कोलकोता, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को एक और बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी की राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। वह इस सप्ताह पार्टी छोड़ने वाली दूसरी राज्यसभा सांसद बन गई हैं। उनके इस्तीफे से पश्चिम बंगाल के साथ-साथ असम में भी टीएमसी के संगठन को बड़ा नुकसान माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, सुष्मिता देव ने बुधवार सुबह राज्यसभा के सभापति को अपना इस्तीफा सौंप दिया। इसके साथ ही उन्होंने असम टीएमसी अध्यक्ष पद समेत संगठन में अपनी सभी जिम्मेदारियों से भी खुद को अलग कर लिया। हिमंता सरमा से मुलाकात के बाद बढ़ीं अटकलें इस्तीफे के तुरंत बाद सुष्मिता देव की मुलाकात असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वास शर्मा से हुई। इस मुलाकात के बाद उनके भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। हालांकि, उन्होंने अभी तक अपने अगले राजनीतिक कदम को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनकी यह मुलाकात असम की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत हो सकती है। कांग्रेस से टीएमसी में आई थीं सुष्मिता देव 53 वर्षीय सुष्मिता देव ने वर्ष 2021 में कांग्रेस छोड़कर टीएमसी का दामन थामा था। वह असम के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री Santosh Mohan Dev की बेटी हैं। वह कांग्रेस की महिला इकाई 'ऑल इंडिया महिला कांग्रेस' की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुकी हैं और असम के सिलचर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। लगातार बढ़ रही हैं टीएमसी की मुश्किलें सुष्मिता देव का इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब टीएमसी पहले से ही आंतरिक असंतोष और बगावत की खबरों से जूझ रही है। इससे पहले राज्यसभा सांसद सुखेंदु शिखर रॉय भी पार्टी से इस्तीफा देने की घोषणा कर चुके हैं। इसके अलावा, पश्चिम बंगाल में पार्टी विधायकों के एक वर्ग द्वारा नेतृत्व के खिलाफ नाराजगी जताने और कुछ सांसदों के अलग रुख अपनाने की खबरों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार हो रहे इस्तीफे टीएमसी के लिए संगठनात्मक चुनौती बन सकते हैं और आने वाले दिनों में पार्टी को अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होंगे।
कोलकाता, एजेंसियां। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) में जारी राजनीतिक घमासान के बीच मंगलवार को एक नया मोड़ सामने आया। फर्जी हस्ताक्षर विवाद की जांच के सिलसिले में CID की टीम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पहुंची। हालांकि, पार्टी नेताओं ने अभिषेक बनर्जी की गैरमौजूदगी का हवाला देते हुए जांच टीम को परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी। CID अधिकारियों के साथ कालीघाट थाना पुलिस और बड़ी संख्या में महिला पुलिसकर्मी भी मौजूद थीं। जांच एजेंसी उन आरोपों की पड़ताल कर रही है, जिनमें दावा किया गया है कि TMC विधायक दल से जुड़े एक प्रस्ताव पर फर्जी हस्ताक्षर किए गए थे। क्या है पूरा विवाद? बागी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि नेता विपक्ष बनाए जाने से संबंधित प्रस्ताव पर उनके हस्ताक्षर फर्जी तरीके से किए गए। आरोप सीधे अभिषेक बनर्जी के लेटरहेड से जुड़े दस्तावेजों पर लगाए गए हैं। इसी मामले की जांच के तहत CID लगातार सबूत जुटा रही है। पार्टी में बढ़ी अंदरूनी खींचतान इस विवाद ने TMC के भीतर चल रही गुटबाजी को भी उजागर कर दिया है। शिकायत करने वाले विधायकों ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निष्कासित किया जा चुका है। वहीं, ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाए जाने के फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है, जिसकी सुनवाई जल्द होने वाली है। राजनीतिक असर पर नजर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल फर्जी हस्ताक्षर तक सीमित नहीं है, बल्कि TMC के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर चल रही खींचतान का संकेत भी देता है। अब सबकी नजर CID जांच और अदालत की आगामी सुनवाई पर टिकी हुई है, जो इस मामले की दिशा तय कर सकती है।
नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में एक बार फिर अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आती दिखाई दे रही है। पार्टी की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि टीएमसी के 20 लोकसभा सांसदों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने का फैसला किया है। इस दावे के बाद पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। काकोली घोष दस्तीदार ने सोमवार को कहा कि इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक पत्र भी सौंपा गया है। उन्होंने दावा किया कि यह निर्णय कई सांसदों के बीच विस्तृत चर्चा और सहमति के बाद लिया गया है। उन्होंने कहा, “हमने लोकसभा अध्यक्ष को अपने निर्णय से अवगत करा दिया है। यह फैसला सांसदों के बीच विचार-विमर्श के बाद लिया गया है।” दावे से बढ़ी राजनीतिक हलचल काकोली घोष दस्तीदार के अनुसार, इस फैसले के समर्थन में करीब 20 सांसद हैं। टीएमसी के लोकसभा में कुल 28 सांसद हैं, ऐसे में यह दावा पार्टी के भीतर संभावित बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है। लोकसभा सचिवालय की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। ऐसे में दावे की वास्तविक स्थिति को लेकर राजनीतिक हलकों में उत्सुकता बनी हुई है। पार्टी नेतृत्व की चुप्पी ने बढ़ाई अटकलें काकोली घोष दस्तीदार के बयान के बाद भी तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी तथा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेतृत्व की चुप्पी ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अटकलों को और बढ़ा दिया है। पहले भी सामने आ चुके हैं असंतोष के संकेत पिछले कुछ समय से तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और मतभेदों की खबरें सामने आती रही हैं। कई नेताओं द्वारा संगठनात्मक मुद्दों और नेतृत्व शैली को लेकर अलग-अलग मंचों पर अपनी राय रखी गई थी। ऐसे में काकोली घोष दस्तीदार का यह दावा पार्टी के भीतर चल रही हलचलों को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। विपक्षी राजनीति पर पड़ सकता है असर यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ व्यापक राजनीतिक एकजुटता बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यदि टीएमसी के भीतर बड़े स्तर पर कोई राजनीतिक पुनर्संरचना होती है, तो इसका असर राष्ट्रीय राजनीति और विपक्षी गठबंधन की रणनीतियों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व और लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय की ओर हैं, जहां से इस पूरे मामले पर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की अंदरूनी खींचतान अब अदालत तक पहुंच गई है। पार्टी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर कर विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें बागी नेता रीतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी गई थी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति कृष्णा राव की अदालत में होगी। कोर्ट ने इस याचिका को प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध करते हुए 11 जून को विस्तृत सुनवाई की तारीख तय की है। विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर कानूनी आपत्ति टीएमसी की ओर से दायर याचिका में विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को चुनौती दी गई है। पार्टी का तर्क है कि नेता प्रतिपक्ष की मान्यता से जुड़ा फैसला पार्टी की आधिकारिक स्थिति और संगठनात्मक निर्णयों के अनुरूप नहीं है। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष को मुख्य प्रतिवादी बनाया गया है। पार्टी का कहना है कि अध्यक्ष के फैसले के कारण विधानसभा के भीतर संवैधानिक और राजनीतिक विवाद पैदा हुआ है। बागी गुट के समर्थन से बढ़ा विवाद विवाद की जड़ टीएमसी विधायकों के भीतर उभरा मतभेद है। विधानसभा चुनाव 2026 के बाद विपक्ष की भूमिका में पहुंची टीएमसी के 80 विधायकों में से बड़ी संख्या ने कथित तौर पर रीतब्रत बनर्जी के समर्थन में रुख अपनाया। इसी समर्थन के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष ने रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता प्रदान की थी। पार्टी नेतृत्व इस फैसले को चुनौती दे रहा है और आधिकारिक उम्मीदवार के पक्ष में अपनी दलील रख रहा है। नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर बढ़ी राजनीतिक लड़ाई टीएमसी नेतृत्व का दावा है कि पार्टी के संगठनात्मक निर्णयों की अनदेखी कर नेता प्रतिपक्ष के चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। वहीं बागी गुट का तर्क है कि उन्हें पर्याप्त विधायकों का समर्थन प्राप्त है और इसी आधार पर उन्हें मान्यता मिली है। इस विवाद ने विधानसभा के भीतर विपक्ष की भूमिका और टीएमसी के आंतरिक नेतृत्व को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विधानसभा में बदला राजनीतिक समीकरण 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर सरकार बनाई, जबकि टीएमसी मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी के भीतर उभरे मतभेदों ने उसके सामने नई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अब सभी की निगाहें 11 जून को होने वाली हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत का फैसला न केवल नेता प्रतिपक्ष के पद की वैधता तय करेगा, बल्कि राज्य की विपक्षी राजनीति और टीएमसी के आंतरिक शक्ति संतुलन पर भी असर डाल सकता है।
कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (TMC) में कथित अंदरूनी असंतोष और कुछ सांसदों के रुख को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इसी बीच कृष्णानगर से सांसद महुआ मोइत्रा ने पार्टी के कुछ नेताओं और सांसदों पर तीखा हमला बोलते हुए उनकी निष्ठा पर सवाल उठाए हैं। लोकसभा में टीएमसी के कुछ सांसदों द्वारा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के प्रति समर्थन जताने संबंधी चर्चाओं और राजनीतिक अटकलों के बीच महुआ मोइत्रा खुलकर पार्टी नेतृत्व के पक्ष में सामने आई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ सांसद जनता के जनादेश के विपरीत राजनीतिक रुख अपना रहे हैं। यूसुफ पठान पर सीधे सवाल महुआ मोइत्रा ने पूर्व भारतीय क्रिकेटर और बहरमपुर से टीएमसी सांसद यूसुफ पठान का नाम लेते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि यदि राजनीतिक दबाव या किसी केंद्रीय नेता के बुलावे पर सांसद अपना रुख बदलते हैं, तो यह मतदाताओं के विश्वास के साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यूसुफ पठान को जनता ने भारी समर्थन देकर संसद भेजा है और उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के भरोसे का सम्मान करना चाहिए। बागी सांसदों को दी खुली चुनौती महुआ मोइत्रा ने कथित रूप से पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाने वाले सांसदों को चुनौती देते हुए कहा कि यदि वे वास्तव में अपने नए राजनीतिक निर्णय को लेकर आश्वस्त हैं, तो उन्हें सांसद पद से इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव मैदान में उतरना चाहिए। उन्होंने कहा कि सांसदों को यह साबित करना चाहिए कि उन्हें व्यक्तिगत लोकप्रियता के आधार पर समर्थन प्राप्त है या फिर वे केवल पार्टी और ममता बनर्जी की राजनीतिक छवि के कारण चुनाव जीतकर आए थे। NDA समर्थन को लेकर बढ़ी सियासी हलचल राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि लोकसभा में टीएमसी के कुछ सांसदों ने NDA के प्रति नरम रुख अपनाया है। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि जनता ने टीएमसी उम्मीदवारों को भाजपा या NDA के समर्थन के लिए नहीं चुना था और जनादेश का सम्मान किया जाना चाहिए। चीफ व्हिप पद को लेकर भी विवाद इस राजनीतिक विवाद के बीच लोकसभा में टीएमसी के मुख्य सचेतक (Chief Whip) पद को लेकर भी नया विवाद सामने आया है। काकोली घोष दस्तीदार ने खुद को पार्टी का चीफ व्हिप बताते हुए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा है। दूसरी ओर टीएमसी नेता कीर्ति आजाद का दावा है कि पार्टी नेतृत्व पहले ही काकोली घोष दस्तीदार को इस पद से हटाकर कल्याण बनर्जी को नई जिम्मेदारी सौंप चुका है। पार्टी के भीतर चल रही इस खींचतान ने टीएमसी की आंतरिक स्थिति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर सभी की नजर बनी हुई है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी All India Trinamool Congress में इन दिनों अंदरूनी मतभेद और राजनीतिक हलचल चर्चा का विषय बने हुए हैं। पार्टी के कुछ नेताओं और सांसदों की ओर से लगातार आ रहे बयानों ने संगठन के भीतर असंतोष की अटकलों को और हवा दे दी है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि कुछ सांसद कथित तौर पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के संपर्क में हैं। ऐसे में संभावित बागी गुट की प्रस्तावित प्रेस वार्ता पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। ममता बनर्जी ने कल्याण बनर्जी को बनाया मुख्य सचेतक इसी बीच पार्टी नेतृत्व ने संगठनात्मक स्तर पर एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है। ममता बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर जानकारी दी है कि कल्याण बनर्जी को लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस का मुख्य सचेतक नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है। राजनीतिक विश्लेषक इसे पार्टी में अनुशासन और एकजुटता बनाए रखने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। कांग्रेस ने भाजपा पर साधा निशाना तृणमूल कांग्रेस से जुड़े घटनाक्रम पर विपक्षी दलों की भी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कांग्रेस नेता Vijay Wadettiwar ने दावा किया कि देश की राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता कमजोर हुई है और इसके लिए भाजपा जिम्मेदार है। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता में बने रहने के लिए राजनीतिक दलों को तोड़ने की रणनीति अपनाई जा रही है। बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल सूत्रों के अनुसार, कुछ सांसदों द्वारा लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपे जाने और एनडीए के साथ संभावित समीकरणों की चर्चाओं ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से अभी तक किसी बड़े विभाजन की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। प्रेस वार्ता से साफ हो सकती है तस्वीर राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि बागी नेताओं की संभावित प्रेस वार्ता के बाद स्थिति और स्पष्ट हो सकती है। फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही उठापटक चर्चा का केंद्र बनी हुई है और आने वाले दिनों में इसका असर राज्य की राजनीतिक दिशा पर पड़ सकता है।
स्पीकर को लेटर लिखा, CM शुभेंदु और बंगाल प्रभारी से मिले, राज्यसभा सांसद का भी इस्तीफा कोलकाता, एजेंसियां। विधायकों के बाद अब तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने भी ममता का साथ छोड़ दिया है। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, लोकसभा के 28 सांसदों में से 20 ने एनडीए सरकार को समर्थन देने का फैसला किया है। सांसद और TMC की पूर्व नेता काकोली ने भी सोमवार को यही दावा किया। उन्होंने बताया कि 20 सांसदों ने NDA को समर्थन देने का फैसला किया है। इस बारे में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र भी भेज दिया गया है। 11 सांसदों ने मीटिंग की इनमें से 11 सांसदों ने सोमवार दोपहर केंद्रीय मंत्री और BJP के बंगाल प्रभारी भूपेंद्र यादव के घर पर मीटिंग की। इस दौरान सुबह TMC के राज्यसभा सांसद पद से इस्तीफा दे चुके सुखेंदु शेखर रे भी मौजूद रहे। बंगाल CM शुभेंदु अधिकारी भी इनसे मिलने पहुंचे। बैठक में ये रहे शामिल बैठक में लोकसभा सांसद काकोली घोष, शताब्दी रॉय, अबू ताहिर, अरूप चक्रवर्ती, खलीलुर रहमान, शर्मिला सरकार, असित मल, कालीपद सोरेन, जगदीश बसुनिया और प्रसून बनर्जी मौजूद रहे। लोकसभा में TMC के अभी 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। इससे पहले 3 जून को बंगाल के 80 में से 58 विधायक अलग गुट बना चुके हैं। इस गुट ने ऋतब्रत को अपना नेता बनाया है। बैठक की तस्वीर वायरल न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, टीएमसी के 20 सांसदों की रविवार देर रात दिल्ली के एक अज्ञात स्थान पर अनौपचारिक बैठक भी हुई। इसमें सांसदों ने मौजूदा नेतृत्व व्यवस्था को लेकर असंतोष जताया। सोमवार को इस बैठक की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर सामने आई। कई TMC सांसद एक मेज के आसपास बैठे दिखाई दे रहे हैं। उस समय एक सांसद के फोटो खींचने पर विवाद भी हुआ। सूत्रों का दावा है कि तस्वीर में जितने सांसद दिख रहे हैं, वास्तविक संख्या उससे कहीं अधिक थी। सुखेंदु का दावा- TMC के लोग ममता से नाराज TMC के वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर ने आज सुबह ही राज्यसभा सांसद पद से इस्तीफा दे दिया और पार्टी भी छोड़ दी। त्यागपत्र में उन्होंने ममता के 15 साल के अराजक शासन को पार्टी की हार का नतीजा बताया और भाजपा की तारीफ की थी। राज्यसभा के चेयरमैन सीपी राधाकृष्णन ने सुखेंदु शेखर का इस्तीफा मंजूर कर लिया है। सुखेंदु ने इस्तीफे के बाद मीडिया से कहा था ममता मनमाने ढंग से पार्टी चला रही थीं, इसी वजह से उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उनका कार्यकाल 2029 तक था। अब सीट खाली हो चुकी है, अब इस पर उपचुनाव कराया जा सकता है। बागी विधायक ऋतब्रत ने सुखेंदु का किया समर्थन सुखेंदु शेखर के इस्तीफे पर बंगाल में TMC के बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि यह सिर्फ सुखेंदु की निजी बात नहीं है। मैंने सुखेंदु से सीधे बात नहीं की है, लेकिन टीवी पर उनके बयान देखे और सुने हैं। मैं उनकी बातों से सहमत हूं। राज्यसभा के कामकाज को लेकर सुखेंदु की बात काफी हद तक सही है। संसद कोई क्विज खेलने की जगह नहीं है। टीमएसी पहुंची हाईकोर्ट उधर, टीएमसी ने बागी नेता रीताब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष (LoP) बनाए जाने के विधानसभा स्पीकर के फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी है। कोर्ट ने तारीख तय नहीं की है। लोकसभा सांसद काकोली घोष भी पार्टी से इस्तीफा दे चुकी काकोली घोष ने दावा किया कि वह अभी भी लोकसभा में पार्टी की मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) हैं। उन्होंने कहा कि यह फैसला साथी सांसदों के साथ विचार-विमर्श के बाद लिया गया है। उन्होंने कहा कि सांसदों ने NDA के साथ जाने का फैसला किया है। उनका मानना है कि यही जनता के जनादेश के अनुरूप है। काकोली ने 27 मई को टीएमसी छोड़ दी है, लेकिन सांसद पद से इस्तीफा नहीं दिया था। प्रदेश अध्यक्ष सुब्रत बख्शी को भेजे लेटर में काकोली ने लिखा था कि मानसिक संघर्ष और लंबे चिंतन के बाद यह फैसला लिया है। 28 साल पुरानी TMC में बगावत तृणमूल कांग्रेस (TMC) में 28 साल के इतिहास में पहली बार औपचारिक तौर पर टूट सामने आई है। बुधवार को 58 बागी विधायकों ने पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना। विधानसभा स्पीकर रथींद्र बोस को समर्थन पत्र दिया। इसमें मांग की गई कि ऋतब्रत को नेता विपक्ष घोषित किया जाए। स्पीकर ने मंजूरी दे दी।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी राजनीतिक संकट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान हालात उन राजनीतिक घटनाओं की याद दिलाते हैं, जिनका सामना कांग्रेस ने पहले किया था। अधीर रंजन ने कहा कि राजनीति में किए गए फैसलों का असर समय के साथ सामने आता है और आज वही स्थिति तृणमूल कांग्रेस के सामने दिखाई दे रही है। ‘इतिहास खुद को दोहरा रहा है’ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि बंगाल की राजनीति में इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराता नजर आ रहा है। उन्होंने दावा किया कि जिस तरह अतीत में विपक्षी दलों को कमजोर करने की कोशिशें हुई थीं, उसी प्रकार की परिस्थितियां अब तृणमूल कांग्रेस के सामने खड़ी हो गई हैं। रीतब्रत खेमे को मिला 58 विधायकों का समर्थन टीएमसी के भीतर राजनीतिक संकट उस समय और गहरा गया जब 58 विधायकों ने रीतब्रत बनर्जी के नेतृत्व का समर्थन किया। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी खेमे को मान्यता मिलने से पार्टी के भीतर चल रहा विवाद और अधिक चर्चा का विषय बन गया। 2016 के घटनाक्रम का किया जिक्र अधीर रंजन चौधरी ने 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद की राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि बाद के वर्षों में कांग्रेस के कई नेता और विधायक पार्टी छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए, जिससे कांग्रेस की विधानसभा में ताकत कम होती गई। ‘राजनीतिक दलबदल का दौर जारी है’ कांग्रेस नेता ने कहा कि बंगाल की राजनीति में दलबदल की संस्कृति नई नहीं है। उनके अनुसार, पहले जो दल इस प्रक्रिया से लाभ उठाते थे, आज वे स्वयं इसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ राजनीतिक समीकरण बदलते रहते हैं, लेकिन दलबदल की राजनीति का सिलसिला जारी रहता है। कांग्रेस ने कार्यकर्ताओं को दिया संदेश अधीर रंजन चौधरी ने इस अवसर पर उन कार्यकर्ताओं और नेताओं का भी जिक्र किया, जिन्होंने वर्षों तक विभिन्न राजनीतिक संघर्षों का सामना किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस संगठन अपने पुराने कार्यकर्ताओं और समर्थकों का स्वागत करने के लिए तैयार है और पार्टी को मजबूत बनाने की दिशा में काम जारी रहेगा। बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल टीएमसी में जारी घटनाक्रम और विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाओं ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक बार फिर गर्मा दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर और बाहर होने वाले फैसले राज्य की राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोनारपुर में हुई हिंसक घटना ने तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना केवल एक सुरक्षा चुनौती नहीं, बल्कि उनके नेतृत्व, जनसंपर्क क्षमता और राजनीतिक परिपक्वता की भी महत्वपूर्ण परीक्षा है। पहली बार खुले जन-विरोध का सामना अब तक अभिषेक बनर्जी की राजनीतिक यात्रा संगठनात्मक मजबूती और सत्ता के प्रभावशाली ढांचे के भीतर आगे बढ़ी है। सोनारपुर में उनके काफिले पर हुए हमले और विरोध प्रदर्शन ने उन्हें पहली बार सीधे सार्वजनिक आक्रोश के सामने ला खड़ा किया है। इस घटना ने राज्य की राजनीति में बढ़ते असंतोष और जनभावनाओं को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। ममता बनर्जी के संघर्षपूर्ण राजनीतिक सफर से तुलना राजनीतिक पर्यवेक्षक इस घटना की तुलना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के शुरुआती राजनीतिक जीवन से कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने विपक्षी राजनीति के दौर में कई आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और हमलों का सामना किया था और अक्सर ऐसे घटनाक्रमों को जनसमर्थन में बदलने में सफल रही थीं। विश्लेषकों का मानना है कि सोनारपुर की घटना अभिषेक बनर्जी के लिए भी वैसा ही निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है। अब यह देखना होगा कि वे इस चुनौती का राजनीतिक रूप से किस प्रकार सामना करते हैं। पुराने संकेतों की याद राजनीतिक विश्लेषक 2023 के कुर्मी आंदोलन का भी उल्लेख कर रहे हैं, जब झाड़ग्राम में आंदोलनकारियों ने अभिषेक बनर्जी के काफिले का विरोध किया था। बाद में कुर्मी बहुल इलाकों में चुनावी परिणामों ने यह संकेत दिया कि स्थानीय असंतोष को नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है। सोनारपुर की घटना को भी कई विशेषज्ञ इसी व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं। विशेषज्ञों की राय पूर्व सांसद जवाहर सरकार का कहना है कि यह अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक जीवन की एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। उनके अनुसार, जिन परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना ममता बनर्जी दशकों से करती रही हैं, अभिषेक अब पहली बार उस राजनीतिक वास्तविकता से रूबरू हो रहे हैं। वहीं राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर मैदुल इस्लाम का मानना है कि किसी भी नेता की वास्तविक राजनीतिक पहचान केवल विरासत से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में उसके व्यवहार और जनता से जुड़ाव से तय होती है। उनके अनुसार, यदि अभिषेक विरोध के बावजूद लोगों के बीच सक्रिय बने रहते हैं, तो यह उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को नई मजबूती दे सकता है। आगे की राह सोनारपुर की घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि तृणमूल कांग्रेस और स्वयं अभिषेक बनर्जी इस घटनाक्रम को किस तरह संभालते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनकी प्रतिक्रिया और जनता के साथ संवाद की रणनीति ही तय करेगी कि यह घटना उनके लिए नुकसानदेह साबित होगी या फिर एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत बनेगी। फिलहाल इतना तय है कि सोनारपुर की घटना ने अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को नए सिरे से परखने का अवसर और चुनौती दोनों पैदा कर दी है। आने वाले महीनों में इसका प्रभाव पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस की बड़ी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। काकोली घोष दस्तीदार के इस्तीफे के बाद अब राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के बयान ने पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। टीएमसी के वरिष्ठ नेता और अनुभवी सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी की कार्यशैली, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हालात पर सवाल उठाते हुए ऐसे संकेत दिए हैं, जिन्हें पार्टी के भीतर खुला विद्रोह माना जा रहा है। उनके बयानों के बाद बंगाल की राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। “असहनीय अराजकता का अंत हुआ” : सुखेंदु शेखर रॉय सुखेंदु शेखर रॉय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति की तुलना रोमन साम्राज्य के पतन से की। उन्होंने लिखा कि वर्ष 44 ईसा पूर्व में जूलियस सीजर की हत्या सीनेट में हुई थी, लेकिन बंगाल में जनता ने “असहनीय अराजकता” का अंत कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रॉय का यह बयान सीधे तौर पर टीएमसी शासन और पार्टी के भीतर बढ़ते भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। “भ्रष्ट लोगों को बढ़ावा मिला, बुद्धिजीवियों को किनारे किया गया” एक अन्य पोस्ट में रॉय ने कहा कि जब भ्रष्ट लोग व्यवस्था पर हावी हो जाते हैं और बुद्धिमानों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है, तब किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का पतन तय हो जाता है। उन्होंने स्वतंत्र विचारों और आंतरिक लोकतंत्र की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को आलोचना और अलग राय को दबाने के बजाय सुनना चाहिए। आरजी कर कांड को लेकर भी जताई नाराजगी सूत्रों के अनुसार, सुखेंदु शेखर रॉय इस बात से बेहद नाराज हैं कि आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले में जनता के गुस्से को पार्टी सही तरीके से समझ नहीं पाई। रॉय का मानना है कि महिला डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी के बाद सड़कों पर जो भारी जनआक्रोश दिखा, उसे पार्टी नेतृत्व ने गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि जब जनता स्वतःस्फूर्त तरीके से विरोध कर रही थी, तब पार्टी के कुछ नेता उसे राजनीतिक साजिश बताने में लगे थे। उनके अनुसार, यही disconnect आगे चलकर चुनावी हार की बड़ी वजह बना। “पार्टी में भ्रष्टाचार संस्थागत रूप ले चुका” सुखेंदु शेखर रॉय ने निजी बातचीत में यह भी स्वीकार किया कि पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार अब “संस्थागत रूप” ले चुका है। उनका मानना है कि इससे पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर हुई और कार्यकर्ताओं के बीच निराशा बढ़ी। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि रॉय का इशारा पार्टी के उन प्रभावशाली नेताओं की तरफ है, जिन पर लंबे समय से भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं। क्यों महत्वपूर्ण माने जाते हैं सुखेंदु शेखर रॉय? सुखेंदु शेखर रॉय पश्चिम बंगाल की राजनीति का बड़ा और अनुभवी चेहरा माने जाते हैं। कांग्रेस पृष्ठभूमि से आने वाले रॉय पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के करीबी रहे हैं और संवैधानिक मामलों के जानकार माने जाते हैं। संसद में वे लंबे समय तक टीएमसी के सबसे मुखर नेताओं में शामिल रहे हैं। ऐसे में उनका खुलकर असंतोष जताना पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। टीएमसी में “पुराने बनाम नये” की लड़ाई तेज राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी हार के बाद टीएमसी में “पुराने बनाम नये नेतृत्व” की लड़ाई खुलकर सामने आने लगी है। पार्टी के पुराने नेता कथित तौर पर आई-पैक और नई रणनीतिक टीम की कार्यशैली से नाराज बताए जा रहे हैं। काकोली घोष दस्तीदार और अब सुखेंदु शेखर रॉय के बयानों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर और बड़े राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं। क्या ममता बनर्जी करेंगी संगठन में बड़ा बदलाव? टीएमसी की हार के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी पार्टी संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव करेंगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पार्टी नेतृत्व ने जल्द संगठनात्मक सुधार नहीं किए, तो असंतोष और बढ़ सकता है। सुखेंदु शेखर रॉय के बागी तेवरों ने यह साफ कर दिया है कि बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद अब तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी बड़ा संघर्ष शुरू हो चुका है।
West Bengal Election Result: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार ऐतिहासिक नतीजे सामने आए हैं। भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत के साथ राज्य की सत्ता पर कब्जा जमाने की ओर निर्णायक बढ़त बना ली है। 294 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी 148 सीटों के आंकड़े को पार करते हुए भाजपा 190 से अधिक सीटों पर जीत या बढ़त के साथ सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई है। करीब 15 साल से सत्ता में काबिज तृणमूल कांग्रेस को इस चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा है। पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के नेतृत्व में लड़ी गई इस लड़ाई में कई दिग्गज नेता अपने-अपने क्षेत्रों में पिछड़ गए, जिससे पार्टी के जनाधार में गिरावट साफ नजर आई। कैसे बदला बंगाल का राजनीतिक समीकरण 2011 में जहां भाजपा का खाता तक नहीं खुला था, वहीं 2016 में उसने 3 सीटें जीतीं और 2021 में 77 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बनकर उभरी। इस बार पार्टी ने 40% से ज्यादा वोट शेयर हासिल कर ग्रामीण, आदिवासी और औद्योगिक क्षेत्रों में अपनी मजबूत पकड़ बना ली। इन इलाकों में भाजपा की बड़ी बढ़त चुनाव नतीजों से साफ है कि भाजपा ने उत्तर बंगाल, जंगलमहल और सीमावर्ती इलाकों में शानदार प्रदर्शन किया। इन क्षेत्रों में पार्टी को भारी जनसमर्थन मिला, जबकि टीएमसी शहरी इलाकों और कुछ पारंपरिक सीटों तक सिमटती नजर आई। भाजपा की जीत के बड़े कारण भाजपा की इस ऐतिहासिक जीत के पीछे कई अहम वजहें रहीं। पार्टी का मजबूत संगठन, आक्रामक चुनाव प्रचार और बढ़ा हुआ वोट प्रतिशत इसके प्रमुख कारण बने। इसके अलावा सीमावर्ती और आदिवासी क्षेत्रों में गहरी पैठ बनाना भी भाजपा के लिए निर्णायक साबित हुआ। सत्ता विरोधी लहर और विपक्ष की कमजोर रणनीति ने भी भाजपा को फायदा पहुंचाया। टीएमसी की हार के कारण तृणमूल कांग्रेस की हार के पीछे सत्ता विरोधी माहौल, संगठनात्मक कमजोरी और नेताओं के खिलाफ बढ़ता असंतोष प्रमुख कारण रहे। कई मंत्री अपने ही क्षेत्रों में पिछड़ गए, जिससे पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर साबित हुई। कल्याणकारी योजनाएं भी इस बार मतदाताओं को पूरी तरह प्रभावित नहीं कर सकीं। नया राजनीतिक अध्याय शुरू इस चुनाव परिणाम के साथ पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो गया है। वामपंथ और कांग्रेस के बाद टीएमसी का दौर खत्म होता दिख रहा है और अब भाजपा के नेतृत्व में राज्य में नई राजनीतिक दिशा तय होती नजर आ रही है। आने वाले समय में इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है।
कोलकाता/दुर्गापुर : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों से पहले सियासी बयानबाजी चरम पर पहुंच गई है। एग्जिट पोल के बाद जहां भारतीय जनता पार्टी खेमे में उत्साह है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने भी आत्मविश्वास भरे दावे करने शुरू कर दिए हैं। 6 मई को शपथ का दावा कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि ममता बनर्जी 6 मई को चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगी। कोलकाता नगर निगम के अधिवेशन के बाद मीडिया से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस 202 से 225 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगी। उन्होंने भाजपा के दावों को सिरे से खारिज किया। दुर्गापुर में ‘गुड़-बतासा’ और पहरा दूसरी ओर, दुर्गापुर में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने स्ट्रॉन्ग रूम की निगरानी के लिए अनोखा तरीका अपनाया है। दुर्गापुर गवर्नमेंट कॉलेज के पास बनाए गए पहरा केंद्र में कार्यकर्ता दिन-रात डटे हुए हैं। गर्मी से बचने के लिए कार्यकर्ता ‘गुड़-बतासा’ खा रहे हैं और राहगीरों को भी बांट रहे हैं। साथ ही, ‘पाचन’ (डंडा) शब्द का इस्तेमाल कर विरोधियों को चेतावनी देने की बात भी सामने आई है, जिससे सियासी माहौल और गरमा गया है। EVM सुरक्षा को लेकर आशंका टीएमसी के स्थानीय युवा नेता अजय देबनाथ का कहना है कि उन्हें EVM से छेड़छाड़ की आशंका है। इसी वजह से कार्यकर्ता लगातार निगरानी कर रहे हैं और किसी भी स्थिति के लिए तैयार हैं। उन्होंने अणुव्रत मंडल के ‘मॉडल’ का हवाला देते हुए कहा कि जरूरत पड़ी तो ‘पाचन’ का इस्तेमाल भी किया जाएगा। भाजपा का तीखा पलटवार टीएमसी की इस सक्रियता पर भाजपा ने कड़ा हमला बोला है। भाजपा जिला प्रवक्ता सुमंत मंडल ने तंज कसते हुए कहा कि अणुव्रत मंडल खुद केंद्रीय एजेंसियों प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के मामलों में उलझे हुए हैं, लेकिन उनके समर्थक अब भी पुरानी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर ‘पाचन’ की राजनीति करनी है तो बंगाल नहीं, कहीं और जाना चाहिए। भाजपा का दावा है कि 4 मई के बाद तृणमूल नेताओं को सत्ता से बाहर होना पड़ेगा। बढ़ता सियासी तापमान नतीजों से पहले ही पश्चिम बंगाल में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। एक ओर टीएमसी सत्ता में वापसी का दावा कर रही है, तो दूसरी ओर भाजपा बदलाव की बात कर रही है। अब सभी की नजरें 4 मई को आने वाले नतीजों और उसके बाद की सियासी तस्वीर पर टिकी हैं।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पूर्व पार्षद निर्मल दत्त को वोटरों को कथित रूप से धमकाने और चुनाव को प्रभावित करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। बुधवार को उन्हें विधाननगर कोर्ट में पेश किया गया, जहां अदालत ने उन्हें 10 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया। शिकायत के बाद हुई कार्रवाई मामले की शुरुआत मंगलवार को हुई, जब भाजपा प्रत्याशी शरदबत मुखर्जी ने चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्मल दत्त वोटरों को डराकर मतदान को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। इस संबंध में उन्होंने विधाननगर पुलिस कमिश्नर से भी मुलाकात की थी। शिकायत के आधार पर विधाननगर दक्षिण थाने की पुलिस ने दत्ताबाद इलाके से निर्मल दत्त को गिरफ्तार किया। सुजीत बोस के करीबी बताए जाते हैं निर्मल दत्त को राज्य मंत्री सुजीत बोस का करीबी माना जाता है, जो विधाननगर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। दत्त की पत्नी भी विधाननगर नगर निगम के वार्ड संख्या 38 से तृणमूल कांग्रेस की पार्षद हैं। वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में इस्लामपुर में एक रैली के दौरान चुनाव आयोग की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यदि तृणमूल के एक नेता को गिरफ्तार किया जाता है, तो उनकी जगह सौ अन्य नेता खड़े हो जाएंगे। वायरल वीडियो से बढ़ा विवाद बताया जा रहा है कि 13 अप्रैल को सॉल्टलेक में हुई एक बैठक का वीडियो वायरल होने के बाद मामला गरमा गया। इस वीडियो में निर्मल दत्त कथित तौर पर यह कहते नजर आ रहे हैं कि अगर किसी ने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ वोट दिया, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी दावा किया कि एक मोबाइल ऐप के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि किसने किसे वोट दिया है। इस बयान के सामने आने के बाद भाजपा प्रत्याशी ने चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई की। पहले भी लग चुके हैं आरोप यह पहली बार नहीं है जब निर्मल दत्त विवादों में आए हैं। इससे पहले भी उन पर सॉल्टलेक के दत्ताबाद इलाके में भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले का आरोप लग चुका है। फिलहाल, पुलिस मामले की जांच में जुटी है और आगे की कार्रवाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार की जाएगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।