Iran अब केवल तेल और समुद्री व्यापार ही नहीं, बल्कि वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क को भी रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की तैयारी में दिखाई दे रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के नीचे बिछी समुद्री इंटरनेट और डेटा केबलों पर नियंत्रण और शुल्क लगाने के संकेत दिए हैं। इस कदम ने दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों, बैंकिंग सेक्टर और अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन केबलों पर किसी तरह का असर पड़ा तो वैश्विक इंटरनेट ट्रैफिक, क्लाउड सेवाएं, ऑनलाइन कारोबार और वित्तीय लेनदेन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं। गूगल-माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों पर शुल्क लगाने की तैयारी ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, Google, Microsoft, Meta और Amazon जैसी कंपनियों को भविष्य में होर्मुज स्ट्रेट के नीचे गुजरने वाली इंटरनेट केबलों के इस्तेमाल के लिए शुल्क देना पड़ सकता है। ईरान के सैन्य प्रवक्ता Ebrahim Zolfaqhari ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर संकेत दिए कि समुद्री इंटरनेट केबलों पर शुल्क लगाया जा सकता है। डिजिटल युद्ध की तरफ बढ़ रहा ईरान? विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान अब अपनी भौगोलिक स्थिति को रणनीतिक दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की पश्चिम एशिया विशेषज्ञ दीना एसफंदियारी के अनुसार, तेहरान दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि यदि उस पर हमला हुआ तो वैश्विक अर्थव्यवस्था भी गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। समुद्र के नीचे बिछी सबसी केबलें वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क की रीढ़ मानी जाती हैं। यूरोप, एशिया और खाड़ी देशों के बीच डेटा ट्रांसफर, बैंकिंग सिस्टम, क्लाउड कंप्यूटिंग, वीडियो स्ट्रीमिंग, ऑनलाइन गेमिंग और AI सेवाओं का बड़ा हिस्सा इन्हीं केबलों के जरिए संचालित होता है। भारत समेत एशियाई देशों पर पड़ सकता है असर रिपोर्ट्स के अनुसार, Strait of Hormuz एशिया और यूरोप के बीच एक अहम डिजिटल कॉरिडोर बन चुका है। अगर यहां इंटरनेट केबलों में बाधा आती है तो भारत की IT और आउटसोर्सिंग इंडस्ट्री को बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता है। इसके अलावा खाड़ी देशों के तेल और गैस निर्यात से जुड़े डिजिटल सिस्टम, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग नेटवर्क और शेयर बाजारों पर भी असर पड़ सकता है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इंटरनेट स्पीड कम होने से कहीं बड़ा खतरा वित्तीय लेनदेन और वैश्विक डेटा ट्रैफिक में रुकावट का हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला दे रहा ईरान ईरानी मीडिया का दावा है कि यह योजना अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून UNCLOS के तहत तैयार की जा रही है। इस कानून के मुताबिक, कोई भी तटीय देश अपनी समुद्री सीमा में आने वाली केबलों पर कुछ नियम लागू कर सकता है। ईरान स्वेज नहर का उदाहरण देकर यह तर्क दे रहा है कि रणनीतिक जलमार्गों से आर्थिक लाभ कमाना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य और स्वेज नहर की कानूनी स्थिति पूरी तरह समान नहीं है। पहले भी निशाने पर आ चुकी हैं समुद्री केबलें समुद्र के नीचे बिछी संचार केबलों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं पहले भी सामने आ चुकी हैं। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने जर्मनी की टेलीग्राफ केबल काट दी थी। हाल ही में 2024 में Houthi Movement से जुड़े हमलों में लाल सागर की तीन इंटरनेट केबल क्षतिग्रस्त हो गई थीं, जिससे क्षेत्रीय इंटरनेट ट्रैफिक का करीब 25 प्रतिशत प्रभावित हुआ था। हालांकि आधुनिक नेटवर्क में वैकल्पिक रूट मौजूद होते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े स्तर पर किसी केबल नेटवर्क को नुकसान पहुंचने पर वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
Donald Trump ने Iran को लेकर एक बार फिर सख्त चेतावनी दी है। परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनाव को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव के बीच ट्रंप ने कहा कि “ईरान के लिए घड़ी की टिक-टिक शुरू हो चुकी है” और उसे जल्द फैसला लेना होगा। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर लिखा, “उन्हें बहुत तेजी से कदम उठाने होंगे, वरना वहां कुछ भी बाकी नहीं बचेगा। समय सबसे महत्वपूर्ण है।” फिर बढ़ा सैन्य कार्रवाई का खतरा ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु वार्ता दोबारा शुरू करने को लेकर गतिरोध बना हुआ है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका एक सप्ताह के भीतर ईरान के खिलाफ नई सैन्य कार्रवाई पर विचार कर सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप मंगलवार को अपने शीर्ष सुरक्षा सलाहकारों के साथ व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में अहम बैठक कर सकते हैं, जिसमें ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य विकल्पों पर चर्चा होगी। नेतन्याहू से हुई लंबी बातचीत सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप ने हाल ही में Benjamin Netanyahu से करीब आधे घंटे तक बातचीत की। चर्चा में ईरान और मिडिल ईस्ट की सुरक्षा स्थिति पर विचार किया गया। बताया जा रहा है कि नेतन्याहू ने ट्रंप से कहा कि इजरायली सेना किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। अमेरिका की नई शर्तें ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने वार्ता फिर से शुरू करने के लिए कई नई शर्तें रखी हैं। इनमें शामिल हैं: 400 किलोग्राम समृद्ध यूरेनियम अमेरिका को सौंपना केवल एक परमाणु केंद्र संचालित रखना युद्ध मुआवजे की मांग वापस लेना अधिकांश फ्रीज विदेशी संपत्तियों पर दावा छोड़ना क्षेत्रीय संघर्ष को वार्ता प्रक्रिया पूरी होने तक समाप्त न करना ईरान ने भी रखीं अपनी शर्तें ईरान ने भी बातचीत के लिए अपनी शर्तें सामने रखी हैं। तेहरान का कहना है कि वह तभी बातचीत करेगा जब: क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई बंद हो ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं विदेशों में फ्रीज ईरानी संपत्तियां जारी की जाएं युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा मिले Strait of Hormuz पर उसकी संप्रभुता को मान्यता दी जाए अब तक अमेरिका ने इन मांगों को स्वीकार नहीं किया है। युद्ध और संघर्षविराम के बाद भी तनाव बरकरार दोनों देशों के बीच संघर्ष 28 फरवरी को उस समय शुरू हुआ था जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर तेहरान समेत कई इलाकों पर हमले किए थे। इसके बाद कई हफ्तों तक संघर्ष जारी रहा और 8 अप्रैल को दोनों पक्षों के बीच संघर्षविराम पर सहमति बनी। सीजफायर के बावजूद धमकियों, आरोपों और सैन्य गतिविधियों का सिलसिला जारी है। ईरानी राष्ट्रपति ने अमेरिका-इजरायल पर लगाए आरोप Masoud Pezeshkian ने अमेरिका और इजरायल पर ईरान को अस्थिर करने की कोशिश का आरोप लगाया है। पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री मोहसिन नकवी के साथ बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि पड़ोसी देशों ने अपनी जमीन का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ नहीं होने दिया। उन्होंने पाकिस्तान, अफगानिस्तान और इराक का आभार भी जताया। होर्मुज स्ट्रेट बना विवाद का केंद्र मिडिल ईस्ट तनाव के बीच होर्मुज स्ट्रेट सबसे संवेदनशील मुद्दा बन गया है। ईरान ने इस समुद्री मार्ग पर निगरानी बढ़ा दी है, जबकि अमेरिका ने क्षेत्र में नौसैनिक गतिविधियां तेज कर दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव और बढ़ा तो इसका असर वैश्विक तेल सप्लाई और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।
Iran और United States के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा ईरान के ताजा शांति प्रस्ताव को खारिज किए जाने के बाद तेहरान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि अगर उस पर हमला हुआ, तो उसके सशस्त्र बल “हमलावर को सबक सिखाने” के लिए पूरी तरह तैयार हैं। ट्रंप ने क्या कहा? वॉशिंगटन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरान के प्रस्ताव को “अस्वीकार्य” बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा: “यह युद्धविराम गंभीर लाइफ सपोर्ट पर है।” ट्रंप ने हालात की तुलना ऐसे मरीज से की जिसकी “जीवित रहने की संभावना सिर्फ एक प्रतिशत” बची हो। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ गया है। ईरान ने दी जवाबी चेतावनी ट्रंप की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरानी संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने कहा कि ईरान किसी भी संघर्ष के लिए तैयार है। उन्होंने X पर लिखा: “हमारे सशस्त्र बल किसी भी हमले का जवाब देने और हमलावर को सबक सिखाने के लिए तैयार हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि “खराब रणनीति और गलत फैसलों का परिणाम हमेशा बुरा ही होता है।” ईरान के प्रस्ताव में क्या था? ईरानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, तेहरान ने जो प्रस्ताव दिया था उसमें: ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करने पूरे क्षेत्र में सैन्य अभियान रोकने लेबनान में Hezbollah को निशाना बनाने वाले हमलों पर रोक विदेशों में फ्रीज ईरानी संपत्तियों को जारी करने जैसी मांगें शामिल थीं। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा: “हमने किसी तरह की रियायत नहीं मांगी, सिर्फ ईरान के वैध अधिकारों की मांग की है।” होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ा दबाव तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी दिखाई देने लगा है। Strait of Hormuz में पहले से चल रही रुकावटों के कारण तेल बाजार दबाव में हैं। अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो: कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पेट्रोल-डीजल महंगा होना खाद्य और परिवहन लागत बढ़ना जैसे असर देखने को मिल सकते हैं। क्यों बढ़ रहा है तनाव? विशेषज्ञों के मुताबिक दोनों देशों के बीच मुख्य विवाद: ईरान के परमाणु कार्यक्रम अमेरिकी प्रतिबंध मिडिल ईस्ट में सैन्य मौजूदगी इजरायल और हिजबुल्ला को लेकर टकराव को लेकर है। हालिया बयानबाजी से साफ है कि फिलहाल दोनों पक्ष पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में मिडिल ईस्ट में अस्थिरता और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक जटिल वैश्विक समीकरण के बीच फंसे नजर आ रहे हैं। एक ओर ईरान के साथ बढ़ता सैन्य और आर्थिक तनाव है, तो दूसरी ओर 14-15 मई को प्रस्तावित चीन का बेहद अहम दौरा। यह दौरा सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक संतुलन से जुड़ा हुआ है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है–क्या पहले ईरान के साथ टकराव सुलझाया जाए या चीन के साथ रिश्तों को प्राथमिकता दी जाए? क्यों इतना अहम है चीन दौरा? व्हाइट हाउस के अधिकारियों के अनुसार, यह दौरा कई वजहों से बेहद महत्वपूर्ण है: अमेरिका-चीन के बीच व्यापार और प्रतिबंधों को लेकर तनाव वैश्विक सप्लाई चेन में आ रही रुकावटें ऊर्जा संकट और तेल आपूर्ति का मुद्दा दरअसल, अमेरिका यह समझता है कि चीन के साथ सीधी बातचीत के बिना मौजूदा संकटों का समाधान मुश्किल होगा। यही वजह है कि पहले टाले जा चुके इस दौरे को अब हर हाल में पूरा करने की कोशिश की जा रही है। ईरान संकट ने बढ़ाई कूटनीतिक चुनौती ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती ईरान से जुड़ी स्थिति है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है, वहां बढ़ते तनाव ने हालात को और गंभीर बना दिया है। इस मार्ग से दुनिया के बड़े हिस्से को तेल सप्लाई होता है मार्च की शुरुआत से ही यहां व्यवधान की स्थिति बनी हुई है कई जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है इसका सीधा असर वैश्विक बाजार, खासकर तेल कीमतों और व्यापार पर पड़ा है। ऊर्जा संकट और वैश्विक असर चीन समेत एशिया के कई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस समुद्री मार्ग पर निर्भर हैं। रास्ता बाधित होने के कारण: तेल की सप्लाई कम हुई कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ा कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ी यही वजह है कि अब यह मुद्दा अमेरिका-चीन वार्ता का केंद्र बन चुका है। चीन की भूमिका–मध्यस्थ या रणनीतिक खिलाड़ी? चीन इस पूरे विवाद में खुद को एक संभावित मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है। लेकिन स्थिति इतनी सरल नहीं है: अमेरिका ने चीन की कई शिपिंग कंपनियों और तेल रिफाइनरियों पर प्रतिबंध लगाए हैं आरोप है कि ये कंपनियां ईरान से तेल खरीदकर अमेरिकी नियमों का उल्लंघन कर रही हैं ऐसे में चीन एक तरफ समाधान चाहता है, तो दूसरी तरफ अपने आर्थिक हितों की भी रक्षा कर रहा है। ट्रंप के सामने दो रास्ते इस पूरे घटनाक्रम में ट्रंप प्रशासन के सामने दो बड़े विकल्प हैं: 1. सैन्य दबाव बढ़ाना ईरान पर और कड़े प्रतिबंध सैन्य कार्रवाई की संभावना क्षेत्र में अमेरिका की मौजूदगी बढ़ाना 2. कूटनीतिक समाधान चीन की मध्यस्थता का इस्तेमाल ईरान के साथ बातचीत ऊर्जा और व्यापार को स्थिर करने की कोशिश विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप फिलहाल दोनों रणनीतियों को साथ लेकर चल रहे हैं–एक तरफ दबाव, दूसरी तरफ बातचीत। दौरे पर पड़ सकता है असर? अगर ईरान के साथ तनाव और बढ़ता है, तो: ट्रंप का चीन दौरा फिर टल सकता है या फिर दौरे का एजेंडा पूरी तरह ईरान संकट पर केंद्रित हो सकता है लेकिन अगर कोई आंशिक समाधान निकलता है, तो यह दौरा वैश्विक राजनीति में बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर कई बड़े दावे किए हैं। ओवल ऑफिस में एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर करते हुए ट्रंप ने कहा कि उनकी एक कॉल के बाद ईरान में 8 महिलाओं को दी जाने वाली फांसी रोक दी गई। “एक फोन कॉल से टली फांसी” ट्रंप ने कहा कि ईरान 8 महिलाओं को फांसी देने की तैयारी कर रहा था, लेकिन उन्होंने हस्तक्षेप करते हुए कहा–“ऐसा मत करो, पूरी दुनिया देख रही है।” उन्होंने दावा किया कि उनकी इस अपील के बाद फांसी रोक दी गई। विरोध प्रदर्शनों पर गंभीर आरोप ट्रंप के अनुसार, पिछले दो महीनों में ईरान में विरोध प्रदर्शनों के दौरान करीब 42,000 लोगों की मौत हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि ये लोग निहत्थे थे और सिर्फ विरोध करने के कारण मारे गए। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। ईरान की सैन्य ताकत पर दावा ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से ईरान की सैन्य क्षमता काफी कमजोर हो चुकी है। उनके मुताबिक: नौसेना लगभग खत्म हो चुकी है वायुसेना भी काफी हद तक निष्क्रिय हो गई है ड्रोन फैक्ट्रियां 82% तक नष्ट मिसाइल फैक्ट्रियां करीब 90% तक तबाह उन्होंने यह भी कहा कि ईरान अब अमेरिका के साथ समझौता करने को “बेताब” है। अर्थव्यवस्था पर भी असर ट्रंप के अनुसार, अमेरिका की नाकेबंदी (ब्लॉकेड) के चलते ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। उन्होंने दावा किया कि ईरान को तेल से लगभग कोई आय नहीं हो रही और आर्थिक स्थिति चरमरा गई है। अन्य मुद्दों का भी जिक्र ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान में एक पहलवान समेत कई लोगों को राजनीतिक बयानों के कारण फांसी दी गई। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां विरोध करने वालों पर सख्ती की जा रही है और मौत के वास्तविक आंकड़े आधिकारिक आंकड़ों से ज्यादा हो सकते हैं। बाजार और रणनीति अमेरिकी अर्थव्यवस्था का जिक्र करते हुए ट्रंप ने कहा कि डॉव जोन्स इंडेक्स और एसएंडपी 500 नई ऊंचाइयों पर पहुंचे, जिसके बाद उन्होंने ईरान पर सख्त रुख अपनाने का फैसला किया। उन्होंने दोहराया कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा। ईरान का जवाब वहीं, ईरान की ओर से जवाब देते हुए संसद अध्यक्ष ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण मजबूत किया जाएगा और फारस की खाड़ी की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने अमेरिका के किसी भी हस्तक्षेप का मुकाबला करने की बात कही।
Iran ने अमेरिका के साथ जारी तनाव खत्म करने के लिए एक नया चरणबद्ध प्रस्ताव दिया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump इससे संतुष्ट नहीं बताए जा रहे हैं। इससे युद्धविराम और कूटनीतिक समाधान की उम्मीदों को झटका लगा है। ईरान ने क्या प्रस्ताव दिया? ईरान की तीन-स्तरीय योजना में शामिल हैं: पहले अमेरिका-इज़राइल के साथ युद्धविराम फिर Strait of Hormuz में नौवहन बहाल करना और समुद्री नाकेबंदी हटाना उसके बाद परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन पर बातचीत तेहरान चाहता है कि परमाणु मुद्दे पर चर्चा युद्ध खत्म होने और समुद्री विवाद सुलझने के बाद हो। अमेरिका क्यों नाराज? वॉशिंगटन का कहना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अलग नहीं किया जा सकता। ट्रंप प्रशासन चाहता है कि किसी भी समझौते की शुरुआत ही परमाणु हथियारों के मुद्दे से हो। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने साफ कहा कि ऐसा कोई भी समझौता स्वीकार्य नहीं होगा जो ईरान को परमाणु हथियार बनाने की क्षमता दे। होर्मुज बना वैश्विक चिंता का केंद्र Strait of Hormuz से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है। यहां जारी तनाव से वैश्विक तेल कीमतों में तेज उछाल आया है और महंगाई बढ़ने की आशंका गहरा गई है। कूटनीति की राह कठिन प्रस्ताव पर गतिरोध के कारण इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता भी टल गई। इस बीच ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान, ओमान और रूस का दौरा किया है। फिलहाल, दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हैं, जिससे निकट भविष्य में समझौते की संभावना कमजोर दिख रही है।
Russia ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर Iran का खुलकर समर्थन किया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस ने पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका, पर तीखा हमला बोला और ईरान के होर्मुज जलडमरूमध्य में कदमों को जायज़ ठहराया। रूस ने क्या कहा? संयुक्त राष्ट्र में रूस के स्थायी प्रतिनिधि Vasily Nebenzya ने कहा कि युद्ध की स्थिति में किसी भी तटीय देश को अपनी सुरक्षा के लिए समुद्री क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही सीमित करने का अधिकार है। उनका कहना था कि ईरान पर पूरा दोष मढ़ना गलत है, जबकि वह खुद बाहरी दबाव और हमलों का सामना कर रहा है। पश्चिमी देशों पर 'समुद्री डाकू' वाला हमला नेबेंज्या ने पश्चिमी देशों की तुलना समुद्री डाकुओं से करते हुए कहा कि वे अपने "गैरकानूनी" कदमों को एकतरफा प्रतिबंधों और दबाव की आड़ में छिपाते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यूरोपीय देश खुलेआम समुद्र में लूटपाट जैसी कार्रवाइयों का समर्थन कर रहे हैं। पहले भी रूस-चीन ने किया था वीटो इस महीने की शुरुआत में China और रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उस प्रस्ताव को वीटो कर दिया था, जिसका उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करना था। पुतिन ने भी जताया समर्थन इसी दिन रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin ने ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची से मुलाकात की और ईरान के प्रति अपना समर्थन दोहराया। क्यों अहम है होर्मुज? Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां बढ़ता तनाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
United Nations में परमाणु अप्रसार संधि (NPT) की समीक्षा बैठक के दौरान अमेरिका और ईरान के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। विवाद ईरान को सम्मेलन का उपाध्यक्ष बनाए जाने को लेकर हुआ। क्या है पूरा मामला? न्यूयॉर्क में आयोजित परमाणु अप्रसार संधि समीक्षा सम्मेलन में ईरान को 34 उपाध्यक्षों में शामिल किया गया। यह नियुक्ति गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की ओर से की गई थी। अमेरिका ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। अमेरिका ने क्यों जताया विरोध? अमेरिकी अधिकारी क्रिस्टोफर यीव ने कहा कि ईरान का इस पद पर होना NPT की भावना के खिलाफ है। उनका आरोप है कि ईरान लंबे समय से अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालन नहीं कर रहा है और International Atomic Energy Agency के साथ भी पूरा सहयोग नहीं कर रहा। उन्होंने इसे सम्मेलन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करने वाला फैसला बताया। ईरान का पलटवार ईरान के प्रतिनिधि रज़ा नजाफी ने अमेरिकी आरोपों को "बेबुनियाद और राजनीतिक" करार दिया। उन्होंने अमेरिका पर ही परमाणु हथियारों के विस्तार और दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया। बढ़ते तनाव की पृष्ठभूमि यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच तनाव पहले से ही चरम पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने हाल ही में दोहराया कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे। ईरान का रुख ईरान का कहना है कि उसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम संवर्धन का अधिकार है। हालांकि पश्चिमी देशों को आशंका है कि इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में किया जा सकता है। फिलहाल, यह टकराव वैश्विक परमाणु सुरक्षा और कूटनीतिक प्रयासों के लिए नई चुनौती बनता दिख रहा है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद हुआ हमला जर्मनी की राजधानी बर्लिन में ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी पर एक व्यक्ति ने लाल रंग का तरल पदार्थ फेंक दिया। शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह टमाटर केचप था। घटना उस समय हुई जब पहलवी प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद अपने समर्थकों का अभिवादन कर रहे थे। हमले का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। कैसे हुआ हमला? वीडियो में देखा जा सकता है कि रेजा पहलवी समर्थकों की ओर हाथ हिला रहे थे। तभी पीछे से एक व्यक्ति अचानक आया और उन पर लाल तरल फेंक दिया। लाल पदार्थ उनके कोट और गर्दन पर गिरा सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत आरोपी को पकड़ लिया पुलिस ने मौके पर ही उसे हिरासत में ले लिया हालांकि, पहलवी इस घटना में पूरी तरह सुरक्षित रहे। हमले के बाद भी नहीं रुके पहलवी हमले के बावजूद रेजा पहलवी ने संयम बनाए रखा। उन्होंने समर्थकों का अभिवादन जारी रखा और बाद में अपनी कार में बैठकर वहां से रवाना हो गए। यह घटना उनके समर्थकों और विरोधियों के बीच मौजूद गहरे राजनीतिक विभाजन को भी दर्शाती है। सीजफायर पर की थी तीखी आलोचना घटना से कुछ देर पहले पहलवी ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्धविराम की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने कहा कि तेहरान के मौजूदा नेतृत्व पर भरोसा करना एक बड़ी भूल होगी और पश्चिमी देशों को ईरान के साथ केवल "यथास्थिति" बनाए रखने की नीति छोड़नी चाहिए। कौन हैं रेजा पहलवी? रेजा पहलवी, ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बेटे हैं। 1967 में उन्हें क्राउन प्रिंस घोषित किया गया था। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद उनका परिवार निर्वासन में चला गया। वे लंबे समय से ईरान की मौजूदा इस्लामिक सरकार के मुखर आलोचक रहे हैं। हाल के महीनों में वे ईरान में राजनीतिक बदलाव की मांग को लेकर काफी सक्रिय रहे हैं।
ईरान को सीधी सैन्य चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी नौसेना को आदेश दिया है कि अगर ईरान की छोटी नौकाएं हॉरमुज जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंग बिछाने की कोशिश करें, तो उन्हें तुरंत "shoot and kill" किया जाए। यह आदेश ऐसे समय आया है जब ईरान ने एक बार फिर इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया है। क्यों अहम है हॉरमुज जलडमरूमध्य? हॉरमुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक कच्चे तेल और गैस व्यापार का लगभग 20% इसी रास्ते से गुजरता है। यहां किसी भी तनाव का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों पर पड़ता है। इसी वजह से अमेरिका और ईरान के बीच यह टकराव वैश्विक चिंता का विषय बन गया है। ट्रंप ने क्या कहा? ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा: "मैंने अमेरिकी नौसेना को आदेश दिया है कि हॉरमुज में बारूदी सुरंग बिछाने वाली किसी भी छोटी नौका को तुरंत मार गिराया जाए।" उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी माइंस्वीपर्स फिलहाल जलडमरूमध्य को सुरक्षित बनाने में जुटे हैं। अमेरिकी सेना ने ईरानी तेल टैंकर भी पकड़ा तनाव को और बढ़ाते हुए अमेरिकी सेना ने भारतीय महासागर में ईरानी तेल तस्करी से जुड़े एक और टैंकर को जब्त कर लिया। बताया जा रहा है कि यह जहाज चीन की ओर जा रहा था और पहले भी अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आ चुका था। ईरान ने भी दिखाई ताकत एक दिन पहले ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने हॉरमुज में तीन मालवाहक जहाजों को निशाना बनाया था, जिनमें से दो को कब्जे में ले लिया गया। ईरानी न्यायपालिका के प्रमुख ने इसे "इस्लामी ईरान की ताकत का प्रदर्शन" बताया। बातचीत पर अभी भी संशय हालांकि पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता कराने की कोशिश जारी है, लेकिन फिलहाल कोई बैठक तय नहीं हो सकी है। ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले नाकेबंदी हटाए। अमेरिका चाहता है कि ईरान पहले समुद्री मार्ग पूरी तरह खोले। लेबनान में सीजफायर बढ़ाया गया ट्रंप ने साथ ही घोषणा की कि इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच लागू युद्धविराम को तीन सप्ताह के लिए बढ़ा दिया गया है। हालांकि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर उल्लंघन के आरोप लगाए हैं। वैश्विक बाजारों पर असर संभव हॉरमुज में बढ़ते तनाव से: तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है शिपिंग बीमा महंगा हो सकता है वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है दुनिया की नजरें अब इस क्षेत्र पर टिकी हैं।
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच बयानबाजी तेज अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर एक बार फिर सख्त बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन साथ ही यह भी चेतावनी दी कि ईरान के पास शांति समझौते के लिए “बहुत कम समय बचा है”। यह बयान ऐसे समय आया है जब मध्य पूर्व में अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी और बढ़ा दी है। ट्रंप का दावा: “पारंपरिक तरीके से ईरान को भारी नुकसान” व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने बिना परमाणु हथियारों के ही ईरान को काफी नुकसान पहुंचाया है। उनके अनुसार, ईरान की सैन्य क्षमता पहले ही “काफी हद तक कमजोर” हो चुकी है और अब स्थिति और बिगड़ सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किसी भी देश के लिए पूरी तरह गलत है और इसे कभी भी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। “टिक-टॉक का समय शुरू हो चुका है”: ट्रंप की चेतावनी ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि ईरान के लिए “समय तेजी से खत्म हो रहा है”। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका की स्थिति मजबूत है और ईरान की सैन्य और नेतृत्व संरचना पहले से कमजोर हो चुकी है। उनके अनुसार, अमेरिका का दबाव लगातार बढ़ रहा है और ईरान के पास समझौता करने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं हैं। मध्य पूर्व में अमेरिकी नौसैनिक ताकत में इजाफा रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाते हुए तीसरा विमानवाहक पोत (aircraft carrier) भी तैनात कर दिया है। इससे क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना की ताकत और बढ़ गई है। पहले से ही दो बड़े विमानवाहक पोत मध्य पूर्व और आसपास के क्षेत्रों में सक्रिय हैं, जिससे तनावपूर्ण स्थिति और गंभीर हो गई है। ईरान-हॉर्मुज स्ट्रेट विवाद से बढ़ी चिंता मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का बड़ा केंद्र स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बना हुआ है, जो वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का अहम मार्ग है। स्थिति इतनी संवेदनशील हो गई है कि इस समुद्री मार्ग से होने वाली व्यापारिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इस क्षेत्र में सुरक्षा खतरे बढ़ गए हैं। सैन्य टकराव की आशंका, लेकिन कूटनीति अभी भी अधर में ईरान और अमेरिका के बीच संभावित शांति वार्ता की कोशिशें फिलहाल अनिश्चित हैं। दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद कमजोर स्थिति में बताया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बातचीत दोबारा शुरू नहीं होती, तो यह तनाव आगे चलकर बड़े सैन्य टकराव में बदल सकता है। युद्ध की नहीं, लेकिन दबाव की राजनीति तेज ट्रंप के बयान और अमेरिका की बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने मध्य पूर्व की स्थिति को और जटिल बना दिया है। हालांकि उन्होंने परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से इनकार किया है, लेकिन उनके बयानों से साफ है कि दबाव की रणनीति तेज हो चुकी है। अब दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह तनाव कूटनीति की ओर बढ़ेगा या फिर टकराव और गहरा होगा।
देश की कमान अब जनरलों के नेटवर्क के इर्द-गिर्द ईरान की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां सर्वोच्च नेतृत्व से जुड़े मोजतबा खामेनेई की गंभीर चोटों के बाद देश की निर्णय प्रक्रिया पर सेना का प्रभाव तेजी से बढ़ गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब महत्वपूर्ण फैसले सीधे तौर पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के शीर्ष जनरलों की सलाह और सहमति से लिए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, मौजूदा हालात में सरकार का मुख्य काम केवल आंतरिक स्थिरता बनाए रखना, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करना और रोजमर्रा के प्रशासन को सुचारू रूप से चलाना रह गया है। गंभीर चोटों के बाद इलाज जारी, कई सर्जरी हो चुकी हैं रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मोजतबा खामेनेई को पहले हुए हमलों में गंभीर चोटें आई हैं। उनकी एक टांग पर अब तक तीन बार सर्जरी हो चुकी है और आगे चलकर उन्हें कृत्रिम पैर (prosthetic leg) की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा, उनके हाथ की भी सर्जरी की गई है और उसमें धीरे-धीरे सुधार देखा जा रहा है। चेहरे और होंठों पर गंभीर जलन के निशान बताए गए हैं, जिससे बोलने में कठिनाई हो रही है। डॉक्टरों का कहना है कि भविष्य में उन्हें प्लास्टिक सर्जरी की आवश्यकता भी पड़ सकती है। देश से अलग-थलग, सिर्फ मेडिकल टीम से संपर्क जानकारी के अनुसार, सुरक्षा कारणों से वरिष्ठ सैन्य और राजनीतिक नेता अब सीधे मोजतबा से मुलाकात नहीं कर रहे हैं। उनका इलाज स्वास्थ्य मंत्रालय और विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में चल रहा है। ईरान के राष्ट्रपति, जो स्वयं एक डॉक्टर हैं, भी उनकी देखभाल प्रक्रिया से जुड़े बताए जा रहे हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि वे सार्वजनिक रूप से बोलने से बच रहे हैं और केवल लिखित संदेशों के जरिए ही संवाद कर रहे हैं। सैन्य नेतृत्व के हाथ में सत्ता का संतुलन ईरान की सत्ता संरचना में इस समय बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स देश की सुरक्षा, विदेश नीति और रणनीतिक फैसलों में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। विदेश नीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण अधिकार पहले के मुकाबले अब अलग नेताओं के पास स्थानांतरित हो गए हैं। संसद प्रमुख और कुछ वरिष्ठ सैन्य अधिकारी अंतरराष्ट्रीय रणनीति में ज्यादा प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं। सरकार सीमित भूमिका में, जनरल्स का बढ़ता प्रभाव ईरान की निर्वाचित सरकार फिलहाल केवल प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नजर आ रही है। खाद्य आपूर्ति, ईंधन व्यवस्था और घरेलू स्थिरता जैसे कार्य सरकार के मुख्य दायित्व बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति में देश के भीतर शक्ति का संतुलन स्पष्ट रूप से सैन्य नेतृत्व की ओर झुका हुआ है। हालांकि, ईरानी व्यवस्था में अलग-अलग शक्ति केंद्रों का अस्तित्व पहले से ही रहा है। अस्थिर समय में सत्ता का बदलता ढांचा ईरान की वर्तमान राजनीतिक स्थिति एक असाधारण मोड़ पर दिखाई दे रही है, जहां घायल नेतृत्व, सीमित प्रशासनिक भूमिका और मजबूत सैन्य प्रभाव मिलकर एक नया शक्ति समीकरण बना रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि देश का राजनीतिक ढांचा किस दिशा में आगे बढ़ता है।
ईरान के बयान से बढ़ी उलझन हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर एक बड़ा बयान सामने आया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि युद्धविराम अवधि के दौरान यह समुद्री रास्ता सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए “पूरी तरह खुला” रहेगा। लेकिन इसी घोषणा के बाद स्थिति और अधिक जटिल हो गई है। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड की सख्त शर्तें ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड ने साफ किया है कि इस मार्ग से गुजरने वाले हर जहाज को पहले उनकी अनुमति लेनी होगी। साथ ही तय मार्ग का ही उपयोग करना होगा। सैन्य जहाजों के प्रवेश पर अब भी रोक जारी है। इसे गार्ड ने “नई व्यवस्था” बताया है। ईरान के अंदर ही बयान पर असहमति ईरान के ही कुछ सरकारी मीडिया संस्थानों ने विदेश मंत्री के बयान पर सवाल उठाए हैं। तस्नीम न्यूज ने इसे “अधूरा और भ्रम पैदा करने वाला” बताया, जबकि मेहर न्यूज ने कहा कि रणनीतिक हालात को देखते हुए यह मार्ग पूरी तरह बंद रहना चाहिए। अमेरिका और ट्रंप का दावा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह खुल चुका है और उन्होंने ईरान को धन्यवाद भी दिया। हालांकि बाद में उन्होंने यह भी कहा कि समुद्री नाकेबंदी तब तक जारी रहेगी जब तक समझौता पूरा नहीं हो जाता। तेल बाजार पर असर इस घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, तेल कीमतें करीब 10 प्रतिशत तक नीचे आ गई हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बड़ा असर पड़ा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान के अलग-अलग बयानों और सैन्य शर्तों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। इससे वैश्विक व्यापार और तेल बाजार पर आने वाले दिनों में भी असर देखने को मिल सकता है।
अमेरिका और Iran के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर है। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump बातचीत और समझौते के संकेत दे रहे हैं, तो दूसरी ओर अमेरिकी सेना ने ईरान के समुद्री रास्तों पर भारी सैन्य घेराबंदी कर दी है। United States Central Command (CENTCOM) के मुताबिक, इस मिशन में 10,000 से ज्यादा सैनिक, 12 से अधिक युद्धपोत और 100 से ज्यादा लड़ाकू विमान तैनात किए गए हैं। समुद्र में अमेरिका की ताकत का प्रदर्शन इस ऑपरेशन में एयरक्राफ्ट कैरियर USS Abraham Lincoln और गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर USS Delbert D. Black जैसे अत्याधुनिक युद्धपोत शामिल हैं, जो ईरान के बंदरगाहों और तटीय इलाकों पर कड़ी नजर रख रहे हैं। CENTCOM का कहना है कि कोई भी जहाज अगर ईरानी बंदरगाहों की ओर जाता है या वहां से निकलता है, तो उसे रोका जाएगा और जांच की जाएगी। होर्मुज जलडमरूमध्य खुला, लेकिन निगरानी कड़ी जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन ने स्पष्ट किया है कि Strait of Hormuz को बंद नहीं किया गया है। यह घेराबंदी केवल ईरान के बंदरगाहों और तटीय सीमा तक सीमित है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में भी अमेरिकी सेना पूरी तरह सक्रिय है और हर संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। ‘डार्क फ्लीट’ पर भी शिकंजा अमेरिका ने उन जहाजों पर भी कार्रवाई के संकेत दिए हैं, जिन्हें ‘डार्क फ्लीट’ कहा जाता है। ये ऐसे जहाज होते हैं जो अंतरराष्ट्रीय नियमों को दरकिनार कर गुप्त रूप से ईरानी तेल की ढुलाई करते हैं। ट्रंप बोले- ईरान डील के लिए तैयार इसी बीच ट्रंप ने दावा किया कि ईरान अब समझौते के लिए पहले से ज्यादा तैयार है। उन्होंने कहा, “ईरान आज उन शर्तों को मानने को तैयार है, जिनके लिए वह पहले राजी नहीं था।” ट्रंप ने साफ किया कि किसी भी संभावित डील की सबसे अहम शर्त यह होगी कि ईरान परमाणु हथियार न बनाए। सीजफायर टूटा तो फिर जंग राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी भी दी कि अगर बातचीत असफल रही, तो युद्ध दोबारा शुरू हो सकता है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना पूरी तरह तैयार है और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जाएगी।
नाज़ुक युद्धविराम के बीच ईरान में आम लोगों की ज़िंदगी धीरे-धीरे पटरी पर लौटती दिख रही है, लेकिन दिलों में डर और अनिश्चितता अब भी कायम है। उत्तर-पश्चिमी इलाकों में जहां बादाम के पेड़ फूलों से लद गए हैं, वहीं सड़कों पर बढ़ती आवाजाही इस बात का संकेत दे रही है कि लोग अपने घरों की ओर लौट रहे हैं। तुर्की सीमा के पास एक अस्थायी वेटिंग रूम में मिले एक बुज़ुर्ग बैंकर ने बताया कि वे अपने बेटे के साथ एक महीने तक तुर्की में शरण लिए हुए थे। उन्होंने कहा कि उनके शहर में हुए हवाई हमले मुख्य रूप से सैन्य ठिकानों तक सीमित थे और आम नागरिक ढांचे को कम नुकसान पहुंचा। हालांकि, हर कोई इतना आश्वस्त नहीं है। हिजाब पहने एक बुज़ुर्ग महिला ने डर जाहिर करते हुए कहा कि हालात अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। उन्होंने उन लोगों की पीड़ा का जिक्र किया जो घनी आबादी वाले इलाकों में बमबारी और अर्धसैनिक बलों के दबाव के बीच जी रहे हैं। एक युवा महिला ने युद्धविराम को लेकर संदेह जताते हुए कहा कि यह शांति ज्यादा समय तक टिकने वाली नहीं है। उनका मानना है कि ईरान रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण कभी नहीं छोड़ेगा। सीमा पार कर ईरान में दाखिल होने के बाद एक स्थानीय व्यक्ति ने अमेरिका को लेकर गहरा अविश्वास व्यक्त किया। उनका कहना था कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump कभी भी ईरान को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने नहीं देंगे और उनका उद्देश्य देश पर दबाव बनाए रखना है। इन तमाम प्रतिक्रियाओं से साफ है कि भले ही ज़मीन पर युद्धविराम लागू हो गया हो, लेकिन आम ईरानी नागरिकों के मन में शांति को लेकर भरोसा अभी भी बहुत कमजोर है। अमेरिका के साथ संभावित समझौते को लेकर भी लोगों में उम्मीद से ज्यादा शंका और डर देखने को मिल रहा है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच United States Navy ने ईरान के समुद्री रास्तों पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी है। United States Central Command (CENTCOM) द्वारा जारी वीडियो में अमेरिकी जंगी जहाज USS Michael Murphy (DDG-112) को ओमान की खाड़ी में एक मर्चेंट शिप को रोकते हुए देखा गया। नेवी अधिकारियों ने जहाज के क्रू को निर्देश दिया कि वे अब अमेरिकी निगरानी में अगले बंदरगाह तक जाएंगे। इस ऑपरेशन के दौरान हेलिकॉप्टर भी ऊपर से लगातार नजर रख रहे थे। 10 हजार सैनिक और 100 से ज्यादा विमान तैनात CENTCOM के मुताबिक, इस घेराबंदी में अमेरिका ने भारी सैन्य ताकत तैनात की है: 10,000 से अधिक सैनिक 12+ युद्धपोत 100+ लड़ाकू विमान इस मिशन का नेतृत्व एयरक्राफ्ट कैरियर USS Abraham Lincoln (CVN-72) कर रहा है, जो अरब सागर में मौजूद है। इस पर F-35C स्टील्थ फाइटर, F/A-18 जेट्स और आधुनिक हेलिकॉप्टर तैनात हैं। इसके अलावा गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर USS Delbert D. Black (DDG-119) भी संदिग्ध जहाजों पर नजर बनाए हुए है। होर्मुज जलडमरूमध्य खुला, सिर्फ ईरानी पोर्ट्स पर पाबंदी अमेरिकी सेना ने साफ किया है कि Strait of Hormuz को बंद नहीं किया गया है। यह कार्रवाई केवल Iran के बंदरगाहों और उसकी तटीय सीमा तक सीमित है। ट्रम्प का सख्त संदेश अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा: “हमारी नेवी शानदार काम कर रही है। अब कोई भी जहाज हमारी मंजूरी के बिना ईरान की सीमा में घुसने की सोच भी नहीं सकता।” बातचीत फेल होने के बाद बढ़ा तनाव रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता बेनतीजा रही, जिसके बाद यह सख्त कदम उठाया गया। हालांकि, दोनों देशों के बीच फिलहाल दो हफ्ते का सीजफायर लागू है। जमीनी हकीकत भी अलग शिपिंग डेटा के अनुसार, घेराबंदी के बावजूद कुछ जहाज–जिनमें ईरानी टैंकर भी शामिल हैं–इस मार्ग से गुजरने में सफल रहे हैं। इससे स्थिति की जटिलता और बढ़ गई है। ईरान के खिलाफ अमेरिका की यह समुद्री घेराबंदी क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकती है। हालांकि, अमेरिका इसे सुरक्षा और रणनीतिक कदम बता रहा है, लेकिन इससे वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका बनी हुई है।
तेहरान: ईरान में इंटरनेट बंदी का सिलसिला लगातार जारी है। इंटरनेट मॉनिटरिंग संस्था NetBlocks के मुताबिक, देश में पिछले 47 दिनों से इंटरनेट लगभग पूरी तरह ठप है, जिससे करीब 9.3 करोड़ लोग दुनिया से कट गए हैं। 1104 घंटे का रिकॉर्ड, टूटा सूडान का आंकड़ा ईरान में यह इंटरनेट शटडाउन अब तक का सबसे लंबा माना जा रहा है। कुल अवधि: लगभग 47 दिन (1104 घंटे) प्रभावित आबादी: 93 मिलियन से अधिक पिछला रिकॉर्ड: सूडान (2019 में 37 दिन) इस तरह ईरान ने सूडान का पुराना रिकॉर्ड भी तोड़ दिया है। प्रदर्शन और हमलों के बाद सख्ती रिपोर्ट्स के अनुसार: जनवरी 2026 में देश में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए इसके बाद सरकार ने इंटरनेट सेवाएं सीमित करनी शुरू की फरवरी में अमेरिका और इजरायल से जुड़े हमलों के बाद पाबंदियां और कड़ी कर दी गईं संचार व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित लगातार इंटरनेट बंद रहने से: लोगों की आपसी बातचीत लगभग ठप अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच बंद सूचना का गंभीर संकट हालांकि, देश के भीतर कुछ लोकल नेटवर्क सीमित रूप से काम कर रहे हैं, लेकिन वैश्विक कनेक्टिविटी लगभग खत्म हो चुकी है। डिजिटल सेंसरशिप का बड़ा उदाहरण इतने लंबे समय तक इंटरनेट बंद रहना सरकारी सेंसरशिप का एक बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम: आंतरिक हालात को नियंत्रित करने सूचना के प्रवाह को रोकने और विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए उठाया गया शांति वार्ता पर टिकी नजर इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बना हुआ है। 14 दिन का सीजफायर 22 अप्रैल को खत्म हो सकता है इस्लामाबाद में हुई पिछली वार्ता बेनतीजा रही नए दौर की बातचीत की संभावना जताई जा रही है डोनाल्ड ट्रंप ने भी संकेत दिए हैं कि दोनों देशों के बीच जल्द ही फिर से वार्ता हो सकती है। क्या आगे भी रहेगा ब्लैकआउट? ईरान में इंटरनेट बहाली को लेकर फिलहाल कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। जिस तरह से आंतरिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय तनाव जारी है, उससे यह साफ है कि इंटरनेट प्रतिबंध अभी कुछ और समय तक जारी रह सकता है।
तेहरान/इस्लामाबाद: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए पाकिस्तान ने कूटनीतिक प्रयास तेज कर दिए हैं। इसी क्रम में पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर बुधवार को एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ तेहरान पहुंचे। शांति मिशन पर मुनीर की ईरान यात्रा पाकिस्तान की सेना की मीडिया विंग ISPR के अनुसार, यह दौरा अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने की कोशिशों का हिस्सा है। मुनीर के साथ पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी भी मौजूद हैं। इस यात्रा का उद्देश्य दोनों देशों के बीच संभावित दूसरे दौर की वार्ता को आगे बढ़ाना और कूटनीतिक गतिरोध खत्म करना है। शहबाज शरीफ के ताबड़तोड़ विदेश दौरे दूसरी ओर, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी सक्रिय भूमिका में नजर आ रहे हैं। वह एक साथ कई अहम देशों के दौरे पर हैं: सऊदी अरब कतर तुर्की इन बैठकों में क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा और अमेरिका-ईरान तनाव पर चर्चा की जा रही है। ‘शांति वार्ता 2.0’ की तैयारी सूत्रों के मुताबिक, जल्द ही अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की बातचीत हो सकती है। पाकिस्तान इस प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। इसका मकसद है: दोनों देशों के बीच तनाव कम करना स्थायी समाधान की दिशा में बढ़ना मिडिल ईस्ट में युद्ध जैसी स्थिति टालना पहला दौर रहा बेनतीजा इससे पहले इस्लामाबाद में हुई 21 घंटे की वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के खत्म हो गई थी। इसके बाद हालात और तनावपूर्ण हो गए। डोनाल्ड ट्रंप के सख्त रुख और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़े तनाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया। आगे क्या? अब पूरी दुनिया की नजर संभावित “शांति वार्ता 2.0” पर टिकी है। अगर यह बातचीत सफल रहती है, तो क्षेत्र में स्थिरता लौट सकती है। वार्ता विफल होने की स्थिति में अमेरिका-ईरान तनाव और गहरा सकता है, जिससे वैश्विक स्तर पर भी असर देखने को मिल सकता है।
वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका का एक बेहद महंगा और एडवांस जासूसी ड्रोन हादसे का शिकार हो गया है। अमेरिकी नेवी ने पुष्टि की है कि MQ-4C Triton ड्रोन फारस की खाड़ी में क्रैश हो गया। इसकी कीमत करीब 200–240 मिलियन डॉलर (करीब 1600–2000 करोड़ रुपये) बताई जा रही है। होर्मुज स्ट्रेट के पास हुआ हादसा ड्रोन 9 अप्रैल को होर्मुज जलडमरूमध्य के पास ऑपरेशन के दौरान अचानक गायब हो गया। ड्रोन ने “कोड 7700” इमरजेंसी सिग्नल भेजा इसके बाद संपर्क पूरी तरह टूट गया बाद में पुष्टि हुई कि यह समुद्र में क्रैश हो गया अमेरिकी नेवल कमांड ने 14 अप्रैल को इसकी आधिकारिक पुष्टि की। F-35 से भी महंगा ड्रोन यह MQ-4C Triton ड्रोन अमेरिका के सबसे एडवांस निगरानी सिस्टम में शामिल है। लंबी दूरी तक समुद्री निगरानी में सक्षम घंटों तक ऊंचाई पर उड़ान भर सकता है हाई-टेक सेंसर और सर्विलांस सिस्टम से लैस इसकी कीमत दो F-35 Lightning II लड़ाकू विमानों से भी ज्यादा बताई जा रही है। ईरान पर शक, लेकिन पुष्टि नहीं ड्रोन के क्रैश होने के बाद कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। क्या तकनीकी खराबी थी? या किसी हमले में गिराया गया? कुछ रिपोर्ट्स में आशंका जताई जा रही है कि इसे ईरान ने निशाना बनाया हो सकता है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ‘क्लास A मिशैप’ माना गया हादसा अमेरिकी नियमों के अनुसार, 2.5 मिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान होने पर उसे “Class A Mishap” कहा जाता है। इस मामले में: नुकसान 240 मिलियन डॉलर से ज्यादा इसे बेहद गंभीर सैन्य हादसा माना जा रहा है बढ़ सकता है तनाव यह घटना ऐसे समय पर हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच पहले से ही तनाव चरम पर है। अगर यह साबित होता है कि ड्रोन को गिराया गया, तो क्षेत्र में हालात और बिगड़ सकते हैं। फिलहाल, अमेरिका इस पूरे मामले की जांच कर रहा है।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। अमेरिका और इजरायल के हमलों के बावजूद ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम लगभग सुरक्षित बना हुआ है। हमलों का सीमित असर The Wall Street Journal की रिपोर्ट के मुताबिक, हफ्तों तक चले हवाई हमलों और मिसाइल स्ट्राइक के बाद भी ईरान के परमाणु ढांचे को पूरी तरह नुकसान नहीं पहुंचाया जा सका। कुछ लैब्स और ‘येलोकेक’ साइट्स जरूर प्रभावित हुई हैं, लेकिन मुख्य इंफ्रास्ट्रक्चर अब भी सक्रिय है। गुप्त सुरंगों में छिपा यूरेनियम रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने अपने वेपन्स-ग्रेड यूरेनियम का बड़ा हिस्सा गहरी भूमिगत सुरंगों में सुरक्षित रखा हुआ है। International Atomic Energy Agency के अनुसार, ईरान के पास करीब 450 किलोग्राम उच्च संवर्धित यूरेनियम मौजूद है, जो परमाणु हथियार बनाने के लिए अहम माना जाता है। सेंट्रीफ्यूज और टेक्नोलॉजी बरकरार विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के पास अब भी उन्नत सेंट्रीफ्यूज और ऐसे गुप्त ठिकाने हैं, जहां यूरेनियम को हथियार-स्तर तक संवर्धित किया जा सकता है। इससे साफ है कि ईरान की परमाणु क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इस्फहान साइट बनी अहम केंद्र रिपोर्ट के मुताबिक, यूरेनियम का एक बड़ा हिस्सा Isfahan स्थित परमाणु साइट के नीचे गहरी सुरंगों में सुरक्षित रखा गया है। यह जगह ईरान के परमाणु कार्यक्रम का महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई है। वैश्विक चिंता बढ़ी इस खुलासे के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन बंद करे, लेकिन ईरान इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं है।
मिडिल ईस्ट अपडेट: ईरान और अमेरिका के बीच दो हफ्तों के सीजफायर के बावजूद होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव बना हुआ है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने इस अहम समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या सीमित कर दी है। हर दिन सिर्फ 15 जहाजों को अनुमति हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान अब रोजाना केवल 15 जहाजों को ही होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की इजाजत देगा। ईरान के उप विदेश मंत्री सईद खतीबजादा ने साफ किया है कि: हर जहाज को ईरानी अथॉरिटी से मंजूरी लेनी होगी सुरक्षित मार्ग के लिए सेना के साथ तालमेल जरूरी होगा जमीनी हकीकत: लगभग ठप पड़ा ट्रैफिक रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 24 घंटों में: सिर्फ 1 ऑयल टैंकर 5 ड्राई बल्क कैरियर और 2 ईरानी टैंकर ही इस रास्ते से गुजर पाए हैं। अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के प्रमुख सुल्तान अल जाबेर ने कहा कि इस तरह की शर्तों के साथ दी गई अनुमति को “फ्री पैसेज” नहीं कहा जा सकता, यानी रास्ता लगभग बंद जैसा ही है। इस्लामाबाद में होगी अहम वार्ता सीजफायर के बाद अब ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में शांति वार्ता होने जा रही है। ईरान ने 10 शर्तें रखी हैं (जैसे प्रतिबंधों में ढील, होर्मुज पर नियंत्रण) अमेरिका ने 15 पॉइंट प्लान पेश किया है दोनों के बीच मतभेद अभी भी बने हुए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान भविष्य में जहाजों से उनके प्रकार और कार्गो के आधार पर फीस वसूलने की योजना बना रहा है। ट्रंप की चेतावनी, सेना तैनात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान होर्मुज को खोलने पर सहमत हो गया है। हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि: जब तक ठोस समझौता नहीं होता, अमेरिकी सेना क्षेत्र में तैनात रहेगी वहीं ईरान की सुप्रीम काउंसिल ने इस दावे को गलत बताते हुए कहा कि अमेरिका ने होर्मुज पर ईरान के नियंत्रण को स्वीकार किया है। तेल बाजार पर असर इस पूरे तनाव का असर ग्लोबल मार्केट पर भी दिख रहा है। कच्चे तेल की कीमतें 3.6% बढ़कर 98.16 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई हैं सीजफायर पर खतरा ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर सीजफायर का उल्लंघन हुआ तो कड़ा जवाब दिया जाएगा। विवाद की एक बड़ी वजह यह है कि: ईरान चाहता है कि लेबनान में इजरायल के हमले भी रोके जाएं लेकिन इजरायल ने साफ कर दिया है कि वह हिजबुल्लाह पर कार्रवाई जारी रखेगा अमेरिका भी इजरायल के इस रुख का समर्थन कर रहा है, जिससे शांति समझौता कमजोर पड़ता दिख रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।