राजनीति

TMC Leader Arrested in Bengal Election Controversy

बंगाल चुनाव: वोटरों को धमकाने के आरोप में TMC का पूर्व पार्षद गिरफ्तार, 10 दिन की न्यायिक हिरासत

surbhi अप्रैल 16, 2026 0
Police escorting former TMC councillor Nirmal Dutta to Bidhannagar court after arrest in voter intimidation case
TMC Leader Nirmal Dutta Arrested

 

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पूर्व पार्षद निर्मल दत्त को वोटरों को कथित रूप से धमकाने और चुनाव को प्रभावित करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। बुधवार को उन्हें विधाननगर कोर्ट में पेश किया गया, जहां अदालत ने उन्हें 10 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया।

शिकायत के बाद हुई कार्रवाई

मामले की शुरुआत मंगलवार को हुई, जब भाजपा प्रत्याशी शरदबत मुखर्जी ने चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्मल दत्त वोटरों को डराकर मतदान को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। इस संबंध में उन्होंने विधाननगर पुलिस कमिश्नर से भी मुलाकात की थी।

शिकायत के आधार पर विधाननगर दक्षिण थाने की पुलिस ने दत्ताबाद इलाके से निर्मल दत्त को गिरफ्तार किया।

सुजीत बोस के करीबी बताए जाते हैं

निर्मल दत्त को राज्य मंत्री सुजीत बोस का करीबी माना जाता है, जो विधाननगर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। दत्त की पत्नी भी विधाननगर नगर निगम के वार्ड संख्या 38 से तृणमूल कांग्रेस की पार्षद हैं।

वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में इस्लामपुर में एक रैली के दौरान चुनाव आयोग की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यदि तृणमूल के एक नेता को गिरफ्तार किया जाता है, तो उनकी जगह सौ अन्य नेता खड़े हो जाएंगे।

वायरल वीडियो से बढ़ा विवाद

बताया जा रहा है कि 13 अप्रैल को सॉल्टलेक में हुई एक बैठक का वीडियो वायरल होने के बाद मामला गरमा गया। इस वीडियो में निर्मल दत्त कथित तौर पर यह कहते नजर आ रहे हैं कि अगर किसी ने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ वोट दिया, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी दावा किया कि एक मोबाइल ऐप के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि किसने किसे वोट दिया है। इस बयान के सामने आने के बाद भाजपा प्रत्याशी ने चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई की।

पहले भी लग चुके हैं आरोप

यह पहली बार नहीं है जब निर्मल दत्त विवादों में आए हैं। इससे पहले भी उन पर सॉल्टलेक के दत्ताबाद इलाके में भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले का आरोप लग चुका है। फिलहाल, पुलिस मामले की जांच में जुटी है और आगे की कार्रवाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार की जाएगी।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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महिला आरक्षण बिल को बड़ा झटका, परिसीमन विवाद में फंसा प्रस्ताव; संसद में पास नहीं हो सका कानून

  नई दिल्ली में राजनीतिक हलचल तेज, विपक्ष ने सरकार पर लगाए गंभीर आरोप भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए लाया गया महत्वपूर्ण बिल संसद में पास नहीं हो सका। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए यह बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि 12 साल के शासन में पहली बार कोई संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव अटक गया है। इस पूरे मामले के पीछे “परिसीमन (Delimitation)” को लेकर चला विवाद मुख्य कारण बताया जा रहा है। सरकार ने लोकसभा में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देने वाले बिल को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ दिया था, जिसके बाद विपक्ष ने इसे लोकतंत्र पर हमला करार दिया। महिला आरक्षण और परिसीमन विवाद ने बढ़ाई टकराव की स्थिति यह विधेयक महिलाओं को संसद और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने के उद्देश्य से लाया गया था। लेकिन इसे 2011 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण (परिसीमन) से जोड़ दिया गया। विपक्ष का कहना है कि यह कदम महिलाओं के अधिकारों के बजाय राजनीतिक सीमाओं को बदलने की कोशिश है। संसद में नहीं मिला दो-तिहाई बहुमत यह एक संवैधानिक संशोधन विधेयक था, जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी था। मतदान में सरकार को 298 वोट मिले, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया। पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण यह बिल पारित नहीं हो सका। विपक्ष का तीखा हमला: ‘लोकतंत्र पर हमला’ विपक्षी दलों ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने इसे लोकतंत्र पर खुला हमला बताया। वहीं गौरव गोगोई ने कहा कि सरकार परिसीमन को “पीछे के दरवाजे” से लागू करने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी ने कहा कि यह बिल महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक नक्शा बदलने का प्रयास है। उत्तर-दक्षिण भारत के बीच बढ़ा राजनीतिक तनाव परिसीमन मुद्दा लंबे समय से भारत में संवेदनशील माना जाता है। दक्षिण भारत के राज्य जैसे तमिलनाडु और केरल को डर है कि जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ने से उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी घट जाएगी। वहीं उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को इसका फायदा मिल सकता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसे “दंडात्मक कदम” बताते हुए विरोध जताया। सरकार का पक्ष: जनसंख्या के आधार पर न्याय जरूरी गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि बढ़ती जनसंख्या के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण जरूरी है ताकि हर वोट का समान मूल्य हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि यह अवसर महिलाओं के हित में है और इसे राजनीतिक नजरिए से नहीं देखना चाहिए। आगे क्या होगा? महिला आरक्षण बिल पहले ही 2023 में पारित हो चुका है, लेकिन इसके लागू होने में 2029 तक की देरी है। अब परिसीमन विवाद के चलते इसकी प्रक्रिया और भी जटिल हो गई है। राजनीतिक दलों के बीच टकराव आगे और बढ़ने की संभावना है।  

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  कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले सियासी तनाव बढ़ता जा रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग और केंद्रीय बलों पर गंभीर आरोप लगाते हुए सवाल उठाया कि उनकी गाड़ी की तलाशी लेने की कोशिश क्यों की गई, जबकि अन्य नेताओं के साथ ऐसा नहीं हो रहा। एयरपोर्ट जाते वक्त तलाशी की कोशिश ममता बनर्जी ने दावा किया कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे जाते समय केंद्रीय सुरक्षा बलों ने उनकी कार की तलाशी लेने की कोशिश की। इस पर उन्होंने कहा, “मैंने कहा तलाशी लो, मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन सिर्फ तृणमूल के नेताओं को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है?” ‘PM मोदी और अमित शाह की गाड़ी क्यों नहीं चेक?’ इस्लामपुर में एक चुनावी रैली के दौरान उन्होंने सवाल उठाया: नरेंद्र मोदी की गाड़ी की तलाशी क्यों नहीं? अमित शाह के काफिले की जांच क्यों नहीं? उन्होंने कहा कि अगर जांच हो रही है, तो सभी दलों के नेताओं पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। ‘मैं कोई चोर नहीं हूं’ मुख्यमंत्री ने अपने बयान में कहा, “अगर आपमें हिम्मत है तो रोज मेरी गाड़ी की तलाशी लीजिए। मैं कोई चोर नहीं हूं।” उन्होंने यह भी कहा कि वह सरकार से वेतन के रूप में एक भी पैसा नहीं लेतीं। चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि चुनाव आयोग ने फ्लाइंग सर्विलांस टीमों को निर्देश दिया है कि मुख्यमंत्री को छोड़कर पार्टी के अन्य नेताओं और उनके परिवार के वाहनों की जांच की जाए। इनमें अभिषेक बनर्जी और उनकी पत्नी का नाम भी शामिल बताया जा रहा है। बढ़ता राजनीतिक टकराव बंगाल में दो चरणों में होने वाले मतदान से पहले यह विवाद चुनावी माहौल को और गरमा रहा है। एक तरफ TMC चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगा रही है, वहीं विपक्ष निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए सख्ती को जरूरी बता रहा है। अब देखना होगा कि इस मुद्दे पर चुनाव आयोग क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या यह विवाद आगे और तूल पकड़ता है।  

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कूचबिहार में गरजे अभिषेक बनर्जी, बोले– भाजपा शासित राज्यों में बंगालियों को ‘बांग्लादेशी’ बताया जा रहा

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले राज्य की राजनीति लगातार गरमाती जा रही है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के राष्ट्रीय महासचिव और डायमंड हार्बर से सांसद Abhishek Banerjee ने मंगलवार को कूचबिहार में एक विशाल रोड शो और जनसभा को संबोधित करते हुए भाजपा पर तीखा हमला बोला। अपने भाषण में उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा शासित राज्यों में बांग्ला भाषी लोगों को “बांग्लादेशी” कहकर उनकी पहचान पर सवाल उठाए जा रहे हैं और उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्होंने इसे न सिर्फ राजनीतिक हमला बल्कि “बंगाली अस्मिता और सम्मान पर चोट” बताया। “हमारी भाषा और पहचान को निशाना बनाया जा रहा” अभिषेक बनर्जी ने कहा कि भाजपा की राजनीति विभाजनकारी है और वह भाषा तथा संस्कृति के आधार पर लोगों को बांटने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा, “जहां-जहां भाजपा की सरकार है, वहां बांग्ला बोलने वालों को संदेह की नजर से देखा जा रहा है। उन्हें घुसपैठिया तक कहा जा रहा है। यह सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय है।” उन्होंने आगे कहा कि बंगाल के लोगों की पहचान और सम्मान की रक्षा करना टीएमसी की प्राथमिक जिम्मेदारी है और पार्टी इसके लिए हर स्तर पर संघर्ष करेगी। खान-पान पर ‘पहरा’ का आरोप सभा को संबोधित करते हुए Abhishek Banerjee ने भाजपा पर लोगों की निजी जिंदगी में दखल देने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि कई भाजपा शासित राज्यों में मछली और मांस की बिक्री व सेवन पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की जा रही है, जो सीधे तौर पर बंगाली संस्कृति पर हमला है। “हमारे यहां मछली-भात सिर्फ खाना नहीं, हमारी परंपरा और पहचान का हिस्सा है। अगर कोई हमारी थाली तक में दखल देगा, तो बंगाल की जनता उसे कभी स्वीकार नहीं करेगी,” उन्होंने कहा। मतदाता सूची से नाम कटने का मुद्दा अभिषेक बनर्जी ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर भी भाजपा को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के जरिए खासकर राजबंशी और मतुआ समुदाय के लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा का “समर्थन” इन समुदायों के लिए सिर्फ दिखावा है, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। “हम यह सुनिश्चित करेंगे कि एक भी वैध मतदाता का नाम सूची से बाहर न रहे। लोकतंत्र में हर नागरिक की भागीदारी जरूरी है,” उन्होंने जोर देकर कहा। केंद्र सरकार पर भेदभाव का आरोप केंद्र की Government of India पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि बंगाल को उसका उचित अधिकार नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि चूंकि राज्य की जनता बार-बार तृणमूल कांग्रेस को चुनती है, इसलिए केंद्र सरकार राजनीतिक बदले की भावना से काम कर रही है। “दिल्ली की सरकार बंगाल के विकास को रोकने की कोशिश कर रही है, लेकिन हम झुकने वाले नहीं हैं,” उन्होंने कहा। “4 मई को जनता देगी जवाब” अपने भाषण के अंत में अभिषेक बनर्जी ने भरोसा जताया कि आने वाले चुनाव में बंगाल की जनता भाजपा को करारा जवाब देगी। उन्होंने कहा, “4 मई को नतीजे आएंगे और उस दिन बंगाल की जनता अहंकारी और बंगाल विरोधी ताकतों को सबक सिखाएगी।” कूचबिहार की इस रैली में Abhishek Banerjee ने बंगाली पहचान, संस्कृति, खान-पान और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया। उनके इस आक्रामक तेवर से साफ है कि आगामी चुनाव में टीएमसी “बंगाली अस्मिता” को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम कर रही है, जिससे राज्य की राजनीति और अधिक ध्रुवीकृत होने की संभावना है।

surbhi अप्रैल 15, 2026 0
Abhishek Banerjee addressing a political rally in Kolkata ahead of West Bengal elections.

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