पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध जैसे हालात के बीच ईरान के विदेश मंत्री Seyed Abbas Araghchi ने कहा है कि क्षेत्र में शांति स्थापित करने में भारत बड़ी और सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। उन्होंने अमेरिका पर निशाना साधते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में शांति की राह में सबसे बड़ी बाधा अमेरिका है। नई दिल्ली में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में अराघची ने कहा कि ईरान से जुड़े मुद्दों का कोई सैन्य समाधान नहीं है और कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है। ‘अमेरिका पर भरोसा नहीं’ अराघची ने कहा, “40 दिनों की लड़ाई के बाद जब अमेरिका को यह समझ आ गया कि वह ईरान के खिलाफ अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर सकता, तब उसने बातचीत का प्रस्ताव रखा। हमें अमेरिकियों पर बिल्कुल भरोसा नहीं है।” उन्होंने आगे कहा कि ईरान के पास अमेरिका पर भरोसा न करने के कई कारण हैं, जबकि अमेरिका के पास ईरान पर अविश्वास करने का कोई ठोस कारण नहीं है। भारत को बताया भरोसेमंद साझेदार ईरानी विदेश मंत्री ने भारत की विदेश नीति और क्षेत्रीय संबंधों की सराहना करते हुए कहा कि भारत फारसी खाड़ी के सभी देशों का मित्र है और उसकी अच्छी साख है। उन्होंने कहा, “भारत इस क्षेत्र में कूटनीति को बढ़ावा देने, शांति और सुरक्षा स्थापित करने में अहम भूमिका निभा सकता है। हम भारत की किसी भी सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका का स्वागत करेंगे।” होर्मुज स्ट्रेट को लेकर दिया बड़ा बयान अराघची ने कहा कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट से अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही जारी रखने के पक्ष में है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा हालात बेहद जटिल हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के जहाजों के लिए खुला रहेगा, सिवाय उन देशों के जहाजों के जो ईरान के साथ युद्ध की स्थिति में हैं। होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और हालिया तनाव के कारण इस क्षेत्र पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। चाबहार पोर्ट पर भारत की तारीफ ईरानी विदेश मंत्री ने Chabahar Port परियोजना को भारत-ईरान सहयोग का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा, “हमें खुशी है कि भारत ने चाबहार बंदरगाह के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण काम कुछ धीमा हुआ है, लेकिन यह बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया और यूरोप तक पहुंच का सुनहरा दरवाजा साबित होगा।” भारत से सहयोग जारी रखने की उम्मीद अराघची ने उम्मीद जताई कि भारत चाबहार पोर्ट परियोजना पर काम जारी रखेगा ताकि इसका पूर्ण विकास हो सके और इससे भारत सहित पूरे क्षेत्र को आर्थिक और रणनीतिक लाभ मिल सके। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत संतुलित कूटनीति के जरिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की स्थिति में है।
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने शुक्रवार को अपनी संक्षिप्त लेकिन अहम संयुक्त अरब अमीरात (UAE) यात्रा के दौरान कई बड़े रणनीतिक समझौते किए। लगभग ढाई घंटे की इस यात्रा में प्रधानमंत्री ने यूएई के राष्ट्रपति Mohamed bin Zayed Al Nahyan के साथ ऊर्जा, रक्षा, निवेश, तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर समेत कई मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान यूएई ने भारत में 5 अरब अमेरिकी डॉलर निवेश करने की घोषणा भी की। यूएई यात्रा के बाद प्रधानमंत्री अपने अगले चरण के विदेश दौरे के लिए Netherlands रवाना हो गए। मिडिल ईस्ट संकट के बीच हुई अहम बैठक प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा ऐसे समय हुई है जब मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अनिश्चितता बनी हुई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव की वजह से समुद्री व्यापार और तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। बैठक के दौरान पीएम मोदी ने यूएई पर हुए हालिया हमलों की निंदा की और कहा कि भारत क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए हर संभव सहयोग देने को तैयार है। उन्होंने कहा कि मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। भारत में 5 अरब डॉलर निवेश करेगा UAE प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि यूएई ने भारत में 5 अरब डॉलर निवेश की घोषणा की है। माना जा रहा है कि यह निवेश इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स और नई तकनीकों से जुड़े क्षेत्रों में किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे भारत-यूएई आर्थिक साझेदारी को नई मजबूती मिलेगी और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बड़ा समझौता विदेश मंत्रालय के अनुसार, इंडियन स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड और अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी के बीच सामरिक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इस समझौते के तहत: भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत की जाएगी पेट्रोलियम भंडारण क्षमता बढ़ाई जाएगी LNG और LPG स्टोरेज सुविधाओं पर सहयोग बढ़ेगा दीर्घकालिक LPG आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा रक्षा और तकनीक सहयोग को बढ़ावा भारत और यूएई ने रक्षा औद्योगिक सहयोग को लेकर भी एक महत्वपूर्ण समझौता किया। इसके तहत दोनों देश रक्षा तकनीक, इनोवेशन और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करेंगे। इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपरकंप्यूटर क्लस्टर विकसित करने को लेकर भी दोनों देशों के बीच समझौता हुआ। विदेश मंत्रालय के अनुसार, इससे तकनीकी विकास और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। गुजरात में बनेगा जहाज मरम्मत केंद्र दोनों देशों के बीच गुजरात के वडीनार में जहाज मरम्मत केंद्र स्थापित करने और बंदरगाह तथा तटीय बुनियादी ढांचे के विकास पर भी सहमति बनी है। साथ ही जहाज मरम्मत और समुद्री क्षेत्र में स्किल डेवलपमेंट को बढ़ावा देने पर भी चर्चा हुई। एयरपोर्ट पर खास स्वागत यूएई पहुंचने पर राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने स्वयं एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया। प्रधानमंत्री को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया और विशेष सम्मान के तौर पर यूएई के सैन्य विमानों ने उनके विमान की अगवानी भी की। पांच देशों के दौरे पर हैं पीएम मोदी प्रधानमंत्री मोदी पांच देशों की यात्रा पर निकले हैं। यूएई इस दौरे का पहला चरण था। इसके बाद प्रधानमंत्री नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का दौरा करेंगे। इन यात्राओं का उद्देश्य निवेश, ग्रीन एनर्जी, नई तकनीक, रणनीतिक साझेदारी और व्यापारिक सहयोग को मजबूत करना बताया जा रहा है।
पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत के आंतरिक मुद्दों पर टिप्पणी कर विवाद खड़ा कर दिया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने प्रेस ब्रीफिंग के दौरान भारत में मुस्लिम समुदाय, उर्दू भाषा और कश्मीर को लेकर कई आरोप लगाए। जामिया कार्यक्रम को लेकर आपत्ति अंद्राबी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े कार्यक्रम को लेकर आपत्ति जताई, जो जामिया मिलिया इस्लामिया में आयोजित होने वाला था। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में किसी भी विचारधारा का “प्रचार” चिंता का विषय है और इससे संस्थानों की मूल पहचान प्रभावित हो सकती है। मुस्लिम पहचान पर चिंता जताई पाकिस्तानी प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि भारत में मुस्लिम समुदाय की पहचान और उनकी भाषा पर दबाव डाला जा रहा है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मुद्दे पर ध्यान देने की अपील की और कहा कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। ‘हेट स्पीच’ पर भी उठाए सवाल अंद्राबी ने भारतीय नेताओं के कथित बयानों को “हेट स्पीच” करार दिया और कहा कि इस तरह की भाषा का इस्तेमाल निंदनीय है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे बयान समाज में विभाजन पैदा करते हैं और इन पर रोक लगनी चाहिए। कश्मीर और उर्दू पर आरोप जम्मू और कश्मीर को लेकर भी पाकिस्तान ने आरोप दोहराए। अंद्राबी के मुताबिक, वहां “जनसांख्यिकीय बदलाव” किए जा रहे हैं और उर्दू भाषा तथा मुस्लिम संस्कृति को कमजोर करने की कोशिश हो रही है। उन्होंने इसे वैश्विक स्तर पर उठाने की बात कही। भारत के आंतरिक मामलों में दखल पर सवाल भारत लंबे समय से यह स्पष्ट करता रहा है कि जम्मू और कश्मीर उसका आंतरिक मामला है और बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयान दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा सकते हैं। पाकिस्तान की स्थिति पर भी उठते सवाल विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान में खुद अल्पसंख्यक समुदायों–जैसे हिंदू, ईसाई, शिया और अहमदिया–की स्थिति को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में भारत के आंतरिक मुद्दों पर उसकी टिप्पणी को लेकर भी बहस छिड़ जाती है।
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच Iran ने एक नई कूटनीतिक पहल करते हुए Pakistan के जरिए United States को दो चरणों वाला शांति प्रस्ताव भेजा है। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय तनाव कम करना और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग Strait of Hormuz को दोबारा खोलना है। क्या है टू-स्टेज प्लान? रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने अपने प्रस्ताव में स्पष्ट किया है कि बातचीत दो चरणों में आगे बढ़े— पहले चरण में समुद्री संकट को खत्म करने, अमेरिकी नेवल नाकेबंदी हटाने और होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने पर जोर दिया गया है। दूसरे चरण में परमाणु मुद्दों और अन्य रणनीतिक विषयों पर बातचीत शुरू करने की बात कही गई है। ईरान का मानना है कि जब तक समुद्री रास्ते सामान्य नहीं होते, तब तक किसी बड़े समझौते की दिशा में आगे बढ़ना मुश्किल है। अमेरिका की शर्तें और रुख अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने साफ किया है कि ईरान को कभी भी परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। वाशिंगटन चाहता है कि ईरान कम से कम 10 वर्षों तक यूरेनियम संवर्धन रोक दे और अपना न्यूक्लियर स्टॉक विदेश भेजे। हालांकि, ईरान के भीतर इन शर्तों को लेकर अभी सहमति नहीं बन पाई है, जिससे बातचीत में गतिरोध बना हुआ है। कूटनीतिक हलचल तेज ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi फिलहाल पाकिस्तान और ओमान के दौरे पर हैं और जल्द ही Russia में राष्ट्रपति Vladimir Putin से मुलाकात करने वाले हैं। दूसरी ओर, अमेरिका ने अपने प्रतिनिधियों की इस्लामाबाद यात्रा रद्द कर दी है, जिससे दोनों देशों के बीच अविश्वास अभी भी कायम है। क्यों अहम है होर्मुज? Strait of Hormuz दुनिया का एक अहम तेल मार्ग है, जहां से वैश्विक सप्लाई का लगभग 20% तेल गुजरता है। इस मार्ग पर तनाव का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों पर पड़ता है। अब आगे क्या? हालांकि व्हाइट हाउस को यह प्रस्ताव मिल चुका है, लेकिन अमेरिका इस पर आगे बढ़ेगा या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल विकास और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर मतभेद गहरे हैं, जिससे समझौते की राह आसान नहीं दिखती।
वॉशिंगटन: अमेरिका और Iran के बीच जारी सैन्य तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच चल रही जंग अब अपने अंत के करीब है। फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि अगर उन्होंने ईरान के खिलाफ कड़ा कदम नहीं उठाया होता, तो तेहरान अब तक परमाणु हथियार बना चुका होता। “परमाणु हथियार होता तो ‘सर’ कहना पड़ता” Donald Trump ने तीखे अंदाज में कहा: “अगर ईरान के पास परमाणु बम होता, तो आज सबको उन्हें ‘सर’ कहना पड़ता।” उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी कार्रवाई ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने में बड़ी भूमिका निभाई है। “ईरान को उबरने में लगेंगे 20 साल” ट्रंप के मुताबिक: अमेरिका और Israel के हमलों से ईरान को भारी नुकसान हुआ है देश को दोबारा खड़ा होने में करीब 20 साल लग सकते हैं सीजफायर के बावजूद जारी दबाव दोनों देशों के बीच फिलहाल दो हफ्ते का युद्धविराम लागू है, जिससे हालात कुछ हद तक शांत हुए हैं। हालांकि, ट्रंप ने साफ किया कि: अमेरिका का मिशन अभी खत्म नहीं हुआ है ईरान पर दबाव बनाए रखा जाएगा बातचीत के संकेत Donald Trump ने यह भी कहा कि: ईरान समझौते के लिए तैयार नजर आ रहा है जल्द ही बातचीत का नया दौर शुरू हो सकता है सूत्रों के मुताबिक, Islamabad में बैक-चैनल वार्ता जारी है। अमेरिका का फोकस ट्रंप प्रशासन का लक्ष्य स्पष्ट है: ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर स्थायी रोक भविष्य में किसी भी परमाणु खतरे को खत्म करना ट्रंप के बयान से संकेत मिलते हैं कि एक ओर अमेरिका युद्ध खत्म होने की बात कर रहा है, तो दूसरी ओर ईरान पर कड़ा दबाव बनाए रखने की रणनीति जारी है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि हालात पूरी तरह शांत होते हैं या फिर तनाव दोबारा बढ़ता है।
वॉशिंगटन/इस्लामाबाद: ईरान संकट के बीच कूटनीतिक हल की कोशिशें तेज होती दिख रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने संकेत दिया है कि ईरान के साथ रुकी हुई बातचीत इस हफ्ते फिर से शुरू हो सकती है, और इसके लिए अमेरिका दोबारा Islamabad जाने पर विचार कर रहा है। इस्लामाबाद वार्ता फिर शुरू होने की उम्मीद न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा, “आपको वहीं (इस्लामाबाद) रुकना चाहिए, क्योंकि अगले दो दिनों में कुछ हो सकता है… हमारा झुकाव भी वहीं जाने का है।” गौरतलब है कि पिछले शनिवार को Islamabad में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई थी, जिसके बाद तनाव और बढ़ गया। होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी से बढ़ा दबाव वार्ता विफल होने के बाद अमेरिका ने Strait of Hormuz पर नाकाबंदी लागू कर दी। अमेरिकी सेना के मुताबिक, नाकाबंदी के पहले 24 घंटों में इस अहम समुद्री मार्ग से कोई जहाज़ नहीं गुजरा, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई। युद्धविराम पर संकट मौजूदा गतिरोध ने अगले सप्ताह समाप्त होने जा रहे दो हफ्ते के युद्धविराम पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, अब बातचीत दोबारा शुरू होने की संभावना ने हालात में कुछ उम्मीद जगाई है। संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया संयुक्त राष्ट्र महासचिव António Guterres ने कहा कि बातचीत फिर से शुरू होने की “काफी ज्यादा संभावना” है। खाड़ी देशों, Pakistan और Iran के अधिकारियों ने भी संकेत दिए हैं कि दोनों पक्षों की टीमें इस हफ्ते के अंत तक फिर से पाकिस्तान लौट सकती हैं, हालांकि अभी तारीख तय नहीं हुई है। तेल बाजार को राहत वार्ता दोबारा शुरू होने की उम्मीद से वैश्विक तेल बाजार में कुछ राहत देखने को मिली। मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गईं, जिससे निवेशकों को थोड़ी राहत मिली।
नई दिल्ली/वॉशिंगटन: ईरान संकट और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच भारत और अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व के बीच एक अहम बातचीत सामने आई है। मंगलवार (14 अप्रैल) को प्रधानमंत्री Narendra Modi और अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के बीच करीब 40 मिनट तक फोन पर चर्चा हुई। यह बातचीत ऐसे समय पर हुई है जब पाकिस्तान में हुई अमेरिका-ईरान शांति वार्ता विफल हो चुकी है और क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है। खास बात यह है कि ईरान-इजराइल-अमेरिका टकराव के दौरान यह दोनों नेताओं के बीच दूसरी बातचीत है। होर्मुज स्ट्रेट पर फोकस अमेरिका के भारत में राजदूत Sergio Gor ने जानकारी दी कि बातचीत के दौरान Strait of Hormuz की स्थिति पर विशेष चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने इस अहम समुद्री मार्ग को खुला और सुरक्षित बनाए रखने पर जोर दिया, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत-अमेरिका रिश्तों पर सकारात्मक संकेत राजदूत के अनुसार, भारत और अमेरिका के बीच संबंध इस समय मजबूत स्थिति में हैं। आने वाले दिनों में ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग से जुड़े कई बड़े समझौते होने की संभावना जताई गई है। बताया गया कि बातचीत के दौरान ट्रंप ने पीएम मोदी से कहा कि “हम सभी आपको पसंद करते हैं”, जो दोनों देशों के रिश्तों की गर्मजोशी को दर्शाता है। पीएम मोदी का बयान बातचीत के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय सहयोग की प्रगति की समीक्षा की और वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर सहमति जताई। उन्होंने यह भी बताया कि मिडिल ईस्ट की मौजूदा स्थिति पर चर्चा हुई और Strait of Hormuz को सुरक्षित बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
United States और Iran के बीच Islamabad में हुई 21 घंटे लंबी शांति वार्ता भले ही बेनतीजा रही, लेकिन अब हालात नया मोड़ लेते दिख रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया है कि Tehran ने खुद आगे बढ़कर समझौते के लिए संपर्क किया है। ‘ईरान डील के लिए बेताब’–ट्रंप ट्रंप ने कहा: “ईरान ने हमें कॉल किया है” “वे हर हाल में समझौता करना चाहते हैं” “वे डील के लिए उत्सुक हैं” हालांकि, इस दावे पर ईरान की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। परमाणु मुद्दा बना सबसे बड़ा अड़ंगा ट्रंप ने साफ किया: अगर ईरान अपनी न्यूक्लियर क्षमता बनाए रखता है, तो समझौता मुश्किल है “ईरान के पास कभी भी परमाणु हथियार नहीं होगा” उन्होंने बताया कि बातचीत में कई मुद्दों पर सहमति बनी, लेकिन परमाणु हथियारों के मुद्दे पर गतिरोध जारी रहा। ‘मुझे पूरा भरोसा है, वे मान जाएंगे’ ट्रंप ने भरोसा जताते हुए कहा: “मुझे यकीन है कि ईरान आखिरकार मान जाएगा” “अगर वे नहीं मानते, तो कोई समझौता नहीं होगा” नाकेबंदी से बढ़ाया दबाव अमेरिका ने पहले ही: Strait of Hormuz और ईरानी बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकेबंदी लागू कर दी है, ताकि तेहरान पर बातचीत के लिए दबाव बनाया जा सके। ‘दुनिया को ब्लैकमेल नहीं करने देंगे’ ट्रंप ने ईरान पर आरोप लगाते हुए कहा: “वे दुनिया को ब्लैकमेल कर रहे हैं” “हम ऐसा होने नहीं देंगे” क्या आगे बन सकता है समझौता? मौजूदा हालात में: एक तरफ अमेरिका आर्थिक और सैन्य दबाव बढ़ा रहा है दूसरी तरफ बातचीत की संभावना भी बनी हुई है अगर ट्रंप का दावा सही साबित होता है और Iran नरमी दिखाता है, तो जल्द ही दूसरे दौर की वार्ता शुरू हो सकती है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजर इस उभरती कूटनीतिक हलचल पर टिकी है।
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच Gaza Strip एक बार फिर हिंसा की चपेट में आ गया है। ताजा हमलों में कम से कम सात फिलिस्तीनियों की मौत हो गई, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। यह घटनाएं ऐसे समय पर हुई हैं जब क्षेत्र में पहले से ही संघर्ष और मानवीय संकट गहराता जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, मध्य गाज़ा के Bureij refugee camp में सुबह-सुबह एक ड्रोन हमले ने नागरिकों के एक समूह को निशाना बनाया। प्रत्यक्षदर्शियों और राहत एजेंसियों के मुताबिक, मिसाइलें एक पुलिस पोस्ट के पास गिरीं, जिससे कई लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। घायलों को तुरंत नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया, जहां कई की हालत गंभीर बनी हुई है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने पुष्टि की है कि Al-Aqsa Hospital में छह शव और कई घायल पहुंचाए गए, जबकि Al-Awda Hospital में एक और मृतक तथा दो घायल लाए गए। राहत कार्य में जुटी टीमों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, क्योंकि हमले के बाद हालात बेहद चुनौतीपूर्ण हो गए थे। इसी के साथ दक्षिणी गाज़ा के Khan Younis इलाके में भी एक ड्रोन हमले में विस्थापित लोगों के तंबू को निशाना बनाया गया। इस हमले में कई लोग घायल हुए हैं। इलाके में लगातार गोलाबारी और टैंक फायरिंग की भी खबरें सामने आ रही हैं, जिससे आम नागरिकों में दहशत का माहौल है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख Volker Turk ने हालिया हिंसा पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि लगातार हो रही हत्याएं और हमले यह दर्शाते हैं कि क्षेत्र में जवाबदेही की कमी बनी हुई है और नागरिकों की सुरक्षा गंभीर रूप से खतरे में है। आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2023 से शुरू हुए इस संघर्ष में अब तक 72,000 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। हाल के दिनों में भी हिंसा थमने के बजाय बढ़ती नजर आ रही है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता और गहरी हो गई है। पश्चिमी तट यानी West Bank में भी हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं, जहां छापेमारी और गिरफ्तारियों का सिलसिला जारी है। कई गांवों में आगजनी और हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ गई है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बेहद संवेदनशील मोड़ पर पश्चिम एशिया में हालात फिर तनावपूर्ण हो गए हैं। एक ओर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की तैयारी चल रही है, वहीं दूसरी ओर इजरायल ने लेबनान में ताजा हमला कर दिया है। इस हमले में कम से कम तीन लोगों की मौत हो गई है, जिससे क्षेत्र में शांति प्रयासों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इजरायली सेना ने दक्षिण लेबनान के नबातीह क्षेत्र के मेफादौन कस्बे में एक रिहायशी इमारत को निशाना बनाया। यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब क्षेत्र में दो सप्ताह के संघर्षविराम (सीजफायर) को स्थायी रूप देने के लिए बातचीत की उम्मीदें जताई जा रही थीं। वार्ता पर मंडराया संकट इस पूरे घटनाक्रम ने इस्लामाबाद में होने वाली अमेरिका-ईरान वार्ता पर असर डाल दिया है। ईरान का दावा है कि हालिया सीजफायर में लेबनान भी शामिल था, जबकि इजरायल और अमेरिका इस दावे को खारिज करते रहे हैं। यही मतभेद अब शांति वार्ता के एजेंडे का सबसे बड़ा विवाद बनता दिख रहा है। सूत्रों के मुताबिक, लेबनान को लेकर बढ़ते तनाव के कारण ईरान ने पहले वार्ता में शामिल होने से हिचक दिखाई थी। हालांकि, इजरायल द्वारा बातचीत के संकेत देने के बाद ईरान वार्ता के लिए तैयार हुआ। 14 अप्रैल को नई उम्मीद इस बीच, लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन ने घोषणा की है कि 14 अप्रैल से इजरायल और लेबनान के बीच सीधी बातचीत शुरू हो सकती है। यह बातचीत अमेरिका की मध्यस्थता में होने की संभावना है। जंग का बड़ा असर 28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद से लेबनान में हालात बेहद खराब हो चुके हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक करीब 1,900 लोगों की मौत हो चुकी है। लगातार हमलों और जवाबी कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है और वैश्विक स्तर पर भी चिंता बढ़ा दी है। क्या आगे बढ़ेगी शांति प्रक्रिया? विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लेबनान में हिंसा नहीं रुकती, तो अमेरिका-ईरान वार्ता का सकारात्मक परिणाम निकलना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि क्षेत्र स्थिरता की ओर बढ़ेगा या फिर एक बार फिर बड़े संघर्ष की ओर लौटेगा।
नई दिल्ली/इस्लामाबाद: वैश्विक कूटनीति के बेहद अहम मोड़ पर अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता शुरू होने जा रही है, जिसकी मेजबानी पाकिस्तान कर रहा है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच यह बातचीत उम्मीद की किरण भी है और आशंकाओं से भरी भी। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे जेडी वेंस ने बातचीत को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं, लेकिन सख्त चेतावनी भी दी है कि किसी भी तरह की धोखाधड़ी बर्दाश्त नहीं होगी। ऐसे में यह वार्ता विश्वास और अविश्वास के बीच संतुलन साधने की चुनौती बन गई है। लेबनान बना सबसे बड़ा शुरुआती विवाद इस वार्ता की शुरुआत से पहले ही लेबनान का मुद्दा सबसे बड़ी अड़चन बनकर सामने आया है। ईरान चाहता है कि लेबनान में पूर्ण युद्धविराम लागू हो, जबकि इजरायल हिजबुल्लाह के खिलाफ अपने सैन्य अभियान को रोकने के मूड में नहीं है। इस टकराव ने वार्ता की सफलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि इसमें तीसरे पक्ष की भूमिका भी बेहद अहम है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ता तनाव वैश्विक तेल आपूर्ति की लाइफलाइन माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है। ईरान इसे अपना संप्रभु क्षेत्र बताते हुए नए ट्रांजिट नियम और टोल लागू करना चाहता है, जबकि अमेरिका ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। यह मुद्दा केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला बन चुका है। परमाणु कार्यक्रम पर आमने-सामने ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस वार्ता का सबसे संवेदनशील और जटिल पहलू है। डोनाल्ड ट्रंप का स्पष्ट रुख है कि ईरान को यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद करना होगा, जबकि ईरान परमाणु अप्रसार संधि का हवाला देते हुए शांतिपूर्ण उपयोग के लिए इसे अपना अधिकार बता रहा है। यही मतभेद इस मुद्दे को सबसे कठिन बना देता है। ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ पर टकराव मध्य पूर्व में ईरान का प्रभाव उसके “एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस” नेटवर्क के जरिए मजबूत होता है, जिसमें लेबनान, यमन और गाजा के संगठन शामिल हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा मानते हैं, जबकि ईरान इसे अपनी सुरक्षा रणनीति का हिस्सा बताता है। सीरिया में हालिया घटनाओं के बावजूद ईरान इस नेटवर्क को छोड़ने के लिए तैयार नहीं दिख रहा। $120 अरब की मांग ने बढ़ाई मुश्किल वार्ता से पहले ही ईरान ने अपनी जमी हुई लगभग 120 अरब डॉलर की संपत्तियों को जारी करने और प्रतिबंध हटाने की मांग रख दी है। अमेरिका ने इस पर अभी तक कोई स्पष्ट सहमति नहीं दी है, जिससे यह आशंका बनी हुई है कि यह मांग वार्ता को पटरी से उतार सकती है। क्या होगा नतीजा? इन सभी जटिल मुद्दों के बीच यह साफ है कि यह वार्ता या तो इतिहास रच सकती है या फिर तनाव को और गहरा कर सकती है। अगर दोनों पक्ष लचीलापन दिखाते हैं, तो मध्य पूर्व में शांति की नई शुरुआत हो सकती है, लेकिन अगर मतभेद कायम रहे, तो यह टकराव और गंभीर रूप ले सकता है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच खुद को “पीस ब्रोकर” के तौर पर पेश करने की पाकिस्तान की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। इस्लामाबाद में आयोजित विदेश मंत्रियों की अहम बैठक तय समय से पहले ही समाप्त हो गई, जिससे इस पहल की गंभीरता और तैयारी पर सवाल खड़े हो गए हैं। एक दिन में खत्म हुआ दो दिन का समिट यह बैठक 29–30 मार्च तक दो दिन चलने वाली थी, लेकिन यह सिर्फ एक दिन में ही खत्म हो गई। इस सम्मेलन में तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया था। बैठक का मकसद अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए एक मध्यस्थता ढांचा तैयार करना था, लेकिन इसमें कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। क्यों नहीं बनी सहमति? कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, बैठक के विफल होने के पीछे कई कारण रहे: ईरान की कड़ी शर्तें, जिसमें सुरक्षा की गारंटी की मांग अमेरिका पर भरोसे को लेकर स्पष्ट आश्वासन का अभाव शामिल देशों के बीच आपसी मतभेद जहां पाकिस्तान और तुर्की बातचीत को आगे बढ़ाने के पक्ष में थे, वहीं सऊदी अरब और मिस्र ने अधिक सतर्क रुख अपनाया। सऊदी और मिस्र ने क्यों छोड़ी बैठक? रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्री पहले ही दिन बैठक छोड़कर लौट गए। इन देशों का मानना था कि: किसी भी मध्यस्थता से पहले सीधे अमेरिका से बातचीत जरूरी है बिना स्पष्ट रणनीति के आगे बढ़ना जोखिम भरा हो सकता है इससे बैठक में एकजुटता की कमी साफ नजर आई। क्या आगे बनेगा रास्ता? हालांकि बैठक से कोई ठोस परिणाम नहीं निकला, लेकिन सभी देशों ने कूटनीतिक बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई है। पाकिस्तान और तुर्की, ईरान को शर्तों में नरमी लाने के लिए मनाने की कोशिश करेंगे अगर अमेरिका और ईरान सकारात्मक संकेत देते हैं, तो जल्द नई बैठक हो सकती है फिलहाल, यह साफ है कि क्षेत्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे पर एकमत बनाना आसान नहीं है।
कोलंबिया में सोमवार को एक बड़ा सैन्य विमान हादसा हो गया। एयरफोर्स का हरक्यूलिस C-130 विमान टेकऑफ के दौरान क्रैश हो गया, जिसमें अब तक 66 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 50 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं। हादसे में 4 सैनिक अभी भी लापता हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, विमान में 114 सैनिक और 11 क्रू मेंबर सवार थे। एक सैन्य सूत्र के अनुसार मृतकों में 58 सैनिक, 6 वायुसेना कर्मी और 2 पुलिस अधिकारी शामिल हैं। टेकऑफ के 1.5 किमी बाद हुआ हादसा यह दुर्घटना पेरू सीमा के पास दक्षिणी अमेजन क्षेत्र के प्यूर्टो लेगुइजामो में हुई। रक्षा मंत्री पेड्रो सांचेज के अनुसार, विमान रनवे से करीब 1.5 किलोमीटर दूर जाकर गिरा। हादसे के बाद विमान में आग लग गई, जिससे उसमें मौजूद गोला-बारूद फटने लगा और स्थिति और भी भयावह हो गई। राष्ट्रपति ने जताया दुख, दिए सुधार के संकेत कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने हादसे पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह एक गंभीर त्रासदी है और जवानों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। पेट्रो ने संकेत दिए कि सेना के आधुनिकीकरण में तेजी लाई जाएगी। उन्होंने चेतावनी भी दी कि अगर अधिकारी जिम्मेदारी नहीं निभाते हैं, तो उन्हें पद से हटाया जा सकता है। सरकार ने नए हेलिकॉप्टर, ट्रांसपोर्ट विमान और एंटी-ड्रोन सिस्टम खरीदने की प्रक्रिया तेज करने की बात कही है। स्थानीय लोगों ने बचाई जानें हादसे के तुरंत बाद आसपास के गांवों के लोग राहत कार्य में जुट गए। कई घायलों को मोटरसाइकिल से अस्पताल पहुंचाया गया। पहले उन्हें स्थानीय क्लीनिक में भर्ती किया गया, फिर गंभीर घायलों को बोगोटा जैसे बड़े शहरों में एयरलिफ्ट किया गया। आतंकी एंगल से इनकार, जांच जारी रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया है कि अभी तक किसी आतंकी हमले या साजिश के सबूत नहीं मिले हैं। फिलहाल इसे एक दुर्घटना माना जा रहा है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, टेकऑफ के तुरंत बाद इंजन फेल होने की आशंका जताई जा रही है, जिसकी जांच की जा रही है। क्या है C-130 हरक्यूलिस विमान? C-130 हरक्यूलिस दुनिया के सबसे भरोसेमंद सैन्य परिवहन विमानों में से एक माना जाता है। सैनिकों, हथियारों और राहत सामग्री की ढुलाई में इस्तेमाल कच्चे और छोटे रनवे पर भी उतरने में सक्षम भारी उपकरण और वाहनों को ले जाने की क्षमता मेडिकल इमरजेंसी और आपदा राहत में उपयोग यह विमान एक बार में करीब 19,000 किलोग्राम तक वजन एयरड्रॉप कर सकता है।
दक्षिण एशिया में सुरक्षा स्थिति एक बार फिर गंभीर होती दिख रही है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी तनाव अब खुले सैन्य टकराव का रूप लेता जा रहा है। ताजा घटनाक्रम में अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने पाकिस्तान पर राजधानी काबुल में बड़े पैमाने पर हवाई हमले करने का आरोप लगाया है, जिसमें अब तक 400 लोगों की मौत और 200 से अधिक के घायल होने का दावा किया गया है। हालांकि पाकिस्तान ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। अस्पताल पर हमले का गंभीर आरोप तालिबान सरकार के अनुसार, यह हमला काबुल के 9वें पुलिस जिले में स्थित एक नशा मुक्ति केंद्र (ड्रग्स रिहैबिलिटेशन अस्पताल) पर किया गया। इस अस्पताल में बड़ी संख्या में मादक पदार्थों के आदी लोगों का इलाज चल रहा था। हमले के बाद अस्पताल का बड़ा हिस्सा मलबे में तब्दील हो गया और वहां मौजूद मरीजों, स्वास्थ्यकर्मियों और स्थानीय लोगों में भारी हताहत हुए। मौत और तबाही का बढ़ता आंकड़ा अफगान अधिकारियों का कहना है कि अब तक 400 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हैं। राहत और बचाव कार्य जारी है, लेकिन मलबे में दबे लोगों के कारण मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई शव अब भी मलबे के नीचे फंसे हुए हैं और अस्पताल की इमारत पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी है। रमज़ान के दौरान हमला, दहशत का माहौल बताया जा रहा है कि यह हमला सोमवार रात करीब 9 बजे हुआ, जब लोग रमज़ान के दौरान रोज़ा खोलने के बाद बाहर निकले हुए थे। अचानक हुए जोरदार धमाकों से पूरा काबुल दहल उठा। हमले के तुरंत बाद एंटी-एयरक्राफ्ट फायरिंग शुरू हो गई और शहर में अफरा-तफरी मच गई। लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागते नजर आए। सीमा विवाद से बढ़ा टकराव विशेषज्ञों के अनुसार, यह हमला दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद, खासकर डूरंड लाइन को लेकर बढ़ते तनाव का परिणाम हो सकता है। बीते तीन हफ्तों से सीमा पर लगातार गोलीबारी, ड्रोन हमले और सैन्य झड़पें हो रही हैं, जिससे हालात और बिगड़ते जा रहे हैं। तालिबान की कड़ी प्रतिक्रिया तालिबान के आधिकारिक प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे “मानवता के खिलाफ अपराध” बताया है। उन्होंने कहा कि यह अफगानिस्तान की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन है। साथ ही, उन्होंने संकेत दिए कि इस हमले का जवाब दिया जाएगा। पाकिस्तान ने किया इनकार दूसरी ओर, शहबाज शरीफ सरकार ने इन सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। पाकिस्तान के आधिकारिक बयान में कहा गया है कि उसकी सेना ने काबुल में किसी भी अस्पताल या नागरिक ठिकाने को निशाना नहीं बनाया। पाकिस्तान ने इन आरोपों को “बेबुनियाद और भ्रामक” करार दिया है। क्षेत्रीय और वैश्विक चिंता बढ़ी इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र में अस्थिरता की आशंका बढ़ गई है। यदि यह तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर न केवल दक्षिण एशिया बल्कि वैश्विक सुरक्षा और व्यापार पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर जल्द कूटनीतिक समाधान नहीं निकला, तो यह संघर्ष व्यापक युद्ध का रूप ले सकता है। कुल मिलाकर, काबुल में हुए इस कथित हमले ने दोनों देशों के बीच पहले से ही खराब रिश्तों को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में हालात शांत होते हैं या संघर्ष और गहराता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।