West Bengal News

कोयला घोटाला जांच I-PAC कार्यालय पर प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी
प्रशांत किशोर की कंपनी I-PAC पर ED रेड, जानें क्या है पूरा कोयला घोटाला

पटना,एजेंसियां। प्रशांत किशोर की कंपनी I-PAC (Indian Political Action Committee) के दफ्तर पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की रेड के बाद एक बार फिर पश्चिम बंगाल के चर्चित कोयला घोटाले की चर्चा तेज हो गई है। यह मामला दरअसल ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) के लीज एरिया से कथित अवैध कोयला खनन, चोरी, तस्करी और उससे कमाए गए पैसे की मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है। ED ने यह जांच 2020 में CBI द्वारा दर्ज FIR के आधार पर शुरू की थी। एजेंसियों के अनुसार, इस सिंडिकेट का कथित मास्टरमाइंड अनूप माझी उर्फ ‘लाला’ था, जिस पर ECL, CISF, रेलवे और अन्य विभागों के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से कोयला चोरी कराने के आरोप हैं।   जांच में क्या आया सामने ? जांच में यह आरोप सामने आया कि ECL के कुनुस्तोरिया और कजोरा क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर कोयला अवैध रूप से निकाला गया और उसे विभिन्न फैक्ट्रियों व कंपनियों तक पहुंचाया गया। CBI और ED की कार्रवाई में कई जगह छापे पड़े, दस्तावेज और डिजिटल सबूत मिले, और कई आरोपियों के नाम सामने आए। ED के मुताबिक अब तक इस केस में 2,742.32 करोड़ रुपये तक की “प्रोसीड्स ऑफ क्राइम” (अपराध से अर्जित रकम) चिन्हित की गई है। एजेंसी ने पहले भी कई संपत्तियां अटैच की हैं और इस मामले में गिरफ्तारी व चार्जशीट की कार्रवाई हो चुकी है।   I-PAC का नाम कैसे जुड़ा? ताजा मोड़ तब आया जब ED ने दावा किया कि कोयला तस्करी से जुड़ी काली कमाई का एक हिस्सा हवाला नेटवर्क के जरिए I-PAC तक पहुंचाया गया। रिपोर्टों के मुताबिक, जांच में करीब 20 करोड़ रुपये के कथित ट्रांसफर की बात सामने आई, जिसे गोवा में 2021-22 के दौरान I-PAC के ऑपरेशंस से जोड़ा गया। इसी कड़ी में ED ने I-PAC से जुड़े परिसरों पर तलाशी ली। हालांकि, जांच एजेंसियों के आरोप और कोर्ट में साबित अपराध—दोनों अलग बातें हैं, इसलिए अंतिम सच न्यायिक प्रक्रिया से ही तय होगा। फिलहाल, यह मामला सिर्फ कोयला चोरी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीति, हवाला और चुनावी मैनेजमेंट नेटवर्क तक फैलता दिख रहा है।

Ranjan Kumar Tiwari अप्रैल 2, 2026 0
WWII bomb found India
सुवर्णरेखा नदी किनारे मिला द्वितीय विश्व युद्ध काल का बम, आज सेना का हाई-रिस्क डिफ्यूज ऑपरेशन

पूर्वी सिहंभूम। झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के बहरागोड़ा प्रखंड में सुवर्णरेखा नदी किनारे द्वितीय विश्व युद्ध काल का 227 किलोग्राम वजनी बम मिलने से हड़कंप मच गया है। दशकों पुराना यह अनएक्सप्लोडेड ऑर्डिनेंस (UXO) आज भी बेहद खतरनाक बताया जा रहा है।   सेना ने संभाली कमान मामले की गंभीरता को देखते हुए भारतीय सेना की स्पेशल बम निरोधक टीम मौके पर पहुंच चुकी है। लेफ्टिनेंट कर्नल धर्मेंद्र सिंह के नेतृत्व में टीम ने ऑपरेशन की पूरी रणनीति तैयार कर ली है। बुधवार को इस बम को निष्क्रिय करने के लिए हाई-रिस्क डिफ्यूज ऑपरेशन चलाया जाएगा।   कड़ी सुरक्षा व्यवस्था सुरक्षा के मद्देनजर बम स्थल के एक किलोमीटर दायरे को पूरी तरह खाली करा लिया गया है। इलाके में नो-एंट्री लागू कर दी गई है और बैरिकेडिंग की गई है। साथ ही पश्चिम बंगाल सीमा से सटे गांवों को भी अलर्ट पर रखा गया है। ऑपरेशन के दौरान हवाई गतिविधियों पर भी रोक रहेगी।   ऐसे किया जा रहा है सुरक्षित बम को निष्क्रिय करने के लिए उसके चारों ओर बालू भरी बोरियों का घेरा बनाया गया है और करीब 10 फीट गहरे गड्ढे में सुरक्षित रखा गया है, ताकि संभावित विस्फोट की ऊर्जा जमीन के भीतर ही सीमित रहे।   रिमोट से होगा ऑपरेशन जानकारी के मुताबिक, यह डिफ्यूज ऑपरेशन करीब एक किलोमीटर दूर से रिमोट सिस्टम के जरिए किया जाएगा, जिससे किसी भी खतरे की स्थिति में जोखिम कम किया जा सके।   आठ दिन पहले चला था पता करीब आठ दिन पहले स्थानीय लोगों ने इस बम को देखा था, जिसके बाद पुलिस और प्रशासन ने तुरंत सेना को सूचना दी। बम पर “AN-M64 500-LB American Made” अंकित है, जिससे इसकी पहचान द्वितीय विश्व युद्ध के बम के रूप में हुई है।

Juli Gupta मार्च 25, 2026 0
West Bengal government enforces new medical rules for ministers requiring CM approval for out-of-state treatment
बंगाल में मंत्रियों पर सख्ती: राज्य के बाहर इलाज के लिए CM की अनुमति अनिवार्य

पश्चिम बंगाल सरकार ने मंत्रियों और उनके परिवार के चिकित्सा खर्च को लेकर सख्त कदम उठाया है। अब राज्य के बाहर किसी भी अस्पताल में इलाज कराने से पहले मुख्यमंत्री से पूर्व अनुमति लेना जरूरी होगा। इस संबंध में गृह विभाग की ओर से अधिसूचना जारी कर दी गई है, जिसे कोलकाता गजट में प्रकाशित किया गया है। नए नियम के तहत मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और उपमंत्री इसके दायरे में आएंगे। साथ ही उनके कुछ परिजनों को भी इस सुविधा में शामिल किया गया है। क्यों लिया गया फैसला? सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य चिकित्सा खर्चों पर नियंत्रण रखना और प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना है। अधिकारियों के मुताबिक, हाल के वर्षों में कुछ मामलों में बिना गंभीर बीमारी के भी अन्य राज्यों में इलाज कराकर भारी-भरकम बिल जमा किए गए थे, जिसके बाद यह फैसला लिया गया। पहले क्या थी व्यवस्था? पहले मंत्रियों को राज्य के बाहर इलाज कराने के लिए किसी तरह की पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं थी। इसी कारण कई बार मेडिकल खर्च को लेकर विवाद भी सामने आए थे। किन पर लागू होगा नियम? इस नई व्यवस्था में मंत्रियों के परिवार के कुछ सदस्य भी शामिल होंगे, जैसे: अविवाहित बेटियां आश्रित माता-पिता 18 वर्ष तक के आश्रित भाई-बहन किन अस्पतालों में मिलेगा लाभ? अब चिकित्सा सुविधाओं का दायरा बढ़ा दिया गया है। इसमें शामिल हैं: सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त अस्पताल पश्चिम बंगाल क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट, 2017 के तहत पंजीकृत निजी अस्पताल और नर्सिंग होम कौन-कौन सी सुविधाएं होंगी शामिल? नई व्यवस्था के तहत निम्न सेवाएं कवर होंगी: डॉक्टर से परामर्श पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी जांच दवाएं और टीकाकरण सर्जरी और दंत चिकित्सा खर्च कैसे होगा कवर? सरकारी अस्पतालों में इलाज पूरी तरह मुफ्त रहेगा निजी या पंजीकृत अस्पतालों में इलाज पर सरकार खर्च वहन करेगी या प्रतिपूर्ति देगी इसके अलावा डॉक्टर के निजी चैंबर, मंत्री आवास पर इलाज, अस्पताल के उच्च श्रेणी के वार्ड और विशेष नर्सिंग सेवाओं का खर्च भी योजना के तहत कवर किया जाएगा।  

surbhi मार्च 25, 2026 0
CJI Surya Kant during Supreme Court hearing on West Bengal SIR voter list revision case
बंगाल SIR मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: CJI सूर्यकांत नाराज़, याचिकाकर्ताओं को लगाई कड़ी फटकार

  पश्चिम बंगाल में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से जुड़े मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सख्त रुख देखने को मिला। सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant याचिकाकर्ताओं पर काफी नाराज़ दिखाई दिए और न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाने को लेकर कड़ी चेतावनी दी। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है, जिनमें पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए हैं।   ‘न्यायिक अधिकारियों पर सवाल बर्दाश्त नहीं’ सुनवाई के दौरान Justice Surya Kant ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाकर “हद पार कर दी है”। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि इस तरह की याचिकाएं न्यायिक व्यवस्था पर अविश्वास का संदेश देती हैं और अदालत इसे किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं करेगी। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा, “याचिकाकर्ता ऐसी अर्जी दाखिल करने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं? न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” उन्होंने यह भी कहा कि अदालत इस तरह की टिप्पणियों को गंभीरता से लेती है और इस संबंध में कड़ी चेतावनी जारी की जा रही है।   ‘सिस्टम पर भरोसे की कमी का गलत संदेश’ सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत लगभग 52 लाख लोगों के मामलों की जांच की जा रही है, जिनमें से करीब 10 लाख मामलों का काम पूरा हो चुका है। इस पर Justice Surya Kant ने कहा कि समय से पहले याचिका दायर करना यह संकेत देता है कि याचिकाकर्ताओं को व्यवस्था पर भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रक्रिया को पूरा होने का समय दिया जाना चाहिए।   वैध मतदाता शामिल होंगे, अवैध नाम हटेंगे अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन लोगों का मतदान का अधिकार वैध है, उन्हें मतदाता सूची में शामिल किया जाएगा, जबकि अवैध रूप से जोड़े गए नामों को हटाया जाएगा। सीजेआई ने कहा, “जो लोग वास्तविक और वैध मतदाता हैं, उन्हें शामिल किया जाएगा और जो घुसपैठिए हैं, उन्हें बाहर किया जाएगा।”   सुप्रीम कोर्ट के निर्देश सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने Election Commission of India और राज्य सरकार को प्रक्रिया सुचारू रूप से चलाने के लिए कई निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि: पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और व्यवस्थित तरीके से पूरा किया जाए।   पोर्टल से जुड़ी तकनीकी दिक्कतों को तुरंत दूर किया जाए।   अधिकारियों के लिए आवश्यक लॉग-इन आईडी और तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।   न्यायिक अधिकारियों को काम करने के लिए सभी जरूरी संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।   अपील की सुनवाई कौन करेगा अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल करने का दावा खारिज हो जाता है, तो उसके खिलाफ किसी प्रशासनिक निकाय के पास अपील नहीं होगी। ऐसे मामलों में संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दो पूर्व या वर्तमान हाईकोर्ट जजों की एक विशेष पीठ गठित कर सकते हैं, जो इन अपीलों की सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि इस अपीलीय व्यवस्था से जुड़ी जानकारी आधिकारिक अधिसूचना जारी कर सार्वजनिक की जाए। इस पूरे घटनाक्रम के बाद बंगाल की SIR प्रक्रिया से जुड़ा मामला एक बार फिर न्यायिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।  

surbhi मार्च 10, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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नालंदा मंदिर हादसा: भीड़ ने ली 8 महिलाओं की जान, धार्मिक आयोजन में मची भगदड़ जैसी स्थिति

surbhi मार्च 31, 2026 0