Attendance Policy बना रही कर्मचारियों पर दबाव, स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर
दुनियाभर की कंपनियां कर्मचारियों के स्वास्थ्य और वेलबीइंग पर जोर देने की बात करती हैं, लेकिन एक नई रिसर्च ने कार्यस्थलों की कुछ नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अध्ययन में सामने आया है कि कई कर्मचारी बीमार होने के बावजूद छुट्टी लेने से बचते हैं और काम पर पहुंच जाते हैं, क्योंकि उन्हें अनुपस्थिति पर मिलने वाली सजा या अंक कटने का डर रहता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसी नीतियां कर्मचारियों के स्वास्थ्य, उत्पादकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य तीनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती हैं।
कई कंपनियां कर्मचारियों की उपस्थिति पर नजर रखने के लिए "Attendance Points System" का उपयोग करती हैं। इस व्यवस्था में देर से आने, जल्दी जाने या अनुपस्थित रहने पर कर्मचारियों को नकारात्मक अंक (Demerits) दिए जाते हैं।
यदि किसी कर्मचारी के अंक एक तय सीमा से अधिक हो जाते हैं, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है या नौकरी पर भी खतरा पैदा हो सकता है।
अध्ययन में शामिल लगभग आधे कर्मचारियों ने बताया कि वे ऐसी ही किसी व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं।
शोध में पाया गया कि जिन कर्मचारियों पर Attendance Points System लागू था, वे अन्य कर्मचारियों की तुलना में बीमारी के दौरान भी ऑफिस आने की अधिक संभावना रखते थे।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब कर्मचारी पहले से कुछ अंक हासिल कर चुके हों या उन्हें पहले अनुपस्थिति के लिए चेतावनी मिल चुकी हो। ऐसे कर्मचारी नौकरी की सुरक्षा को लेकर अधिक चिंतित रहते हैं और स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद छुट्टी लेने से बचते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, बीमार अवस्था में काम करना, जिसे "Presenteeism" कहा जाता है, कई समस्याओं को जन्म देता है।
यानी कर्मचारी भले ही ऑफिस पहुंच जाए, लेकिन उसका प्रदर्शन सामान्य नहीं रह पाता।
रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि केवल Paid Sick Leave उपलब्ध होने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती।
अध्ययन के अनुसार, जिन कर्मचारियों को भुगतान सहित बीमार अवकाश (Paid Sick Leave) का अधिकार मिला हुआ था, वे भी Attendance Penalty के डर से बीमार होने पर काम पर पहुंच रहे थे।
इससे स्पष्ट होता है कि सिर्फ छुट्टी की सुविधा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि कंपनियों को अपनी उपस्थिति संबंधी नीतियों की भी समीक्षा करनी होगी।
शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर संस्थान वास्तव में कर्मचारी कल्याण को प्राथमिकता देना चाहते हैं, तो उन्हें ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिनमें कर्मचारी बीमारी के दौरान बिना डर के छुट्टी ले सकें।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ कर्मचारी ही लंबे समय में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। इसलिए कर्मचारियों पर अनावश्यक दबाव बनाने वाली नीतियों के बजाय संतुलित और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना कंपनियों और कर्मचारियों दोनों के हित में होगा।
कोविड महामारी के बाद कार्यस्थलों पर स्वास्थ्य सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ी है। ऐसे में यह अध्ययन कंपनियों के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल रखता है—क्या उनकी उपस्थिति नीतियां वास्तव में कर्मचारियों के हित में हैं, या वे अनजाने में उन्हें बीमार अवस्था में भी काम करने के लिए मजबूर कर रही हैं?
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
Attendance Policy बना रही कर्मचारियों पर दबाव, स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर दुनियाभर की कंपनियां कर्मचारियों के स्वास्थ्य और वेलबीइंग पर जोर देने की बात करती हैं, लेकिन एक नई रिसर्च ने कार्यस्थलों की कुछ नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अध्ययन में सामने आया है कि कई कर्मचारी बीमार होने के बावजूद छुट्टी लेने से बचते हैं और काम पर पहुंच जाते हैं, क्योंकि उन्हें अनुपस्थिति पर मिलने वाली सजा या अंक कटने का डर रहता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसी नीतियां कर्मचारियों के स्वास्थ्य, उत्पादकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य तीनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती हैं। क्या है Attendance Points System? कई कंपनियां कर्मचारियों की उपस्थिति पर नजर रखने के लिए "Attendance Points System" का उपयोग करती हैं। इस व्यवस्था में देर से आने, जल्दी जाने या अनुपस्थित रहने पर कर्मचारियों को नकारात्मक अंक (Demerits) दिए जाते हैं। यदि किसी कर्मचारी के अंक एक तय सीमा से अधिक हो जाते हैं, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है या नौकरी पर भी खतरा पैदा हो सकता है। अध्ययन में शामिल लगभग आधे कर्मचारियों ने बताया कि वे ऐसी ही किसी व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं। बीमार होने पर भी काम करने को मजबूर शोध में पाया गया कि जिन कर्मचारियों पर Attendance Points System लागू था, वे अन्य कर्मचारियों की तुलना में बीमारी के दौरान भी ऑफिस आने की अधिक संभावना रखते थे। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब कर्मचारी पहले से कुछ अंक हासिल कर चुके हों या उन्हें पहले अनुपस्थिति के लिए चेतावनी मिल चुकी हो। ऐसे कर्मचारी नौकरी की सुरक्षा को लेकर अधिक चिंतित रहते हैं और स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद छुट्टी लेने से बचते हैं। Productivity पर भी पड़ता है असर विशेषज्ञों के अनुसार, बीमार अवस्था में काम करना, जिसे "Presenteeism" कहा जाता है, कई समस्याओं को जन्म देता है। काम की गुणवत्ता प्रभावित होती है। कर्मचारी की रिकवरी में अधिक समय लगता है। बीमारी अन्य सहकर्मियों तक फैल सकती है। टीम की कुल उत्पादकता में गिरावट आती है। यानी कर्मचारी भले ही ऑफिस पहुंच जाए, लेकिन उसका प्रदर्शन सामान्य नहीं रह पाता। Paid Sick Leave भी नहीं कर पा रही मदद रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि केवल Paid Sick Leave उपलब्ध होने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती। अध्ययन के अनुसार, जिन कर्मचारियों को भुगतान सहित बीमार अवकाश (Paid Sick Leave) का अधिकार मिला हुआ था, वे भी Attendance Penalty के डर से बीमार होने पर काम पर पहुंच रहे थे। इससे स्पष्ट होता है कि सिर्फ छुट्टी की सुविधा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि कंपनियों को अपनी उपस्थिति संबंधी नीतियों की भी समीक्षा करनी होगी। कंपनियों के लिए चेतावनी शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर संस्थान वास्तव में कर्मचारी कल्याण को प्राथमिकता देना चाहते हैं, तो उन्हें ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिनमें कर्मचारी बीमारी के दौरान बिना डर के छुट्टी ले सकें। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ कर्मचारी ही लंबे समय में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। इसलिए कर्मचारियों पर अनावश्यक दबाव बनाने वाली नीतियों के बजाय संतुलित और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना कंपनियों और कर्मचारियों दोनों के हित में होगा। बदलती कार्यसंस्कृति में बड़ा सवाल कोविड महामारी के बाद कार्यस्थलों पर स्वास्थ्य सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ी है। ऐसे में यह अध्ययन कंपनियों के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल रखता है—क्या उनकी उपस्थिति नीतियां वास्तव में कर्मचारियों के हित में हैं, या वे अनजाने में उन्हें बीमार अवस्था में भी काम करने के लिए मजबूर कर रही हैं?
नई दिल्ली, एजेंसियां। कोलेजन शरीर में सबसे अधिक पाया जाने वाला स्ट्रक्चरल प्रोटीन है, जो त्वचा, हड्डियों, मांसपेशियों, टेंडन और कार्टिलेज को मजबूती देने का काम करता है। यह त्वचा को लचीलापन और चमक प्रदान करता है, जबकि जोड़ों और हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बढ़ती उम्र और पर्यावरणीय प्रभावों के कारण शरीर में कोलेजन का उत्पादन धीरे-धीरे कम होने लगता है, जिससे झुर्रियां, रूखापन और जोड़ों की समस्याएं बढ़ सकती हैं। प्राकृतिक रूप से बढ़ाया जा सकता है कोलेजन विशेषज्ञों के अनुसार कोलेजन सप्लीमेंट्स और उपचारों के अलावा कुछ खाद्य पदार्थों के सेवन से भी शरीर में इसके उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है। ऐसे खाद्य पदार्थ या तो सीधे कोलेजन प्रदान करते हैं या शरीर को इसे बनाने के लिए जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। ये फूड्स हैं कोलेजन बढ़ाने में मददगार बोन ब्रोथ (हड्डियों का सूप), चिकन, बीफ और मछली जैसे पशु-आधारित खाद्य पदार्थ कोलेजन के अच्छे स्रोत माने जाते हैं। वहीं अंडे का सफेद भाग, स्पिरुलिना और अंडे के छिलके की झिल्ली भी कोलेजन उत्पादन में सहायक होती है। फल और सब्जियों में खट्टे फल, बेरीज, टमाटर, शिमला मिर्च तथा पालक जैसी पत्तेदार सब्जियां विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होती हैं, जो शरीर में कोलेजन निर्माण की प्रक्रिया को मजबूत बनाती हैं। नट्स और बीज भी हैं फायदेमंद काजू, बादाम, कद्दू के बीज और तिल में जिंक व कॉपर जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो कोलेजन के निर्माण और ऊतकों की मरम्मत में मदद करते हैं। ऑयस्टर भी जिंक और कॉपर का बेहतरीन स्रोत माना जाता है। स्वस्थ जीवनशैली भी है जरूरी विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित आहार, पर्याप्त पानी, नियमित व्यायाम और धूप से त्वचा की सुरक्षा जैसे उपाय भी शरीर में कोलेजन के स्तर को बनाए रखने में मदद करते हैं। सही खानपान और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर त्वचा, बालों और जोड़ों को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है।
बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी कुंद्रा 51 साल की हो चुकी हैं, लेकिन उनकी फिटनेस और एनर्जी आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बनी हुई है। 1993 में फिल्म बाजीगर से अपने करियर की शुरुआत करने वाली शिल्पा ने वर्षों से योग, संतुलित खानपान और नियमित व्यायाम को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाया हुआ है। शिल्पा का मानना है कि फिटनेस केवल शरीर को आकार देने का जरिया नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने का भी माध्यम है। वह हमेशा समग्र स्वास्थ्य (Holistic Wellness) पर जोर देती हैं और साफ-सुथरे खानपान के साथ नियमित शारीरिक गतिविधियों को बेहद महत्वपूर्ण मानती हैं। प्लैंक एक्सरसाइज से बनाती हैं मजबूत कोर हाल ही में शिल्पा शेट्टी ने सोशल मीडिया पर अपने वर्कआउट रूटीन की झलक साझा की थी। इस रूटीन में उन्होंने कई तरह की प्लैंक एक्सरसाइज शामिल की हैं, जिनमें— एक्सटेंडेड आर्म प्लैंक विद हिप एक्सटेंशन साइड एल्बो प्लैंक विद हिप डिप्स एल्बो प्लैंक विद हिप एब्डक्शन और एडडक्शन इन सभी एक्सरसाइज को वह 15-20 रेपिटेशन के तीन सेट में करती हैं। यह रूटीन पेट की मांसपेशियों को मजबूत बनाने के साथ-साथ कंधों, हाथों, पैरों और पीठ की मांसपेशियों की सहनशक्ति भी बढ़ाता है। सबसे खास बात यह है कि इस पूरे वर्कआउट के लिए केवल एक योगा मैट और करीब 20 मिनट का समय चाहिए। शिल्पा इसे अपनी "वॉशबोर्ड एब्स की रेसिपी" बताती हैं। हालांकि, वह नए लोगों को सलाह देती हैं कि शुरुआत आसान एक्सरसाइज से करें और धीरे-धीरे एडवांस रूटीन की तरफ बढ़ें। योग और मेडिटेशन भी हैं फिटनेस का अहम हिस्सा शिल्पा शेट्टी केवल जिम वर्कआउट पर निर्भर नहीं रहतीं, बल्कि योग और मेडिटेशन को भी अपनी दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती हैं। उनका कहना है कि योग शरीर के साथ-साथ मन और आत्मा को भी संतुलित करता है। सेतु बंधासन से मिलता है मानसिक और शारीरिक लाभ सेतु बंधासन (ब्रिज पोज) गर्दन, कंधों और पीठ को मजबूत बनाने में मदद करता है। यह रीढ़ की हड्डी के लचीलेपन को बढ़ाने के साथ तनाव कम करने और मानसिक शांति प्रदान करने में भी सहायक माना जाता है। अर्ध हलासन और नौकासन से मजबूत होती हैं पेट की मांसपेशियां अर्ध हलासन और नौकासन दोनों ही कोर स्ट्रेंथ बढ़ाने वाले प्रमुख योगासन माने जाते हैं। इनसे— पेट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। पाचन तंत्र बेहतर होता है। रीढ़ की लचक बढ़ती है। शरीर का पोश्चर सुधरता है। आत्मविश्वास और मानसिक मजबूती में भी वृद्धि होती है। शिल्पा शेट्टी की फिटनेस फिलॉसफी यही संदेश देती है कि नियमित व्यायाम, योग और संतुलित जीवनशैली के जरिए किसी भी उम्र में स्वस्थ और फिट रहा जा सकता है।