प्रतियोगी परीक्षा

सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक और धांधली रोकने के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा विशेष टास्क फोर्स (STF) का गठन
सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक पर सख्ती, दिल्ली पुलिस ने गठित की विशेष टास्क फोर्स (STF)

नई दिल्ली, एजेंसियां। सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक, फर्जीवाड़े और संगठित परीक्षा घोटालों पर प्रभावी कार्रवाई के लिए दिल्ली पुलिस ने विशेष टास्क फोर्स (Special Task Force-STF) का गठन किया है। इस विशेष इकाई का उद्देश्य परीक्षा से जुड़े अपराधों की तेजी से जांच करना, संगठित गिरोहों पर कार्रवाई करना और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना है।   पेपर लीक और साइबर अपराधों की करेगी जांच   नई एसटीएफ पेपर लीक, प्रश्नपत्रों की अवैध खरीद-बिक्री, डिजिटल माध्यमों से नकल, फर्जी अभ्यर्थियों की नियुक्ति और परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े अन्य अपराधों की जांच करेगी। इसके अलावा साइबर माध्यम से संचालित परीक्षा रैकेट पर भी विशेष नजर रखी जाएगी।   साइबर और तकनीकी विशेषज्ञ भी होंगे शामिल   दिल्ली पुलिस के अनुसार, एसटीएफ में अनुभवी पुलिस अधिकारियों के साथ साइबर एक्सपर्ट, डिजिटल फॉरेंसिक विशेषज्ञ और तकनीकी जांच अधिकारी भी शामिल किए गए हैं। यह टीम इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप और डिजिटल साक्ष्यों की मदद से अपराधियों तक तेजी से पहुंचने का काम करेगी।   अन्य एजेंसियों के साथ मिलकर करेगी कार्रवाई   एसटीएफ आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA), केंद्रीय जांच एजेंसियों और राज्य पुलिस के साथ समन्वय स्थापित कर संयुक्त कार्रवाई करेगी। अंतरराज्यीय गिरोहों की पहचान कर उनके खिलाफ अभियान चलाया जाएगा ताकि पूरे नेटवर्क को खत्म किया जा सके।   परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाने पर जोर   दिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है। एसटीएफ के गठन से पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी करने वाले संगठित नेटवर्क पर प्रभावी अंकुश लगाने में मदद मिलेगी और लाखों अभ्यर्थियों का परीक्षा प्रणाली पर विश्वास और मजबूत होगा।  

ranjan kumar tiwari जुलाई 25, 2026 0
प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक रोकने और धांधली पर सख्त कार्रवाई के लिए कैबिनेट द्वारा नए विधेयक के मसौदे को मंजूरी
पेपर लीक पर केंद्र सरकार सख्त, फास्ट-ट्रैक अदालतों और कड़ी सजा वाले नए विधेयक के मसौदे को कैबिनेट की मंजूरी

नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्र सरकार ने प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और परीक्षा से जुड़ी धांधली पर सख्ती बढ़ाते हुए बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ऐसे मामलों में कड़ी सजा और त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने के उद्देश्य से नए विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं की पारदर्शिता बनाए रखना तथा अभ्यर्थियों का भरोसा मजबूत करना है।   पेपर लीक मामलों की होगी फास्ट-ट्रैक सुनवाई   प्रस्तावित विधेयक के तहत पेपर लीक और संगठित परीक्षा घोटालों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों की व्यवस्था की जाएगी। सरकार का लक्ष्य है कि ऐसे मामलों का निपटारा तीन महीने के भीतर किया जाए, ताकि दोषियों को जल्द सजा मिल सके।   10 साल तक की जेल और ₹10 करोड़ तक जुर्माने का प्रावधान   विधेयक के मसौदे में संगठित तरीके से पेपर लीक कराने, परीक्षा में धांधली करने या इसमें शामिल गिरोहों के लिए अधिकतम 10 वर्ष के कठोर कारावास और ₹10 करोड़ तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। यह सजा व्यक्तियों के साथ-साथ संगठित नेटवर्क और संस्थानों पर भी लागू हो सकेगी, यदि उनकी संलिप्तता साबित होती है।   परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने पर जोर   सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था के तहत परीक्षा संचालन, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा और डिजिटल निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किया जाएगा। इसके साथ ही परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही बढ़ाने तथा आधुनिक तकनीक के उपयोग पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।   युवाओं का भरोसा मजबूत करना सरकार का लक्ष्य   केंद्र सरकार का मानना है कि निष्पक्ष और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य से जुड़ी है। नए विधेयक के संसद से पारित होने के बाद भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में अनियमितताओं पर प्रभावी अंकुश लगाने तथा अभ्यर्थियों का विश्वास बहाल करने में मदद मिलने की उम्मीद है।  

ranjan kumar tiwari जुलाई 25, 2026 0
BA graduate student studying for government exams with books and laptop preparing for competitive exams
BA के बाद करियर की चिंता खत्म: ये 5 सरकारी नौकरियां दिला सकती हैं स्थिर भविष्य और शानदार सैलरी

बैचलर ऑफ आर्ट्स (BA) करने के बाद अक्सर छात्रों के मन में यह सवाल उठता है कि आगे कौन-सा करियर चुना जाए। लेकिन हकीकत यह है कि BA के बाद सरकारी क्षेत्र में कई ऐसे अवसर मौजूद हैं, जो न सिर्फ अच्छी सैलरी देते हैं बल्कि जॉब सिक्योरिटी और सामाजिक सम्मान भी सुनिश्चित करते हैं। सही दिशा में तैयारी और रणनीति अपनाकर इन नौकरियों को हासिल किया जा सकता है। यहां हम आपको ऐसे पांच प्रमुख सरकारी करियर विकल्पों के बारे में बता रहे हैं, जो BA के बाद आपके भविष्य को नई दिशा दे सकते हैं। 1. SSC CGL: स्थिर करियर का मजबूत विकल्प SSC CGL परीक्षा BA ग्रेजुएट्स के बीच सबसे लोकप्रिय विकल्पों में से एक है। इस परीक्षा के माध्यम से इनकम टैक्स ऑफिसर, ऑडिटर और असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर जैसे पदों पर नियुक्ति मिलती है। इसमें आकर्षक वेतन के साथ-साथ नियमित प्रमोशन के अवसर भी मिलते हैं। 2. बैंकिंग सेक्टर: सुरक्षित और संतुलित नौकरी बैंकिंग क्षेत्र में करियर बनाने के लिए IBPS Exam और State Bank of India द्वारा आयोजित परीक्षाएं अहम होती हैं। इन परीक्षाओं के जरिए प्रोबेशनरी ऑफिसर (PO) और क्लर्क पद हासिल किए जा सकते हैं। बैंकिंग नौकरियों में फिक्स वर्किंग आवर्स, अच्छी सैलरी और ग्रोथ के पर्याप्त अवसर होते हैं। 3. UPSC सिविल सर्विस: देश सेवा के साथ प्रतिष्ठा अगर आप प्रशासनिक सेवा में जाना चाहते हैं, तो UPSC Civil Services Examination आपके लिए सबसे बड़ा मंच है। इस परीक्षा के माध्यम से IAS, IPS और IFS जैसे प्रतिष्ठित पदों पर चयन होता है। BA के दौरान पढ़े गए विषय इस परीक्षा की तैयारी में काफी मददगार साबित होते हैं। 4. रेलवे में नौकरी: सुविधाओं के साथ स्थिरता Railway Recruitment Board (RRB) हर साल NTPC, ग्रुप D और क्लर्क जैसे पदों के लिए भर्ती करता है। रेलवे की नौकरियां अपने बेहतरीन भत्तों, जॉब सिक्योरिटी और परिवार के लिए सुविधाओं के कारण बेहद लोकप्रिय हैं। 5. राज्य सरकार की नौकरियां: अपने राज्य में अवसर हर राज्य की Public Service Commission Exams के जरिए विभिन्न प्रशासनिक पदों, पुलिस और राजस्व विभाग में भर्तियां होती हैं। इन परीक्षाओं का सिलेबस BA के विषयों से काफी मेल खाता है, जिससे आर्ट्स के छात्रों को अतिरिक्त फायदा मिलता है। सरकारी नौकरी पाने के लिए सिर्फ डिग्री ही नहीं, बल्कि सही प्लानिंग, नियमित पढ़ाई और समय प्रबंधन भी जरूरी है। यदि आप लक्ष्य तय कर लें और निरंतर मेहनत करें, तो BA के बाद भी आपके पास सफल और सुरक्षित करियर बनाने के कई रास्ते खुले हैं।  

surbhi अप्रैल 29, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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kalpana जुलाई 30, 2026 0