पटना, एजेंसियां। बिहार विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) में टिकट वितरण को लेकर असंतोष खुलकर सामने आ गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री शिवचंद्र राम ने एमएलसी टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर संगठन के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफे के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। इस बीच तेज प्रताप यादव भी उनके समर्थन में सामने आए हैं और पार्टी के रवैये पर सवाल उठाए हैं। तेज प्रताप ने जताई नाराजगी तेज प्रताप यादव ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट कर शिवचंद्र राम का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि शिवचंद्र राम वर्षों से पार्टी और समाज के लिए समर्पित भाव से काम करते रहे हैं। संत रविदास के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने और समाज को जोड़ने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। तेज प्रताप ने कहा कि उनके साथ जिस प्रकार का व्यवहार किया गया, वह निराशाजनक और निंदनीय है। सामाजिक न्याय की राजनीति में सभी वर्गों को सम्मान और उचित भागीदारी मिलनी चाहिए। प्रेस कॉन्फ्रेंस में भावुक हुए शिवचंद्र राम एमएलसी चुनाव के लिए आरजेडी उम्मीदवार के नामांकन के बाद शिवचंद्र राम की नाराजगी सार्वजनिक हो गई। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वे भावुक होकर रो पड़े। उन्होंने कहा कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें विधान परिषद भेजने का आश्वासन दिया था, लेकिन अंतिम समय में उनका नाम सूची से बाहर कर दिया गया। उन्होंने बताया कि इस घटनाक्रम से वे मानसिक रूप से बेहद आहत हैं। दलित प्रतिनिधित्व का मुद्दा बना चर्चा का केंद्र शिवचंद्र राम ने अपने इस्तीफे में दलित और रविदास समाज की उपेक्षा का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि समाज के लोगों को उनसे बड़ी उम्मीदें थीं और टिकट नहीं मिलने से उनमें निराशा फैल गई है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने केवल संगठनात्मक पद छोड़ा है, पार्टी नहीं। उन्होंने आरजेडी नेतृत्व से दलित, आदिवासी, पिछड़ा, अतिपिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट नीति बनाने की मांग की। वहीं उन्होंने लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव के प्रति आभार भी व्यक्त किया।
पटना, एजेंसियां। बिहार विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव को लेकर एनडीए के भीतर नए राजनीतिक समीकरण उभरकर सामने आ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का निर्विरोध एमएलसी बनना अब लगभग असंभव माना जा रहा है। चर्चा है कि जिस सीट पर उनके निर्विरोध निर्वाचन की संभावना थी, वह अब लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के खाते में चली गई है। पार्टी ने इस सीट के लिए अपने कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष अशरफ अंसारी को उम्मीदवार घोषित कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि इस घटनाक्रम का संबंध राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा से जोड़ा जा रहा है। एनडीए सूत्रों का दावा है कि भाजपा नेतृत्व ने पहले उपेंद्र कुशवाहा से उनकी पार्टी के भाजपा में विलय को लेकर बातचीत की थी, लेकिन इस पर कोई अंतिम सहमति नहीं बन सकी। इसी वजह से दीपक प्रकाश का नाम निर्विरोध सीट के लिए आगे नहीं बढ़ाया गया। बदला चुनावी गणित अशरफ अंसारी के उम्मीदवार घोषित होने के बाद अब विधान परिषद की बची हुई सीटों पर मुकाबला और रोचक हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब दीपक प्रकाश को चुनावी मैदान में उतरना पड़ सकता है, जहां जीत का गणित पहले जितना आसान नहीं रहेगा। महागठबंधन के पास भी पर्याप्त संख्या बल होने के कारण मुकाबला चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। भविष्य में फिर खुल सकता है रास्ता हालांकि राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि दीपक प्रकाश के लिए संभावनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। यदि भविष्य में उपेंद्र कुशवाहा और भाजपा के बीच राजनीतिक समीकरण बेहतर होते हैं, तो मार्च 2027 में राज्यपाल कोटे से होने वाले मनोनयन के दौरान उन्हें विधान परिषद भेजा जा सकता है। फिलहाल बिहार की राजनीति में इस मुद्दे ने नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है और एनडीए के भीतर की रणनीति पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
पटना: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बिहार विधान परिषद चुनाव 2026 के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति ने चार नामों पर अंतिम मुहर लगाते हुए उन्हें चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया है। घोषित उम्मीदवारों में पवन सिंह, डॉ. संजय मयूख, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित शामिल हैं। बीजेपी ने जारी की उम्मीदवारों की सूची भाजपा द्वारा जारी सूची के अनुसार, डॉ. संजय मयूख को एक बार फिर विधान परिषद चुनाव का टिकट दिया गया है। वहीं पवन सिंह, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित को पहली बार पार्टी ने विधान परिषद के लिए उम्मीदवार बनाया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उम्मीदवारों के चयन में पार्टी ने सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की है। चार उम्मीदवारों में दो सवर्ण और दो अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं। जदयू ने भी उतारे चार उम्मीदवार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दल जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने भी अपने चार उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। पार्टी ने निशांत कुमार, भारती मंडल, ललन प्रसाद और शिवरानी देवी को चुनाव मैदान में उतारा है। जदयू के चारों उम्मीदवार नए चेहरे हैं और पहली बार किसी सदन के सदस्य बनने की दौड़ में शामिल होंगे। सामाजिक समीकरण पर एनडीए का फोकस एनडीए के घोषित आठ उम्मीदवारों में पांच अति पिछड़ा वर्ग से हैं। भाजपा ने जहां दो सवर्ण और दो अति पिछड़ा वर्ग के नेताओं को मौका दिया है, वहीं जदयू ने भी सामाजिक प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए अपने उम्मीदवारों का चयन किया है। संजय मयूख तीसरी बार मैदान में भाजपा उम्मीदवारों में डॉ. संजय मयूख सबसे अनुभवी चेहरा हैं। पार्टी ने उन पर लगातार तीसरी बार भरोसा जताया है। यदि वे चुनाव जीतते हैं तो एक बार फिर विधान परिषद में भाजपा का प्रतिनिधित्व करेंगे। 9 सीटों के लिए होगा चुनाव 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा के आधार पर विधान परिषद की 9 सीटों के लिए चुनाव कराया जाएगा। चुनावी गणित के अनुसार किसी उम्मीदवार को जीत दर्ज करने के लिए लगभग 25 विधायकों की पहली वरीयता का समर्थन चाहिए होगा। यदि पहली वरीयता के मतों से सभी सीटों का फैसला नहीं होता है, तो दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती की जाती है, जिससे अंतिम परिणाम प्रभावित हो सकता है। एनडीए को आठ सीटों पर बढ़त का भरोसा विधानसभा में वर्तमान संख्या बल को देखते हुए एनडीए मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है। जदयू, भाजपा और अन्य सहयोगी दलों को मिलाकर गठबंधन के पास लगभग 202 विधायक हैं, जिसके आधार पर एनडीए को 9 में से 8 सीटें जीतने की उम्मीद है। वहीं महागठबंधन के पास लगभग 41 विधायक हैं, जो उसे कम से कम एक सीट जीतने की स्थिति में रखते हैं। ऐसे में चुनावी मुकाबले का केंद्र दूसरी वरीयता के वोट और दलों की रणनीति पर रहेगा।
पटना, एजेंसियां। बिहार विधान परिषद की 10 सीटों लिए चुनाव की घोषणा कर दी गई है। चुनाव आयोग ने मंगलवार को इसकी सूचना जारी की। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की खाली सीट समेत नौ अन्य सदस्यों का कार्यकाल 28 जून को समाप्त हो रहा है। इन सभी सीटों पर 18 जून को मतदान कराया जाएगा। पहली जून को विधिवत अधिसूचना जारी होगी। इसके साथ ही नामांकन का कार्य आरंभ हो जाएगा। चुनाव का पूरा शेड्यूल पहली जून से आठ जून तक नामांकन होगा। नौ जून को नामांकन पत्रों की जांच की जाएगी। 11 जून तक नाम वापसी का समय है। दस नामांकन होने की स्थिति में 11 जून को नाम वापसी की समय खत्म हो जाने के बाद निर्विरोध निर्वाचन की घोषणा कर दी जाएगी। दस से अधिक नामांकन की स्थिति में 18 जून को मतदान कराया जाएगा। विधानसभा कोटे की इन दस सीटों के लिए 18 जून को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक वोट डाला जाएगा। शाम चार बजे के बाद मतों की गिनती होगी और परिणाम जारी होगा। इनके कार्यकाल हो रहे खत्म डॉ. कुमुद वर्मा, प्रो. गुलाम गौस, मो. फारूख, भीषम साहनी, श्रीभगवान सिंह कुशवाहा, संजय प्रकाश, समीकर कुमार सिंह, सम्राट चौधरी और सुनीरल कुमार सिंह का कार्यकाल 28 जून को खत्म हो रहा है। इन पदों पर द्विवार्षिक चुनाव कराए जायेंगे। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की खाली सीट को भरे जाने के लिए भी उप चुनाव कराने की घोषणा की गई है। इस सीट पर भी 18 जून को जरूरत पड़ने पर वोट कराए जायेंगे। एनडीए से दो मंत्रियों की एंट्री तयः बिहार विधानसभा कोटे से विधान परिषद की 10 सीटों पर 18 जून को होने वाले चुनाव में सबसे बड़ा झटका कांग्रेस को लगना तय माना जा रहा है। विधानसभा में संख्या बल कमजोर होने के कारण कांग्रेस इस बार अपने कोटे से एक भी सदस्य विधान परिषद नहीं भेज पाएगी। कांग्रेस के विधान पार्षद डॉ. समीर कुमार सिंह का कार्यकाल 28 जून को समाप्त हो रहा है। उनके कार्यकाल खत्म होने के बाद परिषद में कांग्रेस के सिर्फ दो सदस्य ही बचेंगे। इसी प्रकार राजद को भी एक सीट का नुकसान उठाना पड़ेगा। उसके दो सदस्य रिटायर हो रहे है, जबकि विधानसभा में संख्या बल के आधार पर पार्टी मात्र एक सदस्य को ही विधान परिषद भेज सकेगी। चुनाव में सबसे अधिक जदयू कोटे की पांच सीटे विधान परिषद की जिन 10 सीटों का कार्यकाल जून में समाप्त हो रहा है, उनमें सबसे अधिक पांच सीटें जदयू कोटे की हैं। भाजपा और राजद के दो-दो सदस्य रिटायर हो रहे हैं। एनडीए कोटे से दो मंत्रियों का विधान परिषद पहुंचना लगभग तय माना जा रहा है। इनमें स्वास्थ्य मंत्री निशांत और पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का नाम है। भाजपा कोटे से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और संजय प्रकाश की सीटों का कार्यकाल भी 28 जून को समाप्त हो रहा है, लेकिन भाजपा अभी यह तय नहीं कर पाई है कि इन सीटों पर किन चेहरों को मौका दिया जाएगा। जदयू की जिन सीटों पर चुनाव होना है, उनमें कुमुद वर्मा, गुलाम गौस, भीष्म सहनी और श्रीभगवान सिंह कुशवाहा के इस्तीफे से रिक्त सीटें शामिल हैं। इसके अलावा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर भी उपचुनाव कराया जाना है।
Bihar Politics: बिहार विधान परिषद की भोजपुर-बक्सर स्थानीय निकाय सीट पर उपचुनाव की घोषणा कर दी गई है। चुनाव आयोग के अनुसार इस सीट पर 12 मई को मतदान और 14 मई को मतगणना होगी। क्यों खाली हुई सीट? यह सीट 16 नवंबर 2025 से खाली है। पहले इस पर जदयू नेता राधा चरण साह का कब्जा था विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें यह सीट छोड़नी पड़ी उनका कार्यकाल 7 अप्रैल 2028 तक था चुनाव का पूरा शेड्यूल 16 अप्रैल: अधिसूचना जारी 23 अप्रैल: नामांकन की अंतिम तिथि 24 अप्रैल: नामांकन पत्रों की जांच 27 अप्रैल: नाम वापसी की आखिरी तारीख 12 मई: मतदान 14 मई: मतगणना आचार संहिता लागू, बढ़ी सियासी हलचल चुनाव की घोषणा के साथ ही भोजपुर और बक्सर क्षेत्र में आचार संहिता लागू हो गई है। इसके बाद राजनीतिक दलों की गतिविधियां तेज हो गई हैं और सभी पार्टियां अपनी-अपनी रणनीति बनाने में जुट गई हैं। NDA बनाम विपक्ष, मुकाबला रोचक यह सीट पहले जदयू (NDA) के पास थी NDA फिर से जीत का दावा कर रहा है वहीं विपक्ष इस मौके को भुनाने की तैयारी में है 27 वोट से जीते थे राधा चरण साह 2025 के विधानसभा चुनाव में राधा चरण साह ने: संदेश सीट से जदयू के टिकट पर जीत दर्ज की राजद के दीपू सिंह को सिर्फ 27 वोटों से हराया उन्हें कुल 80,598 वोट मिले यह मुकाबला काफी चर्चित रहा था।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।