायल में इसने लंबे समय तक ब्लड शुगर नियंत्रित रखने और HbA1c स्तर में सुधार करने के अच्छे परिणाम दिखाए हैं। मरीजों की जिंदगी होगी आसान विशेषज्ञों का मानना है कि सप्ताह में एक बार इंसुलिन लेने की सुविधा से मरीजों पर रोजाना इंजेक्शन का मानसिक और शारीरिक बोझ कम होगा। साथ ही उपचार का नियमित पालन भी बेहतर होने की उम्मीद है। डॉक्टर की सलाह पर ही करें इस्तेमाल स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि यह नई इंसुलिन दवा केवल डॉक्टर की सलाह पर ही इस्तेमाल की जानी चाहिए। मरीजों की स्थिति और ब्लड शुगर के स्तर के अनुसार चिकित्सक ही इसकी सही मात्रा और उपयोग का निर्णय लेंगे।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल सरकार ने महिला सशक्तिकरण और पुलिस व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। करीब 26 साल बाद कोलकाता पुलिस के दो प्रमुख मुख्य पुलिस थानों में महिला अधिकारियों को ऑफिसर-इन-चार्ज (ओसी) की जिम्मेदारी सौंपी गई है। लंबे समय तक महिला अधिकारियों की नियुक्ति मुख्य रूप से महिला पुलिस थानों तक ही सीमित रही, लेकिन अब उन्हें सामान्य पुलिस थानों की कमान भी सौंपी गई है। दो अनुभवी महिला अधिकारियों को मिली जिम्मेदारी तबादला आदेश के तहत सरशुना पुलिस स्टेशन की नई कार्यवाहक अधिकारी (ओसी) रूपा सिंह को बनाया गया है। इससे पहले वह टॉलीगंज महिला पुलिस स्टेशन की प्रभारी थीं। वहीं, सिंथी पुलिस स्टेशन की कमान चमेली मुखर्जी को सौंपी गई है, जो पहले उल्टोडांगा महिला पुलिस स्टेशन में ओसी के पद पर कार्यरत थीं। कोलकाता पुलिस के 33 पुलिस स्टेशनों में इंस्पेक्टर स्तर पर किए गए इस फेरबदल को पुलिस प्रशासन में महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। वर्षों बाद मुख्य थानों में महिला नेतृत्व जानकारी के अनुसार, वाममोर्चा शासनकाल के दौरान वर्ष 2010 में आखिरी बार किसी महिला इंस्पेक्टर को कोलकाता के मुख्य पुलिस स्टेशन का प्रभार मिला था। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में महिला पुलिस थानों का विस्तार तो हुआ, लेकिन मुख्य पुलिस थानों की जिम्मेदारी महिलाओं को नहीं सौंपी गई। अब इस फैसले को पुलिस व्यवस्था में लैंगिक समानता की दिशा में अहम पहल माना जा रहा है। महिला सुरक्षा को मिलेगी नई मजबूती हाल के वर्षों में कोलकाता पुलिस ने महिला सहायता केंद्रों की स्थापना और महिला अधिकारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू किए हैं। इन पहलों का उद्देश्य महिलाओं को एक ही स्थान पर बेहतर पुलिस सहायता उपलब्ध कराना और शिकायतों के त्वरित निस्तारण को सुनिश्चित करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्य पुलिस थानों में महिला नेतृत्व बढ़ने से महिला सुरक्षा को और मजबूती मिलेगी तथा पुलिस व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका पहले से अधिक प्रभावी होगी।
अगर परिवार में किसी को डायबिटीज है, तो अक्सर माता-पिता को यह चिंता रहती है कि कहीं उनके बच्चों को भी भविष्य में यह बीमारी न हो जाए। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि पारिवारिक इतिहास जोखिम जरूर बढ़ाता है, लेकिन यह तय नहीं करता कि बच्चे को डायबिटीज होगी ही। सही खानपान, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। एंडोक्राइनोलॉजिस्ट्स के अनुसार, बचपन में अपनाई गई अच्छी आदतें लंबे समय तक मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। क्या केवल जेनेटिक्स ही जिम्मेदार हैं? विशेषज्ञों के मुताबिक, टाइप-2 डायबिटीज केवल आनुवंशिक कारणों से नहीं होती। यह जेनेटिक प्रवृत्ति और जीवनशैली दोनों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है। यदि माता-पिता या भाई-बहन को डायबिटीज है, तो बच्चे में इंसुलिन रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ सकता है। लेकिन यह जोखिम बीमारी में बदलेगा या नहीं, यह काफी हद तक उसकी रोजमर्रा की आदतों पर निर्भर करता है। बचपन से डालें स्वस्थ खानपान की आदत डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों को सख्त डाइट पर रखने की बजाय पूरे परिवार में हेल्दी खाने की आदत विकसित करनी चाहिए। दैनिक भोजन में शामिल करें: ताजे फल हरी सब्जियां साबुत अनाज दालें और फलियां कम वसा वाले प्रोटीन हेल्दी फैट्स वहीं, इन चीजों का सेवन सीमित रखें: मीठे पेय पदार्थ पैकेज्ड स्नैक्स प्रोसेस्ड फूड फास्ट फूड विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे वही आदतें सीखते हैं जो वे घर में रोज देखते हैं। रोजाना शारीरिक गतिविधि है जरूरी बच्चों को जिम भेजने की जरूरत नहीं है। उन्हें ऐसी गतिविधियों के लिए प्रेरित करें जिनमें उन्हें आनंद आता हो। बेहतर विकल्प हो सकते हैं: साइकिल चलाना तैराकी क्रिकेट या फुटबॉल खेलना दौड़ना डांस करना स्केटिंग आउटडोर गेम्स डॉक्टरों की सलाह है कि बच्चों को हर दिन कम से कम 60 मिनट मध्यम से तेज शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए। पर्याप्त नींद भी उतनी ही महत्वपूर्ण अक्सर लोग खानपान और एक्सरसाइज पर ध्यान देते हैं, लेकिन अच्छी नींद को नजरअंदाज कर देते हैं। कम नींद लेने से शरीर के उन हार्मोन्स पर असर पड़ता है जो नियंत्रित करते हैं: भूख भूख बढ़ाने वाले हार्मोन ब्लड शुगर वजन इसलिए बच्चों के लिए नियमित सोने और जागने का समय तय करना जरूरी है। साथ ही रात में मोबाइल और अन्य स्क्रीन का उपयोग कम करना चाहिए। स्क्रीन टाइम रखें सीमित लंबे समय तक मोबाइल, टीवी या टैबलेट का इस्तेमाल बच्चों की शारीरिक गतिविधि कम कर देता है, जिससे: वजन बढ़ सकता है मोटापे का खतरा बढ़ता है नींद प्रभावित होती है टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है इसलिए स्क्रीन टाइम और एक्टिव प्ले के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। इन शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें यदि परिवार में डायबिटीज का इतिहास है और बच्चे में नीचे दिए गए लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें। बार-बार प्यास लगना बार-बार पेशाब आना बिना कारण वजन घटना लगातार थकान महसूस होना गर्दन या बगल में काले, मखमली धब्बे (Acanthosis Nigricans) तेजी से वजन बढ़ना या मोटापा जरूरत पड़ने पर डॉक्टर ब्लड शुगर टेस्ट, बीएमआई और कमर की माप जैसी जांच की सलाह भी दे सकते हैं। बच्चे वही सीखते हैं जो माता-पिता करते हैं विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चे केवल सलाह नहीं, बल्कि अपने माता-पिता की आदतों की नकल करते हैं। यदि माता-पिता: संतुलित भोजन खाते हैं नियमित व्यायाम करते हैं समय-समय पर हेल्थ चेकअप करवाते हैं मीठे पेय पदार्थों से बचते हैं पर्याप्त नींद लेते हैं तो बच्चों में भी स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की संभावना अधिक रहती है। परिवार में डायबिटीज है तो घबराएं नहीं, सतर्क रहें डॉक्टरों का मानना है कि पारिवारिक इतिहास को डर की तरह नहीं, बल्कि समय रहते बचाव करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए। जेनेटिक्स बदले नहीं जा सकते, लेकिन सही जीवनशैली अपनाकर भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यदि बच्चे में डायबिटीज से जुड़े लक्षण दिखाई दें या परिवार में बीमारी का मजबूत इतिहास हो, तो चिकित्सक से व्यक्तिगत सलाह अवश्य लें।
US-Iran Conflict: अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम टूटने के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव एक बार फिर तेज हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कहा है कि अंतरिम युद्धविराम (सीजफायर) अब समाप्त हो चुका है। लगातार दो दिनों से दोनों देशों के बीच हमले जारी हैं। इस बीच, पहले मध्यस्थता की भूमिका निभाने की कोशिश कर चुका पाकिस्तान अब दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील कर रहा है। पाकिस्तान ने जताई चिंता पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा शुरू हुआ सैन्य संघर्ष किसी के हित में नहीं है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में सभी पक्षों से संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की, जिनसे क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को नुकसान पहुंचे। पाकिस्तान ने कहा कि स्थायी समाधान केवल संवाद, कूटनीति और बातचीत से ही संभव है। मध्यस्थता की पेशकश पाकिस्तान ने यह भी कहा कि यदि दोनों पक्ष सहमत हों तो इस्लामाबाद अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि पहले हुए समझौतों और प्रतिबद्धताओं का सम्मान किया जाना चाहिए ताकि क्षेत्र में शांति बनी रहे। ट्रंप ने कहा- सीजफायर खत्म अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि दोनों देशों के बीच हुआ अंतरिम समझौता अब समाप्त हो चुका है। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कूटनीतिक बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। ट्रंप के बयान के बाद वैश्विक बाजारों में भी असर देखने को मिला और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेजी दर्ज की गई। दोनों ओर से जारी हैं हमले अमेरिका ने लगातार दूसरे दिन ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए। इसके जवाब में ईरान ने बहरीन, कुवैत और कतर में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इन घटनाओं के बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है तथा व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष की आशंका जताई जा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य बना तनाव का केंद्र विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा तनाव का सबसे बड़ा केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल निर्यात होता है। यदि संघर्ष और बढ़ता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति तथा समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकता है। ईरान का सख्त रुख ईरान के वरिष्ठ नेताओं ने भी अमेरिका को चेतावनी दी है कि यदि सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो उसका जवाब और कड़े तरीके से दिया जाएगा। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय अधिकारों की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगा। बढ़ी वैश्विक चिंता अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा शुरू हुए सैन्य टकराव ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की अपील की है, ताकि पश्चिम एशिया में व्यापक युद्ध की स्थिति से बचा जा सके।
आज के समय में डायबिटीज भारत में तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में से एक बन चुकी है। मोटापा, अनियमित खानपान और खराब लाइफस्टाइल के कारण बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। आमतौर पर लोगों के बीच यह धारणा बनी हुई है कि डायबिटीज सिर्फ ज्यादा चीनी या मिठाई खाने से होती है और अगर चीनी खाना बंद कर दिया जाए तो ब्लड शुगर पूरी तरह नियंत्रित हो जाएगा। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सच्चाई इससे कहीं ज्यादा जटिल है। क्या सिर्फ चीनी खाने से होती है डायबिटीज? विशेषज्ञों के अनुसार, टाइप-2 डायबिटीज केवल चीनी खाने से नहीं होती। यह एक मेटाबॉलिक बीमारी है, जिसमें इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, तनाव, आनुवंशिक कारण और असंतुलित आहार जैसी कई चीजें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं, तो ब्लड में ग्लूकोज का स्तर बढ़ने लगता है। लंबे समय तक यही स्थिति टाइप-2 डायबिटीज का कारण बन सकती है। इंसुलिन रेजिस्टेंस क्या है? इंसुलिन एक हार्मोन है, जो पैंक्रियाज द्वारा बनाया जाता है और शरीर की कोशिकाओं तक ग्लूकोज पहुंचाने का काम करता है। लेकिन जब शरीर इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता, तो इसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है। इस स्थिति में पैंक्रियाज को अधिक इंसुलिन बनाना पड़ता है और धीरे-धीरे उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है। परिणामस्वरूप ब्लड शुगर बढ़ने लगता है। डायबिटीज के प्रमुख कारण मोटापा और बढ़ा हुआ वजन पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी इंसुलिन रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ा सकती है। वजन कम करने से डायबिटीज के जोखिम को काफी हद तक घटाया जा सकता है। शारीरिक गतिविधियों की कमी नियमित व्यायाम न करने से शरीर ग्लूकोज का सही उपयोग नहीं कर पाता, जिससे ब्लड शुगर प्रभावित होता है। पारिवारिक इतिहास यदि माता-पिता, दादा-दादी या अन्य करीबी रिश्तेदारों को डायबिटीज है, तो इस बीमारी का खतरा बढ़ सकता है। तनाव और नींद की कमी लगातार तनाव और पर्याप्त नींद न लेने से शरीर का हार्मोनल संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे ब्लड शुगर लेवल बढ़ने का जोखिम रहता है। सिर्फ चीनी नहीं, इन चीजों से भी बनाएं दूरी ब्लड शुगर नियंत्रित रखने के लिए केवल मिठाई छोड़ना पर्याप्त नहीं है। इन चीजों का सेवन भी सीमित करना चाहिए— व्हाइट ब्रेड मैदा और उससे बनी चीजें प्रोसेस्ड फूड केक, पेस्ट्री और बेकरी उत्पाद अत्यधिक नमक शुगरी ड्रिंक्स और सॉफ्ट ड्रिंक्स ब्लड शुगर कंट्रोल करने का सही तरीका डायबिटीज को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए इन बातों का पालन जरूरी है— संतुलित और पौष्टिक आहार लें। रोजाना नियमित व्यायाम करें। वजन को नियंत्रित रखें। पर्याप्त नींद लें। तनाव कम करने की कोशिश करें। डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाएं समय पर लें। समय-समय पर ब्लड शुगर की जांच कराते रहें। डायबिटीज एक बहुआयामी बीमारी है और इसका इलाज सिर्फ चीनी छोड़ने तक सीमित नहीं है। सही जीवनशैली अपनाकर और डॉक्टर की सलाह का पालन करके ब्लड शुगर को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है और भविष्य में होने वाली जटिलताओं के खतरे को कम किया जा सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। आज की व्यस्त जीवनशैली, लंबे समय तक बैठकर काम करने की आदत और असंतुलित खानपान के कारण कई लोग कम उम्र में ही गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञ नियमित शारीरिक गतिविधि को स्वस्थ जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। हर सुबह करीब 30 मिनट की मॉर्निंग वॉक न केवल शरीर को सक्रिय रखती है, बल्कि कई बीमारियों के जोखिम को भी कम करने में मदद कर सकती है। दिल और डायबिटीज के लिए फायदेमंद तेज कदमों से की गई सुबह की सैर हृदय की धड़कन और रक्त संचार को बेहतर बनाती है। नियमित वॉक से उच्च रक्तचाप और खराब कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है, जिससे हृदय रोगों का खतरा घट सकता है। इसके अलावा, पैदल चलने से शरीर की मांसपेशियां रक्त में मौजूद अतिरिक्त ग्लूकोज का उपयोग ऊर्जा के रूप में करती हैं, जिससे ब्लड शुगर नियंत्रित रखने में सहायता मिलती है और टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम कम हो सकता है। वजन नियंत्रण और मानसिक स्वास्थ्य में सहायक यदि जिम जाने का समय नहीं है, तो मॉर्निंग वॉक एक सरल और प्रभावी विकल्प हो सकता है। नियमित तेज चाल से चलने पर अतिरिक्त कैलोरी खर्च होती है और मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है, जिससे वजन नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। वहीं, सुबह की ताजी हवा और प्राकृतिक वातावरण तनाव कम करने में भी सहायक माने जाते हैं। पैदल चलने से एंडोर्फिन जैसे "फील-गुड" हार्मोन का स्तर बढ़ सकता है, जिससे तनाव, चिंता और उदासी जैसी समस्याओं में राहत मिल सकती है। जोड़ों और हड्डियों को भी मिलता है लाभ नियमित मॉर्निंग वॉक से जोड़ों की लचक बनाए रखने और मांसपेशियों को सक्रिय रखने में मदद मिलती है। सुबह की हल्की धूप शरीर को विटामिन-डी प्राप्त करने में भी सहायक हो सकती है, जो हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, किसी भी नई व्यायाम दिनचर्या की शुरुआत करने से पहले, विशेष रूप से यदि पहले से कोई बीमारी हो, तो डॉक्टर की सलाह लेना उचित रहता है। नियमित मॉर्निंग वॉक स्वस्थ जीवनशैली का प्रभावी हिस्सा बन सकती है।
आजकल बदलती जीवनशैली, घंटों बैठकर काम करने की आदत और असंतुलित खानपान के कारण डायबिटीज और हाई ब्लड शुगर की समस्या तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, रोजमर्रा की कुछ छोटी आदतें ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। इन्हीं में से एक है खाना खाने के बाद हल्की सैर करना। कानपुर के अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल के कंसल्टेंट क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डॉ. आशीष मेहरोत्रा के अनुसार, भोजन के बाद 10 से 20 मिनट तक टहलना ब्लड शुगर को नियंत्रित करने और पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकता है। खाना खाने के बाद शरीर में क्या होता है? भोजन करने के बाद शरीर कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज में बदलता है, जो खून में पहुंचता है। यदि भोजन में कार्बोहाइड्रेट या मीठी चीजें अधिक हों तो ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकती है। ऐसे में हल्की वॉक करने से शरीर की मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं और वे ग्लूकोज का उपयोग ऊर्जा के रूप में करने लगती हैं। इससे खून में मौजूद अतिरिक्त शुगर कम होने लगती है और ब्लड शुगर का स्तर संतुलित रहता है। खाना खाने के बाद टहलने के फायदे 1. ब्लड शुगर में अचानक बढ़ोतरी को रोकता है भोजन के बाद होने वाले शुगर स्पाइक को कम करने में मदद मिलती है, जो डायबिटीज और प्रीडायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद फायदेमंद है। 2. इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार नियमित वॉक करने से शरीर इंसुलिन के प्रति बेहतर प्रतिक्रिया देता है, जिससे ग्लूकोज आसानी से कोशिकाओं तक पहुंच पाता है। 3. पाचन तंत्र को बनाता है मजबूत खाने के बाद टहलने से बाउल मूवमेंट बेहतर होता है और पेट फूलना, भारीपन तथा अपच जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है। 4. वजन नियंत्रित रखने में मददगार हल्की शारीरिक गतिविधि कैलोरी बर्न करने में मदद करती है, जिससे मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कम हो सकता है। 5. हार्ट और मेटाबॉलिज्म को फायदा ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और शरीर का मेटाबॉलिज्म सक्रिय रहता है, जिससे समग्र स्वास्थ्य को लाभ मिलता है। ब्लड शुगर कंट्रोल करने के लिए अपनाएं ये आदतें खाना खाने के बाद 10-20 मिनट तक टहलें। ज्यादा मीठा और ओवरईटिंग से बचें। भोजन में फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ शामिल करें। पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। शुगरी ड्रिंक्स और प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करें। प्रोटीन, हेल्दी फैट और कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट वाला संतुलित आहार लें। नियमित व्यायाम करें और वजन नियंत्रित रखें। भोजन के तुरंत बाद लेटने से बचें। यदि डायबिटीज या प्रीडायबिटीज है तो नियमित ब्लड शुगर जांच करवाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि खाने के बाद की छोटी-सी सैर लंबे समय में ब्लड शुगर नियंत्रण, बेहतर पाचन और अच्छी नींद जैसी कई स्वास्थ्य समस्याओं में लाभ पहुंचा सकती है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में खराब खानपान और धूप से दूरी के कारण विटामिन डी की कमी तेजी से बढ़ रही है। लंबे समय तक इस जरूरी विटामिन की कमी केवल हड्डियों को ही नहीं, बल्कि शरीर के शुगर मेटाबॉलिज्म को भी प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम विटामिन डी स्तर टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है। इंसुलिन के लिए क्यों जरूरी है विटामिन डी? विटामिन डी केवल कैल्शियम के अवशोषण और हड्डियों की मजबूती तक सीमित नहीं है। यह इंसुलिन के उत्पादन और उसके प्रभावी कार्य में भी मदद करता है। इंसुलिन वह हार्मोन है जो रक्त में मौजूद शुगर को नियंत्रित करता है। अध्ययनों के अनुसार, जिन लोगों में विटामिन डी की कमी होती है, उनमें इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में शरीर इंसुलिन का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पाता, जिससे टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है। डायबिटीज के साथ बढ़ सकता है अन्य बीमारियों का खतरा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को विटामिन डी की कमी और डायबिटीज दोनों हैं, तो माइक्रोवैस्कुलर जटिलताओं का खतरा भी बढ़ सकता है। इसका असर शरीर की छोटी रक्त वाहिकाओं पर पड़ता है, जिससे कई गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। इनमें शामिल हैं: डायबिटिक रेटिनोपैथी (आंखों की बीमारी) डायबिटिक नेफ्रोपैथी (किडनी को नुकसान) डायबिटिक न्यूरोपैथी (नसों की कमजोरी) विटामिन डी की कमी से शरीर में सूजन बढ़ सकती है, जो रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचाकर ब्लड फ्लो को प्रभावित कर सकती है। विटामिन डी की कमी के संकेत लगातार थकान और कमजोरी मांसपेशियों में दर्द हड्डियों में दर्द बार-बार बीमार पड़ना ऊर्जा की कमी ब्लड शुगर नियंत्रण में परेशानी विटामिन डी की कमी कैसे दूर करें? विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ आसान उपाय अपनाकर विटामिन डी के स्तर को बेहतर बनाया जा सकता है: रोज सुबह 20 से 30 मिनट धूप में समय बिताएं। आहार में अंडा, मशरूम, फैटी फिश, दूध और दही शामिल करें। नियमित रूप से व्यायाम, योग और वॉक करें। डॉक्टर की सलाह पर विटामिन डी सप्लीमेंट लें। जरूरत पड़ने पर 25(OH)D टेस्ट करवाएं। क्या केवल विटामिन डी की कमी से डायबिटीज होती है? स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि डायबिटीज एक बहु-कारक बीमारी है। केवल विटामिन डी की कमी को इसका एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। हालांकि, पर्याप्त विटामिन डी स्तर बनाए रखना बेहतर इंसुलिन संवेदनशीलता और समग्र स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
हाल ही में सामने आई एक पायलट स्टडी में टाइप-2 डायबिटीज मेलिटस (T2DM) और कोरोनरी आर्टेरियोस्क्लेरोटिक हार्ट डिजीज के बीच गट माइक्रोबायोटा और मेटाबोलिक बदलावों को लेकर महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि ये बदलाव कार्डियोमेटाबोलिक बीमारियों के संभावित बायोमार्कर हो सकते हैं। स्टडी में क्या किया गया अध्ययन? शोधकर्ताओं ने कुल 30 प्रतिभागियों के फीकल और प्लाज्मा सैंपल का विश्लेषण किया, जिनमें शामिल थे— 10 स्वस्थ व्यक्ति 10 टाइप-2 डायबिटीज मरीज 10 ऐसे मरीज जिनमें डायबिटीज के साथ हार्ट डिजीज भी थी इस दौरान मेटाजीनोमिक सीक्वेंसिंग और लिक्विड क्रोमैटोग्राफी–मास स्पेक्ट्रोमेट्री (LC-MS) तकनीक का उपयोग किया गया। गट माइक्रोबायोटा में क्या बदलाव मिले? स्टडी में कई बैक्टीरियल स्पीशीज में अंतर पाया गया, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं: Prevotella disiens Bacteroides sp._CAG_875 Sutterella wadsworthensis Paraprevotella clara Anaerobutyricum hallii शोधकर्ताओं के अनुसार, खासकर Bacteroides sp._CAG_875 एक महत्वपूर्ण संभावित बायोमार्कर के रूप में उभरा, जो स्वस्थ व्यक्तियों और T2DM-CAD मरीजों के बीच स्पष्ट अंतर दिखाने में सक्षम रहा। हालांकि कुल माइक्रोबायोटा विविधता में बड़ा अंतर नहीं पाया गया, लेकिन विशिष्ट बैक्टीरिया में महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए। मेटाबोलिक बदलाव और संभावित संकेत शोध में 42 अलग-अलग मेटाबोलाइट्स की पहचान की गई, जिनमें शामिल हैं: फ्रक्टोज गैलिक एसिड पाइरोग्लूटामिक एसिड एडिपिक एसिड सबेरिक एसिड 12-ketolithocholic acid (12-ketoLCA) इनमें 12-ketoLCA को सबसे अहम संभावित बायोमार्कर माना गया, जो बाइल एसिड मेटाबॉलिज्म और मेटाबोलिक डिसफंक्शन से जुड़ा हो सकता है। “गट-हार्ट एक्सिस” पर बड़ा संकेत स्टडी में यह भी पाया गया कि गट माइक्रोब्स और मेटाबोलाइट्स के बीच गहरा संबंध है, जो “gut–heart axis” की ओर संकेत करता है। यह डायबिटीज से जुड़ी हार्ट बीमारियों में एक अहम भूमिका निभा सकता है। इसके अलावा अमीनो एसिड, लिनोलिक एसिड और ग्लूटामेट मेटाबॉलिज्म जैसे पाथवे में भी बदलाव देखे गए, जो इंसुलिन रेजिस्टेंस और कार्डियोवस्कुलर डिजीज से जुड़े हैं। सीमाएं और आगे की जरूरत शोधकर्ताओं ने माना कि यह एक छोटा पायलट अध्ययन था, इसलिए निष्कर्षों को अभी शुरुआती स्तर का माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि: सैंपल साइज छोटा था मेकैनिज्म की पुष्टि बाकी है बड़े और लंबे समय के अध्ययन की जरूरत है
Topical Corticosteroids यानी त्वचा पर इस्तेमाल होने वाली स्टेरॉयड क्रीम और लोशन को आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है। इनका इस्तेमाल एक्जिमा, सोरायसिस और अन्य सूजन वाली त्वचा संबंधी बीमारियों के इलाज में लंबे समय से किया जाता रहा है। लेकिन अब एक नई रिसर्च में दावा किया गया है कि इन दवाओं का लंबे समय तक या ज्यादा ताकत वाली मात्रा में इस्तेमाल Type 2 Diabetes के खतरे को बढ़ा सकता है। लाखों लोगों पर हुई स्टडी यह बड़ी रिसर्च दक्षिण कोरिया में की गई, जिसमें 6.85 लाख से ज्यादा वयस्कों के स्वास्थ्य डेटा का विश्लेषण किया गया। स्टडी में शामिल सभी लोग शुरुआत में डायबिटीज से मुक्त थे। शोधकर्ताओं ने पांच साल की अवधि में Topical Corticosteroids के इस्तेमाल का अध्ययन किया। इसमें दवा की ताकत (Potency), उपयोग की अवधि और कितनी बार दवा लिखी गई, जैसे पहलुओं को शामिल किया गया। इसके बाद प्रतिभागियों को अगले छह साल तक फॉलो किया गया ताकि नए Type 2 Diabetes मामलों की पहचान की जा सके। सामान्य इस्तेमाल में नहीं मिला बड़ा खतरा रिसर्च में यह पाया गया कि सामान्य तरीके से इस्तेमाल की जाने वाली स्टेरॉयड क्रीम और लोशन से डायबिटीज का जोखिम उल्लेखनीय रूप से नहीं बढ़ा। हालांकि, जब शोधकर्ताओं ने दवा के उपयोग के तरीके और अवधि का विस्तार से अध्ययन किया, तब कुछ अहम जोखिम सामने आए। ज्यादा ताकत वाली स्टेरॉयड से बढ़ा जोखिम स्टडी के अनुसार– High-Potency स्टेरॉयड इस्तेमाल करने वालों में Type 2 Diabetes का खतरा 15% ज्यादा पाया गया जिन लोगों को 10 या उससे ज्यादा बार यह दवाएं प्रिस्क्राइब की गईं, उनमें जोखिम 26% तक बढ़ा छह महीने या उससे ज्यादा समय तक लगातार इस्तेमाल करने वालों में डायबिटीज का खतरा 45% तक बढ़ गया वहीं कम ताकत वाली स्टेरॉयड, कम अवधि तक इस्तेमाल और 10 से कम प्रिस्क्रिप्शन वाले मरीजों में जोखिम काफी कम या सामान्य रहा। क्यों बढ़ सकता है खतरा? शोधकर्ताओं का मानना है कि लंबे समय तक या ज्यादा ताकत वाली स्टेरॉयड के इस्तेमाल से शरीर में दवा का अवशोषण बढ़ सकता है। इससे ग्लूकोज कंट्रोल और मेटाबॉलिज्म प्रभावित हो सकता है, जो आगे चलकर डायबिटीज के खतरे को बढ़ा सकता है। डॉक्टरों को क्या सलाह दी गई? विशेषज्ञों ने कहा कि इस रिसर्च का मतलब यह नहीं है कि Topical Steroids का इस्तेमाल बंद कर दिया जाए। लेकिन डॉक्टरों को सलाह दी गई है कि वे– कम से कम प्रभावी ताकत वाली दवा दें इलाज की अवधि छोटी रखें लंबे समय तक इलाज कराने वाले मरीजों की नियमित मॉनिटरिंग करें मरीजों के लिए क्या जरूरी है? विशेषज्ञों का कहना है कि बिना डॉक्टर की सलाह के लंबे समय तक स्टेरॉयड क्रीम का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। खासकर वे लोग जो पहले से मोटापा, हाई ब्लड शुगर या डायबिटीज के जोखिम से जूझ रहे हैं, उन्हें अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है। यह रिसर्च Topical Steroids की सामान्य सुरक्षा को लेकर भरोसा तो देती है, लेकिन साथ ही लंबे और ज्यादा शक्तिशाली इस्तेमाल के दौरान सतर्क रहने की भी सलाह देती है।
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों पर की गई एक नई रिसर्च ने यह संकेत दिया है कि नाइट शिफ्ट में काम करना टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकता है। 10 दिनों तक चले इस ऑब्जर्वेशनल अध्ययन में पाया गया कि रात में काम करने से खानपान की आदतें, जागने का समय और ब्लड शुगर का उतार-चढ़ाव काफी प्रभावित होता है। स्टडी में क्या पाया गया? इस अध्ययन में टाइप 2 डायबिटीज से पीड़ित 37 हेल्थकेयर वर्कर्स को शामिल किया गया, जिनमें से अधिकतर महिलाएं थीं और नर्स या मिडवाइफ के रूप में कार्यरत थीं। रिसर्च के दौरान प्रतिभागियों की ब्लड शुगर, फिजिकल एक्टिविटी, डाइट और नींद के पैटर्न को बारीकी से मॉनिटर किया गया। हालांकि औसत ब्लड शुगर लेवल में खास अंतर नहीं पाया गया, लेकिन ग्लूकोज में उतार-चढ़ाव (ग्लाइसेमिक वेरिएबिलिटी) नाइट शिफ्ट के दौरान ज्यादा देखा गया। खासतौर पर ‘मीन एब्सोल्यूट ग्लूकोज चेंज’ और ‘कंटीन्यूस ओवरलैपिंग नेट ग्लाइसेमिक एक्शन’ जैसे संकेतकों में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो यह दिखाता है कि रात में काम करने से ब्लड शुगर ज्यादा अस्थिर हो सकता है। खानपान पर असर नाइट शिफ्ट के दौरान लोगों की खाने की आदतों में भी बड़ा बदलाव देखा गया। इन दिनों में कैलोरी इनटेक सबसे ज्यादा (लगभग 2199 kcal) रहा। साथ ही मीठे स्नैक्स का सेवन भी बढ़ गया - जो कुल ऊर्जा का करीब 13.4% था, जबकि आराम के दिनों में यह घटकर 7.8% रह गया। खाने की संख्या भी नाइट शिफ्ट में सबसे ज्यादा रही (औसतन 7 बार), जबकि आराम के दिनों में यह घटकर लगभग 3.4 बार रह गई। एक्टिविटी और जागने का समय रात में काम करने वाले लोग ज्यादा समय तक जागते रहे - औसतन 22 घंटे से अधिक। इसके साथ ही उनकी फिजिकल एक्टिविटी भी बढ़ी, जहां स्टेप काउंट 13,775 तक पहुंच गया। यह बदलाव शरीर के मेटाबॉलिज्म और शुगर कंट्रोल को प्रभावित कर सकते हैं। क्यों है यह चिंता का विषय? विशेषज्ञों के अनुसार, नाइट शिफ्ट में काम करने से शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक प्रभावित होती है, जिससे हार्मोनल बैलेंस बिगड़ सकता है। यह डायबिटीज के मरीजों में ब्लड शुगर कंट्रोल को और कठिन बना देता है। क्या है समाधान? इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि नाइट शिफ्ट करने वाले डायबिटीज मरीजों के लिए अलग तरह की डाइट, नींद और लाइफस्टाइल प्लानिंग जरूरी है। हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसे लोगों के लिए विशेष गाइडलाइन और सपोर्ट सिस्टम विकसित किए जाने चाहिए, ताकि वे अपनी बीमारी को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सकें।
नई रिसर्च में सामने आया है कि Type 1 Diabetes से पीड़ित बुजुर्गों में Dementia विकसित होने का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक हो सकता है। साल 2026 की All of Us Cohort Study ने डायबिटीज और डिमेंशिया के बीच गहरे संबंध की ओर संकेत किया है। क्या कहती है रिसर्च शोधकर्ताओं ने All of Us Cohort Study के डेटा का विश्लेषण किया, जिसमें 50 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लगभग 2.84 लाख लोगों को शामिल किया गया। इन प्रतिभागियों की औसत उम्र करीब 65 वर्ष थी और इन्हें औसतन 2.5 साल तक फॉलो किया गया। इस दौरान 2,300 से अधिक लोगों में डिमेंशिया के मामले सामने आए। इनमें से करीब 5,500 लोग टाइप 1 डायबिटीज से पीड़ित थे। तीन गुना तक बढ़ा जोखिम विश्लेषण में पाया गया कि टाइप 1 डायबिटीज वाले लोगों में डिमेंशिया होने का जोखिम लगभग तीन गुना अधिक था। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि ऐसे मरीजों में डिमेंशिया के करीब 64.5% मामलों के पीछे डायबिटीज एक प्रमुख कारण हो सकता है। वहीं Type 2 Diabetes से पीड़ित लोगों में भी खतरा कम नहीं है-इनमें डिमेंशिया का जोखिम दो गुना से अधिक पाया गया। क्यों बढ़ रहा है खतरा विशेषज्ञों के अनुसार, टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की इम्यून सिस्टम इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है। यही प्रक्रिया दिमाग पर भी असर डाल सकती है, जिससे याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी माना कि टाइप 1 डायबिटीज के मरीज हेल्थकेयर सिस्टम के संपर्क में ज्यादा रहते हैं, जिससे उनमें डिमेंशिया का जल्दी पता चलने की संभावना भी अधिक हो सकती है। क्या है इसका मतलब इस स्टडी से यह स्पष्ट होता है कि डायबिटीज सिर्फ ब्लड शुगर तक सीमित बीमारी नहीं है, बल्कि यह दिमागी स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में इस संबंध को और गहराई से समझने और समय रहते रोकथाम के उपाय करने की जरूरत है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।