रोम, एजेंसियां। स्पेन के स्वायत्त शहर स्यूटा में बड़ी संख्या में प्रवासियों के पहुंचने के बाद यूरोपीय संघ में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने स्पेन पर यूरोपीय संघ की बाहरी सीमा की सुरक्षा में विफल रहने का आरोप लगाते हुए उसे शेंगेन व्यवस्था से अस्थायी रूप से निलंबित करने की मांग की है। इस मुद्दे पर कई यूरोपीय देशों ने भी सीमा सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। सीमा सुरक्षा को लेकर इटली का कड़ा रुख जॉर्जिया मेलोनी ने कहा कि यदि कोई सदस्य देश यूरोपीय संघ की बाहरी सीमाओं की प्रभावी सुरक्षा नहीं कर पाता, तो पूरे शेंगेन क्षेत्र की सुरक्षा प्रभावित होती है। इटली ने स्पेन के साथ हवाई और समुद्री मार्गों पर शेंगेन व्यवस्था को अस्थायी रूप से निलंबित करने का फैसला भी लिया है। वहीं फिनलैंड और ऑस्ट्रिया ने भी सीमा नियंत्रण कड़े करने की मांग का समर्थन किया है। स्यूटा में प्रवासियों की भारी आमद से बढ़ी चिंता हाल के दिनों में मोरक्को से हजारों प्रवासी समुद्र और सीमा मार्ग के जरिए स्पेन के स्यूटा क्षेत्र में पहुंच गए, जिससे स्थानीय प्रशासन पर भारी दबाव पड़ गया। स्पेन ने सेना और अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात कर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की है। सरकार का कहना है कि अधिकांश प्रवासियों को वापस भेजने और सीमा पर नियंत्रण बहाल करने की प्रक्रिया जारी है। यूरोपीय संघ के सामने नई चुनौती स्यूटा संकट ने यूरोप में अवैध प्रवासन और सीमा सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। हालांकि यूरोपीय आयोग ने स्पेन को शेंगेन क्षेत्र से निलंबित करने की मांग का समर्थन नहीं किया है, लेकिन सदस्य देशों के बीच इस मुद्दे पर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में यूरोपीय संघ को सीमा सुरक्षा और प्रवासन नीति पर बड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं।
गाजा सिटी, एजेंसियां। गाजा में लंबे समय से जारी संघर्ष के बीच शांति की नई उम्मीद जगी है। अमेरिका की मध्यस्थता में तैयार किए गए नए प्रस्ताव पर बातचीत आगे बढ़ी है, जिसमें हमास के चरणबद्ध निरस्त्रीकरण, इजरायली सेना की क्रमिक वापसी और गाजा में नई प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करने का रोडमैप शामिल है। हालांकि दोनों पक्षों के बीच कई अहम मुद्दों पर मतभेद अब भी बने हुए हैं। युद्धविराम लागू करने पर बनी सहमति की कोशिश प्रस्तावित योजना के तहत संघर्ष विराम लागू करने, मानवीय सहायता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय निगरानी में गाजा के प्रशासन को नई व्यवस्था के तहत संचालित करने का प्रस्ताव रखा गया है। हमास ने कुछ शर्तों के साथ योजना पर आगे बातचीत की इच्छा जताई है, जबकि इजरायल का कहना है कि स्थायी शांति के लिए हमास का पूर्ण निरस्त्रीकरण जरूरी होगा। मतभेद बने रहने से आसान नहीं होगा समझौता विशेषज्ञों का मानना है कि शांति प्रक्रिया अभी शुरुआती दौर में है। सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर है कि पहले कौन-सा पक्ष कदम उठाएगा। हमास पहले इजरायली सेना की वापसी और हमलों पर रोक चाहता है, जबकि इजरायल पहले सुरक्षा संबंधी सभी शर्तें पूरी होने की मांग कर रहा है। यही मतभेद समझौते के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर वार्ता पर संयुक्त राष्ट्र सहित कई देशों ने गाजा में स्थायी शांति स्थापित करने के प्रयासों का स्वागत किया है। यदि वार्ता सफल रहती है तो इससे गाजा में मानवीय संकट कम होने, पुनर्निर्माण कार्य शुरू होने और क्षेत्र में लंबे समय से जारी हिंसा पर विराम लगने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि अंतिम समझौता दोनों पक्षों की सहमति और उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
स्यूटा (स्पेन), एजेंसियां। स्पेन के स्वायत्त शहर स्यूटा में मोरक्को की ओर से हजारों प्रवासियों के अचानक सीमा पार करने की कोशिश के बाद बड़ा मानवीय और सुरक्षा संकट खड़ा हो गया है। हालात को देखते हुए स्पेन सरकार ने अतिरिक्त सुरक्षा बलों के साथ सेना को भी तैनात कर दिया है। अधिकारियों के अनुसार, एक ही दिन में हजारों लोग समुद्र और सीमा मार्ग से स्यूटा पहुंचने की कोशिश करते देखे गए। सीमा पर बढ़ाई गई निगरानी स्पेन और मोरक्को के अधिकारियों ने संयुक्त रूप से सीमा पर निगरानी बढ़ा दी है। स्पेन सरकार ने अवैध रूप से प्रवेश करने वाले लोगों को वापस भेजने की प्रक्रिया तेज कर दी है। वहीं कई प्रवासियों को अस्थायी राहत शिविरों में रखा गया है, जहां उन्हें भोजन और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। समुद्र पार करते समय कई लोगों की मौत अधिकारियों के अनुसार, समुद्र के रास्ते स्यूटा पहुंचने की कोशिश के दौरान कई प्रवासियों की डूबने से मौत हो गई। बचाव एजेंसियां लगातार समुद्र में तलाश अभियान चला रही हैं और लापता लोगों की खोज की जा रही है। इस घटना ने यूरोप में प्रवासन संकट को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। यूरोप में फिर गरमाया प्रवासन का मुद्दा इस घटनाक्रम के बाद स्पेन और यूरोपीय संघ में अवैध प्रवासन को लेकर बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अफ्रीकी देशों में आर्थिक कठिनाइयों और अस्थिरता के कारण यूरोप की ओर पलायन का दबाव लगातार बढ़ रहा है, जिससे सीमा सुरक्षा और मानवीय सहायता दोनों बड़ी चुनौती बन गई हैं।
पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार ने अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले में किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जाएगी। विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि उनकी सरकार केंद्र की ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति को पूरी दृढ़ता के साथ लागू कर रही है और इससे पीछे हटने का कोई सवाल नहीं है। 10 हजार घुसपैठियों की पहचान का दावा मुख्यमंत्री ने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार बनने के बाद पिछले लगभग डेढ़ महीने के दौरान 10 हजार अवैध घुसपैठियों की पहचान की गई है। उन्होंने दावा किया कि इनमें से बड़ी संख्या में लोगों को सीमा पार वापस भेजा जा चुका है और शेष के खिलाफ भी कार्रवाई जारी है। 12 होल्डिंग सेंटरों में रखे गए 1800 लोग मुख्यमंत्री के अनुसार राज्य सरकार ने हाल ही में 12 होल्डिंग सेंटर स्थापित किए हैं, जहां फिलहाल 1800 लोगों को रखा गया है। उन्होंने कहा कि आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन लोगों को भी जल्द डिपोर्ट किया जाएगा। गिरफ्तारी के बाद बीएसएफ को सौंपे जाएंगे लोग मुख्यमंत्री ने कहा कि अवैध घुसपैठ के मामलों में गिरफ्तार व्यक्तियों को जेल में रखने के बजाय सीधे सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को सौंपा जाएगा, ताकि उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के तहत सीमा पार भेजा जा सके। उन्होंने कहा कि राज्य की सुरक्षा और राष्ट्रीय हित सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। पूर्ववर्ती सरकार पर लगाए आरोप अपने भाषण के दौरान मुख्यमंत्री ने पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए आवश्यक सहयोग नहीं दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्षों तक सीमा पर बाड़ लगाने के लिए बीएसएफ को पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं कराई गई। बीएसएफ को 142.79 एकड़ भूमि देने का दावा मुख्यमंत्री ने बताया कि उनकी सरकार ने सत्ता संभालने के बाद डेढ़ महीने से भी कम समय में बीएसएफ को 142.79 एकड़ भूमि उपलब्ध कराई है। उनके अनुसार इससे सीमा पर कंटीले तार लगाने और सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने का काम तेज होगा। ‘जो भागना चाहते हैं, वे भाग जाएं’ मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि जो लोग अवैध रूप से राज्य में रह रहे हैं और भागना चाहते हैं, वे सीमा पर बाड़ पूरी होने से पहले चले जाएं। उन्होंने दावा किया कि सरकार की सख्ती के बाद कुछ क्षेत्रों से अवैध घुसपैठियों के वापस लौटने की सूचनाएं भी मिली हैं। भारतीय नागरिकों को चिंता की जरूरत नहीं मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि वास्तविक भारतीय नागरिकों को किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार की कार्रवाई केवल अवैध घुसपैठियों के खिलाफ है और इसका किसी धर्म, जाति या समुदाय से कोई संबंध नहीं है। सरकारी योजनाओं का लाभ केवल नागरिकों को मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार की सभी जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ केवल भारतीय नागरिकों को मिलेगा। उन्होंने अन्नपूर्णा भंडार, वृद्धावस्था पेंशन, बेरोजगारी भत्ता, शिक्षा और रोजगार से जुड़ी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकारी संसाधनों का उपयोग केवल पात्र नागरिकों के लिए किया जाएगा और किसी भी अवैध घुसपैठिये को इन योजनाओं का लाभ नहीं लेने दिया जाएगा। आगे और तेज हो सकती है कार्रवाई मुख्यमंत्री के बयान से संकेत मिला है कि राज्य सरकार आने वाले दिनों में अवैध घुसपैठ के खिलाफ अपनी कार्रवाई को और तेज कर सकती है। पहचान, हिरासत और डिपोर्टेशन की प्रक्रिया को लेकर प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां जारी हैं और सरकार इसे अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर रही है।
गुवाहाटी: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सीमावर्ती राज्यों में रहने वाले प्रत्येक परिवार की नागरिकता की जांच की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि असम सरकार केंद्र सरकार को यह सुझाव देगी कि सीमा से सटे क्षेत्रों में रहने वाले सभी परिवारों की नागरिकता का सत्यापन किया जाए, ताकि अवैध घुसपैठ और जनसांख्यिकीय बदलावों का सही आकलन किया जा सके। असम समझौते में हुई ऐतिहासिक भूल: सरमा पत्रकारों से बातचीत में हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि 1985 के असम समझौते के दौरान केवल असम-बांग्लादेश सीमा पर फेंसिंग की मांग को प्राथमिकता दी गई, जबकि मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम और पश्चिम बंगाल जैसे अन्य सीमावर्ती राज्यों की सीमाओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने कहा, "यह एक ऐतिहासिक भूल थी। अगर एक जगह सीमा बंद कर दी जाए और दूसरे हिस्से खुले रहें, तो सुरक्षा उपायों का पूरा लाभ नहीं मिलता।" पश्चिम बंगाल का किया जिक्र मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से पश्चिम बंगाल का उल्लेख करते हुए कहा कि लंबे समय तक राज्य की सीमा का बड़ा हिस्सा खुला रहा, जिसके कारण अवैध आवागमन जारी रहा। उन्होंने कहा कि वर्षों तक सीमा प्रबंधन में कमियों के कारण घुसपैठ को पूरी तरह नहीं रोका जा सका। सीमावर्ती राज्यों में तेजी से हो रहा फेंसिंग का काम सरमा ने कहा कि अब स्थिति बदल रही है और भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि: मेघालय में सीमा फेंसिंग का लगभग 90 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। त्रिपुरा में करीब 60 प्रतिशत काम पूरा हो गया है। मिजोरम में फेंसिंग का कार्य जारी है। पश्चिम बंगाल में भी अब सीमा पर बाड़ लगाने का काम शुरू हो गया है। डेमोग्राफी बदलाव की होगी जांच मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Change) का अध्ययन करने के लिए एक समिति गठित की है। असम सरकार इस समिति को सुझाव देगी कि सीमा से सटे क्षेत्रों में रहने वाले हर परिवार की नागरिकता की जांच की जाए। उन्होंने कहा कि नागरिकता सत्यापन और जनसंख्या संरचना में बदलाव का अध्ययन भविष्य में सीमा सुरक्षा को मजबूत करने और अवैध घुसपैठ पर नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। सीमा सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता हिमंत बिस्वा सरमा का यह बयान ऐसे समय आया है, जब पूर्वोत्तर राज्यों में अवैध घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। असम सरकार का मानना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में व्यापक नागरिकता सत्यापन से सुरक्षा चुनौतियों की बेहतर पहचान की जा सकेगी और भविष्य की नीतियों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।
भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा सुरक्षा और समन्वय से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोमवार से नई दिल्ली में उच्चस्तरीय वार्ता शुरू हो रही है। Border Security Force (बीएसएफ) और Border Guard Bangladesh (बीजीबी) के महानिदेशकों की 57वीं द्विवार्षिक बैठक 8 से 11 जून तक आयोजित की जाएगी। इस बैठक में सीमा प्रबंधन, सुरक्षा सहयोग और अवैध घुसपैठियों की वापसी जैसे संवेदनशील विषयों पर चर्चा होने की संभावना है। नई दिल्ली में जुटेंगे दोनों देशों के सीमा सुरक्षा प्रमुख चार दिवसीय सम्मेलन में बांग्लादेशी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व बीजीबी प्रमुख Mohammad Ashrafuzzaman Siddiqui करेंगे, जबकि भारतीय पक्ष की अगुवाई बीएसएफ महानिदेशक Praveen Kumar करेंगे। दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी सीमा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगे। अवैध प्रवासियों की वापसी रहेगा प्रमुख एजेंडा बैठक का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा भारत में रह रहे अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया को लेकर माना जा रहा है। बांग्लादेश ने इस विषय पर अपनी आपत्तियां जताई हैं और इसे वार्ता में प्रमुखता से उठाने की बात कही है। बांग्लादेश के गृह मामलों के सलाहकार Salahuddin Ahmed ने कहा है कि सीमा की मौजूदा स्थिति, द्विपक्षीय सहयोग और अवैध प्रवासियों की वापसी का मुद्दा बैठक में प्रमुख रूप से उठाया जाएगा। वहीं भारत का कहना है कि केवल सत्यापित अवैध घुसपैठियों को स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए बांग्लादेश भेजा जाता है। सीमा अपराध और तस्करी पर भी होगी बातचीत सम्मेलन में सीमा पार अपराध, मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी, अवैध घुसपैठ और सीमा पर होने वाली अन्य आपराधिक गतिविधियों को रोकने के उपायों पर भी चर्चा की जाएगी। दोनों पक्ष सीमा क्षेत्रों में बेहतर समन्वय और विश्वास बढ़ाने के उपायों पर भी विचार कर सकते हैं। 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा बनी चुनौती भारत और Bangladesh के बीच लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। इसमें से करीब 860 किलोमीटर हिस्से में अभी भी बाड़ नहीं लगी है, जिसके कारण सुरक्षा एजेंसियों के सामने निगरानी और अवैध आवाजाही रोकने की चुनौती बनी रहती है। पांच दशक पुराना संवाद तंत्र भारत और बांग्लादेश के बीच महानिदेशक स्तर की सीमा वार्ताओं की शुरुआत 1975 में हुई थी। वर्ष 1975 से 1992 तक यह बैठक हर साल आयोजित की जाती थी, जबकि 1993 से इसे द्विवार्षिक स्वरूप दिया गया। सीमा से जुड़े मुद्दों के समाधान और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने में यह तंत्र दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारत और नेपाल के बीच रिश्तों को मजबूत बनाने की कोशिशों के बीच नेपाल द्वारा भारत-नेपाल सीमा पर चीनी तकनीक आधारित थर्मल निगरानी कैमरे लगाने की खबरों ने नई चर्चा छेड़ दी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल उत्तराखंड से सटी सीमा पर आधुनिक थर्मल सर्विलांस सिस्टम स्थापित कर रहा है, जिनका उपयोग दिन और रात दोनों समय गतिविधियों की निगरानी के लिए किया जाएगा। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इन कैमरों के संचालन के लिए चीनी संचार और इंटरनेट ढांचे का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन दावों की अभी तक भारत या नेपाल की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। 2016 से शुरू हुई थी तकनीकी साझेदारी नेपाल और चीन के बीच सीमा निगरानी से जुड़ा तकनीकी सहयोग कोई नया नहीं है। दोनों देशों के बीच वर्ष 2016 में सुरक्षा और तकनीकी सहयोग को लेकर समझौते हुए थे। इसके बाद 2019 में सीमा क्षेत्रों के सर्वेक्षण और तकनीकी अध्ययन के लिए वित्तीय मंजूरी दी गई। झूलाघाट समेत कई सीमावर्ती क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया था, जहां बाद में निगरानी प्रणाली स्थापित करने की योजना बनाई गई। इसी प्रक्रिया के तहत अब थर्मल कैमरों की तैनाती को आगे बढ़ाया जा रहा है। उत्तराखंड सीमा के किन क्षेत्रों पर रहेगी नजर? भारत और नेपाल के बीच उत्तराखंड में करीब 275 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। भारतीय सीमा की सुरक्षा Sashastra Seema Bal (SSB) और नेपाल की ओर से Armed Police Force Nepal संभालती है। भारतीय क्षेत्र में पिथौरागढ़, झूलाघाट, धारचूला, चंपावत और ऊधमसिंह नगर जैसे इलाके इस सीमा का हिस्सा हैं। वहीं नेपाल की ओर दार्चुला, बैतड़ी, डडेलधुरा और कंचनपुर जिले सीमा से जुड़े हुए हैं। कालापानी विवाद के बाद बढ़ा फोकस विश्लेषकों का मानना है कि 2020 में कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर भारत-नेपाल के बीच पैदा हुए विवाद के बाद नेपाल ने सीमा क्षेत्रों में अपनी सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया। इसी दौरान नेपाल ने कई नए बॉर्डर आउट पोस्ट (BOP) स्थापित किए और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी प्रणालियों के विस्तार की योजना शुरू की। थर्मल कैमरों की तैनाती को उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। भारत ने भी मजबूत की निगरानी व्यवस्था सीमा पार गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भारत ने भी हाल के वर्षों में निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया है। प्रमुख सीमा बिंदुओं पर डिजिटल रिकॉर्डिंग सिस्टम, आधुनिक स्क्रीनिंग उपकरण और चौबीसों घंटे गश्त की व्यवस्था की गई है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, सीमा पार करने वाले लोगों की डिजिटल रिकॉर्डिंग और पहचान सत्यापन की प्रक्रिया को और सख्त बनाया गया है। संवेदनशील इलाकों में SSB और स्थानीय पुलिस संयुक्त रूप से निगरानी कर रही है। राजनीतिक बयानबाजी भी बनी चिंता नेपाल की राजनीति में समय-समय पर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे सीमा विवादों को लेकर बयान सामने आते रहे हैं। हाल के महीनों में नेपाल के प्रधानमंत्री Balen Shah के कुछ बयानों ने भी चर्चा पैदा की थी, बाद में नेपाल के विदेश मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी किया था। रिश्ते सुधारने की कोशिश जारी सीमा पर तकनीकी गतिविधियों के बीच दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संपर्क भी जारी हैं। नेपाल के राजनीतिक नेतृत्व और भारतीय अधिकारियों के बीच हाल के महीनों में कई उच्चस्तरीय मुलाकातें हुई हैं। डिजिटल भुगतान, स्वास्थ्य, कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी है। सीमा पर चीन निर्मित निगरानी उपकरणों की तैनाती और संभावित चीनी संचार नेटवर्क के इस्तेमाल की खबरों ने सुरक्षा विशेषज्ञों और रणनीतिक विश्लेषकों का ध्यान जरूर आकर्षित किया है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर दोनों देशों की आधिकारिक प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण मानी जाएगी।
त्रिपुरा: केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने त्रिपुरा के भारत-बांग्लादेश सीमा क्षेत्र का दौरा करते हुए सीमावर्ती इलाकों में किसी भी प्रकार के डेमोग्राफिक बदलाव को लेकर कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि देश किसी भी कीमत पर सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसंख्या संरचना में बदलाव को स्वीकार नहीं करेगा। लंकामुरा सीमा चौकी पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवानों को संबोधित करते हुए शाह ने घुसपैठ को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया और इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया। सीमावर्ती इलाकों में बदलाव पर ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति गृह मंत्री ने कहा कि भारत की नीति साफ है—सीमावर्ती राज्यों में किसी भी तरह के अवैध घुसपैठ या डेमोग्राफिक बदलाव को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा सिर्फ त्रिपुरा तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिम बंगाल, बिहार और अन्य सीमावर्ती राज्यों के लिए भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। शाह ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता से जुड़ा गंभीर विषय बताया। घुसपैठ रोकने के लिए ‘स्मार्ट बॉर्डर’ प्रोजेक्ट शाह ने सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सरकार की नई पहल ‘स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट’ का भी ऐलान किया। उन्होंने बताया कि इस परियोजना को पायलट आधार पर देश के 7 से 8 संवेदनशील स्थानों पर लागू किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत आधुनिक तकनीक, डिजिटल निगरानी और स्थानीय प्रशासन के बेहतर समन्वय का उपयोग किया जाएगा। सीमा पर किसी भी प्रकार के अवैध अतिक्रमण को रोकने के लिए शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) की नीति अपनाई जाएगी। सीमा पर अवैध गतिविधियों पर कड़ी नजर गृह मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि सीमा क्षेत्रों में कट्टरपंथी गतिविधियों, संदिग्ध वाहनों और फर्जी कंपनियों पर लगातार निगरानी रखी जाए। उन्होंने कहा कि सीमा की सुरक्षा केवल भौतिक चौकसी नहीं, बल्कि तकनीकी और खुफिया तंत्र के माध्यम से भी मजबूत की जाएगी। बीएसएफ जवानों की सराहना और पर्यावरण संदेश अपने दौरे के दौरान Border Security Force के जवानों की सराहना करते हुए शाह ने कहा कि सीमाओं की सुरक्षा में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर उन्होंने ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का भी उल्लेख किया और जवानों द्वारा पेड़ लगाने के प्रयासों की सराहना की। शाह ने कहा कि यह केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति एक स्वाभाविक जिम्मेदारी होनी चाहिए। सुरक्षा और विकास के बीच संतुलन पर जोर गृह मंत्री ने कहा कि सीमा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास के साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था को भी आधुनिक और मजबूत बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। यह दौरा भारत की सीमाई सुरक्षा रणनीति और घुसपैठ रोकने के प्रयासों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
Suvendu Adhikari के मुख्यमंत्री बनते ही West Bengal में कानून-व्यवस्था और सीमा सुरक्षा को लेकर बड़े फैसलों का दौर शुरू हो गया है। अपनी पहली ही कैबिनेट बैठक में शुभेंदु सरकार ने गौ-तस्करी के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए बड़ा कदम उठाया। सरकार ने Border Security Force (BSF) को बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी (Fencing) के लिए जमीन हस्तांतरण की मंजूरी दे दी है। सरकार का मानना है कि जब तक सीमा पूरी तरह सुरक्षित नहीं होगी, तब तक अंतरराष्ट्रीय गौ-तस्करी और घुसपैठ पर प्रभावी रोक लगाना मुश्किल रहेगा। गौ-तस्करी के नेटवर्क पर बड़ा प्रहार कैबिनेट बैठक के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा कि बंगाल में अब तस्करों और अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं होगी। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकार के दौरान सीमा पर बाड़बंदी का काम लंबे समय तक अटका रहा, जिसकी वजह से तस्करी का नेटवर्क मजबूत होता गया। अब सरकार का दावा है कि BSF को जमीन मिलने के बाद सीमा पर तेजी से बाड़ लगाने का काम पूरा किया जाएगा, जिससे तस्करी के प्रमुख रास्ते बंद हो सकेंगे। ‘नार्को-टेरर’ और तस्करी के गठजोड़ पर नजर राज्य सरकार का कहना है कि गौ-तस्करी से आने वाला पैसा सिर्फ अवैध कारोबार तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे सुरक्षा से जुड़े खतरे भी पैदा हो रहे हैं। इसी को देखते हुए गृह विभाग को निर्देश दिया गया है कि तस्करी में शामिल बड़े नेटवर्क और कथित सरगनाओं पर सख्त कार्रवाई की जाए। सरकार इसे सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा मान रही है। सीमावर्ती जिलों पर खास फोकस कैबिनेट बैठक में सीमावर्ती जिलों में तेजी से बदलते जनसंख्या पैटर्न को भी गंभीर विषय बताया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि सीमा सुरक्षा मजबूत करना राज्य की आंतरिक सुरक्षा के लिए जरूरी है। भूमि एवं राजस्व विभाग को निर्देश दिया गया है कि BSF को जमीन सौंपने की प्रक्रिया 45 दिनों के भीतर पूरी की जाए ताकि बाड़बंदी के काम में और देरी न हो। केंद्र के साथ संयुक्त अभियान की तैयारी राज्य सरकार अब केंद्र सरकार के साथ मिलकर संयुक्त अभियान (Joint Operation) चलाने की तैयारी में भी है। इसके तहत सीमा सुरक्षा, घुसपैठ रोकने और अवैध गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाने की रणनीति पर काम किया जाएगा। इसके अलावा जनगणना और केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों को तेजी से लागू करने का फैसला भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक संदेश भी साफ भाजपा सरकार के इस फैसले को राजनीतिक तौर पर भी बड़ा संदेश माना जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने लगातार सीमा सुरक्षा, घुसपैठ और गौ-तस्करी को बड़ा मुद्दा बनाया था। अब सत्ता में आने के बाद सरकार ने पहली कैबिनेट में ही इस दिशा में बड़ा फैसला लेकर यह संकेत देने की कोशिश की है कि बंगाल में कानून-व्यवस्था और सीमा प्रबंधन को लेकर नई नीति अपनाई जाएगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।