हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है और हर महीने दो बार–कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष–में आता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। मई 2026 में दो प्रमुख एकादशी व्रत पड़ रहे हैं–अपरा एकादशी और पद्मिनी एकादशी। आइए जानते हैं इनकी सही तिथि, शुभ समय और महत्व। मई 2026 की एकादशी तिथियां अपरा एकादशी (अचला एकादशी) तिथि: 13 मई 2026, बुधवार एकादशी प्रारंभ: 12 मई 2026, दोपहर 02:52 बजे एकादशी समाप्त: 13 मई 2026, दोपहर 01:30 बजे पारण (व्रत खोलने का समय): 14 मई, सूर्योदय के बाद अपरा एकादशी को “अचला एकादशी” भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से व्यक्ति को अपार पुण्य की प्राप्ति होती है और अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। पद्मिनी एकादशी (कमला एकादशी) तिथि: 27 मई 2026, बुधवार एकादशी प्रारंभ: 26 मई 2026, सुबह 05:10 बजे एकादशी समाप्त: 27 मई 2026, सुबह 06:21 बजे पारण: 28 मई को शुभ मुहूर्त में पद्मिनी एकादशी को “कमला एकादशी” भी कहा जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से धन-धान्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। एकादशी व्रत का महत्व धार्मिक ग्रंथों के अनुसार: एकादशी का व्रत करने से मानसिक शांति मिलती है पापों का नाश और पुण्य की वृद्धि होती है जीवन में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा आती है इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र जाप और कथा सुनना विशेष फलदायी माना जाता है। एकादशी व्रत के नियम व्रत की शुरुआत दशमी तिथि की रात से ही मानी जाती है सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लें भगवान विष्णु को पीले फूल, फल और तुलसी अर्पित करें चावल का सेवन वर्जित होता है क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहें द्वादशी तिथि में शुभ समय पर पारण करना जरूरी होता है ध्यान रखें: एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए, लेकिन पूजा में पहले से रखे तुलसी दल का उपयोग किया जा सकता है। महत्वपूर्ण जानकारी पंचांग के अनुसार तिथियों में स्थान के हिसाब से थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए व्रत रखने से पहले स्थानीय पंचांग या मंदिर के पुजारी से समय की पुष्टि कर लेना बेहतर होता है।
आज 1 मई, शुक्रवार को वैशाख पूर्णिमा का पावन पर्व मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में इस दिन का विशेष महत्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होता है, इसलिए इसे “माधव मास” भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा, दान और भगवान विष्णु के नामों का जाप करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है। क्यों खास है वैशाख पूर्णिमा? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार: इस दिन स्नान, दान और तप का विशेष फल मिलता है भगवान विष्णु की उपासना से सुख-समृद्धि बढ़ती है पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है कहा जाता है कि इस दिन किया गया जप और पुण्य कई गुना फल देता है। 108 नामों के जाप का महत्व भगवान विष्णु के 108 नामों का जाप करना अत्यंत शुभ माना गया है। मन को शांति मिलती है नकारात्मक विचार दूर होते हैं जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि नाम-जप से भगवान नारायण शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। भगवान विष्णु के 108 पवित्र नाम नीचे भगवान विष्णु के 108 नाम दिए जा रहे हैं, जिनका जाप आज के दिन विशेष फलदायी माना गया है: ऊँ श्री विष्णवे नमः ऊँ श्री परमात्मने नमः ऊँ श्री विराट पुरुषाय नमः ऊँ श्री क्षेत्र-क्षेत्रज्ञाय नमः ऊँ श्री केशवाय नमः ऊँ श्री पुरुषोत्तमाय नमः ऊँ श्री ईश्वराय नमः ऊँ श्री हृषीकेशाय नमः ऊँ श्री पद्मनाभाय नमः ऊँ श्री विश्वकर्मणे नमः ऊँ श्री कृष्णाय नमः ऊँ श्री प्रजापतये नमः ऊँ श्री हिरण्यगर्भाय नमः ऊँ श्री सुरेशाय नमः ऊँ श्री सर्वदर्शनाय नमः ऊँ श्री सर्वेश्वराय नमः ऊँ श्री अच्युताय नमः ऊँ श्री वासुदेवाय नमः ऊँ श्री पुण्डरीकाक्षाय नमः ऊँ श्री नर-नारायणाय नमः ऊँ श्री जनार्दनाय नमः ऊँ श्री लोकाध्यक्षाय नमः ऊँ श्री चतुर्भुजाय नमः ऊँ श्री धर्माध्यक्षाय नमः ऊँ श्री उपेन्द्राय नमः ऊँ श्री माधवाय नमः ऊँ श्री महाबलाय नमः ऊँ श्री गोविन्दाय नमः ऊँ श्री प्रजापतये नमः ऊँ श्री विश्वात्मने नमः ऊँ श्री सहस्राक्षाय नमः ऊँ श्री नारायणाय नमः ऊँ श्री सिद्धसंकल्पाय नमः ऊँ श्री महेन्द्राय नमः ऊँ श्री वामनाय नमः ऊँ श्री अनन्तजिते नमः ऊँ श्री महीधराय नमः ऊँ श्री गरुड़ध्वजाय नमः ऊँ श्री लक्ष्मीपतये नमः ऊँ श्री दामोदराय नमः ऊँ श्री कमलापतये नमः ऊँ श्री परमेश्वराय नमः ऊँ श्री धनेश्वराय नमः ऊँ श्री मुकुन्दाय नमः ऊँ श्री आनन्दाय नमः ऊँ श्री सत्यधर्माय नमः ऊँ श्री उपेन्द्राय नमः ऊँ श्री चक्रगदाधराय नमः ऊँ श्री भगवते नमः ऊँ श्री शान्तिदाय नमः ऊँ श्री गोपतये नमः ऊँ श्री श्रीपतये नमः ऊँ श्री श्रीहरये नमः ऊँ श्री श्रीरघुनाथाय नमः ऊँ श्री कपिलेश्वराय नमः ऊँ श्री वाराहाय नमः ऊँ श्री नरसिंहाय नमः ऊँ श्री रामाय नमः ऊँ श्री हयग्रीवाय नमः ऊँ श्री शोकनाशनाय नमः ऊँ श्री विशुद्धात्मने नमः ऊँ श्री केशवाय नमः ऊँ श्री धनंजयाय नमः ऊँ श्री ब्राह्मणप्रियाय नमः ऊँ श्री यदुश्रेष्ठाय नमः ऊँ श्री लोकनाथाय नमः ऊँ श्री भक्तवत्सलाय नमः ऊँ श्री चतुर्मूर्तये नमः ऊँ श्री एकपदे नमः ऊँ श्री सुलोचनाय नमः ऊँ श्री सर्वतोमुखाय नमः ऊँ श्री सप्तवाहनाय नमः ऊँ श्री वंशवर्धनाय नमः ऊँ श्री योगिने नमः ऊँ श्री धनुर्धराय नमः ऊँ श्री प्रीतिवर्धनाय नमः ऊँ श्री प्रीतिवर्धनाय नमः ऊँ श्री अक्रूराय नमः ऊँ श्री दुःस्वप्ननाशनाय नमः ऊँ श्री भूभवे नमः ऊँ श्री प्राणदाय नमः ऊँ श्री देवकीनन्दनाय नमः ऊँ श्री शंखभृते नमः ऊँ श्री सुरेशाय नमः ऊँ श्री कमलनयनाय नमः ऊँ श्री जगतगुरवे नमः ऊँ श्री सनातनाय नमः ऊँ श्री सच्चिदानन्दाय नमः ऊँ श्री द्वारकानाथाय नमः ऊँ श्री दानवेन्द्रविनाशकाय नमः ऊँ श्री दयानिधये नमः ऊँ श्री एकात्मने नमः ऊँ श्री शत्रुजिते नमः ऊँ श्री घनश्यामाय नमः ऊँ श्री लोकाध्यक्षाय नमः ऊँ श्री जरामरणवर्जिताय नमः ऊँ श्री सर्वयज्ञफलप्रदाय नमः ऊँ श्री विराटपुरुषाय नमः ऊँ श्री यशोदानन्दनाय नमः ऊँ श्री परमधार्मिकाय नमः ऊँ श्री गरुड़ध्वजाय नमः ऊँ श्री प्रभवे नमः ऊँ श्री लक्ष्मीकान्ताय नमः ऊँ श्री गगनसदृशाय नमः ऊँ श्री वामनाय नमः ऊँ श्री हंसाय नमः ऊँ श्री व्यासाय नमः ऊँ श्री प्रकटाय नमः
हिंदू धर्म में मोहिनी एकादशी का विशेष महत्व है। यह व्रत भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से पापों का नाश होता है और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोहिनी एकादशी 2026 सही तारीख साल 2026 में मोहिनी एकादशी 27 अप्रैल (सोमवार) को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि शुरू: 26 अप्रैल शाम 6:06 बजे एकादशी तिथि समाप्त: 27 अप्रैल शाम 6:15 बजे उदया तिथि (सूर्योदय के अनुसार) के आधार पर व्रत 27 अप्रैल को रखा जाएगा। पूजा का शुभ मुहूर्त पूजा मुहूर्त: सुबह 9:02 बजे से 10:40 बजे तक व्रत पारण (व्रत खोलने का समय) पारण तिथि: 28 अप्रैल 2026 समय: सुबह 5:43 बजे से 8:21 बजे तक पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप) सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लें चौकी पर भगवान विष्णु की प्रतिमा/तस्वीर स्थापित करें भगवान को स्नान कराकर पीले वस्त्र पहनाएं चंदन तिलक लगाएं, धूप-दीप जलाएं तुलसी दल, फल, नारियल, मिठाई अर्पित करें ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र और विष्णु सहस्रनाम का जाप करें अंत में आरती करें और जरूरतमंदों को दान दें क्या है धार्मिक मान्यता? मोहिनी एकादशी का संबंध उस कथा से है जब भगवान विष्णु ने “मोहिनी” रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाया और असुरों को भ्रमित किया। यह दिन बुराइयों, मोह और गलत संगति से मुक्ति पाने का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक कथा का संदेश एक कथा के अनुसार, एक पापी युवक ने ऋषि के कहने पर यह व्रत किया और उसका जीवन पूरी तरह बदल गया। इससे यह सीख मिलती है कि सही समय पर किया गया एक अच्छा कर्म इंसान की दिशा बदल सकता है। क्यों खास है यह व्रत? सहस्र गौदान के बराबर पुण्य पापों से मुक्ति बुद्धि और विवेक में वृद्धि जीवन की समस्याओं से छुटकारा जीवन के लिए सीख मोहिनी अवतार हमें सिखाता है कि केवल ताकत ही नहीं, बल्कि सही समय पर लिया गया समझदारी भरा निर्णय ही असली जीत दिलाता है। मोहिनी एकादशी सिर्फ एक व्रत नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सही निर्णय और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाला पर्व है।
इस्लामाबाद, एजेंसियां। लाहौर से एक बड़ी खबर सामने आई है, जहां प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के वरिष्ठ नेता अमीर हमजा पर अज्ञात हमलावरों ने ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। यह हमला एक निजी न्यूज़ चैनल के कार्यालय के बाहर हुआ, जिससे इलाके में हड़कंप मच गया। कई गोलियां लगने से हालत नाजुक हमले में अमीर हमजा को कई गोलियां लगी हैं, जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया। फिलहाल उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया है और उनकी हालत गंभीर बताई जा रही है। हाफिज सईद का करीबी सहयोगी अमीर हमजा को हाफिज सईद का करीबी सहयोगी माना जाता है और वह संगठन की केंद्रीय सलाहकार समिति का अहम सदस्य है। उस पर भारत विरोधी कई आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप रहे हैं, जिसके कारण वह लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर था। हमले से मचा हड़कंप लाहौर के व्यस्त और सुरक्षित माने जाने वाले इलाके में हुए इस हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद इलाके को घेर लिया गया और सुरक्षा बलों ने जांच शुरू कर दी। हमलावर फरार, जांच जारी स्थानीय पुलिस ने हमलावरों की तलाश के लिए सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया है, लेकिन अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। जांच एजेंसियां इस हमले के पीछे की वजह और हमलावरों की पहचान जानने में जुटी हैं। बढ़ सकती है अंदरूनी हलचल विशेषज्ञों का मानना है कि इस हमले के बाद आतंकी संगठन के भीतर और पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था में हलचल बढ़ सकती है। आने वाले दिनों में इस घटना के कई अहम पहलू सामने आने की संभावना है।
हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया को बेहद शुभ और पुण्यदायी पर्व माना जाता है। ‘अक्षय’ का अर्थ होता है—जिसका कभी क्षय न हो। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान, जप, तप और पूजा कभी व्यर्थ नहीं जाते, बल्कि उसका फल कई जन्मों तक मिलता है। साल 2026 में यह पर्व 19 अप्रैल को मनाया जाएगा। इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। साथ ही दान-पुण्य का अत्यधिक महत्व बताया गया है। लेकिन आखिर इस दिन दान क्यों इतना खास माना जाता है? इसके पीछे एक पौराणिक कथा जुड़ी है। पौराणिक कथा: धर्मदास की अटूट श्रद्धा प्राचीन समय में धर्मदास नाम का एक गरीब व्यापारी रहता था। उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन वह बेहद धार्मिक और श्रद्धालु था। एक बार उसे अक्षय तृतीया के महत्व के बारे में पता चला। जब यह दिन आया, तो उसने प्रातः स्नान कर विधि-विधान से पूजा की और अपनी क्षमता के अनुसार दान किया। उसने जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को जल से भरे घड़े, जौ, सत्तू, चावल, नमक, गुड़, घी, पंखे और वस्त्र दान किए। परिवार का विरोध, लेकिन अडिग विश्वास धर्मदास की गरीबी को देखते हुए उसके परिवार ने उसे इतना दान करने से रोका। उन्हें चिंता थी कि घर का खर्च कैसे चलेगा। लेकिन धर्मदास ने विश्वास नहीं छोड़ा और हर साल अक्षय तृतीया पर दान करता रहा। भक्ति का मिला “अक्षय” फल धर्मदास की निस्वार्थ भक्ति और दान के प्रभाव से अगले जन्म में वह कुशावती नगर का एक समृद्ध और प्रतापी राजा बना। कहा जाता है कि उसके यज्ञ में स्वयं त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) भी ब्राह्मण रूप में शामिल होते थे। दान का आध्यात्मिक महत्व अक्षय तृतीया पर दान करने के पीछे मुख्य मान्यता यह है कि इस दिन किया गया हर शुभ कार्य “अक्षय” यानी कभी समाप्त न होने वाला पुण्य देता है। इसलिए लोग इस दिन अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, जल, वस्त्र, सोना या अन्य जरूरी चीजें दान करते हैं। अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि श्रद्धा, त्याग और परोपकार का प्रतीक है। यह दिन हमें सिखाता है कि सच्चे मन से किया गया छोटा सा दान भी जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है—और उसका फल कभी समाप्त नहीं होता।
वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली पवित्र Varuthini Ekadashi का सनातन परंपरा में विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत भगवान Vishnu को समर्पित होता है और मान्यता है कि इसे विधि-विधान से करने पर साधक के जीवन के दुख दूर होते हैं और मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं। धार्मिक ग्रंथों में इसे अत्यंत फलदायी व्रत बताया गया है, जो बड़े-बड़े यज्ञों से भी अधिक प्रभावशाली माना जाता है। इस व्रत का पूर्ण पुण्यफल तभी प्राप्त होता है, जब इसके नियमों का पूरी निष्ठा से पालन किया जाए। आइए जानते हैं वरुथिनी एकादशी से जुड़े 11 प्रमुख नियम: वरुथिनी एकादशी व्रत के 11 जरूरी नियम व्रत के नियमों का पालन एक दिन पहले संध्याकाल से ही शुरू कर देना चाहिए और पारण तक जारी रखना चाहिए। एकादशी व्रत में अन्न का सेवन वर्जित है। फलाहार करें और व्रत से एक दिन पहले ही चावल खाना बंद कर दें। इस दिन गंगा या अन्य पवित्र नदी में स्नान करना शुभ माना जाता है। यदि संभव न हो तो स्नान के जल में गंगाजल मिलाएं। केवल शरीर ही नहीं, मन को भी पवित्र रखें। किसी के प्रति गलत विचार न लाएं। व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है। चावल और तामसिक भोजन से पूरी तरह परहेज करें तथा जमीन पर शयन करें। अगले दिन शुभ मुहूर्त में विधिपूर्वक पारण करना अनिवार्य है, तभी व्रत पूर्ण माना जाता है। एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए, इसलिए उन्हें पहले ही तोड़कर रख लें। भगवान विष्णु के साथ माता Lakshmi की पूजा भी करें। अपनी क्षमता अनुसार जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या फल का दान करें। दिनभर वाद-विवाद से बचें और मन में श्रीहरि के मंत्रों का जप करते रहें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन नियमों का पालन करने से साधक को न केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है बल्कि जीवन में सुख-समृद्धि भी आती है। हालांकि, यह जानकारी पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है।
वैशाख मास को हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है और इसी माह में आने वाली वरुथिनी एकादशी का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पंडित आनंद भारद्वाज के अनुसार, यदि इस दिन राशि अनुसार दान-पुण्य और उपाय किए जाएं तो पूरे वर्ष लक्ष्मी-नारायण की कृपा बनी रहती है। कब है वरुथिनी एकादशी 2026? वैदिक पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 13 अप्रैल 2026 को रात 1:17 बजे से प्रारंभ होकर 14 अप्रैल 2026 को रात 1:08 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर 13 अप्रैल 2026 (सोमवार) को व्रत रखा जाएगा और पारण 14 अप्रैल को द्वादशी तिथि में किया जाएगा। क्या है इस एकादशी का महत्व? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वरुथिनी एकादशी का व्रत व्यक्ति को पापों से मुक्ति दिलाता है और जीवन में आ रही बाधाओं को दूर करता है। इस दिन किए गए दान-पुण्य का फल कई गुना बढ़कर मिलता है। राशि अनुसार करें ये खास उपाय मेष: भगवान विष्णु को लाल फूल अर्पित करें, जीवन में सुख-शांति बनी रहेगी। वृषभ: सफेद वस्तुओं का भोग लगाएं, भगवान शीघ्र प्रसन्न होंगे। मिथुन: हरे वस्त्र अर्पित करें, हर कार्य में सफलता मिलेगी। कर्क: खीर का भोग लगाएं, रुके हुए कार्य पूरे होंगे। सिंह: पीले वस्त्र अर्पित करें और स्वयं भी धारण करें, विशेष फल मिलेगा। कन्या: सफेद मिठाई और केसर चढ़ाएं, आर्थिक समस्याएं दूर होंगी। तुला: सफेद वस्तुओं का दान करें, वैवाहिक जीवन में मधुरता आएगी। वृश्चिक: गुड़ का दान करें, नौकरी और व्यापार में तरक्की होगी। धनु: पीले वस्त्र, चंदन और फल अर्पित करें, शुभ परिणाम मिलेंगे। मकर: दही और इलायची का भोग लगाएं, मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। कुंभ: पीपल के नीचे तिल के तेल का दीपक जलाएं, लक्ष्मी-नारायण की कृपा बनी रहेगी। मीन: गरीबों की सेवा करें और मिश्री का भोग लगाएं, पारिवारिक कलह दूर होगी। वरुथिनी एकादशी केवल व्रत रखने का दिन नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, दान-पुण्य और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर है। यदि इस दिन श्रद्धा और राशि अनुसार उपाय किए जाएं, तो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
हिंदू धर्म में आस्था और आध्यात्म का विशेष महत्व है, और इसी क्रम में आज 3 अप्रैल 2026 से हिंदू नववर्ष का दूसरा महीना वैशाख शुरू हो गया है। इस महीने को “माधव मास” के नाम से भी जाना जाता है, जो भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पूरे माह में प्रतिदिन स्नान, पूजा और दान का विशेष महत्व होता है। पंचांग के अनुसार, वैशाख कृष्ण प्रतिपदा तिथि 2 अप्रैल सुबह 7:41 बजे से शुरू होकर 3 अप्रैल सुबह 8:42 बजे तक रही, लेकिन उदया तिथि के आधार पर आज 3 अप्रैल से वैशाख माह का आरंभ माना गया है। क्यों जरूरी है वैशाख में रोज स्नान? धार्मिक ग्रंथों और व्रत-परंपराओं के अनुसार, चैत्र शुक्ल पूर्णिमा से लेकर वैशाख शुक्ल पूर्णिमा तक प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है। मान्यता है कि इस दौरान सूर्योदय से पहले स्नान करने से व्यक्ति के सभी पाप, रोग और दोष समाप्त होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यदि तीर्थ स्थल जैसे नदी, कुआं या सरोवर में स्नान संभव न हो, तो घर पर शुद्ध जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना भी समान फलदायी माना गया है। इस माह में नियमित स्नान करने से पुण्य में वृद्धि होती है और व्यक्ति का प्रभाव व तेज बढ़ता है। वैशाख में स्नान और पूजा के प्रमुख नियम प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना श्रेष्ठ माना गया है। स्नान के जल में गंगाजल मिलाना शुभ होता है। स्नान के दौरान अपने इष्ट देव का स्मरण करें। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु की पूजा करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “हरे राम हरे राम” मंत्र का जाप करें। मंत्र जाप 108 या 1008 बार किया जा सकता है। इस माह में एक समय भोजन करने का भी विधान बताया गया है। पूरे 31 दिनों तक इन नियमों का पालन करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। मेष संक्रांति का विशेष महत्व वैशाख माह में मेष संक्रांति का पर्व भी आता है। इस दिन सूर्य देव अपनी उच्च राशि मेष में प्रवेश करते हैं, जो अत्यंत शुभ माना जाता है। साल 2026 में मेष संक्रांति 14 अप्रैल को मनाई जाएगी। इस दिन सुबह 9:39 बजे सूर्य देव के मेष राशि में प्रवेश के समय स्नान और दान करने से विशेष पुण्य और सूर्य कृपा प्राप्त होती है। वैशाख माह का धार्मिक महत्व वैशाख को “माधव मास” कहा जाता है, इसलिए इस पूरे महीने भगवान विष्णु और जल देवता की पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस माह में किए गए स्नान, दान और पूजा से “अक्षय पुण्य” प्राप्त होता है, जो कभी समाप्त नहीं होता।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।