नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत में एक बार फिर Formula One (F1) की वापसी की उम्मीदें बढ़ गई हैं। केंद्र सरकार ने 2028 तक ग्रेटर नोएडा स्थित बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट पर इंडियन ग्रां प्री की मेजबानी के लिए तैयारियां तेज कर दी हैं। खेल मंत्रालय ने टैक्स, नियामकीय और बुनियादी ढांचे से जुड़ी बाधाओं को दूर करने के लिए एक विशेष टास्क फोर्स बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
भारत ने आखिरी बार 2013 में बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट पर Formula One रेस की मेजबानी की थी। इसके बाद टैक्स विवाद, नियामकीय अड़चनों और व्यावसायिक कारणों के चलते इंडियन ग्रां प्री को F1 कैलेंडर से हटा दिया गया। अब करीब 15 साल बाद इसकी वापसी की दिशा में गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं।
केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने हाल ही में संभावित ट्रैक मालिक अडानी समूह और भारतीय मोटरस्पोर्ट्स महासंघ के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। सरकार का लक्ष्य टैक्स व्यवस्था, नियामकीय मंजूरी और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी सभी बाधाओं को समय रहते दूर करना है, ताकि 2028 तक भारत को फिर से F1 कैलेंडर में शामिल कराया जा सके।
Formula One के मुख्य कार्यकारी अधिकारी स्टेफानो डोमेनिकाली ने भी भारत में रेस की वापसी को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि भारत F1 के लिए एक बड़ा और महत्वपूर्ण बाजार है, लेकिन वापसी से पहले सभी आवश्यक तैयारियां और मजबूत साझेदारी सुनिश्चित करना जरूरी होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 2028 में भारत में Formula One की वापसी होती है, तो इससे खेल पर्यटन, निवेश, रोजगार और वैश्विक स्तर पर भारत की खेल पहचान को बड़ा लाभ मिलेगा। सरकार का मानना है कि इंडियन ग्रां प्री की वापसी देश को अंतरराष्ट्रीय मोटरस्पोर्ट्स मानचित्र पर फिर से मजबूत स्थान दिला सकती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। फीफा विश्व कप 2026 का फाइनल सिर्फ स्पेन और अर्जेंटीना के बीच खिताबी मुकाबला नहीं होगा, बल्कि यह दो पीढ़ियों और दो रणनीतिक दिमागों की भी टक्कर बनेगा। मैदान पर जहां 39 वर्षीय दिग्गज लियोनेल मेसी और 19 वर्षीय युवा स्टार लामिन यामाल के बीच मुकाबला देखने को मिलेगा, वहीं मैदान के बाहर स्पेन के मुख्य कोच लुइस दे ला फुएंते और अर्जेंटीना के कोच लियोनेल स्कालोनी की रणनीतिक जंग भी आकर्षण का केंद्र रहेगी। इस मुकाबले को खास बनाने वाली बात यह है कि स्कालोनी कभी दे ला फुएंते के छात्र रह चुके हैं। वर्ष 2017 में स्पेनिश फुटबॉल फेडरेशन के कोचिंग कोर्स के दौरान दे ला फुएंते उनके प्रशिक्षक थे। अब वही गुरु और शिष्य विश्व फुटबॉल के सबसे बड़े मंच पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। लियोनेल स्कालोनी 48 वर्षीय लियोनेल स्कालोनी ने खिलाड़ी के रूप में स्पेनिश क्लबों के लिए खेला और 2015 में संन्यास लेने के बाद कोचिंग की राह पकड़ी। 2018 में अर्जेंटीना के मुख्य कोच बनने पर उनकी नियुक्ति की आलोचना हुई, लेकिन उन्होंने टीम को नई पहचान दी। उनके नेतृत्व में अर्जेंटीना ने 2021 और 2024 का कोपा अमेरिका तथा 2022 का फीफा विश्व कप जीता। स्कालोनी टीम संतुलन और खिलाड़ियों के बेहतर प्रबंधन के लिए जाने जाते हैं तथा मेसी को खुलकर खेलने की आजादी देते हैं। लुइस दे ला फुएंते दूसरी ओर, 65 वर्षीय लुइस दे ला फुएंते स्पेन की युवा टीमों को निखारने के बाद 2022 में सीनियर टीम के मुख्य कोच बने। उनकी अगुआई में स्पेन ने UEFA यूरो 2024 का खिताब जीता। उनकी रणनीति पजेशन आधारित आक्रामक फुटबॉल, अनुशासन और सामूहिक खेल पर आधारित है। फाइनल में दोनों कोच अपनी-अपनी रणनीतियों से बढ़त हासिल करने की कोशिश करेंगे। ऐसे में यह मुकाबला सिर्फ खिलाड़ियों की प्रतिभा ही नहीं, बल्कि गुरु और शिष्य के फुटबॉल दर्शन की भी सबसे बड़ी परीक्षा साबित होगा।
न्यूयॉर्क, एजेंसियां। फीफा विश्व कप 2026 का फाइनल सिर्फ फुटबॉल ही नहीं, बल्कि मनोरंजन के लिहाज से भी ऐतिहासिक बनने जा रहा है। पहली बार FIFA World Cup Final में आधिकारिक हाफटाइम शो आयोजित किया जाएगा, जिसमें दक्षिण कोरिया का सुपरस्टार K-Pop ग्रुप BTS वैश्विक पॉप आइकन Madonna और Shakira के साथ मंच साझा करेगा। यह आयोजन 19 जुलाई को न्यूयॉर्क-न्यू जर्सी स्टेडियम में स्पेन और अर्जेंटीना के बीच होने वाले फाइनल के दौरान होगा। विश्व कप के इतिहास में पहली बार होगा हाफटाइम शो फीफा ने इस बार अमेरिकी सुपर बाउल की तर्ज पर विश्व कप फाइनल में पहली बार हाफटाइम शो शामिल किया है। शो का निर्माण Global Citizen के सहयोग से किया जा रहा है, जबकि इसकी क्रिएटिव योजना में Coldplay के क्रिस मार्टिन की भी भूमिका है। इस कारण फाइनल का हाफटाइम सामान्य 15 मिनट की बजाय अधिक लंबा रहेगा। BTS की वापसी को लेकर जबरदस्त उत्साह सैन्य सेवा पूरी करने के बाद BTS की यह सबसे बड़ी वैश्विक प्रस्तुतियों में से एक होगी। दुनिया भर में करोड़ों प्रशंसक इस ऐतिहासिक परफॉर्मेंस का इंतजार कर रहे हैं। माना जा रहा है कि यह शो विश्व कप फाइनल की वैश्विक दर्शक संख्या को और बढ़ाएगा। फुटबॉल और संगीत का अनोखा संगम फीफा का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य फुटबॉल और संगीत के जरिए दुनिया भर के दर्शकों को जोड़ना है। हालांकि पारंपरिक फुटबॉल प्रशंसकों के एक वर्ग ने लंबे हाफटाइम को लेकर चिंता भी जताई है, लेकिन फीफा इसे विश्व कप इतिहास का नया अध्याय मान रहा है। स्पेन और अर्जेंटीना के फाइनल पर भी टिकी रहेंगी नजरें हाफटाइम शो के साथ-साथ फुटबॉल प्रेमियों की निगाहें स्पेन और अर्जेंटीना के बीच खेले जाने वाले विश्व कप फाइनल पर भी होंगी। फीफा को उम्मीद है कि खेल और मनोरंजन का यह अनूठा मेल विश्व कप 2026 के फाइनल को अब तक का सबसे यादगार आयोजन बना देगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय क्रिकेट टीम के अनुभवी बल्लेबाज रोहित शर्मा के वनडे भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि भारतीय टीम प्रबंधन और चयन समिति अब 2027 वनडे विश्व कप को ध्यान में रखते हुए नई रणनीति पर काम कर रही है। इसी क्रम में यह भी कहा गया है कि रोहित शर्मा अब टीम में 'ऑटोमैटिक सिलेक्शन' नहीं रहेंगे और उनके चयन का फैसला प्रदर्शन व भविष्य की योजनाओं के आधार पर होगा। हालांकि, BCCI की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। 2027 विश्व कप को ध्यान में रखकर बन रही रणनीति रिपोर्ट्स के अनुसार, चयनकर्ता आगामी वनडे विश्व कप के लिए युवा खिलाड़ियों को अधिक अवसर देने की दिशा में विचार कर रहे हैं। इसी वजह से अनुभवी खिलाड़ियों के चयन पर भी प्रदर्शन और फिटनेस के आधार पर फैसला लेने की बात सामने आई है। लॉर्ड्स वनडे को लेकर भी चर्चा तेज कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि इंग्लैंड के खिलाफ लॉर्ड्स में होने वाला तीसरा वनडे रोहित शर्मा के करियर का आखिरी वनडे मुकाबला हो सकता है। हालांकि, इस संबंध में न तो रोहित शर्मा और न ही भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने किसी तरह की आधिकारिक पुष्टि की है। टीम मैनेजमेंट ने जताया भरोसा इन अटकलों के बीच भारतीय बल्लेबाजी कोच सितांशु कोटक ने रोहित शर्मा का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि दो मैचों में रन नहीं बनने का मतलब यह नहीं कि रोहित जैसे खिलाड़ी पर दबाव है। कोटक ने भरोसा जताया कि रोहित निर्णायक मुकाबले में बड़ी पारी खेल सकते हैं। आधिकारिक घोषणा का इंतजार फिलहाल रोहित शर्मा के भविष्य को लेकर सामने आई सभी बातें मीडिया रिपोर्ट्स और अटकलों पर आधारित हैं। अंतिम फैसला चयन समिति और BCCI की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा। ऐसे में क्रिकेट प्रशंसकों की नजर अब इंग्लैंड के खिलाफ तीसरे वनडे और उसके बाद होने वाले आधिकारिक फैसलों पर टिकी हुई है।