अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के चीन दौरे से लौटने के बाद एक बार फिर मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं तो अमेरिका ईरान पर दोबारा बड़े हवाई हमले कर सकता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी रक्षा मुख्यालय Pentagon संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तैयारी में जुटा हुआ है। ‘शांति प्रस्ताव पसंद नहीं आया’ रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की ओर से भेजे गए हालिया शांति प्रस्ताव को ट्रंप ने खारिज कर दिया। उन्होंने कथित तौर पर कहा, “मैंने उस प्रस्ताव को देखा और उसकी पहली लाइन ही मुझे पसंद नहीं आई, इसलिए मैंने उसे फेंक दिया।” ट्रंप के इस बयान को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 2.0’ की तैयारी? अमेरिकी अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पिछले संघर्ष के दौरान रोके गए “Operation Epic Fury” को नए रूप में फिर शुरू करने की योजना बनाई जा रही है। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन की ओर से आधिकारिक तौर पर “Operation Epic Fury 2.0” नाम की किसी सैन्य कार्रवाई की पुष्टि नहीं की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी और इजरायली सेनाएं संयुक्त युद्धाभ्यास और सैन्य तैयारियों में लगी हुई हैं। अगले सप्ताह हमले की आशंका? मध्य पूर्व के कुछ अधिकारियों के हवाले से दावा किया गया है कि सैन्य तैयारियां काफी आगे बढ़ चुकी हैं और जरूरत पड़ने पर अगले सप्ताह की शुरुआत में कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। होर्मुज स्ट्रेट बना वैश्विक चिंता का केंद्र तनाव के बीच Strait of Hormuz को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। दुनिया के कई देश चाहते हैं कि वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित होने से बचाने के लिए इस समुद्री मार्ग को खुला रखा जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बढ़ता है तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार, शिपिंग और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। सीजफायर के बाद फिर बढ़ा तनाव पिछले महीने संघर्षविराम के बाद कुछ समय के लिए हालात शांत हुए थे, लेकिन अब दोनों पक्षों के बयानों और सैन्य गतिविधियों ने एक बार फिर तनाव बढ़ा दिया है। ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि किसी भी हमले का जवाब दिया जाएगा, जबकि अमेरिका लगातार यह कहता रहा है कि वह ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा। दुनिया की नजर मध्य पूर्व पर मध्य पूर्व में जारी घटनाक्रम पर दुनिया की नजर बनी हुई है। अमेरिका, ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों के बीच बढ़ती गतिविधियों ने क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। किसी आधिकारिक सैन्य कार्रवाई की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट्स और राजनीतिक बयानों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को फिर से सक्रिय कर दिया है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने एक बड़ा कदम उठाते हुए अपने सहयोगी देशों को 8.6 अरब डॉलर से ज्यादा के हथियार बेचने की मंजूरी दे दी है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब ईरान के साथ जारी टकराव ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। किन देशों को मिलेंगे हथियार? अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, जिन देशों को यह सैन्य उपकरण दिए जाएंगे, उनमें शामिल हैं: इजरायल कतर कुवैत संयुक्त अरब अमीरात ये सभी देश लंबे समय से अमेरिका के रणनीतिक सहयोगी रहे हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं। युद्ध और व्यापार साथ-साथ ईरान के साथ संघर्ष में अमेरिका अब तक करीब 25 अरब डॉलर (लगभग 2.37 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर चुका है। यह खर्च मुख्य रूप से: गोला-बारूद मिसाइल सिस्टम ड्रोन सैन्य तैनाती पर हुआ है। इस दौरान अमेरिका को हाईटेक हथियारों और डिफेंस सिस्टम के नुकसान का भी सामना करना पड़ा। ऐसे में हथियारों की यह बिक्री एक तरह से उस आर्थिक नुकसान की भरपाई के रूप में देखी जा रही है। डर बना हथियार बाजार की वजह ईरान के हमलों ने इन देशों की सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार: मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने में कई डिफेंस सिस्टम पूरी तरह सफल नहीं रहे सैन्य ठिकानों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा “स्वार्म अटैक” (एक साथ कई हमले) से रक्षा तंत्र पर दबाव बढ़ा इन हालातों ने मिडिल ईस्ट के देशों को अपनी रक्षा क्षमता मजबूत करने के लिए मजबूर कर दिया। THAAD और पैट्रियट भी पड़े कमजोर? इन देशों ने THAAD और Patriot Missile System जैसे एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया, लेकिन ईरान के कुछ हमलों को रोकने में ये भी पूरी तरह सफल नहीं रहे। इससे यह साफ हुआ कि आधुनिक युद्ध में पारंपरिक रक्षा सिस्टम को और अपग्रेड करने की जरूरत है। अस्थायी शांति, लेकिन खतरा बरकरार अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष अब नौवें सप्ताह में पहुंच चुका है। हालांकि, 8 अप्रैल से एक नाजुक युद्धविराम लागू है, लेकिन हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे में मिडिल ईस्ट के देश: भविष्य के हमलों के लिए तैयार हो रहे हैं अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग मजबूत कर रहे हैं ट्रंप का दावा और सख्त रुख डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह कदम परमाणु खतरे को रोकने के लिए जरूरी था। उन्होंने दावा किया कि: ईरान की सैन्य क्षमता कमजोर हो चुकी है उसके कई डिफेंस सिस्टम नष्ट हो चुके हैं यह कार्रवाई मिडिल ईस्ट और यूरोप को सुरक्षित रखने के लिए की गई दोहरा फायदा: रणनीति और कारोबार विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका को दोहरा फायदा हुआ है: ईरान पर दबाव बनाकर उसे कमजोर करना सहयोगी देशों को हथियार बेचकर आर्थिक लाभ कमाना यानी, युद्ध के माहौल ने हथियारों के बाजार को और तेज कर दिया है।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी हमलों में 8 देशों में फैले अमेरिका के कम से कम 16 सैन्य ठिकाने क्षतिग्रस्त हुए हैं, जिससे क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य रणनीति और सुरक्षा तैयारियों पर सवाल खड़े हो गए हैं। CNN रिपोर्ट में बड़ा दावा CNN की रिपोर्ट के अनुसार, जांच और सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि ईरान ने हालिया हमलों में अमेरिका के कई अहम सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इन हमलों में खासतौर पर: एडवांस्ड रडार सिस्टम कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर एयरक्राफ्ट और सपोर्ट सिस्टम को टारगेट किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ ठिकाने इतने ज्यादा क्षतिग्रस्त हुए हैं कि वे फिलहाल आंशिक इस्तेमाल के लायक भी नहीं बचे। 8 देशों में फैले ठिकाने बने निशाना रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के जिन सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया, वे मिडिल ईस्ट और खाड़ी क्षेत्र के 8 अलग-अलग देशों में स्थित हैं। हालांकि सभी देशों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन यह अमेरिकी क्षेत्रीय सैन्य नेटवर्क के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। इन ठिकानों का इस्तेमाल आमतौर पर: निगरानी अभियानों एयर ऑपरेशंस लॉजिस्टिक सपोर्ट क्षेत्रीय सुरक्षा समन्वय के लिए किया जाता है। मरम्मत या बंद? अमेरिका के सामने चुनौती रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी और खाड़ी देशों के अधिकारियों के बीच इस बात पर मतभेद है कि इन ठिकानों की मरम्मत की जाए या कुछ को स्थायी रूप से बंद कर दिया जाए। कुछ अधिकारी मानते हैं कि इन ठिकानों को दोबारा तैयार करना बेहद महंगा और समय लेने वाला होगा। वहीं, रणनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि इन बेस को छोड़ना अमेरिका के लिए क्षेत्रीय प्रभाव कम कर सकता है। महंगे सिस्टम को हुआ नुकसान ईरानी हमलों में जिन सिस्टम्स को नुकसान पहुंचा है, उनमें हाई-टेक रडार और कम्युनिकेशन नेटवर्क शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ये सिस्टम सीमित संख्या में उपलब्ध होते हैं और इन्हें बदलना काफी महंगा साबित हो सकता है। यही वजह है कि इन हमलों को सिर्फ सामरिक नहीं, बल्कि आर्थिक झटका भी माना जा रहा है। युद्ध में अमेरिका का भारी खर्च पेंटागन के कंट्रोलर जूल्स जे हर्स्ट III ने अमेरिकी सांसदों को बताया कि ईरान के साथ संघर्ष में अब तक अमेरिका करीब 25 अरब डॉलर खर्च कर चुका है। हालांकि कुछ आकलनों के मुताबिक, वास्तविक खर्च 40 से 50 अरब डॉलर के बीच हो सकता है। अमेरिकी मौजूदगी पर उठे सवाल मिडिल ईस्ट में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी लंबे समय से उसकी रणनीतिक नीति का हिस्सा रही है। लेकिन लगातार हमलों और बढ़ते खर्च ने इस मॉडल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसे हमले जारी रहे, तो अमेरिका को क्षेत्र में अपनी सैन्य रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है। बढ़ता क्षेत्रीय तनाव ईरान और अमेरिका के बीच तनाव पहले से ही चरम पर है। परमाणु विवाद, समुद्री मार्गों पर नियंत्रण और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दोनों देशों में टकराव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। आगे क्या? फिलहाल अमेरिका की ओर से इन दावों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन रिपोर्ट्स के बाद यह साफ है कि मिडिल ईस्ट में संघर्ष केवल राजनीतिक या आर्थिक नहीं, बल्कि अब सैन्य ढांचे को भी सीधे प्रभावित कर रहा है।
अमेरिका ने यूरोप में अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए जर्मनी से 5,000 सैनिक वापस बुलाने का फैसला किया है। पेंटागन ने शुक्रवार को इसकी आधिकारिक घोषणा की। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब ईरान को लेकर जारी तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। 6-12 महीनों में पूरी होगी वापसी पेंटागन के अनुसार, सैनिकों की वापसी चरणबद्ध तरीके से अगले 6 से 12 महीनों में पूरी की जाएगी। इस फैसले के बाद यूरोप में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या घटकर 2022 से पहले के स्तर के करीब आ जाएगी। जर्मनी में अमेरिका की मजबूत सैन्य मौजूदगी जर्मनी में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति यूरोप में सबसे बड़ी मानी जाती है। फिलहाल वहां करीब 35,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जबकि पूरे यूरोप में यह संख्या 80,000 से 1,00,000 के बीच रहती है। जर्मनी में अमेरिका के कई अहम सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, जिनमें: रामस्टीन एयर बेस – यूरोप में अमेरिकी वायुसेना का सबसे बड़ा केंद्र पैच बैरक्स – यूएस यूरोपियन और अफ्रीका कमांड का मुख्यालय विस्बाडेन – यूरोप-अफ्रीका कमान का संचालन केंद्र लैंडस्टुहल रीजनल मेडिकल सेंटर – अमेरिका के बाहर सबसे बड़ा सैन्य अस्पताल इसके अलावा ग्राफेनवोहर, होहेनफेल्स और स्पैंगडाहलेम जैसे कई बड़े ट्रेनिंग और एयर बेस भी यहीं स्थित हैं। क्यों बढ़ी अमेरिका-यूरोप में तकरार? यह फैसला ऐसे समय आया है, जब यूरोपीय देशों के साथ अमेरिका के रिश्तों में तनाव बढ़ रहा है। खासतौर पर जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के उस बयान के बाद विवाद गहरा गया, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ बातचीत में अमेरिका के “अपमानित” होने की बात कही थी। इस पर जवाब देते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि जर्मनी को ईरान पर टिप्पणी करने के बजाय यूक्रेन युद्ध खत्म करने और अपने आंतरिक हालात सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। यूरोप के समर्थन की कमी पर नाराजगी रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका इस बात से भी नाराज है कि कई यूरोपीय देशों ने ईरान के खिलाफ उसके सैन्य अभियानों में अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। विशेष रूप से: स्पेन ने सहयोग से इनकार किया इटली ने भी सीमित समर्थन दिया इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और अन्य नेताओं के साथ भी ट्रंप के मतभेद सामने आए हैं। नाटो सहयोगियों पर ट्रंप का आरोप डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से नाटो सहयोगियों पर आरोप लगाते रहे हैं कि वे अमेरिकी सुरक्षा ढांचे का फायदा उठाते हैं, लेकिन पर्याप्त योगदान नहीं करते। उन्होंने खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा में यूरोपीय देशों की निष्क्रियता पर सवाल उठाए। ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों पर असर विशेषज्ञों का मानना है कि जर्मनी से सैनिकों की वापसी का यह फैसला ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों पर दबाव बढ़ा सकता है। अमेरिका चाहता है कि यूरोप अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठाए और नाटो में ज्यादा खर्च करे।
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है। तीखी बयानबाज़ी और सैन्य कार्रवाई के बीच दोनों देशों के नेताओं के बीच शब्दों की जंग भी तेज हो गई है। ईरान के वरिष्ठ नेता और सुरक्षा मामलों के प्रभावशाली चेहरों में शामिल अली लारिजानी ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कड़ी चेतावनी दी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर जारी एक संदेश में लारिजानी ने ट्रंप के हालिया बयान का जवाब देते हुए लिखा, “आपसे भी अधिक शक्तिशाली लोग ईरान को खत्म नहीं कर पाए। अपने लिए सावधान रहें, कहीं ऐसा न हो कि आप ही समाप्त कर दिए जाएं।” यह बयान उस समय आया है जब ट्रंप ने ईरान के खिलाफ बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए सैन्य कार्रवाई की धमकी दी थी। ट्रंप की सख्त चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा था कि यदि ईरान ने दुनिया की तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बाधित करने की कोशिश की, तो अमेरिका पहले की तुलना में “20 गुना अधिक ताकत” से हमला करेगा। ट्रंप ने अपने संदेश में कहा कि ऐसा हमला ईरान को इस स्थिति में पहुंचा सकता है कि वह दोबारा खड़ा भी न हो पाए। उन्होंने लिखा, “मौत, आग और तबाही उन पर बरसेगी-लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि स्थिति वहां तक न पहुंचे।” इसके साथ ही ट्रंप ने ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई को लेकर भी तीखी टिप्पणी की। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि उन्हें ईरान के नए नेतृत्व से संतोष नहीं है और उनका मानना है कि मोजतबा खामेनेई “शांति से नहीं रह पाएंगे।” नए नेतृत्व पर भी जताई नाराज़गी दरअसल, ईरान में हाल ही में हुए बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के पश्चात उनके दूसरे बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता चुना गया है। इस फैसले को लेकर अमेरिका की ओर से पहले ही असंतोष जताया जा चुका है। ट्रंप ने इससे पहले यह भी कहा था कि ईरान के नए नेता के चयन में अमेरिका की भी भूमिका होनी चाहिए, जैसा कि अतीत में कुछ देशों के राजनीतिक मामलों में अमेरिका का प्रभाव देखा गया है। हमलों के बाद भड़का युद्ध मध्य पूर्व में मौजूदा तनाव की शुरुआत उस समय हुई जब 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान पर बड़े सैन्य हमले किए। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत हो गई, जिसके बाद क्षेत्र में व्यापक संघर्ष शुरू हो गया। ईरान ने इस हमले के जवाब में इज़राइल और उसके सहयोगी देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमले तेज कर दिए हैं। इस संघर्ष का असर अब कई खाड़ी देशों तक पहुंच चुका है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर संकट ईरान ने चेतावनी दी है कि जब तक युद्ध जारी रहेगा, वह क्षेत्र से तेल की आपूर्ति रोक सकता है। ईरानी अधिकारियों ने यहां तक कहा है कि वे “एक भी लीटर तेल के निर्यात” को रोक सकते हैं, खासकर उन देशों के लिए जो अमेरिका और इज़राइल का समर्थन कर रहे हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। वैश्विक स्तर पर करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में इस मार्ग पर किसी भी प्रकार का व्यवधान अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। खाड़ी देशों में भी बढ़े हमले मंगलवार को ईरान ने इज़राइल और कई खाड़ी देशों को निशाना बनाते हुए नए हमले किए। बहरीन की राजधानी मनामा में एक रिहायशी इमारत पर हुए हमले में 29 वर्षीय महिला की मौत हो गई और आठ लोग घायल हो गए। सऊदी अरब ने अपने पूर्वी तेल समृद्ध क्षेत्र में दो ड्रोन मार गिराने का दावा किया। कुवैत की नेशनल गार्ड ने छह ड्रोन को नष्ट करने की जानकारी दी। वहीं संयुक्त अरब अमीरात के औद्योगिक शहर रुवैस में एक ड्रोन हमले के बाद पेट्रोकेमिकल संयंत्रों के पास आग लग गई, हालांकि इस घटना में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है। इज़राइल में भी अलर्ट इज़राइल में भी हमलों की आशंका के बीच अलर्ट जारी है। यरुशलम में सायरन बजने लगे और तेल अवीव के ऊपर कई धमाकों की आवाजें सुनी गईं। इज़राइली रक्षा प्रणाली ने ईरान की ओर से दागे गए कई मिसाइलों और ड्रोन को हवा में ही रोकने की कोशिश की। वैश्विक बाजारों पर असर मध्य पूर्व में बढ़ते इस संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी चिंता बढ़ा दी है। तेल आपूर्ति में संभावित बाधा और युद्ध के फैलने की आशंका के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार और शेयर बाजारों में अस्थिरता देखी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह टकराव और बढ़ता है या होर्मुज़ जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। कुल मिलाकर, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती सैन्य कार्रवाई और तीखी बयानबाज़ी ने मध्य पूर्व को एक बार फिर गंभीर संकट की स्थिति में ला खड़ा किया है। आने वाले दिनों में यह टकराव किस दिशा में जाता है, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।